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Saturday, March 21, 2026

अकादेमी पुरस्कारों से उठते गंभीर प्रश्न


आखिरकार साहित्य अकादेमी ने अपने वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा कर ही दी। जैसी की साहित्य जगत में चर्चा थी उसी अनुसार अरुण कमल, अरविंदाक्षण और अनामिका की जूरी ने हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया को हिंदी के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार देने की घोषणा की। पिछले वर्ष दिसंबर में जब आखिरी समय में नाटकीय ढंग से साहित्य अकादेमी पुरस्कारों की घोषणा रोक दी गई थी तब इसको लेकर कई तरह के कयास लगाए गए थे। कुछ लोग इसको साहित्य अकादेमी की स्वयत्तता से जोड़कर देख रहे थे। कुछ इसको पुरस्कार के स्थगित होने की आशंका से व्यथित थे। घोषणा के समय के आसपास ही मंत्रालय ने साहित्य अकादेमी, ललित कला अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और संगीत नाटक अकादमी को एक पत्र, फाइल संख्या एकेडी-18/27/2025 एकेएडी, दिनांक 18 दिसंबर 2025 भेजी। इस पत्र में इन संस्थाओं के प्रमुखों को संस्कृति मंत्रालय के साथ जुलाई 2025 में हुई करार (एमओयू) की याद दिलाई गई थी। कहा गया था कि एमओयू के मुताबिक सभी अकादमियां संस्कृति मंत्रालय से विमर्श करके अपने पुरस्कारों का पुनर्गठन करेगी। उसी पत्र में मंत्रालय ने ये भी सूचित किया था कि जबतक पुरस्कारों का पुनर्गठन नहीं हो जाता है, तबतक मंत्रालय की पूर्व अनुमति के बिना प्रकिया नहीं हो सकती। यहां यह प्रश्न उठता है कि इन तीन महीनों में क्या साहित्य अकादेमी की पुरस्कार प्रक्रिया का पुनर्गठन हो गया? 

दरअसल साहित्य अकादेमी के पुरस्कारों को लेकर विवाद होते रहे हैं। 2024 में सरकार ने सभी अकादमियों के पुरस्कारों को पद्म पुरस्कारों की तरह पारदर्शी बनाए जाने को ध्यान में रखते हुए प्रक्रिया को बदलने को कहा था। जिसमें पाठकों की भी सहभागिता सुनिश्चित करने की बात थी। पहले व्यवस्था ये थी कि हर भाषा के दो विशेषज्ञ संबंधित भाषा की पुस्तकों की आधार सूची तैयार करते थे। इन विशेषज्ञों को भाषा की सलाहकार समिति के सदस्यों के सुझाए गए पैनल के आधार पर अध्यक्ष तय करते थे। अकादेमी ने इस नियम को बदलकर आधार सूची की व्यवस्था समाप्त कर दी थी। अकादेमी ने 2025 में विज्ञापन प्रकाशित किया था। विज्ञापन के अनुसार लेखक, प्रकाशक या कोई भी व्यक्ति किसी पुस्तक को पुरस्कृत करने की अनुशंसा या सुझाव दे सकता था। विज्ञापन के बाद जब पुस्तकें आ जाती तो अकादेमी ने उनकी सूची संबंधिक भाषा की सलाहकार समिति के सभी सदस्यों को भेजा था। उनसे अनुरोध किया गया था कि उस सूची में से दो पुस्तकों की अनुशंसा करें। सलाहकार समिति के सदस्य स्वयं भी पुरस्कार के लिए सूची से बाहर की पुस्तक भी सुझा सकते हैं। सलाहकार समिति के सदस्यों से प्राप्त सूची को प्राथमिक पैनल को भेजा जाता है। प्राथमिक पैनल का गठन भाषा की सलाहकार समिति के सुझाए गए नामों के आधार पर तैयार पैनल में से अध्यक्ष चुनता है। ये पैनल हर भाषा में 10 लोगों का होता है जो गोपनीय रखा जाता है। प्राथमिक पैनल के सदस्यों से दो-दो पुस्तकों के नाम मांगे जाते हैं। किसी भी भाषा के लिए निर्णायक समिति के सामने प्रथामिक पैनल द्वारा भेजी गई सूची और पुस्तकें रखी जाती हैं। हिंदी में सलाहकार समिति के सदस्य अधिक हैं इस कारण अधिक पुस्तकें आती हैं। 

