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Saturday, November 2, 2024

हिंदुओं की वैश्विक व्याप्ति और समाज


महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा के लिए चुनाव में प्रचार चरम पर है। इन दोनों राज्यों में चुनाव प्रचार के बीच उत्तर प्रदेश की नौ विधानसभा सीटों पर होनेवाले उपचुनाव को लेकर भी राजनीतिक सरगर्मी तेज है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बंटेंगे तो कटेंगे वाले बयान की काट ढूंढने में विपक्ष परेशान प्रतीत हो रहा है। कभी जीतेंगे तो पिटेंगे जैसा बयान आते हैं तो कभी जुड़ेंगे तो जीतेंगे जैसे नारे होर्डिंग पर लगते हैं। पूरे चुनाव प्रचार में हिंदू और सनातन की ही चर्चा हो रही है। योगी आदित्यनाथ ने तो रामभक्त ही राष्ट्रभक्त का नारा भी दे दिया है। इसपर पलटवार करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि उनका नारा निराशा और नाकामी का प्रतीक है। अखिलेश यादव ने आदर्श राज्य की कल्पना की बात की। यहां वो राम राज्य कहने से बच गए, लेकिन पूरे पोस्ट से भाव यही निकल रहा है। उनके दल के प्रवक्ता भी श्रीरामचरितमानस की चौपाइयां सुना रहे हैं। हिंदू विमर्श और पौराणिक चरित्र विधानसभा चुनाव प्रचार का केंद्रीय विमर्श है। कुछ लोगों को हिंदू और श्रीराम नाम लेने में कष्ट होता है। वो इशारों में अपनी बात कहते हैं। हिंदुओं की एकजुटता और हिंदू वोटरों को अपने पाले में करने के लिए सभी राजनीतिक दल बेचैन हैं। कोई जाति कार्ड खेल रहा है तो कोई जाति जनगणना की बात को हवा दे रहा है। 

हिंदुओं की चिंता सिर्फ विधानसभा चुनावों में नहीं हो रही है बल्कि वैश्विक स्तर पर भी इसको लेकर चर्चा हो रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव प्रचार में भी हिंदुओं को लेकर दोनों दल सतर्क हैं। रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने तो हिंदुओं पर बंगलादेश में हो रहे अत्याचार पर एक लंबी पोस्ट ही लिख डाली। ट्रंप ने लिखा कि वो बंगलादेश में हिंदुओं, ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यों पर होने वाले बर्बर हिंसा की निंदा करते हैं। उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी कमला हैरिस और अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन पर आरोप लगाया कि दोनों ने मिलकर अमेरिका और पूरे विश्व में हिंदुओं की अनदेखी की। ट्रंप ने स्पष्ट रूप से ये घोषणा की है कि धर्म के विरुद्ध रैडिकल लेफ्ट के एजेंडा से अमेरिकन हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा के लिए वो प्रतिबद्ध हैं। हिंदुओं की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करेंगे। भारत और अपने मित्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बेहतर समन्वय बनाकर चलेंगे। इसके बाद उन्होंने हिंदुओं को दीवाली की शुभकामनाएं दी और कहा कि ये ये पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। उधर डेमोक्रैट पार्टी की उम्मीदवार और अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने भी दीवाली मनाई। दीवाली मनाते हुए उनका वीडियो उनकी टीम ने इंटरनेट मीडिया पर साझा किया। जो बाइडेन ने भी व्हाइट हाउस में अपने परिवार के साथ दीवाली मनाई। जिस तरह से अमेरिका के चुनाव में हिंदुओं की बात हो रही है उतना खुलकर तो यहां भी हिंदुओं और हिंदू धर्म की चर्चा नहीं होती है। पिछले दिनों जब ब्रिटेन में चुनाव हुआ था तो वहां भी प्रधानमंत्री पद के दोनों उम्मीदवारों ने मंदिरों में जाकर पूजा आदि की थी। ऋषि सुनक ने तो खुलकर हिंदू देवी देवताओं के बारे में श्रद्धापूर्वक बात की थी। 

एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बंगलादेश में हिंदुओं पर होनेवाले अत्याचार पर खुलकर बोल और लिख रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हमारे देश में कई दलों के नेता इस मुद्दे पर खामोशी ओढे हुए हैं। जब भी बंगलादेश में हिंदुओं पर होनेवाले अत्याचार की चर्चा होती है और इन दलों के नेताओं या प्रवक्ताओं से इस बाबत प्रश्न पूछा जाता है तो वो अपने उत्तर के साथ साथ फिलस्तीन का मुद्दा भी उठा देते हैं। वो ये भूल जाते हैं कि फिलिस्तीनी आतंकवादियों ने इजरायल में घुसकर ना केवल नरसंहार किया बल्कि सैकड़ों बच्चों और महिलाओं को बंधक भी बना लिया था। इस क्रिया की प्रतिक्रिया में फिलस्तीन पर इजरायल हमले कर रहा है। इससे उलट बंगलादेश में तो हिंदुओं ने किसी प्रकार की कोई हिंसा नहीं की। उनपर तो वहां के बहुसंख्यकों ने अकारण हमले किए। हिंदुओं की हत्या की गई। मंदिरों को तोड़ा गया। जब भारत के सभी राजनीतिक दलों को इस हमले के खिलाफ एक स्वर में बोलना चाहिए था उस वक्त ये किंतु परंतु में अटके रहे। अब भी हैं। इसका कारण क्या हो सकता है। एक वजह है वोटबैंक की राजनीति। जो दल अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों की राजनीति करते हैं उनको लगता है कि बंगलादेश में हिदुओं पर हो रहे हमलों का विरोध करने से उनका वोटबैंक दरक सकता है। इस कारण वो हिंदुओं पर होनेवाले हमले को लेकर तटस्थ हो जाते हैं। धर्म और राजनीति के घालमेल की आड़ लेते हैं। तर्क होता है कि धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहिए। इस तर्क को इकोचैंबर में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवी हवा देते हैं। ऐसा माहौल बनाते हैं कि राजनीति से धर्म को अलग रखना चाहिए। दरअसल इकोचैंबर वाले बुद्धिजीवी ये नहीं समझ पाते कि मार्क्स ने जिस धर्म की बात की थी और जो भारत का धर्म है वो दोनों बिल्कुल अलग हैं। 

