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Saturday, March 1, 2025

भारत का प्रधान गुण धर्मपरायणता


शिवरात्रि के साथ ही प्रयागराज महाकुंभ का समापन हो गया। प्रयागराज में डेढ़ महीने तक चले महाकुंभ के दौरान करोड़ों आस्थावान हिंदुओं ने पवित्र संगम में डुबकी लगाई। तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करके भी देश के कोने कोने से श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचे। प्रयागराज और दिल्ली में भगदड़ से हुई मौत ने भी आस्था के इस समागम पर कोई प्रभाव डाला हो ऐसा प्रतीत नहीं होता। दो दुर्घटनाओं में जो मौत हुईं वो बेहद तकलीफदेह है। बावजूद इसके अगर महाकुंभ में शिवरात्रि के दिन तक गंगा में स्नान करनेवालों की संख्या में कमी नहीं आई तो इसके पीछे कुछ न कुछ कारण तो होगा। कई विरोधी दल के नेताओं ने कुंभ को लेकर जिस तरह की टिप्पणियां कीं उसने भी जनता के मनोबल पर कोई विपरीत असर नहीं डाला। 

कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तो यहां तक कह दिया कि कुंभ में डुबकी लगाने से नौकरी नहीं मिलती, पेट नहीं भरता आदि आदि। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव निरंतर कुंभ को लेकर टीका टिप्पणी करते रहे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने तो महाकुंभ को मृत्युकंभ तक कह दिया। विपक्षी नेताओं के इतना सब कहने के बाद भी महाकुंभ के दौरान पवित्र स्नान करनेवाले श्रद्धालुओं की संख्या का कीर्तिमान बना। एक अनुमान के मुताबिक इस महाकुंभ में बड़ी संख्या में युवाओं ने भी आस्था की डुबकी लगाई। इसको युवाओं के सनातन की ओर बढ़ते झुकाव या फिर अपनी जड़ों की ओर लौटने की तरह देखा जा रहा है। विपक्षी नेता भले ही वोटबैंक के लोभ-लालच में सनातन के इस विशेष आयोजन को लेकर उलजलूल टिप्पणियां कर रहे थे लेकिन भारत के जन का मन कहीं और रमा था। 

इस वातावरण को देखकर प्रेमचंद के एक लेख का स्मरण हो रहा है। प्रेमचंद का एक निबंध है, स्वराज्य के फायदे। इस निबंध में प्रेमचंद ने स्वाधीनता के फायदे गिनाए हैं। लेकिन जो सबसे बड़ा फायदा बताया है वो इस प्रकार है। प्रेमचंद कहते हैं, स्वराज्य से देश को सबसे बड़ा फायदा जो होगा वह भारतीय जीवन का पुनरुद्धार है। प्रत्येक जाति के जीवन में कोई प्रधान गुण होता है। अंग्रेज जाति का प्रधान गुण पराक्रम है, फ्रांसिसियों का प्रधान गुण स्वतंत्र प्रेम है, उसी भांति भारत का प्रधान गुण धर्मपरायणता है। हमारे जीवन का मुख्य आधार धर्म था। हमारा जीवन धर्म के सूत्र में बंधा हुआ था। लेकिन पश्चिमी विचारों के असर से हमारे धर्म का सर्वनाश हुआ जाता है, हमारा वर्तमान धर्म मिटता जाता है, हम अपनी विद्या को भूलते जाते हैं। अपने रहन-सहन, रीति-रिवाज से विमुख होते जाते हैं। हमारा अद्वितीय सामाजिक संगठन छिन्न-भिन्न हुआ जाता है। पश्चिम की देखादेखी हम धनोपार्जन को ही जीवन का लक्ष्य मानने लगे हैं। संपत्ति को ही सर्वापरि समझने लगे हैं। यही हमारा धर्म हो गया है। 