अब यहां से निर्णायक समिति की भूमिका आरंभ होती है जिसको फाइनल जूरी कहते हैं। इस जूरी के सदस्यों का चयन अध्यक्ष करता है। ये सूची भी संबंधित भाषा की सलाहकार समिति के सदस्य के सुझाए गए पैनल से ही होता है। हिंदी के चूंकि 22 सदस्य आमसभा में होते हैं इस कारण से वो सभी सलाहकार समिति के सदस्य होते हैं। अध्यक्ष अपनी मर्जी से पैनल से तीन सदस्यों का चयन करता है जो पुरस्कृत होनेवाले लेखक की कृति को चुनते हैं। पुरस्कृत कृति का चयन बहुमत से या सर्वसम्मति से होता है। हिंदी के लिए इस बार जो चयन समिति बनी उसमें अरुण कमल और अरविंदाक्षण की विचारधारा वामपंथी है। अनामिका का झुकाव घोषित तौर पर वामपंथ की तरफ नहीं है लेकिन वो बहुधा बहुमत के साथ रहती हैं। अरुण कमल तो लंबे समय तक प्रगतिशील लेखक संघ के पदाधिकारी रहे हैं।  जब दिसंबर 2025 में साहित्य अकादेमी के पुरस्कारों की घोषणा होनेवाली थी और उसको मंत्रालय ने रोका था तो यही दलील दी गई थी कि पुरस्कार प्रक्रिया का पुनर्गठन नहीं हुआ। जबकि उपरोक्त व्यवस्था पिछले वर्ष प्रकाशित विज्ञापन के साथ ही आरंभ हो गई थी। 31 अक्तूबर को अकादेमी के तत्कालीन सचिव सेवानिवृत्त हो गए। 1 नवंबर 2025 को उनकी जगह संस्कृति मंत्रालय की एक अधिकारी ने सचिव का कार्यभार संभाला। जब 2025 के पुरस्कार के लिए पैनल बन रहा था तो मंत्रालय की अधिकारी साहित्य अकादेमी में सचिव के तौर पर तैनात थीं। उनके सचिव रहते ही फाइनल जूरी के सदस्यों को अध्यक्ष ने मनोनीत किया। उनकी देखरेख में भी अकादमी के पुरस्कारों की प्रक्रिया चली। उन्होंने सब जगह हस्ताक्षर किए होंगे ऐसा माना जा सकता है। अकादेमी में मंत्रालय की प्रतिनिधि के तौर पर सचिव का कार्यभार संभाल रही अधिकारी के दस्तखत से एजेंडा बना होगा। उस एजेंडा पर कार्यकारिणी ने विचार किया। फिर पुरस्कारों को अंतिम स्वरूप दिया गया। उसके बाद पुरस्कार की घोषणा के लिए मीडिया के लोगों को आमंत्रण भी प्रभारी सचिव की तरफ से ही गया था। 

प्रश्न ये उठता है कि अगर अकादेमी मंत्रालय के साथ किए गए एमओयू को बगैर माने पुरस्कार की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही थी, तो मंत्रालय की जो अधिकारी सचिव का कार्यभार संभाल रही थीं, उन्होंने आपत्ति क्यों नहीं की। हर बैठक में सचिव की उपस्थिति होती है। अगर एमओयू का उल्लंघन हो रहा था तो सचिव ने मंत्रालय को अलर्ट क्यों नहीं किया?  कार्यकारिणी की बैठक में आपत्ति क्यों नहीं उठाई। एजेंडा पर हस्ताक्षर करते समय अध्यक्ष से प्रश्न क्यों नहीं किए गए। ठीक पुरस्कार घोषित होने के समय ही संस्कृति मंत्रालय को ये याद कैसे आया कि एमओयू का उल्लंघन हो रहा है। अब तीन महीने में ऐसा क्या बदल गया कि पुरस्कृत लेखकों की उसी सूची को जारी कर दिया गया जिसे रोका गया था। दरअसल हिंदी की जूरी का नाम और पुरस्कृत होनेवाली लेखिका ममता कालिया का नाम साहित्य के गलियारे में सबको पता था। कई इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर ममता कालिया के नाम की घोषणा भी हो चुकी थी। ममता कालिया की छवि कांग्रेस की पक्षधर और मोदी सरकार की विरोधी की रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय ममता जी के नाम की इतनी अधिक चर्चा हो गई कि मंत्रालय ने पुरस्कार की घोषणा को टालना उचित समझा। अन्यथा मंत्रालय को अब स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि दिसंबर में किस नियम का पालन साहित्य अकादेमी ने नहीं किया जिसका पालन तीन महीने में हो गया? एमओयू के करार के अंतर्गत पुनर्गठन हुआ या नहीं? अगर नहीं तो फिर पुरस्कारो की घोषणा क्यों ? 

