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Saturday, September 28, 2024

फिल्मों से गांधी की उदासीनता क्यों ?


कुछ सप्ताह पूर्व मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के सिलसिले में मुंबई जाना हुआ था। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के परिसर में इस फेस्टिवल का आयोजन था। उसी परिसर में स्थित गुलशन महल में भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय को जाने और उसको देखने का अवसर प्राप्त हुआ। संग्रहालय में एक जगह गांधी गांधी का पुतला बनाकर उसको कुर्सी पर बिठाया गया है। उनके सामने स्क्रीन पर राम राज्य फिल्म का एक स्टिल लगा हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी राम राज्य फिल्म देख रहे हैं। कहा जाता है कि बापू ने अपने जीवनकाल में एक ही फिल्म देखी थी जिसका नाम है राम राज्य। इस बात का उल्लेख देश-विदेश के कई लेखकों ने किया है। एक बेहद दिलचस्प पुस्तक है ‘द चैलेंजेस आफ सिल्वर स्क्रीन’ जिसमें राम, जीजस और बुद्ध के सिनेमाई चित्रण पर विस्तार से लिखा गया है। इस पुस्तक के लेखक हैं फ्रीक एल बेकर। इस पुस्तक में भी गांधी के राम राज्य देखने की चर्चा की गई है। सिनेमा और संस्कृति पर विपुल लेखन करनेवाली रेचल ड्वायर ने भी अपनी पुस्तक में भी गांधी के राम राज्य देखने का उल्लेख किया है। गांधी और सिनेमा पर लिखी अपनी पुस्तक में इकबाल रिजवी ने विस्तार से और रोचक तरीके से इस प्रसंग पर लिखा है। 

इस पर बाद में चर्चा होगी लेकिन उसके पहले गांधी के फिल्मों और नाटक को लेकर विचार को जानना भी दिलचस्प होगा। फिल्म संग्रहालय में ही कुछ पट्टिकाएं लगी हैं जिनपर कुछ टिप्पणियां प्रकाशित हैं। ऐसी ही एक पट्टिका पर लिखा है, मद्रास (अब चेन्नई) के अत्यंत प्रतिष्ठित वकील बी टी रंगाचार्यार के नेतृत्व में इंडियन सिनेमैटोग्राफ कमेटी रिपोर्ट (आईसीसी) का गठन ब्रिटिश प्राधिकारियों द्वारा सेन्सरशिप विनिमयों में अमेरिकी आयात को रोकने के लिए किया गया था। इस वृहदाकर रिपोर्ट में ब्रिटिश इंडिया के सभी भागों को शामिल किया गया है तथा महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, दादासाहेब फाल्के जैसे सैकड़ों महान हस्तियों के मौखिक एवं लिखित राय शामिल हैं। इसका प्रकाशन 1928 में किया गया। इसके खंड संख्या 4 में पृष्ठ संख्या 56 पर महात्मा गांधी का दिनांक 12 नवंबर 1927 का बयान दर्ज है। जो इस प्रकार है- भले ही मुझे जितना भी बुरा लगा हो मुझे आपके प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए। क्योंकि मैंने कभी सिनेमा देखा ही नहीं। लेकिन किसी बाहरी का भी इसने जितना अहित किया है और कर रहा है वो प्रत्यक्ष है। यदि इसने किसी का भला किसी भी रूप में किया है तो इसका प्रमाण मिलना अभी बाकी है। इस टिप्पणी से गांधी की फिल्मों को लेकर राय का स्पष्ट पता चलता है। ऐसा नहीं है कि गांधी जी की फिल्मों को लेकर ये राय अकारण बनी थी। वो जब स्कूली छात्र थे तब नाटक देखा करते थे और उससे प्रभावित भी थे।

संग्रहालय की एक दूसरी पट्टिका पर इसका उल्लेख है, मोहनदास करमचंद गांधी जब स्कूली विद्यार्थी थे उन्होंने एक गुजराती नाटक देखा था, जिसका नाम हरिश्चन्द्र था। इस नाटक का प्रभाव आजीवन उन पर रहा। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है- मैंने किसी ड्रामा कंपनी द्वारा मंचित नाटक को देखने की अनुमति अपने पिता से प्राप्त कर ली थी। हरिश्चन्द्र नामक इस नाटक ने मेरा ह्रदय जीत लिया। मैं इसे देखकर कभी नहीं थकता। लेकिन उसे देखने की अनुमति मैं कितनी बार प्राप्त करता। इसने मुझे परेशान किया और मैं सोचता रहा कि मैंने स्वयं असंख्य बार हरिश्चन्द्र की भूमिका निभाई होती। हम सभी हरिश्चंद्र की भांति सत्यवादी क्यों नहीं होते? यही प्रश्न मुझे दिन रात परेशान किए रखता। हरिश्चन्द्र की भांति सत्य का अनुसरण करना और सारे कष्टों को झेलना एक ऐसा आदर्श था जिसने मुझे प्रेरित किया । मैं पूर्णत: हरिश्चन्द्र की कहानी में विश्वास करने लगा। इन सभी विचारों से बेचैन होकर मैं अक्सर रोने लगता। किशोरावस्था से ही गांधी को ये पता चल गया था कि फिल्मों या नाटकों का मानस पर कितना असर होता है। जब वो स्वाधीनता के संघर्ष के लिए मैदान में उतरे तो उन्होंने कई जगहों पर देखा कि कई युवा पार्सी नाटकों की महिला कलाकारों के चक्कर में घर बार छोड़कर नाटक कंपनी के पीछे चल देते थे। इसको देखकर गांधी के मन में इस माध्यम को लेकर उदासीनता बढ़ने लगी। उसके बाद एक और घटना घटी। मीराबेन की सिफारिश पर गांधी जी ने एक फिल्म देखने की हामी भरी। फिल्म का नाम था मिशन टू मास्को। रिजवी लिखते हैं कि इस फिल्म में तंग कपड़े पहनकर लड़कियां नाच रही थीं। थोड़ी देर तक तो बापू झेलते रहे लेकिन फिर बीच में ही उठकर चले गए। उस दिन उनका मौन व्रत था सो कुछ कहा नहीं। अगले दिन उन्होंने लिखा, ‘मुझे नंगे नाच दिखाने की कैसे सूझी। मैं तो दंग रह गया, मुझे तो कुछ पता ही नहीं था।‘ दरअसल मीराबेन को एक पारसी फोटोग्राफर ने गांधी को फिल्म दिखाने के लिए राजी कर लिया था। सबको इस घटना के बाद काफी अफसोस हुआ। फिल्म राम राज्य देखने के लिए बापू को कनु देसाई ने तैयार किया था। कनु देसाई गांधी की सेवा करते थे। वो विजय भट्ट की फिल्म राम राज्य के कला निदेशक रह चुके थे। उनकी बात बापू ने मान ली और कहा कि एक विदेशी फिल्म देखने की गलती कर चुका हूं इसलिए भारतीय फिल्म देखनी पड़ेगी। बापू की सहयोगी सुशीला नायर ने फिल्म के लिए गांधी के 40 मिनट तय किए थे, लेकिन कहा जाता है कि बापू को ये फिल्म इतनी अच्छी लगी थी कि वो पूरे डेढ़ घंटे तक बैठकर राम राज्य देखते रहे थे। फिर विजय भट्ट की पीठ थपथपाई और निकल गए। 

