Translate

Showing posts with label रामधारी सिंह दिनकर. Show all posts
Showing posts with label रामधारी सिंह दिनकर. Show all posts

Friday, April 7, 2017

हिन्दी की सार्वदेशिक स्वीकार्यता

संसद के चालू सत्र में मिजोरम से राज्यसभा सांसद रोनाल्ड सापा तलाऊ ने मिजोरम में हिंदी शिक्षकों की बदहाली का सवाल उठाया ।  सांसद रोनाल्ड सापा के मुताबिक मिजोरम में अट्ठाइस फरवरी से करीब तेरह सौ संविदा हिंदी हिंदी शिक्षक भूख हड़ताल पर हैं क्योंकि उनको पिछले दस महीने से वेतन नहीं मिला । इसके अलावा अट्ठाइस फरवरी से उनकी सेवा समाप्त कर दी गई है । अब अगर इसको एक समान्य खबर की तरह तो देखें तो हर राज्य में शिक्षकों को कांट्रैक्ट पर रखा जाता है और इन शिक्षकों की सरकार से तनातनी चलती रहती है ।  लेकिन मिजोरम का मसला अलग है क्योंकि ये हिंदी के शिक्षक हैं । पूर्वोत्तर के लोगों के बीच हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने और उनको हिंदी सिखाने के लिए इन शिक्षकों का होना आवश्यक है ।अगर मिजोरम के इतिहास पर नजर डालें तो पिछले करीब दो दशक से ये राज्य हिंसक आंदोलन की चपेट में है । मिजो विद्रोही लगातार हिंदी के खिलाफ ना केवल दुष्प्रचार करते रहे हैं बल्कि इनको भी अपनी समस्याओं के जड़ में मानते रहे हैं । मिजो चरमपंथियों को लगता है कि हिंदी के प्रचार से हिंदूओं का भी प्रचार होगा लिहाजा वो हिंदी और हिंदू को जोड़कर घृणा का वातावरण बनाने की कोशिश करते रहे हैं । और यह कोई नई बात नहीं है हिंदी को हिन्दुत्व से जोड़ने की कोशिशें आजाजी के बाद से ही की जाती रही हैं । रामधारी सिंह दिनकर ने राज्यसभा में एक चर्चा के दौरान साथी सासंद फ्रेंक एंथोनी कि इस बात का कड़ा प्रतिवाद किया था कि हिंदी हिन्दुत्व की भाषा है। उन्होंने कहा था- एक तरफ तो हिंदी को अहिन्दी भाषियों से लड़वाने की कोशिश की गई, हम लोगों ने पैर पकड़कर स्थिति को बचाया । किन्तु अब कहा जाता है कि हिन्दी हिन्दुत्व की भाषा है । दिनकर ने सदन में इस बात का जोरदार विरोध किया था कि हिंदी हिन्दुत्व की भाषा है, हिन्दी सांप्रदायिकता की भाषा है । उन्होंने कहा कि हिन्दी को उस घर में भी जाना जाता है जहां गाय की पूजा होती है और हिंदी उन घरों में भी जाएगी जहां गाय की पूजा नहीं होती है । दिनकर जी ने हिंदी के बारे में सारी शंकाओं को दूर करते हुए कहा था कि ‘हिन्दी संकीर्णता की नहीं बल्कि उदारता की भाषा है। भारत जितना सहिष्णु देश हैस हिन्दी हमेशा उतनी ही सहिष्णु और उदार भाषा रही है।‘ 

मिजोरम का हमारा जो समाज है या वहां के जो लोग हैं वो सांस्कृतिक तौर पर अपनी अलग पहचान रखते हैं और भारत के मैदानी इलाके की संस्कृति से बिल्कुल अलग है । यह हिंदी ही है जो उनको देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने का काम करती है । हिंदी शिक्षकों की समस्या को उठानेवाले सासंद रोनाल्डो सापा भी इस बात पर जोर देते हैं कि हिंदी को रणनीतिक रूप से मिजोरम समेत तमाम उत्तर पूर्व के राज्यों में मजबूत करना होगा ताकि वहां के लोग शेष भारत से अपना जुड़ाव महसूस करते रहें । अगर मिजोरम के हिंदी शिक्षकों की समस्या को इस आईने में देखा जाएगा तो एक बिल्कुल अलहदा तस्वीर नजर आएगी और केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर फौरन इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है । यह बात कई बार कही जा चुकी है कि हिन्दी भारत की एकता की भाषा है और गांधी जी इसको साबित भी किया । जब वो दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो यहां आते ही उन्होंने हिंदी में बोलना शुरू कर दिया और पूरे देश के लोग उनकी बातें समझने लगे । यह तो आजादी के बाद राजनीति की प्रधानता ने हिंदी को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियां फैलानी शुरू की । उग्रवादियों और चरमपंथियों ने लोगों की भावनाओं को भड़काने के लिए भी अन्य भाषाओं को हिंदी के खिलाफ खड़ा करना शुरू किया । भारत का भावना प्रधान समाज इस साजिश को समझ नहीं पाया और उसका शिकार हो गया । अब वक्त आ गया है कि हिंदी को देश को जोड़नेवाली भाषा के तौर पर मिल रही मान्यता को और मजबूत किया जाए और मिजोरम जैसे गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी की स्वीकार्यता को और गाढ़ा करने का काम किया जाए।      
पिछले दो तीन साल में देशभर में हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ी है । गैर हिंदी प्रदेशों में या यों कहें कि गैर हिंदी भाषियों की ये गलतफहमी दूर होने लगी है कि हिंदी उनपर जबरन थोपी जा रही है । पूरे देश में हिंदी एक संपर्क भाषा के तौर पर धीरे-धीरे अंग्रेजी को विस्थापित करने लगी है । सूदूर दक्षिण से लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों में भी हिंदी को लेकर एक खास किस्म का अपनापन दिखाई देने लगा है । कुछ लोग अब भी हिंदी के नाम पर सियासत करने की कोशिश करते हैं जैसे अभी हाल ही में डीएमके के नेता स्टालिन ने मोदी सरकार पर तमिलनाडू पर हिंदी थोपने का आरोप लगाया । उनका आरोप है कि केंद्र सरकार तमिल भाषा का अनादर करना चाहती है और उसकी जगह हिंदी और संस्कृत को बढ़ावा देना चाहती है । दरअसल नेशनल हाइवे पर मील के पत्थरों पर हिंदी में शहरों के नाम लिखे जाने को लेकर स्टालिन खफा थे । स्टालिन ने हिंदी के विरोध में बयान देकर अरनी राजनीति को मजबूत करने की कोशिश की लेकिन इसका कुछ खास असर नहीं हुआ और विधानसभा उपचुनाव के पहले के सियासी कदम के तौर पर देखा गया । स्टालिन अपनी सुविधानुसार हिंदी का विरोध या समर्थन करते रहे हैं । पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान तमिलनाडू में कई जगहों पर डीएमके ने हिंदी में पोस्टर लगवाए थे । स्टालिन को यह बात समझ में आनी चाहिए कि भाषा, धर्म, जाति, समुदाय आदि के आधार पर राजनीति के दिन अब लदने लगे हैं । पारंपरिक राजनीति करनेवालों को भी अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ेगा ।  
सिर्फ तमिलनाडू ही क्यों असम में भी हालिया विधानसभा चुनाव के पहले हिंदी भाषियों पर हमले हुए थे, उनकी हत्या तक की गई थी लेकिन अब वहां भी हालात बेहतर हैं और असम में हिंदी को लेकर गुस्सा खत्म सा होता दिख रहा है । पूर्वोत्तर के राज्यों के ज्यादातर युवाओं का मानना है कि देश की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए हिंदी सीखने की जरूरत है । 