आज पूरी दुनिया हिंदुओं की ओर देख रही है। वो सनातन धर्म को समझना चाहती है। हिंदुओं की उस जीवन शैली को समझना चाहती है जिसकी इकाई परिवार है। एकल परिवार से ऊब चुकी दुनिया भारतीय परिवारों और उनके बीच के लगाव को समझना चाहती है। संस्कारों के बारे में जानने को उत्सुक है। हिंदू धर्म और अध्यात्म को लेकर वैश्विक स्तर पर एक रुझान देखा जा रहा है। ऐसे में अपने देश में हिंदुओं और उनके ग्रंथों को लेकर और सनातन पर अपमानजनक टिप्पणियां करनेवालों को पुनर्विचार करना चाहिए। जब पूरी दुनिया हिंदुओं की ओर देख रही है ऐसे में अपने ही देश में हिंदुओं को लेकर घृणा भाव बहुत दिनों तक चलनेवाला नहीं है। हिंदू धर्म में जो भी कुरीतियां हों उसको दूर करने का सामूहिक प्रयास किया जाना चाहिए। ऐसा पहले होता भी रहा है। हिंदू समाज के अंदर से ही कोई ना कोई सुधारक आता है जो कुरीतियों पर प्रहार करता है और वृहत्तर हिंदू समाज उसको स्वीकार करता है। कुरीतियों और रूढ़ियों के आधार पर हिंदू समाज को बांटने का जो षडयंत्र चल रहा है उसका निषेध हिंदू समाज ही करेगा। अगर कोई सोचता है कि हिंदू समाज को अपमानित करके अपने वोटबैंक को मजबूत कर लेगा तो वो गलतफहमी में है। हिंदू एकता पर पहले भी बातें होती रही हैं, साहित्य में भी इसके उदाहरण मिलते हैं और इतिहास में भी। रामचंद्र शुक्ल से लेकर शिवपूजन सहाय और रामवृक्ष बेनीपुरी के लेखन में हिंदुओं को संगठित होने की अपेक्षा की गई है। यह अकारण नहीं है कि आज प्रबुद्ध हिंदू समाज भी इस ओर सोचने लगा है। सहिष्णुता हिंदुओं का एक दुर्लभ गुण है लेकिन सहिष्णुता को अगर निरंतर छेड़ा या कोंचा जाएगा तो एक दिन उसकी प्रतिक्रिया तो होगी ही। स्वाधीनता के बाद से ही विचारधारा विशेष के लोगों ने हिंदुओं को अपमानित करने का योजनाबद्ध तरीके से लेकिन परोक्ष रूप से उपक्रम चलाया। ऐसा करनेवाले अब परिधि पर हैं और हिंदू केंद्र में। 


Saturday, July 20, 2024

हिंदू-मुसलमान के चक्रव्यूह में शासनादेश


उत्तर प्रदेश सरकार के एक आदेश की इन दिनों बहुत चर्चा है। कई विपक्षी दल और बयान बहादुर किस्म के नेता इस आदेश को समाज को बांटनेवाला बता रहे हैं। आदेश ये है कि कांवड़ यात्रियों के मार्ग में पड़नेवाले सभी दुकानों, ढाबों और ठेलों पर दुकान मालिक का नाम, रेट लिस्ट और दुकान मालिक का मोबाइल नंबर लिखना अनिवार्य कर दिया गया है। यह आदेश समान रूप से सभी दुकानों के लिए है। किसी जाति और मजहब के दुकानदारों के लिए नहीं। इस आदेश के बाद तथाकथित सेक्युलर ब्रिगेड को लगने लगा कि ये मुसलमानों को चिन्हित करने के लिए किया जा रहा है। जमीयत उलमा-ए-हिंद ने भी एक बयान जारी कर सरकार से इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने इस निर्णय को अनुचित, पूर्वाग्रह पर आधारित और भेदभावपूर्ण बताया है। उन्होंने अपने बयान में आगे ये भी कहा कि ये फैसला मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की घिनौनी साजिश है। अपने बयान में मदनी ने सभी धर्म के लोगों से अपील की है कि वो एकजुट होकर इसके विरुद्ध आवाज उठाएं। अब जरा निर्णय की बात कर ली जाए। खानपान व्यवसाय के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 2006 में एक नियम बनाया था। उसको खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम कहा गया। इस अधिनियम के अनुसार प्रत्येक रेस्तरां या ढाबा संचालक को अपनी फर्म का नाम, अपना नाम और लाइसेंस संख्या लिखना अनिवार्य है। ग्राहक जागो अभियान के अंतर्गत भी इस बात की अनिवार्यता की गई थी कि हर प्रतिष्ठान पर उसके मालिक का नाम, पंजीयन संख्या और वहां की सेवाओं या वस्तुओं का रेट कार्ड लगाया जाएगा। तब किसी भी कोने अंतरे से इसके विरोध की आवाज नहीं आई थी। कारण कि तब तथाकथित सेक्यूलरों की सरकार थी। अब योगी आदित्यनाथ की सरकार है तो उनको घेरने के लिए इसका एक राजनीतिक औजार की तरह उपयोग हो रहा है। पुराने कानून को लागू करने से कैसे समाज में हिंदू-मुसलमान विभेद उत्पन्न हो जाएगा, ये समझ से परे है। 

स्वाधीनता के 75 वर्षों बाद भी अगर समाज में हिंदू और मुसलमान के बीच सिर्फ नाम जानने के बाद विभेद पैदा हो रहा है तो इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि हमने कैसा समाज बनाया। गंगा-जमुनी संस्कृति को नारे की तरह उपयोग करनेवालों को ये सोचना चाहिए कि इस कथित गंगा-जमुनी संस्कृति की नींव कितनी कमजोर थी जो सिर्फ नाम जान लेने से दरक जा रही है। नाम उजागर करने से मुसलमान चिन्हित कैसे हो जाएंगे। जमीयत के नेता इसको घिनौनी साजिश बता रहे हैं, लेकिन कैसे, ये नहीं बता पा रहे हैं। जहां तक नाम के सार्वजनिक करने का प्रश्न है तो नाम तो हर जगह सार्वजनिक होता है। किसी जिलाधिकारी के कमरे में जाइए तो उसकी मेज पर उसकी नाम पट्टिका रखी होती है। यहां तक कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की भी नेमप्लेट, जहां आवश्यक होता है, वहां लगाई जाती है। हर पुलिस आफिसर और सैनिक की वर्दी पर उसका नाम लगा होता है। नाम जान लेने से समाज के बंटने का तर्क बेहद सतही है। समाज को इस बात पर चिंता करनी चाहिए कि कुछ लोग हर बात को हिंदू-मुसलमान के चश्मे से देखने लगते हैं। 

