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Monday, September 22, 2025

सितंबर के सितारे


हमारे यहां विभिन्न कलाओं का कैनवस इतना बड़ा है कि वर्ष के हर महीने में इन कलाओं से जुड़े कलाकारों की जन्मतिथि या जयंती उनके स्मरण का अवसर देती हैं। भारतीय फिल्मों का इतिहास सौ वर्षों से अधिक का हो गया है। कई कलाकारों ने भारतीय फिल्मों में अपने हुनर से उसको समृद्ध किया। हर महीने इन कलाकारों में से कइयों से जुड़ी घटनाएं, फिल्में, फिल्मों में उनके गाए गानों आदि की चर्चा होती है पर सितंबर एक ऐसा महीना है जिसमें कई दिग्गज कलाकारों की जन्म तिथि पड़ती है। भारत रत्न लता मंगेशकर से लेकर रणबीर कपूर तक कई कलाकारों का जन्म सितंबर में हुआ। लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर को हुआ। लता मंगेशकर बनने के लिए उन्होंने कई सालों की तपस्या की। मुंबई (तब बांबे) के नाना चौक इलाके के दो कमरे के छोटे से फ्लैट में मां और भाई बहनों के साथ रहते हुए लता मंगेशकर ने न दिन देखा और न रात, बस एक ही सपना देखा कि कैसे अपनी गायकी को बेहतर करना है। लता मंगेशकर कोई भी गाना गातीं तो अपने पिता मास्टर दीनानाथ मंगेशकर की दी सीख याद रखतीं। पिता ने कहा था ‘गाते समय हमेशा ये सोचना कि तुमको अपने पिता या गुरु से बेहतर गाना है।‘ लता ने इसको अपने जीवन में उतार लिया। अपनी गायिकी से वो उस ऊंचाई पर पहुंच गई जहां पहुंच पाना किसी के लिए आसान नहीं। लता मंगेशकर की छोटी बहन आशा भोंसले का जन्म आठ सितंबर को हुआ था। लता मंगेशकर की लोकप्रियता के बीच हिंदी फिल्मों की दुनिया में एक ऐसी आवाज आई जिसे संगीतकार राहुल देब बर्मन के हुनर ने वो ऊंचाई दे दी जो लंबे समय तक बनी रही। फिल्म तीसरी मंजिल में आशा भोंसले और मोहम्मद रफी के गाए युगल गीत अमर हो गए। ओ मेरे सोना रे सोना हो या ऐ हसीना जुल्फों वाली हो या आ जा आ जा मैं हूं प्यार तेरा को याद करिए, आज भी वेलेंटाइन डे पर तीसरी मंजिल फिल्म के ये गीत अवश्य बजते हैं।

गीतों से अगर अभिनय की ओर बढ़ें तो सदाबहार अभिनेता देवानंद का जन्म 26 सितंबर को हुआ। देवानंद का सपना था कि वो प्रसिद्ध हों, इसलिए उन्होंने फिल्मों का रास्ता चुना। बांबे आए, लेकिन फिल्मों में काम नहीं मिल पा रहा था। मिलिट्री सेंसर आफिस में नौकरी की। फिर प्रभात स्टूडियो की एक फिल्म हम एक हैं में काम मिला। फिल्म चली नहीं तो संघर्ष और बढ़ गया। इस फिल्म के दौरान उनकी दोस्ती कोरियोग्राफर गुरु दत्त से हो गई थी। एक दिन अचानक ट्रेन में उनकी मुलाकात अशोक कुमार से हुई। देवानंद ने उनसे फिल्मों में काम मांगा। अशोक कुमार ने देवानंद को बांबे टाकीज बुलाया। वहां निर्देशक शाहिद लतीफ ने देवानंद को ये खारिज कर दिया, कहा कि वो चाकलेटी दिखते हैं। अशोक कुमार अड़े रहे। देवानंद को फिल्म जिद्दी फिल्म में काम मिला। उसके बाद की कहानी इतिहास में दर्ज है। एक समय राज कपूर, देवानंद और दिलीप कुमार हिंदी फिल्मों पर राज करते थे। इसी दौर में देवानंद की दोस्ती किशोर कुमार हुई जो आजीवन चलती रही। हाल में हिंदी फिल्मों में पचास वर्ष पूर्ण करनेवाली शबाना आजमी भी सितंबर में ही पैदा हुईं। कपूर खानदान के दो सितारों, रणबीर और करीना कपूर का जन्म भी सितंबर में हुआ। रणबीर कम फिल्में करते हैं लेकिन दर्शकों को अपने अभिनय का कायल बना लेते हैं। करीना भी एक समय हिंदी फिल्मों में टाप की अभिनेत्री बन गई थीं। इन दिनों वो अलग तरह के रोल में नजर आ रही हैं। अभिनेता अक्षय कुमार भी सितंबर में ही जन्मे। दिल्ली से मुंबई जाकर अक्षय ने फिल्मी दुनिया में अपना एक अलग स्थान बनाया। जब हिंदी फिल्मों में तीन खान अभिनेतों का डंका बज रहा था तो उसके बीच अक्षय कुमार की फिल्मों की सफलता ने उनको सुपरस्टार बना दिया। अक्षय ने एक्शन से लेकर कामेडी फिल्मों में काम किया जो दर्शकों को खूब भाया।

अभिनेताओं के बाद अगर हम बात करें दो फिल्म निर्देशकों हर्षिकेश मुखर्जी और यश चोपड़ा भी सितंबर में ही जन्मे थे। आज दोनों हमारे बीच नहीं हैं लेकिन इन दोनों ने हिंदी फिल्मों के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी। बिमल राय जब कलकत्ता (अब कोलकाता) से बांबे आए तो उनके साथ चार अन्य युवा भी मुंबई पहुंचे उनमें से ह्रषिकेश मुखर्जी एक थे। बिमल राय के सहायक के तौर पर हिंदी फिल्मों में आए ह्रषिकेश मुखर्जी ने एक से एक श्रेष्ठ और लोकप्रिय फिल्में बनाईं। उनकी निर्देशित फिल्म आनंद ने अमिताभ बच्चन के अभिनय के नए आयाम से दर्शकों का परिचय करवाया। गोलमाल और मिली जैसी फिल्में मुखर्जी की फिल्म कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। लतो मंगेशकर ने कहा भी था कि वी शांताराम, गुरुदत्त और बिमल राय की परंपरा को ह्रषिकेश मुखर्जी ने आगे बढ़ाया। सितंबर के एक और सितारे हैं यश चोपड़ा। यश चोपड़ा ने अमिताभ बच्चन की फिल्म दीवार का निर्देशन किया जहां से एंग्री यंग मैन का युग आरंभ होता है। लेकिन यश चोपड़ा एक प्रयोगधर्मी निर्देशक थे। एंग्री यंग मैन को गढ़ने के बाद उन्होंने जब सिलसिला या चांदनी बनाई तो उसमें प्यार का एक अलग ही रूप दर्शकों को देखने को मिला। यश चोपड़ा ने एक्शन फिल्में की तो उसमें भी अपनी छाप छोड़ी और जब रोमांस और लवस्टोरी को विय बनाया तो दर्शकों को भी उनकी फिल्म से प्यार हो गया। सितंबर के इन सितारों में कुछ तो है जो इनको विशेष बनाती है। 

