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Saturday, January 17, 2026

वो कमाल भी क्या खूब था


 कमाल अमरोही का नाम लेते ही  फिल्म महल, पाकीजा. दायरा और रजिया सुल्तान का नाम याद आता है। कमाल अमरोही ने बहुत कम फिल्में निर्देशित कीं लेकिन सबमें उन्होंने अपनी कला की अमिट छाप छोड़ी। वैसे तो वो 1938 से ही फिल्म जगत में कहानीकार और संवाद लेखक के रूप में उपस्थित थे। लेकिन उनको निर्देशक के रूप में पहचान मिली बांबे टाकीज की फिल्म महल से। स्वाधीनता के ठीक पहले देविका रानी ने 1946 में रशियन पेंटर से विवाह कर लिया और बांबे टाकीज में उनकी रुचि कम हो गई। उन्होंने अभिनेता अशोक कुमार और सावक वाचा को 28 लाख रुपए में बांबे टाकीज बेच दिया। अशोक कुमार ने दब बांबे टाकीज संभाला तो उस समय स्वाधीनता आंदोलन चरम पर पहुंच चुका था। पूरे देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव की स्थिति थी। बांबे टाकीज में काम करनेवाले हिंदू और मुस्लिम कर्मचारियों के बीच तनाव महसूस किया जा रहा था। उस दौर में अशोक कुमार और सावक वाचा ने बांबे टाकीज से कई हिंदू कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाकर मुस्लिम कर्मचारियों को काम पर रख लिया था। वहां तनाव बढ़ रहा था। उनके लिए काम करने वाले लेखक सअदात हसन मंटो ने अशोक कुमार को चेताया था कि वो ऐसा ना करें क्योंकि इससे हिंदी बहुत नाराज हो जाएंगे। अशोक कुमार कहा करते थे कि वो ना तो हिंदू हैं और ना ही मुसलमान बल्कि वो तो कलाकार हैं। कला ही उनका धर्म है। इस सोच के अंतर्गत ही अशोक कुमार ने बांबे टाकीज की अपनी पहली फिल्म महल को निर्देशित करने के लिए एक मुस्लिम निर्देशक कमाल अमरोही को साइन किया था। नोआखाली में हिंदुओं के नरसंहार के बाद देशभर में हिंदू मुसलमान के बीच की दरार गहरी हो गई थी। ऐसे माहौल में अशोक कुमार ने क मुस्लिम निर्देशक को फिल्म सौंपने का निर्णय लिया था जिसकी बहुत आलोचना हुई थी लेकिन अशोक कुमार अपने निर्णय पर अडिग रहे। कमाल अमरोही ने ही फिल्म महल निर्देशित की जो 1949 में प्रदर्शित हुई। इस फिल्म ने इतिहास रच दिया था। इसके बाद 1953 में कमाल अमरोही ने दायरा फिल्म निर्देशित की। ये फिल्म फ्लाप रही थी और कमाल अमरोही एक बेहचर कहानी और फिल्म की तलाश में थे। उनको पाकीजा की कहानी में ये संभावना दिखी और उसको निर्देशित करने का कार्य आरंभ किया। 

फिल्म पाकीजा ने कमाल अमरोही को हिंदी फिल्मों के शीर्ष निर्देशकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। मीना कुमारी इस फिल्म की नायिका थीं जो कमाल अमरोही की पत्नी थीं। पाकीजा की शूटिंग के दौरान दोनों के संबंध बहुत खराब हो चुके थे। मीना कुमारी का दिल बरी तरह से टूट चुका था और वो मरणासन्न हो गई थीं। फिल्म की कहानी भी कुछ ऐसी थी कि नायिका प्यार खोजती है लेकिन ना तो उसको प्यार मिलता है ना ही सुकून। फिल्म पाकीजा में बुरी तरह टूटे हुए दिल वाली नायिका में दर्शकों को मीना कुमारी की रीयल लाइफ कहानी नजर आई थी। पाकीजा फिल्म की शूटिंग के दौरान मीना कुमारी इतनी बीमार थीं कि मुजरा करने की स्थिति में नहीं थी। ऐसे में कमाल अमरोही ने तय किया कि मीना कुमारी के डांस सीक्वेंस को पद्मा खान से करवाया जाए। पद्मा खान की कद काठी मीना कुमारी जैसी थी और उनको बुर्का पहनाकर क्लाइमैक्स का डांस शूट करवाया गया था। कैमरे और उसके उपयोग की कमाल अमरोही को कमाल की समझ और जानकारी थी। इस फिल्म को 35 एमएम कैमरे पर शूट किया गया था। कमाल अमरोही ने रील देखकर बता दिया था कि शूट किए गए कुछ सीन आउट आफ फोकस हैं। विदेश में दो बार जांच हुई तब जाकर ये बात पकड़ में आ सकी कि कुछ फ्रेम में शूट आउट आफ फोकस है। पाकीजा को पहले 1971 में रिलीज होना था लेकिन भारत पाकिस्तान युद्ध के कारण रिलीज टली। 1972 में ये फिल्म रिलीज हुई। 1971 के भारत- पाकिस्तान युद्ध में भारत की विजय हुई तो शिमला समझौते के लिए भुट्टो शिमला आए थे। वहां भुट्टो और उनकी टीम ने पाकीजा देखने की इच्छा जताई । कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि इंदिरा गांधी ने पराजित पाकिस्तान के नेताओं के लिए पाकीजा की स्क्रीनिंग की व्यवस्था करवाई थी। कमाल अमरोही के निर्देशन में बनी आखिरी फिल्म रजिया सुल्तान थी। कमाल अमरोही ने कम फिल्में की लेकिन महल और पाकीजा में उनके निर्देशन ने उनकी प्रतिभा का रंग दर्शकों को दिखाया। 