इन प्रसंगों को जानने के बाद ये लगता है कि बापू फिल्मों के विरोध में नहीं थे बल्कि फिल्मों में दिखाई जानेवाली सामग्री के विरोधी थे। 1927 का उनका बयान इसकी ओर ही संकेत करता है। उनको फिल्मों का जनमानस पर पड़नेवाले असर का अनुमान भी था। वो चाहते थे कि फिल्मों के माध्यम से लोगों को स्वाधीनता के लिए तैयार किया जाए। स्वाधीनता के संघर्ष में गांधी के पदार्पण के बाद कई ऐसी फिल्मों का निर्माण हुआ जिसने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान गांधीवादी विचारों को फैलाने में बड़ा योगदान किया। 1939 में तमिल भाषा में बनी फिल्म त्यागभूमि को उस दौर की सर्वाधिक सफल फिल्मों में माना जाता है। ये फिल्म प्रख्यात तमिल लेखक आर कृष्णमूर्ति की कृति पर आधारित है। इस फिल्म में गांधीवादी विचारों को प्रमुखता से दिखाया गया था। बाद में इसको अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया था। इसी तरह से अगर देखें तो तेलुगु में बनी फिल्म वंदे मातरम ने भी गांधी के विचारों को तेलुगु भाषी जनता के बीच पहुंचाने का बड़ा काम किया। भालजी पेंढारकर ने अपनी मूक फिल्म वंदे मातरम में अंग्रेजों की शिक्षा नीति की आलोचना की थी।  1943 में बनी हिंदी फिल्म किस्मत के गाना दूर हटो ये दुनियावालो हिंदुस्तान हमारा है बेहद लोकप्रिय हुआ था। ऐसा नहीं है कि गांधी को ये पता नहीं होगा कि इस तरह की फिल्में बन रही हैं। वो चाहते होंगे कि फिल्मकार राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझें और अपनी फिल्मों के कंटेंट के बारे में निर्णय लें। गांधी जैसा व्यापक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति सिनेमा विरोधी हो ये मानना कठिन है।  


Saturday, June 1, 2024

फिल्मों पर प्रधानमंत्री की मन की बात


लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव लोकसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न हो चुका है। सबकी निगाहें चार जून को होनेवाली मतगणना पर टिकी है। चुनावी शोरगुल के बीच कुछ ऐसी बातें अलक्षित रह गईं जिनको रेखांकित करना आवश्यक है। समाचार एजेंसी आईएएनएस के साथ अपने साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फिल्म इंडस्ट्री को लेकर ऐसी बात कही जिसका गहरा और दूरगामी असर हो सकता है। भारतीय स्टार्टअप्स और अन्य क्षेत्रों के बारे में बात करते हुए प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के मुताबिक जब 2014 में वो देश के प्रधानमंत्री निर्वचित हुए, तब उन्होंने हर क्षेत्र के लोगों के साथ बैठकें कीं। उन्होंने कहा कि ‘मैं 2014 में आया और 2015-16 के भीतर-भीतर मैंने जो स्टार्टअप की दुनिया शुरु हुई थी उनकी मैंने एक वर्कशाप ली। कभी मैंने स्पोर्ट्सपर्सन्स की ली, कभी कोचेज के साथ बैठा, इतना ही नहीं मैंने फिल्म दुनिया वालों के साथ ऐसी ही एक मीटिंग की। मैं जानता हूं कि वो बिरादरी हमारे विचारों से काफी दूर है, मेरी सरकार से भी दूर है। लेकिन मेरा काम था कि उनकी समस्याओं को समझूं क्योंकि बालीवुड अगर मुझे ग्लोबल मार्केट में उपयोगी होता है, अगर मेरी तेलुगू फिल्में दुनिया में पापुलर हो सकती हैं, मेरी तमिल फिल्में पूरी दुनिया में पापुलर हो सकती हैं तो मुझे तो ग्लोबल मार्केट लेना है। मेरे देश की हर चीज को आगे बढ़ाना है।‘ राजनीतिक बातों के बीच प्रधानमंत्री का ये बयान काफी गंभीर है। ऐसा जानते हुए कि फिल्म वालों की बिरादरी उनके विचारों से दूर है उन्होंने उसके वैश्विक बाजार के लिए प्रयत्न किया। ये प्रयत्न उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में ही किया। 

आपको याद दिलाता चलूं कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ही पुरस्कार वापसी का अभियान चला था। जिसमें असहिष्णुता का बहाना बनाकर साहित्यकारों और लेखकों के साथ कई फिल्मकारों ने अपने पुरस्कार लौटाने की घोषणा करके सरकार के खिलाफ अपना विरोध जताया था। इतना ही नहीं एक तरफ प्रधानमंत्री फिल्म उद्योग की बेहतरी के लिए कार्य करने की ओर बढ़ रहे थे तो दूसरी ओर कुछ फिल्मकार गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल को विवादित करने में लगे थे। फिल्म एस दुर्गा और न्यूड को इंडियन पैनोरमा से बाहर करने के खिलाफ जूरी के अध्यक्ष सुजय घोष ने इस्तीफा दे दिया था। कुछ फिल्मकारों और फिल्म से जुड़े लोगों ने राष्ट्रीय पुरस्कार वितरण समारोह का बहिष्कार करके सरकार को कठघरे में खड़ा करने का प्रयत्न किया था। इसके अलावा कुछ फिल्म निर्देशक निरंतर इंटरनेट मीडिया पर सरकार और प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ टिप्पणियां करते रहते हैं। लोकतंत्र में ऐसा करने का उनको अधिकार है लेकिन जब टिप्पणियां व्यक्तिगत हो जाती हैं तो उनकी मंशा पर संदेह होता है। इतना ही नहीं वो अपनी फिल्मों के माध्यम से राजनीतिक एजेंडा चलाने का प्रयत्न करते हैं। फिल्मों के दृश्य, उसके संवाद और उसकी कहानी को ऐसे मोड़ दे दिया जाता है जिससे मोदी, उनकी सरकार या उनकी विचारधारा पर कटाक्ष किया जा सके। इस संबंध में फिल्म मुक्काबाज के एक संवाद का उदाहरण देना काफी होगा। इस फिल्म में बगैर किसी संदर्भ के एक संवाद है, वो आएंगे, पीट-पीट कर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय के नारे लगाकर चले जाएंगे। फिल्मकार क्या संकेत करना चाह रहे थे ये स्पष्ट है। मनोरंजन जगत में कथित प्रगतिशीलता इतनी हावी है कि वहां भारतीयता और हिंदूत्व की बात करनेवालों को फिल्म समाज से अलग करने की प्रवृत्ति काम करती है। विवेक अग्निहोत्री, सुदीप्तो सेन और विपुल शाह इसके उदाहरण हैं। इन तीनों का साहस और पुरुषार्थ है कि बालीलुड की लीक से अलग हटकर फिल्म बनाकर, तमाम तरह के अघोषित बहिष्कार को झेलते हुए भी अपनी राह पर डटे हुए हैं। 

