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Sunday, October 27, 2019

जड़ता पर प्रहार करनेवाला लेखक

राजेन्द्र यादव ने कभी उपेन्द्रनाथ अश्क पर लिखा था कि ‘शायद अपनी पीढ़ी में वो ही अकेले ऐसे हैं, जो उम्र और अवस्था की सारी दीवारें तोड़कर नये से नये लेखक से उसी के धरातल पर मिल सकते हैं, उसके कंधे पर हाथ मारकर हंसी मजाक कर सकते हैं और समान मित्र की तरह सलाह दे सकते हैं-इसलिए भय या श्रद्धा के स्थान पर एक अजीब आत्मीयता का संबंध फौरन स्थापित कर लेते हैं।‘ राजेन्द्र यादव ने जब ये लिखा होगा तो शायद वो ये नहीं जानते होंगे कि वो भी ऐसे ही थे। दोनों में एक बुनियादी अंतर ये था कि अश्क जी दुश्मनों के बिना रह नहीं सकते थे जबकि यादव जी दोस्तों के बिना रह नहीं सकते थे। राजेन्द्र यादव की एक और खूबी ये थी कि वो दूसरे की लेखकीय प्रतिभा को उभारने में बेहद उत्साह के साथ लगे रहते थे। उनको पता होता था कि कौन सा व्यक्ति क्या बेहतर लिख सकता है। उनको बस अंदाज हो जाए फिर तो उसकी जान के पीछे पड़ जाते थे और तबतक शांत नहीं बैठते थे जबतक कि उससे उस विषय पर लिखवा ना लें। उनमें लिखने के लिए प्रेरित करने और लिखवा लेने की अतुलनीय क्षमता थी। यह अनायास नहीं था कि साहित्यिक पत्रिका हंस के संपादन के बाद उनसे एक बहुत बड़ा लेखक वर्ग जुड़ा था। हंस के प्रकाशन के बाद उनको कई तरह के विशेषणों से नवाजा गया। कई विवादों में घिरे लेकिन निर्विवाद रूप से नए लेखकों के सबसे चहेते लेखक के तौर पर उभरे। हंस को चलाने के लिए भले ही उनको कई तरह के दंदफंद करने पड़ते होंगे लेकिन बावजूद इसके वो अंत तक लेखक ही बने रहे। कोलकाता में जब रहते थे तो एक दिन पता चला कि उनका नौकर भी कहानियां लिखता है फिर तो उसके साथ लगातार बैठकी होने लगी। मन्नू भंडारी के गुस्से का भी असर नहीं पड़ता था और वो नौकर से उसकी कहानियां सुनते और उसपर बात करते और उसको कहानी की टेक्नीक पर ज्ञान भी देते।
हंस के दफ्तर में जिस तरह से या जिस सहजता के साथ वो नए से नए लेखकों के अलावा अपने सहकर्मियों के बात करते थे कि लगता ही नहीं था कि वो इतने बड़े लेखक है। बेहद गंभीर बात करते करते अचानक से इतनी हल्की बात कह जाते थे कि वहां उपस्थित लोग सन्न रह जाते थे। तभी तो मन्नू भंडारी ने लिखा था कि उनके व्यवहार में जाने ऐसा क्या है कि निकट रहनेवाले इनको कभी महान मान ही नहीं पाते हैं। राजेन्द्र यादव की मां भी कुछ इसी तरह का कह करती थी, कैसे लोग अखबारों में तेरा नाम छाप देते हैं, तुझे सभापति बना देते हैं! अब यहां सड़क की सीढ़ियों पर ही बैठा है...! इस तरह की टिप्पणियां उनके बेहद सहज व्यवहार की वजह से आती थी। दूसरी एक बात जिसको मन्नू भंडारी ने ऱेखांकित किया है वो ये कि राजेन्द्र यादव अपनी चीजों को कभी खुला नहीं छोड़ते थे ठीक उसी तरह से अपने मन की बात को कभी खुलकर नहीं करते थे। जब पत्नी का ये अनुभव था तो मित्रों का क्या कहा जा सकता है। कुछ इसी तरह की बात कोलकाता के उनके मित्र मनमोहन ठाकोर ने भी लिखी है कि अगर राजेन्द्र का