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Monday, October 13, 2025

आत्मविश्वास से खींची बड़ी रेखा


तेलुगू फिल्मों से बाल कलाकार के तौर पर अपने करियर का आरंभ करने वाली रेखा के पिता जेमिनी गणेशन और मां पुष्पावल्ली भी बेहतरीन कलाकार थे। रेखा जब हिंदी फिल्मों में आई थीं तो उनकी काया व सांवले रंग को लेकर नकारात्मक टिप्पणियां की गई थीं। उनके ड्रेसिंग सेंस और मेकअप का भी मजाक उड़ाया जाता था। यही नहीं उनकी अभिनय क्षमता पर भी प्रश्न चिन्ह लगाए जाते थे। यहां तक कहा गया कि वो एक ऐसी हीरोइन हैं जिनको फिल्मों में गुड़िया की तरह रखा जाता है, जिससे अभिनय की अपेक्षा नहीं की जाती है। ये बातें प्रोड्यूसर्स, निर्देशक और उस समय के फिल्म पत्रकारों ने इतनी बार कहीं कि रेखा का स्वयं पर से विश्वास डिग गया। वो बार-बार ये सोचतीं कि हिंदी फिल्मों की दुनिया में उनका गुजारा नहीं, क्योंकि उनकी तुलना उस दौर की सुंदर अभिनेत्रियों से की जाती थी। बहुधा हेमा मालिनी से। उनकी एक और छवि गढ़ी गई थी कि वो बहुत बिंदास हैं और सेट पर बोलती ही रहती हैं। उस दौर में एक फिल्म पत्रिका ने तो यहां तक लिख दिया था कि रेखा चूंकि गंभीर नहीं हैं इस कारण उनको कोई गंभीरता से नहीं लेता।

ऐसे माहौल में रेखा ने स्वयं को बदलने का तय किया। वो योग की शरण में गईं और उन्होंने वजन काफी कम कर लिया। अपनी साज-सज्जा पर ध्यान दिया। ये 1977 के आसपास की बात थी। अब वो फिल्मों के चयन में भी सावधान हो गईं। वैसी ही फिल्मों का चयन करने लगीं जिनमें उनको अभिनय प्रतिभा दिखाने का अवसर मिले। 1978 में उनकी फिल्म आई घर। इसमें रेखा ने रेप विक्टिम का रोल किया था। इसमें जिस प्रकार से पीड़िता का अभिनय किया उसने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया। फिर आई मुकद्दर का सिकंदर। इसके बाद तो रेखा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस फिल्म में रेखा ने तवायफ के रोल में अभिनय की जो छाप छोड़ी वो दर्शकों के मानस में बैठ गई। फिर आई मि. नटवरलाल और सुहाग। अमिताभ बच्चन के साथ रेखा की जोड़ी सफलता की गारंटी बन गई। यही वो दौर था रेखा और अमिताभ बच्चन के कथित प्रेम की कहानी भी सुनाई दे रही थी। इन दोनों के आन स्क्रीन और आफ स्क्रीन केमिस्ट्री की बातें होती थीं। 1980 में हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म आई खूबसूरत। ये एक कामेडी फिल्म थी जिसमें पूरी फिल्म रेखा के कंधों पर चलती है। इसमें जिस तरह से रेखा ने चुलबुली लड़की का अभिनय किया वो यादगार बन गया। इस फिल्म के बाद ये मान लिया गया कि रेखा अपने दम पर भी फिल्म को सफल बना सकती हैं।
फिर तो एक से एक फिल्मों में रेखा ने अभिनय का लोहा मनवाया। चाहे वो उमराव जान हो या फिर उत्सव। श्याम बेनेगल की फिल्म कलयुग में द्रौपदी के रोल में रेखा ने जबरदस्त अभिनय किया। एक ऐसी लड़की जो दक्षिण भारत से आई थी, अपने उच्चारण से लेकर पहनावे तक का उपहास जिसने झेला था, आज भी उनके स्टाइल की बात होती है।
(10 अक्तूबर को प्रकाशित)

Thursday, December 22, 2016

कैसी पहेली जिंदगानी

