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Saturday, August 13, 2022

सलमान रश्दी पर हमले से उपजे प्रश्न


बुकर पुरस्कार से सम्मानित और करीब तीन दशक से भारी सुरक्षा में जीवन बसर कर रहे भारतीय मूल के लेखक सलमान रश्दी पर अमेरिका के न्यूयार्क में हमला हुआ। हमलावर हादी मतर ने उनकी गरदन, हाथ और पेट पर चाकू से वार किए। उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। उनके लिटरेरी एजेंट के अनुसार उनकी एक आंख की रोशनी जा सकती है। हमले में उनके हाथ की नस कट गई है और लीवर भी जख्मी हुआ है। सलमान रश्दी पर हमले की आशंका काफी लंबे समय से बनी हुई थी। जब उनकी पुस्तक ‘द सेटेनिक वर्सेस’ प्रकाशित हुई थी तो उनपर ईशनिंदा का आरोप लगा था। उसके बाद 14 फरवरी 1989 को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खोमैनी ने सलमान रश्दी की मौत का फतवा जारी किया था। खोमैनी ने उस किताब को ईशनिंदा और इस्लाम का मजाक उड़ाने का दोषी करार दिया था । खोमैनी के फतवे के बाद सलमान रश्दी बहुत दिनों तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहे थे। कभी ब्रिटेन में तो कभी नार्वे में रहे। अपने निर्वासन के दिनों को सलमान रश्दी ने अपनी पुस्तक ‘जोसेफ एंटन’ में विस्तार से लिखा है। साढे छह सौ पृष्ठों की इस पुस्तक में सलमान रश्दी ने निर्वासन का दर्द तो लिखा ही है कई जगहों पर अपने जीवन पर मंडरा रहे आसन्न खतरे का भी उल्लेख किया है। सलमान रश्दी पर हमले के बाद कई बिंदुओं पर एक बार फिर से विचार करने की आवश्यकता है। सलमान पर जानलेवा हमला अमेरिका के शहर न्यूयार्क में हुआ। वो भी करीब ढाई हजार लोगों की उपस्थिति में। यहां ये प्रश्न उठता है कि जो अमेरिका पूरी दुनिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाता रहता है उसके यहां इस तरह के हमले क्यों हो जाते हैं। ब्रिटेन और नार्वे में तो सलमान रश्दी पर हमला नहीं हो पाया। अमेरिका में हमलावरों ने अपने नापाक मंसूबे को कैसे अंजाम तक पहुंचा दिया। क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीटनेवाला देश अपनी धरती पर एक लेखक को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता है? 

सलमान रश्दी पर हमले के बाद दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न ये उठता है कि कोई मजहबी नेता या मजहबी रहनुमा किसी की हत्या का फतवा कैसे जारी कर सकते हैं। इस्लाम में कई बार ये देखने को मिलता है कि ईशनिंदा के आरोप में मौत का फतवा जारी कर दिया जाता है। मौत का फतवा जारी करने के साथ ही इनाम की घो]षणा भी की जाती है। अयातुल्ला खोमैनी ने जब सलमान रश्दी की मौत का फतवा जारी किया था तब भी मारनेवाले को भारी भरकर रकम इनाम में देने की बात की गई थी। ये सब धर्म की आड़ में किया जाता है। अमेरिकी मीडिया में छप रही खबरों के मुताबिक सलमान रश्दी पर हमला करनेवाला हादी मतर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स नामक संस्था का सदस्य है। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध उसके परिचय में शिया उग्रवादी संगठनों से संबंध का शक भी है। अब किस तरह से हादी मतर को रैडिकलाइज किया गया कि वो भीड़ के बीच किसी की जान लेने चला गया। 

सलमान रश्दी अकेले नहीं हैं जिनपर ‘द सैटेनिक वर्सेस’ की वजह से हमला हुआ है। द सैटेनिक वर्सेस से जुड़े कई लोगों पर हमले हुए। एक व्यक्ति की तो जान भी गई। 1991 में सलमान की इस पुस्तक का इटालियन में अनुवाद करनेवाले एत्तोरे कैपरियोलो पर मिलान में हमला हुआ। उनके भी गले, हाथ और छाती पर चाकू से वार कर उनको बुरी तरह से घायल कर दिया गया था। 1991 में ही सैटेनिक वर्सेस का जापानी में अनुवाद करनेवाले  हितोशी इहारशी की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। उनका शव जापान के एक विश्वविद्यालय के परिसर में मिला था। इसके दो साल बाद नार्वे में उस प्रकाशक पर हमला हुआ जिसने नार्वे में ‘द सैटेनिक वर्सेस’ का प्रकाशन किया था। उनको उनके घर के सामने गोली मारी गई थी जिसमें वो बुरी तरह से जख्मी हो गए थे। इन वारदातों के बाद सलमान रश्दी की सुरक्षा और बढ़ा दी गई थी। अगर नार्वे की घटना को छोड़ दिया जाए तो सभी हमले लगभग एक ही तरीके से किए गए हैं यानि गले पर वार। ऐसा प्रतीत होता है कि हर हमलावर सर को तन से जुदा करने की कोशिश में गले पर वार करता है। 