Monday, May 25, 2015

संस्कृति पर बहस हो

रामधारी सिंह दिनकर ने साफ तौर पर लिखा है – ‘साहित्य के क्षेत्र में हम न तो किसी गोयबेल्स की सत्ता मानने को तैयार हैं, जो हमसे नाजीवाद का समर्थन लिखवाए और न ही किसी स्टालिन की ही, जो हमें साम्यवाद से तटस्थ रहकर फूलने-फूलने नहीं दे सकता । हमारे लिए फरमान ना तो क्रेमलिन से आ सकता है और न आनन्द भवन से ही । अपने क्षेत्र में तो हम उन्हीं नियंत्रणों को स्वीकार करेंगे जिन्हें साहित्य की कला अनंत काल से मानती चली आ रही है ।‘  ये था दिनकर का साहस और ये थी उनकी साफगोई । ये बातें दिनकर उस वक्त कह रहे थे जब पूरा देश वामपंथ और नेहरू के रोमांटिसिज्म के प्रभाव में था ।आजादी के बाद भारतीयता और राष्ट्रवाद की बात हो रही थी तो उस वक्त दिनकर ने एक किताब संस्कृति के चार अध्याय लिखी । पहले संस्करण पर उनकी भूमिका में 5 जनवरी 1956 की तारीख हैं । इस किताब के प्रकाशन के अगले वर्ष साठ साल पूरे हो रहे हैं । इस किताब के प्रकाशन के साठ साल पूरे होने के मौके पर देशभर में साल भर तक दिनकर पर केंद्रित कार्यक्रमों की शुरुआत हो रही है । यह पहल की है पूर्व केंद्रीय मंत्री सी पी ठाकुर ने । सालभर चलनेवाले इस कार्यक्रम की शुरुआत दिल्ली के विज्ञान भवन हुई जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसका आगाज किया । रामधारी सिंह दिनकर आधुनिक हिंदी कविता के उत्तर छायावादी दौर के बेहतरीन कवि थे । उनकी कविता की खास बात यह थी कि उसका रेंज बहुत व्यापक है और एक कवि के रूप में दिनकर ने लगातार अपने आपको परिमार्जित किया । कवि के अलावा दिवकर ने गद्यलेखन भी किया । दरअसल अगर हम देखें तो नई कविता के दौर में और उसके बाद भी दिनकर जी की कविताओं को वो प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसके वो हकदार थे । साजिशन उनको सरकारी कवि के तौर पर पेश करके उनकी अनदेखी की जाती रही, खासतौर पर जब प्रगतिशीलता के बोलबाला का दौर था । लेकिन कहते हैं कि प्रतिभा और श्रेष्ठ रचना को कोई रोक नहीं सकता । बाद के दिनों में नामवर सिंह भी ये कहने को मजबूर हो गए कि कुल मिलाकार दिनकर जी का रचनात्मक व्यक्तित्व निराला की तरह है । राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हिंदी साहित्य के उन विरल रचनाकारों में से हैं जिनकी कविताओं में एक साथ राष्ट्रीयता, देशभक्ति, सामाजिकता, प्रेम, अध्यात्म सभी मौजूद है । दिनकर जी ने विपुल लेखन किया । किसी खास विचारधारा को नहीं मानने की वजह से उनके लेखन का उचित मूल्यांकन नहीं हो सका ।
दिनकर की ये किताब संस्कृति के चार अध्याय दरअसल एक बार फिर से बहस की मांग करती है । दिनकर ने अपनी इस किताब में भारत में चार क्रांतियों का जिक्र किया है । उनका मानना है देश की सांस्कृतिक क्रांति का इतिहास उन्हीं चार सांस्कृतिक क्रांतियों का इतिहास है । दिनकर के मुताबिक पहली क्रांति जब हुई जब आर्य भारत आए और उनका संपर्क आर्येतर जातियों से हुआ । दूसरी क्रांति तब हुई जब महावीर और बुद्ध ने स्थापित धर्मों के विरुद्ध विद्रोह किया और उपनिषदों की चिंताधारा को खींचकर वो अपनी दिशा में ले गए । संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर ने कहा है कि चौथी क्रांति तब हुई जब इस्लाम, विजेताओं के धर्म के रूप में भारत पहुंचा और हिंदुत्व से उसका संपर्क हुआ । चौथी क्रांति तब हुई जब भारत में यूरोप का आगमन हुआ । संस्कृति के चार अध्याय में जिस तरह से सांस्कृतिक इतिहास को कालखंडों में विभाजित कर उसको दिनकर ने लिखा है वह इतिहासकारों के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में अपने प्रकाशन के साठ साल बाद भी खड़ा है । दरअसल दिनकर जब हिंदू और मुसलमान के बीच सांस्कृति एकता और समान संस्कृति ती बात करते हैं तो यह कथित प्रगतिशील इतिहासकारों को नागवार गुजरता है लिहाजा उन्होंने इसको गंभीरता से नहीं लिया । इस किताब के प्रकाशन के छह साल के अंदर जब इसका तीसरा संस्करण प्रकाशित हुआ तो उसकी भूमिका में दिनकर ने लिखा- घटनाओं को स्थूल रूप से कोई भी देख सकता है, लेकिन, उनका अर्थ वही पकड़ता है, जिसकी कल्पना सजीव हो । इसलिए, इतिहासकार का सत्य नए अनुसंधानों से खंडित हो जाता है, लेकिन कल्पना से प्रस्तुत चित्र कभी खंडित नहीं होते । दिनकर जी खुद को इतिहासकार नहीं मानते थे बल्कि संस्कृति के चार अध्याय के बारे में तो उन्होंने लिखा- यह महल साहित्य और दर्शन का है । इतिहास की हैसियत यहां किराएदार की है । किरायेदार का आदर तो मैं करता हूं पर महल पर उसे कब्जा देने की बात मैं सोच भी नहीं सकता हूं ।‘ दिनकर जी साफ किया है कि संस्कृति के चार अध्याय इतहास नहीं है लेकिन जिस तरह से उन्होंने राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक क्रांतियों को परखा है वो पुनर्पाठ के लिए पुख्ता जमीन तैयार करती है । अपनी इस किताब में दिनकर ने भारत में हिंदू मुसलमान संबंधों को बहुत गहनता से परखा है । दिनकर ने लिखा है – भारत में एक विशेषता रही है कि वह अनेक जातियों को घोंटकर एक जाति बना देता है, अनेक धर्मों को मिलाकर एक धर्म तैयार कर देता है और अनेक संस्कृतियों के मिश्रण से एक संस्कृति पैदा कर देता है । नीग्रो, औष्ट्रिक, द्रविड़ और आर्य, कम से कम ये चार जातियां थीं, जिनके परस्पर मिश्रण और मिलन से एक महाजाति पैदा हुई जिन्हें हम हिंदू जाति कहते हैं । हिंदू कहलानेवाली संस्कृति इन चारों जातियों की संस्कृतियों के मिलन से पैदा हुईं, ... । यह समन्वित संस्कृति जब उपनिषधों के धरातल पर पहुंची तब वहां से धर्म और विचार अनेक धाराएं फूट पड़ीं, जिनमें कुछ आस्तिक थीं. कुछ नास्तिक, कुछ वेद को मानने वाली कुछ वेद को नहीं माननेवाली । यह ओक तरह की बौद्धिक अराजकता थी, एक तरह का चिंतन का कोलाहल था, जिसे बांधकर एक ओर ले चलना आसान नहीं था । इसलिए एक ही काल में आस्तिक और नास्तिक दर्शन की रचना होने लगी और सारा देश चिंतकों के तरह-तरह के विचारों से जगमगा उठा ।‘  दिनकर की इस अवधारणा के प्रकाशन के साठ साल बैद तक इसपर यथोचित ध्यान नहीं दिया गया । बजाए दिनतर की रचनाओं और अवधारणाओं पर बात करने के एक बार फिर से दिनकर को एक जाति विशेष से जो़ड़कर देखने की कोशिशें शुरू हो गई है । दिनकर के साहित्य को बगैर पढ़े लोगों ने साल भर चलनेवाले कार्यक्रमों को बिहार चुनाव से जोड़कर भूमिहार जाति को रिझाने की बीजेपी की कोशिश के तौर पर देखना और प्रचारित करना शुरू कर दिया है ।  
सवाल यही उठता है कि हमारा कथित प्रगतिशील बौद्धिक समाजज हर चीज को किसी ना किसी चश्मे से देखना शुरू कर देता है । हमारे यहां के बौद्धिक प्रगतिशीलता का आधार ही यही रहा है कि जो आपकी विचारधारा के साथ ना चले या जो आपकी विचारधारा का अनुयायी ना हो उसको बदनाम करना शुरू कर दो । बदनाम भी इस हद तक उसको साहित्य की दुनिया में अस्पृश्य कर दो । संवाद खत्म कर दो । यह इतनी बड़ी साजिश होती है कि किसी भी रचनाकार पर संवाद की प्रक्रिया ही बाधित या बंद कर दो । नतीजा यह होगा कि ना उसकी रचना पर संवाद होगा और उसकी रचनाओं की आलोचना होगी । यह खेल लंबे समय तक चला । दिनकर जी को वामपंथियों के इस खेल का भली भांति अहसास था तभी तो वो बहुधा उनपर चोट भी करते चलते थे । दिनकर ने कहा था- किसी भी कृति को मार्क्सवादी सिद्धांतों की कसौटी पर कसकर उसे क्रांतिकारी अथवा श्रेष्ठ करने की चेष्टा अयुक्तियुक्त औप अन्यायपूर्ण है । दिनकर हमेशा से समालोचना को कवित्व के बराबर मानते हैं जब वो कहते हैं कि – जो लोग यह समझते हैं कि समालोचना सीखने की चीज है वे गलती करते हैं । यह भी उसी प्रकार का जन्मजात है जैसे कवित्व । तभी को डॉ नागेन्द्र ने कहा था- यह उनके व्यक्तित्व की सजीवता का प्रमाण है कि उन्होंने किसी एक विचार पद्धति को नतशिर होकर स्वीकार नहीं कर लिया । दिनकर की साहित्य में उपेक्षा की यह बड़ी वजह है ।  

