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Saturday, December 31, 2016

नया वर्ष, नई किताबें, नया अंदाज

नए साल की आहट और दिल्ली में सात जनवरी से आयोजित होनेवाले विश्व पुस्तक मेले के मद्देनजर इन दिनों लेखकों के बीच और सोशल मीडिया पर प्रकाशित होनेवाली किताबों की जमकर चर्चा हो रही है । लेखक अपनी नई किताब को लेकर उत्साहित नजर आ रहे हैं तो हिंदी के प्रकाशकों ने भी नए वर्ष पर नई किताबों की प्रकाशन योजना को अंजाम पर पहुंचाना शुरू कर दिया है । किताबों का पहला सेट दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में जारी करने की तैयारी है । फेसबुक इन दिनों आनेवाली किताबों के कवर से अटा पड़ा है । तमाम तरह के छोटे बड़े मंझोले लेखक अपनी अपनी किताबों का कवर साझा कर रहे हैं और दोस्तों की शुभकामनाएं बटोर रहे हैं । कई प्रकाशकों ने तो बकायदा फेसबुक पर अपने पेज पर नई किताबों का प्रमोशन शुरू कर दिया है तो किसी ने फेसबुक पर अपने प्रकाशनों का विज्ञापन देना शुरू कर दिया है । हर किसी के जेहन में किसी भी तरह से दिल्ली विश्व पुस्तक मेला के सारा आकाश पर छाने की तमन्ना है । वरिष्ठ टीवी पत्रकार शाजी जमां की बहुप्रतीक्षित किताब ‘अकबर’ (राजकमल प्रकाशन) की खासी चर्चा है और पाठकों को इस किताब को लेकर उत्सुकता भी है । काफी दिनों से अमेजन आदि पर इस किताब की प्री बुकिंग भी शुरू हो चुकी थी और एक दो लिटरेचर फेस्टिवल में इसका कवर भी जारी किया जा चुका था । बावजूद इसके इस किताब के प्रकाशन में देरी हुई । शाजी जमां के इसके पहले दो उपन्यास ‘प्रेम गली अति सांकरी’ और ‘जिस्म जिस्म के लोग’ भी प्रकाशित हो चुके हैं । ‘अकबर’ उनके सालों के शोध का नतीजा है और लिटरेचर फेस्टिवल्स में जो उनकी बातचीत इस किताब को लेकर सुनने को मिली थी वह बेहद दिलचस्प और चौंकानेवाली रही है । हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की लंबी परंपरा रही है । वरिष्ठ लेखक शरद पगारे के दो ऐतिहासिक उपन्यासों की खासी चर्चा हुई थी । ‘पाटलिपुत्र की साम्राज्ञी’ और ‘गन्धर्वसेन’ । अब शाजी जमां ने अकबर पर लिखकर इस परंपरा को आगे बढाया है । ये देखना दिलचस्प होगा कि पाठक शाजी की इस किताब को पाठक किस तरह से लेते हैं ।
दूसरी एक महत्वपूर्ण किताब जिसकी खासी चर्चा पिछले कई लिटरेचर फेस्टिवल में सुनने को मिली है वो है युवा लेखिका नीलिमा चौहान की किताब ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ ( वाणी प्रकाशन ) । इस किताब को लेकर भी प्रकाशक और लेखक दोनों खासे उत्साहित हैं और फेसबुक पर अलग से इसका पेज बनाकर पाठकों की उत्सकुता बढ़ाने का काम किया जा रहा है । पेसबुक के इस पेज पर लेखिका भी सक्रिय हैं और वो पाठकों से संवाद भी कर रही हैं । इस पेज पर बेहद दिलचस्प प्लाकॉर्ड के जरिए किताब की रिलीज डेट का काउंटडाउन भी चलाया जा रहा है । नीलिमा चौहान दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षिका हैं और सोशल साइट्स पर अपने बोल्ड लेखन के लिए जानी जाती हैं । उनकी इस किताब का हिंदी जगत को इंतजार है । कैसी होती हैं पतनशील पत्नियां या फिर पतनशील पत्नियों को लेखिका ने किस तरह से व्याख्यायित किया है यह जानना दिलचस्प होगा । एक और महत्वपूर्ण किताब आ रही है वह है प्रेमचंद साहित्य के मर्मज्ञ कमल किशोर गोयनका के संपादन में – ‘प्रेमचंद कुछ संस्मरण’ ( सामयिक प्रकाशन) । इस