Saturday, January 16, 2021

जिंदगी नाम है कुछ लम्हों का


उर्दू के मशहूर शायर और गीतकार कैफी आजमी का हैदराबाद, औरंगाबाद और मुंबई से खास रिश्ता है। उनके जीवन में प्रेम का प्रवेश हैदराबाद में होता है, परवान औरंगबाद में चढ़ता है और अंजाम तक मुंबई में पहुंचता है। किस्सा कुछ यूं है कि हैदराबाद में एक मुशायरा हो रहा था। इस मुशायरे में कैफी आजमी, मजरूह सुल्तानपुरी और सरदार जाफरी जैसे शायर शामिल थे। श्रोताओं में पहली पंक्ति में सफेद कुर्ता, सफेद शलवार और इंद्रधनुषी दुपट्टा पहने एक बेहद खूबसूरत युवती बैठी थी। मुशायरा खत्म हुआ तो वहां उपस्थित लड़कियों ने ऑटोग्राफ के लिए कैफी को घेर लिया लेकिन सफेद कपड़ों वाली वो हसीन लड़की सरदार जाफरी की ओर गई और उनका ऑटोग्राफ लिया। बाद में वो कैफी के पास पहुंची तो उन्होंने अपने ऑटोग्राफ के साथ एक बेहद अजीबोगरीब शेर लिख दिया। जब वो बाहर निकल रहे थे तो उस युवती ने कैफी से पूछा कि उनकी कॉपी पर इतना खराब शेर क्यों लिखा ? कैफी ने फौरन कहा कि आप भी तो पहले सरदार जाफरी के पास गईं थीं। इतना सुनते ही वो युवती हंसी और कहते हैं कि दोनों के बीच प्यार की शुरुआत यहीं से होती है। वो युवती शौकत थीं। दिन बीते दोनों के बीच प्यार बढ़ता गया। 

दोनों ने अपने प्यार का इजहार भी बेहद रूमानी अंदाज में किया। हैदराबाद के मुशायरे के बाद कैफी, मजरूह और सरदार जाफरी औरंगबाद आ गए। ये लोग शौकत के पिता के मेहमान बने और उनके घर पर ही रुके। एक दिन शौकत और कैफी एक कमरे में बैठे बातें कर रहे थे। शादी विवाह की बातें होने लगीं तो अचानक शौकत ने कहा कि वो उनका हाथ देखना चाहती हैं। शौकत के हाथ में कैफी का हाथ था और वो उनकी लकीरें देख रही थीं। देखते देखते शौकत ने कहा कि आपकी किस्मत में तो प्रेम विवाह लिखा है। फिर शौकत ने अनूठे अंदाज में प्रपोज कर दिया। एक कागज पर लिखा- ‘जिंदगी के सफर में अगर तुम मेरे हमसफर होते तो यह जिंदगी इस तरह जैसे फूलों पर से नसीमे-सहर’। लिखने के बाद उन्होंने ये कागज का टुकड़ा कैफी को दिया। कैफी ने इसको पढ़ा और शौकत की आंखों में आंख डालकर कहा, ‘मेरी जिंदगी की किस्मत इन्हीं आंखों में है’। 

शौकत और कैफी के बीच प्यार अब परवान चढ़ने लग गया था। लेकिन शौकत की मां इसके पक्ष में नहीं थीं। परिवार ने शौकत पर काफी पाबंदियां लगाईं लेकिन प्रेम पत्रों को रोका नहीं जा सका। शौकत के पिता अपनी बेटी के साथ थे और वो अपनी बेटी को लेकर कैफी से मिलने मुंबई पहुंचे। शौकत जब कैफी से शादी के अपने फैसले पर डटी रही तो उन्होंने सज्जाद जहीर से दोनों की शादी करवाने का अनुरोध किया। तय दिन पर सज्जाद जहीर के घर पर शौकत और कैफी के घर दोनों का निकाह हो गया। निकाह के दौरान भी एक दिलचस्प प्रसंग हुआ। जब काजी ने शौकत से पुछवाया कि उनको अतहर हुसैन रिजवी से निकाह कुबूल है तब शौकत को उनका असली नाम पता चला। लेकिन पेंच तो ये फंसा कि दूल्हा शिया और दुल्हन सुन्नी। ऐसे में तो दो काजी निकाह करवा सकते हैं। अब सब एक दूसरे का मुंह ताकें कि दूसरे काजी का इंतजाम कहां से हो। खैर किसी तरह से सज्जाद जहीर ने मामला निबटाया और निकाह संपन्न हुआ। इस शादी में इस्मत आपा, मजाज,जोश मलीहाबाद, अशफाक बेग, मेहंदी, मुनीष सक्सेना आदि शामिल हुए। शौकत और कैफी की शादी के बाद महफिल जमी तो जोश और मजाज ने जमकर शायरी सुनाई। ये महफिल चल ही रही थी कि अचानक मुनीष और मेहंदी को शरारत सूझी और उन्होंने जोश साहब से कहा कि ‘हैदराबाद में एक रिवाज है कि निकाह वाले दिन दूल्हे के पिता के सर पर सुनहरा पाउडर मला जाता है, और अभी तो आप ही कैफी के पिता हैं। जोश साहब तैयार हो गए और सबने जोश के गंजे सर पर जमकर पाउडर लगाया। तब जोश साहब की महबूबा ने शौकत को मुंहदेखाई के तौर पर दो रुपए दिए थे। कैफी ने अपनी पत्नी को शादी के बाद पहला तोहफा एक किताब दिया था, जिसका नाम था ‘इंसान का उरूज’। इस अनूठी प्रेम कहानी में कई ऐसे लम्हे हैं जो बेहद दिलचस्प हैं, खुद शौकत कैफी ने इन लम्हों को अपने संस्मरणों में कलमबद्ध किया है। 