ज्ञान का, संतोष का, कर्तव्यपालन का , त्याग का महत्व हमारी निगाहों में उठता जाता है। हम विद्या को धर्म समझ कर सीखते और सिखाते थे, चाहे वो गान विद्या हो, धनुर्विद्या हो या कोई अन्य विद्या हो। अब हम उसे धनोपार्जन के लिए सीखते और सिखाते हैं। हममें परस्पर प्रेम नहीं रहा, सहानुभूति नहीं रही। हमारी मैत्री, हमारा प्रेम, हमारी सदिच्छाएं, हमारे ह्रदय की उच्च वृत्तियां, सभी धन इच्छा के नीचे दबती जाती हैं। सारांश यह है कि हम अपनी आत्मा को भूलते जाते हैं। स्वराज्य पाकर हम अपनी आत्मा को पा जाएंगे। हमारे धर्म का उत्थान हो जाएगा। अधर्म का अंधकार मिट जाएगा और ज्ञान भास्कर का उदय होगा।...हम किसी जाति के पिछलग्गू न बनकर संसार सभा में उचित स्थान पर बैठेंगे। हमारी गणना दीन हीन परवश जातियों में न होकर उन जातियों में होने लगेगी जिनके हाथों में संसार की बागडोर है।...हम उन्नत और बलवान जातियों के सम्मुख बैठने के अधिकारी हो जाएंगे। 

प्रेमचंद की उपर्युक्त टिप्पणी में दो महत्वपूर्ण बात है। एक तो जब वो कहते हैं कि भारत का प्रधान गुण धर्मपरायणता है और हमारा पूरा जीवन धर्म के सूत्र में बंधा हुआ है। उनके इस वाक्य से समझा जा सकता है कि भारतीय समाज जीवन में धर्म का कितना महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा। जब वो पश्चिमी विचार की बात करते हैं तो उनके दिमाग में क्या रहा होगा ये कहना कठिन है। अनुमान लगाया जा सकता है कि वो उन विचारों की चर्चा कर रहे होंगे जिसने भारत के मूल विचार पर प्रहार किया। प्रश्न उठ सकता है कि क्या वो मार्क्स और उनके विचारों की ओर इशारा कर रहे थे? प्रेमचंद ने इस निबंध के आरंभ में भी स्वराज्य के फायदे को गिनने को ईश्वर के गुणों को गिनने जैसा बताया है। सिर्फ इस निबंध में ही नहीं बल्कि प्रेमचंद ने अपने लेखन में अन्यत्र भी ईश्वर और भगवान का स्मरण किया है। प्रेमचंद सनातनी थे। सनातन और भारत में उनकी पूर्ण आस्था थी। बावजूद इसके अकादमिक जगत के वामपंथी विचार के शिक्षकों ने उनको जबरदस्ती वामपंथी घोषित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। दूसरी बात ये देखी जानी चाहिए कि प्रेमचंद ने जाति शब्द का उपयोग किन अर्थों में किया है। वो अंग्रेजों को फ्रांसीसियों को भारतीयों को एक जाति के तौर पर देखते हैं। उनके लिए जाति का मतलब एक तरीके से राष्ट्रीयता है। बाद में पता नहीं किन परिस्थियों में जाति को समूह विशेष के साथ जोड़ दिया गया। यह पूरा मसला एक अलग अध्ययन की मांग करता है। 