दरअसल अगर हम साहित्य और संस्कृति से जुड़ी अकादमियों को देखें तो वहां ऐसे लोग बैठे हैं जो साहित्य से अधिक राजनीति करते हैं। अपने-अपने को पुरस्कार देने का खेल खेला जाता है। इस तरह के आरोप इस कारण भी उचित प्रतीत होते हैं कि हिंदी की सूची को देखने के बाद लगता है कि ममता कालिया की संस्मरणात्मक कृति ‘जीते जी इलाहाबाद’ अपेक्षाकृत कमजोर कृति है। इस सूची में कई ऐसी पुस्तकें थीं जो उनकी कृति से मजबूत हैं। साहित्य अकादेमी को चाहिए कि वो अब अपने नियम को बदलकर कृति के स्थान पर लेखक/लेखिका के समग्र लेखन पर पुरस्कार देना तय करे। पिछले वर्षों में कई बुजुर्ग लेखकों को उनकी कमजोर कृतियों पर पुरस्कार देकर उपकृत किया गया। विचारधारा का पोषण भी। साहित्य अकादेमी में वामपंथ की विचारधारा बहुत गहरे तक है उससे पार पाना मुश्किल है। उन वामपंथियों की पहचान मुश्लिल है जो इन दिनों रामनामी ओढ़कर अकादेमी में राजनीति कर रहे हैं। 


Monday, September 30, 2019

'लेडी नामवर' की उदार अपेक्षा


हिंदी के चर्चित लेखक और अनुवादक प्रभात रंजन ने फेसबुक पर लिखा, ‘मनोहर श्याम जोशी अक्सर एक बात कहते थे तुम हिंदी वाले हिंदी को ढंग का एक लेखक भी नहीं दे पाए (उनकी मुराद मेरे जैसे हिंदी के विद्यार्थियों से होती थी)। हिंदी के अधिकांश बड़े लेखक वे हैं जो मूलत: हिंदी भाषा-साहित्य के विद्यार्थी नहीं हैं। उसके बाद वो नाम गिनाना शुरू करते- प्रेमचंद, जैनेन्द्र, बच्चन, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, रामविलास शर्मा, भीष्म साहनी, कमलेश्वर, कृष्ण बलदेव वैद, अशोक वाजपेयी आदि आदि के बाद कुछ देर रुककर कहते और मैं ( वे स्वयं विज्ञान स्नातक थे)। एक बार मैंने जवाब दिया कि भले अधिकांश लेखक हिंदी के बाहर के रहे हों लेकिन आचार्य तो एक हिंदी वाला ही है, नामवर सिंह। जोशी जी अपना चश्मा उतारकर कुछ देर अपनी आंखों को मलते रहे, फिर चश्मा पहनकर बोले, तुम हिंदी वाले दूसरा नामवर भी पैदा नहीं कर पाओगे।‘ जैसा कि आमतौर पर होता है कि प्रभात रंजन की पोस्ट पर तरह तरह के कमेंट आते हैं, मनोरंजक भी गंभीर भी, चुटीले भी, कुंठा से भरे हुए भी, प्रशंसात्मक भी, उस दिन भी आए। सबसे दिलचस्प टिप्पणी लिखी वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया ने। उन्होंने लिखा, ‘अब एक महिला नामवर की जरूरत है। कुर्सी खाली पड़ी हुई है। रोहिणी अग्रवाल से हम सबको उम्मीद है।