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Saturday, October 29, 2022

फिल्मों को सरदार ने दी थी जीवनी शक्ति


सरदार पटेल और फिल्म। सधारणतया इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। ऐसा कहने पर लोग चौंकते भी हैं। सरदार पटेल को स्वाधीनता के लिए संघर्ष करनेवाले अग्रिम पंक्ति के नेता, आधुनिक भारत के निर्माता,सख्त निर्णय लेनेवाले कुशल प्रशासक, राष्ट्रवाद के सजग प्रहरी आदि के तौर पर याद किया जाता है। लेकिन सरदार पटेल और फिल्म का बेहद गहरा नाता रहा है। स्वाधीनता आंदोलन के समय सरदार पटेल ने भारतीय फिल्मों के लिए एक ऐसा कार्य किया जिसने फिल्म जगत को लंबे समय तक प्रभावित ही नहीं किया बल्कि उसके विस्तार की जमीन भी तैयार कर दी। फिल्म को लेकर उनके योगदान की चर्चा करने से पूर्व यह जान लें कि उस समय फिल्मों को लेकर किस तरह का वातावरण था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान तिलक भारतीय फिल्मों के प्रबल समर्थक थे। कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि तिलक ने दादा साहब फाल्के की फिल्म राजा हरिश्चंद्र के समर्थन में लेख लिखा था। बाबू राव पेंटर का उनकी फिल्म ‘सैरंध्री’ के लिए सार्वजनिक अभिनंदन किया था। जवाहरलाल नेहरू भी फिल्मों के शौकीन थे। जब स्वाधीनता संग्राम में गांधी का प्रभाव बढ़ा तो अग्रिम पंक्ति के नेताओं के बीच फिल्मों को लेकर उदासीनता का भाव उत्पन्न हो गया। गांधी जी फिल्मों को पसंद नहीं करते थे। वो फिल्मों को समाज में बुराई फैलाने वाला माध्यम और नैतिकता विरोधी मानते थे। गांधी के इस सोच का असर कांग्रेस पर भी पड़ा था। उस दौर में हिंदी फिल्म जगत अपने पैरों पर खड़ा हो रहा था। कई फिल्मकार अपने पुरुषार्थ के बल पर भारतीय सिनेमा को मजबूती देने में लगे थे। 

स्वाधीनता आंदोलन अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका था। इस बीच एक बेहद दिलचस्प घटना घटी। 1945 में फिल्मकार और अभिनेता किशोर साहू ने अपनी फिल्म वीर कुणाल पूरी कर ली थी। किशोर साहू चाहते थे कि इस फिल्म का जब प्रदर्शन हो तो उस अवसर पर कोई बड़ा नेता उपस्थित रहे। मुश्किल ये थी कि कांग्रेस के नेता फिल्मों को लेकर या फिल्मों से जुड़े समारोह को लेकर बिल्कुल उत्साहित नहीं रहा करते थे। उनके अंदर की इस झिझक के बारे में किशोर साहू को पता था, लेकिन उन्होंने ठाना कि कांग्रेस के नेताओं और फिल्मों के बीच जो एक खाई बनती जा रही है उसको रोका जाए। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘मन करने लगा कि कांग्रेस और कला के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करूं। फिल्मों के प्रति कांग्रेसी नेताओँ के मन की झिझक को निकाल दूं।यह काम शेर की गुफा में जाकर शेर को नत्थी करने के समान था। पर मैंने कमर कस ली। उन दिनों कांग्रेस में कई शेर थे। मगर बब्बरशेर एक ही था- सरदार वल्लभभाई पटेल। मैंने तवज्जो इन पर दी।‘  फिल्म उद्योग से चंदा आदि जमा करने के सिलसिले में किशोर साहू का परिचय पुरुषोत्तमदास टंडन से था। टंडन जी जब बांबे (अब मुंबई) आते थे तो वो किशोर साहू को मिलने के लिए कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के आवास पर बुलाया करते थे। इस तरह से किशोर साहू का मुंशी और श्रीमती लीलावती मुंशी से परिचय था। 