रेखा- ये नाम लेते ही एक ऐसे अभिनेत्री की तस्वीर सामने आती है जिसकी जिंदगी एक पहेली की तरह है । वो पहेली जिसको सुलझाने का प्रयास अबतक कई लेखकों ने किया है लेकिन वो सुलझने की बजाए उलझती चली जाती है । भारतीय फिल्मों में मीना कुमारी के बाद रेखा ऐसी अभिनेत्री के तौर पर आईं जिनकी जाति जिंदगी के बारे में जानने की प्रबल इच्छा उनके प्रशंसकों में है । रेखा ने अपने व्यक्तित्व के आसपास एक ऐसा तिलिस्म भी बनाया हुआ है जिसमें बहुत कम लोगों का प्रवेश है । रेखा की जिंदगी के कई हिस्से हैं और हर हिस्से में अलग अलग तरह का व्यक्तित्व सामने आता है । कई लेखकों ने रेखा की जिंदगी के इन अलग अलग छोरों को पकड़ने की कोशिश की है लेकिन सभी छोर किसी एक लेखक के हाथ आ नहीं पाए हैं । राजेश खन्ना पर किताब लिखकर चर्चा में आए यासिर उस्मान ने भी रेखा की जिंदगी के पन्ने पलटने की कोशिश की है । उनकी नई किताब रेखा- द अनटोल्ड स्टोरी बाजार में आई तो पाठकों ने उसको हाथों हाथ लिया । इससे एक बार फिर साबित हुआ कि रेखा में लोगों की कितनी दिलचस्पी है । चंद महीनों में यासिर की इस किताब के कई संस्करण हो गए । रेखा- द अनटोल्ड स्टोरी में कितनी अनकही है इसपर बहस हो सकती है ।
दरअसल ये किताब बगैर रेखा से बात किए लिखी गई है । लेखक के मुताबिक उन्होंने रेखा से कई
बार बात करने की कोशिश की लेकिन वो सफल नहीं हो सके । दरअसल रेखा अपने आसपास जिस तरह का माहौल बनाकर रखती हैं या फिर अपने व्यक्तित्व को जिस तरह के आवरण में ढंक कर चलती हैं उसमें बगैर उनसे बात किए उनके व्यक्तित्व की परतों को खोलना मुमकिन ही नहीं है । महज चौदह साल की उम्र में हिंदी फिल्मों में कदम रखनेवाली रेखा बोल्ड सीन को लेकर चर्चित हुईं । साठ के दशक के आखिरी वर्षों में या फिर सत्तर के दशक की शुरुआत में रेखा अपनी बिंदास अदाओ के साथ-साथ बेबाक बोल की वजह से भी लोकप्रिय हुई थी । छुटपन की उस उम्र में भी रेखा को पता था कि फिल्मी पत्रिकाओं पर कैसे राज किया जा सकता है और उसने किया भी।
कई वर्षों तक वो बी ग्रेड की फिल्मों में काम करती रहीं लेकिन बावजूद इसके रेखा को करीब करीब सभी हिंदी अंग्रेजी फिल्मी पत्रिकाओं में प्रमुखता से जगह मिलती रही । रेखा की इस काबिलियत पर भी अलग से विचार करने की जरूरत है । बी ग्रेड फिल्मों में सेक्सी डांस करनेवाली रेखा ने ऐसा क्या कर दिया कि अभी हाल ही में यतीन्द्र मिश्र की लता की सांगीतिक यात्रा पर लिखी किताब लता सुरगाथा में जब लेखक उनसे पूछते हैं कि बाद की पीढ़ी में कौन सी अभिनेत्री उनको जंची ? जबाव में पहला नाम- ‘रेखा । इसमें कोई शक नहीं कि उनकी एक्टिंग कमाल की है । डांसर तो वो हैं ही, उमराव जान में उनके जैसा काम आज भला कितने लोग कर सकते हैं ? उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया था । आज भी उमराव जान मेरी पसंद की फिल्मों में शामिल है ।‘ लता मंगेशकर ने रेखा के बारे में एक और दिलचस्प बात कही- और सबसे बड़ी बात ये है कि वो साउथ इंडियन होते हुए भी उर्दू अच्छा बोलती हैं । वे लाजवाब ढंग से सुंदर हैं और यह सवाल ही नहीं उठता है कि वेव किसी फिल्म में कम अच्छा काम करें । वह जिस फिल्म में होती हैं,वह फिल्म अपने आप उपर उठ जाती हैं । आप उऩकी उत्सव देखें, तो उसमें वो जिस तरह से राजनर्तकी बनकर अपना पूरा किरदार संभाल रही हैं वह बहुत सुन्दर है । उनका सिलसिला का रोल भी मुझे पसंद है । उनकी हर फिल्म को देखकर यह लगता है कि वह अपने किरदार को समझकर करती हैं । मुझे रेखा जैसी समझदार अभिनेत्री जल्दी दूसरी दिखाई नहीं पड़ती ।‘