Saturday, November 3, 2018

सांस्कृतिक मंच से सियासत


हाल ही में भारतीय जन नाट्य संघ यानि इप्टा का प्लैटिनम जुबली समारोह पटना में मनाया गया। हर संस्था अपनी स्थापना के महत्वपूर्ण पड़ावों पर समारोहों का आयोजन करती है। भारतीय जन नाट्य संघ ने भी किया। आजादी के पहले स्थापित इस संस्था का उद्देश्य नाटकों के माध्यम से सांस्कृतिक जागरण फैलाना था। ये संस्था शुरू से ही वामपंथी विचारकों द्वारा स्थापित थी और कम्युनिस्ट पार्टी की सांस्कृतिक ईकाई के रूप में काम करती रही है। इसी स्थापना के संकेत प्रगतिशील लेखक संघ की 1936 में हुई बैठक में ही मिलने लगे थे और सात साल बाद स्थापना हो गई। आजादी मिलने के बाद भारतीय जन नाट्य संघ ने अपने नाटकों के माध्यम से जमकर वामपंथी विचारधारा का प्रचार किया, लेखन और मंचन दोनों में। वामपंथी और कांग्रेसी सरकारों की छत्रछाया में ये संगठऩ खूब फले फूले भी, लेकिन जब वामपंथी विचारधारा धीरे-धीरे एक्सपोज होने लगी तो इस तरह के संगठनों की ताकत भी कम होती चली गई। ये संगठन अपने मातृ संगठनों के लिए काम करते रहे। प्रगतिशील लेखक संघ से लेकर जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच जैसे संगठन किसी भी फैसले के लिए अपने राजनीतिक आका का मुंह जोहते रहे। उनके निर्देशों के पालन में साहित्य और संस्कृति को ढाल बनाकर राजनीति करते रहे। इस तरह के सैकड़ों वाकए हैं जब इन संगठनों ने साहित्य कला और संस्कृति को ढाल बनाकर राजनीति की। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद असहिष्णुता की मुहिम हो या पुरस्कार वापसी का अभियान हो, इन सबके पीछे यही मानसिकता काम करती रही। ये उस सुविधापरक राजनीति का अंग है कि जिसके तहत वो लेखक जो अशोक वाजपेयी को कल्चरल माफिया और भारत भवन को अजायबघर कहते नहीं थकते थे वो सभी आज अशोक वाजपेयी और रजा फाउंडेशन के झंडे तले एकजुट नजर आते हैं। यह उसी सुविधाजनक राजनीति का हिस्सा है जो एम एफ हुसैन पर हमले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखता है और दूसरी तरफ तस्लीमा नसरीन पर हमला होता है तो खामोशी छा जाती है। इस तरह के इतने उदाहरण हैं कि एक पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। संस्कृति के नाम पर राजनीति करना कोई इनसे सीखे।
हम बात कर रहे थे पटना में आयोजित जन नाट्य संघ के समारोह की जिसमें एक बार फिर से जमकर राजनीति हुई। नाटकों की आड़ में राजनीति का ये बेहतर नमूना है। इसके उद्घाटन सत्र में मंच पर बैठे वक्ताओं की सूची से ही पता चल जाता है कि आयोजकों की मंशा क्या रही होगी। शबाना आजामी, एम के रैना. जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी। शबाना आजमी, एम के रैना की बात तो समझ में आती है कि वो रंगकर्म से जुड़े हुए लोग हैं। कन्हैया ने भी ये बताया कि वो बचपन में अपने गांव में इप्टा में सक्रिय थे । उन्होंने स्वीकार किया कि वो अपने गांव में इप्टा में सक्रिय न होते तो उनमें ये चेतना भी न आयी होती। उन्होंने आगे स्वीकार किया वो जो 'आज़ादी ' का गाना गाते हैं वो भी इप्टा  का ही है।  उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस वक्त देश में बहुत सारे ऐसे स्टैंडअप कॉमेडियन हैं जो इप्टा जैसे किसी संगठन से नहीं जुड़े हैं लेकिन उनके कंटेंट उतने प्रगतिशील हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को साथ जोड़ने की वकालत भी की। वो उस तरह के स्टैंड अप कॉमेडियंस की बात कर रहे थे जो मंच पर खड़े होकर नरेन्द्र मोदी का मजाक उड़ाते हैं। प्रगतिशीलता की पहली शर्त ही नरेन्द्र मोदी की आलोचना या उनका मजाक उड़ाना है। ये ठीक भी है क्योंकि कन्हैया कुमार तो राजनीति कर रहे हैं और उनके इरादे बिहार के बेगूसराय लोकसभा चुनाव से निर्वाचित होने की भी है। उसके लिए वो तैयारी भी कर रहे हैं। एक चतुर राजनेता की तरह वो इप्टा के मंच का इस्तेमाल भी करते हैं। उनको मालूम है कि सूबे की राजधानी में आयोजन हो और उसमें मौजूदा केंद्रीय हुकूमत पर हमला बोला जाए तो मीडिया में जगह मिलेगी ही।