शास्त्रीय संगीत की बात करें। क्या कभी भी उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई को इस कारण से सुनना बंद किया कि वो मुसलमान हैं। किसी ने उस्ताद अल्लारखा खान से लेकर उस्ताद अलाउद्दीन खान, बड़े गुलाम अली खां, विलायत खां, बेगम अख्तर, रसूलन बाई जैसे दिग्गज कलाकारों के सम्मान में कोई कमी की। सबके नाम सार्वजनिक थे हैं और सभी कलाकार समान रूप से हिंदुओं को भी पसंद हैं। नाम को लेकर जो फिजूल की बातें हो रही हैं वो विरोध करनेवालों की मानसिकता को ही दर्शाते हैं। सवाल मुसलमान नाम का नहीं है मानसिकता का है, राजनीति का है। जिन मुस्लिम कलाकारों ने अपना नाम बदलकर हिंदू नाम रख लिए उनको भी हमारे देश की जनता ने इतना सम्मान और प्यार दिया जिसका हिसाब नहीं लगाया जा सकता है। आज भी जब सिनेमा के दमदार कलाकारों की बात होती है तो दिलीप कुमार का नाम लिया जाता है। युसूफ खान जब फिल्मों में आए तो दिलीप कुमार बन गए। लोगों को इस बात का पता भी चला लेकिन उनकी लोकप्रियता में किसी प्रकार की कमी नहीं आई। इसी तरह जब हमारे देश के दर्शकों को पता चला कि अभिनेत्री मीना कुमारी का नाम महजबीन बानो है तब भी कोई अंतर नहीं आया। मधुबाला भी मुमताज जहां बेगम देहलवी थीं लेकिन आज भी हिंदी फिल्मों की सबसे सुंदर अभिनेत्री के तौर पर समादृत है। इन सबके प्रशंसक हैं, न हिंदू न मुसलमान। दर्जनभर से अधिक मुसलमान अभिनेता और अभिनेत्रियों ने अपना नाम बदलकर हिंदू नाम रख लिया था। देश की जनता को पता भी चला लेकिन किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ा। इसी तरह से शाहरुख खान या सलमान खान अपने मुस्लिम नाम और पहचान के साथ ही फिल्मों में आए लेकिन उनके नाम से न तो फिल्म हिट हुई न ही उनके नाम और मजहब को देखकर दर्शक फिल्म देखने गए। यहां तक कि 2002 के गुजरात के सांप्रदायिक दंगों के बाद आमिर खान एक पार्टी विशेष के एजेंडा को बढ़ाने के लिए एक्टिविस्ट बन गए थे लेकिन जनता ने न तो उनकी राजनीति देखी और न ही उनका नाम। देखा तो सिर्फ उनका काम। आज भी फैज से लेकर मीर तक की शायरी भारत में लोगों की जुबान पर है। तो फिर कैसी बात करते हैं कि दुकान पर मुस्लिम नाम लिखे होने के कारण हिंदू वहां नहीं जाएंगे। या दुकानों पर नाम लिखने का नियम लागू होने से मुसलमान इस देश में दोयम दर्ज के नागरिक हो जाएंगे।

जब भी हमारे देश में इस तरह की बातें होती है तो लगता है कि जो लोग धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार होने का दावा करते हैं उनका सोच कितना संकुचित है। जो लोग इस तरह के नियमों से सामाजिक समरसता खत्म होने की बात करते हैं उनको न तो हिंदुओं पर भरोसा है न मुसलमानों पर विश्वास। दरअसल जबसे संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्ष शब्द को अवैध तरीके से जोड़ा गया तब से ही सायास इस तरह का वातावरण बनाया गया जिससे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्यता बढ़े। पिछले दस वर्षों से ये प्रवृत्ति और बढ़ी है। कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम को ये लगता है कि मुसलमानों को इस तरह से डराकर ही अपने पाले में ला सकती है। उनका वोट एकमुश्त उनकी पार्टी को मिल सकता है। 2024 के चुनाव में हलांकि कांग्रेस पार्टी को सफलता नहीं मिली लेकिन मुसलमानों को एक वोटबैंक के तौर पर अपने गठबंधन में लाने में सफल रहे। अब उनके सामने इस वोटबैंक को अपने साथ बनाए रखने की चुनौती है। इस चुनौती से निबटने के लिए वो दुकानों पर नाम लिखने के सरकारी आदेश को राजनीति के टूल की तरह उपयोग कर रहे हैं। हिंदू मुसलमान में देश को उलझानेवाली इन कोशिशों से तात्कालिक रूप से वोट मिल सकता है, कहीं कहीं सत्ता भी लेकिन देश कहीं पीछे छूट जाएगा। इसके बारे में समाज को सोचना होगा।  

Saturday, July 24, 2021

समग्र नीति से समृद्ध होगी संस्कृति


हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संस्कृति को लेकर एक नई पहल की है। खबरों के मुताबिक संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव ने उनके सामने प्रदेश की प्रस्तावित संस्कृति नीति के प्रमुख बिंदुओं को रखा। प्रस्तावित संस्कृति नीति के बारे में योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को विषय से जुड़े विशेषज्ञों से बातचीत कर इसको तैयार करने का निर्देश दिया है। यह तो एक राज्य की बात है लेकिन अब समय आ गया है कि संस्कृति को लेकर गंभीरता से विचार किया जाए और देशभर की एक संस्कृति नीति बनाई जाए। कई राज्यों में संस्कृति नीति के नाम पर अलग अलग नियम आदि मिलते हैं, पर वहां भी एक समग्र संस्कृति नीति की आवश्यकता है। हमारे पूरे देश की संस्कृति एक है। उस एक संस्कृति के विविध रूप हैं जो अलग अलग राज्यों से लेकर अलग प्रदेशों और इलाकों में लक्षित किए जा सकते हैं। स्वाधीनता के पचहत्तर साल पूरे होने जा रहे हैं और इतना समय बीत जाने के बाद भी देश में एक समग्र संस्कृति नीति नहीं है। समग्र संस्कृति नीति के अभाव में राज्यों से लेकर केंद्रीय स्तर पर अलग अलग संस्थाएं कार्यरत हैं। ऐसा लगता है कि जब जरूरत हुई तो संस्कृति से जुड़ी एक संस्था बना दी गई। इन संस्थाओं के कामों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करने पर कई विसंगतियां दिखती हैं। सबसे बड़ी विसंगति तो यही है कि एक ही काम को अलग अलग संस्थाएं कर रही हैं। दिल्ली में केंद्र सरकार की संस्कृति से जुड़ी कई संस्थाएं काम करती हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, साहित्य अकादमी, नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, सांस्कृतिक स्त्रोत और प्रशिक्षण केंद्र,गांधी स्मृति और दर्शन समिति, राष्ट्रीय संग्रहालय आदि हैं। इनके अलावा अगर हम संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी अन्य संस्थाओं को देखें तो इसमें सबसे बड़ा है क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र। पूरे देश में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र हैं। बुद्ध अध्ययन से जुड़ी चार संस्थाएं हैं। पांच पुस्तकालय हैं, सात संग्रहालय भी हैं। 

उपरोक्त संस्थाओं के कामकाज पर नजर डालें तो एक ही काम अलग अलग संस्थाएं कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र जो काम कर रही हैं उसमें से कुछ काम संगीत नाटक अकादमी भी कर रही है। नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट और ललित कला अकादमी के काम भी कई बार एक जैसे होते हैं। ये सब संस्थाएं जो काम कर रही हैं उनमें से कई काम क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी कर रहे हैं। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की असलियत तो कोरोना महामारी के दौरान खुल गई। उनके पास संबंधित इलाकों के कलाकारों की कोई सूची तक नहीं है। पूर्व संस्कृति मंत्री लगातार ये कहते रहे कि कोरोना महामारी से प्रभावित कलाकारों की मदद के लिए क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र सूची तैयार कर रहे हैं। पर मदद तो दूर की बात आजतक सूची की जानकारी भी ज्ञात नहीं हो सकी। किसी भी कलाकार से बात करने पर पता चलता है कि इन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों में कितना भ्रष्टाचार है और अगर सही तरीके से जांच हो जाए तो समूचा सच सामने आ जाएगा। ये सांस्कृतिक केंद्र जिन उद्देश्यों से बनाए गए थे वो अब पुनर्विचार की मांग करते हैं। 