लता मंगेशकर ने रेखा की जिन खूबियों को गिनाया है उसपर यासिर उस्मान ने भी अपनी किताब रेखा- द अनटोल्ड स्टोरी में विचार किया है या फिर इन बातों का जिक्र है । जैसे लता मंगेशकर इस बात से मुतमईन हैं कि रेखा उर्दू अच्छा बोलती हैं । दरअसल अगर यासिर की किताब में उल्लिखित तथ्यों को मानें तो रेखा को तमिल छोड़कर कोई भाषा आती नहीं थी लेकिन उसमें सीखने की जबरदस्त क्षमता थी । जब निर्माता कुलजीत पाल रेखा जो उस वक्त भानुरेखा को साइन करने के लिए उसके घर पहुंचे तो उन्होंने पूछा कि क्या तुम अंग्रेजी बोल सकती हो तो रेखा ने साफ कहा नहीं । लेकिन उसकी मां ने कुलजीत को भरोसा दिया कि रेखा में सीखने की जबरदस्त क्षमता है । रेखा का टेस्ट लेने के लिए कुलजीत ने हिंदी की चंद लाइनें रोमन में लिखकर उसको दी । जबतक वो चाय पीते तबतक रेखा कमरे से वापस आई और बोली- ‘सतीश, अब तो वो दिन आ गए हैं कि तुम्हारे और मेरे बीच में एक फूलों का हार भी नहीं होना चाहिए, हमारे दो जिस्म और दो जान एक होने चाहिए ।‘ इतना साफ उच्चारण कि कुलजीत हैरान । रेखा को फिल्म के लिए साइन कर लिया जाता है । बाद में भी रेखा कठिन से कठिन डॉयलॉग को अपनी इस क्षमता की वजह से बेहतर तरीके से डिलीवर कर पाईं। कहा तो ये भी जाता है कि अमिताभ बच्चन की संगति में रेखा ने अपने उच्चारण पर बहुत काम किया । कहा तो ये भी जाता है कि रेखा का मेकओवर भी अमिताभ के संपर्क में आने के बाद ही हुआ । रेखा के बारे में कहने को बहुत कुछ है और कहा भी बहुत गया है । यासिर ने इन सारे कहे गए को एक साथ अपनी इस किताब में इकट्ठा किया है ।
रेखा ने बहुत ही कम उम्र में जिंदगी के कई रंग देख लिए । बचपन में अवैध संतान होने का दंश झेलने के बाद जब उसकी मां गरीबी से उबकर हिंदी फिल्मों की ओर रुख करती है । वो दौर बॉलीवुड में गोरे रंग की नायिकाओं का दौर था लेकिन सांवली या लगभग काली होने के बावजूद रेखा ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई । हलांकि अपनी इस उपस्थिति को दर्ज करवाने की रेखा ने लगभग अपमानजनक संज्ञाओं के साथ कीमत भी चुकाई । उसको सेक्स बम से लेकर मर्दों को छीनने जैसे उपमाओं से नवाजा गया लेकिन बेफिक्र रेखा अपनी राह पर आगे चलती गई । यासिर की किताब में रेखा के कई प्रेम प्रसंगों का उल्लेख मिलता है जिसमें विनोद मेहरा से लेकर जीवन के बेटे किरण कुमार से चले उनके इश्क का जिक्र है । इस बात के भी संकेत हैं कि रेखा इनमें से कइयों के साथ सहजीवी भी रहीं लेकिन तब भी उनकी उम्र बीस पच्चीस साल के बीच ही थी । विनोद मेहरा के साथ तो शादी भी की लेकिन उनकी मां की वजह से वो ससुराल में रह नहीं सकीं और उनका संवंध विच्छेद हो गया । उस दौर में रेखा की खुदकुशी की कोशिशों का भी जिक्र है । ये किताब रेखा की दिल्ली के कारोबारी मुकेश अग्रवाल के साथ शादी के प्रसंग से शुरू होती है और फिर वो उनके अतीत और वर्तमान में आवाजाही करती है । मुकेश अग्रवाल के साथ उनके संबंधों का अंत मुकेश की खुदकुशी से होता है । खुदकुशी की वजह क्या रही थी इसपर लेखक ने निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा है लेकिन उन्होंने बेहद संवेदनशीलता के साथ दोनों के संबंधों को उस दौर के उनके दोस्तों और पत्रिकाओं में छपे लेखों को आधार बनाते हुए विस्तार दिया है । रेखा पर बात हो और उसमें अमिताभ बच्चन के साथ उनके प्रेम संबंधों का जिक्र ना हो ये मुमकिन ही नहीं है । यासिर ने भी अपनी किताब के कई हिस्से इस प्रेम संबंध पर लिखे हैं । सबसे दिलचस्प किस्सा है सिलसिला फिल्म के दौरान और उसके पहले के स्टार कास्ट को फाइनल करने का प्रसंग । यश चोपड़ा ने कितने पापड़ बेले थे जब रेखा, अमिताभ और जया को इस फिल्म में काम करने के लिए तैयार किया था ।  