वश चले तो वो अपनी टूथपेस्ट और ब्रश को भी ताले में बंद करके रखे। मन्नू भंडारी ने माना कि राजेन्द्र का ये स्वभाव उसके व्यक्तिगत जीवन में अविश्वास पैदा करता है। संभवत: मन न खोल पाने की यही गिरह राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी के अलग होने का कारण बनी हो। राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश के बीच काफी गहरी दोस्ती थी लेकिन उनके बीच अविश्वास की एक गहरी रेखा भी थी। इस बाते के पर्याप्त संकेत कमलेश्वर पर लिखे उनके लेख मेरा हमदम मेरा दोस्त में मिलते हैं। वो बहुत खुलकर कमलेश्वर की तारीफ भी करते हैं लेकिन दुश्यंत को उद्धृत करते हुए उनको झूठा भी कह डालते हैं। मोहन राकेश और उनके बीच भी संबंध बेहद गहरे थे पर अविश्वास भी था।
राजेन्द्र यादव विदेशी लेखकों को बहुत पढ़ते थे। मन्नू जी ने कहा है कि विदेशी लेखकों की जीवनियां पढ़-पढ़कर यह धारणा इनके मन में गहरे तक बैठ गई है कि दुहरी जिन्दगी महान लेखक बनने की अनिवार्य शर्त है। और उसमें ये जोडा जा सकता है कि ये दुहरी जिंदगी वो जीवन के अंत तक जीते रहे। वो अपनी दुहरी जिंदगी को सुविधानुसार स्वीकार भी करते थे, छिपाते भी थे। लेकिन स्वीकार-अस्वीकार के इस खेल में एक खिलंदड़ापन भी होता था। विदेशी लेखकों को पढ़ने की ललक उनके मन में अंत तक बनी रही। एमा डोनॉग की किताब ‘रूम’ जब प्रकाशित हुई थी और उनको जब इस उपन्यास के कथावस्तु के बारे में पता चला था तो वो उसको पढ़ने के लिए मचलने लगे थे। बाद के दिनों में आंख की तकलीफ की वजह से कम पढ़ पाते थे लेकिन मैगनिफाइंग ग्लास लगाकर अपनी रुचि के मोटे-मोटे उपन्यास पढ़ जाते थे। पढ़ने की ये ललक उनके अंदर जीवनपर्यंत बनी रही। इसका ही नतीजा था कि वो अपनी पत्रिका हंस में नित नए प्रयोग करते थे, नए लेखकों से नए और लगभग अछूते विषयों पर लेख लिखवाते थे। कई बार वो चाहते थे कि हंस में विदेशों में प्रकाशित अलग अलग भाषा की बदनाम किताबों पर कोई लिखनेवाला मिले। वो हर तरह के साहित्य को पाठकों को सुलभ करवाना चाहते थे। वो इस बात की परवाह भी नहीं करते थे कि इससे विवाद होगा। विवादों को वो समाज की जड़ता तोड़नेवाले औजार के तौर पर देखते थे, इसलिए प्रयासपूर्वक विवादों को उठाते भी थे। कई बार साहित्यिक विवाद तो कई बार गैर साहित्यिक विवादों को उठाने से भी उनको परहेज नहीं रहा था। उन्होंने हंस के संपादकीयों के माध्यम से कई विवादास्पद मुद्दे उठाए थे। सामाजिक और राजनीतिक विवाद से भी उनको परहेज नहीं था। कई बार वो विवादों में फंसे भी, उनके घर से लेकर उनके दफ्तर के बाहर तक प्रदर्शन आदि भी हुए लेकिन फिर भी विवाद उठाने की आदत से बाज नहीं आए। अपने मृत्यु के कुछ दिन पहले तक भी विवादों में घिरे रहे। इतना विवादप्रिय लेखक हिंदी साहित्य में शायद ही कोई दूसरा हो।


Sunday, November 3, 2013

हम न मरैं मरिहै संसारा