दिनकर की दो कृतियों पर हुए समारोह के बहाने से उनकी रचनाओं पर बात हो सिर्फ सरकारी समारोह की तरह रस्म अदायगी ना हो तो यह दिनकर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी । जिस तरह से दिल्ली के विज्ञान भवन में समारोह हुआ जहां प्रधानमंत्री के अलावा किसी ने भी दिनकर की रचनाओं पर बात नहीं हुई । प्रसून जोशी ने अवश्य उनकी कविताओं का सस्वर पाठ किया लेकिन उसके पहले अपनी एक कविता चिपका दी । मंच पर डॉ बिंदेश्वर पाठक और उषाकिरण खान की मौजूदगी की वजह समझ से परे हैं । मंच पर बैठे प्रधानमंत्री कई बार असहज महसूस कर रहे थे जब उनके व्यक्तित्व की तुलना दिनकर की कविता की मजबूती से की जा रही थी । धन्यवाद ज्ञापन में उनके लिए प्रयुक्त विशेषण उनको असहज कर गए । ना तो मंचासीन साहित्यकार ने संस्कृति के चार अध्याय पर कुछ कहा और ना ही परशुराम की प्रतीक्षा पर । हैरत तो साठ साल पूरे होने को स्वर्णजयंती कहने पर भी हुई । इन्हीं वजहों ने आलोचकों को अवसर दिया । आयोजकों को विचार करना चाहिए ।  

Sunday, May 17, 2015

सांस्कृतिक इतिहास लेखन पर हो बहस

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर । हिंदी साहित्य का एक ऐसा सितारा है जिसने विपुल लेखन किया । उन्हें ज्ञानपीठ समेत कई पुरस्कार मिले लेकिन किसी खास विचारधारा को नहीं मानने की वजह से उनके लेखन का उचित मूल्यांकन नहीं हो सका । दिनकर जी भारत के उन विरले साहित्यकारों में से हैं जो एक साथ गद्य और पद्य में समान अधिकार और विशिष्टता से लिखते हैं । दिनकर बहुत बेबाकी से अपनी बातें कहते थे । रामधारी सिंह दिनकर ने साफ तौर पर लिखा है – ‘साहित्य के क्षेत्र में हम न तो किसी गोयबेल्स की सत्ता मानने को तैयार हैं, जो हमसे नाजीवाद का समर्थन लिखवाए और न ही किसी स्टालिन की ही, जो हमें साम्यवाद से तटस्थ रहकर फूलने-फूलने नहीं दे सकता । हमारे लिए फरमान ना तो क्रेमलिन से आ सकता है और न आनन्द भवन से ही । अपने क्षेत्र में तो हम उन्हीं नियंत्रणों को स्वीकार करेंगे जिन्हें साहित्य की कला अनंत काल से मानती चली आ रही है ।‘  ये था दिनकर का साहस और ये थी उनकी साफगोई । ये बातें दिनकर उस वक्त कह रहे थे जब पूरा देश वामपंथ और नेहरू के रोमांटिसिज्म के प्रभाव में था । अगले साल दिनकर की किताब संस्कृति के चार अध्याय के प्रकाशन के साठ साल पूरे हो रहे हैं । पहले संस्करण पर उनकी भूमिका में 5 जनवरी 1956 की तारीख हैं । इस किताब के प्रकाशन के साठ साल पूरे होने के मौके पर देशभर में सालभर तक दिनकर पर केंद्रित कार्यक्रमों की शुरुआत हो रही है । यह पहल की है पूर्व केंद्रीय मंत्री सी पी ठाकुर ने । सालभर चलनेवाले इस कार्यक्रम की शुरुआत दिल्ली के विज्ञान भवन में होगी जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसका आगाज करेंगे ।

दिनकर की ये किताब संस्कृति के चार अध्याय दरअसल एक बार फिर से बहस की मांग करती है । दिनकर ने अपनी इस किताब में भारत में चार क्रांतियों का जिक्र किया है । उनका मानना है देश की सांस्कृतिक क्रांति का इतिहास उन्हीं चार सांस्कृतिक क्रांतियों का इतिहास है । दिनकर के मुताबिक पहली क्रांति जब हुई जब आर्य भारत आए और उनका संपर्क आर्येतर जातियों से हुआ । दूसरी क्रांति तब हुई जब महावीर और बुद्ध ने स्थापित धर्मों के विरुद्ध विद्रोह किया और उपनिषदों की चिंताधारा को खींचकर वो अपनी दिशा में ले गए । संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर ने कहा है कि चौथी क्रांति तब हुई जब इस्लाम, विजेताओं के धर्म के रूप में भारत पहुंचा और हिंदुत्व से उसका संपर्क हुआ । चौथी क्रांति तब हुई जब भारत में यूरोप का आगमन हुआ । संस्कृति के चार अध्याय में जिस तरह से सांस्कृतिक इतिहास को कालखंडों में विभाजित कर उसको दिनकर ने लिखा है वह इतिहासकारों के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में अपने प्रकाशन के साठ साल बाद भी खड़ा है । दरअसल दिनकर जब हिंदू और मुसलमान के बीच सांस्कृति एकता और समान संस्कृति ती बात करते हैं तो यह कथित प्रगतिशील इतिहासकारों को नागवार गुजरता है लिहाजा उन्होंने इसको गंभीरता से नहीं लिया । एक रणनीति के तहत दिनकर की प्रतिभा को वामपंथी लेखकों ने नजरअंदाज किया । इस किताब के प्रकाशन के छह साल के अंदर जब इसका तीसरा संस्करण प्रकाशित हुआ तो उसकी भूमिका में दिनकर ने लिखा- घटनाओं को स्थूल रूप से कोई भी देख सकता है, लेकिन, उनका अर्थ वही पकड़ता है, जिसकी कल्पना सजीव हो । इसलिए, इतिहासकार का सत्य नए अनुसंधानों से खंडित हो जाता है, लेकिन कल्पना से प्रस्तुत चित्र कभी खंडित नहीं होते । अब वक्त आ गया है कि दिनकर की रचनाओं की ओर आलोचकों का ध्यान जाए और गहराई से उसका विश्लेषण और मूल्यांकन किया जाए ।       