उनहत्तर में हिंदी फिल्मों में कदम रखनेवाली रेखा दो साल के अंदर प्रोड्यूसर्स की पसंद बनकर उभरती है । बहत्तर और तिहत्तर दो सालों में उनकी सोलह फिल्में रिलीज होती हैं लेकिन उनको एक अभिनेत्री के तौर पर पहचान नहीं मिल पाती है । उनहत्तर में ही उनपर श्याम बेनेगल की नजर पड़ती है जो उस वक्त विज्ञापन फिल्में बनाते थे । उन्होंने गोल्ड स्पॉट के विज्ञापन में रेखा को फीचर किया था जिसमें रेखा अपनी दिलकश अंदाज में कहती हैं – ताजगी के पास आइए, अपनी प्यास बुझाइए । उस दौर रेखा का ये पोस्टर काफी चर्चित रहा था और उनकी सेक्सी बाला की छवि को उभारता था । रेखा पर लिखी इस किताब को जब आप एक बार पढ़ना शुरू करेंगे तो पढ़ते चले जाएंगे क्योंकि उनकी जिंदगी से जुड़े लगभग सारे गॉसिप एक जगह पढ़ने को मिल जाते हैं । यासिर ने रेखा के समकालीन अभिनेत्रियों के हवाले से भी कई बातें कही हैं । कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो ये किताब दिलचस्प बनी है लेकिन रेखा के अभिनय कला से ज्यादा इसमें उनकी जाति जिंदगी की कहानियां हैं जो कमोबेश पहले से ज्ञात हैं ।   


Saturday, September 24, 2016

दिलचस्प प्रसंगों की किताबें ·

अभी पिछले दिनों युवा पत्रकार- लेखक यासिर उस्मान की किताब फिल्म अभिनेत्री रेखा पर प्रकाशित हुई है । किताब का नाम है – रेखा, द अनटोल्ड स्टोरी । इस किताब के बाजार में आने के पूर्व ही खूब हलचल शुरू हो गई थी । तमाम अंग्रेजी के अखबारों और पत्रिकाओं ने इस किताब के अंश और लेखक के इंटरव्यू आदि छापने शुरू कर दिए । सोशल साइट्स पर भी इसको लेकर चर्चा रही। देखते-देखते इस किताब के पक्ष में उत्सकुता का बड़ा माहौल बन गया । उत्सुकता के इस माहौल ने किताब की मांग बढ़ा दी और प्रकाशन के चंद दिनों के बाद ही यासिर की किताब का पहला संस्करण बिक गया । अंग्रेजी में लिखी गई इस किताब को लेकर अंग्रेजी के अखबारों में कितना उत्साह था यह कवरेज में दिखाई दे रहा था । वरेज को देखकर मन में यह सवाल भी घुमड़ रहा था कि हिंदी के अखबारों में किसी हिंदी के किताब को लेकर इतनी उत्सकुकता क्यों नहीं दिखाई देती है । याद नहीं पड़ता कि किसी हिंदी लेखक की किताब प्रकाशित होते ही किसी भी राष्ट्रीय अखबार में आधे पन्ने का इंटरव्यू प्रकाशित हुआ हो । खैर -रेखा द अनटोल्ड स्टोरी को मिली कवरेज या उसकी विषय वस्तु पर चर्चा करना अवांतर है । इस विषय पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी ।
हाल के दिनों में अंग्रेजी में उन चुनिंदा फिल्मी अभिनेत्रियों पर किताबें आईं जिनके जीवन के बारे में जानने की पाठकों के अंदर प्रबल इच्छा दिखाई देती रही है । पाठकों की इस इच्छा का प्रकटीकरण इन अभिनेत्रियों को लेकर उठे किसी प्रसंग के दौरान पाठकों की ललक से लगता रहा है । रेखा इन अभिनेत्रियों में से एक है जिनका जीवन एक तिलस्म की तरह रहा है और उनके जीवन से जुड़ी कई किवदंतियां सुनाई देती रही हैं । अमिताभ से उनके संबंध से लेकर उद्योगपति मुकेश अग्रवाल की शादी और फिर अग्रवाल की खुदकुशी जैसी घटनाएं रेखा के जीवन में पाठकों को झांकने के लिए उकसाती रही हैं । यासिर की किताब में इस तरह के प्रसंगों की भरमार है ।