इसके अलावा राज्यों में कई तरह की अकादमियां हैं जो संस्कृति संरक्षण और उसको समृद्ध करने के काम में लगी हैं। मध्य प्रदेश में भी कला साहित्य और संगीत से जुड़ी कई संस्थाएं हैं। मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी, आदिवासी लोक कला और बोली विकास अकादमी, मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय, साहित्य अकादमी भोपाल, कालिदास संस्कृत अकादमी, भारत भवन आदि। इन सबके क्रियाकलापों पर नजर डालने से कई बार एक ही तरह के काम कई संस्थाएं करती नजर आती हैं। इसी तरह से बिहार संगीत नाटक अकादमी, बिहार ललित कला अकादमी, भारतीय नृत्य कला मंदिर के अलावा ढेर सारी भाषाई अकादमियां हैं। इन दो राज्यों के के अलावा अन्य राज्यों का सांस्कृतिक परिदृश्य भी लगभग ऐसा ही है। दरअसल कांग्रेस के लंबे शासनकाल के दौरान अपने लोगों को पद और प्रतिष्ठा देने-दिलाने के चक्कर में संस्थान खुलते चले गए। तर्क दिया गया कि विकेन्द्रीकरण से काम सुगमता से होगा लेकिन हुआ इसके उलट। कला-संस्कृति के प्रशासन के विकेन्द्रकरण ने अराजकता को बढ़ावा दिया। अब तो स्थिति ये है कि कला संस्कृति से जुड़ी ज्यादातर संस्थाएं आयोजन में लग गई हैं। ज्यादातर जगहों पर ठोस काम नहीं हो पा रहा है। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि साहित्य कला और संस्कृति से जुड़ी ज्यादातर संस्थाएं इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में तब्दील हो गई हैं। वो आयोजन करके ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं।  

वर्तमान परिदृश्य में अब यह बेहद आवश्यक हो गया है कि पूरे देश के लिए एक समग्र संस्कृति नीति बने और उसके आधार पर संस्थाओं का पुनर्गठन हो। राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहल होनी चाहिए। नीति आयोग इस बारे में संस्कृति के जानकारों, प्रशासकों के साथ मंथन करे और इस संबंध में सरकार को अपना सुझाव भेजें। बेहतर हो कि एक राष्ट्रीय कला केंद्र बने और उसके अंतर्गत अलग अलग विधाओं और क्षेत्रों की शाखाओं का गठन हो। प्रशासनिक कमान एक जगह रहने से कामों में दोहराव से बचा जा सकेगा, ठोस काम हो सकेगा और करदाताओं के पैसे की बर्बादी रुकेगी। इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में सभी क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों का विलय हो जाना चाहिए ताकि एक समग्र नीति पर लोककलाओं से लेकर अन्य कलाओं को समृद्ध करने का कार्य आरंभ हो। ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, कथक केंद्र को भी प्रस्तावित राष्ट्रीय कला केंद्र का हिस्सा बना देना चाहिए। इन संस्थाओं में लगभग एक जैसे काम होते हैं। उनको कला केंद्र का हिस्सा बनाकर सीमित स्वायत्ता देने पर भी विचार किया जा सकता है ताकि वो अपने स्तर पर कामों को प्रस्तावित कर सकें लेकिन प्रशासन का एकीकृत कमांड हो। 

जितने भी संग्रहालय हैं उनको किसी एक संस्था के अधीन करके उसका प्रशासनिक दायित्व नियोजित किया जा सकता है। इनको देखनेवाली संस्था का दायित्व हो कि वो समग्र संस्कृति नीति के अनुसार इनके कामकाज को तय करे और फिर उसका उचित क्रियान्यवन सुनिश्चित करे। इसी तरह से नाटक और नाट्य प्रशिक्षण से जुड़ी संस्थाओं को पुनर्गठित करके उसको ज्यादा मजबूती प्रदान की जा सकती है। नृत्य आदि रूपकंर कला से जुड़ी सभी संस्थाओं को भी कला केंद्र में समाहित करके नया और क्रियाशील स्वरूप प्रदान किया जा सकता है। सूचना और प्रसाऱण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत विभिन्न संस्थाओं के पुनर्गठन की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। उसी मॉडल पर संस्कृति मंत्रालय में भी काम किया जा सकता है लेकिन यहां के लिए आवश्यक ये होगा कि पहले एक समग्र संस्कृति नीति बने। ये नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन को भी आसान कर सकती है। नई शिक्षा नीति ये मानती है कि कला के माध्यम से संस्कृति का प्रसार हो सकता है और इसके लिए उसमें कई बिंदु सुझाए गए हैं। शिक्षा नीति में संविधान में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी के गठन का भी प्रस्ताव है। इसको साहित्य अकादमी के कार्यक्षेत्र का विस्तार करके आसानी से किया जा सकता है। भाषा और उससे जुड़े विषयों की संस्थाओं को साहित्य अकादमी के अंतर्गत लाकर बेहतर तरीके से काम हो सकता है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार संस्कृति मंत्रालय में एक कैबिनेट और दो राज्य मंत्री पदस्थापित किए गए हैं। इससे इस बात का संकेत तो मिलता ही है कि प्रधानमंत्री का फोकस संस्कृति की ओर है। 