एक साहित्यकार थे राजेन्द्र यादव । बेहद जीवंत और जिंदादिल । 28 सितंबर की देर रात वो है से थे हो गए । जिनकी जिंदादिली से हिंदी साहित्य गुलजार रहा करता था, जिनके ठहाकों की गूंज हिंदी जगत में लगभग छह सात दशक तक गूंजती रही थी, जिनकी प्रेरणा से सैकड़ों लेखक तैयार हुए, जिनके विचारों ने लंबे समय तक हिंदी जगत को झकझोरा, जिनकी लेखनी ने सांप्रदायिकता के खिलाफ जंग लड़ी, जिन्होंने अट्ठाइस साल तक बगैर किसी संस्थागत पूंजी के हंस पत्रिका का निर्बाध संपादन किया, जिन्होंने हंस के मंच का उपयोग सामाजिक आंदोलन को उभारने में किया, जिन्होंने अपने विचारों से दलित साहित्य को हिंदी साहुत्य के केंद्र में ला दिया, जिन्होंने हंस के माध्यम से हिंदी में स्त्री विमर्श को एक नई धार दी , जिन्होंने साठ के दशक में हिंदी कहानी को मनोरंजन के चौखटे बाहर निकाल कर हिंदी साहित्य को चौंकाया, जिनमें चौरासी साल की उम्र के बावजूद किशोरों जैसी चपलता और उम्र के इस पड़ाव पर किसी भी जवान से ज्यादा रोमांटिक। यह सूची बहुत लंबी हो सकती है । लेकिन अब ये सारी बातें इतिहास हो गईं । हिंदी साहित्य के सबसे लोकतांत्रिक लेखक राजेन्द्र यादव के विधन के बाद उनके ठहाके को अब सिर्फ याद किया जा सकता है, उनके पुराने संपादकीयों को पढ़कर अब सिर्फ उनका मूल्यांकन किया जा सकता है । उनका किशोरोचित स्वभाव और रोमांटिक व्यक्तित्व अब कहानियों में याद किए जाएंगे । लेकिन यादव जी बहुत दृढता से कहते थे कि- अतीत मेरे लिए कभी पलायन, प्रस्थान की शरणस्थली नहीं रहा । वे दिन कितने सुंदर थे...काश वही अतीत हमारा भविष्य भी होता – की आकांक्षा व्यक्ति को स्मृति-जीवी निठल्ला बनाती है । लेकिन साहित्य में तो अतीत को ही कसौटी पर कस कर लेखक का मूल्यांकन करने की परंपरा रही है । सो यादव जी के साथ भी यह होना तया है । उनेक निधन के बाद हिंदी जहत को उनके योगदान से लेकर उनकी रचनात्मकता को कसौटी पर कसा जाना शेष लेकिन तय है । राजेन्द्र यादव की रचनात्मकता के अलावा उनके व्यक्तित्व का भी मूल्यांकन भी हमारे युग के आलोचकों के लिए बड़ी चुनौती है । दरअसल उनके व्यक्तित्व के बिना उनकी रचनात्मकता का मूल्यांकन अधूरा सा लगेगा । उनकी पत्नी और मशहूर कथाकार मन्नू भंडारी ने अक्तूबर 1964 में औरों के बहाने में लिखा था- मैं आजतक यह नहीं समझ पाई कि इस व्यक्ति को पति-रूप में पाना मेरे जीवन में सबसे बड़ा सौभाग्य है अथवा सबसे बड़ा दुर्भाग्य । कई लगता है, मेरी छुपी हुई प्रतिभा को कितने यत्न से उन्होंने तराशा है । प्रशंसा और प्रेरणा दे-देकर, कुछ कर डालने के लिए कितना उत्साहित किया है और इतनी ही तीव्रता के साथ इस बात का बोध भी होता है कि इस व्यक्ति ने मेरी सारी प्रतिभा का हनन कर डाला ।‘  दरअसल यादव जी की रचनात्मकता और व्यक्तित्व के अनेक छोर हैं, इतने कि एक पकड़ो तो दूसरे के छूटने का खतरा पैदा हो जाता है । लेकिन मुख्यतया यादव जी के लेखकीय और संपादकीय जीवन में को हम चार खांचे में बांटकर देख सकते हैं । पहला एक कहानीकार के तौर पर जब उन्होंने मोहन राकेश और कमलेश्वर के साथ मिलकर हिंदी कहानी की चौहद्दी को तहस नहस कर दिया । दूसरे साहित्यक पत्रिरा हंस के संपादक के रूप में हिंदी के नए लेखकों की कई पीढ़ी तैयार करने की भूमिका । तीसरा -अपने विचारों से कट्टरपंथियों पर लगातार हमले करते रहना और उनके खिलाफ वैचारिक जंग छेड़ना और चौथा साहित्य में हाशिए पर पड़े दलित और स्त्री लेखन को साहित्य के केंद्र में ला देना ।