‘  ममता जी बेहद सजग लेखिका हैं और शब्दों का चयन सावधानी से करती हैं लेकिन ऐसा लगता है कि अतिरिक्त स्नेह में शब्दों के चयन में वो उदार हो गईं। रोहिणी अग्रवाल में उनको महिला नामवर बनने की उम्मीद नजर आ गई। अब फेसबुक पर चलनेवाली बहसों में या फेसबुक की टिप्पणियों में राय तो फैसले की शक्ल में ही आती है जिसका आधार भी आवश्यक नहीं होता। ममता कालिया की टिप्पणी भी इसी शक्ल में आई लेकिन चूंकि उन्होंने अपेक्षा की थी लिहाजा उसको फैसले की तरह नहीं देखकर अपेक्षा की तरह देखते हैं। लेकिन ममता कालिया की इस टिप्पणी में अपेक्षा के साथ-साथ उम्मीद भी थी, इस वजह से जब मैंने इस टिप्पणी को देखा तो चौंका । ममता कालिया जैसी वरिष्ठ और संजीदा रचनाकार को किसी भी लेखक में नामवर सिंह बनने की उम्मीद नजर आती है तो उसको गंभीरता से लेना चाहिए। उसके लेखन का गंभीरता से विश्लेषण करना चाहिए। रोहिणी अग्रवाल विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाती हैं। निरंतर समीक्षानुमा टिप्पणियां करती हैं लेकिन आलोचना जिस अनुशासन और तैयारी की मांग करती है वो उनकी टिप्पणियों में अनुपस्थित दिखता है। एक तो उनकी ज्यादातर टिप्पणियां प्रशंसात्मक होती हैं। दूसरे ज्यादातर रचनाएं उनको आह्लाद और आनंद से भर देती हैं। वो ज्यादातर उन्हीं कृतियों पर टिप्पणी करती हैं जो ‘अद्भुत’ होती हैं और ‘लंबी लकीर’ खींचती हैं। अभी कुछ दिनों पहले उन्होंने लक्ष्मी शर्मा की कहानी पर एक टिप्पणी लिखी उसका एक अंश देख सकते हैं, ‘जानती हूं कहानी के प्रभाव से चौतरफा घिर कर मैं बहुत कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण कह रही हूं। खुद अपने को बरजना और दुरुस्त करना भी चाहती हूं कि स्त्री की दुरावस्था में स्वयं स्त्री का भी हाथ है। चौबीस घंटे पुरुष को कोसते रहना अपनी निष्क्रियता और कमतरी का स्वीकार है। लेकिन क्या यह भी आज के प्रगतिशील उदार समय का सच नहीं कि डांट-फटकार उपहास-उपेक्षा खाने की प्लेट में परोसी जानेवाली कुछ डिशेज हैं जिन्हें बुद्धिजीवी कमाऊ स्त्री भी पारिवारिक शांति के नाम पर निगल लेती है ?... लक्ष्मी शर्मा की कहानी ‘रानियां रोती नहीं’ पढ कर मन में उगी रॉ प्रतिक्रिया, आलोचना तो लिख नहीं पाई लक्ष्मी जी, चित्त का उबाल आलोचना के आधार को तहस नहस कर देता है न!’ ये टिप्पणी उनकी है जिनसे ममता कालिया नामवर सिंह बनने की उम्मीद कर रही हैं। इनके बिंब देखिए, जब वो लिखती हैं डांट-फटकार और उपहास-उपेक्षा को खाने वाली प्लेट में परोसी जानेवाली डिशेज बताती हैं। ये बिंब उत्तर आधुनिकता के नाम पर छात्रों को तो पढ़ाई जा सकती हैं लेकिन क्या इस तरह के बिंबों को अपनी टिप्पणियों में रचकर कोई नामवर हो सकता है या नामवर के आसपास भी पहुंच सकता है। या इस तरह की भाषा और बिंब को हिंदी आलोचना स्वीकार करेगी। दूसरे उनके एक और शब्द ने चकित किया वो है ‘रॉ’ प्रतिक्रिया। काफी देर तक को ‘रॉ’ का मतलब समझ नहीं पाया। फिर लगा कि वो अनगढ़ प्रतिक्रिया की बात कर रही हैं। यह तो कतई हिंदी आलोचना की भाषा नहीं हो सकती। यह कहा जा सकता है कि उपरोक्त टिप्पणी फेसबुक पर लिखी गई है इसलिए इसमें गंभीरता से नहीं लेना चाहिए । पर प्रतितर्क ये भी हो सकता है कि एक सार्वजनिक मंच पर की गई टिप्पणी से उसके लेखक की भाषा और भाव के संकेत तो मिल ही सकते हैं। हिंदी में कहा जाता है कि अच्छी आलोचना रचना की ही तरह भाषा का शास्त्रीय नहीं बल्कि सृजनात्मक उपयोग करती है। 