Saturday, June 7, 2014

हिंदी को मिले हक

आजादी के तकरीबन दो दशक पहले उन्नीस सौ अट्ठाइस के आसपास चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने लिखा था- जनता की भाषा एक और शासन की भाषा दूसरी होने से जनता संसद तथा विधानसभाओं के सदस्यों पर समुचित नियंत्रण नहीं रख सकेगी, इसलिए उचित यही है कि हम अपनी सुविधा के लोभ में आकर अंग्रेजी के लिए दुराग्रह नहीं करें । यदि अंग्रेजी शासन की भाषा बनी रही तो इससे देश का स्वराज्य अधूरा रहेगा । चक्रवर्ती राजगोपालालाचारी के इस कथन पर भारतीयों ने ध्यान नहीं दिया और कालांतर में अंग्रेजी के चाहनेवालों ने एक ऐसा माहौल पैदा किया जिसमें अन्य भारतीय भाषाएं हिंदी को अपना दुश्मन समझने लगीं । नतीजा यह हुआ कि हिंदी राजभाषा तो बनी लेकिन अंग्रेजी का दबदबा कायम रहा । जनता की भाषा और शासन की भाषा अलग रही । ना तो हिंदी को उसका हक मिला और ना ही अन्य भारतीय भाषाओं को समुचित प्रतिनिधित्व । केंद्र में नई सरकार के गठन के बाद एक बार फिर से यह उम्मीद जगी है कि हिंदी को उसका हक मिलेगा । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरफ से इस बात संकेत मिलने लगे हैं कि हिंदी को सरकार में अहमियत मिलनेवाली हैं । संसद सत्र के पहले दिन प्रधानमंत्री ने हिंदी में शपथ ली । विदेश मंत्री सुषमा स्वराज समेत कई सांसदों ने संस्कृत और हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं में शपथ ली । कई लोगों ने सांसदों और मंत्रियों के इस कदम की आलोचना की । उनकी नजर में संस्कृत में शपथ लेना पुरातनपंथी सोच का परिचायक है । विदेश मंत्री समेत कई मंत्रियों और सांसदों का संसद में संस्कृत में शपथ लेना एक प्रतीक है और इसको उसी तरह से देखा समझा जाना चाहिए । संस्कृत में शपथ लेने को कई बुद्धिजीवी हिंदुत्व से भी जोड़कर देखने की फिराक में हैं । यह सही है कि इस वक्त देश में संस्कृत एक विषय और पूजा पाठ में मंत्रोच्चार की भाषा के तौर पर प्रचारित है, लेकिन अब भी कई लोग संस्कृत में गंभीर काम कर रहे हैं । संसद में संस्कृत में शपथ लेने से हाशिए पर गई इस भाषा को जीवनी शक्ति तो नहीं मिलेगी परंतु इस भाषा में काम करनेवालों का उत्साह अवश्य बढ़ेगा । यह प्रतीक अपने भाषा से प्रेम का और अंग्रेजी के वर्चस्व पर प्रहार का भी है । इसी वर्चस्व पर प्रहार के चलते हमारे देश में अंग्रेजी के लोगों ने हिंदी के बरक्स अन्य भारतीय भाषाओं को खड़ा कर दिया था । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय की राह में अहं और जर का इतना बड़ा अवरोध खड़ा कर दिया गया कि उसको पार पाना मुश्किल हो गया । यह अनायास नहीं है कि बांग्ला भाषा के तमाम लोगों ने आजादी पूर्व हिंदी भाषा का समर्थन किया था । चाहे वो केशवचंद्र सेन की स्वामी दयानंद को सत्यार्थ प्रकाश हिंदी में लिखने की सलाह हो या बिहार में भूदेव मुखर्जी की अगुवाई में कोर्ट की भाषा हिंदी करने का आंदोलन हो । पर बात में हिंदी के बरक्श दूसरी अन्य भारतीय भाषाओं को खड़ा करने की साजिश हुई तो बंगला भाषा के लोग अपनी साहित्यक विरासत की तुलना हिंदी से करने लगे और हिंदी ने तो वह दौर भी देखा जिसमें बंगला के लोग हिंदी को हेय समझने लगे थे । जिस प्रांत के चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने हिंदी के विकास के लिए अनथक प्रयास किया वहीं के तमिल भाषी लोग अपने महाकाव्यों की दुहाई देकर हिंदी को नीचा दिखाने लगे । यह गंभीर शोध का विषय है कि क्यों और कैसे यह माहौल बना कि हिंदी दो अन्य भारतीय भाषा के लोग दुश्मन की तरह से समझने और उसी मुताबिक बर्ताव करने लगे ।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि ‘आजादी के बाद प्रत्येक के लिए अपनी मातृभाषा और सबके लिए हिंदी का माहौल बना था । किन्तु जब हिंदी विरोधियों ने यह देखा कि हिन्दीतर भाषाएं अब हिंदी के विरुद्ध भड़काई नहीं जा सकतीं, तब उन्होंने अंग्रेजी का गुणगान प्रारंभ कर दिया । अब वे यह तर्क देने लगे हैं कि अंग्रेजी को अगर हमने छोड़ दिया तो शिक्षा और शासन के क्षेत्रों में हमारी प्रगति का अवरोध हो जाएगा ।‘ इस तरह का माहौल बनते देख अंग्रेजी के खैरख्वाहों ने एक सुनियोजित साजिश के तहत यह प्रचारित किया गया कि हिंदी का वर्चस्व अगर कायम हो गया या अगर हिंदी को राष्ट्रभाषा बना दिया गया तो अन्य भारतीय भाषाएं खत्म हो जाएंगी । इस अफवाह को इतने जोर शोर से फैलाया गया कि अहिंदी भाषी प्रदेशों में हिंदी को लेकर एक दुर्भावना का भाव उत्पन्न हुआ जो कालांतर में हिंसक आंदोलन में तब्दील हो गया । अंग्रेजी के पैरोकारों की साजिश सफल रही हिंदी पूरे देश में एक संपर्क भाषा या कह सकते हैं कि राष्ट्रभाषा के तौर पर मान्यता नहीं पा सकी । युवकों के बीच में भी इस बात को फैलाया गया कि अगर वो अंग्रेजी में दक्षता प्राप्त नहीं करते हैं तो उनके लिए रोजगार के अवसर कम हो जाएंगे । 5 जुलाई 1928 को यंग इंडिया में लिखी गई गांधी की नसीहत को भुला दिया । गांधी जी ने लिखा था – हजारो नवयुवक अपना कीमती समय इस विदेशी भाषा (अंग्रेजी) को सीखने में ही नष्ट करते हैं जबकि उनके दैनिक जीवन में उनकी कोई उपयोगिता नहीं है । अंग्रेजी सीखने में ,मय लगाते हुए वो अपनी मातृभाषा की उपेक्षा करते हैं. वे इस अंधविश्वास के शिकार हो जाते हैं कि उंचे दर्जे के विचार अंग्रेजी में ही प्रकट किए जा सकते हैं । अंग्रेजी के लादे जाने से राष्ट्र की शक्ति सूख गई है । विद्यार्थी आज जनता से दूर जा पड़े हैं, शिक्षा पाना बड़े खर्चे का काम हो गया है । गांधी जी ने तब चेताया था कि अगर यही हाल रहा तो बहुत संभव है कि राष्ट्र की आत्मा का नाश हो जाए। आज ऐसा माहौल बना दिया गया है कि अंग्रेजी में दक्ष युवाओं के लिए रोजगार के ज्यादा अवसर हैं ।
शिक्षा का अधिकार तो दे दिया गया लेकिन देश में मुकम्मल शिक्षा नीति के अभाव में भाषा नीति पर बात नहीं हो पाई । हिंदी के विकास के लिए बनाई गई संस्थाएं मजा मारने का अड्डा बनती चली गई । जिनपर हिंदी के विकास और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच उसकी स्वीकार्यता बढ़ाने का दायित्व था वो छोटी छोटी चीजों में उलझे रहे । इसी वर्ष साहित्य अकादमी के एक कार्यक्रम में अकादमी पुरस्कार से नवाजे गए लेखकों से मुलाकात का मौका मिला । उनसे बातचीत के क्रम में यह बात उभर कर आई कि अबतक उनरे मन में हिंदी को लेकर एक खास किस्म की ऐसी भावना है जो सहोदर भाषा के लेखकों के मन में नहीं होनी चाहिए । इस तरह की भावना का विकास एक दिन में नहीं हुआ है । अफसोस की बात यह है कि साहित्य अकादमी या राज्य की भाषा अकादमियां भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय बनाने के काम में बुरी तरह से फ्लॉप रहीं । साहित्य अकादमी में साठ साल के बाद हिंदी भाषा का अध्यक्ष हुआ है । उनसे कई उम्मीदें हैं लेकिन साहित्य अकादमी की गतिविधियों से ऐसा कोई संकेत फिलहाल मिलता नहीं दिख रहा है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय की कोई कोशिश दिख नहीं रही है । हिंदी के विकास के लिए बनाए गए महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अब जाकर आकार ले पाया है । इस विश्वविद्यालय के साथ यह दिक्कत हुई कि शुरुआत से ही इसकी दिशा भटक गई । विश्वविद्यालय पत्रिका निकालने और किताब छापने के काम में उलझ गई । दस साल तक तो इसकी इमारत तक ढंग से नहीं बन पाई । इन सारे संस्थानों को हिंदी के विकास के लिए एक कार्ययोजना बनानी चाहिए और उसपर अमल करना चाहिए । साथ ही यह कोशिश भी होनी चाहिए कि अन्य भारतीय भाषाओं के लोगों में हिंदी को लेकर जो आशंकाएं वो दूर हों । परस्पर सहयोग और समन्वय का माहौल बने । ये संस्थाएं एक भाषा की कृति का अनुवाद दूसरी भाषा में करवाकर परस्पर विश्वास का एक माहौल बना सकती हैं । साहित्य अकादमी और नेशनल बुक ट्रस्ट ये काम कर रही हैं लेकिन इसे और व्यापक बनाना होगा । दूसरी एक बात और कि हिंदी के लोगों को भी अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों से परहेज को छोड़ना होगा । अपनी भाषा में दूसरी भाषा के शब्दों के प्रयोग को सहजता से होने देना होगा ।