Friday, October 6, 2017

केरल में शाह का ब्रह्मास्त्र

चंद महीनों पहले तक केरल की सियासत में बीजेपी का नाम सीरियस प्लेयर के तौर पर नहीं लिया जाता था। पिछले विधानसभा चुनाव में भी पहली बार बीजेपी का एक विधायक वहां चुना गया था लेकिन बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति के बाद अब केरल में बीजेपी प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर जमीनी संघर्ष करती दिखाई दे रही है। अमित शाह ने 2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव को लेकर जो रणनीति तैयार की है उनमें केरल उनकी प्रथामिकता में है। केरल में बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता दौरा कर चुके हैं। 29 जुलाई को केरल में आरएसएस के कार्यकर्ता राजेश की हत्या के बाद अगस्त में वित्त मंत्री अरुण जेटली खुद केरल पहुंचकर बीजेपी की स्ट्रैटजी के बारे में संकेत दे गए थे। वित्त मंत्री जेटली ने उस वक्त केरल की वाम सरकार पर संघ के कार्यकर्ताओं के हत्यारों को परोक्ष रूप से मदद करने का आरोप लगाया था। उन्होंने राजेश के परिवारवालों से मुलाकात पार्टी कैडर में को एक भरोसा भी दिया था। केरल को लेकर बीजेपी को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का भी साथ मिल रहा है और दिल्ली में संघ के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होस्बोले की मौजूदगी में विरोध प्रदर्शन भी किया गया था। उसके बाद भी सेमिनार आदि करके भी केरल में संघ के कार्यकर्ताओं की हत्या के खिलाफ जनमत तैयार किया जा रहा है।  
केरल की सियासी लड़ाई में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ को उतारकर अब बीजेपी ने इसको नई धार देने की कोशिश की है। योगी आदित्यनाथ को केरल ले जाना बीजेपी की रणऩीति का यूटर्न भी है। पिछले विधानसभा चुनाव के पहले बीजेपी ने वहां सॉफ्ट हिंदुत्व को ध्यान में रखा था क्योंकि केरल में 46 फीसदी मतदाता अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। उस वक्त बीजेपी इन 46 फीसदी वोटरों को टार्गेट कर रही थी। पर उस रणनीति का परिणाम बेहतर नहीं रहा था और 140 सीटों की विधानसभा में बीजेपी को सिर्फ एक सीट से संतोष करना पड़ा था। अब योगी आदित्यनाथ को मैदान में उतारकर बीजेपी हार्डकोर हिदुत्व की लाइन पर चलती दिख रही है। 15 दिनों तक चलनेवाली जनरक्षा यात्रा में रेड जेहादी के मुद्दे को उठाने के साथ साथ बीजेपी अपने कॉडर की हत्या के मुद्दे को लेकर भी केरल की जनता के बीच जा रही है। योगी आदित्यनाथ ने केरल पहुंचकर लव जेहाद का मुद्दा तो उठाया ही साथ ही उन्होंने लगातार हो रही राजनीतिक हत्या के लिए भी मौजूदा सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। जनरक्षा यात्रा में योगी आदित्यनाथ के अलावा कई अन्य केंद्रीय मंत्रियों को भी शामिल होना है। जाहिर है कि दोनों तरफ से जुबानी जंग जारी रहेगी । सालों बाद केरल में ऐसा पहली बार हो रहा है कि सत्ताधारी दल को विपक्षी दल इतनी गंभीरता से चुनौती दे रही है।  
बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 12 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। इस वक्त लोगों को ये टार्गेट बहुत ज्यादा लग रहा है क्योंकि जब से बीजेपी बनी है यानि 1980 से तब से लेकर अबतक बीजेपी ने वहां से कोई लोकसभा सीट जीती नहीं है। योगी आदित्यनाथ के वहां पहुंचने और लव जेहाद और आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे को उठाकर बीजेपी हिंदू और क्रिश्चियन दोनों वोटरों को एक संदेश दे रही है। क्रिश्चियन वोटरों का विश्वास जीतने के लिए असफांस को केंद्र में पर्यनट मंत्री का पद भी दिया गया। मंत्री बनने के बाद अलफांस ने केरल कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस के चीफ के अलावा भी अन्य चर्चों के मुखिया से मुलाकात की थी। इसके अलावा राजनीतिक हत्या को मुद्दा बनाकर वामपंथ के अंतर्विरोधों को भी जनता के सामने रखा जा रहा है। केरल में सबसे ज्यादा राजनीतिक हत्या कन्नूर जिले में होती है जहां से मुख्यमंत्री विजयन आते हैं। केरल में राजनीति हत्याओं का बहुत पुराना इतिहास रहा है लेकिन अबतक इस स्तर पर ले जाकर किसी दल ने इसको मुद्दा नहीं बनाया। दरअसल मार्क्सवादियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि उनकी दीक्षा ही हिंसा और हिंसक राजनीति में होती है।उन्नीस सौ साठ में विभाजन के बाद सीपीआई तो लोकतांत्रिक आस्था के साथ काम करती रही लेकिन सीपीएम तो सशस्त्र संघर्ष के बल पर भारतीय गणतंत्र को जीतने के सपने देखती रही । चेयरमैन माओ का नारा लगानेवाली पार्टी चीन के तानाशाही के मॉडल को इस देश पर लागू करने करवाने का जतन करती रही । चीन में जिस तरह से राजनीतिक विरोधियों को कुचला डाला जाता है , विरोधियों का सामूहिक नरसंहार किया जाता है वही इनके रोल मॉडल बने । उसी चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा की बुनियाद पर बनी पार्टी भारत में भी लगातार कत्ल और बंदूक की राजनीति को जायज ठहराने में लगी रही । केरल में तो मार्क्सवादी नेता खुले आम सार्वजनिक सभा में हिंसा और मरने मारने की बात भी करते रहे हैं। वहां राजनीति हत्याओं को रोकने के लिए सरकार के ठोस कदम दिखाई भी नहीं देते है।
यह अकारण नहीं है कि हॉवर्ड फास्ट जैसे मशहूर लेखक अपनी कृति दे नेकेड गॉड में कहते हैं कि –कम्युनिस्ट पार्टी एक ऐसी मशीन है जिसमें प्राय: अच्छे लोग प्रवेश करते हैं जो अन्नत: बुरे लोगों में परिवर्तित हो जाते हैं । सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टियों में इस प्रक्रिया से बच पाना आमतौर पर जान देने की कीमत पर ही होता है ।‘ अब अगर हम हॉवर्ड फास्ट के विचारों का विश्लेषण करें तो लगता है कि कम्युनिस्ट विचारधारा फासिस्ट है जो अपना जनतांत्रिक विरोध भी बर्दाश्त नहीं कर पाती है। फासिज्म का डर दिखाकर फलती फूलती रहती है। बंगाल चुनावों में एक के बाद एक हार के बाद केरल ही उऩका अंतिम गढ़ बचा है लेकिन जिस तरह से बीजेपी ने वहां अपनी मुहिम को परवान चढ़ाया है तो ये देखना दिलचस्प होगा कि 2019 में वामपंथ का किला बच पाता है या उसमें भी सेंध लग जाती है।


