Translate

Showing posts with label बिहार राष्ट्रभाषा परिषद. Show all posts
Showing posts with label बिहार राष्ट्रभाषा परिषद. Show all posts

Saturday, November 12, 2022

सांप्रदायिकता की शिकार अकादमियां


महारानी वेबसीरीज में एक संवाद है, जैसे ही मुझे लगता है कि मैंने बिहार को समझ लिया है, वैसे ही बिहार एक और झटका देता है। हो सकता है शब्दों में कुछ बदलाव हो लेकिन भाव यही है। इस संवाद में बिहार की जगह अगर वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लिख दिया जाए तब भी इस संवाद के अर्थ में कोई बदलाव नहीं होता दिखेगा। कुछ दिनों पहले की बात है बिहार में उर्दू अनुवादकों को समारोहपूर्वक नियुक्ति पत्र बांटा जा रहा था। मुख्य सचिव ने अपने उद्बोधन में विभाग को कई सुझाव दिए। बारी आई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बोलने की। उन्होंने मुख्य सचिव पर तंज कसते हुए कहा कि प्रवचन तो आपने बहुत अच्छा दिया। आप तो 2007 से मेरे साथ थे। 2008 से ही हम उर्दू अनुवादकों की बहाली (नियुक्ति) के लिए कह रहे हैं लेकिन अबतक नहीं हो पाया है। अभी भी पूरा बहाली नहीं हुआ है। जल्दी से सब पता करके काम पूरा करवाइए। पूरा सभागार पहले ठहाकों से और फिर तालियों से गूंज उठा। वेबसीरीज महारानी के पात्र मिश्रा जी की तर्ज पर बिहार के मुख्य सचिव अमीर सुब्हानी भी सोच रहे होंगे कि जैसे ही उनको लगता है कि वो नीतीश कुमार को समझने लगे हैं तो वो एक झटका देते हैं। प्यार से ही सही लेकिन नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्य सचिव को सार्वजनिक तौर पर झटका तो दे ही दिया।

ठहाकों और तालियों के बीच एक महत्वपूर्ण बात दब सी गई वो ये कि ये समारोह उर्दू के अनुवादकों को नियुक्ति पत्र देने का था। जिसमें नीतीश कुमार ने कहा कि वो 2008 में जिसकी घोषणा की गई थी उसको चौदह साल बाद भी पूरी तरह से संपन्न नहीं किया जा सका। उर्दू को लेकर नीतीश कुमार की चिंता की प्रशंसा की जानी चाहिए। यह अपेक्षा की जाती है कि किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री या उनके अधीन कार्य करनेवाले मंत्रालय या विभाग किसी भी भाषा के साथ भेदभाव नहीं करेंगे। संविधान भी यही कहता है। लेकिन क्या बिहार सरकार इस अपेक्षा को पूरा कर रही है। नीतीश कुमार ने जब तेजस्वी यादव के साथ मिलकर सरकार बनाई तो महागठबंधन की सरकार ने  बिहार की दो और स्थानीय भाषाओं के लिए अकादमियां खोलने की घोषणा की। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में निर्णय लिया गया कि वैशाली के आसपास के जिले में बोली जानेवाली बज्जिका और सीमांचल में बोली जानेवाली सुरजापुरी को संरक्षित और समृद्ध करने के लिए दो नई अकादमियों का गठन किया जाएगा। ये घोषणा स्वागतयोग्य है। उर्दू अनुवादकों की नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में मुख्यमंत्री स्वयं कह चुके हैं कि उर्दू को लेकर 2008 में जो घोषणाएं की गई थीं वो अबतक धरातल पर नहीं उतर पाई हैं। तो क्या माना जाए कि इन अकादमियों की घोषणाओं को भी पूरा होने में काफी समय लगेगा। ये कब तक हो पाएगा ये तो भविष्य के गर्भ में है।

