Translate

Showing posts with label बहुवचन. Show all posts
Showing posts with label बहुवचन. Show all posts

Saturday, October 7, 2017

कॉपीराइट के तिलिस्म में हिंदी के लेखक

पिछले वर्ष हिंदी के शीर्षस्थ आलोचक नामवर सिंह का नब्बेवां जन्मदिन धूमधाम के साथ दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में मनाया गया था। दिनभर चले इस कार्यक्रम में कई विद्वान लेखकों, विचारकों और केंद्रीय मंत्रियों के भाषण आदि भी हुए थे। नामवर जन्मोत्सव के दिन ही महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘बहुवचन’ का नामवर सिंह पर केंद्रित भारी भरकम विशेषांक विमोचित हुआ था। पत्रिका की चर्चा हुई, उसमें छपे लेखों की चर्चा हुई। अब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने ‘बहुवचन’ के नामवर सिंह पर केंद्रित अंक को पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया है जिसके संपादक विश्वविद्यालय के कुलपति गिरीश्वर मिश्र और उसी विश्वविद्यालय के हिंदी और तुलनात्मक साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष कृष्ण कुमार सिंह हैं । पुस्तक के प्राक्कथन में गिरीश्वर मिश्र ने स्वीकार किया है कि ‘यह सामग्री ‘बहुवचन’ के एक विशेष अंक में प्रकाशित हुई । शीघ्रता में उसमें कुछ त्रुटियां रह गई थीं। उसका लोकार्पण दिल्ली में 28 जुलाई को आयोजित गोष्ठी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के संस्कृति संवाद में किया गया। तभी यह लगा कि यह सामग्री ऐतिहासिक महत्व की है और इसे पुस्तकाकार प्रकाशित करना उपयोगी होगा। आशा है ‘हिंदी के नामवर’ नामवर जी के बहाने हिंदी की आलोचना यात्रा, उसकी संस्कृति, विकृति और निष्पत्ति को समझने में सहायक होगी।‘
यहां तक तो सबकुछ सामान्य लग रहा है। विश्वविद्लाय की एक पत्रिका ने विशेषांक छापा और फिर उसे पुस्तकाकार प्रकाशित करवा दिया गया। लेकिन सतह पर यह जितना सामान्य दिख रहा है उतना है नहीं। पुस्तक प्रकाशन में लेखकों के साथ छल है। पत्रिका के लिए लिखवाए गए लेख को पुस्तकाकार छापने के पहले लेखकों से लिखित अनुमति लेनी चाहिए थी, जो नहीं ली गई। दूसरे जब प्रकाशित पुस्तक मेरे पास पहुंची तो देखा कि इस पुस्तक का कॉपीराइट महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पास है। जबकि कानूनन इस पुस्तक की कॉपीराइट लेखकों के पास होनी चाहिए। अगर लेखकों से कॉपीराइट विश्वविद्यालय ने ली है तो उसके एवज में लेखकों को भुगतान किया जाना चाहिए था। वो भी नहीं हुआ। महात्मा गांधी के नाम पर बने एक केंद्रीय विश्वविद्लाय के कुलपति के संपादन में निकली पुस्तक में कानून का पालन नहीं होना हैरान करनेवाला है। अगर कुलपति ने यह महसूस किया था कि ‘बहुवचन’ के विशेषांक में प्रकाशित सामग्री ऐतिहासिक महत्व की है और उसको पुस्तकाकार प्रकाशित करवाना चाहिए तो फिर उनको पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए था। विश्वविद्यालय ने इस पुस्तक को प्रकाशित किया और उसका व्यावसायिक उपयोग होगा, क्योंकि पुस्तक पर मूल्य के तौर पर सात सौ पचास रुपए अंकित है। लेखकों से पत्रिका के