Saturday, July 27, 2024

मानवीय संबंधों-मूल्यों का कोलाज


आज से बासठ वर्ष पहले एक फिल्म आई थी, साहिब, बीबी और गुलाम। विमल मित्र के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म को गुरुदत्त ने बनाया था। जब ये फिल्म प्रदर्शित हुई थी तो इसको अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। दर्शकों ने बहुत पसंद नहीं किया लेकिन समीक्षकों ने इस फिल्म की बहुत प्रशंसा की थी। इसको समय से आगे की फिल्म बताया गया था । बहुत हद तक यह बात सही भी है। गुरुदत्त ने इस फिल्म में ‘छोटी बहू’ के चरित्र के माध्यम से स्त्री के सेक्सुअल डिजायर को पर्दे पर चित्रित किया था। आज से छह दशक पहले इस तरह के विषयों को फिल्मी पर्दे पर उतारने की बात सोच पाना भी मुश्किल था। गुरुदत्त ने सोचा भी और किया भी। छोटी बहू के रूप में मीना कुमारी ने जब शादी करके जमींदार चौधरी के परिवार में हवेली में प्रवेश करती है तो उसकी पहचान बदल जाती है। उसका नाम हवेली की देहरी के बाहर रह जाता है और वो बन जाती है छोटी बहू। जिससे ये अपेक्षा की जाती है कि वो जमींदार चौधरी खानदान की स्त्रियों की तरह हवेली की चौखट के अंदर ही रहे। वो रहती भी है। परिवार और विवाह को निभाने के लिए सारे जतन करती है। पति पर पूरा भरोसा करती है लेकिन उसका जमींदार पति कहता है कि चौधरियों की काम वासना को उनकी पत्नियां कभी तृप्त नहीं कर सकती हैं। यह सुनकर छोटी बहू के अंदर कुछ दरकता है। वो पति का ध्यान आकृष्ट करने के लिए तमाम तरह के जतन करती है। स्त्री यौनिकता के बारे में भी पति से खुल कर बात करती है जिसमें उसकी स्वयं की संतुष्टि की अपेक्षा भी शामिल है। इन दृष्यों को साहब बीबी और गुलाम में जिस संवेदनशीलता के साथ फिल्माया गया है उसको रेखांकित किया जाना चाहिए। पहले भी कुछ लोगों ने इसपर चर्चा की होगी। 

इस तरह के विषय आज सामान्य लग सकते हैं। लेकिन 1962 की फिल्म में नायिका के संवाद में आता है कि मर्दानगी की डींगे हांकने के बावजूद छोटे बाबू नपुंसक हैं। इस संवाद और दृष्य को उस समय के दर्शक पचा नहीं पाते। उनको झटका लगा था। आज ये सामान्य बात है। मिर्जापुर वेबसरीजीज में भी नायिका और उसके पति के बीच इस तरह के संवाद है। जिसका नोटिस भी नहीं लिया जाता। अभिनेता पंकज त्रिपाठी जिसने अखंडानंद त्रिपाठी का अभिनय किया है और उसकी पत्नी बीना त्रिपाठी की भूमिका निभाने वाली रसिका दुग्गल के बीच भी कुछ दृश्यों में साहिब बीबी और गुलाम के छोटे बाबू और छोटी बहू जैसा संवाद है। यहां भी स्त्री कामोत्तजना से लेकर कामोद्वेग तक के दृष्य हैं लेकिन अब दर्शकों को झटका नहीं लगता है। दर्शक इन दृष्यों को और संवाद को सहजता के साथ लेता है। समाज बदल गया है। दर्शकों की मानसिकता बदल गई है। स्त्री यौनिकता पर समाज में खुलककर बात होने लगी है। जब गुरुद्दत ने ये सोचा था तब भारतीय समाज इस विषय पर सार्वजनिक रूप से चर्चा करने को तैयार नहीं था। विमल मित्र ने तो फिल्म के प्रदर्शन से वर्षों पहले अपने उपन्यास में ये सब लिख दिया था। माना जाता है कि साहित्य में जो विषय पहले आते हैं वो फिल्मों में बाद में आते हैं। उस समय का भारतीय समाज ऐसा था कि वो विवाह से बाहर के संबंध भी पर्दे पर देखना नहीं चाहता था। कम से कम साहब बीबी और गुलाम में तो ऐसा ही प्रतीत हुआ था। 

गुरुदत्त की फिल्में जब रिलीज होती थीं तो वो दर्शकों की प्रतिक्रिया जानने के लिए बेहद उत्सुक रहते थे। साहिब बीबी और गुलाम जब प्रदर्शित हुई तो उन्होंने अपने मित्र राज खोसला को फिल्म देखने के लिए भेजा। राज खोसला बांबे (अब मुंबई) के मिनर्वा सिनेमा में दोपहर का शो देखने के लिए पहुंचते हैं। दर्शकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया होती है। फिल्म के उत्तरार्ध के एक दृश्य में गुरुदत्त अभिनीत पात्र भूतनाथ और छोटी बहू मीना कुमारी बग्घी में जा रही होती हैं। अचानक छोटी बहू अपना सर भूतनाथ की गोद में रख देती है। इस सीन पर दर्शकों की प्रतिक्रिया अच्छी नहीं होती। अगले दिन गुरुद्दत स्वयं फिल्म देखने पहुंचते हैं। उस दिन भी जब ये दृश्य पर्दे पर आता है तो दर्शक अपनी नाराजगी प्रकट कर देते हैं। सिनेमा हाल में बैठे- बैठे ही गुरुदत्त ये निर्णय लेते हैं कि इस दृष्य को फिल्म से हटाकर दूसरा दृष्य पिरोना है। वहीं से वो मीना कुमारी को फोन करके अगले दिन शूटिंग के लिए आने का आग्रह करते हैं। अगले दिन नया शूट होता है और फिल्म के सभी प्रिंट में उसको जोड़ा जाता है। इस बारे में गुरुदत्त ने 1963 में सेल्यूलाइड पत्रिका में लिखे अपने लेख कैश एंड क्लासिक्स में लिखा- विमल मित्र के उपन्यास पर साहिब, बीबी और गुलाम नाम से फिल्म बनाने को फिल्म समीक्षकों ने उचित तरीके से नहीं लिया। धर्म कर्म में आस्था रखनेवाली घरेलू महिला का अपने पति का दिल जीतने के लिए शराब पिते दिखाना बेहद जोखिम भरा निर्णय था। मेरे इस फैसले का प्रेस ने स्वागत किया था। दर्शकों की प्रतिक्रिया भी उत्साहवर्धक रही। इस फिल्म के प्रदर्शन पर बंबई के दर्शकों में केवल दो सीन को लेकर गुस्सा दिखा। पहला जब छोटी बहू आकर्षण में आकर अपना सर भूतनाथ की गोद में रख देती है और दूसरा सीन वो जिसमें वो अपने पति से कहती है कि मुझे शराब का घूंट पीने दो केवल अंतिम बार। मैंने छोड़ने का निश्चय किया है, पूरी तरह से छोड़ने का फैसला किया है। हमने दोनों सीन फिल्म से निकाल दिए।

