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Saturday, December 13, 2025

संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाने का खेल


संसद के शीतकालीन सत्र चुनाव सुधार को लेकर चर्चा हुई। यह चर्चा चुनाव सुधार पर कम मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर केंद्रित हो गई। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर अपने हमले को सदन में भी जारी रखा। वोट चोरी के आरोप दोहराए। अपनी पिछली प्रेस कांफ्रेस में कही गई बातों को दोहराते हुए चुनाव आयुक्त की आलोचना की। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने तो एसआईआर कराने के चुनाव आयोग के अधिकार पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया। सत्ता पक्ष के सांसदों ने भी अपनी बात रखी। गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में चर्चा का उत्तर देते हुए विपक्ष के सभी आरोपों को ना केवल खारिज किया बल्कि कांग्रेस को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। इस चर्चा से भ्रम भी दूर हुआ। कांग्रेसी ईकोसिस्टम निरंतर ये नैरेटिव बनाने का प्रयास कर रही थी कि मोदी सरकार ने चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया में बदलाव किया। समिति से उच्चतम न्यायाल के मुख्य न्यायाधीश को कानून बनाकर बाहर कर दिया। कानून बनाकर चुनाव आयुक्तों को जीवनभर के लिए केस मुकदमे से बचाने के लिए कानूनी कवच दे दिया। तीसरा कानून बनाकर वोटिंग के दौरान के सीसीटीवी फुटेज को 45 दिनों तक ही रखने का नियम बना दिया। गृह मंत्री अमित शाह ने तीनों आरोपों की धज्जियां उड़ा दीं। 2023 में पहली बार चुनाव आयुक्तों के चयन को एक समिति से कराने का कानून पास हुआ। उसी समय केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल ने बताया था कि मुख्य न्यायाधीश को हटाने की बात गलत है। दरअसल 2023 के पहले प्रधानमंत्री की अनुशंसा पर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति होती थी। सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद अंतरिम व्यवस्था बनी थी। मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति का सदस्य बनाया गया था। सरकार ने जब कानून बनाया तो अंतरिम व्यवस्था समाप्त हो गई। इसको ही कांग्रेसी इकोसिस्टम जोर-शोर से प्रचारित कर रहा था, अर्धसत्य के साथ । मतदान के दौरान की सीसीटीवी फुटेज को सहेजने को लेकर भी भ्रम फैलाया गया था। चुनाव से संबंधित विवाद पर वाद दायर करने की अवधि ही 45 दिनों तक है तो सीसीटीवी फुटेज को वर्षों तक सहेजने का क्या औचित्य । चुनाव विवाद पर यदि कोई वाद दायर होता है तो कोर्ट के आदेश पर फुटेज को सहेजा जा सकता है। चुनाव आयोग के कर्मचारियों को 1951 के कानून के मुताबिक चुनाव के दौरान किए गए कार्यों के लिए केस मुकदमे से मुक्त रखा गया है। कोई नया नियम नहीं बनाया गया है। लोकसभा में अमित शाह ने स्थिति साफ की लेकिन इकोसिस्म अब भी अर्धसत्य फैलाने में लगा हुआ है। 

