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Saturday, August 3, 2019

लेखक संघों की सियासत का स्याह चेहरा


कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध लेखकों के अपने-अपने संगठन हैं। सीपीआई की प्रगतिशील लेखक संघ है, सीपीएम की जनवादी लेखक संघ है, सीपीआई-एमएल की जन संस्कृति मंच है। इन लेखक संगठनों की स्थापना चाहे जिस भी उद्देश्य से हुई हो लेकिन पिछले कई वर्षों में ये अपने अपने राजनीतिक दलों के बौद्धिक प्रकोष्ठ बनकर रह गए हैं। जो इनका पितृ-संगठन जो करता है ये उसके पीछे-पीछे चलते हैं। बहुधा अपने राजनीतिक दलों की नीतियों को बौद्धिक जामा पहनाने का काम भी करते हैं। एक और संगठन है जिसका नाम है दलित लेखक संघ। ये दलित लेखकों के हितों को लेकर चलने का दावा करता है लेकिन इसके ज्यादातर कार्यक्रम जनवादी लेखक संघ से संबद्ध ही नजर आते हैं। इस संगठन में पिछले दिनों काफी विवाद हुआ था जिसके बाद भारतीय दलित लेखक संघ की स्थापना हुई जिसके अध्यक्ष इन दिनों अजय नावरिया हैं। उसके बाद एक अंबेडकरवादी लेखक संगठन भी बना जो अभी ठीक से सक्रिय भी नहीं हो पाया है। इन लेखक संगठनों के बारे में बताने की वजह इनका एक साझा बयान है। ये बयान 29 जुलाई 2019 को जारी किया गया। पहले ही बताया जा चुका है कि लेखकों के हितों से अधिक इनको अपने राजनीतिक आकाओं की चिंता रहती है लिहाजा इनका साझा बयान भी राजनीति की बिसात का एक मोहरा है। लेखक संगठन है, जाहिर है कुछ पढ़े लिखे लोग इसके साथ जुड़े हैं, लेकिन जो बयान जारी हुआ है उसकी भाषा से घृणा की बू आती है। लेखकों के संगठन के बयान में अगर घृणा नजर आए तो समझ लीजिए कि उसमें कोई ना कोई राजनीतिक हित है। इनके साझा  बयान का एक हिस्सा देखिए- लेखक-कलाकार हमेशा से सत्ता के विरोध में रहे हैं, लेकिन मोदीराज में सत्ता के विरोध का विरोध एक स्थायी रुझान बनता जा रहा है| जब 2015 में लेखकों-कलाकारों-वैज्ञानिकों ने अपने पुरस्कार लौटा कर सत्ताधारी दल की असहिष्णुता का विरोध किया तो एक हिस्सा, भले ही इस हिस्से के लोगों का कद अपने-अपने कार्यक्षेत्र में उतना बड़ा न हो, उनके विरोध में उठ खड़ा हुआ| जब 23 अक्टूबर 2015 को प्रो. कलबुर्गी की शोकसभा की मांग के साथ लेखक-कलाकार साहित्य अकादमी के कार्यकारी मंडल की बैठक के मौक़े पर अपना मौन जुलूस लेकर पहुंचे, तब वहां भी भाजपा समर्थक लेखकों-कलाकारों का एक जमावड़ा इनके विरोध में मौजूद पाया गया जिसमें नरेन्द्र कोहली जैसे औसत दर्जे के लोकप्रिय लेखक को छोड़ दें तो कोई प्रतिष्ठित नाम नहीं था|’  चार लेखक संगठनों का ये बयान नरेन्द्र कोहली को औसत दर्जे का लोकप्रिय लेखक कह रहा है। लेखक संगठनों के बयान से ये अपेक्षा की जाती है कि वो शब्दों के चयन में सावधान रहें। नरेन्द्र कोहली इस वक्त हिंदी के सबसे समादृत लेखक हैं जिनकी व्याप्ति समाज के हर वर्ग में है। वो हिंदी के इकलौते लेखक हैं जिनके लेखन के, जिनकी कृतियों के लाखों