साहिब बीबी और गुलाम एक असाधारण फिल्म है। इसका निर्देशन भले ही अबरार अल्वी ने किया है लेकिन इस पूरी फिल्म पर गुरुदत्त की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। असाधारण फिल्म असाधारण घटनाओं से बनती है। ये इस कारण कह रहा हूं कि इस फिल्म को लेकर गुरुदत्त की योजनाएं कुछ और थीं लेकिन नियति कुछ और ही मंजूर था। गुरुदत्त चाहते थे कि भूतनाथ की भूमिका शशि कपूर करें लेकिन वो संभव नहीं हो पाया। इस भूमिका के लिए विश्वजीत को भी संपर्क किया गया था पर वो भी नहीं आए। अंत में उन्होंने खुद ये भूमिका निभाई। इसी तरह से छोटी बहू को लेकर कई नायिकाओं के नाम पर विचार करने के बाद मीना कुमारी तय हुईं। इस भूमिका के लिए नर्गिस से भी गुरुदत्त ने संपर्क किया था। उन्होंने मना कर दिया। तब ये चर्चा हुई थी कि गुरुदत्त और सुनील दत्त के संबंघ ठीक नहीं होने के कारण नर्गिस ने इंकार किया। गुरुदत्त ने इस फिल्म के लिए लंदन में रह रहे अपने सिनेमेटोग्राफर मित्र जितेन्द्र आर्य की पत्नी छाया को तैयार कर लिया। वो लोग लंदन से मुंबई शिफ्ट भी हो गए। गुरुदत्त के सामने जब छोटी बहू के गेटअप में छाया की तस्वीरें आईं तो वो निराश हो गए और उनको मना कर दिया। इतना ही नहीं गुरुदत्त इस फिल्म का संगीत निर्देशन एस डी बर्मन से करवाना चाहते थे लेकिन वो अपनी बीमारी के कारण कर नहीं सके तो हेमंत कुमार को लिया गया। साहिर ने मना कर दिया तो शकील बदायूंनी से गीत लिखवाए गए। सिर्फ जब्बा की भूमिका के लिए वहीदा रहमान पहले दिन से तय थीं। जो टीम बनी उसने एक ऐसी फिल्म दी जो आज पूरी दुनिया में फिल्म निर्माण कला के लिए न सिर्फ देखी जाती है बल्कि छात्रों को दिखाकर फिल्म निर्माण की बारीकियां बताई भी जाती हैं। गुरुदत्त का छोटा जीवन मिला लेकिन उनकी दो फिल्में प्यासा और साहिब बीबी और गुलाम ने उनको अमर कर दिया। उनकी शैली को देखकर लोग कहा करते थे कि वो पर्दे पर कविता लिखते हैं।  


Sunday, January 31, 2021

पचास की 'पाकीजा'


आपके पांव देखे, बहुत हसीन हैं, इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे। फिल्म ‘पाकीजा’ ये संवाद बहुधा सुनाई देता है। ये भी सुनने को मिलता है कि ये संवाद अमर हो गया है। दरअसल ये संवाद फिल्म ‘पाकीजा’ की मूल स्क्रिप्ट में नहीं था। जब ये सीन फिल्माया जा रहा था और कैमरा मीना कुमारी के पांव पर पहुंचा तो अचानक कमाल अमरोही के दिमाग में एक मुजरे की याद कौंधी। वो मुजरा था चंदेरी नाम की एक खूबसूरत बाई का, जिसे उन्होंने काफी पहले सुना था। मुजरे में वो अपने पांव को अदा से लहराती थी। कमाल अमरोही ने शूटिंग रोकी और स्क्रीनप्ले में बदलाव करके ये पंक्ति जोड़ दी। हिंदी फिल्मों के इतिहास में कई ऐसी फिल्में हैं जिनके बनने के दौरान के कई रोचक किस्से आज भी सिनेमा प्रेमियों के बीच याद किए जाते हैं। कमाल अमरोही की फिल्म ‘पाकीजा’ इस तरह की फिल्मों में शीर्ष पर है। इसको लेकर सैकड़ों कहानियां कही-सुनी जाती हैं। ये स्वाभाविक भी है क्योंकि 1957 में जिस फिल्म का मूहुर्त हुआ हो और वो पंद्रह साल बाद 1972 में रिलीज हो तो कहानियां तो बनेंगी हीं। इन पंद्रह सालों में इस फिल्म के निर्माता कमाल अमरोही ने कई बार फिल्म का नाम बदला। ‘पाकीजा’ का नाम ‘लहू पुकारेगा’ तो लगभग तय हो गया था, लेकिन जब फिल्म के रिलीज होने का वक्त आया तो वो फिर से ‘पाकीजा’ पर ही जा पहुंचे। कई पुस्तकों में और उस वक्त की पत्रिकाओं में इसका उल्लेख मिलता है कि जब कमाल अमरोही ने फिल्म बनाने की सोची थी उनके दिमाग में अपने जमाने की दो बाइयों का जीवन था। एक तो जद्दनबाई, जिनकी महफिल में जुल्फिकार अली भुट्टो और के एल सहगल जैसे दिग्गज जाते थे और दूसरी थीं गौहर जान, जिसकी आन-बान के किस्से मशहूर हैं। इसके अलावा भी कमाल अमरोही ने कई बाइयों की जिंदगी को नजदीक से देखा था और कइयों के बारे में सुना था। जब मीना कुमारी से उनकी शादी हुई तो कमाल अमरोही ने उनको लीड रोल में लेकर बाइयों की जिंदगी पर एक फिल्म बनाने की सोची जिसका नाम रखा ‘पाकीजा’।

फिल्म शुरू हुई और सबकुछ ठीक चल रहा था इस बीच कमाल अमरोही और उनकी पत्नी और फिल्म की नायिका मीना कुमारी के बीच संबंध खराब हो गए और फिल्म का काम रुक गया। इसको लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन सात साल के व्यवधान के बाद अगर ‘पाकीजा’ फिर से शुरू हो सकी तो उसके लिए संगीतकार खय्याम और उनकी पत्नी जगजीत कौर की भूमिका को रेखांकित करना जरूरी है। ये वो समय था जब कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को साथ काम करने के लिए अनुरोध पत्र भी लिखा था जिसे मीना कुमारी ने ठुकरा दिया था। कमाल अमरोही परेशान थे। इसी दौर में वो एक दिन अपने दोस्त ख्य्याम के घर गए। वहां जगजीत कौर ने ‘पाकीजा’ की चर्चा छेड़ दी और कमाल अमरोही से अनुरोध किया कि वो अब तक शूट की गई फिल्म उनको दिखाएं। कमाल तैयार हो गए। खय्याम, उनकी पत्नी और कमाल अमरोही ने आधी फिल्म देखी। जगजीत फिल्म के अधूरे हिस्से को देखकर इतनी उत्साहित हो गईं कि उसने मीना कुमारी को मनाने का बीड़ा उठाया। खय्याम और उनकी पत्नी मीना कुमारी के भी अच्छे दोस्त थे। जगजीत कौर ने मीना कुमारी से बात की। मीना कुमारी ने उनको बताया कि कमाल से उनकी बोलचाल बंद है, संबंध बहुत खराब हैं इसलिए ये संभव नहीं है। जगजीत ने हार नहीं मानी और मीना कुमारी को मनाने में लगी रहीं। धीरे-धीरे उनको तैयार कर लिया । मीना कुमारी ने फिर खुद ही कमाल अमरोही को संदेश भेजा कि वो पाकीजा को पूरा करने के लिए तैयार हैं। सात साल के व्यवधान के बाद ‘पाकीजा’ की शूटिंग शुरू हो सकी।