साठ के दशक में राजेन्द्र यादव की कहानियों में दिखाई देने वाला अंतर्विरोध कहानी के स्थापित मान्यताओं को ध्वस्त कर रहा था, समाज के पवित्र समझे जानेवाले रिश्तों पर हमले कर रहा था । लेकिन उस दौर में भी आलोचक राजेन्द्र यादव की कहानियों के अंतर्विरोध के आदार पर उसे अपने औजारों से खारिज नहीं कर पा रहे थे । एक आलोचक ने लिखा भी था- राजेन्द्र यादव का लेखन बहुत उलझा हुआ होता है । नामवर जी ने भी अपने एक लेख में कहा था कि प्राय: वो चक्करदार शिल्प गढ़ने के चक्कर में रहते हैं और उनकी भाषा की पेचीदगी भी इसी का परिणाम है । इन तमाम अंतर्विरोधों और कमजोरियों के बावजूद राजेन्द्र यादव की कहानियों ने उस वक्त की कहानी को एक नई राह दिखाई थी जिसकी हिंदी कहानी की विकासयात्रा में एक अहमियत है, अपना स्थान है । दरअसल मैं इसमें एक बात जोड़ना चाहता हूं – राजेन्द्र यादव की कहानियों में जो पेचीदगी दिखाई देती है वो उनके व्यक्तित्व का प्रतिबिंब है । याद कीजिए टी एस इलियट ने कहा था कि- लेखन अपने व्यक्तित्व से पलायन का दूसरा नाम है- शायद विरोध का भी । लेकिन बाद के दिनों में राजेन्द्र यादव और उनके नई कहानी के साथी एक सीमित दुनिया की वास्तविकता में उलझ कर रह गए जिससे कि ना सिर्फ नई कहानी आंदोलन का विकास अवरुद्ध हो गया बल्कि आंदोलनों के अगुवा के लिए भी रचनात्मक लेखन असंभव होता चला गया । राजेन्द्र यादव भी इसके शिकार हुए ।
जब राजेन्द्र यादव ने देखा कि कहानियों में उनका हाथ तंग होता जा रहा है तो उन्होंने साहित्यक पत्रिका निकालने का जोखिम उठाया । यह वो दौर था जब एक एक करके हिंदी की पत्रिकाएं बंद हो रही थी तब हंस के प्रकाशन का जुआ (राजेन्द्र यादव के ही शब्द ) यादव जी ने खेला । पिछले अट्ठाइस साल से राजेन्द्र यादव ये जुआ जीते जा रहे थे लेकिन काल से वो जीत नहीं पाए । नामवर सिंह तो कहते हैं कि राजेन्द्र यादव का नाम हिंदी साहित्य जगत में इस वजह से सुनहले अक्षर में लिखा जाएगा कि उसने अट्ठाइस वर्षों तक हंस का संपादन किया । नामवर जी के कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि वो सिर्फ हंस संपादन के लिए याद किए जाएंगे । नामवर जी का अभिप्राय यादव जी के इस अहम योगदान को भी रेखांकित करना है । हंस में अपने संपादीकय के माध्यम से राजेन्द्र यादव ने साप्रदायिकता की राजनीति पर जमकर प्रहार किया । उन संपदकीयों की वजह से देश के कई हिस्सों में उनपर केस भी हुए । हंस की प्रतिया जलाईं गईं और उनके दफ्तर के सामने प्रदर्शन भी हुए । एक व्कत तो ऐसा भी आ गया था कि लगने लगा था कि वो गिरफ्तार हो जाएंगे । लेकिन तमाम दबावों के बावजूद राजेन्द्र यादव के रुख में जरा भी बदलाव नहीं आया और वो इस मोर्चे पर अंत तक डटे रहे हलांकि कुछ दिनों पहले उन्हें वामपंथी कट्टरतावाद का भी शिकार होना पड़ा और हंस के सालाना जलसे में वरवरा राव के वादाखिलाफी से वो आहत थे ।