अगर ये मान भी लिया जाए कि कन्हैया का रंगकर्म से कोई लेना देना है लेकिन यह मानना मुश्किल है कि जिग्नेश मेवाणी का नाटक से कोई लेना देना है। जिग्नेश गुजरात से निर्दलीय विधायक हैं जिनको कांग्रेस का समर्थन है। जिग्नेश ने इप्टा के मंच से राजनीतिक भाषण दिया और कहा कि संगठन को सिर्फ लाल और नीले रंग की चिंता नहीं करनी चाहिए बल्कि सभी रंगों का ख्याल रखना चाहिए। रंगों की बात इस वजह से चली कि शबाना ने अपने भाषण में भी रंग से बात शुरू की थी। शबाना ने कहा था कि जब वो छोटी थी तो अपने पिता कैफ़ी आज़मी साहब उनको मदनपुरा के मज़दूरों के रैली में ले जाते थे। जब दुनिया में आँखे खोलीं तो सबसे पहले   लाल रंग ही देखी। उनका मानना है कि लाल रंग लोगों को जोड़ने के काम आता है। उन्होंने लाल रंग की महत्ता स्थापित करने के बाद कहा कि आज लड़ाई धर्म और मज़हब की नहीं बल्कि विचारधारा की है। उन्होंने बेहद चतुराई के साथ कहा कि वो एक महिला हैं, बेटी हैं, पत्नी हैं, फिल्म अभिनेत्री हैं, सामाजिक कार्यकर्ता हैं, और एक मुस्लिम भी हैं। जोर देकर कहा कि मुस्लिम शब्द आते ही उनकी सारी पहचान गौण हो जाती हैं और सिर्फ मुस्लिम के तौर पर पहचान बच जाती है। अब हमें इश बात पर विचार करना चाहिए कि ये भाषण एक सांस्कृतिक संगठन के मंच से हो रहा था। शबाना आजामी प्रकारांतर से राजनीति कर रही थी जिसको जिग्नेश मेवाणी जैसे नेता आगे बढ़ा रहे थे।
अगर हम देखें तो इप्टा के प्लैटिनम जुबली समारोह को राजनीति का मंच बना दिया गया। इस आयोजन का जिम्मा भारतीय जन नाट्य संघ की पटना ईकाई के जिम्मे था और इसके मुख्य पदाधिकारी लंबे समय तक राष्ट्रीय जनता दल के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के मुखिया रहे हैं। साफ है कि उनकी प्रतिबद्धता किस ओर है। इप्टा का ये आयोजन विपक्ष की राजनीति को मजबूत करने के लिए किया गया प्रतीत होता है। जिसमें अमूमन सभी वक्ताओं ने केंद्र सरकार की नीतियों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। हद तो तब हो गई थी कि जब कांग्रेस के नेता शकील अहमद खान भी मंच पर पहुंचे और उन्होंने वहां से लगभग राजनीतिक भाषण दिया। कुछ लोगों का कहना है कि शकील अहमद खान ने कहा कि अब इस तरह के कार्यक्रम उन जगहों पर करने चाहिए जहां वक्ताओ की ऊंची आवाज को सुनने में दिक्कत ना हो।  दरअसल हुआ ये था कि आयोजन में मंचन और भाषण के दौरान तेज आवाज की वजह से पड़ोसियों को दिक्कत हो रही थी और पुलिस ने हस्तक्षेप की वजह से कार्यक्रम को मैदान से हटाकर हॉल में करना पड़ा था। वाम दलों के अलावा इस जुटान में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के नेता भी पहुंचे थे और मंचासीन भी हुए थे। इप्टा से ज्यादा ये समारोह विपक्षी दलों का सम्मेलन बन गया था।
बिहार की भूमि इस तरह की राजनीति को लेकर हमेशा से उर्वर रही है। पाठकों को याद होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले भी वामपंथियों ने इसी तरह से असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी का मुद्दा उठाया था। नीतीश कुमार की जीत के बाद उनमें से कइयों को पुरस्कृत भी किया गया। वामपंथियों की नीतीश कुमार से दिल्ली में मुलाकात भी हुई थी जिसमें ये तय किया गया था कि बुद्धिजीवियों के बीच नीतीश की छवि बनाने के लिए काम किया जाएगा। इस काम का टेंडर हो गया था,लेकिन ठेकेदारी शुरू हो पाती इसके पहले नीतीश कुमार ने ही महागठबंधन को छोड़ दिया। इसके बाद इस योजना पर पानी फिर गया। अब एक बार फिर से वामपंथियों ने अपने सांस्कृतिक संगठन के माध्यम से राजनीति की बिसात बिछानी शुरू कर दी है जिससे की लोसकभा चुनाव के पहले मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जा सके। वाम दलों का तो कांग्रेस के साथ बने रहने का इतिहास रहा है, उन्होंने तो इमरजेंसी तक का समर्थन किया था। इसका उनको इनाम भी मिला था और इंदिरा गांधी ने देश के कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े सरकारी, गैर सरकारी और स्वयत्त संगठनों की कमान वामपंथियों को सौंप दी थी। पिछले चार साढे चार सालों में ये व्यवस्था बाधित हुई जिसका सबसे बड़ा असर कम्युनिस्टों पर ही पड़ा। लोकसभा चुनाव में उनको संभावना नजर आ रही है कि किसी तरह से भारतीय जनता पार्टी हारे और वो लोग एक बार फिर से सांस्कृतिक सत्ता की मलाई खा सकें। इनको ये नहीं भूलना चाहिए कि इसके लिए जनता का भरोसा जीतना होता है।   