अब अगर हम अपने देश में सलमान रश्दी पर हुए हमले पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रगतिशील पैरोकारों की प्रतिक्रिया को देखते हैं। लगभग हर जगह इसके लिए धर्मांधता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, बिना उस धर्म का नाम लिए। जावेद अख्तर ने सलमान पर हमला करनेवाला को ‘किसी कट्टरपंथी’ कहा। उन्होंने हमलावर का नाम और पहचान सामने आने के बाद से चुप्पी साध ली है। हमलावर को इस्लामी कट्टरपंथी कहने में इनके हाथ कांपने लगते हैं, उंगलियां सुन्न हो जाती हैं। अगर कोई अपराधी हिंदू होता है तो उसको हिंदू धर्मांध या हिंदू फैनेटिक कहने में देर नहीं करते हैं। सलमान रश्दी पर हमले के ठीक पहले उन्होंने एक रिट्वीट किया है जिसमें अक्षय कुमार को कनाडा कुमार बताकर उनका मजाक उड़ाया गया है और आमिर खान की इस बात के लिए प्रशंसा की गई है कि उसने अपनी फिल्म पाकिस्तान में रिलीज करने के मना कर दिया था। जावेद अख्तर भी बहुधा नैतिकता की मीनार पर खडे होकर अपनी निष्पक्षता का ढिंढोरा पीटते रहते हैं लेकिन समय आने पर उनकी निष्पक्षता का ढोंग उजागर हो जाता है। कई वामपंथी बुद्धिजीवी सलमान पर हुए हमले को लेकर बहुत हल्की प्रतिक्रिया दे रहे हैं। हमलावर को धर्मांध कहने से इस समस्या का समाधान नहीं निकलनेवाला है। धर्मांध कहकर तो अपराध कम करते हैं। अपराधी के कुकर्मों पर धर्म का परदा डालने की कोशिश करते हैं। 

किसी भी अपराधी को धर्मांध बनाता कौन है इसपर विचार करना होगा, उन कारकों को चिन्हित करना होगा, उन स्थितियों की पहचान करनी होगी जिसमें कोई किसी की जान लेने की हद तक चला जाता है। प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को इन कारणों पर विचार करके मुखर होना पड़ेगा अन्यथा उनकी प्रतिक्रिया रस्म अदायगी बनकर रह जाएगी। वैसे इस जमात से इस प्रकार की अपेक्षा रखना व्यर्थ है क्योंकि निर्वासित बंगालादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन के मसले पर इन्होंने कभी कुछ नहीं बोला। जब बंगाल की वामपंथी सरकार ने उनको पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी या जब ममता सरकार ने उनको अपने राज्य में रखने से मना कर दिया, तब भी इन प्रगतिशीलों ने अपने मुंह सिल लिए थे। मेरे जानते दुनिया में इस्लाम अकेला ऐसा मजहब है जिसके माननेवालों के बीच मौत के फतवे की अवधारणा है। धर्म की आड़ में जिस तरह से हत्या होती है उसके बारे में मुस्लिम समाज के रहनुमाओं को भी विचार करना होगा। साहस के साथ इसके विरोध में अपनी आवाज बुलंद करनी होगी। ईशनिंदा की सजा मौत की लगातार मजबूत होती जा रही अवधारणा पर न केवल विचार करने की आवश्यकता है बल्कि इसका निषेध भी समय की मांग है। इसके लिए मुस्लिम समाज को अपने मजहब में व्यापक स्तर पर धार्मिक सुधार की आवश्यकता है। वैज्ञानिक तरीके से अपने मजहबी विचारों की व्याख्या करने की जरूरत है। आधुनिक और सभ्य समाज में कानून और संविधान से बाहर जाकर मौत की सजा देने का अधिकार किसी को नहीं है। इस बात को प्रचारित प्रसारित करना होगा। यह काम आसान प्रतीत नहीं होता है। लेकिन आज नहीं तो कल इसपर काम करना ही पड़ेगा। बेहतर है कि इस कार्य को शीघ्र आरंभ कर दिया जाए, ताकि कम से कम लोगों की जान जाए और जो दहशत में जी रहे हैं उनको खुली हवा में सांस लेने का अवसर मिल सके। 