फिर वो दिन आया जब फिल्म रिलीज हुई। फिल्म के प्रीमियर पर मीना कुमारी और कमाल अमरोही साथ बैठे थे। मीना कुमारी के साथ ही खय्याम और जगजीत कौर भी थीं। फिल्म खत्म होने के बाद मीना कुमारी ने जगजीत कौर को गले से लगा लिया। सिनेमा हॉल में ही दोनों काफी देर तक आलिंगनबद्ध रहे और फिर मीना कुमारी ने जगजीत से कहा कि ‘तुम्हारी वजह से ही कमाल का ये सपना साकार हो सका है। तुम्हारी वजह से मैं इतनी अच्छी फिल्म को पूरा कर सकी।‘ भावुकता के इन क्षणों की गवाह बहुत सी फिल्मी हस्तियां बनीं। रिलीज के बाद इस फिल्म ने इतिहास रच दिया। आज पचास साल बाद भी इस फिल्म के गीत, संगीत, फिल्मांकन और निर्देशन की बारीकियां इसको क्लासिक की श्रेणी में रखती हैं।

Saturday, March 28, 2020

मीना कुमारी और अकेलेपन का दंश


इस वक्त पूरे देश में लॉकडाउन चल रहा है। ये लॉकडाउन कोरोना वायरस की वजह से किया गया है ताकि इसके फैलाव को रोका जा सके। सरकार के इस फैसले के बाद लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं। सारा देश कोरोना को रोकने के आह्वान की वजह से लगभग ठप है। लगभग इस वजह से कह रहा हूं कि आवश्यक सेवाएं जारी हैं। बड़े-बुजुर्ग, महिलाएं-पुरुष, बच्चे-किशोर सभी घरों में ही रह हैं। वो बाहर बिकुल नहीं निकल रहे हैं। महानगरों में जहां फ्लैट की संस्कृति है, जहां संयुक्त परिवारों का चलन लगभग नहीं है, वहां लोग अकेले अपने घरों में रह रहे हैं। शहरों के अलावा कस्बों और गांवों में भी ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है जो अपने घरों में अकेले रहकर कोरोना के इस संकट को मात देने में लगे हैं। इसके लिए धैर्य और संकल्प की जरूरत है। अपने घरों में इक्कीस दिनों तक अकेले रहना बेहद मुश्किल है। जो लोग वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं उनको तो बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही है लेकिन जो लोग कारोबारी हैं, जिनका अपना काम है, जो छात्र हैं ऐसे लोगों को घर में बहुत अधिक काम नहीं है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ‘कई बार अकेलापन लोगों को अवसाद की ओर भी ले जाता है।‘
हिंदी फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी की आगामी 31 मार्च को पुण्यतिथि है। इस माहौल में उनकी जिंदगी की कहानी याद आती है कि किस तरह से अकेलापन एक बिंदास शख्सियत को अवसाद की ओर ले कर चला गया था। उनतालीस साल की अपनी छोटी सी उम्र में जब-जब मीना कुमारी ने अपना अकेलापन दूर करने की कोशिश की वो जिंदगी के तमाम रंगों को अपने व्यक्तित्व में उतारने में सफल रहीं। अपनी निजी जिंदगी में भी और अपने प्रोफेशन में भी। जब-जब अकेलापन उनपर भारी पड़ा तब-तब वो अवसाद में गईं और उनका और पूरे कलाजगत का नुकसान हुआ।
इस संदर्भ में मशहूर अभिनेत्री नर्गिस ने एक प्रसंग लिखा है, ‘राजेश खन्ना और मीना कुमारी अभिनीत फिल्म ‘दुश्मन’ की शूटिंग खत्म हो चुकी थी। उसकी एडिटिंग शुरू हो चुकी थी। इस फिल्म की डबिंग का काम नरगिस के घर पर स्थित छोटे से थिएटर में शुरू हो चुका था। एक दिन फिल्म की डबिंग के लिए मीना कुमारी वहां पहुंची। उन्हें पता था कि ये थिएटर नर्गिस के घर में ही है। उन्होंने किसी से कहा कि जाओ देखकर आओ नर्गिस है कि नहीं। जब उनको पता चला कि नर्गिस घर पर हैं तो उन्होंने अपने स्टॉफ को नर्गिस के पास इस अनुरोध के साथ भेजा कि वो उनसे मिलना चाहती हैं।‘ नर्गिस किसी काम में व्यस्त थीं लेकिन मीना कुमारी के अनुरोध को वो ठुकरा नहीं सकती थीं क्योंकि दोनों में काफी दोस्ती हो चुकी थी। मीना कुमारी को नर्गिस मंजू कहती थीं और वो नर्गिस को बा’जी के नाम से बुलाती थी। दोनों के बीच की दोस्ती फिल्म ‘मैं चुप रहूंगी’ की शूटिंग के दौरान अंतरंगता में बदल गई थी। जब इस फिल्म की शूटिंग चेन्नई में चल रही थी तो उसका शेड्यूल काफी लंबा हो गया था। सुनील दत्त साहब ने नर्गिस को फोन कर अपने दोनों बच्चों संजय और नम्रता के साथ वहां बुला लिया था। तब संजय दत्त ढाई साल के थे और नम्रता दो महीने की थी। ये सभी लोग जब चेन्नई पहुंचे तो वहां होटल ओसनिक में रुके थे। उनके कमरे के बगल के कमरे में ही मीना कुमारी भी रह रही थीं। वहीं दोनों की दोस्ती परवान चढ़ी थी। एक दिन शाम को सुनील दत्त ने चाइनीज खाने का प्रोग्राम बनाया तो नर्गिस ने मीना कुमारी को भी साथ चलने का निमंत्रण दिया। मीना कुमारी उस दिन शूटिंग करते हुए बहुत थक गई थी इसलिए उसने साथ जाने में असमर्थता जताई। लेकिन मीना कुमारी ने नर्गिस के सामने एक प्रस्ताव रखा कि वो उनके दोनों बच्चों को अपने साथ रख लेंगी ताकि वो और दत्त साहब अकेले डिनर पर जा सकें। नर्गिस और सुनील दत्त को मीना कुमार का ये प्रस्ताव भाया और वो दोनों बच्चों को उनके पास छोड़कर चाइनीज खाने का आनंद लेने चले गए। जब वो लौटकर आए तो दोनों बच्चे मीना कुमारी से चिपटकर सो रहे थे। नर्गिस ने लिखा कि ‘उस वक्त मीना कुमारी के चेहरे पर सुखद संतुष्टि का भाव था और उसका एक हाथ संज और एक हाथ नम्रता के ऊपर था’