ममता कालिया ने जब रोहिणी अग्रवाल में संभावना देखी और उनका नाम सार्वजनिक तौर पर लिखा तो एक किस्से का स्मरण हो आया जो हिंदी के एक वरिष्ठ उपन्यासकार ने बताया था। हुआ यूं कि वो एक दिन अपने एक मित्र की पुस्तक प्रकाशन की सिफारिश लेकर हिंदी के शीर्ष प्रकाशकों में से एक के यहां पहुंचे। बातचीत शुरू हुई और उपन्यासकार महोदय ने अपने आने का उद्देश्य प्रकाशक महोदय को बताया। पूरी बात सुनने के बाद प्रकाशक महोदय ने जो उत्तर दिया वो आलोचना और समीक्षा पर की गई सटीक टिप्पणी थी। प्रकाशक ने उपन्यासकार से कहा कि आप जिनकी सिफारिश लेकर आए हैं वो समीक्षा लिखते हैं और हम समीक्षा की पुस्तक प्रकाशित करते नहीं हैं। जब उपन्यासकार ने जोर दिया तो प्रकाशक और खुले और बोले कि आलोचना के लिए एक विशेष तैयारी और अध्ययन की जरूरत होती है। आलोचना योजनाबद्ध तरीके से की जाती है जबकि समीक्षा करने के अन्यान्य कारण होते हैं। अब उपन्यासकार महोदय सन्न। उनसे कुछ कहते नहीं बना और वो प्रकाशक के यहां से उठकर चले आए।
दरअसल आलोचना बहुत कठिन विधा है। इस विधा का साधने के लिए आवश्यक है कि आप अपने देश की लेखन परंपरा से पूरी तरह परिचित हों। ना सिर्फ परंपरा बल्कि समकालीन लेखक क्या लिख रहे हैं और वो अपने लेखन में किस तरह का प्रयोग कर रहे हैं, अपने लेखन से अपनी परंपरा को किस चरह से चुनौती दे रहे हैं आदि। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर इस वक्त साहित्य में किस तरह का लेखन हो रहा है, किस तरह की नई लेखकीय प्रवृत्ति आकार ले रही है इसका भी भान हो। नामवर सिंह ने ना सिर्फ विदेशी साहित्य को पढ़ा था बल्सि संस्कृत समेत अन्य भारतीय भाषाओं के लेखन से भी परिचित थे। नामवर सिंह की एक खूबी और थी कि वो अपने समकालीनों को तो पढ़ते ही थे, नए से नए लेखकों की रचनाएं भी उनकी नजर से गुजरती थी और जब भी उनको उचित लगता था तो उसपर टिप्पणी भी करते थे। कभी भी ऐसा नहीं देखा गया कि उनके ‘चित्त के उबाल ने उनकी आलोचना के आधार को तहस नहस कर दिया हो’। आलोचक को रचना पढते समय और उसकी आलोचना करते समय अपनी संवेदनाओं पर काबू रखना पड़ता है। राग-द्वेष और मित्रता आदि से तो दूर रहना ही पड़ता है। यहां निराला और पंत का उदाहरण देना उचित होगा। ये छायावाद के दौर की बात है। पंत और निराला में बेहद घनिष्ठ संबंध थे लेकिन जब पंत की कृति पल्लव पर लिखने की बात आई तो निराला ने अपनी घनिष्ठता को अलग रखते हुए उसपर बेहद कठोर टिप्पणी की थी। इसके ठीक उलट राग-द्वेष का भी उदाहरण है। जब विजयमोहन सिंह कहते हैं कि ‘राग दरबारी तो घटिया उपन्यास है और मैं उसको हिंदी के पचास उपन्यासों की सूची में भी नहीं रखूंगा और ये तीन कौड़ी का उपन्यास है।