संसद के चालू सत्र में
मिजोरम से राज्यसभा सांसद रोनाल्ड सापा तलाऊ ने मिजोरम में हिंदी शिक्षकों की बदहाली
का सवाल उठाया । सांसद रोनाल्ड सापा के मुताबिक
मिजोरम में अट्ठाइस फरवरी से करीब तेरह सौ संविदा हिंदी हिंदी शिक्षक भूख हड़ताल पर
हैं क्योंकि उनको पिछले दस महीने से वेतन नहीं मिला । इसके अलावा अट्ठाइस फरवरी से
उनकी सेवा समाप्त कर दी गई है । अब अगर इसको एक समान्य खबर की तरह तो देखें तो हर राज्य
में शिक्षकों को कांट्रैक्ट पर रखा जाता है और इन शिक्षकों की सरकार से तनातनी चलती
रहती है । लेकिन मिजोरम का मसला अलग है क्योंकि
ये हिंदी के शिक्षक हैं । पूर्वोत्तर के लोगों के बीच हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने
और उनको हिंदी सिखाने के लिए इन शिक्षकों का होना आवश्यक है ।अगर मिजोरम के इतिहास
पर नजर डालें तो पिछले करीब दो दशक से ये राज्य हिंसक आंदोलन की चपेट में है । मिजो
विद्रोही लगातार हिंदी के खिलाफ ना केवल दुष्प्रचार करते रहे हैं बल्कि इनको भी अपनी
समस्याओं के जड़ में मानते रहे हैं । मिजो चरमपंथियों को लगता है कि हिंदी के प्रचार
से हिंदूओं का भी प्रचार होगा लिहाजा वो हिंदी और हिंदू को जोड़कर घृणा का वातावरण
बनाने की कोशिश करते रहे हैं । और यह कोई नई बात नहीं है हिंदी को हिन्दुत्व से जोड़ने
की कोशिशें आजाजी के बाद से ही की जाती रही हैं । रामधारी सिंह दिनकर ने राज्यसभा में
एक चर्चा के दौरान साथी सासंद फ्रेंक एंथोनी कि इस बात का कड़ा प्रतिवाद किया था कि
हिंदी हिन्दुत्व की भाषा है। उन्होंने कहा था- एक तरफ तो हिंदी को अहिन्दी भाषियों
से लड़वाने की कोशिश की गई, हम लोगों ने पैर पकड़कर स्थिति को बचाया । किन्तु अब कहा
जाता है कि हिन्दी हिन्दुत्व की भाषा है । दिनकर ने सदन में इस बात का जोरदार विरोध
किया था कि हिंदी हिन्दुत्व की भाषा है, हिन्दी सांप्रदायिकता की भाषा है । उन्होंने
कहा कि हिन्दी को उस घर में भी जाना जाता है जहां गाय की पूजा होती है और हिंदी उन
घरों में भी जाएगी जहां गाय की पूजा नहीं होती है । दिनकर जी ने हिंदी के बारे में
सारी शंकाओं को दूर करते हुए कहा था कि ‘हिन्दी संकीर्णता की नहीं बल्कि उदारता की भाषा है।
भारत जितना सहिष्णु देश हैस हिन्दी हमेशा उतनी ही सहिष्णु और उदार भाषा रही है।‘
मिजोरम का हमारा जो
समाज है या वहां के जो लोग हैं वो सांस्कृतिक तौर पर अपनी अलग पहचान रखते हैं और भारत
के मैदानी इलाके की संस्कृति से बिल्कुल अलग है । यह हिंदी ही है जो उनको देश के बाकी
हिस्सों से जोड़ने का काम करती है । हिंदी शिक्षकों की समस्या को उठानेवाले सासंद रोनाल्डो
सापा भी इस बात पर जोर देते हैं कि हिंदी को रणनीतिक रूप से मिजोरम समेत तमाम उत्तर
पूर्व के राज्यों में मजबूत करना होगा ताकि वहां के लोग शेष भारत से अपना जुड़ाव महसूस
करते रहें । अगर मिजोरम के हिंदी शिक्षकों की समस्या को इस आईने में देखा जाएगा तो
एक बिल्कुल अलहदा तस्वीर नजर आएगी और केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर फौरन इस दिशा
में सकारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है । यह बात कई बार कही जा चुकी है कि हिन्दी
भारत की एकता की भाषा है और गांधी जी इसको साबित भी किया । जब वो दक्षिण अफ्रीका से
लौटे तो यहां आते ही उन्होंने हिंदी में बोलना शुरू कर दिया और पूरे देश के लोग उनकी
बातें समझने लगे । यह तो आजादी के बाद राजनीति की प्रधानता ने हिंदी को लेकर तमाम तरह
की भ्रांतियां फैलानी शुरू की । उग्रवादियों और चरमपंथियों ने लोगों की भावनाओं को
भड़काने के लिए भी अन्य भाषाओं को हिंदी के खिलाफ खड़ा करना शुरू किया । भारत का भावना
प्रधान समाज इस साजिश को समझ नहीं पाया और उसका शिकार हो गया । अब वक्त आ गया है कि
हिंदी को देश को जोड़नेवाली भाषा के तौर पर मिल रही मान्यता को और मजबूत किया जाए और
मिजोरम जैसे गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी की स्वीकार्यता को और गाढ़ा करने का
काम किया जाए।
पिछले दो तीन साल में देशभर में हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ी है । गैर हिंदी प्रदेशों में या यों कहें कि गैर हिंदी भाषियों की ये गलतफहमी दूर होने लगी है कि हिंदी उनपर जबरन थोपी जा रही है । पूरे देश में हिंदी एक संपर्क भाषा के तौर पर धीरे-धीरे अंग्रेजी को विस्थापित करने लगी है । सूदूर दक्षिण से लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों में भी हिंदी को लेकर एक खास किस्म का अपनापन दिखाई देने लगा है । कुछ लोग अब भी हिंदी के नाम पर सियासत करने की कोशिश करते हैं जैसे अभी हाल ही में डीएमके के नेता स्टालिन ने मोदी सरकार पर तमिलनाडू पर हिंदी थोपने का आरोप लगाया । उनका आरोप है कि केंद्र सरकार तमिल भाषा का अनादर करना चाहती है और उसकी जगह हिंदी और संस्कृत को बढ़ावा देना चाहती है । दरअसल नेशनल हाइवे पर मील के पत्थरों पर हिंदी में शहरों के नाम लिखे जाने को लेकर स्टालिन खफा थे । स्टालिन ने हिंदी के विरोध में बयान देकर अरनी राजनीति को मजबूत करने की कोशिश की लेकिन इसका कुछ खास असर नहीं हुआ और विधानसभा उपचुनाव के पहले के सियासी कदम के तौर पर देखा गया । स्टालिन अपनी सुविधानुसार हिंदी का विरोध या समर्थन करते रहे हैं । पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान तमिलनाडू में कई जगहों पर डीएमके ने हिंदी में पोस्टर लगवाए थे । स्टालिन को यह बात समझ में आनी चाहिए कि भाषा, धर्म, जाति, समुदाय आदि के आधार पर राजनीति के दिन अब लदने लगे हैं । पारंपरिक राजनीति करनेवालों को भी अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ेगा ।
सिर्फ तमिलनाडू ही क्यों असम में भी हालिया विधानसभा चुनाव के पहले हिंदी भाषियों पर हमले हुए थे, उनकी हत्या तक की गई थी लेकिन अब वहां भी हालात बेहतर हैं और असम में हिंदी को लेकर गुस्सा खत्म सा होता दिख रहा है । पूर्वोत्तर के राज्यों के ज्यादातर युवाओं का मानना है कि देश की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए हिंदी सीखने की जरूरत है ।