हम बात कर रहे थे ‘दुश्मन’ फिल्म की डबिंग के दौरान मीना कुमारी का नर्गिस को अपने पास बुलाने की। नर्गिस जब वहां पहुंची तो मीना कुमारी ने वहां मौजूद सभी कर्मचरियों से अनुरोध किया कि वो ग थोड़ी देर के लिए कहीं चले जाएं, दोनों अकेले में कुछ बातें करना चाहते हैं। जैसे ही लोग वहां से निकले तो मीना कुमारी ने अपना सर नर्गिस के कंधे पर रख दिया और सुबकने लगी। अचानक मीना कुमारी के इस बर्ताव से नर्गिस हतप्रभ रह गईं। मीना कुमारी लगातार रोए जा रही थीं और नर्गिस उनके पीठ पर हाथ फेरते हुए उनको सांत्वना दे रही थी। रोते-रोते मीना कुमारी ने नर्गिस से कहा ‘बा’जी, मैं कितनी अभागन हूं कि कोई भी मुझे प्यार नहीं करता, आप भी नहीं। आप भी मुझसे महीनों नहीं मिलती हैं, कोई मुझसे बात नहीं करता, मैं किसको अपने मन की बात कहूं’ । इतना सुनते ही नर्गिस भी भावुक हो गईं और उन्होंने मीना कुमारी को बच्चों की तरह अपने सीने से लगा लिया और समझाना शुरू कर दिया। नर्गिस के भरोसे के बाद मीना कुमारी बेहद खुश दिखीं और उन्होंने नर्गिस से वादा लिया कि वो ‘पाकीजा’ के प्रीमियर पर जरूर आएंगी। इस पूरे प्रसंग को बताने का मकसद इतना है कि मीना कुमारी के अवसाद में जाने की वजह उनका अकेलापन था। वो इस बात को लेकर खुद को अभागन तक मानने लगी थीं कि कोई न तो उनसे बात करता है न ही उनकी बात सुनता है। अकेलापन को लेकर लोगों में मतैक्य नहीं है। कई लोग इसको रचनात्मकता बढ़ानेवाला मानते हं तो कई इसको अवसाद का रास्ता। पर ज्यादातर केस में देखा गया है कि अकेलापन लोगों को अवसादग्रस्त करता है। ग्रेट ब्रिटेन के ब्रिटिश रॉयल कॉलेज ऑफ जनरल प्रैक्टिशनर्स के मुताबिक ‘अकेलापन एक गंभीर बीमारी है. पूरी दुनिया में डायबिटीज से जितनी मौत होती है उतनी ही मौत अकेलेपन के शिकार लोगों की होती है।‘
अगर हम मीना कुमारी के जिंदगी को ही देखें तो एक इतनी कामयाब अभिनेत्री जिसने ‘बैजू बावरा’ से लेकर ‘पाकीजा’ जैसी बेहतरीन फिल्में की। अभिनय की जिन ऊंचाइयों को उन्होने अपनी निभाई भूमिकाओं में छुआ उसने उनको कला के शिखर तक पहुंचा दिया था। मीना कुमारी जब भी तन्हा होती थी तो उनकी व्यक्तिगत जिंदगी उनको परेशान करती थीं। जब भी उनकी जिंदगी में तन्हाई दूर होती थी तो उनकी जिंदगी सतरंगी हो जाती थी। आज जब सभी लोगो कोरोना वायरस से बचने के लिए अपने घरों में बंद हैं तो इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आप अकेलापन के शिकार न हों। शारीरिक दूरी इस भयंकर बीमारी को रोकने के लिए जरूरी है लेकिन अपनी सामाजिकता को बाधित न होने दें। फोन, इंटरनेट और अन्य आभासी माध्यम से अपने संपर्कों को जीवंत रखें। दोस्तों से अपने मन की बात कहें और दोस्तों के मन की बात सुनें। मीना कुमारी जब भी किसी वजह से परेशान होकर घर बैठ जाती थीं तो वो अकेलेपन का शिकार हो जाती थीं क्योंकि वो खुद को घर में सबसे दूर कर लेती थीं। लेकिन जब-जब को किसी रिलेशनशिप में रहीं या किसी काम में व्यस्त रहीं तो उनकी जिंदगी बेहतरीन हो जाती थीं। जब वो अपनी व्यक्तिगत जिंदगी के संघर्षों से बाहर निकलकर ‘पाकीजा’ फिल्म करने के लिए वापस तैयार हुईं तो भी वो इस अकेलेपन से मुक्त हो गईं, उनके जीवन का खालीपन भर गया। लेकिन फिल्म ‘पाकीजा’ के रिलीज होने के बाद वो फिर से अकेलेपन की गिरफ्त में चली गईं। नाम, इज्जत शोहरत, काबिलियत, रुपया-पैसा हासिल करने के बाद कई बार लोगों को लगता है कि उन्होंने अपनी जिंदगी के सभी लक्ष्य हासिल कर लिया है। सारी भौतिक सुख सुविधाएं हासिल कर लेने के बाद भी जिंदगी पूर्ण नहीं होती। मीना कुमारी की जिंदगी इस बात का उदाहरण है कि तमाम चीजें हासिल करने के बाद भी इंसान अगर अकेला है तो वो उसकी जिंदगी अधूरी है। आप भी अपने जीवन में अकेलेपन को आने न दें।