लिए लिखवाकर, बगैर उनकी अनुमति के व्यावसायिक उपयोग के छापी गई यह पुस्तक कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन है। यह शीघ्रता में त्रुटि का केस भी नहीं है। यह मानना भी मुश्किल है कि किसी विश्वविद्लाय के कुलपति से इस तरह की लापरवाही हो गई, क्योंकि लापरवाही से कॉपीराइट विश्वविद्यालय के पास नहीं पहुंच सकता है। अगर कॉपीराइट लेखकों के पास होता तब भी माना जा सकता था कि किसी स्तर पर लापरवाही या जानकारी के आभाव में ऐसा हुआ लेकिन यहां तो ऐसा प्रतीत होत है कि सबकुछ जानते बूझते किया गया है। नियमों का पालन करते हुए भी इस ‘ऐतिहासिक महत्व’ की पुस्तक का प्रकाशन किया जा सकता था। यह पुस्तक महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा और संपादक द्वय के माथे पर एक ऐसा धब्बा है जिसमें लेखकों के अधिकारों का हनन चिन्हित है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बात के प्रकाश में आने के बाद विश्वविद्यालय अपनी गलती सुधार लेगा।
दरअसल महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से प्रकाशित ये पुस्तक तो एक उदाहरण मात्र है, हिंदी प्रकाशन जगत में इस तरह के छल छद्म बहुत हो रहे है। साहित्यक पत्रिकाओं के विशेषांकों की पुस्तकें फौरन बाजार में आ जाती हैं। लेखकों की अनुमति आदि की फिक्र होती ही नहीं है। राजेन्द्र यादव के संपादन में प्रकाशित ‘हंस’ के कई विशेषांक पुस्तकाकार प्रकाशित हुए जिनकी कॉपीराइट लेखकों के पास नहीं है। सिर्फ ‘हंस’ ही क्यों, अन्य साहित्यक पत्रिकाओं के संपादकों ने भी ये काम किया। कई साहित्यक पत्रिकाएं तो पुस्तक को ध्यान में रखकर ही अपने विशेषांकों की योजना बनाती हैं और उसको प्रकाशित करती हैं। बगैर किसी मेहनत के पुस्तक तैयार। अगर कुछ बिक-बिका गई तो बल्ले-बल्ले। इस काम में इन साहित्यक पत्रिकाओं के संपादकों को कुछ प्रकाशकों का भी सहोग मिलता है। हासिल क्या होता है यह तो पता नहीं लेकिन साहित्य में गैरे पेशेवर रवैये को बढ़ावा अवश्य मिलता है।
पत्रिकाओं के अलावा जो दूसरा बड़ा साहित्यक घपला है वो है संचयन प्रकाशित करने का। संचयन में किसी भी लेखक की रचनाओं से चुनकर कुछ रचनाओं को संकलित और प्रकाशित किया जाता है। चयन और संकलन के लिए एक अदद संपादक भी होता है। कई बार लेखक तो कई बार संपादक को कॉपीराइट मिल जाता है। अब यहां इसको समझने की जरूरत है। किसी लेखक की कुछ किताबें किसी प्रकाशक के पास है, कुछ किताबें किसी अन्य प्रकाशक के पास हैं और फिर जब संचयन छपता है तो वो तीसरे प्रकाशक के यहां से प्रकाशित होता है। होता यह है कि लेखक संचयन छपने की अनुमति तो दे देता है लेकिन वो अपने मूल प्रकाशक से उसकी अनुमति नहीं लेता है। दरअसल संचयन छापकर ना तो पाठकों का भला होता है और ना ही मूल प्रकाशकों का, हां, जो प्रकाशक संचयन छापता है उसको अवश्य फायदा हो जाता है कि अमुक बड़े लेखक की किताब उसके पास से प्रकाशित हुई है। बिक्री भी हो जाती है, उसका भी लाभ मिलता है वो अलग। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी संचयिता के प्रकाशन के वक्त भी महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय विश्विद्यालय को कानूनी पचड़े में फंसना पड़ा था। राधावल्लभ त्रिपाठी के संपादन में पुस्तक का प्रकाशन हो गया था। इसी दौरान द्विवेदी जी के बेटे ने विश्वविद्यालय पर केस कर दिया था। बाद में प्रकाशक की सूझबूझ से दोनों पक्षों में समझौता हुआ था।