Sunday, February 28, 2016

सलमान रश्दी पर खामाशी क्यों

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में देशप्रेम और देशद्रोह और हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या पर मचे कोलाहल के बीच धर्मनिरपेक्षता के ध्वजवाहकों को दूसरे मसलों पर ध्यान देने की फुरसत नहीं है । हर मसले पर फौरन प्रेस बयान जारी करनेवाली वामपंथी लेखकों की संस्था जनवादी लेखक संघ खामोश है । ये खामोशी है भारतीय मूल के मशहूर लेखक सलमान रश्दी को लेकर । हाल ही में खबर आई कि ईरान की कई मीडिया और अन्य संस्थानों ने सलमान रश्दी को जान से मारनेवाले की इनामी राशि में इजाफा कर दिया है । इन सब लोगों ने मिलकर छह लाख डालर इकट्ठा किया और एलान किया कि ये राशि पहले से घोषित इनामी राशि में जोड़ दी जाएगी । सत्ताइस साल पहले ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी ने सलमान रश्दी की जान मारनेवाले को इनाम देने का एलान किया था । उनकी नाराजगी सलमान की 1988 में छपी किताब सैटेनिक वर्सेस को लेकर थी । खुमैनी ने उस किताब को ईशनिंदा और इस्लाम का मजाक उड़ाने का दोषी करार दिया था । खुमैनी के उस फतवे के बाद सलमान रश्दी निर्वासित जीवन बिता रहे हैं और उनको कई बार जान से मारने की नाकाम कोशिश हुई । करीब सत्ताइस साल से संगीनों के साए में जीवन बिता रहे सलमान रश्दी की जिंदगी खतरे में आ गई है । ईरान के एक मंत्री ने कहा है कि खुमैनी साहब का फतवा उनेक लिए धार्मिक अध्यादेश की तरह है जो कभी भी अपनी ताकत और महत्ता नहीं खो सकता है ।
अब सवाल यही उठता है कि पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चैंपियन इस मसले पर कमोबेश खामोश क्यों हैं । सलमान रश्दी को जान से मारने के फतवा को पूरा करने के लिए बढ़ाई गई इनामी राशि के खिलाफ उनकी कलम नपुंसक क्यों हो गई है । नोम चोमस्की से लेकर उमर खालिद और कन्हैया कुमार पर छाती कूटनेवाले हमारे वामी मित्रों के मुंह इस मसले पर क्यों सिल गए हैं । सलमान रश्दी के पक्ष में और ईरान के खिलाफ किसी भी तथाकथित प्रगतिशील जमात ने बयान तक जारी नहीं किया । उन विश्वविद्लायों को प्रोफसरों का क्या जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में जारी बवाल पर हस्ताक्षरित बयान जारी किया । क्या उनके हाथ कांपने लगते हैं । उस जनवादी लेखक संघ को सलमान रश्दी के मसले पर क्यों सांप सूंघ गया है जो ईमेल पर फौरन बयान आदि जारी कर विरोध जताने के लिए मशहूर हैं । दरअसल ये इनका वर्ग चरित्र है । ये चुनिंदा मामलों पर शोरगुल मचाते हैं । इनकी इसी चुनिंदा प्रतिक्रया की वजह से दूसरे लोगों को ये लगता है कि प्रगतिशील जमात का विरोध एकतरफा होता है । इस भावना के बढ़ते जाने से कट्टरपंथियों को जमीन मिलती है और वो आम लोगों को समझाने की कोशिश करते हैं कि वामपंथी सिर्फ एक जमात के पक्ष में खड़े होते हैं । लंबे वक्त तक जब जनता देखती है कि वामपंथियों का विरोध सचमुच एक ही जमता के लिए होता है तो वो कट्टरपंथी की ओर कदम बढ़ाने लगते हैं । नतीजा इस चुनिंदा विरोध से कट्टरता को बढ़ावा मिलता है । वामपंथियों को ये लगता है कि मुसलमानों के मसलों पर दखल देने से उनकी धर्मनिरपेक्षता की छवि को धक्का लगेगा, जबकि ऐसा है नहीं । किसी भी दल या संगठन को जनता के हितों की बात करनी चाहिए लेकिन अफसोस कि भारत की प्रगतिशील जमात भी जाति और धर्म के बाड़े से बाहर नहीं जा पाई है । समानता की बुनियादी सिद्धांत का दावा करनेवाले ये संगठन, दरअसल अपनी दुकान चलाते हैं और कारोबार के लिहाज से ही अपने कदम उठाते हैं ताकि मुनाफा हो सके ।