Saturday, December 2, 2017

विवाद उछालने की नीयत !

अपने एक लेख में मशहूर सांस्कृतिक इतिहासकार लोटमान ने लिखा है कि – चिन्हों और प्रतीकों के जरिए संप्रेषण मानवता की सबसे बड़ी उपलब्धि है लेकिन इसती भी नियति तकनीकी सुधार की तरह ही है। जैसे प्राय: सभी तकनीकी सुधार एक प्रकार से दुधारी तलवार होती है जहां उन्हें सामाजिक प्रगति और जनकल्याण के क्षेत्र में अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है वहां नकारात्मक उद्देश्यों के लिए भी उनका उपयोग चालाकी से किया जाता है। चिन्हों और प्रतीकों के उपयोग का उद्देश्य सही रचना देना होता है लेकिन इसका उपयोग बहुधा गलत रचना देने के लिए किया गया गया है। उनका मानना है कि इस प्रकार के चलन से एक बहुत ही विचित्र किस्म की हठवादी विपरीत अवधारणा का विकास हुआ। इस अवधारणा के तहत यह माना जाने लगा कि एक विषय जो कि असत्य हो सकता है बनाम एक विषय जो कि असत्य नहीं हो सकता है। हाल ही में गोवा में संपन्न हुए अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के दौरान जिस तरह से ‘एस दुर्गा’ फिल्म को लेकर विवाद उठाने की कोशिश की गई, उसको अगर लोटमान की इन अवधारणाओं के आलोक में देखें तो उसमें भी एक हठवादी अवधारणा की अंतर्धारा दिखाई देती है। फिल्मकार ने पहले ‘सेक्सी दुर्गा’ के नाम से फिल्म बनाई, बाद में उसको ‘एस दुर्गा’ कर दिया। फिल्म फेस्टिवल में उसकी स्क्रीनिंग नहीं हो पाई, वो अदालत चले गए वहां से स्क्रीनिंग का आदेश लेकर आए। फिर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अदालत में अपील की जहां से जूरी को फैसला लेने को कह दिया गया। फिल्म फेस्टिवल के आखिरी दो दिनों तक इस फिल्म को दिखाए जाने पर सस्पेंस बना रहा। इन दो दिनों के दौरान फिल्म सनल शशिधरन ने गोवा में धरना प्रदर्शन आदि की भी कोशिश की लेकिन ज्यादा तवज्जो नहीं मिली। इस पूरे विवाद का पटाक्षेप सेंसर बोर्ड के एक फैसले से हो गया जिसमें उसने इस फिल्म के सर्टिफिकेशन को रद्द कर दिया। हलांकि अगर इस फिल्म को प्रदर्शित किया जाता तो एक गलत परंपरा की शुरुआत होती कि कोई भी अदालत जाकर जूरी के फैसले को चुनौती देता और फिर अदालत के आदेश के बाद फिल्म की स्क्रीनिंग हो जाती। ऐसा होने से जूरी की आजादी पर भी फर्क पड़ता जो कि स्वस्थ सिनेमा के लिए उचित नहीं होता। हलांकि इस तरह के आयोजनों में फिल्मों के प्रदर्शन की अनुमति का अंतिम अधिकार स्थानीय राज्य सरकार के पास होता है।  
इस पूरे विवाद को हवा देने की कोशिश की गई लेकिन इन तथ्यों को छुपा लिया गया कि फिल्मकार ने ‘एस’ के बाद तीन आयताकार सफेद बॉक्स लगा कर फिल्म को गोवा अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में दिखाने की अर्जी दी थी। सेंसर बोर्ड से जुड़े जानकारों का कहना है कि ‘एस’ के बाद तीन आयताकार बॉक्स लगाकर उसके बाद दुर्गा लिखने के कई अर्थ हैं। इन आयताकार बॉक्स लगाकर फिल्मकार ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हो सकते हैं कि उन्होंने विरोध स्वरूप ‘सेक्सी’ की तीन अक्षरों दो ढंक दिया। शबाना आजमी जैसी अदाकारा ने गोवा फिल्म फेस्टिवल के बहिष्कार का आह्वान किया था लेकिन उसको फिल्मी दुनिया में ही किसी ने तवज्जो नहीं दी। गोवा फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन, सलमान खान, अक्षय कुमार, कटरीना कैफ से लेकर करण जौहर, पूजा हेगड़े, भूमि पेडनेकर और सुशांत सिंह राजपूत के अलावा कई अन्य सितारे मौजूद थे। दरअसल एक खास विचारधारा के पोषकों को बहिष्कार आदि का रास्ता सबसे आसान लगता है। उससे भी आसान है कि कहीं कुछ हो तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरे में होने की बात उछाल दो। यह एक ऐसा जुमला बन गया है जो हर जगह फिट हो जाता है चाहे वो फिल्म हो, साहित्य हो, पत्रकारिता हो, पेंटिंग हो, कहीं भी।
अगर कहीं कुछ गलत होता लग रहा हो तो उसके लिए संवाद करने की जरूरत है, सरकार या आयोजक से बात की जा सकती है। शबाना आजमी जैसी शख्सियतों को मसलों को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए ना कि किसी भी विवाद में अपनी राजनीति को चमकाने का अवसर तलाशना चाहिए। एक अभिनेत्री के तौर पर उनका जितना सम्मान है उसका उपयोग उनको बॉलीवुड के सकारात्मक पैरोकारी में करना चाहिए क्योंकि नकारात्मकता का अंत तो नकार से ही होता है। यह ठीक है कि लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का हक है, विरोध जताने का हक भी है लेकिन जब आप एक मुकाम हासिल कर लेते हैं तो लोगों की आकांक्षा अलग हो जाती है। इस फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन ने एक बेहतरीन बात की। उन्होंने कहा कि ‘फिल्म ही एक ऐसा माध्यम है जहां तीन घंटे तक हमें अपने बगल में बैठे इंसान के जाति, धर्म, विचारधारा आदि के बारे में पता नहीं होता और ना ही उससे कुछ लेना लेना देना होता है।‘ लेकिन अफसोस कि अमिताभ बच्चन की सोच वाले लोग कम हैं यहां तो लोग फिल्म को लेकर भी राजनीति करने से नहीं चूकते।
विवादों से बेअसर गोवा फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष कुछ बेहद सार्थक काम भी हुए। फिल्म फेस्टिवलों में भी अबतक ज्यादातर एकालाप होता था। या तो फिल्मकार की बातें सुनकर फिल्म देखो, या सितारों की स्पीच सुनो, लेकिन अड़तालीस साल बाद अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल ने अपना दायरा बढाया और एकालाप को संलाप में बदलने की कोशिश की गई।
साहित्य और सिनेमा को लेकर पूर्व में बहुत बातें होती रही हैं। खासतौर पर हिंदी में तो साहित्यकारों के सिनेमा को लेकर अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। प्रेमचंद के सिनेमा से मोहभंग के बारे में रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा है- ‘1934 की बात है । बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था । इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया। बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे कि प्रेमचंद जी का ‘मजदूर’ अमुक तारीख से रजतपट पर आ रहा है । ललक हुई, अवश्य देखूं कि अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई । मैंने ‘मजदूर’ की चर्चा कर दी । बोले ‘यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो ये फिल्म कभी नहीं देखना ।’ यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं । और, तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है ।‘ प्रेमचंद के अलावा अमृत लाल नागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकारों का भी सिनेमा से साथ ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया।
अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष साहित्य और सिनेमा से लेकर कहानी की ताकत, उसके कहने का अंदाज और बच्चों के सिनेमा जैसे विषयों पर गंभीर मंथन हुआ। वाणी त्रिपाठी टिक्कू द्वारा क्यूरेट किए गए इन विषयों को लेकर श्रोताओं में खासा उत्साह रहा। साहित्यक प्रेरणा, सिनेमा और लिखित शब्द पर पौऱाणिक कथाओं को आधुनिक तरीके से लिखनेवाले लेखक अमीश त्रिपाठी, कवि और संगीत मर्मज्ञ यतीन्द्र मिश्र के अलावा गीतकार और सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने अपने विचार रखे। इसका संचालन वाणी ने किया था। कहानी की ताकत और किस्सागोई पर एक पैनल में बेहद रोचक चर्चा हुई। अगर हम बॉलीवुड को देखें या फिर पूरे भारतीय भाषा की फिल्मों को देखें तो बच्चों की फिल्मों का अनुपात बहुत कम होता है। एक सत्र बच्चों के सिनेमा पर भी केंद्रित था जिसमें प्रसून जोशी और नितेश तिवारी जैसे वक्ता मौजूद थे। चर्चाओं का फलक इतना बड़ा था कि एक पूरा सत्र टैगोर के संसार पर केंद्रित था। आज के जमाने में डिजीटल प्लेटफॉर्म को लेकर बात ना हो तो आयोजन अधूरा सा लगता है। मशहूर फिल्मकार भारतबाला ने इस विषय पर एक सत्र संचालित किया।