प्रधानमंत्री अगर ये कहते हैं कि फिल्म बिरादरी उनके विचारों से दूर है तो ये फिल्मों से लेकर ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री में परिलक्षित होता है। कई सारी डाक्यूमेंट्री ऐसी बनाई जाती है जिसमें सरकार और उनकी नीतियों की आलोचना होती है। सरकार और उनकी नीतियों की आलोचना हो लेकिन जब किसी विशेष एजेंडा के आधार पर नीतियों की आलोचना होती है तो फिल्मकार राजनीति का हिस्सा बन जाता है। फिल्मों का तो लंबा इतिहास रहा है जहां हिंदू धर्म प्रतीकों को गलत परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाता रहा है। हिंदू धर्म के देवी देवताओं के नाम पर खलनायकों और खलनायिकाओं के नाम रखे गए। नायक को ईश्वर के सामने खड़े होकर भड़ास निकालते हुए दिखाया गया। जबकि अन्य धर्मों को बहुत इज्जत बख्शी गई। अब एक नया चलन आरंभ हुआ है। यह चलन है डाक्यूमेंट्री के सहारे राजनीति चमकाने की। एक उदाहरण आप सबके सामने रखता हूं। आपको समझ आ जाएगा कि किस तरह से मनोरंजन के माध्यम को राजनीतिक एजेंडा के लिए उपयोग में लाया जाता है। एक डाक्यूमेंट्री है आल दैट ब्रीद्स। जब इसको कान फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कृत किया गया तो इलकी काफी चर्चा हुई। प्रचारित किया गया कि इसमें घायल पक्षियों की देखभाल करनेवाले दिल्ली के दो भाइयों के संघर्ष की कहानी है। वो भी है पर उसके अलावा इस डाक्यूमेंट्री में सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (सीएए) और नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन्स (एनआरसी) पर भी सियासी टिप्पणियां है। फारेन कंट्रीव्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) के बारे में तथ्यहीन बातें हैं। डाक्यूमेंट्री में दिल्ली दंगों की कहानी के समय पृष्ठभूमि से लेके रहेंगे आजादी जैसे नारे भी लगते रहते हैं। इतना ही नहीं एक पत्रकार की आवाज भी गूंजती है जिसमें वो बताता है सीएए के पास होने पर पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को वहां प्रताड़ित होने की दशा में भारत में नागरिकता नहीं मिलेगी जबकि अन्य धर्म के लोगों को मिलेगी। दरअसल ये ऐसी बातें हैं जिसका पक्षियों की देखभाल से कोई लेना देना नहीं है। परोक्ष रूप से मुसलमानों की कथित प्रताड़ना को रेखांकित किया करना ही उद्देश्य है। 

मनोरंजन के अपेक्षाकृत नए माध्यम ओटीटी के बारे में तो कहना ही क्या। वहां तो किसी प्रकार की कोई रोक टोक नहीं है। स्वनियम की व्यवस्था अवश्य है लेकिन बावजूद इसके जिस तरह की सामग्री दिखा दी जाती है उससे तो यही प्रतीत होता है कि व्यवस्था में झोल है। याद करिए जब अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह होनेवाला था तो उसके पहले एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी का प्रदर्शन हुआ था। इसके संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया । एक दृश्य में शेफ बनने की चाहत रखनेवाली ब्राह्मण लड़की को बिरयानी बनाने के पहले नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया था। विरोध के बाद नेटफ्लिक्स पर इसका प्रदर्शन रोका गया था। अब इस बारे में फिल्म जगत के लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि देश का प्रधानमंत्री फिल्मों के लिए वैश्विक बाजार की संभावनाओं पर बात कर रहे हैं, वो भारतीय भाषाओं की फिल्मों को दुनियाभर में लोकप्रिय बनाने की चिंता कर रहे हैं वहीं अधिकतर फिल्मकार, कथाकार, संवाद लेखक फिल्मों के माध्यम से अपनी राजनीति चमकाने की चेष्टा कर रहे हैं। सुधीर मिश्रा जैसे फिल्मकार तो दर्शकों को भी विचारधारा के आधार पर बांटने की बात कर चुके हैं। फिल्मकारों को खुले मन से सरकार के साथ मिलकर भारतीय फिल्मों को वैश्विक बनाने का प्रयास करना चाहिए। 


Saturday, January 27, 2024

चरित्र और संवाद के माध्यम से राजनीति


फिल्मों के माध्यम से पहले भी और अब भी एक विचारधारा विशेष को प्रमोट करने की युक्ति चल रही है। उसका विस्तार भी हो रहा है। जब भारत अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ तो स्वाधीनता के बाद जब उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट कर दिया था कि फिल्म इंडस्ट्री नए बने राष्ट्र की प्राथमिकता में नहीं है नेहरू के इस बान के बाद इंडस्ट्री से जुड़े लोग चिंतित हो गए थे। उस समय हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने सरकार को प्रसन्न करने के लिए नेहरू की विचारधारा के अनुसार फिल्में बनाने का उपक्रम आरंभ किया था। नेहरू साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित थे। फिल्मकारों को लगा कि अगर साम्यवादी विचारधारा की कहानियों पर फिल्में बनाई जाएं तो नेहरू खुश होंगे। उनको खुश करने के लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने मार्क्स के बहुविध स्त्रोत से निर्माण के सिद्धांत को अपना लिया। इस प्रविधि में अलग अलग क्षेत्र के विशेषज्ञ अलग अलग भाग का निर्माण करते हैं और उन सबको एक जगह जमा करके या जोड़ करके एक पूरी फिल्म बना ली जाती थी। परिणाम यह हुआ कि पूंजीवादी व्यवस्था से फिल्में बनने वाली फिल्मों की निर्माण प्रक्रिया साम्यवादी रही। लेखन में भी साम्यवादी व्यवस्था धीरे धीरे हावी होने लगी। 

जब नेहरू से मोहभंग का युग आरंभ हुआ तो हिंदी फिल्मों में साम्यवादी और पूंजीवादी धारा दोनों दिखाई देने लगी। फिर इंदिरा गांधी का दौर आया। उस दौर में हिंदी फिल्मों में साम्यवादी व्यवस्था और मजबूत हुई। इस कालखंड में साम्यवादी व्यवस्था में एक और रसायन मिलाया गया वो था हिंदू मुस्लिम एकता का। हिंदू महिला को उसके पुत्र के मुस्लिम दोस्त का खून चढ़ाकर बचाने जैसे दृष्य फिल्मों का हिस्सा बनने लगे। देश के विभाजन के समय हिंदू मुसलमान के बीच जो एक खाई बनी थी उसको पाटने की आड़ ली गई। इंदिरा जी ने देश में इमरजेंसी लगाई और संविधान की प्रस्तावना में मनमाने तरीके से समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जोड़ा गया। संविधान की प्रस्तावना में संशोधन का असर भी फिल्मों पर भी पड़ा। अब हिंदू मुसलमान दोस्ती की मिसाल देनेवाली कहानियों पर फिल्में बनने लगीं। संवाद में कथित गंगा-जमुनी तहजीब की झलक दिखाई जाने लगी। साझा संस्कृति की बात होने लगी। इसके बाद असल खेल आरंभ होता है वो है फिल्मों में सनातन या हिंदू धर्म को नीचा दिखाना और अन्य धर्मों को बेहतर दिखाने की प्रवृत्ति का आरंभ। नायक भगवान को कोसते नजर आने लगे। देश में जब आतंकवाद का दौर आया तो उसका असर फिल्मों पर भी दिखा। स्वाधीनता के बाद फिल्मों में साम्यवाद का प्रभाव था तो उस दौर की फिल्मों में नायकों के अपराधी बनने को जमींदारों या दबंगों के अत्याचार से जोड़कर दिखाया गया था। इसी तरह से मुसलमानों के आतंकवादी बनने को पुलिस प्रशासन की ज्यादतियों से जोड़ा जाने लगा। कश्मीर के आतंकवादियों को लेकर भी हिंदी के कई फिल्मकारों ने यही उक्ति अपनाई। चाहे वो आमिर खान और काजोल अभिनीत फिल्म फना हो या संजय दत्त और ह्रतिक रोशन की फिल्म मिशन कश्मीर हो। इस तरह की फिल्मों की सूची लंबी है, जहां हिंदी फिल्मकारों ने आतंकवादियों को लेकर रोमांटिसिज्म दिखता है। धीरे धीरे ये प्रवृत्ति बढ़ती ही चली गई। 