Saturday, March 30, 2019

वक्त के अंधेरे में खोई अदाकारा


मीना कुमारी भारतीय फिल्मी दुनिया में एक ऐसा नाम है जिनकी जिंदगी के अनगिनत किस्से जुड़े हैं । उनके बचपन, उनकी किशोरावस्था से लेकर जवानी और फिर मौत तक । साठ के दशक में बॉलीवुड पर मीना कुमारी का राज चलता था । उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचाती थी । उसी तरह उनके अफसाने भी अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियां बनते थे । कमाल अमरोही से शादी फिर अलगाव और उसके बाद प्रेमियों की फेहरिश्त फिल्मी पत्रिकाओं के लिए जरूरी विषय और गॉसिप मुहैया करवाते थे । फिल्मी पत्रिकाओं में उनकी मौत के बाद तो उनके किस्से धारावाहिक के तौर पर छपते रहे हैं । मुझे याद आ रहा है कि सन 2000 में एक फिल्मी पत्रिका में एच आई पाशा ने मीना कुमारी की मौत पर धारावाहिक सत्यकथा लिखी थी, जिसमें पात्रों के नाम बदल दिए गए थे । मीना कुमारी ने अपनी जिंदगी मुफलिसी में शुरू की और जब उनकी मौत हुई तो भी अस्पताल के बिल भरने का पैसा नहीं था । बीच में उन्हें मिली शोहरत, बेशुमार दौलत, इज्जत, कई फिल्म फेयर पुरस्कार लेकिन प्यार की तलाश में भटकते भटकते उन्होंने शराब का दामन थाम लिया । यहां उन्हें सुकून तो मिला लेकिन शराब का गिलास उन्हें मौत के रास्ते पर ले गई । मौत का अफसाना भी मशहूर हो गया । जब मशहूर संपादक विनोद मेहता ने अपनी आत्मकथा लिखी थी उसमें उन्होंने 1972 में मीना कुमारी की जिंदगी पर लिखी एक किताब का जिक्र किया था । किताब उस वक्त जयको पब्लिकेशन से छपी थी लेकिन बाद में उसके संस्करण नहीं छपे और वो बाजार में अनुपलब्ध हो गई । अपनी आत्मकथा की सफलता से उत्साहित विनोद मेहता ने इस किताब को फिर से छपवाने का फैसला किया। इस किताब को लिखने की भी बेहद दिलचस्प कहानी है । मीना कुमारी की मौत मार्च 1972 में होती है जब वो अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थी । मीना कुमारी के पति कमाल अमरोही की फिल्म ‘पाकीजा’ उनकी मौत के महीने भर पहले रिलीज हुई थी । शुरुआत में फिल्म को दर्शकों का प्यार नहीं मिला और मुंबई का मराठा मंदिर सिनेमा हॉल पहले हफ्ते में ही खाली रह गया था । फिल्म रिलीज के महीने भर बाद ही मीना कुमारी की मौत हो जाती है और उसके बाद ‘पाकीजा’ ने लोकप्रियता के सारे मानकों को ध्वस्त कर दिया था । दर्शकों ने ‘पाकीजा’ देखकर मीना कुमारी को अपनी श्रद्धांजलि दी । मीना कुमारी की मौत के बाद ‘पाकीजा’ की सफलता से उत्साहित प्रकाशक ने विनोद मेहता को उनकी जीवनी लिखने का प्रस्ताव दिया । 
इस किताब में विनोद मेहता ने माई हिरोइन कहकर मीना कुमारी को संबोधित किया है और उनके कहने का अंदाज आम जीवनियों से जुदा है । मीना कुमारी के बचपन से लेकर मौत तक की कहानी को विनोद मेहता ने बेहतर तरीके से कहने की कोशिश की है लेकिन मीना कुमारी के जीवन के इतने सिरे हैं कि विनोद मेहता सबको पकड़ नहीं पाए हैं । मीना कुमारी की जीवनी धर्मेंन्द्र और गुलजार के बगैर पूरी नहीं होती है । विनोद मेहता की इस किताब में मीना कुमारी की जिंदगी के इन दो अध्याय पर सरसरी तौर पर लिखते हुए निकल गए हैं । हलांकि धर्मेन्द्र और मीना कुमारी के बारे में नहीं लिख पाने की सफाई विनोद मेहता ने नए संस्करण में दी है । उन्होंने लिखा है कि – ‘मुझे धर्मेन्द्र ने धोखा दिया जिसने मीना कुमारी का इस्तेमाल किया और फिर उसे छोड़ कर आगे बढ़ गया । धर्मेन्द्र ने मुझे कई बार मिलने का वक्त दिया लेकिन हर बार वो नहीं मिला ।‘  विनोद मेहता दूसरे संस्करण की भूमिका में यह स्वीकार करते हैं कि धर्मेन्द्र मीना कुमारी के जीवन का वो दौर है जिसके बिना उनके हिरोइन की कहानी पूरी नहीं होती है । गुलजार और मीना कुमारी के बारे में विनोद मेहता खामोश हैं और ये इस किताब की कमजोरी है । मीना कुमारी मास्टर अली बख्श और इकबाल बेगम की संतान थी और विनोद मेहता के मुताबिक उनका जन्म एक अगस्त 1932 को मुंबई के परेल अस्पताल में हुआ था । मीना कुमारी के पिता अली बख्श उर्दू में थोड़ा बहुत लिखते थे जिसकी वजह से वो मास्टर अली बख्श कहलाने लगे । वो बेहतरीन हारमोनियम भी बजाते थे । वो दौर मूक फिल्मों का दौर था और वो काम की तलाश में इस वक्त के पाकिस्तान के बहेरा से चलकर मायानगरी पहुंचे और यहां उन्होंने मूक फिल्मों के दौरान संगीत देने का काम शुरू किया । यहां आकर उन्हें महाकवि टैगोर के परिवार की लड़की प्रभावती से दिल लगा लिया । प्रभावती मूक फिल्मों के दौरान डांस किया करती थी और मास्टर