किशोर साहू मुंशी जी के घर पहुंचे और लीलावती जी से पटेल से मिलवाने का अनुरोध किया। लीलावती जी ने किशोर साहू की सरदार पटेल से भेंट तय करवा दी। किशोर साहू नियत समय पर पटेल के मुंबई के घर पर पहुंच गए। पटेल की बेटी मणिबेन ने किशोर साहू को हिदायत दी कि पटेल साहब की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए पांच मिनट में बात समाप्त कर वो निकल जाएं। जब किशोर साहू पटेल के कमरे में पहुंचे तो वो सोफे पर लेटे हुए थे। बातचीत आरंभ हुई। किशोर साहू ने कांग्रेस पार्टी पर फिल्मवालों की अवहेलना का आरोप जड़ा। साथ ही फिल्म जगत की समस्याएं भी बताईं। इस बीच पांच मिनट खत्म हो गए थे। मणिबेन ने कमरे में घुसकर किशोर साहू को बातचीत समाप्त करने का संकेत दिया। जब दो तीन बार मणिबेन कमरे में आई तो पटेल समझ गए। उन्होंने मणिबेन को कहा कि इस व्यक्ति को बैठने दिया जाए। तब किशोर साहू ने अन्य समस्याओं के साथ पटेल के सामने विदेशी स्टूडियो के भारत में कारोबार आरंभ करने की योजना के बारे में बताया । उनको ये भी बताया कि विदेशी कंपनियों के पास इतनी अधिक पूंजी है कि वो भारतीय फिल्मों की व्यवस्या को खत्म कर सकती है। करीब घंटे भर बाद पटेल ने पूछा कि आप क्या चाहते हैं?  किशोर साहू ने उनसे कहा कि आप 1 दिसंबर (1945) को बांबे के नावेल्टी सिनेमा में मेरी फिल्म वीर कुणाल के प्रीमियर पर आएं और वहां से फिल्म जगत को आश्वासन दें कि कांग्रेस उनके साथ है। सरदार पटेल ने किशोर साहू को वचन दिया कि वो अवश्य आएंगे। जब उन्हें पता चला कि एक दिसंबर को कलकत्ता (अब कोलकाता) में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक है। अब दुविधा में थे लेकिन फिल्म के प्रीमियर में जाने के अपने वादे पर अटल थे। उन्होंने इसका हल निकाला। अपने सहयोगी को चार्टर प्लेन की व्यवस्था करने को कहा। जिससे वो प्रीमियर के बाद कलकत्ता जा सकें। किशोर साहू ने अपनी फिल्म के प्रीमियर को खूब प्रचारित किया। लोगों में आश्चर्य का भाव था कि कांग्रेस के नेता कैसे फिल्म के प्रीमियर पर पहुंच रहे हैं। उत्सकुकता सरदार पटेल के वक्तव्य को लेकर भी थी कि वो क्या बोलेंगे। एक दिसंबर को सिनेमाघर के बाहर हजारों की भीड़ जमा थी। समय पर सरदार सिनेमा हाल पहुंचे। फिल्म आरंभ होने के पहले उनको मंच पर ले जाया गया। किशोर साहू ने फिल्म जगत की समस्या उनके सामने रखी। अब बोलने की बारी सरदार की थी। उन्होंने सबसे पहले फिल्म की सफलता की शुभकामनाएं दीं लेकिन उसके बाद जो कहा उसका दूरगामी असर पड़ा। सरदार ने लंबा भाषण दिया और पहली बार फिल्मों से जुड़े लोगों को आश्वस्त भी किया कि कांग्रेस फिल्म विरोधी नहीं है। अंत में उन्होंने चेतावनी के स्वर में कहा, जिस दिन विदेशी पूंजीपतियों ने हमारे देश आकर स्टूडियो खोलने की कोशिश की, तो याद रखें वो विदेशी, और याद रखे ये बरतानवी सरकार, उस दिन कांग्रेस अपनी पूरी ताकत के साथ इसका विरोध करेगी। जिस तरह नमक सत्याग्रह हुआ था, उसी तरह इन विदेशी पूंजीपतियों के स्टूडियो पर सत्याग्रह होगा और इस सत्याग्रह का नेतृत्व मैं खुद करूंगा।‘  किशोर साहू ने विस्तार से इस पूरे प्रसंग को अपनी आत्मकथा में लिखा है। भाषण के बाद सरदार पटेल ने मध्यांतर तक फिल्म देखी। उसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भाग लेने के लिए कलकत्ता चले गए। सरदार पटेल की इस चेतावनी के बाद विदेशी कंपनियों ने स्टूडियो खोलने की योजना रोक दी थी।