अब एक बार फिर से हिंदी के पक्ष में माहौल बनता दिख रहा है । खबरों के मुताबिक देश के प्रधानमंत्री ने यह तय किया है कि वो विदेशी मेहमानों से हिंदी में ही बात करेंगे । यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में अपना भाषण देकर अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत को आगे बढ़ाते हैं या नहीं । अगर वो ऐसा करते हैं तो एक बार फिर से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में मान्यता दिलवाने की मुहिम जोर पकड़ेगी तब विदेश मंत्रालय के लिए यह तर्क देना आसान नहीं होगा कि सालाना बयासी करोड़ के खर्च की वजह से संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को मान्यता दिलवाने का काम नहीं हो पा रहा है ।

Saturday, March 8, 2014

जन्म शताब्दी के बहाने से उठे सवाल

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं – जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वे अपनी परंपराओं को भूलकर दूसरों की परंपराओं का अनुकरण करने लगती हैं...जब वे मन ही मन अपने को हीन और दूसरों को श्रेष्ठ मानकर मानसिक दासता को स्वेच्छया स्वीकार कर लेती हैं । पारस्परिक आदान प्रदान तो संस्कृतियों का स्वाभाविक धर्म है, परंतु जहां प्रवाह एकतरफा हो, वहां यही कहा जाएगा कि एक जाति दूसरी जाति की सांस्सकृतिक दासी हो रही है । किन्तु सांस्कृतिक गुलामी का इन सबसे भयानक रूप वह होता है, जब कोई जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा को अपना लेती है और उसी में तुतलाने को अपना परम गौरव मानने लगती है । यह गुलामी की पराकाष्ठा है, क्योंकि जो जाति अपनी भाषा में नहीं सोचती, वह अपनी परम्परा से छूट जाती है और उसके स्वाभिमान का प्रचंड विनाश हो जाता है । दिनकर के इस कथन में मैं यह जोड़ना चाहता हूं- जो समाज अपनी भाषा के लेखकों को याद नहीं रख सकता, जो उनका उचित सम्मान नहीं कर सकता, जो उनके लिखे को अपनी आनेवाली पीढ़ियों को हस्तगत नहीं कर सकता, जो अपने महान लेखकों की विरासत को संभाल नहीं सकता वह समाज कालांतर में साहित्यक और सांस्कृतिक रूप से पंगु हो जाता है । हमारे समाज, विशेषकर साहित्यक समाज में अपने महान लेखकों को याद करने की परंपरा धीरे धीरे खत्म होती जा रही है । लेखकों के जन्म दिवस या पुण्य तिथि पर रस्म अदायगी के लिए छोटे मोटे समारोह हो जाते हैं लेकिन हमने कभी गंभीरता से इस बात को नहीं सोचा कि आनेवाली पीढ़ियों को हिंदी समाज के बड़े लेखकों से कैसे परिचित करवाया जाए । साहित्य और संस्कृति तो खैर सरकार की प्राथमिकता में कहीं होती नहीं है । चिंता की बात यह है कि साहित्य समाज भी अपने लेखकों को लेकर उदासीन दिखता है । यह बहुत दुखद है कि आज की हमारी पीढ़ी को अपनी भाषा में बात करने में गौरव महसूस नहीं होता है बल्कि उसे अंग्रेजी में तुतलाने में परम गौरव का अनुभव होता है । हमारी शिक्षा व्यवस्था इस तरह की हो गई है कि अंग्रेजी स्कूलनुमा दुकानें हर गली मुहल्ले में खुल गई हैं जो कि बच्चों को ना तो सही से अंग्रेजी का ज्ञान दे पा रहे हैं और हिंदी तो बस पढ़ाने के लिए पढ़ाई जाती है । इस तरह से हमारा हिंदी समाज भाषाई गुलामी की ओर बढता जा रहा है ।
हम इस भाषाई गुलामी के चंगुल में जाने की पड़ताल करें तो राजनीतिक नेतृत्व की उदासीनता के अलावा हमारी भी अपने साहित्यक नायकों के प्रति उदासीनता बड़ी वजह है । कई यूरोपियन देशों में यह परंपरा है कि वहां स्कूल कॉलेजों के अलावा सड़कों और हवाई अड्डों के नाम उनकी भाषा के महान लेखकों के नाम पर रखे जाते हैं । अमेरिका में सड़कों और सरकारी इमारतों के नाम लेखकों के नाम पर हैं । भारत में तो परिवार विशेष के सदस्यों को ही यह विशेष इज्जत बख्शी जाती है । हमारे लिए बेहद अफसोस की बात है कि कोई बड़ा हवाई अड्डा किसी लेखक के नाम पर नहीं है । दिल्ली में कोई सड़क प्रेमचंद से लेकर किसी भी हिंदी के बड़े लेखक के नाम पर नहीं है । हर जगह गांधी, गांधी और गांधी । सड़कों या इमारतों का नाम किसी मशहूर शख्सियत के नाम पर रखने का यह फायदा होता है कि नई पीढ़ी उनके बारे में जानना चाहती है । वह इस बात की तफ्तीश करती है कि अमुक नाम के व्यक्ति का क्या योगदान है । इस तरह से पीढ़ी दर पीढ़ी उस व्यक्ति विशेष की प्रासंगिकता बनी रहती है । हमारे यहां राजनेताओं को यह गौरव हासिल है लेकिन साहित्यकारों को नहीं । इमारतों और सड़कों के नामकरण की तो छोड़िए साहित्यकारों की जन्म शताब्दी पर भी देश में व्यापक आयोजन नहीं होता है । जन्म शताब्दी वर्ष पर समारोह का एलान होता है लेकिन वो बस रस्म अदायगी भर होकर रह जाता है ।
इस साल हिंदी और उर्दू के मशहूर लेखक कृश्न चंदर का जन्म शताब्दी वर्ष है लेकिन अबतक कहीं भी किसी तरफ से कोई सुगबुगाहट नहीं सुनाई दे रही है । ना तो साहित्य अकादमी की तरफ से ना ही उर्दू अकादमी की तरफ से । इन दोनों अकादमियों से अपेक्षा इस वजह से ज्यादा है क्योंकि कृश्न चंदर हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में समान अधिकार से लिखते थे । कृश्न चंदर की हिंदी और उर्दू में रचनात्मक आवाजाही उन्हें एक विशिष्टता प्रदान करती है । कृश्न चंदर के जन्म को लेकर कई भ्रांतियां हैं। कहीं तो इस बात का उल्लेख है कि वो लाहौर में पैदा हुए, कहीं उनका जन्मस्थान पुंछ बताया जाता है तो किसी प्रकाशन में उनके जन्म स्थान के रूप में वजीराबाद का जिक्र है । लेकिन पिछले दिनों एक अखबार में कृश्न चंदर के छोटे भाई उपेन्द्र चोपड़ा के हवाले से खबर छपी कि उनका जन्म राजस्थान के भरतपुर में हुआ था । कृश्न चंदर के पिता डॉक्टर थे और उनके जन्म के समय वो भरतपुर इलाके में तैनात थे । जन्मस्थान चाहे भरतपुर रहा हो लेकिन कृश्नचंदर की मौत के बाद लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक व्यू प्वाइंट में उनका आखिरी खत छपा था । जिसमें कृश्न चंदर ने स्वीकार किया था कि वो लाहौरिया हैं । कृश्न चंदर ने लिखा कि उन्होंने लाहौर में शिक्षा और प्रसिद्धि दोनों पाई । अपने उस खत में कृश्न चंदर ने इस बात को भी शिद्दत से स्वीकार किया था कि लाहौर का उनके लिए वही स्थान है जो शरीर के लिए आत्मा का होता है । आजादी के बाद कृश्न चंदर लाहौर से हिंदुस्तान आ गए । बंटवारे के बाद मिली आजादी को कृश्न चंदर हमेशा से त्रासद आजादी मानते रहे और उसी के आलोक में उन्होंने कई कहानियां और रचनाएं लिखी । यह वही दौर था जब कृश्न चंदर के अलावा सआदत हसन मंटो, बलवंत सिंह, उपेन्द्र नाथ अश्क, अली सरदार जाफरी, राजेन्द सिंह बेदी और यशपाल जैसे तरक्की पसंद लेखक अपनी रचनाओं से समाज को झकझोर रहे थे । एक तरफ मंटो जहां समाज की रूढ़ियों पर चोट कर रहे थे वहीं कृश्न चंदर अपनी रचनाओं के माध्यम से दबे कुचलों और हाशिए के लोगों को वाणी दे रहे थे । उनकी स्थितियों और संघर्ष को चित्रित कर रहे थे । अपनी मशहूर कहानी कचड़ा बाबा में कृश्न चंदर ने बताया है कि किस तरह से कूड़े के ढेर के पास अपनी जिंदगी बसर करनेवाले एक शख्स को जब कूड़े के ढेर में एक लावारिस नवजात मिलता है तो उसकी जिंदगी बदल जाती है । इस कहानी में कृश्न चंदर की रचनात्मकता और उसका व्यापक फलक उभर कर सामने आता है । इसी तरह से जामुन के दरख्त कहानी में कृश्न चंदर ने लालफीताशाही और अफसरशाही को निशाने पर लिया था और बताया था कि किस तरह से वो अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं । कृश्न चंदर की कहानियों का रेंज काफी व्यापक था लेकिन सारी कहानियों में एक सूत्र था वह था समाज में फैली कुरीतियों और बुराइयों पर प्रहार । कालांतर में कृश्न चंदर ने फिल्मी दुनिया में भी अपने हाथ आजमाए और उनकी कहानियों पर कई फिल्में भी बनी । कृश्न चंदर के बीस उपन्यास, तीस कहानी संग्रह प्रकाशित हैं । अस्सी के दशक में पाकिस्तान के एक प्रकाशक ने उनकी सौ कहानियों का एक संग्रह भी प्रकाशित किया था । हिंदी में भी उनकी रचनाएं उपलब्ध हैं । हिंदी साहित्य समाज का यह दायित्व बनता है कि कृश्न चंदर के जन्म शताब्दी वर्ष में उनकी रचनाओं के बारे में नई पीढ़ी को बताया जाए । लेकिन सवाल फिर से मुंह बाए खड़ा है कि हम अपनी भाषा के लेखकों का सम्मान कब कर पाएंगे । हमें हमने लेखकों पर गुमान करना होगा तभी हम हमारी भाषा को चौतरफा हमले से बचा पाएंगे । आजादी के बाद गिरिजा कुमार माथुर ने लिखा था- आज जीत की रात पहरुए, सावधान रहना / दुश्मन है खूंखार पहरुए, सावधान रहना । हिंदी पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं उसमें हिंदी के पहरुओं को सावधान रहने की जरूरत तो है ही साथ ही आवश्यकता इस बात की भी है कि उसे हर स्तर पर हमें मजबूती देनी होगी । भाषा को मजबूती मिलेगी उसमें रचना करनेवालों को मजबूत करके।
 