जब ओवर द टाप (ओटटीटी) प्लेटफार्म प्रचलन में आए तो वहां दिखाई जानेवाली वेबसीरीज में भी इस तरह का रोमांटिसिज्म दिखा। संवाद में आतंकवादियों ने वो बातें कहीं जो विचारधारा विशेष की राजनीति के अनुकूल थीं। हाल ही में एक वेब सीरीज आई है जिसको मशहूर फिल्मकार रोहित शेट्टी ने बनाई है। सात भागों में बनी इस वेब सीरीज का नाम है द इंडियन पुलिस फोर्स। इसमें भी मुस्लिम आतंकवादियों को लेकर एक विशेष प्रकार का रोमांटिसिज्म दिखता है। इंडियन मुजाहिदीन के लिए काम करनेवाले आतंकवादी जरार का चित्रण मानवीय तरीके से किया गया है।वेबसीरीज में दिखाया जाता है कि आतंकवादी जरार का परिवार कानपुर का रहनेवाला है। दंगाइयों ने उसकी फैक्ट्री में जिंदा जला दिया। उसका चाचा भी उस आग में जिंदा जल गया। प्रतिशोध के लिए में वो आतंकवादी बनता है। ये चित्रण आतंक और आतंकवाद को जस्टिफाई करने जैसा है। 

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि संवादों के माध्यम से भी उन स्थितियों को बल दिया जाता है जिसमें जरार जैसे लोग आतंकवादी बनते हैं। द इंडियन पुलिस फोर्स में एक मुसलमान पुलिस अफसर जब आतंकवादी जरार को पकड़ लेता है तो दोनों के बीच का संवाद उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। आतंकी जरार पुलिस अफसर कबीर से कहता है, एक बात बताइए कबीर साहब! अपनी कौम पर होते जुल्म को देखकर भी रात को आसानी से नींद आ जाती है आपको? कैसा लगता है खुदा से नाशुक्री करके, कैसा लगता है इन काफिरों का कुत्ता बनकर। इतना सुनकर कबीर उसके पास पहुंचता है और उससे कहता है कि इस्लाम तेरे ... का है, तू ठेकेदार है खुदा का। वो मेरा नहीं है, नफीसा का नहीं है जिसकी जिंदगी तुमलोगों ने बरबाद की । तुम लोग सिर्फ मजहब की आड़ में अपनी कमजोरी, नाकामी, फ्रस्टेसन गुस्सा निकालनेवाले लोग हो। सिर्फ अपना उल्लू सीधा करनेवाले खूनी। आतंकवादी। और कुछ नहीं। फिर रोष में जरार बोलता है कि आप सुनना चाहते हैं कि आतंकवादी कौन है। उसके बाद वो अपने बचपन की खौफनाक कहानी कहता है जिसमें कानपुर में उसके परिवार पर जुल्म होता है। गुड मुस्लिम- बैड मुस्लिम का संवाद चलता रहता है। इस सीरीज में कई जगह इस प्रकार के संवाद हैं। ये ठीक है कि सीरीज को समग्रता में देखें तो अच्छाई की बुराई पर जीत होती है। परंतु दर्शकों के मन में एक सवाल तो छोड़ ही देती है। अगर कानपुर कं दंगे में जरार की फैक्ट्री न जलाई जाती या उस दंगे में उसके चाचा को जिंदा न जला दिया गया होता तो वो आतंकवादी नहीं बनता। इसका ट्रीटमेंट उसी प्रकार है जब पहले की फिल्मों में दिखाया जाता था कि बीहड़ में कोई डकैत बनता था तो उसके पीछे दबंगों का जुल्म होता था।

प्रश्न सिर्फ द इंडियन पुलिस फोर्स की कहानी या संवाद का नहीं है बल्कि उस प्रवृत्ति का है जिसके अंतर्गत हिंदी फिल्मों की दुनिया से जुड़े लोग इस तरह की बातों को न केवल दिखाते हैं बल्कि प्रमुखता से उसको प्रचारित भी करते हैं। वेब सीरीज के माध्यम से ओटीटी पर चलनेवाली फिल्मों के माध्यम से जिस तरह की एजेंडा आधारित सामग्री दिखाई जाती है उसको लेकर समाज को ही विचार करना होगा। पिछले दिनों एक तमिल फिल्म आई थी अन्नपूर्णी। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। बताया गया कि इसके लिए उसको मांसाहारी खाना भी बनाना होगा। इसके संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क ये दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए उसने नमाज पढ़ी। ये फिल्म सिनेमाघरों में एक दिसंबर को रिलीज हुई और महीने भर बाद ओटीटी प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स पर आई। ओटीटी प्लेटफार्म पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्य पर केस हुआ। केस के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी और नेटफ्लिक्स से इसको हटाया गया। ये सब कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हुआ। पर इस फिल्म की टाइमिंग देखिए। अयोध्या में 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होनी थी। कुछ राजनीतिक दल और साम्यवादी बौद्धिक इसका विरोध कर रहे थे। उसी समय पर राम को मांसाहारी बतानेवाली फिल्म ओटीटी पर रिलीज की गई। ओटीटी प्लेटफार्म की लोकप्रियता या व्याप्ति जैसी है उसको ध्यान में रखना होगा। मनोरंजन को लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए लेकिन धर्म की आड़ में राजनीतिक खेल बंद होना चाहिए। 


Saturday, January 13, 2024

रामकथा प्रसंगों से भरी हिंदी फिल्में


श्रीरामजन्मभूमि पर अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है। 22 जनवरी को मंदिर में श्रीराम के बालस्वरूप की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। पूरे देश के सनातनी इस समय रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर उत्साहित हैं। ऐसे वातावरण में श्रीरामचरित पर, श्रीराम कथा पर अन्य भाषाओं में लिखे रामायण के विभिन्न आयामों पर चर्चा हो रही है। नई-नई पुस्तकें आ रही हैं। बच्चों के लिए रामकथा और श्रीरामजन्मभूमि पर कामिक्स का प्रकाशन हो रहा है। फिल्मों और सीरियल्स का निर्माण हो रहा है। ऐसे वातावरण में मन में सहज ही एक प्रश्न उठा कि श्रीराम कथा का हिंदी फिल्मों पर क्या प्रभाव रहा है। जब इस दिशा में विचार करने लगा तो सामने आया कि रामकथा से जुड़े विभिन्न प्रसंगों को लेकर हिंदी के फिल्मकारों ने फिल्में बनाई। फिल्म या पटकथा लिखनेवालों ने रामकथा से प्रसंग उठाए। उन प्रसंगों को आधार बनाकर आधुनिक परिवेश और पात्रों की रचना की और उनको कथासूत्र में पुरो दिया। ये बहुत ही रोचक विषय लगा । इसको सोचते हुए सचिन भौमिक और राजकपूर से जुड़ा एक किस्सा याद आ गया। सचिन भौमिक हिंदी फिल्मों से जुड़े सफलतम कहानीकारों में से एक हैं। उनकी लिखी कहानियों पर बनी फिल्में निरंतर सुपर हिट होती रही हैं। उनकी सफल फिल्मों की लंबी सूची है जिसमें अनुराधा, आई मिलन की बेला, जानवर, आया सावन झूम के, अराधना, गोल-माल, कर्ज, नास्तिक, झूठी, सौदागर, ताल आदि प्रमुख हैं। इन सफल फिल्मों में उन्होंने किसी की कहानी लिखी तो किसी फिल्म की पटकथा, लेकिन लेखक के रूप में वो बेहद सफल रहे हैं। बताया जाता है कि एक जमाने में निर्माताओं की वो पहली पसंद थे। कहना न होगा कि सलीम जावेद की जोड़ी से ज्यादा हिट फिल्में सचिन भौमिक के नाम पर दर्ज है। तो बात कर रहा था एक किस्से की। वो किस्सा है सचिन भौमिक और राज कपूर से जुड़ा। सचिन भौमिक कोलकाता (तब कलकत्ता) से मायानगरी मुंबई (तब बांबे) पहुंचे थे। उनकी इच्छा राज कपूर से मिलने की थी। वो इसके लिए प्रयत्न कर रहे थे। एक दिन वो राज कपूर से मिलने आर के स्टूडियो पहुंच गए। उन्होंने गेट पर अपना परिचय दिया लेकिन किसी कारणवश उस दिन राज कपूर से उनकी भेंट नहीं हो सकी। उनको अगले दिन के लिए मुलाकात का समय मिल गया। अगले दिन नियत समय पर सचिन भौमिक फिर से चेंबूर स्थित आर के स्टूडियो पहुंचे। उनको राज कपूर के कमरे में ले जाया गया। अभिवादन आदि के बाद राज कपूर ने उनसे मुलाकात का प्रयोजन जानना चाहा। सचिन भौमिक ने खुल कर अपनी इच्छा बताई और कहा कि वो उनके लिए फिल्म की कहानी लिखना चाहते हैं। राज कपूर ने धैर्यपूर्वक उनकी बात सुनी और कहानी भी। जब बातचीत खत्म हो गई तो राज कपूर ने कहा कि आप हिंदी फिल्मों के लिए कहानियां लिखते हो, अच्छी बात है, लिखते रहो लेकिन इतना ध्यान रखना कि हिंदी फिल्मों में कहानी तो एक ही होती है, ‘राम थे, सीता थीं और रावण आ गया।‘ सचिन भौमिक ने एक साक्षात्कार में बताया था कि राज कपूर की ये बात उन्होंने गांठ बांध ली थी और वो कोई भी कहानी लिखते थे तो उनके अवचेतन में रामकथा अवश्य चल रही होती थी।