ये पहला मौका नहीं है जहां वामपंथियों ने इस तरह का रुख अपनाया है । पहले भी कई मौकों पर देखा गया है कि वो बहुसंख्यक समाज की गड़बड़ियों को लेकर जितने मुखर होते हैं उतनी मुखरता के साथ वो अल्पसंख्यक समुदाय की समस्याओं पर अपना पक्ष नहीं रखते हैं । चाहे वो सलमान का मसला हो या फिर तसलीमा नसरीन का हो । पहले पश्च्म बंगाल की प्रगतिशील सरकार ने तसलीमा के साथ न्याय नहीं किया और फिर उसके बाद ममता बनर्जी की सरकार ने भी वामपंथियों से लाख विरोध के बावजूद तसलीमा नसरीन को बंगाल में रहने की इजाजत नहीं दी । तसलीमा नसरीन की अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार किसी भी प्रगतिशील लेखक को याद नही आया । जब बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार ने तसलीमा नसरीन को बंगाल से निकाला था तब भी ये वामपंथी लेखक और उनके संगठन खामोश रहे थे । दरअसल प्रगतिशीलता के चोले के पीछे वोटबैंक की राजनीति काम करती है । ये बात सबको पता है कि जो तीन लेखक संगठन, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच, हैं वो सब अपने राजनीतिक दलों से संबद्ध हैं । इन लेखक संगठनों को अपने राजनीतिक आकाओं का मुंह देखना होता है उसी अनुसार ये अपनी रणनीति बनाते हैं । सलमान रश्दी और तसलीमा नसरीन के मामले से वोटबैंक की राजनीति जुड़ी हुई है लिहाजा इन प्रगतिशीलों के आका खामोश हैं । जब आका खामोश तो फिर कारकुनों की क्या मजाल कि जुबान से कुछ भी निकल जाए । दरअसल यही वजह भी रही कि हमारे देश में इन प्रगतिशील लेखकों की साख छीजती चली गई । साख के कम होने का प्रमाण पुरस्कार वापसी के वक्त भी देखने को मिला । चालीस पचास लेखकों ने पुरस्कार वापस किए लेकिन एक सर्वे के मुताबिक उनके खिलाफ उस दौर में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सवा सौ से ज्यादा लेख छपे थे ।   दपअसल जब भी इस तरह का मामला सामने आता है तो मुझे राजेन्द्र यादव और हंस के साथ हुआ वाकया याद आता है । दिल्ली में हंस की सालाना गोष्ठी में कथित क्रांतिवारी कवि बरवर राव को आना था । राजेन्द्र यादव से उन्होंने वादा भी किया था और अंत तक झूठ बोलते रहे कि एयरपोर्ट पर पहुच गए हैं, रास्ते में हैं लेकिन उनका रास्ता मंजिल की तरफ ना जाकर कहीं और चला गया था । वरवर राव की इस वादा खिलाफी का किसी वामपंथी लेखक ने विरोध नहीं किया था बल्कि उनके कदम को यह कहकर जायज ठहराने की कोशिश की गई थी कि वो दक्षिणपंथी लेखक के साथ मंच कैसे साझा कर सकते हैं । जीवनभर वामपंथ का खूंटे से बंधे रहे राजेन्द्र यादव उस वक्त वामपंथियों के रुख से खासे झुब्ध थे । उन्होंने तब माना था कि इनकी विश्वसनीयता संदिग्ध होती जा रही है लेकिन आस्था के वशीभूत वो उनको बेनकाब करने से तब भी बचे थे ।  

Wednesday, July 15, 2015

सच का सामना का साहस !