हिंदी में कॉपीराइट को लेकर अजीब सी अराजक स्थिति है। हिंदी पाठकों के सामने इस तरह के कहानी संग्रह आते रहें हैं जिनके नाम हैं- मेरी श्रेष्ठ कहानियां, मेरी सर्वश्रेष्ठ कहानियां, मेरी प्रिय कहानियां, मेरी पांच कहानियां, मेरी पसंदीदा कहानियां आदि और उसके बाद मेरी संपूर्ण कहानियां। और तो और अब तो गौरतलब कहानियां भी प्रकाशित होने लगी हैं। इन सारे संग्रहों में घूम फिर कर वही कहानियां छपती रहती हैं, जो अलग अलग प्रकाशकों के यहां से अलग अलग नामों से छपती रही हैं। लेखक को थोड़ी बहुत रॉयल्टी सबके यहां से मिलती होगी लेकिन हर प्रकाशक खुश रहता है। पाठकों के साथ छल होता रहता है। अगर नाम देखकर पाठक ने कोई संग्रह खरीद लिया तो उसको निराशा हाथ लग सकती है। लेखक और प्रकाशक दोनों इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। हिंदी में ज्यादातर लेखकों की प्रिय, अप्रिय, पसंदीदा कहानियां जैसे संग्रह हैं। कॉपीराइट की फिक्र ना लेखक को और ना ही प्रकाशक को। एक और विषम स्थिति तब उत्पन्न होती है जब किसी लेखक को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल जाता है। साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलते ही अन्य भारतीय भाषाओं में पुरस्कृत लेखक की कृति का प्रकाशन होता है। उस वक्त भी कई बार कॉपीराइट को लेकर लेखक उसके मूल प्रकाशक और अकादमी के बीच विवाद खड़ा हो जाता है।

दरअसल अगर हम देखें तो हिंदी प्रकाशन जगत में प्रोफेशनलिज्म की बहुत आवश्यकता है। चंद प्रकाशकों को छोड़ दें तो अब भी लेखक और प्रकाशक के बीच एग्रीमेंट नहीं होता है। लेखक-प्रकाशक के बीच के एग्रीमेंट का कोई मानक नहीं है, और वो समय के साथ अपडेट होता है इस बारे में मुझे पक्की जानकारी नहीं है लेकिन संदेह है कि ऐसा होता होगा। कॉपीराइट कानून को लेकर भी लेखकों और प्रकाशकों में जागरूकता होनी चाहिए। होना तो ये चाहिए कि साहित्य अकादमी, हिंदी अकादमी और राज्य अकादमियों जैसी संस्थाएं इन विषयों पर भी सेमिनार, गोष्ठी आदि करे जिसमें कॉपीराइट कानून के जानकारों को बुलाकर उनके व्याख्यान करवाए जाएं। इस तरह के आयोजन नियमित अंतराल पर किए जाने चाहिए ताकि हर पीढ़ी के लेखकों और प्रकाशकों को कॉपीराइट के बारे में जानकारी हो, वो दोनों अपने-अपने अधिकारों को समझ सकें और उसके लिए बातचीत कर सकें। हिंदी प्रकाशन जहत के लिए प्रोफेशनलिज्म बहुत आवश्यक है क्योंक् अगर हिंदी को विश्व भाषा बनाने के संकल्प है तो फिर उसमें प्रकाशकों की बड़ी भूमिका होनेवाली है। विश्वविद्यालयों से उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि वहां कब क्या और कैसे हो जाता है यह किसी को पता नहीं रहता। नामवर पर जो ऐतिहासिक महत्व की सामग्री को पुस्तकाकार प्रकाशित किया गया है उसकी जिम्मेदारी किसकी है, किसे मालूम? 