राज कपूर ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण बात  सचिन भौनिक ने भी कही कि कहानी लिखते समय उनके अवचेतन रामकथा होती थी। इस अवचेतन मन की छाप आपको कई फिल्मों पर दिखेगी। अगर आप सुपरहिट फिल्म शोले पर विचार करें तो श्रीरामकथा का एक प्रसंग आपको उसमें दिखाई देगा। श्रीरामकथा में जब राक्षसों ने ऋषियों को बहुत तंग करना आरंभ कर दिया, यज्ञ आदि में बाधा डालने लगे तो विश्वामित्र ने राजा दशरथ से जाकर ये बातें बताईं। उनसे राक्षसों से मुक्ति के लिए राम और लक्ष्मण को साथ भेजने का आग्रह किया। राजा दशरथ पहले घबराए लेकिन फिर राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दिया। दोनों भाइयों ने राक्षसों का वध करके ऋषियों के यज्ञादि में आनेवाले विघ्न को दूर किया। अब फिल्म शोले की कहानी को देखिए तो आपको इस प्रसंग की छाया वहां दिखाई देगी। ठाकुर बलदेव सिंह और उनकी बहू को छोड़कर डकैत गब्बर सिंह ने उनके परिवार के सभी सदस्यों की हत्या कर दी थी। रामगढ़ इलाके में उसका आतंक था। गब्बर के आतंक को खत्म करने के लिए ठाकुर जय और वीरू को रामगढ़ लेकर आते हैं। कहानी में तमाम तरह के मोड़ आते हैं और अंत में गब्बर के आतंक का अंत होता है। अब यहां अगर हम देखें तो विश्वामित्र वाले प्रसंग को कहानीकार ने उठाया और नए परिवेश और पात्रों को बदलकर कहानी में पिरो दिया। यहां हम सिर्फ विश्वामित्र के लिए राक्षसों को खत्म करने के लिए राम और रावण को ले जाने की बात कर रहे हैं। श्रीराम कथा में वर्णित दोनों भाइयों के चरित्र के बारे में बिल्कुल ही बात नहीं कर रहे हैं। इसी तरह से एक और फिल्म आई, कभी खुशी कभी गम। इसमें भी श्रीरामकथा का प्रसंग आपको दिखाई देगा। राजा दशरथ के वचन की रक्षा करने के लिए प्रभु श्रीराम चौदह वर्षों के वनवास पर चले गए। इस फिल्म में भी अपने पिता यशवर्धन रायचंद के कहने पर उनका ज्येष्ठ पुत्र राहुल घर छोड़कर अपनी पत्नी के साथ विदेश चला जाता है। राहुल की माता नंदिनी को बहुत कष्ट होता है। वो घुटती रहती है। अब इस छोटे से प्रसंग को उठाकर करण जौहर ने बिल्कुल ही आधुनिक परिवेश और पात्रों के साथ फिल्म बना दी। यहां एक बार फिर से स्पष्ट करना चाहता हूं कि इसमें न तो श्रीराम के चरित्र का अंश है और ना ही उनका मर्यादित आचरण की झलक। बस प्रसंग वहीं से उठाए गए हैं। हिंदी फिल्मों में इस तरह के सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं। कई फिल्मों के गीतों में भी रामकथा के प्रसंग आपको दिख जाएंगे। स्वदेश फिल्म का गीत याद करिए, पल पल है भारी वो विपदा है आई, मोहे बचाने अब आओ रघुराई। आओ रघुवीर आओ, रघुपति राम आओ, मोरे मन के स्वामी, मोरे श्रीराम आओ। इतना ही नहीं कई फिल्मी गीत तो इतने लोकप्रिय हुए उसको सुनकर आम जनता के मन में श्रद्धा उत्पन्न होने लगती है। फिल्म नीलकमल का गाना- हे रोम रोम में बसनेवाले राम, जगत के स्वामी, हे अंतर्यामी, मैं तुमसे क्या मांगू। या फिर 1961 की फिल्म घराना का गीत, जय रघुनंदन जय सियाराम से ऐसा ही प्रभाव उत्पन्न होता है। 

दरअसल श्रीराम कथा और उनका चरित्र इतना विराट है कि उससे जुड़े किसी प्रसंग को कहानीकार उठाते हैं और फिर उसकी पृष्ठभूमि में अपनी कथा रच लेते हैं। रामकथा तो गंगा है जो सदियों से बहती आ रही है और हर कोई अंजुलि भर जल वहां से लेता है। अपनी श्रद्धानुसार उसका उपयोग करता है। इसी तरह से रामकथा रूपी गंगा से फिल्मी कथाकार अंजुलि भर भर कर प्रसंग उठाते रहते हैं और अपनी शैली में, अपनी भावभूमि पर उसका उपयोग करते रहते हैं। श्रीराम कथा के मूल में है अर्धम पर धर्म की विजय और जितनी भी सुखांत हिंदी फिल्में हैं उसमें यही दिखता है। तमाम बाधाओं के बाद अधर्म का नाश होता है और धर्म की स्थापना होती है। यहां धर्म को व्यापक संदर्भ में देखे जाने की आवश्यकता है। अब जबकि कई विश्वविद्यालयों में फिल्म अध्ययन केंद्र खुल गए हैं तो जरूरत इस बात की है कि वहां श्रीराम कथा के हिंदी फिल्मों पर व्यापक प्रभाव पर शोध हो, चर्चा हो और उसको जनता के सामने रखा जाए। कथाकारों के अवचेतन को समझा जाए।     