दो सत्र बेहद रोचक रहे जिसमें एक तो था ‘अपनी अगली फिल्म कैसे बनाएं’ जिसमें करण जौहर के अलावा एकता कपूर, सिद्धार्थ रॉय कपूर और स्टार फॉक्स के सीईओ विजय सिंह ने अपनी बातें रखीं। दूसरा सत्र ‘नए यथार्थ से मुठभेड़’ पर केंद्रित था। इन दोनों सत्रों में करण जौहर ने बेहद सधे अंदाज में अपनी बात रखी। एकता कपूर हमेशा की तरह संक्षिप्त पर दू द प्वाइंट रहीं। करण जैहर ने एक सत्र में सोशल मीडिया पर फिल्म समीक्षा को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की । उन्होंने कहा कि जिस तरह से इन दिनों ट्वीटर आदि पर फिल्मों की लाइव समीक्षा होती है वो अच्छा संकेत नहीं है। इन सत्रों की परिकल्पना करनेवाली समिति की अध्यक्ष वाणी त्रिपाठी टिक्कू के मुताबिक इस आयोजन का मकसद देश में सिनेमा लिटरेसी को बढ़ावा देना है। इन सत्रों में लोगों की उपस्थिति ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि इस तरह का प्रयोग लोगों को पसंद आया। कुल मिलाकर अगर हम देखें तो बेवजह के विवादों को उठाने की कोशिशों को सकारात्मक पहल ने हाशिए पर पहुंचा दिया।  