किताब का भी पाठकों को इंतजार है क्योंकि कमल किशोर गोयनका हिंदी के ऐसे लेखक हैं जो प्रेमचंद के विभिन्न आयामों को ना केवल तलाशते रहते हैं बल्कि पाठकों के लिए उसको रुचिकर तरीके से पेश भी करते रहे हैं । कुछ दिनों पहले उन्होंने प्रेमचंद के उपन्यास ‘गो-दान’ के दस जून उन्नीस सौ छत्तीस को छपे पहले संस्करण का जिस तरह से संकलित संपादित करके पेश किया था वह बेहद महत्वपूर्ण है । एक और किताब जिसका बहुत दिनों से हिंदी पाठकों को इंतजार था वह है फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार की आत्मकथा । मूलत: अंग्रेजी में ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो’ के नाम से प्रकाशित उपन्यास ‘वजूद और परछाइयां’ ( वाणी प्रकाशन) के नाम से हिंदी पाठकों के लिए उपलब्ध होगा । ‘अकबर’ और ‘पतनशील पत्नियों को नोट्स’ को लेकर बने उत्सकुकता का जो वातावरण है उसको देखकर लगता है कि हिंदी पाठकों की रुचि साहित्य की शास्त्रीय विधाओं से इतर किताबों में बढ़ी है । कई प्रकाशकों से बात करने पर भी इस बात की पुष्टि होती है । यह सिर्फ इस साल की प्रवृत्ति नहीं है । इसकी पृष्ठभूमि काफी पहले से बन रही थी । लोग एक ही तरह की कहानियां, कविताएं और उपन्यास पढ़-पढ़कर उब गए थे । हिंदी के ज्यादातर लेखक इस बात को समझ नहीं पा रहे थे लिहाजा एक एक करके हर विधा में पाठकों की रुचि कम होती चली गई । सबसे पहले कविता पर इसका असर देखने को मिला और इसके पाठक इतने कम हो गए कि प्रकाशकों ने कविता संग्रह छापना लगभग बंद कर दिया । वरिष्ठ कवियों से लेकर स्थापित कवियों तक को अपने संग्रह छपवाने के लिए संघर्ष करना पड़ा । इन दिनों यही हाल कहानी का हो रहा है । फॉर्मूलाबद्ध कहानियां लिखते जाने से लेखक का नाम देखकर इस बात का अंदाज लग जाता है कि अमुक की कहानियां कैसी होंगी । बावजूद इसके पुस्तक मेले में कई कहानी संग्रह प्रकाशित होने जा रहे हैं । हंस कथा मासिक से लंबे समय तक जुड़े रहे कथाकार गौरीनाथ का कहानी संग्रह बीज-भोजी (अंतिका प्रकाशन), कथाकार वंदना शुक्ला का ‘काफिला साथ और सफर तन्हा’ ( अनन्य प्रकाशन) से प्रकाशित हो रहा है । इसके अलावा कई दिग्गज कहानीकारों की कहानियों का संकलन भी प्रकाशित हो रहा है जिनमें नरेन्द्र कोहली और विजयदान देथा की लोकप्रिय कहानियां ( प्रभात प्रकाशन) शामिल हैं ।
हिंदी में अनुवाद पर काम कम हो रहा है लेकिन पाठकों की साहित्येत्तर रुचि के मद्देनजर प्रकाशकों ने इस ओर अपना फोकस किया है । हलांकि हिंदी पाठकों की संख्या को देखते हुए अनुवाद के दायरे को और फैलाना होगा । दरअसल हिंदी में  अनुवाद की एक दिक्कत और है । हिंदी में अनुवाद करने पर ना तो ज्यादा पैसा मिलता है और ना ही अच्छे अनुवादक मिलते हैं । गूगल से अनुवाद करनेवालों की संख्या बढ़ती जा रही है । बावजूद इसके दो हजार सत्रह में कई अच्छी अनूदित किताबें प्रकाशित हो रही हैं । मशहूर अमेरिकी एंकर ओपरा विनफ्रे की बेस्टसेलर किताब ‘व्हाट आई नो फॉर श्योर’ का हिंदी अनुवाद ‘ये जो है जिंदगी’ ( प्रभात प्रकाशन) छपकर आनेवाली है । इसी तरह से मशहूर लेखक ज्यां द्रेज और कमल नयन चौबे के संपादन में ‘भारत में सामाजिक नीतियां: समकालीन परिप्रेक्ष्य’ (वाणी प्रकाशन) दो हजार सत्रह में प्रकाश्य है । मशहूर उद्योगपति एन आर नारायणमूर्ति की किताब ‘मेरे बिजनेस मंत्र’ ( प्रभात प्रकाशन) और आस्टिन ग्रेनविल की किताब ‘भारतीय संविधान’ ( वाणी प्रकाशन) से छपकर आनेवाली है । इस वक्त पूरी दुनिया में आतंकवादी संगठन आईएआईएस और उसकी कार्यप्रणाली के तिलिस्म को जानने की इच्छा है । जाहिर है कि इसमें हिंदी के पाठक भी शामिल हैं । हिंदी के पाठकों की इस क्षुधा को शांत करेगी पैट्रिक कॉकबर्न की किताब ‘आईएसआईएस का आतंक’ ।  