मुरीद हैं। अब जरा उन नामों को देख लिया जाए जो इन चार लेखक संगठनों की नुमाइंदगी करते हैं। इस साझा बयान पर जिनके हस्ताक्षर हैं। जनवादी लेखक संघ से मुरली मनोहर प्रसाद सिंह हैं, प्रगतिशील लेखक संघ से राजेंद्र राजन हैं, जन संस्कृति मंच से मनोज कुमार सिंह और दलित लेखक संघ से हीरा लाल राजस्थानी हैं। आज इनसे ये पूछा जाना चाहिए कि मुरली मनोहर प्रसाद सिंह की हिंदी जगत में एक लेखक के रूप में कितनी स्वीकार्यता या प्रतिष्ठा है। दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे मुरली बाबू शिक्षक राजनीति करते रहे और कभी कभार कोई किताब आदि छप जाती थी। उनका हिंदी साहित्य को क्या और कितना योगदान है ये पाठकों के सामने आना शेष है। औसत तो दूर की बात इनको लेखक के रूप में कौन जानता है? दूसरा हस्ताक्षर है प्रगतिशील लेखक संघ के राजेन्द्र राजन का। उनके लेखकीय योगदान के बारे में किसी को कुछ नहीं पता। जन संस्कृति मंच के मनोज कुमार सिंह हैं, उनका लेखकीय कर्म और संस्कृति के लिए किया जानेवाला कार्य भी अभी पाठकों या दर्शकों के समक्ष नहीं है। चौथे हैं हीरालाल राजस्थानी जो दलित लेखक संघ के नुमाइंदे के तौर पर इस साझा बयान पर उपस्थित हैं। हीरालाल राजस्थानी दिल्ली में चित्रकारी सिखाते हैं, क्या लिखते हैं या साहित्य में किस विधा में सिद्धहस्त हैं इसके बारे में अभी जानकारी सार्वजनिक होना शेष है। ये चारो मिलकर नरेन्द्र कोहली को औसत लेखक करार दे रहे हैं। है न आश्चर्य की बात। किसी को भी किसी का अपमान करने का हक नहीं है, इस वजह से इन चार लोगों के बारे में किसी प्रकार का विशेषण इस्तेमाल नहीं करूंगा लेकिन इनको सोचना चाहिए कि जिस नरेन्द्र कोहली को ये औसत कह रहे हैं उनके पासंग बराबर भी इनका लेखकीय योगदान होता तो इनकी बातों को गंभीरता से लिया जा सकता था।      
इस साझा बयान की भाषा ऐसी है जो इन लेखक संगठन से जुड़े लोगों के पढ़े लिखे होने पर भी संदेह पैदा करती है। या हो सकता है कि हाशिए पर चले जाने की कुंठा से ऐसी ही भाषा उपजती हो। अब जरा इस भाषा को देखिए जो साझा बयान का हिस्सा है, ‘जब 49 नामचीन कलाकारों-बुद्धिजीवियों ने, जिन पर यह देश गर्व और भरोसा करता है, प्रधानमंत्री मोदी के नाम खुला पत्र लिखा है तो जवाब में प्रधानमंत्री ने नहीं, उनके 62 निर्लज्ज समर्थकों ने पत्रोत्तर लिख भेजा है| यह पत्रोत्तर अडूर गोपालकृष्णन, मणि रत्नम, अनुराग कश्यप, आशीष नंदी, अपर्णा सेन, सुमित सरकार, श्याम बेनेगल, शुभा मुदगल जैसे लोगों द्वारा उठाये गए एक भी सवाल का जवाब नहीं देता, बस पलट कर कुछ और सवाल उठाते हुए यह साबित करने की बेहद लचर कोशिश करता है कि मूल पत्र में आयी शिकायतें राजनीतिक पक्षधरता से निकली हैं|’  मोदी के समर्थक हुए तो आप निर्लज्ज हो गए और अगर आपने उनका विरोध किया तो महान हो गए। अब ये लोग खुद तय करें कि निर्लज्जता क्या है।