सरदार पटेल का वीर कुणाल के प्रीमियर पर दिया गया वक्तव्य फिल्मी के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया था। उस दौर में जब गांधी फिल्मों का विरोध कर रहे थे, सरदार पटेल ने फिल्मों का ना केवल समर्थन किया बल्कि उसको आगे बढ़ाने के लिए हर संभव मदद का भरोसा भी दिया। गांधी के मत के खिलाफ जाकर कदम उठाने का साहस पटेल ने दिखाया था। अगर सरदार पटेल भारतीय फिल्मों के समर्थन में खड़े नहीं होते तो आज भारतीय फिल्म जगत किस स्थिति में होती, कहना कठिन है। स्वाधीनता के पहले ही हमारे देश में विदेशी स्टूडियो खुल गए होते और स्वदेशी फिल्मों पर विदेशी पूंजी का ग्रहण लग चुका होता। स्वाधीनता के सालों बाद जब भारतीय फिल्म उद्गोय परिपक्व हुआ, विश्व सिनेमा की बराबरी पर खड़ा होने लगा, तब जाकर यहां विदेशी स्टूडियो को खोलने की अनुमति दी गई। भारतीय फिल्म जगत की वैश्विक सफलता के पीछे सरदार पटेल का सोच भी था। 

Saturday, January 9, 2021

हिंदी की मजबूती का मूलमंत्र उदारता


आज विश्व हिंदी दिवस है। इस अवसर पर एक बेहद दिलचस्प किस्सा याद आ रहा है। बात ग्यारह अप्रैल 1941 की है। जबलपुर में सेंट्रल प्रोविंस एंड बेरार स्टूडेंट्स फेडरेशन का एक सांस्कृतिक अधिवेशन होना तय हुआ था। फेडरेशन के सचिव चाहते थे कि इस अधिवेशन का शुभारंभ अभिनेता और निर्देशक किशोर साहू करें। किशोर साहू को आमंत्रित करने के लिए वो बांबे (अब मुंबई) पहुंचे और उनसे मिलकर अपना प्रस्ताव उनके सामने रखा। किशोर साहू ने उनका आमंत्रण स्वीकार कर लिया और नियत दिन वो जबलपुर पहुंच गए। उस वक्त तक किशोर साहू की तीन फिल्में लोकप्रिय हो चुकी थीं और एक निर्माता के तौर पर भी उनकी पहचान बन चुकी थी। रेलवे स्टेशन पर अभिनेता किशोर साहू के स्वागत में काफी लोग जुटे थे। स्टेशन पर ‘कॉमरेड किशोर साहू जिंदाबाद’ का नारा भी लगाया गया था। किशोर साहू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘राजनीतिक क्षेत्र में मैने कोई तीर नहीं मारा था, कोई विशेष कॉमरेडी नहीं दिखाई थी।‘ बावजूद इसके उनके स्वागत में कॉमरेड किशोर साहू जिंदाबाद का नारा लगा था। इस प्रसंग पर विचार करने से वामपंथ का वो पहलू सामने आता है जिसमें वो लोगों को छद्म नारों आदि से भरमाते रहे हैं। खैर यह अवांतर प्रसंग है जिसपर फिर कभी चर्चा। 