अनुवाद के अलावा अगर हम नजर डालें तो एक और महत्वपूर्ण किताब जो नए वर्ष में प्रकाशित होगी वह है अंग्रेजी और हिंदी की नई कविता पर केंद्रित ‘अंगरेजी-हिंदी नयी कविता की प्रवृतियां’ ( सामयिक प्रकाशन) । उपन्यासों की अगर बात करें तो कई उपन्यास इस वर्ष भी प्रकाशित होंगी । इनमें कुसुम अंसल के उपन्यास ‘परछाइयों का समयसार’ (सामयिक प्रकाशन) से प्रकाश्य है ।

दो हजार सत्रह में एक और प्रवृत्ति के जोर पकड़ने की आशंका है वह है पैसे देकर किताबें छपवाना । ऐसा नहीं है कि अभी पैसे देकर किताबें नहीं छप रही है लेकिन यह काम छिटपुट तरीके से हो रहा है । अब कुछ प्रकाशक सेल्फ पब्लिशिंग के नाम पर इसको संस्थागत रूप देने जा रहे हैं । सेल्फ पब्लिशिंग के नाम की सिर्फ आड़ होगी । एक प्रकाशक ने तो बकायदा एक पूरा विभाग इस काम में लगा रखा है और बजाप्ता रेटकार्ड तय कर दिया है । पचास प्रति छपवाने पर कितना,सौ प्रति छपवाने पर कितना बल्कि रेटकार्ड में तो पच्चीस प्रतियां छापने का भी प्रावधान रखा गया है । पैसे देकर पहले भी और अब भी किताबें छप रही हैं लेकिन जिस तेजी से इसका विस्ततार हो रहा है वो हिंदी साहित्य के लिए एक खतरनाक संकेत है । जिस तरह से अखबारों के खबरनुमा विज्ञापन या टेलीविजन के पैसे लेकर बने आधे घंटे के शो के दौरान विज्ञापन या मार्केटिंग इनीशिएटिव लिखकर चलाया या छापा जाता है उसी तरह से पैसे देकर छपी किताबों पर भी इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए या संकेत होना चाहिए कि यह किताब पैसे देकर छपवाई गई है या फिर सेल्फ फाइनिंसिंग योजना के तहत प्रकाशित है । यह होता भी रहा है जब हिंदी अकादमी या अन्य संस्थाओं के सहयोग से किताब छपती है तो उसका उल्लेख किताब पर होता है । इससे पारदर्शिता बनी रहेगी ।    

Sunday, January 24, 2016

पाठकों की वापसी का मेला

हिंदी में लंबे समय से पाठकों की कमी का रोना रोया जा रहा है । खुद को महान मान कर किताबें लिखनेवाले कई साहित्यकारों की किताबें जब कम बिकती हैं तो वो ये प्रचारित करने में जुट जाते हैं कि हिंदी में साहित्य के पाठक कम हो रहे हैं । इस बात को भी फैलाया जाता है कि हिंदी साहित्य सरकारी थोक खरीद की वजह से जिंदा है । कुछ प्रकाशकों ने भी इस तरह की बातों को हवा दी और ये बात फैलाई कि साहित्यक किताबें नहीं बिकती हैं । प्रकरांतर से यह निकल कर आता है कि साहित्य के पाठक कम हो रहे हैं । इसके अलावा ई बुक्स की उपलब्धता और उसकी कम कीमत की वजह से भी किताबों के बाजार के सिकुड़ने की बात बहुधा सामने आती रहती है । हाल ही में दिल्ली में खत्म हुए विश्व पुस्तक मेला से पाठकों की कमी की बात गलत साबित होती है । एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में नौ दिनों तक चले इस विश्व पुस्तक मेले में करीब बारह लाख पुस्तक प्रेमी पहुंचे थे । नौ दिन में बारह लाख यानि तकरीबन करीब एक लाख से ज्यादा पुस्तक प्रेमी हर दिन । काफी दिनों के बाद पुस्तक मेले में ये भी देखने को मिला कि लोग कतार में खड़े होकर हॉल में प्रवेश कर