इस दौरान ही एक और महत्वपूर्ण घटना हुई। तमिलनाडू हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस जी आर स्वामीनाथन पर विपक्षी दलों ने महाभियोग चलाने का मांग पत्र लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिड़ला को सौंपा। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के सांसद अखिलेश यादव, कांग्रेस की सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की सांसद कनिमोई समेत सौ से अधिक सांसदों ने जस्टिस स्वामीनाथन पर महाभियोग के प्रस्ताव पत्र पर हस्ताक्षर किए। विपक्षी दलों के इन सांसदों ने मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस स्वामीनाथन पर आरोप लगाया है कि वो विष्पक्ष होकर अपने न्यायिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर रहे । उनपर एक वकील का पक्ष लेने का आरोप भी लगाया गया है। विपक्ष को महाभियोग का अधिकार है लेकिन महाभियोग की टाइमिंग को लेकर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। दरअसल तमिलनाडु के मदुरै में थिरुपनकुंद्रम पहाड़ियों पर स्थित मंदिर में दीपक जलाने से जुड़ा मामला है। पहाड़ी पर स्थित मंदिर के पास दीपथून में दीप जलाने की मान्यता है। दीप जलाने को लेकर पास के दरगाह से जुड़े लोगों ने आपत्ति की थी। मामला कोर्ट में गया तो कोर्ट ने दीपस्थान पर दीप जलाने की अनुमति दे दी। इसके विरोध में कुछ लोग हाईकोर्ट पहुंचे। हाईकोर्ट में जस्टिस स्वामीनाथन ने दीप जलाने की अनुमति दी। ये भी आदश दिया गया कि सिर्फ 10 लोग दीप जलाने के समय दीपस्थान पर उपस्थित रहें। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद पुलिस प्रशासन ने दीप जलाने की अनुमति नहीं दी। हाईकोर्ट के दीप जलाने के आदेश के विरुद्ध राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई। सुप्रीम कोर्ट में ये मामला लंबित है। लेकिन राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन दीप नहीं जलाने देने पर अड़ी है। सुप्रीम कोर्ट से इस मसले पर कोई फैसला आने के पहले ही तमिलनाडू की डीएमके ने आईएनडीआईए गठबंधन के अपने साथियों के साथ मिलकर लोकसभा अध्यक्ष को दीप जलाने का आदेश देनेवाले जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव दे दिया।  

दरअसल मदुरै की पहाडी पर स्थित मंदिर के पास एक दरगाह है। मंदिर दूसरी शताब्दी का बताया जाता है और दरगाह बहुत बाद में बना। दरगाह के बनने के बाद से ही पहाड़ी की जमीन को लेकर विवाद आरंभ हो गया था। 1920 में पहली बार मामला कोर्ट पहुंचा था। मंदिर और दरगाह के बीच को जमीन को लेकर एक प्रकार की सहमति बनी हुई है। 1994 में कार्तिगई दीपक के समय मंदिर में दीप जलाने की मांग की गई क्योंकि पहाड़ी पर दीप जलाने की मान्यता रही है। 1996 में कोर्ट ने पारंपरिक स्थान पर दीपक जलाने की अनुमति दी। 2014 में दीपाथुन पर दीप जलाने पर रोक लग गई और तब से रहकर रहकर ये विवाद उठता रहता है। तमिलनाडू में डीएमके की सरकार है और उनके मंत्रियों का सनातन को लेकर बयान आते रहते हैं । इस कारण सनातन मान्यताओं और परंपराओं पर राज्य सरकार के रुख पर कुछ कहना व्यर्थ है। इस आलेख का उद्देश्य इस विवाद पर लिखना नहीं है बल्कि चुनाव आयोग और न्यापालिका पर विपक्ष के दबाव को रेखांकित करना है। अनेक अवसरों पर संविधान का गुटका संस्करण लहरानेवाले विपक्ष के नेता और उनकी पार्टी के सांसद देश के संवैधानिक संस्थानों पर अनावश्यक दबाव बनाने की चेष्टा करते हुए नजर आते हैं। उपरोक्त दो मामले इसके सटीक उदाहरण हैं। चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्त को लेकर विपक्षी नेताओं ने कई बार अपमानजनक टिप्पणियां की हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को तो सरकार में आने पर देख लेने तक की धमकी भी दी गई। कहा गया कि अगर कांग्रेस की सरकार कंद्र में आ गई को उनको छोड़ा नहीं जाएगा। 

देश में संवैधानिक सस्थाओं को दबाब में लेने की विपक्ष की ये जुगत खतरनाक है और एक गलत परंपरा की नींव डाल रही है। अगर आप चुनाव नहीं जीत पा रहे हैं तो दलों को मंथन करने की आवश्यकता है। अपनी पार्टी संगठन को कसने की जरूरत है। कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करने वाले कार्यक्रम आरंभ करने की आवश्यकता है। अपनी नाकामी छिपाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को जिम्मेदार ठहराना ना तो संविधान सम्मत है और ना ही राजनीतिक रूप से ठीक है। विपक्षी दलों के नेताओं को इस बारे में विचार करना चाहिए। अगर इसी तरह से संवैधानिक संस्थाओं पर दबाब डाला जाता रहा तो संभव है कि इन संस्थाओं से कोई गलत कदम उठ जाए। ये ना तो विपक्ष के हित में होगा और ना ही लोकतंत्र के हित में। 