‘ इस तरहब की प्रवृत्ति ने तब जोर पकड़ा जब हिंदी आलोचना ने साहित्य की आसान पंगडंडियों पर चलना शुरू कर दिया और आलोचक रचनाकार की परवाह करने लगे। आलोचना लिखते समय ये सोचने लगे कि अमुक रचनाकार पर की गई टिप्पणी से कहीं बो बुरा ना मान जाएं। आलोचना राजनीति नहीं है जिसमें समझौते की कोशिश की जाए और सभी पक्षों की सहूलियतों का ध्यान रखा जाए। आलोचना दायित्व और विवेक का वो रास्ता है जिसमें किसी रचना को बेहतर ढंग से समझकर सिर्फ और सिर्फ रचना के आधार पर टिप्पणी की जाए और आलोचना लिखते समय रचनाकार कहीं से सोच में भी न आए। अगर कोई आलोचक ऐसा कर पाए तो उससे नामवर सिंह बनने की उम्मीद की जा सकती है।

Sunday, May 10, 2009

पत्रिकाओं के बहाने...

25 जून 1999 को समीक्षक और स्तंभकार भारत भारद्वाज ने मुझे एक भारी भरकम पत्रिका का प्रवेशांक भेंट किया जो आकार प्रकार और अपने सादे कवर की वजह से आकर्षक लग रहा था । उस पत्रिका का नाम था- बहुवचन, प्रकाशक था महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और पत्रिका के प्रधान संपादक थे विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति अशोक वाजपेय़ी, जिनके संपादक के रूप में नाम छपा था पीयूष दईया का । आज से लगभग दस वर्षों पूर्व जब ये पत्रिका छपी थी तब पीयूष दईया का नाम हिंदी में नया और अनजाना सा था । बहुवचन के साथ ही विश्विविद्यालय ने दो और पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ किया था- पुस्तक वार्ता जिसके भी प्रधान संपादक अशोक वाजपेयी थे और पत्रकार थे पत्रकार राकेश श्रीमाल । तीसरी पत्रिका थी अंग्रेजी में - हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग, इसके संपादक थे रुस्तम सिंह । 
जब इन पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरु हुआ था तो तो हिंदी साहित्य में इसपर जमकर बहस चली थी । अशोक वाजपेयी के विरोधियों का आरोप था कि विश्विविद्यालय का काम पत्रिकाएं छापना नहीं है । लेकिन इन आरोप लगानेवालों को ये ज्ञान नहीं था कि देश-विदेश की लगभग सभी विश्विविद्यालयों से पत्रिकाएं निकलती हैं, चाहे वो कैंब्रिज हो , ऑक्सफोर्ड हो या फिर लखनऊ या भागलपुर विश्विविद्यालय । ये अवश्य है कि भारत में विश्वविद्यालयों की पत्रिकाएं सिर्फ रस्मी तौर पर निकलती हैं जिसे छपने के बाद गोदामों में ठूंस दिया जाता है, जिसे कालांतर में रद्दी के भाव बेच दिया जाता है। क्या मुझे यहां ये कहने की जरूरत है कि ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज से निकलने वाली पत्रिकाओं की विश्व में क्या प्रतिष्ठा है ? 