रहे थे । शनिवार और रविवार को तो कतार काफी लंबी थी लेकिन सप्ताह के अन्य दिनों में भी लोग पंक्तिबद्ध होकर मेले में पहुंच रहे थे । हिंदी के हॉल में ये स्थिति देखकर लगा कि साहित्य में पाठकों की वापसी हो गई है । इस बार के विश्व पुस्तक मेले में किताबों की जमकर बिक्री भी हुई । हिंदी के लगभग सारे प्रकाशक बेहद खुश नजर आए । पाठकों की वापसी ने उनके चेहरे पर मुस्कान खिला दी । वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी ने बेहद दिलचस्प वजह बताई । उनका मानना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के फैलाव ने किताबों के लिए एक सकारात्मक वातावरण बनाया । उनके मुताबिक अब पाठक सोशल मीडिया पर किताबों से अवगत हो जाते हैं और उनेक मन में पुस्तक को लेकर उत्सकुता जगती है । उसी उत्सकुकता के आकर्षण में पाठक पुस्तक तक पहुंचना चाहते हैं ।

इसके अलावा पुस्तकों से पाठक भावनात्मक रूप से भी जुड़ते हैं । कई लोगों का कहना है कि वर्चुअल स्पेस पर किताबें पढ़ने से वो आनंद नहीं मिलता है जो कि हाथ में किताब लेकर पढ़ने से प्राप्त होता है । ई बुक्स को आप लगातार लंबे वक्त तक नहीं पढ़ सकते हैं । किंडल या अन्य डिवाइस पर लंबे वक्त तक पढने से आंखों पर जोर पड़ता है और कुछ समय के लिए पढ़ना रोकना पड़ता है , बहुधा यह कहानी या उपन्यास के आनंद को बाधित करता है । इस तरह से हम देखें तो कई वजहों से पाठकों का रुझान एक बार फिर से किताबों की ओर हुआ है । इनमें से एक और वजह है कि अब पाठकों का सामने विषयों की विविधता भी है । दो तीन दशकों तक पाठकों के सामने इतने विकल्प नहीं थे । उन्हें एक खास तरह का फॉर्मूलाबद्ध लेखन से रूबरू होना पड़ता था जिसकी वजह से साहित्य में एकरसता आ गई थी । अब हिंदी के लेखकों ने उन विषयों पर भी लिखना शुरू कर दिया है जिसको पिछले कई सालों से अस्पृश्य माना जाता था । अब फिल्मों से लेकर खेल आदि पर भी किताबें लिखी जाने लगी हैं लेकिन अगर हम गंभीरता से विचार करें तो हिंदी में अब भी कई विषयों पर काम नहीं हो रहा है । मसलन साइंस फिक्शन और पॉलिटिकल थ्रिलर आदि ना के ही बराबर लिखे जा रहे हैं । पाठकों को साहित्य की ओर वापस लाने और उनको अपने साथ बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि लेखक विविध विषयों पर लिखने का प्रयोग करते हैं । 

Sunday, February 23, 2014

पुस्तक मेले में युवा लेखकों की धूम

पिछले नौ दिनों से जारी दिल्ली विश्व पुस्तक मेले का आज आखिरी दिन है। दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला जर्मनी के फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेला और लंदन बुक फेयर के बाद सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित माना जाता है । दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में देश के कोने कोने से लेखकों का जत्था पहुंचता है । किताबों के इस महाकुंभ में लेखकों के साथ साथ पाठकों की भी भागीदारी होती है । विश्व में पुस्तक मेलों का एक लंबा इतिहास रहा है। पुस्तक मेलों की पाठकों की रुचि बढ़ाने से लेकर समाज में पुस्तक संस्कृति को बनाने और उसको विकसित करने में एक अहम योगदान रहा है ।  भारत में बड़े स्तर पर पुस्तक मेले सत्तर के दशक में लगने शुरू हुए । दिल्ली और कोलकाता में पुस्तक मेला शुरू हुआ । 