Thursday, March 30, 2017

आंकलन के पहले मिले वक्त

योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री पद संभाले अभी एक पखवाड़ा भी नहीं बीता है और उनके कामकाज के तरीकों पर टीका टिप्पणी शुरू हो गई है । यह बात सही है कि सत्ता हनक और इकबाल से चलती है और योगी आदित्यनाथ की हनक बगैर कुछ कहे सत्ता के गलियारों में दिखाई दे रही है । प्रशासनिक अधिकारी भी इसको महसूस कर रहे होंगे, तभी तो औपचारिक आदेश के पहले ही गैरकानूनी कार्यों पर पुलिस की गाज गिरनी शुरू हो गई है । अवैध कत्लगाहों पर ताले लगे शुरू हो गए । महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पुलिस सजग नजर आने लगी । सबसे बड़ी बात है कि पुलिस एक्शन में नजर आ रही है, चाहे वो अवैध कत्लखानों को बंद करवाने की मुहिम हो फिर एंटी रोमियो स्कवॉड । उत्तर प्रदेश का सिर्फ प्रशासनिक अमला ही सक्रिय नजर नहीं आ रहा है बल्कि योगी के आलोचक भी सक्रिय नजर आने लगे हैं । सबसे पहले योगी आदित्यनाथ के पहनावे को लेकर टीका टिप्पणी शुरू हुई फिर मुख्यमंत्री आवास की शुद्धिकरण को लेकर योगी आदित्यनाथ को घेरने की कोशिश की गई । आलोचना करनेवाले यह भूल गए कि भारतीय लोकाचार में गृह प्रवेश की बहुत पुरानी परंपरा है और उसके पहले पूजा पाठ का भी प्रावधान रहा है । गृह प्रवेश के पहले घर के बाहर स्वास्तिक का चिन्ह भी बनाया जाता है । अब इन परंपराओं से अनजान या जानबूझकर इसको नजरअंदाज कर योगी आदित्यनाथ पर जिस तरह से हमले किए गए वो हमलावरों की मानसिकता को ही उजागर कर गया । इस पूरे दौर में सबसे रेखांकित करनेवाली बात रही योगी का मुखर मौन। बगैर किसी बयानबाजी के वो शासन-प्रशासन की चूलें कसने में लगे हैं और सरकार की तरफ से बोलने के लिए अपने दो मंत्रियों सिद्धार्थनाथ सिंह और श्रीकांत शर्मा को अधिकृत कर मंत्रियों को भी अनुशासन के दायरे में रहने की परोक्ष नसीहत दे दी । दरअसल योगी आदित्यनाथ की आलोचना करनेवाले उनके बहाने से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को भी घेरने की कोशिश करते हैं ।
एक पुरानी कहावत है कि इतिहास खुद को दोहराता है । ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब मई दो हजार चौदह में नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे तब भी इसी तरह की बातें देखने सुनने को मिल रही थीं । उनसे भी इसी तरह की अपेक्षा की जा रही थी कि वो जादू की छड़ी घुमाएंगें और चमत्कार हो जाएगा । अब उत्तर प्रदेश के सीएम योगी से भी इसी तरह की अपेक्षाएं की जा रही है । दरअसल हमारे देश के पारंपरिक राजनीतिक विश्लेषकों ने आलोचना या किसी भी नेता को कसौटी पर कसने का नया औजार विकसित नहीं किया । पुराने ढर्रे पर चलकर ही वो खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश करते हैं जिसमें बहुधा उनको सफलता हासिल नहीं होती है ।
अगर पिछले एक दशक की ही बात करें तो उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव की सरकार रही । मायावती के शासनकाल में भ्रष्टाचार ने सांस्थानिक रूप ले लिया । हजारों करोड़ के घोटाले और घपले हुए, एनआरएचएम तो मायावती के राज में हुए घोटाले का सबसे बड़ा स्मारक है । मायावती के कई मंत्रियों को इस घोटाले में जेल जाना पड़ा, भ्रश्टाचार में शामिल नहीं होने पर सीएमओ तक का कत्ल हुआ । इसी तरह से अखिलेश यादव के शासनकाल में कानून व्यवस्था इतनी बदतर हो गई थी कि पुलिस भी किसी तरह अपनी इज्जत बचाकर चल रही थी । तुष्टीकरण की नीति के चलते पुलिस कई इलाकों में बेबस थी । अखिलेश यादव के शासनकाल में ही इंसपेक्टर से लेकर डीएसपी तक की हत्या की गई । पुलिस की बेबसी का आलम यह है कि बुधवार को शामली में पशुकटान की जांच करने पहुंची पुलिस की पार्टी को दौड़ा लिया गया और फायरिंग आदि भी की गई जिसमें कई पुलिस वाले बुरी तरह से जख्मी गए । योगी आदित्यनाथ के सामने सबसे पहले पुलिस को मिली कानून की ताकत बहाल करनी होगी । योगी के आलोचकों की अपेक्षा है कि वो एक ही दिन में सबकुछ ठीक करें । पिछले पांच साल में लगभग सड़ चुकी कानून व्यवस्था की स्थिति को ठीक करने में कुछ वक्त तो योगी आदित्यनाथ को देना होगा, देना भी चाहिए ।

चुनाव के पहले बीजेपी के संकल्प पत्र में किए गए वादों को लेकर भी योगी आदित्यनाथ से अपेक्षा की जा रही है कि वो उन संकल्पों को फौरन पूरा कर दें । किसानों की ऋण माफी को लेकर भी उनको घेरने की कोशिश की जा रही है । किसानों की ऋणमाफी का वादा खुद प्रधानमंत्री ने किया था इसलिए इसको पूरा तो होना ही है लेकिन इसकी जो प्रक्रिया है वो तो होगी । इसके अलावा गन्ना किसानों के भुगतान की प्रक्रिया में भी वक्त लगेगा । भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग के लिए अफसरों की पहचान करनी पड़ेगी और उनमें से कईयों को केंद्र की प्रतिनियुक्ति से वापस सूबे में लाना होगा, इसी एक प्रक्रिया है जिसमें वक्त लगता है । जिस तरह से योगी के आलोचक जल्द फैसलों को लेकर अधीर हो रहे हैं उनको सब्र करना चाहिए । टीवी पर बहस में बोलना, सोशल मीडिया पर लिखना आसाना है और वक्त  कम लगता है लेकिन सरकारी प्रक्रिया को कानून सम्मत ढंग से पूरा करने में वक्त लगता है और करीब पखवाड़े पहले सूबे की कमान संभालनेवाले मुख्यमंत्री को इतना वक्त तो देना ही चाहिए । इस मसले पर समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने सही कहा है कि योगी आदित्यनाथ को अपने वादों को पूरा करने और उसको जनता तक पहुंचाने के लिए कम से कम छह महीने का वक्त दिया जाना चाहिए । अभी योगी आदित्यनाथ की प्रशासनिक क्षमता को भी देश ने देखा नहीं हैस बगैर उसको परखे, बगैर उसको वक्त दिए भी आलोचना आधारहीन है । 