Sunday, August 28, 2016

खुद को स्थापित करने की होड़

करीब तीन चार साल पहले की बात है अमेरिकी उपन्यासकार जोनाथन फ्रेंजन से हुई एक मुलाकात में उनके उस वक्त प्रकाशित होकर पूरी दुनिया में चर्चित हो चुके उपन्यास फ्रीडम पर काफी लंबी बातचीत हुई थी । बातचीत उनके लेखन पर शुरू हुई लेकिन हमारे यहां तो प्रशंसा की परंपरा रही है लिहाजा मैंने उनको याद दिलाना शुरू किया कि कैसे कई हफ्तों तक उनका उपन्यास फ्रीडम बेस्ट सेलर की सूची में बना रहा था । उपन्यास की शैली को लेकर अमेरिका और यूरोप के आलोचक इतने अभिभूत थे कि कई आलोचकों ने तो जोनाथन फ्रेंजन की तुलना टॉलस्टॉय और टॉमस मान से कर दी थी । मैं जब ये सारी बातें उनसे कह रहा था तो वो थोड़े असहज दिखने लगे थे और इन बातों को टालने के मूड में भी नजर आए थे । लेकिन अपन तो हिंदी साहित्य की प्रशंसा परंपरा का ख्याल रखते हुए उनको यहां तक बताने लगा था कि टाइम पत्रिका के कवर पर भी उनको जगह मिली थी और कृतियों की समीक्षा में अनुदार न्यूयॉर्क टाइम्स ने उक्त कृति को अमेरिकन फिक्शन का मास्टरपीस करार दिया था । बातचीत आगे बढ़ रही थी और प्रशंसात्मक हो रही थी जिसकी वजह से जोनाथन फ्रेंजन लगातार असहज होते जा रहे थे । टाइम मैगजीन के कवर तक आते आते जोनाथन फ्रेंजन के चेहरे पर अजीब सा भाव आने लगा था और अंतत उन्होंने कह ही दिया कि बेहतर हो कि हमारी बातचीत भारतीय लेखन की ओर मुड़े । उनके अनुरोध के बाद हमारी बातचीत भारतीय भाषाओं के साहित्य की ओर मुड़ गई थी । लेकिन एक सवाल मुझे मथ रहा था कि जोनाथन अपनी प्रशंसा क्यों नहीं सुनना चाह रहे थे । बातचीत खत्म हो गई ।
जब हम वहां से चले तो इस पूरे प्रसंग के बाद अचानक मुझे नीरद सी चौधरी की किसी किताब में लिखे शब्द याद आने लगे कि ब्रिटिश लेखक मुंह पर अपनी तारीफ सुनते ही असहज होने लगते हैं और खुद से तो कभी भी अपनी तारीफ नहीं ही करते हैं । संभव है कि अमेरिकन लेखकों में भी कुछ इसी तरह की मानसिकता रही हो, कम से कम जोनाथन फ्रेंजन में तो इसी तरह की मानसिकता दिखी थी । इधर अपने हिंदी साहित्य पर नजर डालिए तो स्थिति कितनी भिन्न नजर आती है । यहां लेखक खुद की प्रशंसा का एक भी मौका नहीं गंवाना चाहते हैं । सामने वाला प्रशंसा करने लगे तो फिर क्या कहने । लेख से लेकर कविता तक, उपन्यास से लेकर कहानी तक हर जगह और हर विधा में प्रशंसाकामी लेखक आपको घूमते टहलते मिल जाएंगें । अगर आपने तारीफ कर दी तो वो उस तारीफ को जोर-शोर से विज्ञापित भी करेंगे और तारीफ के वाक्य को सोशल मीडिया से लेकर हर मंच पर उसकी चर्चा की जुगत में रहेंगे ।
प्रशंसा सिंन्ड्रोम से वैसे लेखक ज्यादा ग्रसित हैं जिन्होंने कम लिखा है । इधर इधर से सामग्री इकट्ठा कर उपन्यास बना देना, रिपोर्ताज को कहानी की शक्ल में पेश कर देने वाले लेखक और कविता के नामपर भाषणबाजी करनेवाले कवि इसके सबसे ज्यादा शिकार हैं उनकी अपेक्षा रहती है कि उनकी कृति को महान कह दिया जाए । दरअसल ये उसी मनोविज्ञान का हिस्सा है जहां अगर गली मोहल्ले का कोई नेता गली में खडंजा या सड़क बनवा देता है तो पूरे इलाके में खुद को विकास पुरुष करार देते हुए पोस्टर लगा देता है । विकास पुरुष का मतलब क्या होता है ये जाने समझे बगैर । हिंदी साहित्य में भी आपको हर नुक्कड़ पर विकास पुरुष नजर आएंगे जो लगातार अपनी एक दो रचना को जोरदार तरीके से विज्ञापित करते घूमते हैं । गली मोहल्ले के नेता खुद को राजनीतिक महात्वाकांक्षा के चलते विकास पुरुष घोषित करते हैं उधर साहित्य के इन विकास पुरुषों की नजर छोटे मोटे पुरस्कारों पर टिकी रहती है । यही हाल कमोबेश हिंदी में लिखे जा रहे ज्यादातर संस्मरणों की भी है । यहां भी लेखक खुद को स्थापित करने में जुटा नजर आता है ।  