1972 में भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली में आयोजन हुआ । उसके बाद से हर दूसरे साल दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया जाता था । दो हजार बारह में जब एम ए सिकंदर ने नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक का पद संभाला तो इस हर साल आयोजित करने का ऐलान किया । अगले साल से यह पुस्तक मेला अब प्रतिवर्ष आयोजित हो रहा है । इस बार का पुस्तक मेला पहले के आयोजनों से कई मायनों में अलग और व्यवस्थित है । पाठकों से लेखकों के संवाद से लेकर हिंदी महोत्सव तक आयोजित हुए जिसमें लेखक पाठक संवाद सुकून से संभव हुआ । इस बार लोकार्पण को लेकर भी मारामारी नहीं हुई क्योंकि उसके लिए भी व्यवस्था थी । कुल मिलाकर कह सकते हैं कि विश्व पुस्तक मेला इंतजाम के लिहाज से विश्वस्तरीय होने की राह पर चल पड़ा है ।

इस वर्ष का विश्व पुस्तक मेला कई लिहाज से उल्लेखनीय रहा । इस बार हिंदी के कई युवा लेखकों की कृतियां सामने आई । हिंदी के कई प्रकाशकों ने इस बार इन युवा लेखकों की कृतियों को प्रचारित भी किया । इस बात पर हिंदी में बहुधा गंभीर चिंता जताई जाती है कि साहित्य से हिंदी का युवा पाठक दूर होता जा रहा है । विश्व पुस्तक मेले में युवा पाठकों की भागीदारी ने इस चिंता को कुछ हद तक दूर किया । युवा लेखकों की भारी संख्या में प्रकाशित कृतियों को हिंदी के प्रकाशकों ने पहले के मुकाबले बेहतर तरीके से प्रचारित और प्रदर्शित कर नए पाठकों से उनका परिचय करवाने का प्रत्न भी किया । भारतीय ज्ञावपीठ ने पुस्तक मेले के दौरान ही युवा पुरस्कार दिया और पुरस्कृत लेखक की किताब भी जारी की । कहानी के लिए आठवां ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार पत्रकार योगिता यादव को दिया गया और योगिता का पहला कहानी संग्रह क्लीन चिट भी ज्ञानपीठ प्रकाशन से छपकर विमोचित हुआ । कविता के लिए यही पुरस्कार अरुणाभ सौरभ को उनके काव्य संग्रह दिन बनने के क्रम में को दिया गया । इस मौके पर एक और नए लेखक आशुतोष का कहानी संग्रह मरें तो उम्र भर के लिए भी विमोचित किया है । इस मौके पर बोलते हुए वरिष्ठ लेखकों और आलोचकों का मानना था कि इन युवा लेखकों ने अपनी रचनाओं से एक उम्मीद जगाई है । ज्ञानपीठ के अलावा आधार प्रकाशन, पंचकूला ने भी विश्व पुस्तक मेले में कई युवा लेखक लेखिकाओं की किताबें प्रकाशित की । आधार प्रकाशन से प्रकाशित नई किताबों में मशहूर लेखिका जयश्री राय का नया उपन्यास- इकबाल भी है । कश्मीर की पृष्ठभूमि पर लिखा गया एक यह उपन्यास अपनी भाषा और शैली के जरिए हिंदी साहित्य में एक ताजा हवा के झोंके की तरह से आता है । जिया और इकबाल के प्रेम संबंधों में एक अजीब तरह की कशमकश और छटपटाहट है । जयश्री राय के अलावा आधार प्रकाशन से ही कहानीकार अल्पना मिश्रा का नया उपन्यास-अन्हियारे तलछट में चमका, कविता का उपन्यास- ये दिये रात की जरूरत थे, वंदना शुक्ल की मगहर की सुबह, विमलचंद पांडे का उपन्यास भी प्रकाशित हुआ । इसके अलावा कहानीकार ज्योति चावला के कहानी संग्रह-अंधेरे की कोई शक्ल नहीं होती की भी पुस्तक मेले में खासी चर्चा रही । पुस्तक मेले में सामयिक प्रकाशन ने भी कई युवा लेखकों की किताबें जारी की । इसमें पूर्व पत्रकार और कवयित्री वर्तिका नंदा की किताब- खबर यहां भी.. के अलावा कहानीकार विवेक मिश्र का कहानी संग्रह-पार उतरना धीरे से और निर्मला भुराड़िया की किताब-गुलाम मंडी भी जारी हुई । गुलाम मंडी में