हारमोनियम बजाता था । सुर ऐसे मिले कि प्रभावती इकबाल बेगम बनकर मास्टर के घर आ गई । इकबाल ने इस शादी के बाद तीन लड़कियों – खुर्शीद, महजबीन और मधु को जन्म दिया । मास्टर और इकबाल की जोड़ी यश और पैसा दोनो कमा रहे थे । फिर घर पर बीमारी का साया आया । पहले अली बख्श और फिर इकबाल बीमार पड़ी । दोनों की बीमारी की वजह से बड़ी बहन खुर्शीद पर घर चलाने के लिए पैसे कमाने की जिम्मेदारी थी लेकिन वो इतना नहीं कमा पा रही थी कि मां-बाप का इलाज भी हो और घर का खर्च भी चले । तब अली बख्श ने तय किया उनकी तीनों बेटियां फिल्मों के लिए अलग अलग तरीके का काम करेंगी । उस वक्त मीना कुमारी चार साल की थी । उनके पिता लगातार प्रोड्यूसर्स को फोन पर उसके लिए काम मांग रहे थे । इस दौर में निर्माता निर्देशक विजय भट्ट ‘लेदर फेस’ नाम की फिल्म बना रहे थे । इस फिल्म में जयराज और महताब की जोड़ी काम कर रही थी । एक छोटी बच्ची की जरूरत थी । उन्होंने मास्टर को महजबीन को लेकर आने को कहा । इस फिल्म की शूटिंग प्रकाश स्टूडियो में चल रही थी जो मास्टर के घर के सामने ही था और महजबीन वहां खेलने जाया करती थी । जब विजय भट्ट ने महजबीन को कैमरे के सामने खड़ा किया तो उसने बेहद सहजता से अपना काम निबटा दिया । इस छोटे से रोल के लिए विजय भट्ट ने मास्टर को उस वक्त 25 रुपए दिए । इसके बाद कई सालों तक महजबीन ने कई फिल्मों में बाल कलाकार की भूमिका निभाई जिनमें अधूरी कहानी, पूजा, नई रोशनी, विजया, कसौटी और गरीब प्रमुख हैं । उसी दौर में एक और बाल कलाकार बेबी मुमताज भी फिल्मों में काम कर रही थी जो बाद में मधुबाला के तौर पर प्रसिद्ध हुई । दोनों की दोस्ती छुटपन से ही थी लेकिन बाद में प्रोफेशनल प्रतिद्वंदिता और बीच के लोगों की वजह से दोस्ती कमजोर पड़ गई थी ।
उसी वक्त कमाल अमरोही को सोहराब मोदी की फिल्म जेलर के लिए एक सात साल की लड़की की तलाश थी । किसी की सलाह पर वो मास्टर के घर पहुंचे ।दिलचस्प प्रसंग है – मास्टर ने महजबीन को आवाज लगाई और जब वो बाहर आई तो उसके पूरे चेहरे में मसला हुआ केला लगा था । यहीं पहली बार कमाल अमरोही ने महजबीन को देखा । ये फिल्म महजबीन को नहीं मिली लेकिन उसकी प्रसिद्धि का दौर जारी रहा और वो विजय भट्ट के लिए काम करती रही । जैसे जैसे वो बड़ी होने लगी तो विजय भट्ट ने एक दिन उसका नाम बेबी मीना कर दिया । मास्टर अली बख्श को ये अच्छा नहीं लाग लेकिन वो उस वक्त इस हैसियत में नहीं थे कि विजय भट्ट के प्रस्ताव का विरोध कर सकें । इस तरह से महजबीन, मीना कुमारी बन गई ।
बाल कलाकार की शोहरत के साथ मीना कुमारी फिल्म की हिरोइन बनी और फिर कमाल अमरोही से प्यार हुआ । कार दुर्घटना में अस्पताल में भर्ती होने के दौरान कमाल और उसके बीच नजदीकियां बढ़ी । कमाल के लिए मीना कुमारी मंजू और मीना के लिए कमाल चंदन बन गए । प्यार इतना परवान चढ़ा कि कालांतर में दोनों ने छुपकर निकाह कर लिया । बाद में जब मास्टर को पता चला तो वो आगबबूला हुए लेकिन होनी हो चुकी थी । फिर कमाल से झगड़ा और अलगाव । अपनी हिरोइन की कहानी में विनोद मेहता ने कई जगह पर इस बात के संकेत भी दिए हैं कि बाद के दिनों में मीना कुमारी कमाल अमरोही से झूठ बोलकर कार्यक्रमों और पार्टियों में जाने लगी थी । जब कमाल को इसका पता चलता था तो जमकर झगड़ा होता था । उसके बाद कमाल लगातार मीना कुमारी की जासूसी करने लगे । उसपर शक करने लगे । एक पार्टी में मीना कुमारी दिलीप कुमार के साथ बैठे बातें कर रहे थे तो कमाल अमरोही ने वहां पहुंचकर बाधा डाली थी । फिर उनकी जिंदगी में मशहूर थप्पड़ कांड आया । मीना कुमारी की जिंदगी में शराब का प्रवेश तो दवा के तौर पर होता है लेकिन धर्मेन्द्र के आने के बाद शराब नियमित साथी हो गया । नजदीक से जानने वाले कहते हैं कि ब्रांडी से शुरुआत करनेवाली मीना कुमारी बाद के दिनों में ठर्रा भी पी लेती थी ।
जैसा कि मैंने उपर कहा कि मीना कुमारी का चित्रण या उनपर लिखना आसान काम नहीं है । 1972 में लिखी गई विनोद मेहता की इस किताब से सिर्फ मीना कुमारी के बारे में जानने की जिज्ञासा होती है । जिन परिस्थियों में 1972 में आठ महीनों में ये किताब लिखी गई थी उन परिस्थियों के आलोक में ही इस किताब को देखना होगा । मुझे याद आ रहा है कि रविवार पत्रिका दीपावली उपहार अंक में मीना कुमारी पर काफी सामग्री प्रकाशित हुई थी । संभवत: मीना कुमारी की डायरी । उसमें मीना कुमारी का दर्द और मोहब्बत के अफसाने बेहतर तरीके से उबर कर सामने आए थे ।  
(बॉलीवुड सेल्फी, वाणी प्रकाशन)

