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Saturday, August 26, 2023

फिल्म पुरस्कारों पर अकारण विवाद


कुछ दिनों पूर्व राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा हुई। आमतौर पर प्रतिवर्ष कुछ विघ्नसंतोषी किस्म के लोग राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा पर विवाद उठाने का प्रयास करत रहे हैं। कभी किसी नाम को लेकर तो कभी किसी फिल्म के चयन को लेकर। 2021 के लिए घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में फिल्म मिमी के अभिनेता पंकज त्रिपाठी को सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता और कृति सैनन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का साझा पुरस्कार देने की घोषणा की गई। कुछ लोगों ने इस फिल्म के कलाकारों को पुरस्कृत करने पर इस आधार पर प्रश्न खड़ा किया कि किसी रीमेक फिल्म को कैसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिया जा सकता है। फिल्म मिमी मराठी फिल्म मला आई व्हायचंय का रीमेक है। मिमी को पुरस्कार पर प्रश्न खड़ा करनेवालों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की नियमावली देखनी चाहिए। अगर रीमेक को पुरस्कार नहीं देने का नियम होता तो संजय लीला भंसाली की शाह रुख खान अभिनीत देवदास को पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार कैसे मिल पाते। जब देवदास प्रदर्शित होनेवाली थी तब ये प्रचारित किया गया था कि ये फिल्म तीसरा रीमेक है। होता ये है कि अज्ञानतावश कई बार आलोचना आरंभ हो जाती है। इंटरनेट मीडिया के इस दौर में तथ्यों को परखने की या उस तक पहुंचने का समय कम लोगों के पास होता है। झटपट लिख कर पहले पोस्ट करने की हड़बड़ी होती है। किसी एक ने लिख दिया और फिर उससे जुड़े लोग उसी लिखे को लेकर शोरगुल मचाने लग जाते हैं। आलोचना बहुत सावधानी से किया जाना वाला कार्य है। होना यह चाहिए कि पूरी तरह से तथ्यों को परखने के बाद ही अपने मत को सार्वजनिक करना चाहिए, अन्यथा जानकारों के बीच आलोचना करनेवाले उपहास के पात्र बन जाते हैं।

हाल ही में घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में फिल्म द कश्मीर फाइल्स को राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पुरस्कार देने की घोषणा की गई। इस घोषणा के बाद कांग्रेस ने इसका विरोध किया। कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता ने ट्वीट करके कहा कि ‘एक ऐसी फिल्म जिसने लोगों के बीच विषाक्त माहौल बनाया, जिसने एक समुदाय विशेष को टारगेट किया, जिसने ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ा मरोड़ा, कहानी का सिर्फ एक विद्रूप पक्ष दिखाया, जिसका एकमात्र उद्देश्य सिर्फ वैमनस्यता फैलाना और शांति भंग करना था, उस फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ को राष्ट्रीय एकता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है।‘ लंबी प्रतिक्रिया में आगे कहा गया कि ‘ऐसी फिल्म, जिसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘वल्गर और प्रोपेगैंडा’ कहा गया, जिसके निर्माता लगातार जहर उगलते हैं और अगर आप उनसे असहमत हैं तो जाहिलियत करने पर उतारू हो जाते हैं...अगर लोगों का जख्म कुरेद कर, लोगों पर बीती त्रासदी को भुनाकर पैसा कमाने की प्यास नहीं बुझी, तो उस फ़िल्म को पुरस्कार देकर कश्मीरियों के घावों पर नमक छिड़क दिया गया है। राष्ट्रीय पुरस्कारों की जूरी पर एक नज़र डालने से ही पता चल जाता है कि ‘कश्मीर फाइल्स’ जैसी विकृत फिल्म को क्यों पुरस्कृत किया गया है! उन्माद और नफ़रत की इस आग को भड़काने के लिए कोई हथकंडा नहीं छोड़ेगी यह सरकार।‘ 