Tuesday, February 28, 2017

नसीहत नहीं, कार्रवाई का वक्त

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पांचवें चरण की वोटिंग के पहले चुनाव आयोग ने एक बार फिर से सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से संयम बरतने की अपील की है । सभी दलों को लिखे खत में चुनाव आयोग ने कहा है कि इस तरह का कोई बयान ना दें जिससे धर्म और राजनीति का घालमेल होता हो । चुनाव आयोग ने अपने नसीहत में यह भी कहा है कि वोटरों को अपनी तरफ लुभाने के लिए धर्म का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इससे धार्मिक कटुता और ध्रुवीकरण का खतरा पैदा हो जाता है । चुनाव आयोग पहले भी इस तरह की गाइडलाइंस जारी करती रही है लेकिन इसको सख्ती से लागू करवाने का कोई प्रयास इस संवैधानिक संस्था की तरफ से दिखाई नहीं देता है । नियमित अंतराल पर एडवायजरी जारी कर राजनीतिक दलों को उनके कर्तव्यों की याद दिलाई जाती है ।चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के नेताओं को लगभग आदेश दिया है कि वो इस तरह के बयानों से बचें जिसकी व्याख्या से धार्मिक तनाव पैदा हो सकता है ।  चुनाव आयोग का मानना है कि मौजूदा समय में किसी भी तरह का कोई भी बयान किसी क्षेत्र विशेष में सीमित नहीं रहता है और टीवी पर प्रसारण के अलावा सोशल मीडिया के विस्तार से वो बिजली की गति से हर जगह पहुंच जाता है । चुनाव आयोग के मुताबिक इसका असर उन इलाके के मतदाताओं के दिमाग पर पड़ता है जहां चुनाव हो रहे होते हैं । कई बार तो उससे समाज में भी दरार पैदा होने जैसे हालात पैदा होते हैं । चुनाव आयोग कोई नई बात नहीं कर रहा है । इसी साल सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में धर्म को चुनाव प्रचार से अलग करने का आदेश दिया था । चुनाव आयोग के पास तो कानून का डंडा भी है लेकिन वो नेताओं के मसले पर नरम दिखाई पड़ता है । चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में नेताओं के खिलाफ कार्रवाई बहुत ही विरले होती है । ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग भी राजनीतिक दलों और उनके नेतांपर सीधी कार्रवाई से बचता है । अभी हाल ही में एक अखबार की बेवसाइट पर जनता की राय के नाम से सर्वेनुमा एक्जिट पोल छप गया था तो उसके संपादक और मालिक के खिलाफ केस दर्ज करने के आदेश चुनाव आयोग ने दिया था । संपादक की तो गिरफ्तारी भी हुई थी और बाद में वो जमानत पर छूटे थे । कितने नेताओं के मामले में चुनाव आयोग ऐसा त्वरित कार्रवाई करता है ? कितने नेताओं को चुनाव के दौरान आचार संहिता के उल्लंघन में जेल जाना पड़ता है ? इसपर विचार किया जाना आवश्यक है ।