Friday, January 6, 2017

डूब गया अभिनय का सितारा

हिंदी फिल्मों में अपनी दमदार आवाज और शानदार अभिनय के बूते पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करानेवाले ओमपुरी का छियासठ साल की उम्र में निधन हो गया । नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के छात्र रहे ओमपुरी ने मराठी फिल्म घासीराम कोतवाल से उन्नीस सौ छिहत्तर में बॉलीवुड में कदम रखा था । विजय तेंडुलकर के नाटक पर बनी इस फिल्म को मणि कौल ने निर्देशित किया था । उसके बाद तो सद्गति, आक्रोश, अर्धसत्य, मिर्च मसाला और धारावी जैसी फिल्मों में यादगार भूमिका निभाई । इलके अलावा उन्होंने जाने भी दो यारो, चाची 420, मालामाल वीकली, माचिस, गुप्त, सिंह इज किंग और धूप जैसी कमर्शियलल फिल्म भी की । उनको अर्धसत्य में उनी शानदार भूमिका के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड भी मिला था । हिंदी फिल्मों के अलावा उन्होंने कई अंग्रेजी फिल्मों में भी काम किया और वहां भी अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी । घोस्ट ऑ द डार्कनेस, सिटी ऑफ जॉय, माईसन द फैनेटिक, वुल्फ जैसी फिल्मों में उनके काम को अंतराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली । छोटे पर्दे पर कक्का जी कहिन के काका के तौर पर उनकी भूमिका अब भी मील का पत्थर है ।
अंबाला में पैदा होनेवाले ओम पुरी का बचपन बेहद गरीबी में गुजरा । जब ओमपुरी सात साल के थे तो उनके पिता जो रेलवे स्टोर में इंचार्ज थे को चोरी के आरोप में जेल भेज दिया गया । जब उसके पिता जेल भजे गए तो रेलवे ने उनको दिया क्वार्टर भी परिवार से खाली करवा लिया । फटेहाली और तंगहाली में ओम के बड़े भाई वेद ने कुली का काम करना शुरू कर दिया और ओम पुरी को चाय की दुकान पर कप प्लेट साफ करना पड़ा । लेकिन परिवार की मुश्किलें कम नहीं हो रही थी । खाने के लाले पड़ रहे थे तो सात साल का बच्चा एक दिन एक पंडित जी के पास गया लेकिन बजाए मदद करने के पंडित ने सात साल के बच्चे का यौन शोषण कर डाला था ।
ओमपुरी जब चौदह साल के थे उनके जीवन में एक टर्निंग प्वाइंट आया । यह वह दौर था जब ओमपुरी का संघर्ष शुरू हो चुका था । उसके आसपास कोई भी हमउम्र लड़की नहीं थी । उसने महिला के रूप में या तो अपनी मां को देखा था फिर मामी को या फिर मामी के घर काम करनेवाली पचपन साल की महिला शांति को । ओमपुरी का पहला शारीरिक संबंध यहीं बना । जब वो मामा के घर रह कर पढाई कर रहा था तो उसे घर की कामवाली के साथ पानी लाने का जिम्मा सौंपा गया । अचानक एक दिन शाम के वक्त पचपन साल की कामवाली ने चौदह साल के किशोर को दबोच लिया । उत्तेजित किशोर ने पहली बार अधपके बालों और टूटी दांतवाली महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाया । बाद में पारिवारिक विवाद की वह से ओमपुरी को मामा नेअपने घर से निकाल दिया ।
किसी तरह दोस्तों की मदद और अपने कठिन परिश्रम की वजह से ओमपुरी ने अपनी पढाई पूरी की । ओमपुरी जब नौंवी क्लास में थे तो उनके मन में ग्लैमर की दुनिया में जाने कई इच्छा होने लगी । अचानक एक दिन अखबार में उन्हें एक फिल्म के ऑडिशन का विज्ञापन दिखाई दिया और ओम ने उसके लिए अर्जी भेज दी । कुछ दिनों के बाद एक रंगीन पोस्टकार्ड पर ऑडिशन में लखनऊ पहुंचने का बुलावा था । साथ ही एंट्री फीस के तौर पर पचास रुपये लेकर आने को कहा गया था । तंगहाली में दिन गुजार रहे ओमपुरी के पास ना तो पचास रुपये थे और ना ही लखनऊ आने जाने का किराया, सो फिल्मों में काम करने का यह सपना भी सपना ही रह गया । ये फिल्म थी जियो और जीने दो । वक्त के थपेड़ों से जूझते ओमपुरी दिल्ली आते है और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में एडमिशन लेते है । लेकिन यहां भी हिंदी और पंजाबी भाषा में हुई अपनी शिक्षा को लेकर उसके मन में जो कुंठा पैदा होती है वह उसे लगातार वापस पटियाला जाने के लिए उकसाता रहता है । लेकिन उस वक्त के एनएसडी के डायरेक्टर अब्राहम अल्काजी ने ओमपुरी की परेशानी भांपी और एम के रैना को उससे बात करने और उत्साहित करने का जिम्मा सौंपा । एनएसडी के बाद ओमपुरी का अगला पड़ाव राष्ट्रीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे था । यहां एनएसडी में बने दोस्त नसीरुद्दीन शाह भी ओम के साथ थे । जैसा कि आमतौर पर होता है कि पुणे के बाद अगला पड़ाव मुंबई होता है वही ओम के साथ भी हुआ । यहां पहुंचकर फिर से एक बार शुरू हुआ फिल्मों में काम पाने के लिए संघर्षों का दौर । यहां ओम को पहला असाइनमेंट मिला एक पैकेजिंग कंपनी के एक विज्ञापन में जिसे बना रहे थे गोविंद निहलानी । फिर फिल्में मिली और ओम मशहूर होते चले गए ।
चंद सालों पहले ओमपुरी की पत्नी रही नंदिता पुरी उनकी जीवनी लिखी थी । इस किताब में ओम पुरी के व्यक्तित्व का एक और पहलू सामने आता है वह है सेक्स को लेकर ओम का लगाव । ओम के जीवन में कई महिलाएं आती हैं, लगभग सभी के साथ ओम शारीरिक संबंध भी बनाते हैं लेकिन विवाह के बंधन में बंध पाने में असफलता ही हाथ लगती है । ओम की जिंदगी में आनेवाली महिलाओं की एक लंबी फेहरिश्त है – लेकिन ओम का पहला प्यार रोहिणी थी जिसने बाद में रिचर्ड अटनबरो की फिल्म गांधी में कस्तूरबा की भूमिका निभाई थी । कालांतर में फिर ओम के जीवन में उसके दोस्त कुलभूषण खरबंदा की दोस्त सीमा साहनी आई । सीमा प्रसिद्ध लेखिका इस्मत चुगताई और फिल्मकार शाहिद लतीफ की बेटी थी । दोनों के बीच लंबा रिश्ता चला लेकिन ग्लैमर की दुनिया में बिंदास अंदाज में जीनेवाली सीमा को ओम के साथ संबंध रास नहीं आया क्योंकि वह शादी के बंधन में नहीं बंधना चाहती थी । फिर उसके जीवन में उसके दोस्त सुभाष की बहन बंगाली बाला माला डे आई । यहां भी शादी नहीं हो पाई । उसके बाद ओम के जीवन में उसके घर में काम करनेवाली की बेटी लक्ष्मी से शारीरिक संबंध बने। एक समय तो ओम इस लड़की से शादी को तैयार होकर एक मिसाल कायम करना चाहते थे लेकिन जल्द ही सर से आदर्शवाद का भूत उतर गया और ओम ने लक्ष्मी से पीछा छुड़ा लिया । फिल्म अर्धसत्य ने ओमपुरी की पूरी जिंदगी बदल दी थी । अर्धसत्य की जो भूमिका ओम ने निभाई थी वो पहले अमिताभ बच्चन को ऑफर की गई थी लेकिन व्यस्तता की वजह से अमिताभ ने वह प्रस्ताव ठुकरा दिया था और बाद में जो हुआ वह इतिहास है । ओमपुरी के निधन के बाद अब बॉलीवुड की एक जानदार आवाज खामोश हो गई