निर्मला भुराड़िया ने देह व्यापार को केंद्र में रखा है । सामयिक प्रकाशन से ही चर्चित लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास पंचकन्या भी जारी किया गया । कहानी संग्रहों और उपन्यासों के कोलाहल के बीच हरियाणा की युवा लेखिका निर्मल सिंह की एक किताब हरियाणा के लोकगीतों पर वाणी प्रकाशन से छपी है । निर्मल ने हरियाणा के सोलह जिलों में तीन सौ लोगों से बातचीत करने के बाद ये किताब तैयार की है । किताबों की इस फेहरिश्त के बीच ये बात भी रेखांकित करने योग्य है कि इन किताबों का प्रोडक्शन भी काफी अच्छा है । उम्मीद की जा सकती है कि आनेवाले दिनों में इन युवा लेखकों की किताबों पर हिंदी में गंभीर चर्चा होगी । दिल्ली के इस पुस्तक मेले में इतनी संख्या में युवा लेखकों की किताबों का प्रकाशन आश्वस्तिकारक है जरूरत इस बात की है कि प्रकाशन इन किताबों को पाठकों तक पहुंचाने का यत्न करें । 

Sunday, September 2, 2012

उद्देश्य से भटकता पुस्तक मेला

विश्व में पुस्तक मेलों का एक लंबा इतिहास रहा है। पुस्तक मेलों की पाठकों की रुचि बढ़ाने से लेकर समाज में पुस्तक संस्कृति को बनाने और उसको विकसित करने में एक अहम योगदान रहा है ।  भारत में बड़े स्तर पर पुस्तक मेले सत्तर के दशक में लगने शुरू हुए । दिल्ली और कलकत्ता पुस्तक मेला शुरू हुआ । 1972 में भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली में आयोजन हुआ । उसके बाद से हर दूसरे साल दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया जाता है । दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेला और लंदन बुक फेयर के बाद सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित माना जाने लगा है । इस प्रतिष्ठा की वजह भारत की समृद्ध लेखन परंपरा तो है ही लेकिन एक और अहम वजह भारत में पुस्तकों का बढ़ता बाजार है । हाल के दिनों में ये साबित हो गया है कि भारत विश्व में अंग्रेजी किताबों का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है । लिहाजा पूरी दुनिया के अंग्रेजी प्रकाशकों की नजर भारत के बाजार पर कब्जा करने या फिर वहां से मुनाफा कमाने पर लगी है । यह परिदृश्य सिर्फ अंग्रेजी को लेकर ही नहीं है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का भी बाजार भी लगातार बढ़ रहा है । यह अकारण नहीं है कि फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में दो बार भारत को अतिथि देश का दर्जा मिला था । एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त भारत में करीब बारह हजार प्रकाशक हैं और हर साल सभी भाषाओं को मिलाकर लगभग एक लाख नई किताबें छप रही हैं । पुस्तक मेलों की अहमियत इस बात में हैं कि वो पुस्तकों की बिक्री के अलावा सभी भाषाओं के प्रकाशकों को एक जगह इकट्ठा होकर कारोबार के आदान प्रदान का एक मंच भी मुहैया करवाता है । जैसे फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में लेखकों के अलावा उनके एजेंट और प्रकाशकों के बीच कारोबारी समझौता को ज्यादा अहमियत दी जाती है । वहां अलग अलग भाषाओं के प्रकाशकों के बीच अपनी भाषा में किताबों को छापने को लेकर कारोबारी शर्तें तय होती हैं । कॉपीराइट और लेखकों से जुड़े अन्य मसलों पर विमर्श होता है । इसका फायदा यह होता है कि हर भाषा के पाठकों को दूसरी भाषा की कृतियों को पढ़ने और उससे परिचित होने का मौका मिलता है । नतीजा यह होता है कि पुस्तक संस्कृति का निर्माण होता है और उसे मजबूती मिलती है ।