लंबे समय से विश्विद्यालय के हिंदी विभागों में कुंडली मारकर बैठे साहित्य के आचार्यों को ये बात हजम नहीं हो रही थी कि हिंदी के नाम पर खुले विश्विविद्यालय में उनकी कोई पूछ नहीं हो रही है । नए-नए 'लौंडे लफाड़ों' को पत्रिका का संपादक बना दिया गया है और वर्षों से साहित्य साधना में लीन आचार्यों की प्रतिष्ठा और निष्ठा को दरकिनार कर दिया गया है । अशोक वाजपेयी पर जमकर हमले हुए लेकिन पांच वर्षों 'बहुवचन' और 'पुस्तक वार्ता' नियमित रूप से निकलती रही । हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग का प्रकाशन अवश्य बाधित हुआ, वजह तो तत्कालीन कुलपति ही बता सकते हैं । अशोक वाजपेयी के बाद जी गोपीनाथन कुलपति बने, जिनके कार्यकाल में धीरे-धीरे इन पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया, साहित्य जगत को खबर भी नहीं लगी । 
अब नए कुलपति विभूति नाराय़ण राय के प्रभार संभालने के बाद फिर से इन तीनों पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरु हुआ है । बहुवचन (संपादक- राजेन्द्र कुमार), पुस्तक वार्ता(संपादक- भारत भारद्वाज), हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग(संपादक- ममता कालिया) । दस वर्षों में बहुवचन का टैग लाइन भी बदल गया है जो पत्रिका के बदले हुए मिजाज का संकेत है । प्रवेशांक में लिखा था- बहुवचन, साहित्य भाषा शोध विचार की पत्रिका । लेकिन अब बहुवचन- बहुसुमन, बहुरंग निर्मित एक सुंदर हार- हो चुका है । इन दोनों टैग लाइन पर ही अगर हम विचार करें तो पत्रिका के चरित्र में बदलाव को साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । पहले अंक में - यह प्रवेशांक- शीर्षक से एक टिप्पणी थी, जिसमें लिखा गया था कि 'यह प्रयत्न हिंदी में सक्रिय अनेक पीढ़ियों, अनेक दृष्टियों और शैलियों के लेखकों को एकत्र करने का है ।' जो उस अंक में दिखा भी था । बहुवचन के नए अंक में संपादकीय का शीर्षक देखिए - 'यह नवोन्मेषांक ।' ये हिंदी इतनी कठिन है कि आम पाठकों को भी समझ नहीं आएगी । संपादकीय में भी जिस शास्त्रीय शब्दावली का प्रयोग किया गया है जो इसको न सिर्फ जटिल बना देता है बल्कि बोझिल भी । महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का एक उद्देश्य पूरे विश्व में हिंदी को इंटरनेशनल भाषा के तौर पर मान्यता दिलवाना भी है । लेकिन अगर पत्रिका के संपादक ही इस तरह की जटिलतम भाषा का इस्तेमाल करेंगे तो हिंदी पढ़ने समझनेवाले ही इससे दूर हो जाएंगे, गैर हिंदी भाषी के तो पास आने का सवाल ही नहीं उठता । 
बहुवचन के संपादक राजेन्द्र कुमार ने अपने संपादकीय में लिखा है- 'यह शिकायत प्राय सुनने को मिलती है कि हमारे विश्वविद्यालय अकादमिक जड़ता के 'भव्य ठिकाने' होते जा रहे हैं । खासतौर से हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन 
में लगे लोगों के बारे में आम धारणा यह है कि भाषा और साहित्य उनके लिए वहीं तक महत्वपूर्ण जहां तक वह उनकी आजीविका का विषय बनता हो । जिज्ञासा का विषय वो बने, इसका क्या लाभ । अपने ज्ञान के स्तर को अद्यतन बनाने में उनकी अधिक रुचि नहीं, जितनी अपनी सुख सुविधाओं को अद्यतन बनाने में ।' और बहुवचन का ये पूरा अंक इस आम धारणा को पूरी तरह से नहीं तो आंशिक तौर पर अवश्य ही मजबूत करता है । इसके अलावा अगर हम बहुवचन के जनवरी-मार्च 2009 के अंक के लेखकों की सूची पर नजर डालें तो ये पत्रिका महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की कम जन संस्कृति मंच की पत्रिका ज्यादा लगती है । 