अभी पिछले दिनों मैं अपने ट्वीटर अकाउंट को देख रहा था तो मैंने पाया कि कुछ लोगों ने मुझे ब्लॉक कर रखा है । मुझे हैरानी तब हुई जब मैंने देखा कि ब्लॉक करनेवालों की फेहरिश्त में अलग अलग विचारधारा के नेता, एक्टिविस्ट और हमारी पत्रकार बिरादरी के सदस्य भी हैं । आश्चर्य तब और ज्यादा हुआ जब मैंने देखा कि विश्व प्रसिद्ध लेखक सलमान रश्दी ने भी मुझे ब्लॉक कर रखा है । मैं सोच में पड़ गया कि सलमान रश्दी ने मुझे क्यों ब्लाक किया । नैतिकता के उच्च मानदंडों की बात करनेवाले दो तीन नेताओं ने तो मुझे इस वजह से ब्लॉक किया है कि उनको मेरे सवालों से दिक्कत थी । मेरे सवाल उनको सार्वजनिक तौर पर असहज कर रहे थे । सलमान रश्दी ने जब मुझे ब्लॉक किया तो मुझे हैरानी इस वजह से हुई कि वो तो लेखकीय स्वतंत्रता के लिए जाने जाते हैं । उन्होंने अपनी पोजिशनिंग इस तरह की बनाई है लेखकीय स्वतंत्रता के लिए उन्हें कितना झेलना पड़ा । झेलना भी पड़ा है । उनको जिसके बारे में वो बहुधा बताते भी रहते हैं । अपनी किताब जोसेफ एंटन में उन्होंने इस पर विस्तार से लिखा भी है । मैंने जोसेफ एंटन की विस्तृत समीक्षा लिखी थी उसमें अन्य बातों के अलावा मैंने ये कहा था कि उसको थोडा और कसने की जरूरत है और उस उपन्यास में उबाऊ होने की हद तक विस्तार दिया गया है । खैर जोसेफ एंटन की समीक्षा लिखे जाने तक हमारा ट्विटर संवाद था, बहुधा एकतरफा । मैंने अपनी लिखी समीक्षा के लिंक उनको टैग भी किए थे । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जब सलमान रश्दी के भारत आने को लेकर विवाद हुआ था,  तब भी मैंने सलमान रश्दी के पक्ष में स्टैंड लिया था। देशभर के कई अखबारों में लंबे लंबे लेख लिखे थे । उस वक्त भी ट्विटर पर उनके साथ जुड़ाव था, मैं उनको फॉलो करता था । मुझे लगता है गड़बड़ी की शुरुआत, रश्दी और भालचंद नेमाड़े के बीच हुए विवाद में मेरे स्टैंड को लेकर हुआ । भालचंद नेमाडे को जब ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का एलान किया गया था तब सलमान रश्दी ने एक घोर आपत्तिजनक ट्वीट किया था- ग्रम्पी ओल्ड बास्टर्ड, जस्ट टेक योर प्राइज ऐंड से थैंक्य यू नाइसली । आई डाउट यू हैव इवन रेड द वर्क यू अटैक । दरअसल नेमाडे ने मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान सलमान की किताब मिडनाइट चिल्ड्रन को औसत कृति करार दिया था । सलमान के गाली गलौच भरे ट्वीट के खिलाफ मैंने जनसत्ता में एक लेख लिखा था – ताक पर मर्यादा, जो इसी वर्ष पंद्रह फरवरी को प्रकाशित हुआ था । अपने उस लेख में मैंने सलमान रश्दी के आपत्तिजनक ट्वीट के बहाने से उनके कृतित्व पर भी अपने विचार रखे थे । ट्वीट पर तो उनको जवाब दिया ही था, जनसत्ता का लिंक भी टैग कर दिया था । लेकिन कभी भी मैंने सलमान रश्दी की तरह भाषिक मर्यादा का उल्लंघन कभी नहीं किया, हां उनकी कृतियों को तर्क की कसौटी पर अवश्य कसा । उनके ट्वीट को भाषा की मर्यादा की हदों से बाहर जानेवाला करार दिया । अब एक बात मेरी समझ से परे है । इतना बड़ा लेखक, जो