अब जरा बात प्रगतिशील लेखक संघ की कर ली जाए। प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से एक सज्जाद जहीर की पुत्री और वरिष्ठ लेखिका नूर जहीर ने प्रगतिशील लेखक संघ के अंदर की बजबजाहट को उघाड़ को सामने रख दिया है। मामला ये है कि प्रगतिशील लेखक संघ का एक सम्मेलन पूर्व पुलिस अधिकारी और लेखक विभूति नारायण के सौजन्य से आयोजित हो रहा है। विभूति नारायण राय ने लेखिकाओं को लेकर एक टिप्पणी की थी जिसपर काफी बवाल मचा था। बाद में विभूति नारायण राय पर सवाल उठानेवाले ज्यादातर लेखक उनके शरणागत हो गए थे, कुछ को तो उन्होंने उपकृत भी किया लेकिन अब एक बार फिर से नूर जहीर ने उस प्रश्न को उठाकर प्रगतिशील लेखक संघ को कठघरे में खड़ा कर दिया है। नूर जहीर कहती हैं, ‘प्रगतिशील लेखक संघ में बीस साल से बढ़ते हुए पुरुषवाद को देख रही हूं, यह भी जानती हूँ कि पुरुषवाद अकेले नहीं पनपता, जातिवाद और सांप्रदयिकता उसके हाथ मे हाथ डाले चलतीं हैं। ऐसे मे अगर कुछ लेखक या लेखिकाएं बिगाड़ नहीं करना चाहती और चुप्पी बनाए रखतीं हैं तो यह उनका निजी मामला है। मैंने खुद कभी फायदा या नुकसान को देखकर ‘स्टैंड’ नहीं लिया है । एक सवाल और एक अपने तजुर्बे की बात कह रहीं हूँ, पहला ये कि ऐसा क्या मिल रहा है एक पैतृक्तावादी पुरुष को जोड़े रखने से ? नाम, पैसा, यश, सहूलियतें? और दूसरे पुरुषवाद एक बीमारी है जिसे यदि फैलने से नहीं रोका गया तो वह चुप्पीधारियों को भी नहीं छोड़ेगी।‘ अब ये तो नूर जहीर ही जानें या फिर प्रगतिशील लेख संघ के लोग जानें कि वहां पिछले बीस साल से किस प्रकार का पुरुषवाद बढ़ रहा है? अगर किसी संगठन के संस्थापक की बेटी और सम्मानित लेखिका को उस संगठन के बारे में इतनी तल्ख टिप्पणी करनी पड़ रही हो तो ये तय करना आसान है कि ‘निर्लज्जता’ कहां है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब इन लेखक संगठनों से जुड़े एक कवि ने हिंदी कवयित्री अनामिका को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इन्हीं लेखक संगठनों से जुड़े एक लेखक ने वाराणसी में अपनी पत्नी के साथ सरेआम अभद्रता की थी लेकिन इन संगठनों के कार्ताधर्ताओं ने मुंह पर पट्टी बांध ली थी। ये जब नैतिकता आदि की बात करते हैं तो खोखले लगते हैं। ये लेखक संगठन अब राजनीति की ऐसी दुकान बन गए हैं जिनके मालिक का दीवाला निकल चुका है और वहां काम करनेवाले कर्मचारीनुमा लेखक अच्छे दिन की आस में अपने मालिक की सेवा किए जा रहे हैं।
आमतौर पर मैं कविताएं कम पढ़ता हूं। लेकिन इन लेखक संगठनों के साझा बयान को पढ़ने के बाद धूमिल की एक कविता की चंद पंक्तियां याद आ गईं- वे सब के सब तिजोरियों के दुभाषिये हैं/ वे वकील हैं/ वैज्ञानिक हैं/ अध्यापक हैं/ नेता हैं/ दार्शनिक हैं/ लेखक हैं/ कवि हैं/ कलाकार हैं/ यानी कि- कानून की भाषा बोलता हुआ अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।

Saturday, March 31, 2018

लेखक संगठनों पर वाजपेयी का हमला