 द कश्मीर फाइल्स पर कांग्रेस की इस प्रतिक्रिया में स्पष्ट रूप से राजनीति दिखाई देती है। प्रतिक्रिया के अंत में इसको उन्माद और नफरत की आग को भड़काने वाला सरकार का कदम बताया गया। शायद कांग्रेस पार्टी को ये नहीं मालूम हो कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के लिए फिल्मों का चयन एक जूरी स्वतंत्र रूप से करती है। फिल्मों को पुरस्कृत करने के लिए चयन का कार्य दो स्तरों पर किया जाता है जिसमें सरकार का कोई दखल नहीं होता है। ये मेरा अनुभ भी है। द कश्मीर फाइल्स को वैमनस्यता फैलाने और शांति भंग करनेवाला बताया गया है। द कश्मीर फाइल्स को लेकर कहां शांति भंग हुई या कहां वैमनस्यता फैली ये ज्ञात नहीं हो सका। पूरी दुनिया में इस तरह की फिल्में पहले भी बनती रही हैं और उसपर विमर्श भी होते रहे हैं। नाइट एंड फाग से लेकर सिंडलर्स लिस्ट से लेकर पियानिस्ट तक। यह सूची बहुत लंबी है। द कश्मीर फाइल्स ने कश्मीर के इतिहास की एक बेहद भयानक और क्रूरतापूर्ण घटना को देश की जनता के सामने रखा। एक ऐसी घटना जिसमें हिंदुओं के साथ बर्बरतापूर्ण अत्याचार हुआ था। यह स्वाधीन भारत के इतिहास का वो काला अध्याय है जिसको भूलना संभव नहीं है। जब यह फिल्म रिलीज हुई थी तो इसको देखे बगैर लोगों ने इसपर टिप्पणियां की थीं। इसके निर्माताओं का दावा है कि इसमें किसी घटना को फिक्शनलाइज नहीं किया गया है। खैर इसपर बात करने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इस फिल्म के कंटेंट को लेकर पूर्व में काफी बातें हो चुकी हैं। 

एक और आरोप जो कांग्रेस प्रवक्ता ने अपनी प्रतिक्रिया में जड़ा वो कि जूरी पर नजर डालने से पता चल जाता है कि इस तरह की विकृत फिल्म को क्यों पुरस्कृत किया गया। 2021 के लिए घोषित फीचर फिल्मों की जूरी के अध्यक्ष केतन मेहता हैं। केतन मेहता की विचारधारा क्या रही है ये सबको ज्ञात है। मिर्च मसाला से लेकर माया मेमसाब, टोबा टेक सिंह, मंगल पांडे, मांझी द माउंटेनमैन जैसी फिल्मों से जुड़े केतन मेहता दक्षिणपंथी या सरकार समर्थक फिल्मकार नहीं माने जाते हैं। वो फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा जैसे वर्तमान सरकार के आलोचक के साथ काम कर चुके हैं। हिंदी फिल्मों की दुनिया में केतन मेहता को लिबरल फिल्मकार माना जाता है जिसकी आत्मा वाम की ओर झुकी हुई है। कम से कम हिंदी फिल्मों के जो लोग उनके साथ सार्वजनिक रूप से दिखते हैं वो मोदी सरकार के समर्थक तो नहीं हैं। केतन मेहता का फिल्मों में काम करने का वृहद अनुभव है। वो फिल्म और टेलीविजन संस्थान से प्रशिक्षित हैं। हर तरह की फिल्में बनाई हैं। उनकी अध्यक्षता में जूरी ने द कश्मीर फाइल्स को राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म चुनने का निर्णय लिया है। ऐसे व्यक्ति को जूरी का चैयरमैन बनाकर सरकार ने अपनी निष्पक्षता का परिचय दिया लेकिन कांग्रेस उनके विवेक और चयन पर प्रश्न खड़ा कर रही है। कहा जा रहा है कि जूरी पर नजर डालने से विकृत चयन का पता चल रहा है। 