दूसरी पत्रिका- पुस्तक वार्ता- के संपादक भारत भारद्वाज हैं जो पिछले दो दशकों से हंस में के अपने लोकप्रिय स्तंभ और अन्य पत्र पत्रिकाओं में लेखकों की खबर लेते रहे हैं । इस पत्रिका के चरित्र में कोई ज्यादा बदलाव नहीं किया गया है । लेकिन संपदकीय में भविष्य में इसकी प्रकृति में बदलाव के संकेत साफ हैं- 'यह मुख्यत समीक्षा (रिव्यू) की पत्रिका है । कुछ कुछ अंग्रेजी की 'बिब्लियो' और 'द वीक रिव्यू' की तरह । लेकिन भविष्य़ में इसकी प्रकृति में  बदलाव करते हुए सृजनात्मकता और समकालीन वैचारिक विमर्श का उन्मुक्त मंच बनाने की मेरी आकांक्षा है ।' लोकार्पण समारोह में विश्वविद्यालय के कुलाधिपति नामवर सिंह ने भारत भारद्वाज को बहुपठित और अद्यतन सूचनाओं से लैस लेखक बताते हुए अपनी अपेक्षाएं भी जाहिर की थी । पुस्तक वार्ता के ताजे अंक में कुंवर नारायण पर पठनीय सामग्री है । बजुर्ग आलोचक नंदकिशोर नवल ने अपनी याददाश्त के आधार पर पुस्तकों की एक लंबी सूची गिना दी है, कुछ रोचक प्रसंगों के साथ । इस अंक की एक विशेषता साहित्य कोलाहल है, जिसे प्रज्ञाचक्षु के छद्म नाम से कोई लिख रहा/रही है । ये स्तंभ काफी रोचक और दिलचस्प जानकारियों से भरा है । लेकिन पुस्तक वार्ता की आत्मा भी बिहार की ओर झुकी नजर आती है, बावजूद इसके आनेवाले दिनों में ये पत्रिका हिंदी में सार्थक हस्तक्षेप की आहट तो दे ही रही है । 
वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया ने  हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग का संपादन किया है । इस पत्रिका पर हिंदी में जो कुछ महत्वपूर्ण लिखा जा रहा है या लिखा जा चुका है उसे अंग्रेजी में अनूदित करवा कर विश्व पटल पर पेश करना है । ममता कालिया जब इस पत्रिका की संपादक बनी थीं तब विश्वविद्यालय से जुड़ी गगन गिल ने अच्छा खासा विवाद खड़ा कर दिया था, जिसे जनसत्ता संपादक ओम थानवी ने भी हवा दी थी । लेकिन अब जब पत्रिका छपकर आई तो तमाम विवादों पर विराम लगा गया । इस पूरी पत्रिका में रचनाओं और रचनाकारों के चयन में बेहतरीन संपादकीय दृष्टि को साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । रचनाकारों के चयन में ममता कालिया पर ये आरोप है कि उन्होंने अपनी पत्रिका में अपने पति रवीन्द्र कालिया की रचना का अनुवाद छापा । लेकिन आलोचना करनेवाले ये भूल जाते हैं कि रवीन्द्र कालिया हिंदी के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं और कोई भी संपादक उनकी रचनाएं छापने को उत्सुक रहता है । लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या रिश्तेदार होने की वजह से ही सिर्फ लेखक को दरकिनार करने का हक संपादको को है । कतई नहीं । हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग की सबसे बड़ी कमजोरी अनुवाद है । ज्यादातर अनुवाद में वो प्रवाह और रवानगी नहीं है जो मूल रचनाओं में है । इसके अलावा इस पत्रिका में अगर तीन महीनों में हिंदी की महत्वपूर्ण गतिविधियों को शामिल किया जा सके तो गैंर हिंदी भाषियों की जानकारी समृद्ध होगी और विश्विविद्यालय के उद्देश्य की पूर्ति भी ।