नामवर सिंह के नब्बे साल के उपल्क्ष्य में दिल्ली में जो जश्न हुआ था उस मौके पर महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका बहुवचन का उनपर केंद्रित एक अंक प्रोफेसर कृष्ण कुमार सिंह के संपादन में निकला था । उस अंक में करीब करीब जितने आलोचकों ने नामवर सिंह पर लिखा है सबके लेख में ये साबित करने की एक होड़ दिखाई देती है कि वो नामवर जी के कितने करीब थे या नामवर जी ने उनकी किन किन मौके पर कितनी तारीफ की । नामवर जी उनके किन किन पारिवारिक समारोहों में शामिल हुए। कुछ में तो यहां तक है कि नामवर सिंह ने उनको बुलाकर नौकरी दी ।  बहुवचन के इस अंक में साहित्य से जुड़े लोगों के लेख में नामवर निकटता का एक साझा सूत्र दिखाई देता है । यह प्रवृत्ति खासतौर पर उनमें ज्यादा दिखाई देती है जो विश्वविद्लायों में शिक्षक रहे हैं । वहीं जब साहित्येतर लोगों के उनपर लिखे संस्मरणों को देखें तो उसमें नामवर सिंह को लेकर एक अलग तरह की संवेदना दिखाई देती है- चाहे वो राम बहादुर राय का लेख हो या फिर संतोष भारतीय का ।
संस्मरण एक तरफ तो खुद को विकास पुरुष बताने की पूर्व पीठिका तैयार करने का माध्यम बनता है तो दूसरी तरफ अपनी खुंदक निकालने का भी । बहुवचन के इसी अंक में नामवर सिंह का अशोक वाजपेयी ने मूल्यांकन किया है । अपने विद्वतापूर्ण आलेख में अशोक जी ने नामवर जी के मूल्यांकन के चार आधार बताते हुए उसको अपने हिसाब से व्याख्यायित किया है । अशोक जी के मुताबिक विचारधारा के अतिरेक के अलावा नामवर सिंह के यहां तीन और अतिचार सक्रिय हैं- वाचिकता, अवसरवादिता और सत्ता का आकर्षण । नामवर सिंह की वाचिकता पर हिंदी साहित्य में लंबी बहस हो चुकी है लिहाजा अशोक वाजपेयी ने कोई नया सत्य उद्घाटित नहीं किया है ना ही ही कोई नई मान्यता स्थापित की है । इस बारे में काफी लिखा जा चुका है और नामवर सिंह ने भी कई बार अपने तर्क रखे हैं । रही बात अवसरवादिता और सत्ता के आकर्षण की  । अशोक वाजपेयी ने नामवर सिंह के साहित्यक आचरण में अवसरवादिता को अंतर्प्रवाह बताया है । इस पर बहस हो सकती है । नामवर सिंह पर उन्होंने सत्ता के आकर्षण का आरोप लगाते हुए कहा कि वो सत्ताधारियों के मंच पर होने पर बहुत विनम्र हो जाते हैं । संभव है कि अशोक जी ने देखा होगा और आंखो देखी पर संदेह करना उचित नहीं जान पड़ता है । वैसे भी सत्ता के आकर्षण के अशोक वाजपेयी के आंकलन पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता है क्योंकि सत्ता से नजदीकी का अशोक जी को अप्रतिम अनुभव है । मुझे तो वो प्रसंग भी याद है जब विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने थे तब वो अपने एक कविता संग्रह की भूमिका नामवर सिंह से लिखवाना चाहते थे ।