Sunday, February 9, 2014

गुरु आख्यान को सम्मान

आज से तकरीबन दो दशक पहले की बात है , मुझे ठीक से याद नहीं है कि कौन सा महीना था । दि्ल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर में पत्रकारिता का कोर्स शुरू हुआ था । अपने किसी मित्र की सलाह पर मैंने भी एडमिशन फॉर्म भर दिया, प्रवेश परीक्षा में पास कर गया, इंटरव्यू का बुलावा भी आ गया । दक्षिण परिसर के हिंदी विभाग के अंतर्गत पत्रकारिता कोर्स था, लिहाजा हिंदी विभाग में सारा कामकाज होता था । साक्षात्कार उसी इमारत की पहली मंजिल के किसी कमरे में था । जब मैं कमरे में दाखिल हुआ तो वहां सात लोग बैठे थे । जिनमें से मैं नामवर सिंह और सुरेन्द्र प्रताप सिंह को जानता था । नामवर सिंह जी को दिल्ली और पटना की कई गोष्ठियों में सुन चुका था और सुरेन्द्र जी को रविवार के दिनों से जानता था । इसके अलावा इंटरव्यू बोर्ड के पांच अन्य सदस्यों को मैं नहीं जानता था । बाद में पता चला कि उनमें मनोहर श्याम जोशी, प्रभाष जोशी, जे एस यादव, विश्वनाथ त्रिपाठी और पाठ्यक्रम संयोजक निर्मला जैन थीं । ये तो अच्छा हुआ इन विभूतियों को नहीं जानता था वर्ना इतने मूर्धन्य लोगों के सामने बोल पाना मुमकिन नहीं था । मेरा इंटरव्यू चला, सामान्य ज्ञान के अलावा साहित्य पर सवाल शुरू हो गए तो फिर साक्षात्कार तकरीबन चालीस मिनट तक खिंच गया था । सभी ने सवाल दागे थे । हिंदी उपन्यासों में प्रेम पर जब बात हुई तो मैंने मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास कसप की जमकर तारीफ की । लोग एक दूसरे को देखकर मुस्कराने लगे तो मुझे उस वक्त लगा था कि कुछ गलत बोल रहा हूं । वहां बैठे एक शख्स ने कसप और गुनाहों का देवता के बारे में तुलनात्मक सवाल पूछा था । बाद में मुझे पता लगा था कि इंटरव्यू बोर्ड में मनोहर श्याम जोशी भी बैठे थे और जब मैंने कसप की तारीफ की थी तो उस वजह से सारे लोग मुस्कुरा उठे थे । गुनाहों का देवता और कसप के बारे में सवाल पूछनेवाले शख्स विश्वनाथ त्रिपाठी थे । पत्रकारिता के कोर्स में त्रिपाठी जी हमें हिंदी भाषा की प्रकृति और विकास के अलावा पत्रकारिता का इतिहास पढ़ाते थे । खैर पढ़ाई के दौरान विश्वनाथ त्रिपाठी से संवाद का काफी अवसर मिला । उनकी निश्छल हंसी और साहित्य के प्रसंगों को सुनना हमें रुचिकर लगता था । बहुधा हम दो चार मित्र उनको घेर लेते थे और फिर उनसे साहित्यक प्रसंगों को सुनाने का आग्रह करते थे । कोर्स खत्म होने के बाद हमारा संपर्क टूटता चला गया । महानगर की आपाधापी में साहित्यक गोष्ठियों में कभी कभार मिलना होता था और यदा कदा फोन पर बातचीत । मैं दक्षिण परिसर के दिनों से उनको गुरुदेव कहने लगा था । विश्वनाथ त्रिपाठी ने उन दिनों हमें कई बार कहा था कि निर्भीक होकर अपनी बात कहनी चाहिए । बातचीत में उन्होंने यह भी कहा था कि अगर तुम्हारे पास तथ्य हों तो उसे जोर देकर दबंगई से सबके सामने रखो और अगर तथ्य ना हों तो टेबल पर मुक्का मारते हुए अपनी बात कहो।
खैर उस दौर की कई यादें हैं लेकिन अभी विश्वनाथ त्रिपाठी जी की चर्चा इस वजह से कर रहा हूं कि गुरुदेव को उनकी संस्मरणात्मक पुस्तक व्योमकेश दरवेश पर तेइसवां व्यास सम्मान देने का ऐलान हुआ है । व्योमकेश दरवेश दो हजार ग्यारह में प्रकाशित हुआ था और यह किताब विश्वनाथ त्रिपाठी के गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी पर केंद्रित है । खुद लेखक ने भी इस किताब को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का पुण्य स्मरण कहा है । दो हजार ग्यारह में जब त्रिपाठी जी की यह किताब प्रकाशित हुई थी तो हिंदी जगत में इस पर व्यापक चर्चा हुई थी । आलोचकों से लेकर पाठकों तक ने इस पुस्तक को जमकर सराहा था । माना गया था कि बहुत दिनों के बाद हिंदी में कोई ऐसी किताब आई थी जिसने पाठकों और आलोचकों को अपनी ओर आकृष्ट किया । इसके पहले दो हजार चार में विश्वनाथ त्रिपाठी की अपने गांव पर लिखी संस्मरणात्मक किताब नंगातलाई का गांव भी प्रकाशित होकर लोकप्रिय हो चुकी थी । मेरा मानना है कि नंगातलाई के गांव ने विश्वनाथ त्रिपाठी को हिंदी में पर्याप्त शोहरत दी । इसके पहले विश्वनाथ त्रिपाठी एक सम्मानित शिक्षक के रूप में जाने जाते थे जिनकी आलोचना की भी कुछ किताबें प्रकाशित हुई थी । नंगातलाई के गांव के प्रकाशन के पहले त्रिपाठी जी को अकादमिक जगत से बाहर लोकप्रियता हासिल नहीं थी जो उसके प्रकाशन के बाद मिली ।  नंगातलाई के मोहक गद्य और किताब से गुजरते हुए गांव के माहौल को महसूस करता पाठक उसे सम्मोहित होकर पढ़ता चला जाता है । मैं दृढता से यह बात कह सकता हूं कि नंगातलाई का गांव से त्रिपाठी जी को शोहरत मिली और व्योमकेश दरवेश ने उनको बड़ा पुरस्कार दिलवाया । व्योमकेश दरवेश को तेइसवें व्यास सम्मान के ऐलान के वक्त के के बिरला फाउंडेशन ने कहा – यह पुस्तक अपने  विधागत रूप, भाषा शैली और शिल्प में एक अनोखापन लिए हुए है । इसमें जीवनी, संस्मरण, आत्मचरित, इतिहास और आलोचना के विभिन्न रंग किस्सागोई की तरलता में मिलकर एक ऐसा इंद्रधनुष बनाते हैं जो अपने आप में बेजोड़ है । इसमें मैं सिर्फ यह जोड़ना चाहता हूं कि इस पुस्तक में त्रिपाठी जी ने अपने गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को भी कई बार  कसौटी पर कसा है लेकिन बहुधा वो गुरू को श्रद्धाभाव से ही देखते चलते हैं ।