एक अन्य अभिनेत्री हैं स्मिता पाटिल । भारतीय फिल्म इतिहास में स्मिता पाटिल सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली और संवेदनशील अभिनेत्रियों में से शीर्ष पर हैं । जब मैथिली राव ने उनपर किताब लिखी तो पाठकों के मन में स्वाभाविक तौर पर ये जानने की इच्छा हुई थी कि वो कौन सी परिस्थितियां थी जिनमें स्मिता पाटिल ने अपने से उम्र में काफी बड़े और शादीशुदा अभिनेता राज बब्बर से शादी की और फिर दोनों साथ नहीं रह सके । स्मिता पाटिल की इस जीवनी में उनकी जिंदगी का ये पन्ना गायब है । लेखिका ने स्वीकार किया है कि उसकी स्मिता पाटिल से मुलाकात नहीं हुई थी और राज बब्बर से उनकी इस जटिल संबंध के बारे में बात नहीं हो पाई । इस मायने में मैथिली की ये किताब यासिर उस्मान की किताब से थोड़ी अलग है । स्मिता पाटिल की ये जीवनी अन्य जीवनियों से भी थोड़ी अलग है । इसमें अमुक जगह पैदा हुई, अमुक जगह लालन पालन हुआ, अमुक जगह स्कूल शिक्षा ली और उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए अमुक जगह गईं शैली नहीं अपनाई गई है । स्मिता पाटिल एक ऐसी कलाकार थी जिन्हें इक्कीस साल की उम्र में नेशनल अवॉर्ड मिल गया था । मैथिली राव की ये किताब हमें इस बेहतरीन अदाकारा की जिंदगी से जुड़ी दिलचस्प दुनिया में लेकर जाती है । इस किताब में भले ही राज बब्बर के बारे में बात ना हो लेकिन स्मिता और शबाना के रिश्तों पर लेखिका ने विस्तार से लिखा है । स्मिता पाटिल की बात शबाना आजमी के बगैर अधूरी रहती है । स्मिता पाटिल और शबाना आजमी में जबरदस्त स्पर्धा थी और लोग कहते हैं कि साथ काम करने के बावजूद उनमें बातचीत नहीं के बराबर होती थी । हलांकि किताब के लांच के वक्त शबाना ने स्मिता पाटिल के बारे में बेहद स्नेहिल बातें की और यहां तक कह डाला कि उनका नाम शबाना पाटिल होना चाहिए था और स्मिता का नाम स्मिता आजमी होना चाहिए था । मौथिली राव ने स्मिता पर किताब लिखते वक्त तमाम तरह के लोगों से बात की लेकिन गंभीरता से गॉसिप को दरकिनार करते हुए आगे बढ़ती चली गई ।
रेखा और स्मिता के अलावा एक और अभिनेत्री में पाठकों की रुचि है वो हैं अनु अग्रवाल । उन्नीस सौ नब्बे में महेश भट्ट की फिल्म आशिकी के सुपर हिट होने के बाद अनु अग्रवाल भी हिट हो गई थी । सफलता के कुछ दिनों बाद ही अनु अग्रवाल फिल्मी परिदृश्य से गायब हो गईं । वन फिल्म वंडर के नाम से बॉलीवुड में मशहूर अनु अग्रवाल ने खुद ही आत्मकथात्मक संस्मरण लिखी है जो कि अनुयूजअल, मेमॉयर ऑफ अ गर्ल हू केम बैक फ्रॉम द डेड के नाम से प्रकाशित हुई है । करीब पौने दो सौ पन्नों की इस किताब में अनु अग्रवाल ने खुलकर अपनी जिंदगी के उन पन्नों को खोला है जिसके बारे में पाठकों में जानने की इच्छा दिखाई देती है । अनु अग्रवाल का क्या हुआ ? वो कहां गायब हो गई ? उसने फिल्म के बाद मॉडलिंग का अपना करियर क्यों छोड़ दिया ? आदि आदि । अनु अग्रवाल अपने रंग को लेकर बेहद सटीक टिप्पणी करती है । वो कहती हैं कि