प्रेमचंद भारत में जिस धर्मपरायणता की बात कर रहे हैं वो भारतीयों का मूल जीवन दर्शन है। प्रगतिशीलता के दावे करनेवालों के मन में कहीं न कहीं धर्म और उसकी परायणता को लेकर एक लगाव दिखता है। कुछ लोग ये तर्क देते हैं कि धर्म और आस्था बहुत ही व्यक्तिगत चीज है, ऐसे लोग भी धर्म को लेकर भ्रमित होते हैं। वो धर्म को कर्मकांड समझ लेते हैं और उसके ही आधार पर धर्म की व्याख्या कर उसके फायदे और नुकसान गिनाने लगते हैं। धर्म ना तो फायदा देखता है और ना ही नुकसान। उसका उद्देश्य तो मानव कल्याण है। धर्म को अफीम बतानेवाली विचारधारा के अनुयायी इस बात को समझ नहीं पाते हैं। अपने एजेंडे के अनुसार समाज में शोर मचाते हैं। धर्म के विरोध में वातावरण बनाने का प्रयास करते हैं। प्रेमचंद ने पराधीनता के कालखंड में ही इस बात का अनुमान लगा लिया था कि अगर भारत की जनता धर्म की ओर उन्मुख होती है तो संसार सभा में हमारे देश को उचित स्थान मिल सकेगा। आज वैश्विक स्तर पर भारत की जो स्थिति है उसको प्रेमचंद के इस अनुमान के साथ मिलाकर देखने के स्पष्ट तस्वीर बनती है। वैश्विक परिदृष्य में आज भारत ना तो किसी जाति का पिछलग्गू है और ना ही कोई अन्य देश हमारी उपेक्षा करने के बारे में सोच भी सकता है। आज भारत को दीन-हीन परवश जाति बताने का साहस दुनिया का शक्तिशाली और विकसित देश भी नहीं कर सकते हैं। आज कोई भी इतिहासकार भारत के बारे में लिखते हुए इसको संपेरों का देश कहने का साहस नहीं कर पाएगा। यह भारतीय जनता की धर्मपरायणता का ही प्रतिफल है। सनातन का जितना उत्थान होगा भारत उतना सबल और शक्तिशाली होगा। धर्मो रक्षति रक्षित:। 


Saturday, February 15, 2025

तिरुपति मंदिर जैसी हो दर्शन व्यवस्था


प्रयागराज में जारी महाकुंभ में लगभग 50 करोड़ श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान किया। महाकुंभ में स्नान के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु अयोध्या और काशी में पहुंच रहे हैं। अयोध्या में इतनी संख्या में श्रद्धालु पहुंच गए कि कई दिनों तक स्कूल बंद करना पड़ा। रामपथ को वाहनों के लिए बंद करना पड़ा। अयोध्या के निवासियों को रामपथ पर स्थित चिकित्सालय तक पहुंचने में संघर्ष करना पड़ा। आसपास के जिलों से आनेवाले रास्तों पर वाहनों पर सख्ती की गई। अयोध्या में प्रभु श्रीराम के नव्य और भव्य मंदिर का निर्माण कार्य जैसे जैसे आगे बढ़ रहा है वैसे वैसे वहां श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ रही है। पिछले वर्ष श्रीराम मंदिर को दर्शन के लिए खोला गया था। मंदिर परिसर में अब भी कई तरह के निर्माण कार्य चल रहे हैं। परकोटा से लेकर अन्य स्थानों पर मंदिर के भव्य स्वरूप को अंतिम रूप दिया जा रहा है। जानकारों के मुताबिक मंदिर में एक लाख व्यक्ति प्रतिदिन दर्शन का अनुमान लगाकर तदनुसार व्यवस्था की गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि श्रद्धालुओं की संख्या अनुमानित संख्या से अधिक हो जा रही है। दर्शकों को व्यवस्थित करने के लिए स्कूल बंद करने पड़ते हैं, अयोध्या शहर के लोगों को घरों से निकलने में परेशानी होती है। रामपथ के आसपास वाहनों पर प्रतिबंध को लेकर मुश्किल होती है। व्यवस्था संभालने में पुलिस को भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है। अभी मंदिर का कार्य चल रहा है तो इसके पूर्ण होने के साथ सुचारू रूप से प्रभु के दर्शन की व्यवस्था पर विचार करना चाहिए। 