वर्षों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बना हो वो अपनी कृतियों के खिलाफ, अपने भद्दे ट्वीट्स के खिलाफ कुछ भी सुनने का माद्दा नहीं रखता है । दरअसल अब मुझे लगने लगा है कि सलमान रश्दी के तरह के जो लेखक हैं उनको अपने खिलाफ सुनना अच्छा नहीं लगता है । रचनात्मकता के उस दौर में जब कलम नपुंसक होने लगती है और उसके पुंसत्व पर सवाल खड़े करते लेख या टिप्पणी प्रकाशित हो तो लेखक बिलबिलाने लगता है । यही बिलबिलाहट लेखक को दूसरे की राय को ब्लॉक करने के लिए उकसाती है । जब कोई काम प्रतिक्रिया में या बदले की भावना से किया जाता है तब उस वक्त हर इंसान मतिभ्रम का शिकार हो जाता है । मतिभ्रम होने की स्थिति में इसी तरह के काम होते हैं जैसा कि सलमान रश्दी ने किया । आदर्श स्थिति तो वह होती जिसमें मेरे तर्कों पर बहस होती और वो अपने तर्क रखते । संभव है कि वो इतने बड़े लेखक हैं कि मुझ जैसे अदने शख्स से बहस नहीं करना चाहते हों । ये उनका फैसला हो सकता है, इसमें मुझ समेत किसी को भी आपत्ति नहीं । आपत्ति तो इसमें भी नहीं कि उन्होंने ट्विटर पर ब्लॉक कर दिया, लेकिन सवाल तब उठते हैं जब ऐसा किसी खास मकसद और मंशा से किया गया हो । मकसद साफ है और मंशा भी । सलमान रश्दी में अपना सार्वजनिक आलोचना सहने की क्षमता नहीं है ।
दरअसल यह एक प्रवृत्ति है । इस प्रवृत्ति के शिकार वैसे सभी लोग होते हैं जिनको लगता है कि वो आलोचनाओं से परे हैं । इस तरह के लोगों को यह भी लगता है कि समाज में उनका जो स्थान है वो इतना पवित्र है कि उसपर उंगली नहीं उठाई जा सकती है । नैतिकता के जिस पायदान पर वो खड़े हैं वहां तक सवालों की पहुंच नहीं हो सकती है । लिहाजा जब उनको लगता है कि असहज करनेवाले सवाल उनतक पहुंचने लगे हैं तो वो इसी तरह के कदम उठाते हुए खुद को एक्सपोज कर देते हैं । अन्ना आंदोलन के दौरान जब किरण बेदी के टिकटों के मसले पर उनसे सवाल पूछे गए थे तो उन्होंने भी ट्विटर पर व्लॉक कर दिया था । इसी तरह से मधु किश्वर को भी जब लगा कि असहज करनेवाले सवालों में वो घिर रही हैं तो उन्होंने भी ब्लॉक करने का रास्ता अख्तियार किया । लेकिन इन सारे लोगों में एक साझा सूत्र दिखाई देता है अपने को आलोचना से उपर देखने, रखने का । इस तरह के लोग हमेशा से लोकतंत्र की भी दुहाई देते हैं, लोकतांत्रिक होने का दावा भी करते हैं लेकिन अपने तौर तरीकों में लोकतांत्रिक होने में उनको तकलीफ होती है । यह उसी तरह का मामला है कि क्रांति की चाहत हमेशा पड़ोसी के घर में होती है । यह भी सचाई है कि सोशल साइट्स पर गाली गलौच होती है, हर तरह के अपशब्द कहे जाते हैं, भद्दी टिप्पणियां की जाती हैं । उनको ब्लॉक करने का हक होना चाहिए । लेकिन जब आप सार्वजनिक जीवन में हैं तो आपको अपनी रचनात्मक आलोचना तो सुननी ही होगी । आपके बयानों के आलोक में उठ रहे सवालों या सच का समाना तो करना ही होगा । मर्यादा में रहते हुए अगर आपकी टिप्पणियों की धज्जियां उड़ेंगी तो उसको झेलना ही होगा अन्यथा अभिव्यक्ति की आजादी की ध्वजा लहराने वाले सलमान रश्दियों की बातें खोखली लगेंगी ।    