Monday, February 13, 2017

मोहब्बत की मिसाल 'पाकीजा'

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो काल से होड़ लेती हुई कालजयी हो जाती हैं । ऐसी ही एक फिल्म है ‘पाकीज़ा’ । आज से करीब साठ साल पहले यानि सत्रह जनवरी 1957 में एक फिल्म का मुहूरत हुआ था और मुहूरत के पंद्रह साल बाद 4 फरवरी 1972 में ये फिल्म रिलीज हो पाई । यह एक ऐसी ऐतिहासिक फिल्म थी जिसको लेकर फिल्मी दुनिया में कई किवदंतियां अब भी मौजूद हैं । कहा जाता है कि जब फिल्म ‘पाकीज़ा’ बनकर तैयार हो गई तो कमाल अमरोही ने फिल्म के जानकारों और समीक्षकों को यह फिल्म दिखाई । फिल्म के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया उनको मिली उससे उनका दिल टूट गया । उन्होंने जमकर शराब पी और घर लौटकर फिर शराब पीने लगे । उस दिन कमाल अमरोही ने जितनी शराब पी थी उतनी कभी नहीं पी थी । शराब के नशे में उन्होंने अपने बच्चों को पास बुलाया और कहा कि उनके मरने के बाद वो स्टूडियो और कामकाज को अच्छी तरह से संभालें । कमाल के परिवारवाले उनकी यह हालत देखकर बेहद परेशान हो गए । उन्होंने मीना कुमारी के पास जाकर कमाल की हालत बतलाई, तब मीना कुमारी उनसे अलग रहने लगी थी । जब 1964 में मीना कुमारी कमाल का घर छोड़कर बाहर निकली थीं तो उन्होंने कसम खाई थी कि उस घर में कभी नहीं जाएंगीं । लेकिन कमाल की हालत में वो उनके घर तक आई और बाहर ही गाड़ी में बैठी रहीं । उनके बच्चों से कहा कि सब ठीक हो जाएगा । जब रात ढलने लगी तो कमाल के बच्चों ने गाड़ी में बैठी मीना कुमारी को बताया कि वो सो गए हैं तो मीना कुमारी अपने घर लौट आईं । इस तरह के कई किस्से इस फिल्म से जुड़े हैं ।
दरअसल फिल्म ‘दायरा’ के फ्लॉप होने के बाद कमाल अमरोही के दिमाग में ‘पाकीज़ा’ का आइडिया आकार लेने लगा था । वो दस्तों से कहते थे कि मीना कुमारी को लेकर ऐक ऐसी फिल्म बनाना चाहते हैं जो ना केवल ऐतिहासिक हो बल्कि अपनी महबूब पत्नी की प्रतिभा को सर्वोत्तम तरीके से उभार सके । उनके करीबी बताते हैं कि कमाल साहब हमेशा कहते थे कि शाहजहां ने अपनी मोहब्बत के लिए ताजमहल बनवाया और वो अपनी मोहब्बत के लिए ‘पाकीज़ा’ बनाना चाहते हैं । ‘पाकीज़ा’ फिल्म के संवाद की हर पंक्ति इस बात की गवाही देती है कि वो मीना कुमारी को ध्यान में रखकर लिखी गई थी । फिल्म ‘पाकीजा’ को बनाते वक्त कमाल अमरोही के दिमाग में के आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ थी और वो चाहते थे कि भव्यता और विजुअल ट्रीटमेंट में ‘पाकीज़ा’ उससे आगे निकल जाए । ‘पाकीज़ा’ पहले व्लैक एंड व्हाइट में शूट होनी शुरू हुई, तकनीक बदली तो फिर से कलर फिल्म पर शूट होने लगी उसके बाद सिनेमास्कोप का जमाना आया तो उसमें शूटिंग हुई । पहले के सारे शूट रद्दी में डाल दिए गए ।
सिनेमास्कोप को लेकर भी एक दिलचस्प प्रसंग इस फिल्म से जुडा़ हुआ है । कमाल अमरोही को परफैक्शनिस्ट के तौर पर जाना जाता है । वो फिल्म के लोकेशन से लेकर हर शॉट का बेहद बारीकी से ध्यान रखते थे । जब उन्होंने पाकीजा के कलर शूट को रद्दी में डालकर सिनेमास्कोप में शूट शुरू किया तो उन्हें लगा कि सिनेमास्कोप के जिस लैंस से वो शूटिंग कर रहे थे उसका फोकस ठीक नहीं था । उस जमाने में एमजीएम नाम की विदेशी कंपनी से लैंस आता था कभी किराए पर तो कभी अन्य शर्तों पर । कमाल अमरोही उस जमाने में इस लैंस के लिए पचास हजार रुपए महीने चुका रहे थे । कमाल अमरोही ने लेंस के फोकस की त्रुटि के बारे में एमजीएम कंपनी को खत लिखा । कंपनी के नुमाइंदों ने लेंस की जांच की तो अमरोही की शिकायत सही पाई गई । बाद में उस लेंस को कंपनी ने कमाल अमरोही को उपहार के तौर पर भेंट कर दिया ।
पाकीजा को तकनीक से आधुनिक बनाने के कमाल अमरोही के जुनून के बीच उनका और मीना कुमारी के संबंध में खटास आनी शुरू हो गई थी । लोकेशन को लेकर कमाल अमरोही ने इतनी यात्राएं की कि उस वक्त ये भी कहा जाने लगा था कि इस फिल्म का नाम ‘इंडिया ट्रिप’ रख देना चाहिए । मीना कुमारी की ज्वेलरी के लिए भी उन्होंने बनारस, जयपुर और त्रिवेन्द्रम तक की यात्रा की । फिल्म के शुरू होने के सात वर्षों के बाद मार्च उन्नीस सौ चौंसठ में मीना कुमारी और कमाल अमरोही अलग हो गए । जब कमाल अमरोही और मीना कुमारी अलग हो गए तो लगा था कि ये फिल्म कभी रिलीज नहीं हो पाएगी । इस बीच इस फिल्म में काम करने वाले कई लोग इस प्रोजेक्ट से अलग हो गए तो कइयों की मौत हो गई । मीना कुमारी भी अपना इलाज करवाने विदेश गईं, लौट कर आईं लेकिन फिल्म की गाड़ी पटरी पर लौट नहीं रही थी । मीना कुमारी की बॉक्स ऑफिस पर तूती बोल रही थी । आखिरकार कमाल अमरोही ने 25 अगस्त 1968 को मीना कुमारी को एक पत्र लिखा- ‘सिर्फ पाकीज़ा की रिलीज ही बच गई है । तुमने एक शर्त रखी है कि जबतक मैं तुमको तलाक नहीं दूंगा तबतक तुम पाकीज़ा पूरी नहीं करोगी । मैं तुम्हें इस बंधन से आजाद कर दूंगा अगर तुम अपनी पाकीजा को पूरा रना चाहोगी तो मुझे खुशी होगी ।‘ अब ये इस पत्र का कमाल था या फिर कुछ और मीना कुमारी मे फिल्म में दोबारा काम करने की हामी भर दी । फिल्म पूरी हुई लेकिन बॉक्स ऑफिस पर अच्छी शुरुआत नहीं मिली । लेकिन इस बीच मीना कुमारी अस्पताल में भर्ती हो गईं और उनकी बीमारी की खबर फैलने लगी थी । 31 मार्च को उन्होंने अंतिम सांसे ली । उनकी मौत के बाद ‘पाकीज़ा’ देखने दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी थी । कहा गया कि पहले तो मीना कुमारी ने अपने पैसों से फिल्म पाकीज़ा बनाई और फिर अपनी मौत से ।