हिंदी साहित्य जगत में एक बार फिर से लेखक संगठनों पर सवाल उठ रहे हैं। इस बार सवाल उठाया है हिंदी के वरिष्ठतम लेखकों में से एक अशोक वाजपेयी ने । हाल ही में उन्होंने वामपंथ को लेकर जो टिप्पणी की है उसके लपेटे में लेखक संगठन भी आ गए हैं। अशोक वाजपेयी के मुताबिक ‘वाम रुझान रखनेवाले लेखकों के तीन संगठन हैं, वे त्रिपुरा-हार के पहले से ही, बल्कि भाजपा की दिग्विजय से भी पहले से, अप्रासंगिक और निष्क्रिय होते गए हैं, हालांकि वे ऐसा मानने को कतई तैयार नहीं हैं। उन्होंने स्वयं कई लेखकों और वृत्तियों के साथ जो अन्याय और अनाचार किए हैं उन्हें स्वीकार करने को भी तैयार नहीं हैं। लोकतंत्र का नाट्य करते हैं पर इन संगठनों का ढांचा मूलतः और मुख्यतः लोकतांत्रिक नहीं रहा। उसके पदाधिकारियों की राजनैतिक-साहित्यिक चूकें काफी रही हैं।पर इस वस्तुस्थिति ने उन्हें बहिष्कार, निन्दा, अफवाह की गर्हित राजनीति से बचने के लिए उकसाया नहीं है। वे अब भी विचार और विश्लेषण ऐसी पदावली में करते हैं जो अब संसार भर की वाम विचारशीलता में कब की बाहर फेंकी जा चुकी है।‘ अशोक वाजपेयी ने बहुत सधे तरीके से लेखक संगठऩों की निष्क्रियता और उन संगठनों में अलोकतांत्रिक व्यवस्था को उजागर कर एक बार फिर से वाम विचारधारा को कठघरे में खड़ा कर दिया। अशोक वाजपेयी का वाम विरोध जगजाहिर रहा है और वामपंथी लेखक बहुधा उनको कलावादी कहकर मजाक उड़ाते रहे हैं। निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र जैसे लेखकों के साथ अशोक जी की निकटता जगजाहिर थी। इस वजह से भी वो वामपंथियों के निशाने पर रहते थे और अशोक वाजपेयी भी लगातार वामपंथियों पर हमले करते रहते थे। लेकिन केंद्र में मरेन्द्र मोदी सरकार आने के बाद जिस तरह से अशोक वाजपेयी ने सरकार के खिलाफ पहले परोक्ष रूप से और फिर प्रत्यक्ष रूप से मुहिम चलाई थी, जिसमें पुरस्कार वापसी अभियान प्रमुख था, उसके बाद वामपंथी लेखकों को अशोक वाजपेयी में एक अवसर नजर आया और वो अचूक अवसरवादी की तरह अशोक वाजपेयी के झंडे के नीचे खड़े होते चले गए। चाहे वो खुद को सबसे ज्यादा क्रांतिकारी मानने वाला संगठन जन संस्कृति मंच के उपाध्यक्ष मंगलेश डबराल हों या फिर जनवादी लेखक संघ के असद जैदी हों। इस तरह अलग अलग वामपंथी लेखक संगठनों में मौजूद लोग अशोक वाजपेयी के साथ जुड़ते चले गए। ये अशोक जी के साहित्यिक हितों की प्रत्यक्ष तौर पर रक्षा करते हैं या नहीं ये ज्ञात नहीं है लेकिन कई बार इनके कदमों से अशोक जी को समर्थन मिलता है। इससे यह संदेश भी गया कि अशोक वाजपेयी वामपंथी हो गए। नतीजा यह हुआ कि अशोक वाजपेयी के साथ जुड़े लेखकों उन लेखकों को परेशानी होने लगी जो वामपंथ विरोध की वजह से अशोक जी के साथ थे। मैंने एक बार अशोक जी से इस बारे में जिक्र किया और उनको कहा कि आप तो सरकार और मोदी विरोध के चलते वामपंथियों के साथ चले गए तो अशोक जी ने थोडी नाराजगी भरे स्वर में मुझे कहा कि मैं किसी से साथ नहीं गया बल्कि वो मेरे साथ आ गए। खैर...