रही बात अतीत के जख्मों को कुरेदने की तो अंग्रेजी के एक विख्यात लेखक ने कहा था कि अतीत आपके भविष्य को परिभाषित तो नहीं करता लेकिन आपके भविष्य निर्माण में उसकी अहम भूमिका होती है। अगर इस लिहाज से देखें तो द कश्मीर फाइल्स ने कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अमानवीय कृत्यों को आज की पीढ़ी के सामने लाने का जो प्रयास किया है, उसको रेखांकित किया जाना चाहिए। द कश्मीर फाइल्स को जिस इजरायली फिल्मकार ने प्रोपगैंडा फिल्म कहा था उसको भी भारत सरकार ने ही गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल की जूरी में नामित किया था। उसपर भी काफी बातें हो चुकी हैं इससलिए उसको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है। अगर समग्रता में कांग्रेस की द कश्मीर फाइल्स को मिले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की टिप्पणी को देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टी इसपर राजनीति कर रही है। राजनीतिक दल होने के नाते यह उनका धर्म भी है लेकिन सिनेमा को राजनीति का औजार बनाने के बचना चाहिए था। साहित्य और कला में राजनीति के घालमेल से हिंदी साहित्य का अधिकतर सृजनात्मक लेखन एकांगी हो गया है। पिछले आठ नौ सालों से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों और गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म उत्सव को विवादित करने का भरपूर प्रयत्न किया जाता रहा है। एस दुर्गा फिल्म के प्रदर्शन को लेकर विवाद हो या विनोद खन्ना को दादा साहब फाल्के पुरस्कार देने का मसला हो, विवादजीवी सक्रिय होते ही रहते हैं। स्वस्थ आलोचना विधा को समृद्ध करती है जबकि आधारहीन आलोचना से विधा के कुम्हलाने का डर होता है। 


Saturday, July 23, 2022

रचनात्मकता से समृद्ध होंगी भाषाएं


दो दिन पहले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा हुई। फीचर फिल्मों और लोकप्रिय सितारों को पुरस्कार मिले। उनकी खूब चर्चा हुई लेकिन कुछ फिल्मों का उल्लेख नहीं हो पाया। ये उन भाषाओं में बनी फिल्में हैं जो हमारे देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जाती हैं। कई बार छोटे भूभाग पर बोली जानेवाली भाषा में बेहतरीन फिल्म देखने को मिल जाती हैं कई बार ऐसा होता कि भौगोलिक रूप से बड़े क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषा में अच्छी फिल्में बनती हैं। दो दिन पहले घोषित राष्ट्रीय पुरस्कार में बेस्ट नान फीचर फिल्म के लिए डांगी भाषा की फिल्म टेस्टीमनी आफ एना चुनी गई। इस भाषा के बारे में कम ही जानकारी है। गुजरात का एक जिला है डांग जो महाराष्ट्र की सीमा से लगता है। उस जिले में आदिवासी आबादी है और वहां डांगी बोली जाती है। इस छोटे से आदिवासी बहुल जिले में बोली जानेवाली भाषा में बनी नान फीचर फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार में स्वर्ण कमल प्रदान किया जाएगा। इसी तरह 2020 के लिए ही बेस्ट शार्ट फिल्म कर्बी भाषा में बनी एक फिल्म को दिए जाने की घोषणा की गई है। हरियाणवी में दादा लख्मी पर बनी फिल्म , दिमासा में अमी बरुआ की फिल्म और टुलू में संतोष माडा की फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दिया जाएगा। इसके अलावा राजस्थानी की एक फिल्म को भी सम्मानित करने की घोषणा की गई है।