अयोध्या में दो तरह से श्रद्धालु दर्शन करते हैं, एक तो आम दर्शन जिसमें श्रद्धालु पंक्तिबद्ध हो जाते हैं और धीरे धीरे चलते हुए दर्शन करके मंदिर परिसर से बाहर आ जाते हैं। इसके अलावा एक सुगम दर्शन होता है। इसकी लेन अलग है। इसमें पासधारक ही प्रवेश कर सकते हैं। इस लेन में जाने के लिए पास प्रशासन, पुलिस और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट से जारी होता है। तीसरा अतिविशिष्ट पास जारी होता है जिसके धारक रंगमंहल बैरियर के पास से मंदिर में प्रवेश करते हैं। दर्शन के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पिछले वर्ष तो काफी इंताजम किए गए थे, लेकिन धीरे धीरे ये सुविधाएं कम होती चली गईं। अयोध्या पहुंचनेवाले श्रद्धालुओं को धर्मशालाओं और आश्रमों का आसरा रह गया। कई नए होटल खुले जरूर हैं लेकिन वो श्रद्धालुओं की संख्या के आधार पर अपने कमरों की दर तय करते हैं। जो कई बार बहुत अधिक हो जाता है। ऐसा लगता है कि अभी ट्रस्ट की प्राथमिकता में मंदिर परिसर का निर्माण है, इस कारण श्रद्धालुओं की सुविधाओं की ओर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जा रहा है। किंतु यही उचित समय है कि श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र श्रद्धालुओं की सुविधाओं और अयोध्या पहुंचनेवाले भक्तों की संख्या को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध तरीके से निर्माण कार्य करे। दर्शन के लिए जिस प्रकार के लेन आदि की व्यवस्था करनी है या राम मंदिर के आसपास के क्षेत्र में वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था करनी है उसपर गंभीरता से विशेषज्ञों के साथ विचार करके निर्णय लिया जाना चाहिए। अगर ऐसा हो पाता है तो दीर्घकाल तक श्रद्धालुओं की संख्या से ना तो अयोध्यावासियों को कोई तकलीफ होगी और ना ही प्रभु श्रीराम के दर्शन के लिए पहुंचनेवाले भक्तों को। 

पिछले दिनों तिरुपति में बालाजी के मंदिर जाकर दर्शन करने का सौभाग्य मिला। वहां दर्शन की व्यवस्था देखकर मन में ये विचार आया कि श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टियों को वहां जाकर श्रद्धालुओं और मंदिर परिसर की व्यवस्था को देखना चाहिए। अगर उनको उचित लगे तो उस व्यवस्था को बेहतर करके उसको राम मंदिर परिसर में लागू करने का प्रयास करना चाहिए। तिरुपति से जैसे ही आप तिरुमला की पहाड़ी स्थित मंदिर में दर्शन करने के लिए यात्रा आरंभ करते हैं तो उसके पहले आपको आनलाइन दर्शन का टिकट और मंदिर के आसपास रहने की व्यवस्था कर लेनी होगी। अन्यथा आपको नीचे तिरुपति में रुकना होगा। अगर आप विशिष्ट या सुगम दर्शन करना चाहते हैं तो तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के कार्यालय में संपर्क करना होगा। वहां आपको अपने आधार कार्ड के साथ आवेदन करना होगा। इसके बाद से सारी व्यवस्था आनलाइन। अगर आपका आवेदन स्वीकृत हो जाता है तो आपके मोबाइल पर एक लिंक आएगा। उस लिंक से आपको पेमेंट करना होगा। पेमेंट होते ही आपके मोबाइल पर ही पास आ जाएगा। जिसमें दर्शन का समय और गैट आदि का उल्लेख होता है। वहां सर्व दर्शन, शीघ्र दर्शन और ब्रेक दर्शन की व्यवस्था है। सबके लिए अलग अलग शुल्क है।  अगर आपने तिरुमला में रात में रुकने की व्यवस्था करनी है तो आनलाइन बुकिंग करनी होगी। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के कार्यालय में जाकर अपने लिए कमरा आवंटित करवाना होगा। सबकुछ व्यवस्थित। आपकी फोटो ली जाएगी फिर पैसा जमा करने के लिए बगल के काउंटर पर भेजा जाएगा। आनलाइन पैसे जमा होंगे। कमरे के किराए जितना ही सेक्युरिटी जमा करवाना होता है। फिर आपके मोबाइल पर कमरा आवंटन की जानकारी और एक कोड आ जाएगा। उसको लेकर बताए हुए स्थान पर पहुंच जाइए। कमरा तैयार मिलेगा। कमरा में चेक इन करते ही एक कोड आपके मोबाइल पर आएगा। जब आप कमरा छोड़ रहे हों तो आपको ये कोड बताना होता है। फिर वापस उसी कार्यालय में जाना होता है जहां आपने पैसे जमा करवाए थे। वहां इस कोड को बताते ही आपको मोबाइल पर सेक्युरिटी मनी के रिफंड की जानकारी आ जाएगी। कहीं भी नकद से लेन देन नहीं। कहीं भी किसी प्रकार का बिचौलिया या एजेंट नहीं। 