अभी हम हिंदी की बात कर रहे हैं। शाम को स्टूडेंट फेडरेशन के अधिवेशन का भव्य शुभारंभ हुआ था जिसकी अध्यक्षता विश्वंभरनाथ जी ने की थी। किशोर साहू ने अपना उद्घाटन भाषण अंग्रेजी में दिया था। भाषण को उपस्थित श्रोताओं ने काफी पसंद किया था। यहां तक तो सब ठीक था लेकिन किशोर साहू के बाद के वाले वक्ता जब बोलने खड़े हुए तो उन्होंने अंग्रेजी में भाषण देने के लिए किशोर साहू की जमकर आलोचना की। हिंदी फिल्मों से प्रसिद्धि पाने और भाषण अंग्रेजी में देने को लेकर भी उन्होंने किशोर साहू को घेरा था। किशोर साहू तबतक उनको जानते नहीं थे। अपनी आत्मकथा में किशोर साहू ने इस प्रसंग का विस्तार से उल्लेख किया है। किशोर ने मंच पर साथ बैठे एक व्यक्ति से उनका परिचय पूछा। साहू को बताया गया कि ‘वो यशपाल हैं और खुद को कॉमरेड बताते हैं।‘ तबतक किशोर साहू हिंदी के लेखक यशपाल से या उनके नाम से परिचित नहीं थे। तो उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा कि कौन यशपाल ? जवाब मिला ‘अपने को कम्युनिस्ट कहता है अब फॉर्वर्ड ब्लाकिस्ट बना हुआ है और आपके जयघोष से जलकर आपकी खिल्ली उड़ाना चाहता है।‘ यशपाल ने किशोर साहू की इतनी तीखी और व्यक्तिगत आलोचना कर दी थी कि वो गुस्से से लाल-पीला हो रहे थे और मंच से ही यशपाल पर जवाबी हमला करने लगे थे। मामला गरमा गया था। कुछ अप्रिय घटने की आशंका को लेकर अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे विश्वंभरनाथ ने पहले तो किशोर साहू को रोका और फिर उनसे आगे कुछ नहीं बोलने का अनुरोध किया था। विश्वंभरनाथ ने यशपाल की उनके आचरण के लिए सार्वजनिक रूप से निंदा की और कहा, ’अगर किशोर साहू ने अंग्रेजी में भाषण दे दिया तो कोई पाप नहीं किया। उनका दिल और पोशाक तो भारतीय है। मगर, यशपाल जी, अगर आपको अंग्रेजी से इतनी नफरत है तो आपने यह अंग्रेजी पोशाक क्यों पहन रखी है?’ सभास्थल लोगों के ठहाके से गूंज उठा था। आपको बताते चलें कि कॉमरेड यशपाल ने तब कोट-पैंट पहना हुआ था और गले में लाल टाई बांधी हुई थी। किसी तरह अधिवेशन का उद्घाटन सत्र समाप्त हुआ लेकिन यशपाल अपने उपेक्षा से इतने आहत हो गए कि तय समय से पहले ही अधिवेशन छोड़कर जबलपुर से निकल गए। 

हिंदी दिवस पर इस किस्से का स्मरण इस वजह से हो रहा है कि आज भी कई लोग हिंदी को लेकर इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि वो उसमें अंग्रेजी के शब्दों के उपयोग को लेकर हाय तौबा मचाने लगते हैं। गैर हिंदी भाषियों से भी अपेक्षा करते हैं कि वो हिंदी में ही बात करें और अगर लिखें तो शुद्ध लिखें। यह आग्रह उचित है लेकिन आग्रह जब जिद में और सामने वाले को अपमानित करने में बदल जाता है तो समस्या गंभीर हो जाती है। किशोर साहू ने साफ तौर पर स्वीकार किया था कि कॉलेज के डिबेट्स में अंग्रेजी में बोलते थे और किसी विषय पर लंबा बोलने के लिए वो अंग्रेजी में ही ज्यादा सहज थे। इसलिए उन्होंने स्टूडेंट्स फेडरेशन के सांस्कृतिक अधिवेशन में अंग्रेजी में भाषण दिया था। यशपाल को ये बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने किशोर साहू को लेकर सार्वजनिक रूप से व्यक्तिगत कटाक्ष कर दिया। वो यह भूल गए कि फिल्मों की दुनिया में काम करनेवाले किशोर साहू न सिर्फ एक अच्छे अभिनेता के तौर पर स्थापित थे बल्कि उनकी हिंदी में लिखी कहानियां उस दौर की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हो चुकी थीं। बाद में तो किशोर साहू ने ‘परदे के पीछे’ के नाम से एक उपन्यास भी हिंदी में लिखा था। 