Saturday, February 14, 2015

रश्दी की कुंठा, निशाने पर नेमाडे

सलमान रश्दी, विश्व प्रसिद्ध लेखक ।  अपने लेखन, व्यक्तित्व और बयानों से विवादों में बने रहने वाले । ये वही सलमान रश्दी हैं जिनकी किताब सैटेनिक वर्सेस के खिलाफ चौदह फरवरी उन्नीस सौ नवासी को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खोमैनी ने मौत का फतवा जारी किया था जिसके बाद वो वर्षों तक निर्वासन में रहे । इसके पहले उन्नीस सौ चौरासी में सलमान रश्दी ने ज़ॉर्ज ऑरवेल की अवधारणा को निगेट करते हुए विवादित लेख लिखा था । ऑरवेल लेखकों के राजनीति से अलग रहने की वकालत करते थे लेकिन सलमान ने इस अवधारणा को खारिज करते हुए कहा था लेखन को राजनीति से मिलकर चलना होगा । हलांकि सलमान ने उस वक्त भी लेखन और राजनीति के मेल को घटिया करार दिया था लेकिन उसको जरूरी भी बताया था । इस पर भी उन दिनों काफी विवाद हुआ था । इसी वक्त लगभग सलमान ने अमेरिकी उपन्यासकार मैरियन विगिन्स से शादी की जो खासी विवादास्पद रही । उस दौर के अमेरिका के अखबार इस विवाद से रंगे रहते थे । अब ताजा विवाद उनके एक ट्वीट को लेकर पैदा हो गया है । उन्होंने अपने एक ट्वीट में लिखा- ग्रम्पी ओल्ड बास्टर्ड, जस्ट टेक योर प्राइज एंड से थैंक यू नाइसली । आई डाउट यू हैव इवन रेड द वर्क यू अटैक । ये विस्फोटक ट्वीट उन्होंने किया था इस बार के ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मराठी के वरिष्ठ लेखक भालचंद नेमाडे के बारे में । दरअसल नेमाडे ने एक कार्यक्रम में सलमान रश्दी की किताब मिडनाइट चिल्ड्रन को औसत साहित्यक कृति करार दिया था । नेमाडे ने कहा था कि सलमान रश्दी और वी एस नायपॉल पश्चिम के हाथों खेल रहे हैं । अपने उस बयान में नेमाडे ने अंग्रेजी के खिलाफ बहुत कुछ कहा था और उनके अपने तर्क थे । सलमान रश्दी को नेमाडे की बातें नागवार गुजरीं और उन्होंने भाषिक मर्यादा को ताक पर रखते हुए गाली गलौच की भाषा में ट्वीट किया । सलमान रश्दी को शायद पता हो कि नेमाडे अंग्रेजी के ही शिक्षक रहे हैं और लंदन के मशहूर स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज में शिक्षक रह चुके हैं । तो सलमान रश्दी का ये संदेह बेकार है कि उन्होंने बगैर पढ़े उनके साहित्य को औसत कह दिया । भालचंद नेमाडे ने यह भी बताया था कि क्यों सलमान और नायपाल की रचनाएं पश्चिम के इशारे पर लिखी जा रही हैं । उनके अपने तर्क हैं, रश्दी को बजाए गाली गलौच की भाषा इस्तेमाल करने के तर्कों के आधार पर नेमाडे की प्रस्थापना को काटना चाहिए था ।
अब अगर सलमान रश्दी के लेखन की बात की जाए तो बहुत हद तक नेमाडे सही भी कह रहे हैं । पिछले दिनों उनकी किताब जोसेफ एंटन अ मेमोऑर प्रकाशित हुई थी । साढे छह सौ पन्नों के इस ग्रंथ में बोरियत की हद तक विस्तार दिया है । इसको खारिज नहीं किया जा सकता लेकिन बेहद ऊबाऊ तो कहा ही जा सकता है । चंद दिलचस्प अंशों को छोड़कर जहां वो अपने निर्वासन के दिनों का वर्णन करते हैं । पलायन इस संस्मरणात्नमक किताब की सेंट्रल थीम है लेकिन वो पाठकों को पलायन से नहीं रोक पाते हैं । इसी वजह से इस किताब को लेकर कहीं कोई उत्साह नहीं दिखा । निर्वासन के दौरान ही लिखा उनका उपन्यास द मूर’स लास्ट साय भी कोई खास प्रभाव पैदा नहीं कर पाया था और लंदन और अमेरिका के अखबारों में उसकी विध्वंसात्मक समीक्षाएं प्रकाशित हुई थी । नेमाडे ने पश्चिम के हाथों खेलने का जो आरोप लगाया है वो कोई नया आरोप नहीं है तो इससे अब क्यों तिलमिला रहे हैं यह समझ से परे हैं । रही बात वीएस नायपाल की तो उनको नोबेल पुरस्कार अवश्य मिला है लेकिन उनके बाद के लेखन में खास किस्म का ह्रास देखने को मिलता है । जो रचनात्मक चमक मिस्टिक मैसअर, सफरेज ऑफ अलवीरा या मायगुल स्ट्रीट में दिखाई देती है वो एन एरिया ऑफ डार्कनेस, इंडिया अ वूंडेड सिविलाइजेशन