अब, जब अशोक वाजपेयी ने वामपंथी लेखक संगठनों को कठघरे में खड़ा किया है तो ये देखना दिलचस्प होगा कि मंगलेश डबराल या असद जैदी जैसे कवि/लेखक कोई प्रतिक्रिया देते हैं या नहीं। हलांकि इसकी उम्मीद कम से कम जनवादी लेखक संघ को नहीं है क्योंकि जनवादी लेखक संघ के उपमहासचिव संजीव कुमार ने अशोक वाजपेयी को फेसबुक पर लंबी टिप्पणी लिखकर जो जवाब दिया हैं उसमें इस बात के पर्याप्त संकेत हैं। ‘अशोक वाजपेयी की मुश्किल’ शीर्षक से की गई लंबी टिप्पणी में संजीव कुमार ने लिखा- ‘अशोक जी इतने सुजान तो हैं ही कि उनकी हर बात बेबुनियाद न हो। मसलन, उनका यह कहना कि लेखक संगठनों के लोग ‘अब भी विचार और विश्लेषण ऐसी पदावली में करते हैं जो अब संसार भर की वाम विचारशीलता में कब की बाहर फेंकी जा चुकी है’ (‘अब’ ‘कब’ के प्रयोग में जो अटपटापन है, उसका श्रेय मुझे न दें), वामपंथी लेखकों के एक हिस्से के लिए बहुत गलत नहीं है। लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि अपनी चरम निराशा में उन्होंने वामपंथी पहचान वाले लेखकों को पढ़ना ही छोड़ दिया है, इसलिए उन्हें मुहावरे के बदलाव और विश्लेषण में उभरे नए नुक्तों का कोई इल्म नहीं है। उनसे यह उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए कि उन्होंने सब कुछ पढ़ रखा हो, लेकिन यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि ‘संसार भर की वाम विचारशीलता’ आदि के बारे में सब कुछ पढ़े हुए जैसा दावा करने से बचें—अगर बौद्धिक ईमानदारी के ख़याल से नहीं, तो अपने को हास्यास्पद होने से बचाने के लिए ही सही! उनकी इस बात से भी सहमत होने के अलावा कोई चारा नहीं कि ये लेखक संगठन निष्क्रिय होते गए हैं. अगर निष्क्रिय न होते तो ऐसा क्यों होता कि अशोक जी के या किसी भी और के लगाए आरोपों का जवाब देने के लिए कोई आगे न आता! ऐसा तभी होता है जब संगठन के साथ अपनी पहचान को जोड़ने से उसके सदस्य भी कतराते हैं, या दूसरी तरह से देखें तो वह उनकी आत्म-छवि का हिस्सा नहीं होता. शामिल लोग संगठन से अपनी पहचान को न जोड़ें, यह निष्क्रियता की सबसे बड़ी निशानी है; इससे पता चलता है कि कार्यक्रम आदि करा लेने के बावजूद, जो कि मुट्ठी भर सक्रिय लोगों के प्रयास से भी हो सकते हैं, संगठन कुल मिलाकर एक जीवंत इकाई की तरह काम नहीं कर रहा।‘ अशोक वाजपेयी को उत्तर देने के क्रम में संजीव कुमार ने लेखकों के संगठन से अपनी पहचान जोड़ने से कतरानेवाले लेखकों की ओर इशारा किया है। बेहतर होता कि संजीव कुमार अपने लेख में ऐसे लेखकों के नाम उजागर करते। साहित्य जगत को यह तो पता चलता कि कौन से ऐसे लेखक हैं जो संगठन में रहते हुए उसका लाभ तो उठाते हैं लेकिन जब संगठन पर किसी तरह का संकट आता है या उसपर कोई साहित्यिक हमला होता है तो वो उससे अपना नाम जोड़ने में कतराते हैं।
इस पूरे प्रसंग से एक बात तो साफ है कि हिंदी साहित्य में जो लेखक वाम विचारधारा के ध्वजवाहक हैं, उनमें से ज्यादतर अवसरवाद की ध्वजा लिए घूम रहे हैं और जिस जगह पर उनको अवसर दिखाई देता है अपना झंडा वहीं गाड़कर कीर्तन करने लग जाते हैं। अशोक वाजपेयी के अखाडे में इन दिनों इस तरह के लेखकों का अखंड कीर्तन होता दिख रहा है। अशोक वाजपेयी लंबे समय तक भारत सरकार में नौकरशाह रहे हैं, मंत्रालयों में उच्च पदों पर काम किया है, इसलिए यह माना जा सकता है कि उनको इस तरह के लेखकों की पहचान करने में कोई दिक्कत नहीं होती है और वो गाहे बगाहे इनका इस्तेमाल करते रहते हैं, तरह तरह के लॉलीपॉप देकर।