लेकिन भारत में पुस्तक मेलों का उद्देश्य और स्वरूप कुछ और ही होता चला गया है । हमारे यहां पुस्तक मेले अपने उद्देश्यों से भटककर उत्सवों में तब्दील हो गए है । इस साल दिल्ली में जो विश्व पुस्तक मेला आयोजित हुआ उसकी थीम भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष थे । लेकिन सिनेमा पर चंद सेमिनारों के आयोजन के अलावा उस आयोजन में कुछ खास देखने को नहीं मिला । विश्व पुस्तक मेले के आयोजनकर्ता नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशकों की नाराजगी दिखी थी । ये नाराजगी सुविधाओं और आयोजन की तिथि और पुस्तक मेले के प्रचार में ढिलाई को लेकर थी । लेकिन प्रकाशकों की शिकायतों से इतर नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक एम ए सिकंदर का दावा था कि उन्होंने इस बार विश्व पुस्तक मेले को छात्रों के बीच ले जाने की अनोखी पहल शुरू की थी । इन आरोपों और सफाई के बीच विश्व पुस्तक मेले में हिंदी के ह़ल में एक बात जो रेखांकित करने योग्य थी वह थी विमचनों का रेला । पुस्तक मेले के दौरान विमचनों की होड़ लगी थी । हर लेखक और प्रकाशक ये सोच रहा था कि किसी भी तरह से अगर उनकी किताब का विमोचन पुस्तक मेले में नहीं हुआ तो फिर उनका लेखन बेकार है । ताबड़तोड़ विमोचनों का असर यह हुआ कि जो आम पाठक मेले में आए थे वो बेहद क्फ्यूज हो गए । हर स्टॉल पर हर दिन हिंदी का कोई ना कोई बड़ा लेखक किसी ना किसी किताब का विमोचन करते हुए उस किताब को सदी की महानतम कृति की श्रेणी में डालने का उद्घोष कर रहा था । हिंदी के एक बड़े प्रकाशक के स्टॉल पर चो एक साथ दर्जनभर पुस्तकों का विमोचन हुआ । लग रहा था कि अगर वहां विमोचवन नहीं हुआ तो मोक्ष की प्राप्ति से वंचित रह जाएंगे ।
यह बताने का मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि पुस्क मेले अपने उद्देश्यों से भटकते जा रहे हैं । जिन मेलों पर ये दायित्व था कि वो पाठकों की रुचि का परिष्कार करेंगे और देश में एक पुस्तक संस्कृति का निर्माण करेंगे वो पुस्तक मेले अब लेखकों के प्रचार का मंच बनता जा रहा है । पुस्तक मेलों में सार्थक संवाद की गुंजाइश खत्म होने लगी है । कुछ दिनों पहले दिल्ली के प्रगति मैदान में दिल्ली पुस्तक मेला खत्म हुआ है । दिल्ली पु्स्तक मेले का आयोजन द फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स और इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गेनाइजेशन के संयुक्त तत्वाधान में किया जाता है । एक जमाना था जब दिल्ली पु्स्तक मेले को लेकर दिल्ली के लोगों के बीच जबरदस्त उत्साह देखने को मिलता था । उस वक्त प्रकाशकों की प्रतिभागिता भी ज्यादा होती थी । लेकिन बाद में संगठन में राजनीति और प्रचारप्रियता के अलावा श्रेय लेने की होड़ ने दिल्ली पुस्तक मेले के रंग को फीका करना शुरू कर दिया । नतीजा यह हुआ कि हिंदी और अंग्रेजी के बड़े प्रकाशकों ने इस मेले से मुंह मोड़ना शुरू कर लिया । दिल्ली पुस्तक मेले को विस्तार देने की बजाए चंद लोगों ने इसको अपनी जागीर बना ली जिसकी वजह से दिल्ली पुस्तक मेला अपनी आखिरी सांसे गिनने लगा । रही सही कसर नेशनल बुक ट्रस्ट ने हर साल विश्व पुस्तक मेले के आयोजन का ऐलान कर पूरा कर दिया । नेशनल बुक ट्रस्ट के संयोजन में अब हर साल दिल्ली के प्रगति मैदान में फरवरी में विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया जाएगा । नेशनल बुक ट्रस्ट के इस फैसले के बाद माना जा रहा है कि दिल्ली पुस्तक मेले का ये आखिरी आयोजन था ।