नीतीश सरकार ने दो नई भाषा अकादमियों की घोषणा की लेकिन जो भाषा और सांस्कृतिक अकादमियां बिहार में पहले से चल रही हैं वो लगभग मृतप्राय हैं। बिहार में पहले से भोजपुरी अकादमी, मगही अकादमी, मैथिली अकादमी और संस्कृत अकादमी अस्तित्व में हैं। पटना के शास्त्री नगर इलाके के सरकारी कर्माचरियों के आवासीय फ्लैट्स में इन सभी अकादमियों का कार्यालय है। इन अकादमियों की हालत इतनी खराब है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। इनकी आधारभूत जरूरतें पूरी हो सकें, इतनी व्यवस्था भी बिहार सरकार का शिक्षा विभाग नहीं कर पा रहा है। अकादमियों में इतने कम नियमित कर्मचारी हैं कि किसी नए काम के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। कुछ दिनों पूर्व मगही अकादमी के पूर्व अध्यक्ष और हिंदी के महत्वपूर्ण कवि रामगोपाल रुद्र से संबंधित सामग्री की तलाश में एक मित्र मगही अकादमी पहुंचे थे। कार्यालय में एक कर्मचारी अकेले बैठा था। कुछ सामग्री मिली लेकिन अकादमी कार्यालय बुरी  हालत में थी। इनकी हालत देखकर ही किसी के मन में ये प्रश्न भी नहीं उठेगा कि इनकी स्थापना किन उद्देश्यों के लिए की गई थी। ये अकादमियां स्थापना के समय निश्चित किए गए उद्देश्यों की पूर्ति में कितनी सफल रहीं। आंकलन तो उन संस्थानों का हो सकता है जो सक्रिय हों और साधन संपन्न हों। संसाधन की कमी वाले संस्थानों के कार्यों का आकलन लगभग असंभव है। अन्य भाषा अकादमियों की बदहाली के बीच दो नई भाषा अकादमियों की घोषणा का कोई अर्थ नहीं है। दूसरी तरफ उर्दू को लेकर पूरी बिहार सरकार सक्रिय नजर आ रही है। मुख्यमंत्री स्वयं प्रदेश के मुख्य सचिव को सार्वजनिक रूप से सभी बहालियां जल्द करने के लिए कह रहे हैं। क्या अन्य अकादमियां भाषाई सांप्रदायिकता का शिकार हो रही हैं।    

समग्रता में बिहार के कला और संस्कृति के परिदृश्य को देखा जाए तो उसको लेकर शासन के स्तर पर एक उदासीनता नजर आती है। भाषा अकादमियों के अलावा शिक्षा विभाग के अंतर्गत बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी और बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का संचालन भी होता है। इन दोनों संस्थाओं का बेहद समृद्ध इतिहास रहा है। यहां से अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन हुआ था लेकिन अब उन पुस्तकों का पुनर्प्रकाशन नहीं हो पा रहा है। इन दोनों संस्थाओं का कार्यालय ऐसी जगह पर है जहां से शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारी हर दिन गुजरते हैं लेकिन इनकी बदहाली पर किसी की नजर नहीं जाती है या देखकर अनदेखा किया जाता है। अगर ये दोनों संस्थाएं सिर्फ पूर्व प्रकाशित पुस्तकों का प्रकाशन कर दें तो उनकी बिक्री से ही आगे की योजनाओँ पर काम करने लायक धन मिलने की संभावना बन सकती है। संस्कृति विभाग के अंतर्गत बिहार संगीत नाटक अकादमी और बिहार ललित कला अकादमी का संचालन होता है। ये दोनों संस्थाओं में लंबे समय से न तो अध्यक्ष हैं और न ही उपाध्यक्ष। प्रविधान है कि दोनों संस्थाओं में एक अध्यक्ष और दो उपाध्यक्ष को बिहार सरकार नामित करेगी। सचिव का अतिरिक्त प्रभार भी विभाग के अधिकारियों के पास है। ऐसी स्थिति में इन संस्थाओं के क्रियाकलाप लगभग ठप हैं। बिहार में एक और अनूठी घटना हुई। पटना में एक हिंदी भवन बना, लोगों की उम्मीदें जगीं कि वहां हिंदी के प्रोन्नयन को लेकर कार्य हुआ करेंगे। लेकिन पहले वहां एक मैनेजमेंट संस्थान और अब जिलाधिकारी का कार्यालय चल रहा है।    