सर्वदर्शन और शीघ्रदर्शन के श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए मंदिरर के गर्भगृह तक पहुंचने में जितना भी समय लगे उनको पंक्ति में ही बने रहना होता है। 12-13 घंटे भी लगते हैं तो मंदिर प्रशासन श्रद्धालुओं का पूरा ख्याल रखते हैं। भोजन, फल और बच्चों के लिए दूध आदि की नियमित अंतराल पर व्यवस्था होती है। दर्शन के लिए जो रास्ता बनाया गया है उस रास्ते में वाशरूम की व्यवस्था है। चौबीस घंटे वहां सफाई कर्मचारी तैनात रहते हैं। एकदम स्वच्छ व्यवस्था। किसी भी श्रद्धालु को किसी प्रकार की परेशानी न हो इसका विशेष ध्यान रखा जाता है। ब्रेकदर्शन के लिए जब सर्वदर्शन की लाइन रोकी जाती है तब भी किसी को किसी तरह की परेशानी नहीं होती है क्योंकि सब पारदर्शी तरीके से किया जाता है। बताय जाता है कि तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के चेयरमैन बी आर नायडू सक्रिय रूप से व्यवस्था पर नजर रखते हैं। दर्शन के बाद नीचे पहुंचने के लिए 40 मिनट का समय तय है। अगर आपका वाहन 40 मिनट के पहले नीचे के बैरियर तक पहुंचता है तो आपको जुर्माना देना होगा। ये व्यवस्था वाहनों की गति सीमा को कंट्रोल करने के लिए बनाई गई है। जिस प्रकार से मंदिरों में हिंदुओं की आस्था बढ़ रही है उसको ध्यान में रखते हुए दर्शन की व्यवस्था को बहुत बेहतर करने की आवश्यकता है। जिस प्रकार से युवाओं की सनातन में आस्था बढ़ रही है तो उनकी आस्था को गाढा करने के लिए आवश्यक है कि मंदिरों की व्यवस्था तिरुमला बालाजी मंदिर जैसी हो। 