Tuesday, March 28, 2017

क्षेत्रीय क्षत्रपों की अहमियत

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों के दिन एक न्यूज चैनल पर चर्चा के दौरान बीजेपी के एक उत्साही नेता ने लगभग नारेबाजी की शक्ल में कहा कि ये बीजेपी से ज्यादा नरेद्र मोदी की जीत है । बहुत विनम्रता से उनको नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनने के पहले बीस मई दो हजार चौदह को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में दिया भाषण याद दिलाया । उस भाषण में उन्होंने भावुक होकर कहा था कि पार्टी उसके कार्यकर्ता के लिए मां समान होती है और मां पर कोई कृपा नहीं करता है बल्कि सेवा करता है । कहना ना होगा कि नरेन्द्र मोदी अपने इस वाक्य से पार्टी और संगठन की अहमियत बता रहे थे । प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नरेन्द्र मोदी ने पार्टी और संगठन की अहमियत को दरकिनार नहीं किया। उन्होंने लगभग तीन वर्षों के अपने कार्यकाल में बीजेपी को सांगठनिक रूप से मजबूत करने काम किया । जिन राज्यों में बीजेपी को विधानसभा चुनावों में जीत मिली वहां उन्होंने स्थानीय नेतृत्व को उभारने और मजबूत करने की योजना पर गंभीरता से काम हुआ । उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को सूबे की कमान सौंपकर एक बार नरेन्द्र मोदी ने फिर से अपनी इस कार्ययोजना को परवान चढाया । मोदी ने योगी को मुख्यमंत्री बनाकर आडवाणी-वाजयेपी युग से आगे जाकर पार्टी को युवा नेतृत्व देने का साहस भी दिखाया । ना सिर्फ योगी को बल्कि अपने विश्वासी रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर को भी गोवा भेजकर वहां पार्टी की स्थिति मजबूत करने का दांव चल दिया । पार्रिकर के दिल्ली आने के बाद से पार्टी गोवा में बिखर गई थी । इसके पहले भी उन्होंने महाराष्ट्र में ब्राह्णम देवेन्द्र फड़णवीस को, झारखंड में गैर आदिवासी रघुवर दास को, हरियाणा में गैर जाट मनोहर लाल खट्टर को, असम में सर्वानंद सोनोवाल को सूबे की कमान सौंपी थी । गुजरात में तमाम अटकलों के बावजूद विजय रूपानी को कमान मिली थी । विधानसभा चुनावों में जीत के बाद तो अटकलें ये भी लग रही हैं कि शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह और वसुंधरा को दिल्ली लाकर वहां नए नेतृत्व के हाथ में सत्ता दी जाएगी । अगर ऐसा होता है एंटी इनकंबेंसी को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जाएगा । दरअसल अगर देखा जाए तो मोदी उन लोगों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं जिनकी छवि बेदाग है और जो दबाव में नहीं आते हैं । देवेन्द्र फड़णवीस को ही लें तो वो शिवसेना के जरा भी दबाव में नहीं आते हैं और पार्टी को लगातार मजबूत भी करते चल रहे हैं । ऐसी ही छवि योगी आदित्यनाथ की भी है । इसके साथ ही मोदी जिनको चुनते हैं उनके आसपास एक कवच भी तैयार कर देते हैं जैसे योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद फौरन सूबे के सभी सांसदों को बुलाकर संदेश दे दिया कि वो ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए मुख्यमंत्री के पास सिफारिश ना करें । इस तरह से वो स्थानीय या क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूत करते हैं । राजनीतिक तौर पर इसके कई फायदे हैं । एक तो संगठन मजबूत हो रहा है दूसरे अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाकर नरेन्द्र मोदी अपनी स्थिति को भी मजबूत कर रहे हैं । हलांकि इस वक्त पार्टी में उनको कोई चुनौती नहीं है लेकिन वो भविष्य के मद्देनजर अपनी रणनीति तय करते चल रहे हैं ।

अब बीजेपी की तुलना में अन्य दलों में देखें तो इसका साफ अभाव दिखता है । कांग्रेस ने सायास वर्षों तक स्थानीय नेतृत्व को कमजोर करने का ही काम किया। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक ने किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को मजबूत नहीं होने दिया । कांग्रेस के इन दो नेताओं के दौर में शायद ही कोई ऐसा मुख्यमंत्री होगा जिसने पद पर अपना कार्यकाल पूरा किया हो । कांग्रेस में इंदिरा गांधी के दौर में किचन कैबिनेट और राजीव गांधी के दौर में कोटरी हुआ करती थी, इनमें तमाम वो नेता होते थे जो गणेश परिक्रमा में यकीन रखते थे । लंबे समय तक चली इस कोटरी की पॉलिटिक्स ने कांग्रेस को पंगु कर दिया । सांगठनिक क्षमताओं की बजाए उन नेताओं को तरजीह दी जाने लगी जो नेता व्यक्ति पूजा में प्रवीण थे । यही वह दौर था जब भारत को राजवंशीय लोकतंत्र कहा जाने लगा था क्योंकि एक परिवार के इर्दगिर्द पार्टी सिमट गई थी । इंदिरा गांधी ने जिस दरबारी संस्कृति को बढावा दिया था उसको संजय-राजीव-सोनिया ने आगे बढ़ाया । राहुल गांधी ने जरूर शुरुआत में संगठन के चुनाव आदि की पहल की थी लेकिन उसको वो आगे नहीं बढ़ा पाए और दरबारियों ने उनको अपने चंगुल में ले लिया । कांग्रेस की इस राजवंशीय संस्कृति का असर अन्य पार्टियों पर भी पड़ा चाहे वो डीएमके हो, एआईएडीएमके हो,नेशनल कांफ्रेंस हो, जेडीएस हो, समाजवादी पार्टी हो । समाजवादी पार्टी, नेशनल कांफ्रेंस और डीएमके जैसी कुछ पार्टियों के नेताओं ने अपने बेटों को पार्टी सौंप दी लेकिन मायावती, ममता और जयललिता ने दूसरी पंक्ति के नेता तैयार नहीं किए । नीतीश कुमार तक ने इस मसले पर कुछ खास नहीं किया । बहुधा यह इस वजह से भी होता है कि इनको लगता है कि अगर मजबूत नेता उभर गया तो उनकी कुर्सी को खतरा हो सकता है । इस मनोविज्ञान के तहत ही कमजोर नेताओं को आगे बढाया जाता है। कांग्रेस को अगर दो हजार चौबीस के लोकसभा चुनाव में मुकाबले में रहना है तो उसको अपने क्षेत्रीय क्षत्रपों को अहमियत देनी होगी, क्योंकि पार्टी की जो हालत है उसमें दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव तक उसको सांगठनिक रूप से मजबूत कर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती देना संभव नहीं लग रहा है । कांग्रेस के नेता भले ही पार्टी में बदलाव की बात करें लेकिन ये बदलाव जमीनी होंगे तभी लाभ हो पाएगा । 