राजेन्द्र यादव ने दलित विमर्श के माध्यम से जिस तरह से समकालीन हिंदी साहित्य में हस्तक्षेप किया उसका मूल्यांकन होना भी शेष है । यादव जी के स्त्री विमर्श पर भी देह विमर्श का आरोप लगा । मुझे लगता है कि यादव जी का स्त्री विमर्श जर्मन ग्रीयर और सिमोन द बुआ के स्त्री विमर्श के बीच का रूप था जहां वो परिवार के विघटन और यौन स्वच्छंदता के अलावा आपसी समझदारी की बात भी करते चलते हैं । जर्मन ग्रीयर की तरह यादव जी मानते थे कि स्त्रियां अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व के निर्माण में लगें और संबंधों को बाधा नहीं बनने दें लेकिन उनके लेखन से यह साफ नहीं होता है कि वो परिवार के विघटन की शर्त पर ये करने की सलाह देते हैं । हलांकि राजेन्द्र यादव खुद कहा करते थे कि वो किसी तरह के बंधन को स्वीकार नहीं कर सकते हैं । किया भी नहीं । सिर्फ मत्रता की डोर को वो टूटने नहीं देते थे । राजेन्द्र यादव ने कई नए तरह के प्रयोग किए । उन्होंने खुद ही लिखा था – अचानक ख्याल आया कि अगर कानून रूप से अग्रिम जमानत ली जा सकती है तो अग्रिम श्रद्धांजलि क्यों नहीं लिखी जा सकती । आज जिंदा बने रहना भी तो अपराध ही है । मरने के बाद लोग दिवंगत के बारे में क्या-क्या लिखते और बोलते हैं वह बेचारा ना उसका प्रतिवाद कर सकता है और न उसमें कुछ घटा बढ़ा सकता है । दरअसल मेरे ये संस्मरण उसी लाचार आदमी के प्रतिवाद हैं ।‘  इसी प्रतिवाद में उन्होंने खुद और अपने साथियों के जीवित रहते ही उनपर श्रद्धांजलि लेख लिख डाले थे । उसी में एक जगह यादव जी ने लिखा है – मझे सबसे ईमानदार आत्मकथा गालिब की ये पंक्तियां लगती हैं जहां वह कहता है कुछ अपनों की प्रिय तस्वीरें और कुछ सुंदरियों के पत्र- यही तो मरने के बाद मेरी अपनी कहानी है । राजेन्द्र जी यही आपकी भी कहानी है । अलविदा दोस्त ।   

Wednesday, April 1, 2009

साहित्य को शर्मसार करते दो बुजुर्ग

राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी । हिंदी के दो शीर्षस्थ कथाकार । दोनों की प्रतिष्ठा इतनी कि पाठक तो क्या लेखक भी नतमस्तक । लेकिन पिछले लगभग एक दशक से दोनों ने कुछ भी उल्लेखनीय नहीं लिखा है । राजेन्द्र यादव ने हंस के संपादकीय के बहाने समकालीन समय में जरूर सार्थक हस्तक्षेप किया है, लेकिन साथ ही ये स्वीकार भी किया है कि – इधर शब्द संकट बहुत बढ़ गया है- जो लिख रहा हूं उसे लेकर दुहराव की कचोट अलग बनी रहती है......अब तो मुझे दो तीन ड्राप्ट करने पड़ते हैं, उन्हें संशोधित करना पड़ता है । इधर एक बैठक में चार पांच सौ से ज्यादा शब्द नहीं लिख पाता- वह भी सुबह पांच-छह बजे के एकांत में ( हंस फरवरी का संपादकीय) । वर्षों बाद मन्नू भंडारी ने अपनी आत्मकथा लिखी लेकिन उस आत्मकथा में भी साहस और ईमानदारी का आभाव आलोचकों को दिखा । मन्नू जी अपनी आत्मकथा में भी राजेन्द्र यादव से ऑबसेस्ड दिखी । ये कहने का मेरा मतलब दोनों की साहित्यिक लेखन पर प्रश्नचिन्ह लगाना नहीं है और ना ही इनकी महानता पर सवाल खड़ा करना ।