बिहार रचनात्मक रूप से बेहद उर्वर प्रदेश है। पहले भी और अब भी प्रदेश के कई लेखकों की राष्ट्रीय ख्याति रही है। रेणु से लेकर दिनकर तक, रामवृक्ष बेनीपुरी, शिवपूजन सहाय से लेकर उषाकिरण खान तक। वर्तमान में भी कई लेखक रचनात्मक रूप से खूब सक्रिय हैं। इन रचनाकारों और कलाकारों के साथ मिल कर ये भाषा संस्थान प्रदेश के गौरव को और विस्तार दे सकते थे लेकिन अफसोस कि शासन के स्तर पर इनपर ध्यान देनेवाला कोई नहीं है। जिस तरह से उर्दू को लेकर नीतीश सरकार उत्साहित दिखाई देती है और उसके विस्तार के लिए योजनाएं बन रही है, नियुक्तियां हो रही हैं उस अनुपात में सरकार का ध्यान न तो मैथिली, न मगही और न ही भोजपुरी अकादमियों की ओर जा रहा है। अगर इन चार भाषा अकादमियों को कुछ स्थायी कर्मचारी भी मिल जाते तो इनका दैनंदिन कार्य सुचारू रूप से चल पाता। 2015 में पुरस्कार वापसी का जो प्रपंच रचा गया था, उसके कर्ताधर्ता बिहार की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि फिर से विश्व कविता समारोह जैसे किसी आयोजन की रचना हो जाए और कोई अशोक वाजपेयी उसके आयोजन के लिए आगे न आ जाएं। करोड़ों का बजट आवंटन हो और कला संस्कृति के नाम पर मेला लगे।   