Friday, December 2, 2016

दूसरी औरत पर फिदा बॉलीवुड

भारतीय समाज में दूसरी पत्नी को वो दर्जा प्राप्त नहीं हो पाता है जो पहली पत्नी को मिलता था । दूसरी पत्नी को हमेशा हेय दृष्टि से ही देखा जाता रहा है । लेकिन फिल्म इंडस्ट्री के रीति रिवाज और मान्यताएं अलहदा हैं । वहां दूसरी पत्नी या फिर नायकों के जीवन में आई दूसरी औरत को ही सम्मान मिलता है । कई ऐसे उदाहरण हैं जिसमें फिल्मों से जुड़े मशहूर शख्सियत अपनी पहली पत्नी को ना केवल तलाक दे देते हैं बल्कि पहली पत्नी के साथ उसी शहर में दूसरा घर बसा लेते हैं । कुछ दिनों पहले एक मशहूर फिल्म अभिनेता ने अपनी पत्नी को कहा था कि मेरी जान बख्शो क्योंकि मुझे किसी और से प्यार हो गया है । तुम धन दौलत घर-बार सब ले लो लेकिन मुझे आजाद करो । दरअसल वॉलीवुड में दो तरह के हीरो हुए हैं । एक तो मुंबई में ही पले-बढ़े और उनका सामाजिक परिवेश भी फिल्मों से ही जुड़ा रहा । नायकों का एक दूसरा तबका देश के छोटे शहरों से आया और संघर्ष के बाद सफलता के शीर्ष पर जा पहुंचा । छोटे शहरों से जो हीरो मुंबई आए उसमें से तकरीबन सभी शादी के बाद ही फिल्मों की दुनिया में आए थे । यहां आकर उनका महिलाओं का खुलापन और बिंदास स्वभाव लगातार आकर्षित करने लगा । आजाद ख्याल महिलाएं उन्हें अपनी पत्नी से ज्यादा लुभाती रही । जब धर्मेन्द्र फिल्म इंडस्ट्री में आए थे तो वो शादी शुदा थे लेकिन फिल्मी दुनिया में उन्हें उस वक्त की सुपर स्टार मीना कुमारी से इश्क हो गया । ये इश्क इतना परवान चढ़ा कि धर्मेंन्द्र का ज्यादातर वक्त मीना कुमारी के जानकी कुटीर में ही बीतने लगा । उसके बाद उन्होंने ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी के साथ रोमांस की पींगे बढ़ानी शुरू कर दी । दोनों के बीच प्यार इतना बढ़ गया कि धर्मेंन्द्र ने कानून को ताक पर रखकर पहली पत्नी को बगैर तलाक दिए चुपके से जाकर हेमा मालिनी से दूसरी शादी रचा ली । प्यार के शिकार तो दिलीप कुमार भी हुए थे और उनका सायरा बानो से तलाक होते होते बचा था । 1982 में यह चर्चा आम थी कि दिलीप कुमार एक पाकिस्तानी महिला आसमा में इतने मशरूफ हो चुके हैं कि उन्होंने सायरा बानो को छोड़ उसके साथ घर बसा लेने का फैसला कर लिया था । किसी तरह से सायरा ने उस होनी को टालने में सफलता हासिल की । यही हाल फिल्म अभिनेता बनने की चाहत में मुंबई पहुंचे सलीम खान का भी रहा । उन्होंने डांसर हेलेन के साथ सरहदी लुटेरा और तीसरी मंजिल जैसी फिल्में की । सलीम साहब ने एक इंटरव्यू में बताया कि सलमा से उनकी मुलाकात 1959 में हुई थी और पांच सालों तक दोनों के बीच प्यार परवान चढ़ता रहा और 1964 में दोनों ने शादी कर ली । सलीम खान सलमा से मिलने से पहले हेलेन से मिल चुके थे और उनके दिल में हेलेन को लेकर प्यार की चिंगारी दबी रह गई थी । दिल में दबी चिंगारी जब तक प्यार के शोला बनकर भड़कती रहती थी । आखिरकार सलमा से शादी के सोलह साल बाद 1980 में सलीम साहब ने हेलेन से दूसरी शादी रचाई ।
अस्सी के दशक की सुपर स्टार श्रीदेवी की कहानी एकदम फिल्मी है लेकिन यहां भी पहली पत्नी को ही हार मिलती है । श्रीदेवी बोनी कपूर के गेस्ट रूम में रहती थी और धीरे धीरे दोनो ने मोहब्बत का ऐसा अफसाना लिखा कि वो गेस्ट रूम से कब उनके बेडरूम तक पहुंच गई ये बोनी की पहली पत्नी मोना कपूर को पता भी नहीं चल सका । मोना कपूर ने इस शादी अपने जीते जी मंजूरी नहीं दी और ना ही उसने बोनी को तलाक दिया । बगैर पहली पत्नी के तलाक के बोनी ने शादी की और दूसरे नीड़ का निर्माण कर लिया । आमिर खान की पहली पत्नी रीना दत्ता ने इससे उलट व्यवहार किया । जब आमिर खान ने तय किया कि वो लगान फिल्म की अपनी सहायक निर्देशक किरण राव से शादी करेंगी तो रीना दत्ता ने फौरन उनको तलाक देकर आजाद कर दिया । उनके नजदीकियों का कहना है कि रीना को जब आमिर और किरण के रिश्ते का पता चला तो उसने भी इस रिश्ते को छोड़कर आगे बढ़ने का फैसला कर लिया ।
महिला अधिकारों की बात करनेवाली शबाना आजामी भी शादी-शुदा जावेद अख्तर  के इश्क में इस तरह से मशरूफ हुई कि दोनों ने शादी रचा ली । आज जावेद और शाबाना के मोहब्बत के अफसानों की बॉलीवुड में चर्चा होती है । पति-पत्नी के रूप में दोनों की मिसाल दी जाती है । लेकिन जब शाबाना ने लेखक-गीतकार जावेद अख्तर से शादी करने का ऐलान किया था तो उसकी खूब लानत-मलामत हुई थी । शाबाना ने उस वक्त दो बच्चों- फरहान और जोया अख्तर के पिता से शादी की थी । अपनी स्त्रीवादी छवि के विपरीत उनके इस कदम से हनी ईरानी का घर टूटा था । लेकिन यहां भी शबाना की आलोचना की शिकार बनने के बावजूद आज एक सफल पत्नी की तरह समाज में प्रतिष्ठा हासिल कर चुकी है लोग यह भूल गए हैं कि वो जावेद अख्तर की दूसरी औरत हैं । हनी ईरानी की तो लोगों को याद भी नहीं है । कुछ ऐसा ही हुआ था नादिरा बब्बर के साथ जब स्त्रीवादी स्मिता पाटिल ने उनके पति के साथ विवाह कर लिया था । उस वक्त राज बब्बर ने दोनों परिवारों को साथ रखने का जोखिम उठाया था लेकिन वो उसमें सफल नहीं हो पाए थे । हलांकि स्मिता पाटिल की मौत के बाद राज बब्बर वापस नादिरा के पास लौट आए थे । इस कड़ी में ताजा नाम जुड़ा है सैफ अली खान का, जिन्होंने अपनी पत्नी अमृता सिंह को छोड़कर करीना कपूर से ब्याह रचाया । दोनों की उम्र में लंबा फासला है । करीना को मिला बेगम का दर्जा और पहली पत्नी गुमनामी के अंधेरे में खो गई । 
ऐसा नहीं है कि यह सबकुछ सिर्फ मुंबईया फिल्म इंडस्ट्री में ही हो रहा है । दक्षिण भारत के सफलतम अभिनेताओं में से एक कमल हासन ने 1978 में मशहूर डांसर वाणी गणपति से शादी की थी । वाणी किसी वजह से लंबे समय के लिए अमेरिका गई तो कमल हासन ने सारिका को सहजीवी बना लिया । इस सहजीविता के दौरान सारिका ने एक बच्ची को जन्म दिन । बच्ची के जन्म के बाद कमल हासन पर सामाजिक दबाव इतना बढ़ा कि उनको वाणी को तलाक देकर सारिका से शादी करनी पड़ी । इस तरह की अनगिनत प्रेम कहानियां फिल्मी दुनिया में है । लेकिन सवाल अब भी अनुत्तरित है कि फिल्मी दुनिया का जो समाज है उसमें पहली पत्नी के लिए ना तो किसी के दिल में दर्द है और ना ही उसको लेकर संवेदना । कहना ना होगा कि यह चमकदार वॉलीवुड का एक स्याह पक्ष है लेकिन है तो हकीकत ही और इस हकीकत के साथ ही जी रही है बॉलीवुड की पहली पत्नियां ।