उपरोक्त सभी भाषाओं पर विचार करें तो इनमें से कोई भी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है। राजस्थानी को छोड़कर सभी भाषाएं अपेक्षाकृत छोटे भूभाग की भाषा है लेकिन इन भाषाओं में लगातार फिल्में बन रही हैं। लगातार इस वजह से कि पिछले तीन वर्षों के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची देखने पर इस तरह की कई भाषाओं की फिल्में दिखती हैं जिनको स्वर्ण कमल या रजत कमल से सम्मानित किया गया है। 2017 में तो निर्देशक की पहली सर्वोत्तम फिल्म का अवार्ड लक्षद्वीप में बोली जानेवाली भाषा जेसरी में बनी फिल्म सिंजर को दिया गया था। इस फिल्म का चयन करनेवाली जूरी के अध्यक्ष मशहूर फिल्मकार शेखर कपूर थे। करीब 115 मिनट की ये फिल्म लक्षद्वीप में रहनेवाले एक मछुआरे पर वैश्विक आतंकवाद के प्रभाव की कहानी है। फिल्म में ये दिखाया गया है कि जब उसकी बहन और मंगेतर को आईएसआईएस के आतंकवादियों के चंगुल से छुड़ाया जाता है तो पता चलता है कि उनके साथ बलात्कार हुआ है। स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब पता चलता है कि युवतियां गर्भवती हैं। जब उनसे संवाद होता है तो ये बात सामने आती हैं कि वो अपना गर्भ गिराने को तैयार नहीं हैं। इस पूरी कहानी और नायक के मन के द्वंद्व को निर्देशक पैंपली ने बेहतरीन तरीके से दर्शकों के सामने रखा है। फिल्म के साथ साथ निर्देशक को भी सम्मानित किया गया था। इसी वर्ष लद्दाखी और टुलू भाषा में बनी फिल्मों को भी पुरस्कृत किया गया था। अगले वर्ष के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में भी राजस्थानी, गारो, सेरदुकपेन जैसी भाषाओं में बनी फिल्मों को सम्मानित किया गया। अगले वर्ष यानि 2019 में पर्यावरण पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मोनपा में बनी फिल्म को दिया गया। इसके साथ ही खासी, मीशिंग, पानिया, टुलू और छत्तीसगढ़ी में बनी फिल्मों को भी पुरस्कार मिले।

उपरोक्त सारी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं है। कहने का अर्थ ये है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं होते हुए भी इन भाषाओं में बेहतर कार्य हो रहा है। वो अपनी जमीन से जुड़ी कहानियों और अपने समाज में फैली कुरीतियों पर अपनी कला के माध्यम से प्रहार कर रहे हैं। अच्छी बात ये है कि कला जगत इनके कार्यों को रेखांकित भी कर रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि इन भाषाओं में अधिक से अधिक काम हो ताकि उन इलाकों में फैली कहानियों को देश के सामने लाया जा सके। अब जैसे इस वर्ष अभिनेता यशपाल शर्मा की फिल्म दादा लख्मी को सर्वश्रेष्ठ हरियाणवी फिल्म का पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। दादा लख्मी हरियाणवी के प्रसिद्ध कवि और कलाकार थे। उनको हरियाणा में सूर्य कवि कहा जाता है। लोक कला के क्षेत्र में दादा लख्मी की बहुत प्रतिष्ठा है। अभिनेता यशपाल शर्मा ने श्रमपूर्वक दादा लख्मी के जीवन को पर्द पर उतारा है। इसके लिए उनको इस बात की आवश्कता नहीं हुई कि हरियाणवी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा हो। किसी भी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग अपनी जगह सही हो सकती है लेकिन उस भाषा के लोगों का ये भी दायित्व होता है कि वो अपनी भाषा में बेहतर काम करें और उसको समृद्ध बनाएं।

इस देश में भाषा के नाम पर स्वाधीनता के बाद से राजनीति हो रही है। कभी राष्ट्रभाषा के नाम पर तो कभी राज्यों के बंटवारे के नाम पर तो कभी शिक्षा नीति में भाषा को मिलनेवाली प्राथमिकता के नाम पर। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आने के बाद भी भाषा को लेकर एक विभाजन करने की कोशिश की गई थी लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा का उल्लेख होने की वजह से वो विभान संभव नहीं हो पाया। कला जगत में भाषा के नाम पर राजनीति अपेक्षाकृत कम है लेकिन जो कलाकार भाषा के आधार पर कला से महत्व चाहते हैं उनको अपनी भाषा में रचनात्मक कार्य करना चाहिए। रचनात्मक कार्यों से उस भाषा के प्रति लोगों के मन में एक आकर्षण पैदा होगा और वो अधिक लोगों तक पहुंच सकेगी। अगर हम लक्षद्वीप में बोली जानेवाली भाषा जेसरी में बनी फिल्म संजर का ही उदाहरण लें तो निर्देशक ने अपनी कला के माध्यम से अपनी भाषा को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। जिस प्रकार से उन्होंने अपनी फिल्म ने वैश्विक आतंकवाद और उसके प्रभाव का मुद्दा उठाया और उसको वैश्विक मंचों पर सराहना मिली। उसने फिल्म से साथ साथ जेसरी भाषा के बारे में जानने की उत्सकुकता भी पैदा की। इस तरह के प्रयासों से न केवल भाषा का फैलाव होता है बल्कि भाषा को मजबूती भी मिलती है।

देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जानेवाली भाषा में फिल्में बनने का एक और लाभ है।    हमारे यहां कथावाचन की एक सुदीर्घ और लंबी परंपरा रही है। उस परंपरा को समृद्ध करने के लिए अपने देश की हर भाषा में जो कदम कदम पर कहानियां बिखरी पड़ी हैं, जो लोककथाएं सुनाई जाती हैं उनको फिल्मों के माध्यम से दुनिया के सामने लाया जा सकते है। 2017 में ही एक फिल्म पुरस्कृत हुई थी जिसका नाम है विलेज राकस्टार और इसकी निर्देशक हैं रीमा दास। असमिया में बनी इस फिल्म में एक उत्तर पूर्व के एक 10 वर्षीय बच्ची धुनू की कहानी है। वो अपना राक बैंड बनाना चाहती है। इस फिल्म में उसके सपने और संघर्ष के बीच चलती कथा है जिसमें उसकी विधवा मां है और लड़कों का एक समूह है। इसको जिस तरह से निर्देशक ने कहानी में पिरोया है वो अद्भुत है। पिछले दिनों कान में आयोजित फिल्म फेस्चिवल में भारत को दुनिया का कंटेंट हब बनाने की बात हुई थी। तमाम तरह की सहूलियतों के साथ साथ हमारे देश की सैकड़ों भाषा में फैली कहानियां भी इस योजना में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। अगर हम गंभीरता से अपनी भाषा को समृद्ध और मजबूत करना चाहते हैं तो उसमें रचनात्मक कार्य करें। दुनियाभर का उदाहरण हमारे सामने है कि कोई भी भाषा आंदोलन से न तो दीर्घजीवी हुई है और न ही समृद्ध। उसमें होनेवाले रचनात्मक कार्य ही उस भाषा को और उसको बरतनेवालों को दीर्घायु बनाते हैं।  

Saturday, January 15, 2022

साहित्य में दयनीय महानता का दौर


इन दिनों हिंदी साहित्य में एक अजीब किस्म का सन्नाटा दिखाई देता है। कुछ रचनाकार कई बार अपने लेखन से तो कई बार अपनी टिप्पणियों से इस सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश करते हैं। वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा नियमित तौर पर फेसबुक पर कोई टिप्पणी लिखकर साहित्य के ठहरे पानी में कंकड़ फेंकती रहती हैं। कई बार उस पर विवाद भी होता है। बीच-बीच में लेखक संगठनों के नाम पर कुछ नए पुराने लेखक अपील आदि जारी करते रहते हैं लेकिन उसका भी कहीं कोई असर दिखाई नहीं देता है। ऐसी अधिकतर अपील किसी न किसी चुनाव के पहले ही जारी की जाती हैं। अब तो इसका असर इंटरनेट मीडिया पर भी नहीं होता।  जमीनी स्तर पर तो शायद अपील पहुंचती भी नहीं है। कुछ ऐसे भी लेखक हैं जो साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में फासीवाद को लेकर चिंतित ही नहीं रहते हैं बल्कि उसके खतरों से लोगों को आगाह भी करते रहते हैं। उधर सरकार के विभिन्न मंत्रालय और विभाग साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में वैचारिक विरोधियों को लगातार स्थान देती रहती है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय की पत्रिका आजकल के आवरण पर धुर वामपंथी कवि की तस्वीर छपती है। इसके पहले भी वामपंथी विचारधारा के लेखकों के चित्र आजकल पत्रिका के आवरण पर नियमित तौर पर छपते रहे हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार मोदी सरकार के घोषित विरोधियों को दिया जाता है। फिल्म फेस्टिवल से लेकर युवा महोत्सव तक में सरकार विरोधियों की फिल्में और वक्ता के तौर पर उनको आमंत्रित करके सरकार लगातार अपने लोकतांत्रिक होने का प्रमाण देने में जुटी है। बावजूद इसके विचारधारा विशेष के लेखकों को 2014 के बाद से ही फासीवाद का डर सता रहा है। 

अब वामपंथियों में एक नई प्रवृत्ति स्पष्ट दिखने लगी है। पहले वो अपनी विचारधारा से संबद्ध राजनीतिक दलों के लिए काम करते थे । पिछले तीन चार साल से हो रहे चुनावों में वामपंथी दलों की हालत बहुत खराब हो गई है। अब अधिकतर वामपंथी लेखकों को कांग्रेस में संभावना नजर आने लगी। वामपंथी लेखक अब खुलकर कांग्रेस पार्टी के लिए काम करते हुए नजर आने लगे हैं। इंटरनेट मीडिया पर उनके लिखे को देखने से ये स्पष्ट हो जाता है। उनको अब इंदिरा गांधी के फासीवाद की बिल्कुल याद नहीं आती। उनको आपातकाल के दौर की ज्यादातियों की भी याद नहीं आती। निर्मल वर्मा ने तमिल लेखक पी कृष्णन से एक बातचीत में स्पष्ट रूप से इंदिरा गांधी की फासीवादी नीतियों और हिंदी के लेखकों पर अपनी राय रखी थी। निर्मल वर्मा ने कहा था, सबसे अधिक चौंकानेवाली बात थी इंदिरा गांधी की अलोकतांत्रिक तथा अत्याचारी नीतियों का बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा जरा भी विरोध न किया जाना। वैसे तो इंदिरा गांधी की तानाशाही हल्की थी लेकिन इस हल्के संस्करण ने भी  हमारे बुद्धिजीवी वर्ग को खासा भयभीत कर दिया था और उन्होंने घुटने टेक दिए थे। इस क्रम में निर्मल ने रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती तक का नाम लिया था। निर्मल ने बहुत कठोर शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा था कि उन्हें इस बात का अंदाज नहीं था कि हिंदी के बड़े साहित्यकार इतने भंगुर और सारहीन सिद्ध होंगे। अब जब वामपंथी लेखक भय से नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से इंदिरा गांधी की विरासत की प्रशंसा कर रहे हैं। संभव है इस वजह से प्रभाव नहीं पैदा कर पा रहे हैं। 

साहित्य के राजनीतिक दांवपेंच से अलग हटकर अगर रचनात्मक स्तर पर भी देखें तो हिंदी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य बहुत आशाजनक नहीं लगता है। अब भी वरिष्ठ और बुजुर्ग साहित्यकार ही अपनी सक्रियता से रचनात्मक संसार को जीवंत बनाने के प्रयास में लगे हुए हैं, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं। हिंदी के अधिकतर युवा लेखक आत्ममुग्धता के शिकार हो गए हैं। छोटे-मोटे उपन्यास लिखनेवाले भी खुद को प्रेमचंद से बड़ा कथाकार मानने लगा है। उसकी अपेक्षा भी होती है कि साहित्य समाज उनको प्रेमचंद से अधिक सम्मान भी दे। इसी अहंकार में वो आलोचना से लेकर समीक्षा विधा को खारिज करने लगते हैं। इंटरनेट माध्यम पर होनेवाली फूहड़ या प्रशंसात्मक चर्चा को सत्य मानकर वो अपनी कृति को महान समझ लेते हैं। कवियों के तो कहने ही क्या, वो तो खुद की रचनाओं पर मुग्ध रहते ही हैं। साहित्य के इस दौर को देखकर एक मित्र की टिप्पणी सटीक लगती है। उसने एक दिन कहा था कि हिंदी साहित्य में ये दयनीय महानता का दौर है। ,