अस्सी के दशक तो फिल्मों में जो फेयर वही लवली माना जाता था लेकिन फिर उसने अपनी सांवलेपन को ही अपनी ताकत बनाया । अनु अग्रवाल ने 1980 में दिल्ली से मुंबई आने और फिर एक संगीतकार के प्रेम में पड़ने के किस्से को विस्तार से लिखा है । अनु अग्रवाल ने आशिकी की सफलता के बाद दो तीन फिल्मों में काम किया और उसके बाद एक भयंकर हादसे का शिकार हो गईं और सालों तक कोमा में रहीं । कोमा से वापस आने के बाद अनु योग और अध्यात्म में लीन हो गई और इस किताब में दो अध्याय उनके इन अनुभवों पर है । अध्यात्म से लेकर ब्रह्म और भ्रम पर अनु ने विस्तार से लिखा है । कहना ना होगा कि इन किताबों से पाठकों की ज्ञानझुधा की पूर्ति होती है ।
स्मिता पाटिल, अनु अग्रवाल और रेखा पर किताबों के प्रकाशन के आसपास ही शोमा चटर्जी की किताब सुचित्रा सेन पर प्रकाशित हुई थी । किताब का नाम था- सुचित्रा सेन दे लीजेंड एंड द एनिग्मा । किताब के शीर्षक से ही साफ है कि लेखिका इस लीजेंड की पहेली के बारे में इस किताब में बात करना चाह रही है । किया भी उन्होंने यही है । सुचित्रा सेन के बारे में भी तमाम तरह की किंवदंतियां चलती रही हैं । उनके बारे में कहा जाता था कि उन्होंने सत्यजित राय की फिल्म ठुकरा दी थी । सुचित्रा सेन के बारे में ये भी कहा जाता था कि फिल्मों के छोड़ने के बाद वो सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आती थीं । कहा तो ये भी जाता है कि वो अपने लुक को लेकर बेहद संवेदनशील थी । फिल्मों से जुड़े लोग ये भी कहते हैं कि सुचित्रा सेन ने इस वजह से दादा साहब फाल्के पुरस्कार लेने से मना कर दिया क्योंकि वो नहीं चाहती थी कि उनके फैन उनको बढ़ी उम्र के साथ देखें । अब इस किताब में भी लेखिका कभी सुचित्रा सेन से मिली नहीं बल्कि एकाधिक बार सिर्फ उनसे फोन पर बात हुई थी । इस किताब में लेखिका ने सुचित्रा सेन के बारे में कई दिलचस्प तथ्य बताए हैं जैसे सुचित्रा सेन पहली ऐसी अभिनेत्री  थी जो मां बनने के बाद फिल्मों में आई और छा गई । उनकी बेटी मुनमुन सेन के साथ भी ऐसा हुआ । शाहरुख की फिल्म बाजीगर से जुड़ा भी एक बेहद दिसलचस्प तथ्य इस किताब में है ।
एक के बाद एक इस तरह की किताबों के अंग्रेजी में प्रकाशित होने के बाद फिर से ये सवाल खड़ा होने लगा है कि फिल्मों पर हिंदी में लिखनेवाले लेखक गंभीरता से इस तरह का कोई प्रयास क्यों नहीं करते हैं । हिंदी में ज्यादातर लेखक फिल्मी समीक्षाओं के संग्रह को छपवाने में रुचि रखते हैं । हिंदी के प्रकाशकों को भी इस दिशा में काम करने की जरूरत है । उनको भी फिल्मों पर गंभीर लेखन करनेवाले हिंदी लेखकों को चिन्हित करना होगा और उनको उन अभिनेता-अभिनेत्रियों पर लिखने के लिए प्रोत्साहित करना होगा ताकि उन पाठकों को हिंदी भाषा की ओर आकृष्ट किया जा सके जो कहानी कविता उपन्यास से इतर हिंदी में कुछ दिलचस्प पढ़ना चाहते हों । हिंदी पाठकों के बीच भी फिल्मों को लेकर पढ़ने की चाहत है लेकिन उनकी इस चाहत को पूरा करने का गंभीरता से उपक्रम नहीं किया जा रहा  है और लेख आदि को सजा संवारकर किताब के रूप में पेश कर उनको भरमाने की कोशिश होती है । अगर हमें हिंदी को विस्तार देना है तो हमें कोशिश करनी होगी कि उन विधाओं और उन शख्सियतों के बारे में किताबें छपें जो नए पाठकों को अपनी ओर आकृष्ट कर सकें ।