Monday, March 20, 2017

हिंदू वोटरों को रिटर्न गिफ्ट

प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के तमाम दिग्गजों की मौजूदगी में गोरक्षपीठ के महंत और पांच बार से लगातार गोरखपुर से सांसद चुने जा रहे योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली । चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जिस केसरिया होली की बात की थी वो उत्तर प्रदेश में योगी के शपथ ग्रहण के साथ संपन्न हो गई । योगी आदित्यनाथ के तौर पर बीजेपी ने एक ऐसे चेहरे पर दांव लगाया है जो अपनी वेशभूषा और बयानों से प्रखर हिंदूत्व की पैरोकारी करता रहा है । योगी आदित्यनाथ पूर्वी उत्तर प्रदेश से आते हैं जहां बीजेपी को लोकसभा और विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला था । इसके पहले शनिवार को जब भारत माता की जय के नारों के बीच लखनऊ के लोकभवन के सभागार में योगी आदित्यनाथ के नाम को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर जब विधायकों ने सर्वसम्मति से चुना तो वहां से एक साथ कई संदेश निकले । प्रखर और कट्टर हिंदूवादी छवि के नेता की पूर्वांचल में बेहद दबंग छवि है । कहा जाता है कि योगी अपनी दबंगई की वजह से प्रशासन को भी अपने इलाके में सही से काम करने के लिए मजबूर करते रहे हैं । जब गोरखपुर विकास प्राधिकरण ने इलाके के मुसलमानों की जमीन अधिग्रहित की थी तो योगी ने उनके अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी थी।  इसके अलावा योगी गोरखपुर से हिंदू वाहिनी नाम की एक संस्था भी चलाते हैं जिसके माध्यम से समाजसेवा का काम तो करते ही रहते हैं अपनी राजनीतिक जमीन भी मजबूत रखते हैं । दो हजार दो में जब वो अपनी पार्टी से खफा हो गए थे तो उसके बाद ही उन्होंने इस संगठन को बनाया था ।
योगी आदित्यनाथ को देश के सबसे बड़े सूबे की कमान सौंपकर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश के हिद्ओं को विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत का रिटर्न गिफ्ट दे दिया है । जिस तरह से जातियों के बंधन को तोड़कर उत्तर प्रदेश की हिंदू आबादी ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भरोसा जताया था उस भरोसे को योगी का राजतिलक और गाढ़ा करेगा । योगी ने चुनाव पूर्व अपने भाषणों में साफ साफ कहा था कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में सत्य का संतुलन कायम कर दिया गया है और यही संतुलन पूरे प्रदेश में लाना है । उनका इशारा बहुत साफ था । कैराना से पलायन और लव जेहाद जैसे मुद्दों को योगी प्रमुखता से उठाते रहे हैं ।  
दरअसल अगर योगी के राजतिलक पर विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि वहां अब भारतीय जनता पार्टी हिदुत्व और विकास की समन्यवादी राजीनीति के रास्ते पर चलेगी । हिदुत्व और विकास की इस समन्वयवादी राजनीति का मानचित्र दो हजार चौदह में लोकसभा चुनाव के वक्त तय किया गया था जब नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश को छोड़कर बनारस को अपना लोकसभा क्षेत्र चुना था । बनारस का सनातन परंपरा में अपना एक अलग स्थान है और उसी प्रतीकात्मकताकी वजह से बनारस का चयन हुआ था । नरेद्र मोदी की उम्मीदवारी मात्र ने उस वक्त पूर्वांचल औप बिहार के सटे इलाकों में बीजेपी के लिए कम से कम तीन दर्जन लोकसभा सीट पर जीत तय कर दी थी । उसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी मुसलमान को अपना प्रत्याशी नहीं बनाकर अपने कोर वोटरों को एक संदेश भी दिया । इस बात की लाख आलोचना हुई लेकिन उन आलोचनाओं पर ध्यान ही नहीं दिया गया, बल्कि उस पार्टी के नेताओं से जब इस बारे में सवाल पूछा जाता था तब वो कहते थे कि उनकी पार्टी सबका साथ सबका विकास में यकीन रखती है और तुष्टीकरण को किसी भी कीमत पर तरजीह नहीं देगी । विधायक दल के नेता के चुनाव में केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर मौजूद केंद्रीय मंत्री वैकेंया नायडू ने पत्रकारों से बात करते हुए साफ कहा कि विकास के अलावा जाति और मजहब की राजनीति के पैरोकारों को जनता ने जिस तरह से सबक सिखाया है उसका बीजेपी ध्यान रखेगी ।
अपने हिंदू वोट को मजबूत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी बहुत सधे हुए तरीके से उनको इस बात का संदेश दे रही थी और चुनावी नतीजों ने यह साबित किया कि बीजेपी के लक्षित वोटरों ने इन संदेशों को ग्रहण भी किया । अब योगी के हाथ में यूपी की कमान देकर बीजेपी नेतृत्व ने वोटों के इस समूह को और मजबूत करने का प्रयास किया है । इस प्रयास को दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव के पहले अन्य राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों की तैयारी से भी जोड़कर देखा जा सकता है। आनेवाले दिनों में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं ।

योगी को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपकर एक बार फिर से प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने राजनीतिक विश्लेषकों के आंकलन को गलत साबित कर दिया है । जो लोग पारंपरिक तरीके से राजनीति का विश्लेषण करते हैं उनको यह बात गले ही नहीं उतर रही थी कि उत्तराखंड में भी राजपूत जाति का मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश में भी राजपूत सीएम । जातियों से जकड़े विश्लेषकों को यह समझ ही नहीं आ रहा था । परंपरागत राजनीति विश्लेषक तो यहां तक कह रहे थे कि पूर्वी उत्तर प्रदेश से पीएम और सीएम दोनों नहीं हो सकते । पत्रकारों की टोली, जो खबरों के मामले में खुद को तीस मार खां समझती है, लगातार अलग अलग नामों पर कयास लगा रही थी । न्यूज चैनलों पर तो हर पांच मिनट में यूपी का नया सीएम घोषित हो रहा था । शनिवार सुबह तो मनोज सिन्हा का नाम तय माना जा रहा था । मनोज सिन्हा तो बनारस क मंदिर-मंदिक जाकर आशीर्वाद भी लेने लगे थे । योगी की ताजपोशी ने इन सब अटकलों को गलत साबित कर दिया । दरअसल अगर हम देखें तो नरेन्द्र मोदी ने बिल्कुल नई तरह की राजनीति शुरू की है जिसमें जातिगत समीकरणों का ध्यान तो रखा जाता है लेकिन उसको परोक्ष तरीके से अपनी राजनीति का हिस्सा बनाते हैं । जैसे योगी के साथ केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाकर सोशल इंजीनियरिंग को भी साधने की कोशिश की गई है । केशव प्रसाद मौर्य पिछड़ी जाति से आते हैं और दिनेश शर्मा ब्राह्मण हैं । अब इस समीकरण पर नजर डालें तो साफ है कि गैर यादव पिछड़ा, ब्राह्मणों को संदेश दे दिया गया । इसके बाद मंत्रियों के चयन में भी अन्य जातियों और क्षेत्रीय संतुलन का ख्याल रखा जाना तय है । योगी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने पर कुछ लोगों को लग रहा है कि विकास से ज्यादा विवाद होगा । कुछ उत्साही स्तंभकारों ने तो यूपी को हिंदू राज्य तक घोषित करते हुए योगी को मुसलमानों को साथ लेकर चलने की नसीहत तक दे डाली है । योगी के अबतक के बयानों और उनकी छवि के मद्देनजर यह आशंका व्यक्त की जा रही है लेकिन उत्तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जिसपर पीएमओ की सीधी नजर रहेगी । योगी के नाम के ऐलान के दो दिन पहले ही पीएमओ के आला अफसरों की टीम लखनऊ पहुंचकर सुशासन का खाका खींचने के काम में जुटी है । ऐसे में विवाद की आशंका से एकदम इंकार तो नहीं किया जा सकता है लेकिन मुख्यमंत्री बनने और उसके पहले के नेताओं के आचार व्यवहार में फर्क इस देश ने पहले भी देखा है । दूसरे योगी को साथ देने या साधने के लिए केशव मौर्या और दिनेश शर्मा को भी लगाया गया है, इस बात को नहीं भूलना चाहिए ।