आज अगर हिंदी साहित्य में किसी प्रकार का कोई विमर्श नहीं हो रहा है तो उसके पीछे के कारणों की पहचान करनी होगी। राजेन्द्र यादव से हमारा वैचारिक स्तर पर काफी विरोध रहता था लेकिन उनकी इस बात के लिए उनके विरोधी भी प्रशंसा करते थे कि वो साहित्य में अछूते प्रश्न उठाते थे। नामवर सिंह धुर वामपंथी थे, कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके थे लेकिन जब वो लिखते थे तो उससे साहित्य जगत में हलचल होती थी, उनके लिखे के पक्ष विपक्ष में बातें होती थीं। अशोक वाजपेयी भी जबतक वामपंथ की राजनीति में नहीं उलझे थे तबतक उनके लेखन में एक वैचारिक उष्मा होती थी। इनके बाद की पीढ़ी में भी देखें तो ज्ञानरंजन से लेकर रवीन्द्र कालिया तक के लेखन में कुछ ऐसे तत्व अवश्य होते थे जो पाठकों के बीच चर्चा की वजह बनते थे। नरेन्द्र कोहली के लेखन में लगातार प्रयोग होते थे जो पाठकों को नई तरह से सोचने का आधार देते थे। कमलकिशोर गोयनका ने प्रेमचंद को समझने की नई दृष्टि हिंदी साहित्य जगत को दी। इन लोगों में अहंकार नहीं था और वो अपने पूर्वज लेखकों को कभी खारिज नहीं करते थे। उनको साहित्य की परंपरा का भी ज्ञान था और उसपर वो गुमान भी करते थे। कविता में भी देखें तो आधुनिक काल के कवियों ने काफी प्रयोग किए। स्वाधीनता के बाद भी कवियों ने अपनी लेखनी के माध्यम से भारतीय समाज की जड़ता पर प्रहार किया। आज ज्यादातर कविताएं गद्य में लिखी जा रही हैं। पहले कवियों पर संपादक नाम की संस्था का एक फिल्टर होता था लेकिन अब इंटरनेट मीडिया ने उस फिल्टर को समाप्त कर दिया। परिणाम यह हो रहा है कि कविता के नाम पर अंट शंट लिखा जा रहा है। लेकिन अहंकार इतना कि खुद को दिनकर और बच्चन से कम मानने को राजी नहीं। 

एक जमाना होता था जब साहित्यकारों की निजी गोष्ठियां हुआ करती थीं। जिसमें साहित्य की प्रवृत्तियों से लेकर नए लिखे जा रहे पर चर्चा होती थी। लोग खुलकर नई रचनाओं पर अपनी बातें रखते थे। आलोचना या प्रशंसा दोनों होती थी। इसमें बैठनेवाले वरिष्ठ साहित्यकार नए लेखकों की टिप्पणियों को ध्यान से सुनते थे और अगर आवश्यकता होती थी तो उसमें सुधार भी करते थे। इसका फायदा ये होता था कि नए लेखकों की समझने की दृष्टि का विस्तार होता था।  इंटरनेट मीडिया के विस्तार के बाद इस तरह की गोष्ठियां कम हो गईं। लोगों में पढ़ने की भी आदत कम होती जा रही हैं। रचनाओं पर टिप्पणी के स्थान पर लाइक के बटन अधिक दबने लगे हैं। दूसरी एक बात जो युवा लेखकों में देखने को मिल रही है कि वो अपनी लेखकीय परंपरा से अनजान हैं, उनको इस बात का भान ही नहीं है कि वो जिस भारतीय लेखन परंपरा में आना चाह रहे हैं वो कितना समृद्ध है। जब अपनी परंपरा के वैराट्य का अनुमान नहीं होता है तो व्यक्ति अहंकार का शिकार हो जाता है। उसको लगता है कि उसने जो लिख दिया है वही सबसे अच्छा है। युवा लेखकों को अपनी इस कमी को दूर करना होगा तभी जाकर हिंदी साहित्य जगत का वैचारिक सन्नाटा दूर होगा।