हिंदी को वैश्विक स्तर पर ना केवल स्वीकार्यता मिल रही है बल्कि व्याप्ति भी बढ़ रही है, लेकिन अगर हिंदी अपना मूल स्वभाव, उदारता, त्यागती है तो स्वीकार्यता और व्याप्ति दोनों में परेशानी हो सकती है। हिंदी में तो शुरू से ही दूसरी भाषा के शब्द लेने की उदारता रही है। हिंदी में आज न सिर्फ अंग्रेजी बल्कि फारसी और पुर्तगाली तक के शब्द बहुत सहजता के साथ स्वीकृत और प्रचलित हैं। इन भाषाओं के शब्दों को हिंदी ने इतनी उदारता के साथ अंगीकार किया है कि लगता ही नहीं है कि वो दूसरी भाषा के शब्द हैं। दूसरी भाषा के शब्दों को लेकर दुश्मनी का भाव नहीं होना चाहिए बल्कि देश काल और परिस्थिति के मुताबिक उसको अपने अंदर समाहित और स्वीकृत करने की उदारता होनी चाहिए। इससे ना केवल भाषा समृद्ध होती है बल्कि उसका शब्द भंडार भी व्यापक होता है। यह भी किया जा सकता है कि विदेशी भाषा के शब्दों को स्वीकार करने के पहले अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को देखा, परखा और आजमाया जाए। अगर हमें भारतीय भाषाओं में उपयुक्त शब्द मिल जाते हैं तो उसको अंगीकार करने में प्राथमिकता देनी चाहिए। इस प्रयास की सफलता के लिए आवश्यक होगा कि भारतीय भाषाओं के शब्दकोशों को तैयार किया जाए। जो शब्दकोश तैयार हैं उनको जनता के बीच पहुंचाने का उपक्रम करना होगा। आज जिस तरह से इंटरनेट मीडिया का विस्तार हो रहा है, जिस तरह से देशभर में इंटरनेट का घनत्व बढ़ता जा रहा है, उसको ध्यान में रखते हुए भारतीय भाषाओं के शब्दकोशों को इंटरनेट पर उपलब्ध करवाने की कोशिश करनी चाहिए। बोलियों के शब्दों को सहेजने का प्रयास होना चाहिए। ये प्रयास व्यक्तिगत स्तर पर हो रहे हैं, लेकिन वो नाकाफी हैं। इसको संस्थागत स्तर पर शुरू करने का समय है ताकि भारतीय भाषाओं के बीच जो वैमनस्यता बोध कभी कभार गहराने लगता है उसका निषेध किया जा सके।

देश के अलग अलग हिस्सों में केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, वहां अगर इस काम की शुरुआत करवाई जाए तो ये शब्दकोश आसानी से कम समय में बन सकते हैं। किसी एक संस्थान पर बहुत ज्यादा वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा। इसको कुलपति चाहें तो अपने स्तर पर भी आरंभ करवा सकते हैं, लेकिन अगर सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों का केंद्रीयकृत प्रयास हो तो नतीजे बेहतर होंगे। इसकी शुरुआत संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाओं से की जा सकती है। यह काम अगर अभी शुरू कर दिया जाए तो इससे नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में भी सुविधा होगी। जिस तरह से राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय भाषाओं में साहचर्य की बात करती है और मातृभाषा में शिक्षा की बात कहती है उसके लिए सभी भाषाओं के आधुनिक शब्दकोश तैयार करने होंगे और हर वर्ष उसको अद्यतन भी करना होगा। करना भी चाहिए।