इस किताब में एक ऐसा प्रसंग है जो मुझे खटका था । व्योमकेश दरवेश के पहले संस्करण में पृष्ठ संख्या दो सौ चौदह पर यशपाल और साहित्य अकादमी विवाद के संदर्भ में त्रिपाठी जी लिखते हैं – यशपाल के विषय में विवाद हुआ ।कहते हैं कि दिनकर ने आपत्ति दर्ज की कि झूठा सच के लेखक ने किताब में जवाहरलाल नेहरू के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया है ।नेहरू भारत के प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ अकादमी के अध्यक्ष भी थे । नेहरू तक बात पहुंची हो या ना पहुंची हो, द्विवेदी जी पर दिनकर की धमकी का असर पड़ा होगा । भारत के सर्वाधिक लोकतांत्रिक नेता की अध्यक्षता और पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी के संयोजकत्व में यह हुआ । अगर यह सच है तो अकादमी के अध्यक्ष और हिंदी के संयोजक दोनों पर धब्बा है यह घटना और मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है । अब यहीं विश्वनाथ त्रिपाठी का दिनकर को लेकर पूर्वग्रह सामने आता है । जबकि यह पूरा प्रसंग ही इससे उलट है । डी एस राव की किताब फाइव डिकेड्स, अ शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ साहित्य अकादमी के पृष्ठ संख्या 197 पर लिखा है – एक्जीक्यूटिव बोर्ड की बैठक में नेहरू ने जानना चाहा कि यशपाल के झूठा सच को अकादमी पुरस्कार क्यों नहीं मिला तो हिंदी के संयोजक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि उसमें नेहरू जी को बुरा भला कहा गया है । नेहरू जी ने कहा कि पुरस्कार नहीं देने की ये कोई वजह नहीं होनी चाहिए । इसपर द्विवेदी जी ने जवाब दिया कि सिर्फ वही एकमात्र कारण नहीं था बल्कि और भी अन्य बेहतर किताबें पुरस्कार के लिए थी । अर्थात द्विवेदी जी ने यशपाल को साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं दिया । कालांतर में यह बात सुननियोजित तरीके से फैलाई गई कि इसके पीछे दिनकर थे लेकिन वो गलत तथ्य है । इस पूरे प्रसंग से यह साबित होता है कि विश्वनाथ त्रिपाठी या तो स्मरण दोष के शिकार हो गए या जानबूझकर दिनकर को बदनाम करने की साजिश के हिस्सा बने । अगर स्मरण दोष के शिकार हुए होते तो यह नहीं कहते- मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है । डॉ नागेन्द्र की किताब विमोचन के प्रसंग में विश्वनाथ त्रिपाठी ने आचार्य जी को कोट किया है – मंजन की बात थी ताड़ व भोज के पत्तों पर ग्रंथ लिखा जाता था । कभी किसी पत्ते को हवा उड़ा ले गई या दीमकों ने चाट लिया तो उसकी जगह पर सादा पत्ता लगा दिया जाता था । उस सादे पत्ते पर कुंडलिनी का चिन्ह बना दिया जाता था । उस कुंडलिनी चिन्ह सामग्री का मंजन होता था जिसका अभिप्राय यह है कि खोई हुई चिन्तन सामग्री की पुनरुद्भावना की जाएगी । गुरू उठ जाते थे तो शिष्य मंजन करते थे । लेकिन दिनकर के प्रसंग में त्रिपाठी जी अगले संस्करण में खुद ही सक्रियता दिखाई और मुझे बताया गया है कि दिनकर का नाम और अपने समय का सूर्य वाली लाइन हटा दी गई है । सवाल यही उठता है कि कि सादा कागज लगाने की आवश्यकता विश्वनाथ त्रिपाठी को क्यों पड़ी । खैर इस तरह के कई प्रसंग इस किताब में हैं । गुरू जी आपने ही कहा था कि निर्भीकता के साथ अपनी बात कहनी चाहिए और अगर तथ्य मजबूत हों तो दबंगई से सामने रखो । अंत में पुरस्कार के लिए आपको बधाई । आप दीर्घजीवी हों । 