या इंडिया अ मिलियन म्यूटिनी नाऊ तक आते आते निस्तेज होने लगती है । उम्र बढ़ने के साथ साथ नायपाल के लेखन में एक ठहराव सा आ गया और विचारों में जड़ता भी । इस्लामिक जगत के जीवन का उन्होंने बहुत ही विवादास्पद चित्र खींचा है । बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने को जिस तरह से उन्होंने परोक्ष रूप से सही ठहराया वो भी लेखकों के सामने है । गांधी के बारे में वो लिखते हैं कि उनमें किसी तरह की पूर्णता थी ही नहीं, उनका व्यक्तित्व यहां वहां से उटाए टुकड़ों ने निर्मित हुआ था । बिनावो के बारे मे लिखते हैं कि वो एक मूर्ख शख्सियत थे जिन्होंने पचास के दशक में गांधी की नकल करने की कोशिश की । नीरद सी चौधरी को वो शारिरिक और मानसिक दोनों दृष्टियों से बौना करार दे चुके हैं । तभी तो विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि एक लेखक के रूप में नायपाल का अंत हो चुका है जितना ज्यादा वो अपने अनुभवों के बारे में लिखते हैं उनकी कलम उतनी ही नपुंसक होती जाती है ।
दरअसल अगर हम देखें तो सलमान रश्दी की नेमाडे को लेकर जो भड़ास है वो भारतीय लेखकों का वैश्विक परिदृश्य पर बढ़ते दबदबे की परिणति है । पिछले लगभग एक दशक से जिस तरह से भारतीय लेखकों ने अंग्रेजी साहित्य में अपनी धमक कायम की उससे सलमान और नायपाल के अलावा कुछ अंग्रेजी लेखक घबराए हुए हैं । उनकी पूछ और लोकप्रियता दोनों कम होने लगी है । जिस तरह से एशियाई लेखकों को पुलित्जर और बुकर मिलने लगे उसपर अंग्रेजी लेखक एलेक्स ब्राउन ने कहा भी था कि हमें डर लगने लगा है । चंद वर्षो पहले तक भारत के बारे में अंग्रेजी लेखक संपेरों के देश से लेकर कुछ भी कह जाते थे लेकिन बच जाते थे । अब उनको जवाब मिलने लगा है । ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब हॉवर्ड के प्रोफेसर और इतिहासकार नायल फर्ग्यूसन की किताब- सिविलाइजेशन, दे वेस्ट एंड द रेस्ट छपी थी तो पंकज मिश्रा ने लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स में उसकी विध्वंसात्मकक समीझा लिखी थी । पंकज ने साफ साफ लेखक से पूछा था कि क्या महात्मा गांधी के बिना पिछली सदी की सभ्यता का मूल्यांकन संभव है । क्या चीन की उत्पादन क्षमता और भारत के टैक्नोक्रैट के योगदान को नजरअंदाज किया जा सकता है । तिलमिलाए नायल ने पत्रिका को लिखे अपने पत्र में कहा था कि पंकज मिश्रा ने उनके लेखन की तुलना अमेरिकी नस्लवादी सिद्धांतकार लॉथ्रॉप स्टोडार्ड की किताब द राइजिंग टाइड ऑफ कलर अगेंस्ट व्हाइट सुप्रीमेसी से की है । उन्होंन मिश्रा को कोर्ट आदि जाने की धमकी भी दी थी । लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स में कई अंकों तक ये विवाद चला था लेकिन पंकज मिश्रा डटे रहे थे और एलआरबी ने भी पंकज का ही समर्थन किया था । इस तरह के वाकयों से साफ है कि पश्चिम में रह रहे लेखकों को यह गंवारा नहीं है कि उनके अलावा कोई और लेखक सामने आए या उनके लेखन पर कोई सवाल उठाए
अगर हम विस्तार से वैश्विक अंग्रेजी साहित्य के परिवेश को देखें तो सलमान रश्दी के फ्रस्टेशन की वजह साफ हो जाती है। सलमान भारत आते जाते रहते हैं, यहीं पैदा भी हुए हैं, उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार की प्रतिष्ठा का भी ज्ञान होगा । उन्हें चोट इस बात से पहुंची होगी कि इतने सम्मानित पुरस्कार से नवाजा गया लेखक उनके लेखन को औसत मानता है । इसी परेशानी में वो मर्यादा भूल गए और ट्वीट पर अपनी कुंठा को उड़ेल दिया । सलमान रश्दी ने अपने लेखन के नहीं पढ़े जाने की बात की है उसमें मैं सिर्फ इतना जोड़ना चाहूंगा कि क्या सलमान ने नेमाडे के साहित्य को पढ़ा है । अगर नहीं तो पढ़ लें तो उन्हें एहसास हो जाएगा कि नेमाडे कितना सही कह रहे थे । आग्रह सिर्प इतना है कि इस तरह की भाषा से उनकी छवि दरकती ही है मजबूत नहीं होती।