अशोक वाजपेयी ने लेखक संगठनों पर दो बेहद संगीन इल्जाम लगाए हैं, एक तो ये कि इन संगठनों ने लेखकों और वृत्तियों के साथ अन्याय और अनाचार किया। यह सही है। जिस तरह से पूर्व में कई लेखकों को सायास उपेक्षित किया गया वो अब सबके सामने है। हिंदी में प्रचुर और महत्वपूर्ण लेखन करनेवाली शिवानी और मालती जोशी को लगातार उपेक्षित किया गया। उनके लेखन पर जानबूझकर विचार नहीं किया गया। नरेद्र कोहली की कथावाचक कहकर खिल्ली उड़ाई जाती रही। जबकि इन लेखकों के पास तथाकथित मुख्यधारा के लेखकों से कई गुणा ज्यादा पाठक थे और अब भी हैं। यह अन्याय ही तो है। अशोक वाजपेयी और कड़े शब्दों में कहते हैं कि ये लेखक संगठन ‘लोकतंत्र का नाट्य करते हैं पर इन संगठनों का ढांचा मूलतः और मुख्यतः लोकतांत्रिक नहीं रहा।‘ यह सबसे संगीन इल्जाम है। इस बात पर हिंदी साहित्य जगत में विचार किया जाना चाहिए कि क्या इन लेखक संगठनों में लोकतंत्र नहीं है क्या वो लोकतंत्र का नाटक करते हैं। इन लेखक संगठनों के अध्यक्ष उपाध्यक्ष और महासचिव के कार्यकाल को देखकर तो अशोक जी के आरोपों में दम लगता है। पर यह भी लगता है कि इन लेखक संगठनों की सार्थकता तो लगभग समाप्त हो गई है, प्रासंगिकता तो ये पहले ही खो चुके हैं, इनकी विश्वसनीयता भी लगभग समाप्त ही हो चुकी है तो ऐसे में अशोक जी क्यों चिंता कर रहे हैं? संजीव कुमार की तो मजबूरी समझ में आती है क्योंकि वो जनवादी लेखक संघ के पदाधिकारी हैं लिहाजा उनका बोलना आवश्यक है। लेकिन अकेले संजीव कुमार का बोलना भी तो कुछ संकेत करता ही है। इन संकेतों को समझने की जरूरत भी है।


Friday, April 17, 2009

लेखकों के मरने का इंतजार करते लेखक संगठन !

पिछले कुछ वर्षों से लेखकों की सामाजिक भूमिका लगभग खत्म हो गई है । कहीं से भी ये लगता ही नहीं है कि लेखकों का समाज से कोई जुड़ाव भी है । किसी भी बड़े सामाजिक प्रश्न पर इनकी एकजुटता नजर नहीं आती है । वे छोटे-छोटे गुटों में बनाई अपनी ही दुनिया में संतुष्ट नजर आते हैं, जबकि साहित्य और संस्कृति के सामने संकट गहराता जा रहा है । लेखकों की सामाजिक सक्रियता को लेकर लेखक संगठों की स्थापना की गई थी । कहने को तो आज हिंदी में तीन लेखक संगठन हैं और ये तीनों अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध हैं । प्रगति लेखक संघ, सीपीआई से , जनवादी लेखक संघ, सीपीएम से और जन संस्कृति मंच, सीपीआई-एमएल से । लेकिन ये संगठन इन पार्टियों के पिछलग्गू ही साबित हो रहे हैं । जब सन 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई थी तो दो दशकों तक इसने सभी भारतीय भाषाओं में समान रूप से लेखकों को जोड़कर गंभीरता से काम किया लेकिन समय बीतने के साथ ये संगठन कमजोर होता गया और आज तो हालत ये है कि कुछ शहरों को छोड़ दें तो ये लगभग मृतप्राय है । यही हाल जलेस और जसम का भी है । अब तो ये तक पता नहीं चलता है कि इनके अध्यक्ष और सचिव कौन हैं । इन संगठनों का पता तब चलता है जब किसी लेखक की मृत्यु होती है । इसके बाद लेखक संगठन एक शोकसभा का आयोजन करते हैं और उसमें मर्सिया पढकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं । यह सही और दुखद है कि लेखक लोग या तो किसी शोकसभा में मिलते हैं या पुस्तक विमोचन के अवसर पर । मुद्दों को लेकर लेखकों ने आपस में मिलना बंद कर दिया है ।