उस वक्त नामवर सिंह ने वी पी सिंह को कहा था कि लोग कहेंगे कि आप प्रधानमंत्री होकर कविता छपवा रहे हैं, इसलिए मैं भूमिका नहीं लिखूंगा । जबकि विश्वनाथ प्रताप सिंह उदय प्रताप कॉलेज में नामवर सिंह के साथ पढ़ते थे और उनके पारिवारिक संबंध थे। यह अवश्य है कि नामवर सिंह के वी पी सिंह और चंद्रशेखर के साथ रिश्ते थे लेकिन इन रिश्तों का कभी कोई लाभ नहीं लिया । नामवर सिंह को जो भी पद मिले को उनके कद के हिसाब से ही थे । अशोक जी ने अपने संस्मरण में एक बहुत ही खतरनाक संकेत किया है कि जातिवाद का भी जब वो अमृत महोत्सव का हवाला देते हैं – सभी राजनेता थे, राजनीति और वर्तमान या भूतपूर्व सत्ताधारी होने की समानता थी- वे संयोगवश एक हीवर्ण के ही थे । नामवर सिंह पर ठाकुरवाद का बहुधा आरोप लगता रहा है लेकिन उनके नब्बे साल के करियर पर ठीक से विचार करें तो यह आरोप समय समय पर गलत भी साबित होते रहे हैं ।

उक्त प्रसंगों के उल्लेख का उद्देश्य साहित्यकारों में बहुधा देखेजानेवाले प्रशंसाकामना पर टिप्पणी करना था साथ ही किसी अन्य पर लिखे संस्मरणों के बहाने अपने को साबित करने की लालसा को रेखांकित करना भी। इस मायने में हिंदी के साहित्यकार विदेशी साहित्यकारों से कितने अलग हैं । राजेन्द्र यादव अगर जीवित होते तो मेरे इस लेख को पढ़कर कहते कि हिंदीवालों को लेकर छाती कूटना बंद करो । जब देखा तब हाय ये नहीं है हाय वो नहीं करने लग जाते हो । आज उनका जन्मदिन है इस वजह से उनका स्मरण हो आया । उनके जन्मदिन के मौके पर आदरपूर्वक उनके सामरे फिर से हमारा वही तर्क होता कि जब तक हम अपनी कमियों खामियों पर उंगली नहीं रखेंगे या पके हुए घाव को फोड़कर मवाद बाहर नहीं निकालेंगे तो घाव अंदर ही अंदर फैलता रहेगा जो कि बेहद खतरनाक होगा । 

Sunday, May 10, 2009

पत्रिकाओं के बहाने...

25 जून 1999 को समीक्षक और स्तंभकार भारत भारद्वाज ने मुझे एक भारी भरकम पत्रिका का प्रवेशांक भेंट किया जो आकार प्रकार और अपने सादे कवर की वजह से आकर्षक लग रहा था । उस पत्रिका का नाम था- बहुवचन, प्रकाशक था महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और पत्रिका के प्रधान संपादक थे विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति अशोक वाजपेय़ी, जिनके संपादक के रूप में नाम छपा था पीयूष दईया का । आज से लगभग दस वर्षों पूर्व जब ये पत्रिका छपी थी तब पीयूष दईया का नाम हिंदी में नया और अनजाना सा था । बहुवचन के साथ ही विश्विविद्यालय ने दो और पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ किया था- पुस्तक वार्ता जिसके भी प्रधान संपादक अशोक वाजपेयी थे और पत्रकार थे पत्रकार राकेश श्रीमाल । तीसरी पत्रिका थी अंग्रेजी में - हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग, इसके संपादक थे रुस्तम सिंह । 
जब इन पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरु हुआ था तो तो हिंदी साहित्य में इसपर जमकर बहस चली थी । अशोक वाजपेयी के विरोधियों का आरोप था कि विश्विविद्यालय का काम पत्रिकाएं छापना नहीं है । लेकिन इन आरोप लगानेवालों को ये ज्ञान नहीं था कि देश-विदेश की लगभग सभी विश्विविद्यालयों से पत्रिकाएं निकलती हैं, चाहे वो कैंब्रिज हो , ऑक्सफोर्ड हो या फिर लखनऊ या भागलपुर विश्विविद्यालय । ये अवश्य है कि भारत में विश्वविद्यालयों की पत्रिकाएं सिर्फ रस्मी तौर पर निकलती हैं जिसे छपने के बाद गोदामों में ठूंस दिया जाता है, जिसे कालांतर में रद्दी के भाव बेच दिया जाता है। क्या मुझे यहां ये कहने की जरूरत है कि ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज से निकलने वाली पत्रिकाओं की विश्व में क्या प्रतिष्ठा है ? 