Saturday, July 28, 2012

दम तोड़ती साहित्यिक संस्थाएं

आजादी के बाद देश को जवाहरलाल नेहरू जैसा साहित्यप्रेमी और लेखक प्रधानमंत्री मिला जिसके दिमाग में देश में साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की एक व्यापक योजना थी । नेहरू के वक्त में साहित्य और साहित्यकारों की काफी इज्जत थी । रामधारी सिंह दिनकर और मैथिलीशरण गुप्त के अलावा कई साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों को जवाहरलाल नेहरू ने राज्यसभा में मनोनीत कर संसद का मान और स्तर दोनों बढाया था । आजादी के बाद संविधान द्वारा स्वीकृत भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट लेखन को पुरस्कृत, संवर्धित और विकसित करने के एक बड़े उद्देश्य को लेकर 1954 में साहित्य अकादमी की स्थापना की गई थी । पररंतु अगर हम पिछले अट्ठावन साल की उपल्बिधियों पर गौर करें तो एक साथ विस्मय भी होता है और आश्चर्य भी । शुरुआती एक दशक के बाद से लगभग चालीस साल तक साहित्य अकादमी अपने उद्देश्य से भटकती रही । अस्सी और नब्बे के दशक में तो साहित्य अकादमी की प्रतिष्ठा बेहद धूमिल हुई । जिस तरह से हिंदी के कर्ताधर्ताओं ने उस दौरान पुरस्कारों की बंदरबांट की थी उससे साहित्य अकादमी की साख को तो बट्टा लगा ही उसकी कार्यशैली पर भी सवाल खड़े होने लगे थे । फिर साहित्य अकादमी के चुनावों में जिस तरह से खेमेबंदी और रणनीतियां बनी उससे भी वो साहित्य कम राजनीति का अखाड़ा ज्यादा बन गई थी । गोपीचंद नारंग और महाश्वेता देवी के बीच हुए अध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान तो माहौल एकदम से साहित्य के आमचुनाव जैसा था । गोपीचंद नारंग के चुनाव जीतने के बाद साहित्य अकादमी की स्थिति सुधरी । वर्षों से विचारधारा के नाम पर अकादमी पर कुंडली जमाए मठाधीशों की सत्ता का अंत होने से तिलमिलाए लोगों ने नारंग पर कई तरह के आरोप लगाए । उनको हटाने की मांग की गई लेकिन उस दौर में अकादमी ने अपना भव्य स्वर्ण जयंती समारोह तो मनाया ही और कई बेहतरीन कार्यक्रम कर आलोचकों को मुंहतोड़ जवाब दिया । हाल के दिनों में जब से विश्वनाथ तिवारी साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष बने हैं तो अकादमी के कार्यक्रमों में विविध लेखकों की सहभागिता काफी बढ़ी हैं ।
साहित्य अकादमी के अलावा अगर हम अन्य राज्यों की हिंदी साहित्य, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई अकादमियों पर विचार करें तो हालात बेहद निराशाजनक नजर आते हैं । दिल्ली की हिंदी अकादमी तो सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग में तब्दील हो गया है । हिंदी अकादमी की संचालन समिति की पिछले कार्यकाल में एक भी बैठक नहीं हो पाई थी । दिल्ली सरकार हिंदी अकादमी का नियमित सचिव नियुक्ति नहीं कर पाई और एडहॉक सचिव से लंबे समय तक काम चलाती रही । इससे साहित्य को लेकर सरकार की गंभीरता का भी पता चलता है । नतीजा यह हुआ कि अकादमी के एडहॉक प्रशासनिक मुखिया के नेतृत्व में आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों में भी एक एडहकिज्म नजर आती रही । एक जमाने में लाल किले पर होनेवाली कवि गोष्ठी दिल्ली की हिंदी अकादमी का प्रतिष्ठित कार्यक्रम हुआ करती था लेकिन जिस तरह से बाद में कवियों के चयन में मनमानी और उपकृत करने की मनोवृत्ति सामने आई उससे लालकिले का आयोजन रस्मी होकर रह गया । उसके अलावा हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए ना तो कोई किताब छापी गई और ना ही अकादमी की साहित्यक पत्रिका की आवर्तिता बरकरार रखी जा सकी । जो किताबें छपी वो भी स्तरहीन और पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाने वाली बनकर रह गई । हिंदी अकादमी की प्रतिष्ठित पत्रिका इंद्रप्रस्थ भारती का आज कहीं कोई नामलेवा नहीं रहा । दसियों साल से दिल्ली की हिंदी अकादमी दिल्ली के युवा लेखकों के प्रोत्साहन के लिए पुस्तक प्रकाशन योजना के तहत दस हजार रुपए का अनुदान देती है । लेकिन बदलते वक्त के साथ इस अनुदान राशि में कोई बदलाव नहीं किया गया । दिल्ली की युवा प्रतिभाओं को सामने लाने के अपने दायित्व को निभा पाने में कामयाब नहीं हो पा रही है और संघर्षरत युवा लेखकों को अपनी किताबें छपवाने में दर बदर भटकना पड़ रहा है ।