Saturday, February 8, 2025

सनातन से कांग्रेस की चिढ़ पुरानी


कुछ दिनों पूर्व कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रयागराज महाकुंभ को लेकर एक बयान दिया था। अपने बयान में खरगे ने गंगा में डुबकी लगाने को रोजगार और भूख से जोड़ा था। बयान की खूब चर्चा हुई थी। खरगे ने उसी तरह की बात की जैसे श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के दौरान कहा जाता था कि अयोध्या में श्रीराममंदिर बनाने से अच्छा हो कि वहां एक अस्पताल या शिक्षण संस्थान बना दिया जाए। इसी संदर्भ में ध्यान आया कि पिछले दिनों श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के चेयरमैन डा अनिर्वाण गांगुली से राहुल सांकृत्यायन और भगवान बुद्ध को लेकर किए गए उनके कार्यों और लेखों पर चर्चा हो रही थी। चर्चा तो राहुल सांकृत्यायन के लेखों से आरंभ हुई थी लेकिन बात खरगे जी के कुंभ संबंधी बयान तक जा पहुंची। चर्चा के क्रम में डा गांगुली ने बताया कि नेहरू जी के प्रधानमंत्रित्व काल में 1956 में साधुओं के पंजीकरण के लिए कांग्रेस पार्टी के सांसद राधा रमण ने एक बिल पेश किया था। उस बिल पर लोकसभा में चर्चा हुई थी। चर्चा खत्म हो गई। पर मन में जिज्ञासा बनी रही कि कांग्रेस के सांसद ने लोकसभा में जो बिल पेश किया था वो क्या था। जिज्ञासा के कारण उस बिल की प्रति की खोज शुरू हुई। इंटरनेट मीडिया पर उक्त बिल की प्रति मिल गई। छह पन्नों के इस बिल को देखकर इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी की साधुओं और संन्यासियों को लेकर सोच क्या रहा होगा। आज अगर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष कुंभ के दौरान पवित्र डुबकी को डुबकी का कंपटीशन कहते हैं तो इसपर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 1956 में संसद में पेश इस बिल संख्या 37 का नाम है, द साधुज एंड संन्यसीज रजिट्रेशन एंड लाइसेंसिंग बिल। नाम से ही स्पष्ट है कि इस बिल का उद्देश्य क्या रहा होगा। 

उक्त बिल में प्रस्तावित किया गया था कि साधु और संन्यासियों को अपने निवास या संन्यास स्थान के जिलाधिकारी के समक्ष अपना रजिस्ट्रेशन करवाना होगा। कल्पना करिए कि अगर ये बिल पास हो गया होता तो आज योगी आदित्यनाथ का रजिस्ट्रेशन हुआ होता, स्वामी अवधेशानंद जी और चिदानंद जी को साधु होने का लाइसेंस लेना पड़ता। शंकराचार्यों का भी एक रजिस्ट्रेशन नंबर होता। सबसे बड़ी बात तो ये होती कि जबतक रजिस्ट्रेशन न हो जाए या जब तक साधु या संन्यासी होने का लाइसेंस न मिल जाए तबतक कोई भी व्यक्ति खुद को न तो साधु कह सकता था और ना ही किसी मठ का मंदिर का महंथ बता सकता था। इतना ही नहीं साधुओं को लाइसेंस जारी करनेवाले अधिकारी को प्रत्येक साधु के बारे में एक रजिस्टर बनाना होता। इस रजिस्टर में साधु का लाइसेंस जारी करने के पहले का उनका नाम, उनकी उम्र, लिंग और धर्म की जानकारी दर्ज करनी होती। साधु बनने के पहले उनका पेशा क्या था, वो अपना जीवनयापन किन साधनों से कर रहे थे और वो किस क्षेत्र के रहनेवाले थे ये सब जानकारी उस रजिस्टर में दर्ज करनी होती। साधु बनने के बाद वो किस मठ या आश्रम में रहनेवाले होते ये जानकारी देनी होती। जिनको भी साधु का लाइसेंस चाहिए उनको संबंधित जिलाधिकारी को लिखित में आवेदन करना होता। इस बिल में लाइसेंसिंग अधिकारी से ये अपेक्षा की गई थी कि वो आवेदन मिलने के बाद तथ्यों की जांच करे और संतुष्ट होने के बाद ही संन्यासी होने का लाइसेंस जारी करे। जिलाधिकारी या लाइसेंसिंग अधिकारी को ये अधिकार प्रस्तावित किया गया था कि वो चाहे तो आवेदक के जीवन या उसके क्रियाकलापों के धार पर लाइसेंस के आवेदन को रद कर सकता है। साधु या संन्यासी बनने के प्रत्यक आकांक्षी को दस वर्षों के लिए लाइसेंस दिया जाना प्रस्तावित था। दस वर्षों के बाद इस लाइसेंस का नवीकरण होने था। लाइसेंसिंग अधिकारी को अगर ये लगता कि साधु या संन्यासी अपेक्षित तरीके से जीवन नहीं जी रहे हैं तो वो लाइसेंस को बीच अवधि में भी निरस्त कर सकता था। बिल में लाइसेंस देने और उसको रद करने की प्रकिया बताई गई थी। 

