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Saturday, October 24, 2026

संस्कार की धरा पर विराट संस्कृति


दुर्गा पूजा और पंडाल कोलकाता की उत्सवी संस्कृति का वो हिस्सा है जिसको हर भारतीय को एक बार महसूस करना चाहिए। नवरात्र के दौरान कोलकाता में देवी दुर्गा के आगमन से लेकर प्रस्थान तक का उत्सव भारतीय संस्कृति के उस आयाम को उद्घाटित करता है जहां संस्कार हैं, मर्यादा है, नवाचार है ,सहयोग से समन्वय का सोच है। देवी दुर्गा की मूर्ति से लेकर पंडाल तक में प्रयोगधर्मिता है। ऐसी प्रयोगधर्मिता जो जन के मन से जुड़कर उनके संस्कार को झंकृत करता है। इस वर्ष तो इनके साथ परिवर्तन भी जुड़ा है। कोलकाता के दुर्गा पूजोत्सव में प्रयोगधर्मिता पंडाल के डिजायन से लेकर मां की प्रतिमा निर्मित तक में दिख रही है। परंतु प्रयोग के नाम पर संस्कार को किसी भी प्रकार से खंडित नहीं किया जाता है। महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा में पौराणिक आख्यानों में वर्णित सारे प्रतिमान दिखेंगे। महिषासुर वध भी होगा, माता की भुजाओं में अस्त्र और कमल का फूल होगा लेकिन किसी प्रतिमा में वो एक भुजा में गणेश को उठाए भी होंगी। उनके पांवों के नीचे महिषासुर होगा ही। 

कहना ना होगा कि ये प्रयोगधर्मिता सनातन के संस्कारों से निर्मित होती है। जो इस वर्ष कोलकाता के पंडालों में दिख रही है। कहीं वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने की थीम, तहीं राम की अयोध्या, कहीं महाभारत तो कहीं देवी दुर्गा की ब्रहंमांडीय शक्ति को बताती विश्वरूपा-विश्वरूपिणी का विराट स्वरूप।कोलकाता में दुर्गा पूजा के अवसर पर नवरात्र में विशेषकर पांच दिनों तक पूरा शहर भक्ति में सराबोर होता है लेकिन किसी भी पंडाल में आपको कानफोड़ू संगीत का शोर नहीं सुनाई देगा। डीजे पर बजनेवाले फिल्मी संगीत भी अनुपस्थित। इन पांच दिनों के दौरान जो संस्कृति आकार लेती है उसमें ढाक के स्वर, रवीन्द्र संगीत की कर्णप्रिय धुनें और देवी मां की प्रतिमा के आगे ढाक की धुन पर धुनुची नृत्य करती महिलाएं। ये नृत्य मां दुर्गा के भक्तों में उल्लास भरता है। पंडाल और उसके आसपास खाने पीने की वस्तुएं बिकती हैं। इन स्टाल्स में विशेष प्रकार की सुरुचिसंपन्नता दिखती है। दुर्गा जी की प्रतिमा लगभग सभी मुहल्ले में स्थापित होती है लेकिन कहीं कोई शोर नहीं। कहीं कोई अफरातफरी नहीं। आत्मनियंत्रण और एक दूसरे के साथ सहयोग करते लोग। पांडालों के बीच कोई द्ववंद्व नहीं बल्कि संयोग और सहयोग का समन्वय दिखता है जो बंगाल की इस संस्कृतिक विरासत की एक अमिट छाप छोड़ता है। इस बार कोलकाता के विभिन्न दुर्गा पंडालों में सनातनी संस्कृति को लेकर एक विशेष आकर्षण दिखता है। जिस भूमि पर जयश्रीराम कहने पर सत्ताधारियों की भृकुटि तन जाती थी वहां अब पंडालों के बाहर राम-राम लिखा है। छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय के लोग भजन गा रहे हैं। परिवर्तन ने बंगाल में सनातन के सातत्य को बल प्रदान किया।