चुनाव आयोग की प्राथमिक जिम्मेदारी सही तरीके से चुनाव करवाने की है और उसमें वो सफल रहता है । फ्री और फेयर इलेक्शन के बुनियादी सिद्धांत की रक्षा भी करता है लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह से चुनावों के दौरान एक दूसरे पर भाषायी तीर चलते हैं उसको रोकने के लिए चुनाव आयोग को कदम उठाने की जरूरत है । जिस तरह से राजनीतिक दल एक समुदाय विशेष को टिकट देकर और फिर उसका सार्वजनिक प्रचार करते हुए उस समुदाय के वोटरों को लुभाने की कोशिश करते हैं यह तो परोक्ष रूप से धर्म के आधार पर वोट मांगने की कोशिश जैसा है । यह वैसा ही मामला है जैसे हमारे देश में शराब के विज्ञापन पर पाबंदी है लेकिन शराब कंपनियां उसी नाम से कोई अन्य उत्पाद बनाकर उसका विज्ञापन कर ग्राहकों तक अपनी बात पहुंचाती हैं । ऐसा ही कुछ राजनीति दल भी कर रहे हैं । अब चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वो इन सरोगेट विज्ञापनों की तरह सरोगेट बयानों को भी चिन्हित करें और उनको रोकने के लिए उचित कार्रवाई करें । चुनाव आयोग को धर्म के आधार पर वोट मांगने की मंशा को पहचान कर उसको रोकने के अलावा जाति के नाम पर वोट मांगने की कोशिशों पर भी रोक लगानी होगी । अलां समाज महासभा, फलां महासभा पर भीनजर रखनी होगी क्योंकि ये जातीय संगठवन चुनाव के दौरान कुकुरमुत्ते की तरह उग आते हैं और राजनीतिक दल इनकी आड़ में अपनी सियासी रोटी सेंकते हैं । चुनाव आयोग को इनके अलावा मर्यादाहीन बयानों पर भी रोक लगाने की दिशा में काम करना होगा । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान इशारों में ही सही प्रधानमंत्री को गधा कहा गया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं, प्रधानमंत्री को रावण कहा गया, प्रधानमंत्री को आतंकवादी कहा गया लेकिन चुनाव आयोग लगभग खामोश ही रहा । मुलायम सिंह यादव के मरने के वक्त की घोषणा की गई, प्रियंका गांधी पर सेक्सिस्ट कमेंट किए गए लेकिन चुनाव आयोग नेताओं की सफाई भर से ही संतुष्ट नजर आया ।  चुनाव आयोग ये मानता है कि आज सूचनाओं के तेज संप्रेषण के दौर में देश के किसी कोने में दिया गया बयान चुनाव वाले इलाके में असर डाल सकता है । यह टीवी का दौर है और नेताओं को लगता है कि टीवी पर उनके भाषणों का वही हिस्सा दिखाया जाएगा जो विवादस्पद होगा । स्वस्थ आलोचना कभी भी भाषा की मर्यादा को नहीं तोड़ती और यह सच है कि जब भाषा की मर्यादा नहीं टूटती तो न्यूज चैनलों में स्पंदन नहीं होता । सारे दिन चलनेवाले न्यूज चैनलों के इस दौर में नेताओं के विवादित या बिगड़े बोल हमेशा प्राथमिकता पाते हैं । बार बार उन्हीं बयानों को दिखाया जाता है । टीवी और सोशल मीडिया के दौर में भाषा अपनी सीमा रेखा का बार बार अतिक्रमण करती है । क्या चुनाव आयोग को इसपर भीनजर रखने की जरूरत है इसपर विचार करवना भी आवश्यक है ।