दूसरी सबसे शर्मनाक बात ये है कि इन लेखक संगठनों को किसी लेखक के मरने के बाद ही ही उसकी महत्ता समझ में आती है । लेखक के जीवित रहते ये संगठन लेखकों की रचनाओं पर कुछ भी करने से कतराते रहते हैं लेकिन उनके मरते ही उसे महान तथा उसकी रचनाओं को बेहद अहम बताने लग जाते हैं । इससे लगता तो ये है कि ये लेखक संगठन लेखकों की मरने की प्रतीक्षा कर रहा होता है । पिछले दिनों हिंदी के कवि सुदीप बनर्जी का निधन हुआ और तामम संगठनों के बीच उन्हें महान साबित करने की होड़ लग गई लेकिन मुझे नहीं याद कि उनके जीवित रहते किसी भी संगठन ने कोई मग्तवपूर्ण कार्यक्रम सुदीप बनर्जी पर आयोजित किया ।
कई साल पहले हिंदी के एक वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने एक बातचीत में कहा था कि लेखक संगठन लेखकों के यूनियन नहीं है जो कॉपीराइट आदि के मुद्दे पर संघर्ष करें । उनका मानना था कि ये वैचारिक संगठन हैं जिनका काम साहित्य की दुनिया में वैचारिक संवेदना का प्रचार करना है । अगर मंगलेश की बातों को मान भी लिया जाए तो सवाल ये उठता है कि वैचारिक संवेदना के प्रचार के लिए भी लेखक संगठन क्या कर रहे हैं ?
आज जरूरत इन लेखक संगठों की भूमिका पर पुन्रविचार की है । इन संगठनों की निष्क्रियता के पीछे वामपंथी राजनीति की हिम्मतपरस्ती और अवसरवादिता की राजनीति है । लेखको के बीच भी पद और पुरस्तार पाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है । वैचारिकता पर अवसरवादिता हावी हो गई है । तमाम लेखक इस दंद-फंद में जुटे रहते हैं कि किस संगठन से जुड़कर उन्हें लाभ हो सकता है और ये तय करते ही वो उन संगठनों से जुड़कर साहित्यिक मठाधीशों का आशीर्वाद प्राप्त कर लेता है । सच तो ये है कि इन दिनों लेखक संगठनों से न तो कोई उर्जा प्राप्त कर पा रहे हैं और न ही कोई वैचारिक दिशा ।
लेखक संगठनों का इतना बुरा हाल है कि वो अपने ही साथी लेखकों के हित के लिए कुछ बी नहीं कर पा रहा है । कॉपीराइट हिंदी में लेखकों के लिए आज एक बड़ा मु्दा है और तमाम लेखक इसके शिकायत हो रहे हैं । लगातार प्रकाशकों द्वारा लेखकों के शोषण की बात सामने आती रहती है लेकिन आजतक लेखक संगठनों ने इस शोषण के खिलाफ कोई ठोस आवाज नहीं उठाई है, आंदोनल की बात तो दूर । इसके अलावा भी की मुद्दे हैं जिनपर लेखक संगठनों की खोमोशी चिंतनीय है ।
दरअसल अब प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, और जन संसकृति मंच को आपसी भेदभाव भुलाकर साथ आकर एक नया सांस्कृतिक और साझा मंच बनाना चाहिए और लेखकों की मर्सिया पढ़ना बंद कर उनके जीवित रहते उनको उनका देय दिलाने के लिए प्रयास करना चाहिए तभी साहित्या का भी भला होगा और साहित्यकारों का भी । अन्यथा लेखक संघ अपने ही साथियों के मरने का इंतजार करनेवाला संगठन बनकर रह जाएगा ।