Saturday, April 30, 2016

सेंसर बोर्ड में सुधार की बयार ·

जब से पहलाज निहलानी को केंदीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया है तब से सेंसर बोर्ड को लेकर, उसके नियमों को लेकर, सेंसर बोर्ड के अधिकारों को लेकर कई बार बहस हुई है । पहलाज निहलानी ने सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनते ही ऐसे काम शुरू कर दिए किए कि सोशल मीडिया पर सेंसर बोर्ड को संस्कारी बोर्ड कहा जाने लगा । सेंसर बोर्ड ने जब जेम्स बांड की फिल्म में कांट-छांट की थी तो संस्कारी बोर्ड हैश टैग के साथ कई दिनों तक ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा था । फिल्म में चुंबन के दृश्य पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली थी । तब पहलाज निहलानी ने तर्क दिया था कि भारतीय समाज के लिए लंबे किसिंग सीन उचित नहीं हैं और उन्होंने आधे से ज्यादा इस तरह के सीन को हटवा दिया था । बांड की फिल्म में कट लगाने के बाद पूरी दुनिया में सेंसर बोर्ड और उसके अध्यक्ष की फजीहत हुई थी । देश में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर बहस हुई थी । सेंसर बोर्ड के सदस्य अशोक पंडित ने भी इसका विरोध किया था लेकिन पहलाज निहलानी ने किसी की नहीं सुनी थी और फिल्मों को नैतिकता की कसौटी पर कसकर खुद को फिल्मों में नैकिकता के नए झंडाबरदार के तौर पर पेश कर दिया । उन्होंने नैतिकता की अपनी परिभाषा गढ़ी । दरअसल पहलाज निहलानी को ताकत मिली थी सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) से जहां शब्दों को अपने तरीके से व्याख्यायित करने की छूट है । इसपर गौर करते हैं- किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए । मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं – पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए । अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है । संभव भी है ।
चंद सालों पहले तक बॉलीवुड की फिल्मों में चुंबन दृश्यों को दिखाने पर रोक थी उसको दिखाने के लिए फिल्म निर्देशक दो फूलों को हिलते और फिर मिलते हुए दिखा देते थे लेकिन कालांतर में वक्त बदलने के साथ साथ आधुनिकता के नाम पर चुंबन दृष्यों को मंजूरी मिलनी शुरू हो गई । कम कपड़ों में या फिर पारदर्शी कपड़ों में नायिकाओं के चित्रण को कहानी की मांग बताकर निर्देशक सेंसर बोर्ड से छूट लेने लगे थे । राजकपूर ने अपनी फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम और राम तेरी गंगा मैली में बड़े गले के या फिर पारदर्शी कपड़ों में नायिकाओं को दिखाने की छूट सेंसर बोर्ड से हासिल कर ली थी । उस वक्त भी इस तरह के दृश्यों को लेकर खासी बहस हुई थी । तब एक पक्ष का तर्क था कि निर्देशकों ने इस तरह के दृश्य को दिखाकर दर्शकों में उद्दीपन पैदा करने की कोशिश की है ।
इसके पहले उन्नीस सौ तेहत्तर में बी के आदर्श ने गुप्त ज्ञान नाम की फिल्म बनाई थी तो सेंसर बोर्ड के सामने सिनेमेटोग्राफी एक्ट की उपरोक्त धारा के आधार पर फैसला लेना का संकट पैदा हो गया था । उस फिल्म में कई दृश्य ऐसे थे जिनको लेकर निर्माताओॆ की दलील थी कि वो यौनिकता को लेकर जनता को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से फिल्म में डाली गई हैं । उस वक्त के बोर्ड के कई सदस्यों को लग रहा था कि ये जनता की यौन भावनाओं को भड़का कर पैसा कमाने की एक चाल है । लंबी बहस के बाद गुप्त ज्ञान को बगैर किसी काट छांट के प्रदर्शन की इजाजत तो दी गई थी लेकिन फिल्म के प्रदर्शन के बाद उसमें फिल्माए अंतरंग दृष्यों को लेकर इतनी आलोचना हुई कि चंद महीने में ही उसको सिनेमाघरों से वापस लेना पड़ा था । एक बार फिर से सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने इसको देखा और जमकर कैंची चलाई । इस पूरी प्रक्रिया में ढाई साल लग गए थे ।  
उन्नीस सौ चौरानवे में फूलन देवी की जिंदगी पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन में भी स्त्री देह की नग्नता को लॉंग शॉट में ही दिखाने की इजाजत दी गई थी । फिल्म फायर से लेकर डर्टी पिक्चर तक पर अच्छा खासा विवाद हुआ लेकिन सेंसर बोर्ड ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया था । फिल्म 12 इयर्स अ स्लेव में गुलामों के अत्याचार के नाम पर नग्नतापूर्ण दृश्यों की इजाजत देना हैरान करनेवाला था । जब दो हजार में सेंसर बोर्ड के सीईओ पर सत्तर हजार की घूसखोरी का आरोप लगा था और सीबीआई ने उनको गिरफ्तार भी किया था तब हैरानी दूर हो गई थी और अलग अलग फिल्मों के लिए अलग मानदंड की बात समझ में आने लगी थी । सीईओ साहब की गिरफ्तारी के बाद कई सुपरस्टार्स और निर्देशकों ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उनको अपनी फिल्मों में गानों को पास करवाने के लिए घूस देना पड़ा था ।
सेंसर बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद भ्रम है । यही हर तरह की गड़बड़ियों की जमीन तैयार करता है । फिल्मों को सर्टिफिकेट देने की गड़बड़ी शुरू होती है क्षेत्रीय स्तर की कमेटियों से जहां वैसे लोगों का चयन होता है जिनको सिनेमा की गहरी समझ नहीं होती है और वो अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर या फिर अपनी विचारधारा के आधार पर कमेटी में जगह पाते हैं और उसी आधार पर  फिल्मों को देखते और टिप्पणी करते हैं । इसके बाद फिल्म प्रमाणन बोर्ड में भी कई स्तर होते हैं और एक्ट के शब्दों को अपनी तरह से व्याख्यित कर अध्यक्ष अपनी मनमानी चलाते हैं । एक सेंसर बोर्ड सैफ अली की फिल्म ओमकारा में गालियों के प्रयोग की इजाजत देता है तो दूसरा सेंसर बोर्ड प्रकाश झा की फिल्म में साला शब्द पर आपत्ति जताता है और उसको फिल्म से निकालने को कहता है ।
इन सारे गड़बड़झालों की पृष्ठभूमि में सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी जिसने पिछले दिनों सीबीएफसी में सुधारों को लेकर अपनी रिपोर्ट सौंप दी है । इस कमेटी ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया में बदलाव की सिफारिश की है । बेनेगल कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक अब इस संस्था को सिर्फ फिल्मों के वर्गीकरण का अधिकार रहना चाहिए । वो फिल्म को देखे और उसको किस तरह के यू , ए या फिर यूए सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए, इसका फैसला करे । इस सिफारिश को अगर मान लिया जाता है तो फिल्म सेंसर के इतिहास में एक क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत हो सकेगी। लेकिन इसमें भी एक पेंच दिखाई दे रहा है । अबतक इस समिति की जो सिफारिशें सार्वजनिक की गई हैं उसमें कहा गया है कि प्रमाणन के दौरान कमेटी सिनेमेटोग्राफिक एक्ट की धारा 5 बी(1) का ख्याल रखेगी और ये ध्यान देगी कि उसका उल्लंघन तो नहीं हो रहा है । सारी समस्या की जड़ में तो यही धारा है । नैतिकता और मर्यादा दो ऐसे आधार हैं जिनकी सुविधानुसार व्याख्या की जा सकती है । बेनेगल कमेटी ने इन दो शब्दों की व्याख्या से निबटने की क्या सिफारिश की है ये जानना दिलचस्प होगा ।
अन्य सिफारिशों के मुताबिक फिल्मकारों के लिए ये बताना जरूरी होगा कि वो किस श्रेणी की फिल्म बनाकर लाए हैं और उन्हें किस श्रेणी में सर्टिफिकेट चाहिए । उसके बाद सीबीएफसी के सदस्य फिल्म को देखकर तय करेंगे कि फिल्मकार का आवेदन सही है या उनके वर्गीकरण में बदलाव की गुंजाइश है । उसके आधार पर ही फिल्म को सर्टिफिकेट मिलेगा । बेनेगल कमेटी ने अपनी सिफारिशों में फिल्मों के वर्गीकरण का दायरा और बढा दिया गया है । यू के अलावा यूए श्रेणी को दो हिस्सों में बांटने की सलाह दी गई है । पहली यूए + 12 और यूए +15 । इसी तरह से ए कैटेगरी को भी दो हिस्सों में बांटा गया है । ए और ए सी । ए सी यानि कि एडल्ट विद कॉशन । इसके अलावा कमेटी ने बोर्ड के कामकाज में सुधार के लिए भी सिफारिश की है । उन्होंने सुझाया है कि बोर्ड के चेयरमैन समेत सभी सदस्य फिल्म प्रमाणन के दैनिक कामकाज से खुद को अलग रखेंगे और इस काम की रहनुमाई करेंगे । सभी क्षेत्रों से बोर्ड में एक सदस्य रखने की सिफारिश भी की गई है । तो इस तरह से बोर्ड में चेयरमैन के अलावा नौ सदस्यों की सिफारिश की गई है । इसके अलावा भी कमेटी ने कई छोटी मोटी सिफारिशें की है । फिल्मों में पशुओं पर अत्याचार और स्मोकिंग दृश्यों पर अपनी सिफारिश कमेटी जून तक प्रस्तुत कर देगी । तो यह माना जाना चाहिए कि जून के बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय इसपर कोई ठोस फैसला लेगी ताकि फिल्म प्रमाणन बोर्ड को फिल्मों पर कम से कम कैंची चलाने का हक मिल सके ।