लंबे समय से विश्विद्यालय के हिंदी विभागों में कुंडली मारकर बैठे साहित्य के आचार्यों को ये बात हजम नहीं हो रही थी कि हिंदी के नाम पर खुले विश्विविद्यालय में उनकी कोई पूछ नहीं हो रही है । नए-नए 'लौंडे लफाड़ों' को पत्रिका का संपादक बना दिया गया है और वर्षों से साहित्य साधना में लीन आचार्यों की प्रतिष्ठा और निष्ठा को दरकिनार कर दिया गया है । अशोक वाजपेयी पर जमकर हमले हुए लेकिन पांच वर्षों 'बहुवचन' और 'पुस्तक वार्ता' नियमित रूप से निकलती रही । हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग का प्रकाशन अवश्य बाधित हुआ, वजह तो तत्कालीन कुलपति ही बता सकते हैं । अशोक वाजपेयी के बाद जी गोपीनाथन कुलपति बने, जिनके कार्यकाल में धीरे-धीरे इन पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया, साहित्य जगत को खबर भी नहीं लगी । 
अब नए कुलपति विभूति नाराय़ण राय के प्रभार संभालने के बाद फिर से इन तीनों पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरु हुआ है । बहुवचन (संपादक- राजेन्द्र कुमार), पुस्तक वार्ता(संपादक- भारत भारद्वाज), हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग(संपादक- ममता कालिया) । दस वर्षों में बहुवचन का टैग लाइन भी बदल गया है जो पत्रिका के बदले हुए मिजाज का संकेत है । प्रवेशांक में लिखा था- बहुवचन, साहित्य भाषा शोध विचार की पत्रिका । लेकिन अब बहुवचन- बहुसुमन, बहुरंग निर्मित एक सुंदर हार- हो चुका है । इन दोनों टैग लाइन पर ही अगर हम विचार करें तो पत्रिका के चरित्र में बदलाव को साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । पहले अंक में - यह प्रवेशांक- शीर्षक से एक टिप्पणी थी, जिसमें लिखा गया था कि 'यह प्रयत्न हिंदी में सक्रिय अनेक पीढ़ियों, अनेक दृष्टियों और शैलियों के लेखकों को एकत्र करने का है ।' जो उस अंक में दिखा भी था । बहुवचन के नए अंक में संपादकीय का शीर्षक देखिए - 'यह नवोन्मेषांक ।' ये हिंदी इतनी कठिन है कि आम पाठकों को भी समझ नहीं आएगी । संपादकीय में भी जिस शास्त्रीय शब्दावली का प्रयोग किया गया है जो इसको न सिर्फ जटिल बना देता है बल्कि बोझिल भी । महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का एक उद्देश्य पूरे विश्व में हिंदी को इंटरनेशनल भाषा के तौर पर मान्यता दिलवाना भी है । लेकिन अगर पत्रिका के संपादक ही इस तरह की जटिलतम भाषा का इस्तेमाल करेंगे तो हिंदी पढ़ने समझनेवाले ही इससे दूर हो जाएंगे, गैर हिंदी भाषी के तो पास आने का सवाल ही नहीं उठता । 
बहुवचन के संपादक राजेन्द्र कुमार ने अपने संपादकीय में लिखा है- 'यह शिकायत प्राय सुनने को मिलती है कि हमारे विश्वविद्यालय अकादमिक जड़ता के 'भव्य ठिकाने' होते जा रहे हैं । खासतौर से हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन 
में लगे लोगों के बारे में आम धारणा यह है कि भाषा और साहित्य उनके लिए वहीं तक महत्वपूर्ण जहां तक वह उनकी आजीविका का विषय बनता हो । जिज्ञासा का विषय वो बने, इसका क्या लाभ । अपने ज्ञान के स्तर को अद्यतन बनाने में उनकी अधिक रुचि नहीं, जितनी अपनी सुख सुविधाओं को अद्यतन बनाने में ।' और बहुवचन का ये पूरा अंक इस आम धारणा को पूरी तरह से नहीं तो आंशिक तौर पर अवश्य ही मजबूत करता है । इसके अलावा अगर हम बहुवचन के जनवरी-मार्च 2009 के अंक के लेखकों की सूची पर नजर डालें तो ये पत्रिका महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की कम जन संस्कृति मंच की पत्रिका ज्यादा लगती है । 