उधर कोलकाता पुस्तक मेले में भी राजनीति और कंट्टरपंथ हावी होने से उसकी साख को बट्टा लगा है । साल के अंत में सर्दियों में लगनेवाला ये पुस्तक मेला आम पाठकों के लिए होता है और माना जाता है कि ये विश्व का सबसे बड़ा गैर कारोबारी पुस्तक मेला है । लोगों की उपस्थिति के लिहाज से इस पुस्तक मेले को विश्व का सबसे बड़ा पुस्तक मेला माना जा सकता है । पिछले साल एक अनुमान के मुताबिक इस कोलकाता बोई मेला को देखने और किताबें खरीदने के लिए तकरीबन बीस लाख लोग मेला स्थल पर आए थे । कोलकाता पुस्तक मेले की प्रतिष्ठा इस बात को लेकर भी ज्यादा थी कि वहां हर विचारधारा के लेखकों की किताबों को जगह मिलती थी । लेकिन इस बार जिस तरह से तस्लीमा नसरीन की किताब को लेकर सरकार और आयोजक कट्टरपंथियों के आगे झुके वो शर्मनाक है । तस्लीमा की किताब निर्बासन का लोकार्पण की इजाजत नहीं देने की चारो ओर आलोचना हुई थी । ये लोकार्पण तस्लीमा की अनुपस्थिति में किया जाना था । लेकिन कट्टरपंथियों के दबाव में झुके आयोजकों को ममता सरकार ने भी विमोचन नहीं कराने की सलाह दी । इस घटना की विश्व भर के साहित्यक हलके में जमकर आलोचना हुई । सिर्फ देश के चंद प्रगतिशील लेखकों ने चुप्पी साध ली थी ।
पुस्तक मेलों का घटता आकर्षण और जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल जैसे आयोजनों की बढ़ती लोकप्रियता से बड़े सवाल खड़े होने लगे हैं ।  अब वक्त आ गया है कि हमें इसपर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि हमारे देश में दिल्ली ,कोलकाता, पटना जैसे विश्व प्रसिद्ध पुस्तक मेलों के प्रति लोगों का आकर्षण कम क्यों होता जा रहा है । पुस्तक मेलों की बजाए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल, गोवा लिट फेस्ट, चेन्नई लिटरेचर फेस्टिवल आदि कैसे विस्तार पा रहा हैं । क्या पाठकों की रुचि का परिष्कार हो गया है और अब वो सुख शांति से अपने प्रिय लेखकों को सुनना और उनसे संवाद करना चाहते हैं । क्या इन पुस्तक मेलों में पाठक अपने लेखकों से संवाद कायम करने का सुख नहीं पा रहे हैं जो उन्हें लिटरेचर फेस्टिवलों की ओर खीच रहा है । इन बातों पर हिंदी के प्रकाशकों और लेखकों को गंभीरता से विचार करना होगा । हिंदी पट्टी में खासकर छोटे शहरों में पुस्तक मेलों की एक अहमियत है । अगर समय रहते छोटे शहरों में पुस्तक मेलों के अस्तित्व को बचाने का प्रयास नहीं किया गया तो पुस्तक संस्कृति को भारी नुकसान होगा । नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थापना के उद्देश्यों में पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देना भी शामिल है । इस दिशा में नेशनल बुक ट्रस्ट को पहल करनी होगी ताकि देशभर में नई पीढ़ी के बीच पुस्तकों से प्रेम करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया जा सके । एनबीटी को महानगरों से निकलकर लगातार छोटे शहरों में पुस्तक मेलों का आयोजन करना होगा और उन मेलों में बड़े लेखकों की उपस्थिति सुनिश्चित करवानी होगी ताकि पाठकों को संवाद का मौका मिल सके । अगर ऐसा हो सके तो हम भाषा और संस्कृति के प्रति अपने दायित्वों को सही तरीके से निभा पाने में सफल हो पाएंगे ।