Saturday, January 5, 2013

अकादमी के लिए मंथन का वक्त


अभी हाल में कोलकाता में आयोजित साइंस कांग्रेस के अधिवेशन में देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि वो विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीतने के लिए काम करें । प्रधानमंत्री के उस बयान को देश के वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती और उत्साहवर्धन दोनों के तौर पर देखा जा रहा है । लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि सृजनात्मक लेखन के लिए भारत के लेखकों को नोबेल पुरस्कार के लिए ना तो कोई चुनौती देता है और ना ही उत्साहवर्धन करता है । गाहे बगाहे ये खबर छपती हैं कि साहित्य अकादमी ने अमुक साहित्यकार का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया गया है । साहित्य अकादमी से निकलनेवाली उस खबर को इस तरह से प्रचारित किया जाता है कि अमुक साहित्यकार नोबेल पुरस्कार की रेस में है । लेकिन वो प्रचार वास्तविकता से कोसों कूर होती है । दरअसल नोबेल पुरस्कार के लिए कोई भी संगठन किसी का भी नाम प्रस्तावित कर सकता है । ठीक उसी तरह से जैसे भारत में पद्म पुरस्कारों के लिए कोई भी किसी का नाम प्रस्तावित कर सकता है ।
सवाल नोबेल पुरस्कार का नहीं है । यहां सवाल यह है कि भारत के, खासकर हिंदी के, लेखकों को अंतराष्ट्रीय पाठक वर्ग तक पहुंचाने के लिए हम कितना प्रयास कर रहे हैं । क्या हमारे लेखक, प्रकाशक, साहित्य अकादमी और राज्यों की अकादमियां इस दिशा में शिद्दत से प्रयास कर रही हैं । अगर हम इस सवाल का जवाब ढूंढने निकलते हैं तो हमें पूरे परिदृष्य में घुप्प अंधेरा नजर आता है । लेखक और प्रकाशक तो अपने तईं कोशिश करते हैं लेकिन जिस तरह से साहित्य अकादमी पर भारतीय भाषाओं के रचनात्मक लेखन को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी थी उसमें अकादमी बुरी तरह से विफल रही है । 12 मार्च 1954 को जब संसद के सेंट्रल हॉल में साहित्य अकादमी का उद्धघाटन हुआ था तो उस वक्त के उपराष्ट्रपति और विद्वान चिंतक एस राधाकृष्णन ने कहा था कि -साहित्य अकादमी ऐसे लोगों का समूह है जो सृजनात्मक और आलोचनात्नक लेखन में रुचि रखते हैं । उन्होंने आगे कहा था कि साहित्य अकादमी का उद्देश्य है कि वो सृजनात्मक लेखकों की पहचान करें और उन्हें प्रोत्साहित करे । इसके अलावा साहित्य अकादमी के अन्य उद्देश्यों में उन्होंने सृजनात्मक लेखन को बढ़ावा देने के कामों पर भी जोर दिया था । लेकिन लगभग अट्ठावन साल बाद यह सवाल जोरदजार तरीके से उठाया जाना चाहिए कि साहित्य अकादमी ने सृजनात्मक लेखन की पहचान करने और उसे आग बढ़ाने के लिए क्या किया । दरअसल साहित्य अकादमी में नब्बे के दशक के आखिरी सालों में राजनीति बुरी तरह से हावी हो गई । लेखकों के बीच की राजनीति का असर यह हुआ कि धीरे धीरे   साहित्य अकादमी सृजनात्मक लेखकों से दूर होकर विश्वविद्लाय के शिक्षकों के शिकंजे में चली गई । भारत के उन विश्वविद्लायों के शिक्षकों के कब्जे में जिन्हें राजेन्द्र यादव सृजनात्मक लेखन की कब्रगाह कहते हैं । साहित्य अकादमी के अपने उद्देश्यों के भटक जाने से सृजनात्मक लेखन का बड़ा नुकसान हुआ । साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों पर नजर डालें तो पाते हैं कि लेखकों से मिलिए जैसे कार्यक्रमों के अलावा कोई खास कार्यक्रम नहीं होते । पर्दे के पीछे और कागजों पर अगर होते होंगे तो वो जनता को ज्ञात नहीं हैं ।
दरअसल अगर हम साहित्य अकादमी की सामान्य परिषद के सदस्यों पर नजर डालेंगे तो तस्वीर आईने की तरह से साफ हो जाएगी । साहित्य अकादमी का जब गठन हुआ था तो उसके सामान्य सभा के सदस्यों में एस राधाकृष्णन, अबुल कलाम अजाद, सी राजगोपालाचारी, के एम पाणिक्कर, ए एम मुंशी, वी एन मेनन, जाकिर हुसैन, हुमांयू कबीर, सुनीति कुमार चटर्जी, उमाशंकर जोशी, जैनेन्द्र कुमार, नीलमणि फूकन, हजारी प्रसाद द्विववेदी, एम वी आयंगर, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, बनारसी दास चतुर्वेदी जैसे उदभट विव्दान थे जो खुद भी बेहतरीन सृजनात्मक लेखन कर रहे थे । लेकिन कोई भी व्यक्ति साहित्य अकादमी की बेवसाइट पर जाकर वर्तमान सदस्यों की सूची देख सकता है । स्तरीयता और स्तरहीनता का पता खुद चल जाएगा । सृजनात्मक लेखन करनेवाले वहां बहुत कम हैं । साहित्य अकादमी की कार्यशैली एक अवांतर प्रसंग है जिसपर कभी बाद में विस्तार से चर्चा होगी लेकिन सवाल यगह उठता है कि मीडियॉकर लोगों से क्या हम ये अपेक्षा कर सकते हैं कि वो देश की सृजनात्मक प्रतिभा को नोबेल पुरस्कार दिलवाने जैसी योजना पर काम कर पाएंगे, उसके लिए कोई रणनीति बना पाएंगे । जबाव ना में ही मिलेगा । राज्यों की अकादमियों का हाल तो और भी बुरा है । राज्यों की भाषा और साहित्य की अकादमियां वहां की सरकारों के लिए प्रचार प्रसार के काम में जुड़ी हैं ।
अब बचते हैं प्रकाशक जिनसे उम्मीद की जा सकती है कि वो देश में सृजनात्मक लेखकीय प्रतिभा को सामने लाने का काम करेंगे । हाल के दिनों में हिंदी के कम से कम तीन प्रकाशकों ने इस दिशा में काम करना शुरू किया है जो संतोष देने के लिए तो काफी है । वाणी प्रकाशन, राजकमल प्रकाशन और प्रभात प्रकाशन ने हिंदी के लेखकों की किताबों को अंग्रेजी में छापना शुरू कर दिया है । इससे एक फायदा तो यह होगा कि हिंदी के लेखकों की कृतियां उस भाषा में उपलब्ध होंगी जो पूरे विश्व में एक संपर्क भाषा के तौर पर इस्तेमाल की जाती है । अभी हाल में वाणी प्रकाशन से राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कृति – कुरुक्षेत्र का अंग्रेजी में अनुवाद छपा है – द बैटल रॉयल – इस काम को अंजाम दिया है डॉक्टर सचिकांत और डॉक्टर रमन पी सिंह ने । अब अगर हम देखें तो दिनकर का ये प्रबंध काव्य कुरुक्षेत्र आज से तकरीबन छियासठ साल पहले 1946 में प्रकाशित हुआ था लेकिन उसके अनुवाद का काम छह दशक बाद हुआ । जिस वक्त दिनकर जी इस काव्य की रचना कर रहे थे वह वक्त युद्ध और उसके बाद की शांति का था । उनके काव्य में युद्ध और शांति समान रूप से चलते जाते हैं । उसमें वो अपने समय से पहले की बात भी करते हैं और उसे सार्वजनिक भी करते चलते हैं । दिनकर या यह प्रबंध काव्य अगर उस वक्त या बाद के दस बीस वर्षों में भी अंग्रेजी में अनुदित होकर दुनिया के पाठकों के बीच जाता तो विश्व के उस वक्त के माहौल में उक्त कृति का मूल्यांकन होता लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं सका । ऐसा नहीं है कि सिर्फ रामधारी सिंह दिनकर ही बेहतरीन कवि हैं, हिंदी में कई ऐसे कवि हुए हैं जिनकी कृतियां नोबेल पुरस्कार के योग्य हैं । क्या अज्ञेय और निर्मल वर्मा की कृतियां ओरहन पामुक या फिर फ्रेडरिक येलेनिक से कमजोर हैं । कतई नहीं । यहां सवाल यह है कि जिस तरह से ओरहन पामुक की कृतियां अग्रेजी समेत विश्व की अन्य भाषाओं में प्रकाशित हुई उससे उन कृतियों को एक विशाल पाठक वर्ग मिला और उसकी चर्चा कई देशों के अखबारों में हुई । नतीजा यह हुआ कि उनकी कृतियों के पक्ष में एक माहौल बना जो बाद में उनके नोबेल पुरस्कार का आधार बना । लेकिन हमारे यहां जिनके कंधों पर साहित्यक कृतियों के प्रचार प्रसार और पाठकों के बीच पहुंचाने की जिम्मेदारी है वो बेहद छोटे कामों में उलझे हैं । मैं कई ऐसे लेखकों को व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं जिन्होंने साहित्य अकादमी को अहम पुस्तकों का अनुवाद कर दे दिया लेकिन पांच छह वर्षों बाद भी वहां यह बतानेवाला कोई नहीं है कि उन पुस्तकों का प्रकाशन कब होगा । दरअसल यहां भी एक भयंकर भूल है कि साहित्य अकादमी खुद से किताबों का प्रकाशन करेगा । यह काम प्रकाशकों के जिम्मे छोड़ देना चाहिए । होना यह चाहिए कि अकादमी पुस्तकों का अनुवाद करवाए और प्रकाशकों पर उसे छापने की जिम्मेदारी दे । अब वक्त आ गया है कि साहित्य अकादमी अपने क्रियाकलापों को बदले और उसका जो मूल उद्देश्य था उसके लिए काम करे और छोटे छोटे कामों में ना उलझे ।
इसके अलावा हिंदी के प्रकाशकों को अपनी भाषा के क्लासिक्स को ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी में अनुवाद करवाना चाहिए और अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में भागीदारी के दौरान उसको शोकेस करना चाहिए । इसमें लेखक की तो प्रतिष्ठा बढे़गी ही, नया पाछक वर्ग भी मिलेगा।  लेकिन अगर हमारे किसी लेखक को कोई अंतराष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया तो किताब की भी जबरदस्त बिक्री होगी और अंतत: उनका लाभ प्रकाशकों को ही होगा । पश्चिम में इस तरह की प्रवृत्ति है आम है कि वहां पुरस्कृत कृतियों को पाठक हाथों हाथ लेते हैं । और कारोबार के नजरिए से भी इस तरह के काम करना प्रकाशकों के लिए फायदे का सौदा रहेगा । भारतीय लेखकों को अंतराष्ट्रीय मंच पर पहुंचाने में जहां साहित्य अकादमी विफल रही है वहां से प्रकाशकों की जिम्मेदारी शुरू होती है ।