दूसरी पत्रिका- पुस्तक वार्ता- के संपादक भारत भारद्वाज हैं जो पिछले दो दशकों से हंस में के अपने लोकप्रिय स्तंभ और अन्य पत्र पत्रिकाओं में लेखकों की खबर लेते रहे हैं । इस पत्रिका के चरित्र में कोई ज्यादा बदलाव नहीं किया गया है । लेकिन संपदकीय में भविष्य में इसकी प्रकृति में बदलाव के संकेत साफ हैं- 'यह मुख्यत समीक्षा (रिव्यू) की पत्रिका है । कुछ कुछ अंग्रेजी की 'बिब्लियो' और 'द वीक रिव्यू' की तरह । लेकिन भविष्य़ में इसकी प्रकृति में  बदलाव करते हुए सृजनात्मकता और समकालीन वैचारिक विमर्श का उन्मुक्त मंच बनाने की मेरी आकांक्षा है ।' लोकार्पण समारोह में विश्वविद्यालय के कुलाधिपति नामवर सिंह ने भारत भारद्वाज को बहुपठित और अद्यतन सूचनाओं से लैस लेखक बताते हुए अपनी अपेक्षाएं भी जाहिर की थी । पुस्तक वार्ता के ताजे अंक में कुंवर नारायण पर पठनीय सामग्री है । बजुर्ग आलोचक नंदकिशोर नवल ने अपनी याददाश्त के आधार पर पुस्तकों की एक लंबी सूची गिना दी है, कुछ रोचक प्रसंगों के साथ । इस अंक की एक विशेषता साहित्य कोलाहल है, जिसे प्रज्ञाचक्षु के छद्म नाम से कोई लिख रहा/रही है । ये स्तंभ काफी रोचक और दिलचस्प जानकारियों से भरा है । लेकिन पुस्तक वार्ता की आत्मा भी बिहार की ओर झुकी नजर आती है, बावजूद इसके आनेवाले दिनों में ये पत्रिका हिंदी में सार्थक हस्तक्षेप की आहट तो दे ही रही है । 
वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया ने  हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग का संपादन किया है । इस पत्रिका पर हिंदी में जो कुछ महत्वपूर्ण लिखा जा रहा है या लिखा जा चुका है उसे अंग्रेजी में अनूदित करवा कर विश्व पटल पर पेश करना है । ममता कालिया जब इस पत्रिका की संपादक बनी थीं तब विश्वविद्यालय से जुड़ी गगन गिल ने अच्छा खासा विवाद खड़ा कर दिया था, जिसे जनसत्ता संपादक ओम थानवी ने भी हवा दी थी । लेकिन अब जब पत्रिका छपकर आई तो तमाम विवादों पर विराम लगा गया । इस पूरी पत्रिका में रचनाओं और रचनाकारों के चयन में बेहतरीन संपादकीय दृष्टि को साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । रचनाकारों के चयन में ममता कालिया पर ये आरोप है कि उन्होंने अपनी पत्रिका में अपने पति रवीन्द्र कालिया की रचना का अनुवाद छापा । लेकिन आलोचना करनेवाले ये भूल जाते हैं कि रवीन्द्र कालिया हिंदी के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं और कोई भी संपादक उनकी रचनाएं छापने को उत्सुक रहता है । लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या रिश्तेदार होने की वजह से ही सिर्फ लेखक को दरकिनार करने का हक संपादको को है । कतई नहीं । हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग की सबसे बड़ी कमजोरी अनुवाद है । ज्यादातर अनुवाद में वो प्रवाह और रवानगी नहीं है जो मूल रचनाओं में है । इसके अलावा इस पत्रिका में अगर तीन महीनों में हिंदी की महत्वपूर्ण गतिविधियों को शामिल किया जा सके तो गैंर हिंदी भाषियों की जानकारी समृद्ध होगी और विश्विविद्यालय के उद्देश्य की पूर्ति भी ।