Tuesday, April 21, 2009

मेरी आवाज़ ही पहचान है

इकबाल रिजवी देश के उन गिने चुने पत्रकारों में हैं जिनकी फिल्म और कला की समझ बेहतरीन है । कल और फिल्म पर समान अधिकार से लेखन करते हैं । इनके लेख देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपते रहे हैं । हाहाकार के लिए विशेष रूप से उन्होंने शमशाद बेगम पर लिखा है - अनंत

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फिर पद्म अवार्ड बांटे गए। हर साल की तरह इस बार भी बंदर बांट हुई। कई लोग जो इस सम्मान के लायक नहीं थे उन्हें सम्मानित किया गया लेकिन एक हस्ती ऐसी भी है जिसे यह सम्मान अब दे कर उसका अपमान ही किया गया। इस बार के पद्म सम्मान में सबसे ज़्यादा नाइंसाफ़ी गायिका शमशाद बेगम के साथ हुई। गायकी के उच्चतम शिखर पर पहुंचकर लगभग चालीस साल पहले फिल्मी दुनिया को अलविदा कहने वाली शमशाद बेगम ने फ़िल्मी दुनिया को एक दो नहीं कई कालजयी गीत दिये हैं। 90 साल की उम्र में जब वो व्हील चेयर पर बैठ कर राष्ट्रपति से पुरस्कार लेने आयीं तो यह उनकी सादगी ही थी क्योंकि इस उम्र में उन्हें किसी सम्मान या पुरस्कार की ज़रूरत नहीं रह गयी है। न जाने क्यों उन्होंने यह पुरस्कार ग्रहण किया उनके प्रशंसकों का तो मानना है कि उन्हें यह पुरस्कार लेना ही नहीं चाहिये था। क्योंकि जो सम्मान उन्हें अब दिया गया है वो तो उन्हें बहुत पहले ही मिल जाना चाहिये था। वैसे भी शमशाद बेगम के गाए कालजयी गाने किसी भी पुरस्कार के मोहताज नहीं हैं।

ज़माने के तमाम उतार चढ़ाव की गवाह रहीं शमशाद बेगम स्वभाव से बहुत सरल हैं। उनकी आवाज़ ने जिन संगीतकारों को लोकप्रियता दिलायी उनमें से कई लोगों ने शमशाद से किनारा कर लिया लेकिन शमशाद बेगम ने कभी इसकी शिकायत किसी नहीं की। सत्तर के दश्क में जब उनके गायन की मांग कम होने लगी तो वो बिना किसी से शिकवा किये फ़िल्मी दुनिया से रूख़्सत हो गयीं और उन्होंने अपने आप को इस तरह गुम कर लिया कि तीन दशक तक किसी को उनका बारे में कुछ पता ही नहीं चला। उनके बारे में सिर्फ़ संगीतकार नौशाद और ओ पी नैयर को जानकारी थी लेकिन शमशाद बेगम ने उन्हें सख्ती से मना कर दिया था कि वे किसी को भी उनके बारे में कोई जानकारी न दें। वर्ष 2004 में सिनेमा के स्तंभकार शिशिर शर्मा ने डेढ़ साल की मेहनत के बाद एक दिन उन्हें ढूंढ ही निकाला। इसके बाद उन्हें शमशाद बेगम को बात चीत को राज़ी करने के लिये दो महीने लग गए।

14 अप्रैल को शमशाद बेगम 90 साल की हो गयीं। इस उम्र में याददाश्‍त का कमज़ोर हो जाना आम बात है यही उनके साथ भी हुआ है । इसलिए उनसे बातें करना कठिन होता है, लेकिन फिर भी उन्हें अपने दौर की कई बातें याद हैं ख़ासकर वो लोग जिन्होंने शमशाद बेगम से मुंह मोड़ लिया और जिनकी उपेक्षा की वजह से उन्हें फ़िल्मों में गायकी बंद कर देनी पड़ी। संगीतकार मदन मोहन अपनी पहली फिल्म आंखें में उनकी आवाज़ का इस्तमाल किया। शमशाद के गाए गीत लोकप्रिय हुए। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि मदन मोहन को पहली कामियाबी दिलाने में शमशाद बेगम की आवाज़ का भी योगदान रहा लेकिन इसके बाद मदन मोहन ने कभी शमशाद बेगम को गाने का मौक़ा नहीं दिया। राजकपूर की निर्माता-निर्देशक के रूप में पहली फिल्म आग बहुत कामयाब रही और इस कामियाबी में शमशाद बेगम के गाए गीतों का उल्लेखनीय योगदान रहा लेकिन इस फिल्म के बाद राजकपूर ने उन्हें अपनी गिनी चुनी फिल्मों में ही गायन का मौका दिया। राजकपूर ने एक बार सार्वजनिक तौर पर माना था कि उनकी शुरूआती सफ़लता में शमशाद बेगम के गीतों का बहुत योगदान है लेकिन साथ ही उन्होंने अफसोस भी जताया था कि वह उनके लिए कुछ नहीं कर सके क्योंकि संगीत निर्देशक शंकर-जयकिशन उनकी आवाज़ को ज़्यादा पसंद नहीं करते थे। लेकिन शमशाद बेगम बिना किसी कटुता के बहुत सहजता से कहती हैं कि जिन्होंने उन्हें नज़र अंदाज़ किया उनसे उन्हें कोई शिकायत नहीं है क्योंकि उन्होंने मेरे साथ ऐसा कोई करार नहीं किया था कि प्रसिद्ध हो जाने के बाद वह उन्हें साइन करेंगे। शमशाद बेगम की आवाज़ का सबसे अधिक और सबसे अच्छा इस्तेमाल नौशाद और ए पी नैय्यर ने किया। ओ पी ने 23 फ़िल्मों में उनकी आवाज़ का इस्तेमाल किया। ओपी नय्यर का कहना था कि शमशाद बेगम की आवाज मंदिर की घंटी की तरह स्पष्ट और मधुर है।

हांलाकि उनके आखरी गीत को लेकर विवाद है। जिस फ़िल्म में अंतिम बार उनकी आवाज़ शामिल हुई वह थी 1981 में रिलीज़ हुई फिल्म "गंगा मांग रही बलिदान"। लेकिन इस फ़िल्म के गीत रिलीज़ होने से काफ़ी पहले रिकार्ड हो गए थे। शमशाद बेगम के मुताबिक उनका गया अंतिम गीत कजरा मोहबब्त वाला था। जो फ़िल्म क़िस्मत के लिये उन्होंने 1968 में रिकार्ड करवाया था।