   

Tuesday, January 24, 2017

बजट का बेवजह विरोध

लोकतंत्र में विपक्ष की रचनात्मक भूमिका की परिकल्पना की गई थी । भारत के संविधान में विपक्ष को यह अधिकार दिया गया है कि वो सरकार के कामकाज पर नजर रखे और अगर सरकार निरंकुशता की ओर कदम बढ़ाए तो उसपर अंकुश लगाने के लिए वो विरोध आदि करे जिससे कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूती से कायम रह सके । इस अधिकार को देते वक्त विपक्ष से कुछ जिम्मेदारी की भी अपेक्षा की गई थी । संविधान में सारी चीजें लिखी नहीं होती हैं, कुछ परंपराएं भी कानून का आधार बनती हैं । सिर्फ विरोध के लिए विरोध या सरकार के हर कदम का विरोध करते रहने से विपक्ष की साख पर असर पड़ता है और धीरे-धीरे लोग इस तरह के कदमों से ऊबने लगते हैं । अभी जिस तरह से पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर विपक्ष ने केंद्र सरकार के आम बजट को रोकने के लिए कार्य किया वह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक गैरजरूरी कदम है । पहले तो विपक्ष ने चुनाव आयोग में अर्जी दी और मांग की विधानसभा चुनावों के मद्देनजर एक फरवरी को पेश होनेवाले केंद्रीय बजट को टाल दिया जाए । सरकार ने इसका विरोध किया और तर्क दिया कि इससे राज्यों के चुनाव पर असर नहीं पड़ेगा । इस बीच एक याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर सरकार को बजट पेश करने से रोकने का निर्देश देने की मांग की । बजट को लेकर एक तरफ चुनाव आयोग तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में मामला था । सोमवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की बजट पर रोक लगाने की मांग को खारिज कर दिया । जिरह के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह ने टिप्पणी की उससे भी जाहिर था कि ये मांग बेजा थी । सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे एस खेहर की अध्यक्षतावाली तीन जजों की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की और याचिकाकर्ता की मांग को कानून सम्मत नहीं पाया । सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक बजट से चुनाव की आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन होता नहीं दिख रहा है । याचिकाकर्ता की दलील थी कि बजट की घोषणाओं से पांच राज्यों के चुनाव में मतदाताओं पर असर पड़ सकता है । याचिकाकर्ता से सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो एक भी ऐसा उदाहरण पेश करें जिससे ये साबित हो कि केंद्रीय बजट से मतदाताओं पर प्रभाव पड़ता है या वोटरों को रिझाया जा सकता है । कोर्ट ने तो याचिकाकर्ता से यहां तक पूछा कि वो पिछले बजट से एक उदाहरण निकालकर ये बताएं कि वो राज्यों के मतदाताओं पर प्रभाव डाल सकते हैं । जब याचिकाकर्ता कोई ठोस दलील पेश नहीं कर पाए तो कोर्ट ने टिप्पणी कि इस देश में सालों भर चुनाव चलते रहते हैं और अगर राज्यों के चुनाव को आधार मान लिया जाए तो फिर तो केंद्र सरकार कभी बजट पेश ही नहीं कर पाएगी । बजट पेश करने से रोकने की याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि वो केंद्र सरकार के एक फरवरी को बजट पेश करने के फैसले में दखल नहीं डालेंगे । कोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद यह साफ हो गया था कि अब चुनाव आयोग भी बजट रोकने के बारे में कोई फैसला शायद ही दे । अब अगर विपक्ष सचमुच संजीदा है तो उसको प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आमचुनाव और विधानसभाओं के चुनाव साथ कराने के प्रस्ताव पर विचार करना चाहिए और इसपर अपना स्पष्ट मत प्रकट करना चाहिए । अगर दोनों चुनाव साथ हो जाएं तो इस तरह के मामलों से भी छुटकारा मिल जाएगा ।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद सोमवार को ही देर शाम चुनाव आयोग ने भी विपक्ष की बजट रोकने की मांग को ठुकरा दिया । चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को दो शर्तों के साथ एक फरवरी को बजट पेश करने का रास्ता साफ कर दिया । चुनाव आयोग ने कहा कि वित्त मंत्री अपने बजट भाषण में उत्तर प्रदेश, गोवा, पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर के लिए अलग से कोई विशेष ऐलान नहीं करें । दूसरी शर्त ये रखी गई है कि वित्त मंत्री अपने बजट भाषण में अलग से चुनाव वाले पांच राज्यों में केंद्र सरकार की स्कीमों की उपलब्धियों का बखान ना करें । इसके अलावा चुनाव आयोग ने चुनाव वाले राज्यों में पूर्ण हजट की बजाए जरूरत पड़ने पर लेखानुदान पेश और पास करने की इजाजत दे दी । दरअसल जनवरी के पहले हफ्ते में कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद की अगुवाई में चुनाव आयोग से मांग की थी कि वो आदर्श चुनाव संहिता को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार को एक फरवरी को बजट पेश नहीं करने का आदेश दे । कांग्रेस ने यह आशंका जताई थी कि विधानसभा चुनाव के चंद दिनों पहले पेश किए जानेवाले बजट में केंद्र सरकार वोटरों को लुभाने के लिए कई तरह की घोषणाएं कर सकती हैं । कांग्रेस के नेताओं ने विरोध करते वक्त संविधान को भी नजरअंदाज किया ।  हमारे देश के संविधान में समवर्ती सूची में राज्य और केंद्र सरकार के अधिकारों के बारे में साफ तौर पर दिशा निर्देश दिए गए हैं । वहां इसके बारे में विस्तार से चर्चा है । विपक्ष को यह समझना चाहिए कि केंद्र का बजट पूरे देश के लिए होता है ना कि किसी राज्य विशेष के लिए । इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने समझा और उसी हिसाब से अपना फैसला सुनाया ।