संसद में हर बिल को पेश करने के लिए उसके उद्देश्यों को भी स्पष्ट करना होता है। 1956 के अप्रैल में पेश इस बिल में भी उद्देश्य स्पष्ट किया गया था। उसके आधार पर ही संसद में बहस होनी थी। बिल में बताया गया था कि हमारे देश में साधु और संन्यासियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। इनमें से बहुत सारे लोग साधुओं की वेशभूषा में दोषपूर्ण जीवन जीते हैं। भीख मांगते हैं। असमाजिक गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। इस प्रवृत्ति को समय रहते ठीक नहीं किया गया तो देश में अपराध में बढ़ोतरी होगी। इस बिल का दूसरा लाभ ये बताया गया था कि रजिस्टर्ड साधुओं के अखिल भारतीय रजिस्टर से सबको पता होगा कि देशभर में कितनी संख्या में साधु और संन्यासी हैं। सरकार के पास हर साधु के बारे में जानकारी होगी । अगर कोई साधु अपराध में लिप्त पाया जाता है तो रजिस्टर से उसके बारे में पूर्ण जानकारी निकाली जा सकेगी। इतने विस्तार से इस बिल के बारे में बताना इस कारण आवश्यक लगा क्योंकि इससे कांग्रेस पार्टी की सनातन के प्रति सोच प्रतिबिंबित होता है।

ये बिल 1956 में ना सिर्फ संसद में पेश हुआ बल्कि अगस्त महीने में इसपर चर्चा भी हुई। बिल पास नहीं हो सका लेकिन नेहरू के प्रधानमंत्री रहते एक ऐसे बिल पर संसद में चर्चा हुई जिसमें सनातन के ध्वजवाहकों को अपमानित करने का प्रयास किया गया। कांग्रेस पार्टी साधुओं और संन्यासियों के स्वधीनता संग्राम में योगदान को भुला बैठी थी। बिल को इस तरह से प्रस्तावित किया गया जिससे  प्रतीत होता है कि सारे साधु और संन्यासी अपराधी हैं। उनका नेशनल रजिस्टर बनाना आवश्यक है, जैसे अपराधियों की हिस्ट्री शीट बनती है। कुछ दिनों पूर्व जब उत्तर प्रदेश सरकार ने कोराबार करनेवालों को अपने प्रतिष्ठानों पर अपना नाम प्रदर्शित करने का आदेश दिया था तब इसी कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने आसमान सर पर उठा लिया था। कांग्रेस के सहयोगी दलों ने भी इसको मुद्दा बनाने का प्रयास किया था। तब किसी ने ये नहीं सोचा कि कांग्रेस पार्टी ने साधुओं के साथ कैसा व्यवहार किया था। 

स्वाधीनता के बाद कांग्रेस पार्टी ने नेहरू के नेतृत्व में इस देश को ऐसा बनाने का प्रयास किया जिसमें सनातन के चिन्ह सार्वजनिक रूप से कम से कम दिखें। दिखें भी तो अपने मूल स्वरूप में न हों। इसके कई उदाहरण इतिहास से पन्नों में दबे हुए हैं। अगर ठीक से नेहरू के शासनकाल के क्रियकलापों पर चर्चा हो जाए तो कांग्रेस पार्टी का मूल चरित्र जनता के सामने आ जाएगा। अकारण नहीं है कि कांग्रेस के नेता सनातन और धर्म को लेकर भ्रमित रहते हैं। उनको वोट लेने के लिए सनातन एक टूल की तरह तो नजर आता है, उसका उपयोग करना चाहते हैं। जब मूल में ही सनातन का विरोध होगा तो टूल का उपयोग सही तरीके से संभव नहीं। वर्तमान कांग्रेस, उसका नेतृत्व और उनकी टिप्पणियों को अगर समग्रता में देखेंगे तो ये भ्रम साफ तौर पर नजर आता है।