मिया हुसैन बख्श और गुलाम फातिमा की आठ संतानों में से एक शमशाद को प्रकृति ने सुरीला स्वर दिया था। लाहौर में उनके घर में रखा बड़ा सा ग्रामाफ़ोन नन्ही शमशाद के लिये हैरत की चीज़ हुआ करता था। ग्रामाफ़ोन बजने पर शमशाद उसके पास आकर बैठ जातीं और फिर उसमें से जो आवाज़ आती उसे दोहराया करतीं। इसके अलावा मोहर्रम के दौरान जब मर्सिये पढ़े जाते तो शमशाद उन्हें याद कर पढ़ा करती थीं। उनका ये शौक देख कर उनके चाचा उन्हें गाने के लिये प्रोत्साहित करते रहते थे। धीरे धीरे शमशाद बेगम की आवाज़ सुरों को साधने लगी और हज़ारों आवाज़ों के बीच अलग से पहचानी जाने वाली उनकी खनकदार आवाज़ सुनने वालों पर असर डालने लगी। एक दिन शमशाद के चाचा 13 साल की शमशाद को लेकर जीनोफ़ोन रिकार्डिंग कंपनी गए जहां शमशाद की आवाज़ बहुत पसंद की गयी और उनकी आवाज़ में एक पंजाबी गाना रिकार्ड हुआ जिसके बोल थे " हथ जोड़ परखियां दा " यह एक गैर फ़िल्मी गाना था जो बेहद लोकप्रिय हुआ। इस गीत की लोकप्रियता के कारण कंपनी ने साल भर में शमशाद बेगम की आवाज़ में करीब 200 गाने रिकार्ड किये। जीनोफ़न कंपनी के स्थायी संगीतकार ग़ुलाम हैदर थे। शमशाद के उच्चारण की शुद्धता से प्रभावित गुलाम हैदर ने शमशाद को गायकी की बारीकियों से परिचित कराया। उनके प्रति बेहद श्रद्धा रखेने वाली शमशाद बेगम का कहना है कि गुलाम हैदर जैसे संगीतकार सदियों में एक बार पैदा होते हैं।

1937 में शमशाद को लाहौर रेडियो स्टेशन से नियमित गाने का मौका मिला और उनकी शीशे जैसी साफ़ और खनकती आवाज़ घर घर लोकप्रिय होने लगी। इससे पहले ही 1939 में 15 की उमर में बैरिस्टर गणपतलाल बट्‌टो के साथ विवाह हो गया था। उन्हें पहली बार फ़िल्मों में गाने का मौका मिला पंजाबी फ़िल्म "यमला जट"(1940) में । इस फिल्म में शमशाद बेगम ने आठ गाने गाए। इसके बाद एक और पंजाबी फ़िल्म "चौधरी (1941) में उन्होंने गाने गाए दोनो फ़िल्में अपने गीत और संगीत के कारण हिट रहीं। इसके बाद पंचोली आर्ट फ़िल्म ने हिंदी में "खज़ांची" नाम की फ़िल्म बनायी। इसमें शमशाद के गाए गीत "लौट गयी पापी अंधियारिन" , " मन धीरे धीरे रोना " और "एक कली नाज़ों से पली" ने धूम मचा दी। खज़ांची के बाद शमशाद बेगम ने चार पांच और फ़िल्मों में गया और सभी अपने गीत संगीत की वजह से हिट रहीं।

शमशाद बेगम का यह सौभाग्य रहा कि कड़े परंपरागत परिवार में जन्म लेने और फिर शादी हो जाने के बाद भी उनके गाने के शौक़ पर किसी ने भी रोक नहीं लगायी। रेडियो स्टेशन पर उन्हें नियमित गाने के लिये जाना पड़ता था। यहां तक की पंजाबी फ़िल्मों के ज़रिये जब शमशाद बेगम की आवाज़ की खनक पूरे देश में गुंजने लगी तो मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया से शमशाद को बुलावा मिला। सबसे पहले महबूब ने अपनी फ़िल्म "तक़दीर(1943) " में अंजुम पीलीभीती का लिखा गाना "बाबू जी दरोगा जी कौन कसूर पर धर लियो सैंया मोर" गवाने के लिये शमशाद बेगम को पूना बुलाया तब भी शमशाद को वहां जाने से किसी ने नहीं रोका। उनके इस सफ़र ने ही आगे चल कर मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया में उनके लिये रास्ते खोले।

शमशाद बेगम के गायन का एक रोचक तथ्य यह भी है कि उन्होंने पुरूष अभिनेताओं के लिये भी पार्शव गायन किया। उन्होंने दारा सिंह के लिए एक फिल्म में गीत गाया। निर्माता-निर्देशक राजकुमार कोहली की 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘लुटेरा’ में दारा सिंह एक समुद्री जहाज़ पर औरत के भेस में गीत गाते हैं- ‘पतली कमर, नाज़ुक उमर, अरे, हट मुए मुझे लग जाएगी नज़र’। यही बात उस दौर के चॉकलेटी हीरो विश्वजीत पर भी उसी तरह लागू होती है। 1968 की फिल्म ‘किस्मत’ का मशहूर गीत ‘कजरा मोहब्बत वाला’ का शमशाद बेगम वाला हिस्सा विश्वजीत पर और आशा भोंसले वाला हिस्सा बबिता पर फिल्माया गया था। विश्वजीत उस समय औरत के भेस में थे।

शमशाद बेगम ने अपने गायन काल के दौरान अपना फोटो कभी नहीं खिंचवाया। जब भी फ़ोटो खिंचने का मौक़ा आता वे बहुत सफ़ाई से बच निकलती। दरअसल उन्हें हमेशा यह एहसास रहा कि वे सुंदर नहीं हैं इसलिये उन्होंने चित्र नहीं खिंचवाए। बरसों तक लोग उन्हें उनकी सुरीली आवाज के जरिए ही उन्हें पहचानते रहे। 1965-66 के आस पास शमशाद के पास फ़िल्मों से गाने के प्रस्ताव आने बहुत कम हो गए। उनकी आवाज़ में कोई कमी नहीं आयी थी। ऐसा भी नहीं था कि फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में आ रहे बदलाव में शमशाद बेगम की आवाज़ मिस फिट होने लगी थी।उनका व्यवहार भी बहुत सरल था। फिर भी शमशाद को नज़र अंदाज़ किया जाने लगा। संभवत: इसकी वजह थी फ़िल्मी दुनिया में बढ़ती खेमेबाज़ी और राजनीति। शमशाद इस मुद्दे पर बात करना पसंद नहीं करतीं कि आखिर उनके खिलाफ़ कौन सी ताकतें राजनीति कर रही थीं। फ़िल्मी दुनिया से अलग हो कर शमशाद पूरी तरह अपनी बेटी ऊषा और दामाद रिटायर लेफ़्टिनेन्ट कर्नल वाई रात्रा पर निर्भर हो गयीं। रात्रा का जहां भी तबादला होता शमशाद उनके साथ ही चली जातीं। बीच बीच में मुम्बई आने पर वे केवल नौशाद और ओ पी नैय्यर से ही संबंध साधती थीं। रिटाटर होने के बाद जब रात्रा नियमित रूप से मुम्बई में रहने आ गए तो शमशाद भी उन्हीं के साथ रहने लगीं और आज भी रह रही हैं।

कुछ समय पहले शमशाद बेगम के बारे में एक समाचार यह भी छप गया था कि उनका निधन हो गया। शमशाद बेगम के एक प्रशंसक और गणित के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर चंद्रकांत मोहन लाल ने सात सालों की मेहनत के बाद एक किताब लिखी है जिसका नाम है "खनकती आवाज़ .. शमशाद बेगम" इस किताब की सामग्री जुटाने के लिये वे लाहौर तक गए। यही नहीं उन्होंने शमशाद बेगम को भारतरत्न, दादा साहेब फालके सम्मान, पद्‌मविभूषण आदि दिलाने के लिए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार से बार-बार संपर्क किया। फ़िलहाल शमशाद बेगम पद्म सम्मान लेकर वापस अपनी बेटी ऊषा रात्रा के साथ मुम्बई में रह रही हैं।