लेकिन हाल के दिनों में इन दोनों बुजुर्ग लेखकों ने अपनी शादी को लेकर जो कहा लिखा है उससे मन में ये सवाल उठने लगा है कि क्या हिंदी के इन दो प्रतिष्ठित लेखकों के पास लिखने के लिए अब कुछ नहीं रह गया है ।
हिंदी पत्रिका कथादेश के मार्च अंक में मन्नू भंडारी ने एक लंबा लेख लिखा है – सच को स्वीकार करने का साहस हो तभी साक्षात्कार दें । इस पूरे लेख में मननू जी ने ये साबित करने की कोशिश की है कि कथादेश के जनवरी अंक में राजेन्द्र यादव ने जो साक्षात्कार दिया उसमें दोनों की शादी को लेकर यादव जी ने गलत कहा और अब मन्नू भंडारी उसे ठीक कर रही हैं । एक आम हिंदी पाठक को इस बात से क्या लेना देना कि दोनों की शादी किन परिस्थितियों में हुई, क्यों हुई, किसने पहल की आदि आदि । मन्नू भंडारी, राजेन्द्र यादव से सच कहने की अपेक्षा करती हैं लेकिन मन्नू भंडारी में भी तो ये साहस नहीं है कि वो ये बता सकें कि मीता का असली नाम क्या था। इन दोनों के संबंधों में मीता तो वैसी ही हो गई है जैसी कि हिंदी साहित्य में स्नोबा बार्नो, जिसके बारे में सुना तो खूब जा रहा है लेकिन देखा किसी ने भी नहीं । साथ ही मन्नू ने किन परिस्थितियों में और किसकी वजह से राजेन्द्र यादव को घर से निकाला, ये बताने का साहस मन्नू भंडारी आजतक क्यों नहीं कर पाई ? बेहद चतुराई से इस, बात का उन्होंने अपनी आत्मकथा में उल्लेख नहीं किया और बचकर निकल गई । तो अगर खुद सच कहने और लिखने का साहस न हो तो दूसरों से ये अपेक्षा करना बेमानी है ।
रही बात राजेन्द्र यादव की तो वो तो पिछले दो दशकों से विवादों को जानबूझकर न्योता देते आ रहे हैं । लेकिन पहले राजेन्द्र यादव की रुचि साहित्यिक विवाद में हुआ करती थी जो हाल के दिनों में व्यक्तिगत विवादों तक पहुंच गी है । प्रचार पाने के लिए इस तरह से अपने संबंधों को सार्वजनिक बहस का मुद्दा बना देना हिंदी के पाठकों के साथ छल है । लेकिन जिस तरह से हाल के दिनों में गंभीर छवि वाली मन्नू भंडारी विवाद वीर हो गई हैं, वाकई वो चौंकानेवाला है । आज हिंदी का पाठक ये जानना चाहता है कि राजेन्द्र यादव या मन्नू भंडारी ने नया क्या लिखा है । ये जानने में उसकी कोई रुचि नहीं है कि दोनों की शादी में क्या हुआ था । दोनों के व्यक्तिगत झगड़ों को छापने के लिए संपादक भी कम जिम्मेदार नहीं है । एक संपादक में इतना साहस तो होना ही चाहिए कि वो ये कह सके कि राजेन्द्र जी या मन्नू जी आपके इस व्यक्तिगत झगड़े को हम अपनी अपनी पत्रिका में जगह नहीं दे सकते । लेकिन कथादेश संपादक से ये अपेक्षा बेमानी है । इन व्यक्तिगत विवादवीर बुजुर्ग लेखकों की वजह से आज हिंदी साहित्या शर्मसार है । शर्मसार हम भी हैं क्योंकि ये हमारे सबसे प्रतिष्ठित लेखकों में से एक हैं । गुजारिश ये कि बंद करो ये आपसी झगड़े और विशाल हिंदी पाठक समुदाय के बीच जो आपकी छवि और प्रतिष्ठा है उसको नेस्तानाबूद न करें ।
अनंत विजय
( ये एक बड़ा प्रश्न है, अगर बहस शुरु हो सके तो साहित्य का भला होगा )