यह हाल सिर्फ दिल्ली की हिंदी अकादमी का नहीं है । हिंदी प्रदेशों में जितनी भी अकादमियां हैं वो सब राजनैतिक नेतृत्व की बेरुखी और उपेक्षा के अलावा लेखकों की आपसी राजनीति का शिकार हो गई हैं । मध्य प्रदेश एक जमाने में साहित्य संस्कृति का अहम केंद्र माना जाता था । अस्सी के दशक में मध्य प्रदेश में इतनी साहित्यिक गतिविधियां हो रही थी और सरकारी संस्थाओं से नए पुराने लेखकों के संग्रह प्रकाशित हो रहे थे कि अशोक वाजपेयी ने अस्सी में कविता की वापसी का ऐलान कर दिया था । ना सिर्फ साहित्य बल्कि कला के क्षेत्र में भी मध्य प्रदेश का सांस्कृतिक संस्थाओं की सक्रियता चकित करनेवाली थी । मध्य प्रदेश में कई जगहों पर मुक्तिबोध, प्रेमचंद और निराला के नाम पर साहित्य सृजन पीठ खोले गए थे और उन पीठों पर हिंदी के मूर्धन्य लोगों को नियुक्ति दी गई थी जिससे की उन पीठों की साख शुरुआत से ही कायम हो पाई ।  लेकिन बाद में लेखकों की विचारधारा की लड़ाई और राजनीतिक सत्ता का बदलने से मध्यप्रदेश में साहित्यिक सत्ता भी पलट गई । कालांतर में इन साहित्यक संस्थाओं की सक्रियता और काम करने का स्तर भी गिरा । संस्थाओं पर भाई भतीजावाद के आरोप लगे । उनकी नियुक्तियों में धांधली की शिकायतें सामने आई । विचारधारा की लड़ाई और सरकार की बेरुखी से नुकसान तो साहित्य का ही हुआ । मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान साहित्य अकादमी का भी बुरा हाल है । राजस्थान से निकलने वाली पत्रिका- मधुमती- का एक जमाने में हिंदी के पाठकों को इंतजार रहता था लेकिन अब मधुमती कब आती है और कब गायब हो जाती है उसका पता भी नहीं चल पाता । राजस्थान में नेहरू की पार्टी कांग्रेस का राज है लेकिन नेहरू के सपनों का भारत बनाने की वहां के राजनैतिक नेतृत्व को फिक्र नहीं है । सरकारी साहित्यिक संस्थाएं सरकारी की बेरुखी की वजह से दम तोड़ रही हैं ।
एक जमाने में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार ग्रंथ अकादमी और बिहार साहित्य सम्मेलन की देशभर में प्रतिष्ठा थी और उनसे रामधारी सिंह दिनकर, शिवपूजवन सहाय , रामवृत्र बेनीपुरी जैसे साहित्यकार जुड़े थे । लेकिन आज बिहार सरकार के शिक्षा विभाग की बेरुखी से ये संस्थाएं लगभग बंद हो गई हैं । बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के परिसर में सरकारी सहायता प्राप्त एनजीओ किलकारी काम करने लगी है । किलकारी पर सरकारी धन बरस रहा है लेकिन उसी कैंपस में राष्ट्रभाषा परिषद पर ध्यान देने की फुर्सत किसी को नहीं है । बिहार ग्रंथ अकादमी का बोर्ड उसके दफ्तर के सामने लटककर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहा है । उसके अलावा बिहार साहित्य सम्मेलन में तो हालात यह है कि आए दिन वहां दो गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई को लेकर पुलिस बुलानी पड़ती है । साहित्य सम्मेलन का जो भव्य हॉल किसी जमाने में साहित्यक आयोजनों के लिए इस्तेमाल में लाया जाता था वहां अब साड़ियों की सेल लगा करती है । इन संस्थाओं के समृद्ध पुस्तकालय देखभाल के आभाव में बर्बाद हो रहे हैं । बिहार के शिक्षा विभाग पर इन साहित्यक विभागों को सक्रिय रखने का जिम्मेदारी है लेकिन अपनी इस जिम्मेदारी को निभा पाने में शिक्षा विभाग बुरी तरह से नाकाम है ।
दरअसल साहित्यक संस्थाओं को लेकर नेहरू के विजन वाला कोई नेता अब देश में बचा नहीं । नेताओं को पढ़ने लिखने से ज्यादा तिकड़मों और अपनी कुर्सी बचाने की फिक्र होती है । सरकार में शामिल लोगों की साहित्य का प्रति उदासीनता से इन संस्थाओं के खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है । वक्त आ गया है कि सरकार अपनी समृद्ध साहित्यिक संस्थाओं को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए ।