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Saturday, October 10, 2026

साहित्यिक वक्ताओं की तैयारी पर प्रश्न


बात कड़वी लग सकती है लेकिन सच्चाई यही है। हद तो यह हो गई कि एक वक्ता कुंवर नारायण की जगह निर्मल वर्मा पर बोलने लगे। टोकने पर उसको स्मृति दोष बताने लगे। यह बात भी उचित है कि कुछ वक्ताओं को ही हर विषय पर बोलने के लिए बार-बार क्यों बुला जाता है। असल में रजा न्यास दरबारियों को प्राथमिकता देता है। दो दिन तक में इस कार्यक्रम में बतैर श्रोता मौजूद रहा, और एकाध वक्ताओं को छोड़ दें तो किसी ने भी कुंवर नारायण को पढ़ा नहीं था। यह कहने के बाद हो सकता है कि रजा न्यास मुझे बतौर श्रोता भी आमंत्रित नहीं करे लेकिन जिस तरह से सरकारी संस्थाओं में इस तरह के आयोजन रस्मी होते हैं रजा न्यास के आयोजन भी उसी तरह के होते हैं, जिसमें चमचों को माइक दिया जाता है। यह कठोर टिप्पणी लिखी है दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक और हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक प्रभात रंजन ने। प्रभात रंजन बात कर रहे हैं हिंदी कवि कुंवर नारायण के जन्मशताब्दी के अवसर पर रजा न्यास के दो दिवसीय आयोजन की। रजा न्यास लेखक अशोक वाजपेयी की साहित्यिक दुकान है। ये संस्था नियमित रूप से कार्यक्रम आदि आयोजित करती है। इनके कार्यक्रमों में कुछ ऐसे लोगों को आमंत्रित किया जाता है जो अशोक वाजपेयी के हर कार्यक्रम में उपस्थित होते हैं। चाहे उनको पुरस्कार दिया जा रहा हो या फिर किसी लेखक कवि पर केंद्रित गोष्ठी आयोजित की जा रही हो। हिंदी के वर्तमान साहित्यिक परिदृष्य में बहुत ही कम ऐसे लेखक हैं जो किसी गोष्ठी में जाने के लिए मना करते हैं। अध्ययन हो या न हो। 

प्रभात रंजन की टिप्पणी हिंदी साहित्य की किसी राजनीति के अंतर्गत नहीं लिखी गई है बल्कि क्षोभ से उपजी हुई है। कुंवर नारायण समकालीन हिंदी साहित्य के ऐसे कवि या लेखक हैं जिनका रचना संसार विस्तृत है। उन्होंने श्रेष्ठ कवितें लिखी हैं। उनकी कविताओं में कई परतें हैं जिनको समझने के लिए भारतीय काव्य परंपरा का गहन अध्ययन होना चाहिए। काव्य परंपरा के साथ साथ भारतीय परंपराओं का ज्ञान भी होना चाहिए। कुंवर नारायाण ने अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के बहाने विश्व सिनेमा पर भी बहुत गंभीर टिप्पणियां की थीं जो उनके अध्ययन क्षेत्र का सूचक है। हिंदी साहित्य में कम ही ऐसे लेखक और कवि हुए हैं जिन्होंने अंतराष्ट्रीय सिनेमा पर अधिकारपूर्वक लिखा हो। ऐसे लेखक के जन्म शताब्दी समारोह में इस तरह के हल्के, अज्ञानी और लापरवाह वक्ताओं को बुलाकर दिवंगत लेखक का अपमान करना ही माना जाएगा। आप कल्पना करिए कि जन्म शताब्दी समारोह कुंवर जी की मनाई जा रही हो और मंच से कोई वक्ता निर्मल वर्मा पर बोलने लगे। यह तो लेखक और मंच दोनों का अपमान है। लापरवाही की हद तब होती है जब उनको याद दिलाया गया तो वो कहने लगे कि स्मृति दोष के कारण कुंवर जी की बजाए निर्मल जी पर बोलने लगे थे। यह बहुत ही गैर जिम्मेदारी वाला अप्रोच है। इस तरह की घटनाएं हिंदी साहित्य की गोष्ठियों में आम है। आप किसी विषय पर सुनने जाएंगे लेकिन इसकी गारंटी नहीं है कि वक्ता उसी विषय पर बोलें। वक्ता अपनी मर्जी से बोलते हैं और वक्तव्य के बीच में एक दो बार विषय का नाम ले लेते हैं ताकि ऐसा प्रतीत हो कि वो विषय पर बोल रहे हैं।  जन्म शताब्दी जैसे आयोजनों में तो ये खूब होता है। आप अपने पूर्वज लेखक की रचनाशीलता और उसके विभिन्न कोणों के बारे में जानने सुनने के लिए ऐसी गोष्ठियों में जाते हैं लेकिन वक्ता अपने और उनके संबंधों के बारे में बखान करने लग जाते हैं। उनको लगता है कि श्रोताओं को उनकी चतुराई समझ नहीं आती। श्रोता सब समझते हैं.  

यह अकारण नहीं है कि हिंदी साहित्य से जुड़ी गोष्ठियों में श्रोता नहीं या कम मिलते हैं। गोष्ठियों में श्रोताओं को कुछ नया मिलना लगभग बंद हो गया है। जो भी वक्ता आते हैं उनमें से अधिकतर बगैर किसी तैयारी के अपने ज्ञानदंभ के साथ आते हैं। जो मन आता है वो बोलकर चले जाते हैं। श्रोता बेचारा ठगा रह जाता है। अशोक वाजपेयी का ही उदाहरण लीजिए। वो अच्छे वक्ता माने जाते हैं। लच्छेदार हिंदी और अंग्रेजी बोलते हैं। उनके पास संस्मरणों का खजाना भी है। पर तय विषय पर उनको बोलते कम ही सुना गया है। आखिरी बार किसी गोष्ठी में तय विषय पर अशोक वाजपेयी कब बोले इसपर तो शोध हो सकता है। उनकी विशेषता है कि वो मंच पर आते हैं। आरंभ कुछ हल्की फुल्की बातों से करते हैं। फिर एकाध संस्मरण सुनाते हैं और तय विषय को छूते हुए निकल जाते हैं। बात रामचंद्र शुक्ल के कविता क्या है जैसे लेख पर होगी तो वो ये बताएंगे कि उनका रामचंद्र शुक्ल का अध्ययन कितना कम है। अरे भले आदमी अगर आपका अध्ययन कम है तो मत बोलिए। मंच और माइक का लोभ संवरण कर पाना बहुत कठिन कार्य है। नामवर सिंह भी अपने आरंभिक दिनों में बहुत तैयारी के साथ बोलते थे। उनके व्याख्यानों में तथ्य और तर्क दोनों होते थे। इसलिए लोग उनको सुनने के लिए घंटों प्रतीक्षा करते थे। बढ़ती अवस्था के साथ-साथ मंच और माइक के आकर्षण ने उनको भी वक्तव्य पूर्व की तैयारी से दूर कर दिया। वो भी अपने अनुभवों के आधार पर बोलने लगे थे। परिणाम होता था कि जब नामवर सिंह किसी पुस्तक लोकार्पण में जाते थे तो मंच पर ही पुस्तक को उलटते-पलटते थे। अपने भाषण में पुस्तक की दो-तीन पंक्तियां उद्धृत करते हुए लेखक पर तले जाते थे। यह अकारण नहीं था कि बाद के दिनों में नामवर सिंह मंच से हर किसी की प्रशंसा करने लगे थे। प्रशंसा कर देने से प्रश्न नहीं उठते हैं। 

इस तरह की गोष्ठियों और वक्ताओं से हिंदी साहित्य समृद्ध नहीं होता। ना ही लेखक की कृति पर चर्चा हो पाती है। तात्कालिक रूप से लेखकों को अच्छा लग सकता है कि नंच से उसकी प्रशंसा हुई पर कुछ समय बाद उसको कोई याद भी नहीं रखता क्योंकि कोई सार्थक बात तो हुई नहीं। दूसरी तरफ अशोक वाजपी जैसे वक्ताओं को जो बेहतर बोल सकते हैं वो भी संस्मरणात्मक घटनाओं से आगे नहीं बढ़ पाते हैं। संस्मरणों की हल्की फुल्की बातें सुनाकर श्रोतों का मनोरंजन तो हो सकता है लेकिन ज्ञानवर्धन नहीं। विषय के साथ न्याय के लिए आवश्यक है कि उसपर बोलने के लिए पर्याप्त तैयारी की जाए। कुछ ऐसा विश्लेषण या तथ्य प्रस्तुत किया जा सके जिससे श्रोता समृद्ध हो सकें, साहित्य की चौहद्दी बढ़े। किसी कृति पर बोलने के पहले यह भी आवश्यक है कि उसकी लेखन प्रकृत्ति की परंपरा को रेखांकित करते हुए इस बात का आकलन किया जाए कि अमुक कृति ने उस परंपरा को आगे बढ़ाया या उसमें कुछ जोड़ा या नहीं। पाठकों के सामने कृति के उस पक्ष को रखा जाना चाहिए जिसको लेखक स्पष्ट नहीं कर पाया हो। यही काम तो आललोचना का भी था और यही काम गोष्ठियों में अपने विचार प्रस्तुत करनेवालों का भी है। प्रभात रंजन की टिप्पणी में दरबारियों और चमचों की भी बात की गई है। कम से कम ये साहित्य का भला तो नहीं कर सकते। 


Saturday, November 4, 2023

आकांक्षी लेखक व बुजुर्ग अवसरवादिता


लखनऊ में आयोजित होनेवाले आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान का निमंत्रण पत्र पिछले दिनों मिला। कथाक्रम सम्मान, लखनऊ निवासी उपन्यासकार शैलेन्द्र सागर पिछले कई वर्षों से प्रदान कर रहे हैं। कथाक्रम सम्मान के निमंत्रण पत्र को देख रहा था। वहां कोष्ठक में उल्लिखित रजा फाउंडेशन से सहयोग प्राप्त पढ़ते समय थोड़ी देर रुका। रजा फाउंडेशन पूर्व नौकरशाह अशोक वाजपेयी चलाते हैं। इसके पहले कानपुर के किसी महाविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम की प्रचार सामग्री इंटरनेट मीडिया पर दिखी थी। उसपर भी रजा फाउंडेशन का लोगो लगा था। हिंदी साहित्य से जुड़े कई अन्य कार्यक्रमों में रजा फाउंडेशन का सहयोग दिखता है। इसमें से अधिकतर कार्यक्रमों में रजा फाउंडेशन से संबद्ध अशोक वाजपेयी का नाम वक्ता के तौर पर होता है। कथाक्रम सम्मान समारोह के निमंत्रण पत्र पर भी वक्ता के तौर पर अशोक वाजपेयी का नामोल्लेख है। जब रजा फाउंडेशन का लोगो और अशोक वाजपेयी का नाम वक्ता के तौर पर देखा तो एक उपन्यासकार मित्र को फोन किया। चर्चा के दौरान उन्होंने और भी कई दिलचस्प बातें बताईं। उन्होंने कहा कि सिर्फ आनंद सागर कथाक्रम सम्मान क्यों, रजा फाउंडेशन तो देवीशंकर अवस्थी सम्मान और भारत भूषण अग्रवाल सम्मान में भी सहयोग करता है और वहां भी कई बार अशोक वाजपेयी वक्ता होते हैं। सम्मान और आयोजनों में सहयोग करके वक्ता बनने की ये प्रवृत्ति हिंदी साहित्य के लिए नई और दिलचस्प है। इसपर अगर गंभीरता से विचार किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि अशोक वाजपेयी रजा फाउंडेशन के माध्यम से हिंदी के पुरस्कारों का अधिग्रहण कर रहे हैं। क्या अशोक वाजपेयी हिंदी में एक नया साहित्यिक उपनिवेश बनाना चाहते हैं। 

हिंदी साहित्य में नया उपनिवेश बनते देखकर अशोक वाजपेयी की वर्षों पहले लिखी एक टिप्पणी का स्मरण हो उठा। बुजुर्ग अवसरवादिता के नाम से लिखी उस टिप्पणी में अशोक जी ने शायर कैफी आजमी और अली सरदार जाफरी पर प्रहार किया था। अशोक वाजपेयी ने तब लिखा था, सफलता के इस निर्लज्ज युग में अकसर यह मान लिया जाता है कि युवा लोग ही अवसरवादी होते हैं। पर सच यह नहीं है। हमारे बुजुर्ग चौहान भी अवसर का लाभ उठाने से कतई नहीं चूकते। गालिब की द्विशताब्दी के सिलसिले में दिल्ली के लालकिले के नौबतखाने पर जो मुशायरा मुनक्कद किया गया था उसमें, जाहिर है, गालिब को प्रणीति देनी थी। उर्दू में किसी पुराने कवि की जमीन पर नया कुछ कहकर प्रणीति देने की एक खूबसूरत परंपरा है। लेकिन उस शाम हमारे दो बुजुर्ग शायरों कैफी आजमी और सरदार अली जाफरी ने इस परंपरा को तज दिया जबकि बाकी सबने उसे बखूबी निभाया। इस टिप्पणी में अशोक वाजपेयी ने जाफरी साहब पर गालिब से अलग हटकर गोष्ठी को हिंद-पाक दोस्ती के गुणगान के कार्यक्रम में बदलने के लिए व्यंग्य किया। अशोक वाजपेयी इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने जाफरी साहब की आलोचना करते हुए लिखा कि उन्होंने अहमद फराज की दोस्ताना नज्म के उत्तर में हिंद-पाक के 1965 के युद्ध के समय लिखी अपनी नज्म सुनाई । उनकी टिप्पणी थी, माना कि बम परीक्षण के बाद हिंद-पाक संबंध फिर से हमारी चिंता के विषय हो गए हैं पर इसका यह मतलब तो नहीं कि हर मौके पर उसी का राग अलापा जाने लगे, वह भी गालिब को प्रणिति देने के बजाय। 

अशोक वाजपेयी ने अली सरदार जाफरी की अवसरवादिता का एक और उदाहरण अपनी उसी टिप्पणी में दिया था। उन्होंने लिखा था कि जाफरी साहब ने ज्ञानपीठ पुरस्कार के अवसर पर ऐसी ही अवसरवादिता का परिचय अपने स्वीकृति भाषण में दिया। अव्वल तो भारतीय संस्कृति में कमल के फूल के महत्व पर बेमौके काफी देर तक बोले जिसपर स्वयं प्रधानमंत्री जी ने भी बाद में चुटकी ली। दूसरे, उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की कविता उद्धृत की, प्रधानमंत्री जी को कवि की हैसियत से उनके बम-विरोध की याद दिलाने के लिए। अपनी टिप्पणी की अंतिम पंक्ति में अशोक वाजपेयी कहते हैं कि उम्र के इस पड़ाव पर जाफरी साहब को यह सब करने की क्या जरूरत है। आज से करीब 25 वर्ष पूर्व जब अशोक वाजपेयी उर्दू के दो कवियों के बहाने जिस बुजुर्ग अवसरवादिता को रेखांकित कर रहे थे वही अब परोक्ष रूप से उनके व्यवहार में या कर्म में दिखाई देता है। आयोजन को अपने फाउंडेशन के माध्यम से आर्थिक सहयोग देना और फिर उसी आयोजन में वक्ता बनना। यह तो ‘बुजुर्ग चौहान’ का अवसर का लाभ उठाने जैसा ही प्रतीत होता है। इस सहयोग का एक अन्य पहलू भी है। रजा फाउंडेशन के माध्यम से अशोक वाजपेयी साहित्य और संस्कृति की दुनिया में एक प्रतीकात्मक राजसत्ता की स्थापना कर रहे हैं। एक ऐसी राजसत्ता जिसमें साहित्यिक न्याय के लिए कोई जगह नहीं होगी। जिसमें समर्थकों और चाटुकारों को स्थान मिलेगा। स्थान उपलब्ध करवाने वाले के लिए नायकत्व का सृजन होगा। एक तरफ अपने राजनीतिक आकाओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कारों की वापसी का प्रपंच रचा जाता है दूसरी तरफ पूंजी की शक्ति का उपयोग करके पुरस्कारों का अधिग्रहण कर अपने समर्थकों को उपकृत किया जाता है। आयोजनों में ‘सहयोग’ देकर मंच हासिल करते हैं और फिर उस मंच से राग फासीवाद और समय का संकट जैसे राग अलापते हैं। अवसर मिलते ही ‘बुजुर्ग चौहान’ भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होकर अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता, संबद्धता और संलिप्तता भी साबित करते हैं। 

एक जमाना था जब हिंदी पट्टी के साहित्यकार दिल्ली आते थे तो अकारण राजेन्द्र यादव से मिलने हंस पत्रिका के कार्यालय चले जाते थे। वहां जानेवालों का उद्देश्य साहित्य सत्ता के दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना होती थी। नामवर सिंह के यहां भी पद और पुरस्कार के आकांक्षी लेखक अपनी हाजिरी लगाते थे। राजेन्द्र यादव और नामवर सिंह के निधन के बाद हिंदी के आकांक्षी लेखक अशोक वाजपेयी के दरबार में पहुंचने लगे। अशोक वाजपेयी के पास आर्थिक शक्ति भी है जिसका उद्घोष रजा फाउंडेशन से सहयोग प्राप्त, की पंक्ति निरंतर करती रहती है। ये पंक्ति आयोजनों की प्रचार सामग्री से लेकर पुस्तकों पर दिखती रहती है। हिंदी साहित्य में आपको कई ऐसे लेखक मिल जाएंगे जो रजा फाउंडेशन के लिए किसी दिवंगत हो गए लेखक की जीवनी लिख रहे होंगे। दिवंगत लेखक भी ‘बुजुर्ग चौहान’ की पसंद के होते हैं। लेखक को पैसे देकर जीवनी लिखवाना और फिर प्रकाशकों को सहायता प्रदान कर पुस्तकों का प्रकाशन। अब तो हालत यहां तक पहुंच गई है कि अपना साक्षात्कार भी ‘सहयोग और मदद’ से प्रकाशित करवा रहे हैं। परिणाम यह कि ‘बुजुर्ग चौहान’ के इर्द गिर्द आकांक्षी प्रकाशकों का जमावड़ा। आकांक्षी लेखक और आकांक्षी प्रकाशकों की मदद से नायकत्व का विस्तार होता जाता है। ‘बुजुर्ग चौहान’ फासीवाद-फासीवाद का राग भी अलापते रहते हैं लेकिन जब अपने नायकत्व को मजबूत कर रहे होते हैं तो एक प्रकार से साहित्यिक फासीवाद का पोषण कर रहे होते हैं। 

अशोक वाजपेयी ने सरदार जाफरी, कैफी आजमी से लेकर नामवर सिंह तक को अवसरवादी कहा और लिखा है। नामवर सिंह को तो उन्होंने उनके विचलनों के आधार पर अचूक अवसरवादी करार दिया था। जहां तक मुझे याद है तो इसी शीर्षक से एक लंबा लेख भी लिखा था। अपने साथी लेखकों को अवसरवादी करार देनेवाले अशोक वाजपेयी रजा फाउंडेशन के माध्यम से अपनी साहित्यिक महात्वाकांक्षओं की पूर्ति में लगे हैं। विचार करना होगा कि अपने को साहित्य का नायक स्थापित करने के लिए हर तरह के अवसर का लाभ उठाना अवसरवादिता है या नहीं। क्या साहित्य सेवा की आड़ में अपनी छवि को गाढ़ा करने का खेल अवसरवादिता है या नहीं। अंत में अशोक वाजपेयी के शब्दों के साथ में ही अगर कहूं तो, उम्र के इस पड़ाव पर आखिर ये सब करने की जरूरत क्या है।  


Saturday, February 23, 2019

साहित्यिक आयोजन में राग फासीवाद


दिल्ली में एक संस्था है रजा फाउंडेशन। यह संस्था विश्व प्रसिद्ध चित्रकार सैयद हैदर रजा के नाम पर स्थापित है। रजा के मित्र अशोक वाजपेयी इस संस्था के सर्वेसर्वा हैं। हिंदी जगत में यह माना जाता है कि रजा के नाम पर स्थापित ये संस्था रजा साहब के अर्जित धन से चलता है। अशोक वाजपेयी अब तमाम आयोजन इसी संस्था के तहत करते हैं। साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर यह संस्था बहुत सक्रिय है, दिल्ली में नियमित आयोजन करती है, पुस्तकों का प्रकाशन करती है, फेलोशिप भी देती है. जरूरतमंद साहित्यकारों को आर्थिक मदद भी करती है। केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद जिस तरह से अशोक वाजपेयी और वामपंथी लेखकों ने हाथ मिला लिया है उसका प्रकटीकरण बहुधा रजा फाउंडेशन के आयोजनों में होता रहता है। अशोक वाजपेयी को ये श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होंने जनवादी और प्रगतिशील लेखकों को एक साथ कर दिया। दिल से भले ही ना मिले हों पर मंच पर तो एक साथ कर ही दिया है। जो काम वैचारिकी नहीं कर पाई उस काम को पूंजी ने पूरा किया। अगर कभी मौजूदा दौर का साहित्यिक इतिहास लिखा गया तो कलावादी-वामपंथी लेखकों का यह गठजोड़ दिलचस्प शोध की मांग करेगा। निष्कर्ष भी रोचक निकलेगा।   
अभी हाल ही में इस संस्था ने दिल्ली में रजा उत्सव का आयोजन किया था। मुख्यत: कविता पर केंद्रित ये आयोजन एशियाई कविता पर आयोजित था जिसे रजा बिनाले ऑफ एशियन पोएट्री 2019 का नाम दिया गया था।। इस आयोजन में भारत के अलावा अन्य एशियाई देशों के कवियों को आमंत्रित किया गया था। इस आयोजन में भी कई जनवादी और प्रगतिशील लेखक कवि आमंत्रित किए गए थे। आमंत्रित कवियों में एक जनवादी कवि असद जैदी भी थे। एक सत्र में असद जैदी ने कहा कि वर्तमान समय को सबसे खराब समय करार दिया क्योंकि ये मोदी का इंडिया है, क्योंकि इस दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सभी जगह पर कब्जा कर रखा है, फासिस्ट ताकतों ने हर जगह आधिपत्य जमा लिया है। सबसे खराब दौर में, जब हर ओर फासिस्ट ताकतों का आधिपत्य है, तब भी असद जैदी ये सारी बातें सार्वजनिक तौर पर कह पा रहे थे। ये विरोधाभास जैसा लगता है। दरअसल असद जैदी जैसे लोग मौजूदा दौर से इस वजह से परेशान हैं कि उनका सत्ता सुख कम हो गया है, और उत्तरोत्तर कम ही होता जा रहा है। वामपंथी लेखक लगातार राग फासीवाद गा कर मौजूदा हुकूमत को बदनाम करने की मुहिम में 2014 मई के बाद से ही लगे हैं। जब भी जहां भी उनको अवसर मिलता है वो ये राग फासदीवाद छेड़ने से बाज नहीं आते हैं। तभी तो कविता समारोह में भी असद जैदी ने फासीवाद, मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सवालों के घेरे में लाने का प्रयत्न किया, बेशक लचर दलीलों के साथ। वामपंथियों के लिए फासीवाद का मतलब है बीजेपी, आरएसएस और नरेन्द्र मोदी । उनके लिए स्कूलों में योग शिक्षा भी फासीवाद है, उनके लिए स्कूलों में वंदे मातरम का पाठ भी फासीवाद है, उनके लिए सरस्वती वंदना भी फासीवाद है, उनके लिए अकादमियों या सरकारी पदों से वामपंथी विचारधारा के लोगों को कार्यकाल खत्म होने के बाद हटाया जाना भी फासीवाद है, उनके लिए इतिहास अनुसंधान परिषद में बदलाव की कोशिश भी फासीवाद है । दरअसल उनके लिए वामपंथ की चौहद्दी से बाहर किसी भी तरह का कार्य फासीवाद है । इस तरह का शोरगुल इन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के वक्त भी मचाया था । वामपंथी जमात को यह समझना होगा कि नरेन्द्र मोदी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के मुखिया है और जनता ने उनको पांच सालों के लिए चुना है। अभी दो महीने में लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं एक बार फिर से जनता की राय सबके सामने होगी। अगर देश में हालात इने बुरे हैं तो जनता अपने विवेक से उसको ठीक कर देगी।
जैदी ने रजा उत्सव के इसी मंच से गुजरात दंगों पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने गुजरात दंगों को नरसंहार करार दिया। उन्होंने गुजरात दंगे के बाद वहां के साहित्यकारों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों की चुप्पी को रेखांकित किया। वो इस बात को लेकर व्यथित दिखे कि गुजरात दंगों के बाद वहां के संस्कृतिकर्मियों में एक खास किस्म की खामोशी व्याप्त हो गई थी। उन्होंने गुजरात नरसंहार के बाद सांस्कृतिक चुप्पी जैसा जुमला भी उछाला। इस जुमले को या वक्तव्य के पीछे की राजनीति को समझने की जरूरत है। एक तरफ असद जैदी गुजरात दंगों में गुजराती के लेखकों और संस्कृतिकर्मियों की खामोशी को रेखांकित कर रहे हैं वहीं अब से चंद दिन पहले प्रकाशित पहल पुस्तिका में अशोक वाजपेयी ने लिखा था- ‘2002 में गुजरात के भीषण नरसंहार के बाद महाश्वेता देवी और अपूर्वानंद के के साथ बड़ोदरा गया था। हमारी बैठक में एकाध कलाकार को छोड़कर कोई गुजराती लेखक, विद्वान या कलाकार नहीं आया। माहौल में इस कदर डर व्याप गया था।‘ अब इस पंक्ति और असद जैदी के वक्त्वय को मिलाकर देखें तो एक सोची समझी रणनीति नजर आती है कि किस तरह से इस बात को आगे बढ़ाया जाए कि गुजरात दंगों के बाद सिर्फ एक या दो लेखकों ने इसका विरोध करने की हिम्मत दिखाई थी, इसमें भी अशोक वाजपेयी प्रमुख थे। एशियाई कविता के दौरान इस बात को परोक्ष और कहीं कहीं प्रत्यक्ष रूप से स्थापित करने की ये दयनीय कोशिश दिखती है। दयनीय इस वजह से भी एक जमाने में क्रांति आदि की बात करनेवाले जनवादी कवि को अशोक वाजपेयी का भोपाल गैस कांड के बाद दिया गया संवेदनहीन बयान याद नहीं आता है। हजारों नागरिकों की मौत पर दिया गया वो बयान, मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता, असद जैदी को याद नहीं आता। उनको इमरजेंसी एक नॉस्टेल्जिया के तौर पर याद आता है, 1984 का सिख विरोधी दंगा तो याद ही नहीं आता। इमरजेंसी में वामपंथियों का रुख क्या था, इसकी कई बार चर्चा इस स्तंभ में हो चुकी है और उसको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है।
2002 के दंगों पर गुजरात के संस्कृतिकर्मियों की खामोशी पर गुजराती के वरिष्ठ साहित्यकार शीतांशु यशश्चंद्र की राय अलहदा है। उनका मानना है कि बहुलतावादी देश में विरोध और समर्थन की पद्धति भी अलग-अलग है। गुजरात का विरोध करने का तरीका उस तरह का नहीं हो सकता है जिस तरह से बंगाल का है। महाराष्ट्र में विरोध का तरीका अलग है और बिहार में अलग। तो ये दुराग्रह उचित नहीं है कि सभी के विरोध का तरीका वही हो जैसा असद जैदी जानते समझते हैं। यहां एक और प्रश्न उठता है कि आप किसके सामने कौन सी बात कर रहे हैं। असद जैदी जहां ये बातें कह रहे थे वहां एशिया के कई देशों के कवि आमंत्रित थे। वो भारत की कैसी छवि लेकर अपने देश में जाएंगे। आप आधारहीन बातें कर रहे हैं, आर पूरे देश को फासीवाद की जकड़न मे बता रहे हैं आप परोक्ष रूप ये कहना चाहते हैं कि यहां अपनी बात कहने में डर लगता है। जबकि स्थिति इसके ठीक उलट है। यहां हर कोई बेखौफ होकर अपनी बात कह रहा है। हर तरह की बात कह रहा है, प्रधानमंत्री से लेकर तमाम मंत्रियों की आलोचना हो रही है। इसी तरह से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के तत्ताकलीन अध्यक्ष की गिरफ्तारी के खिलाफ विदेशों से विद्वानों से एक सामूहिक अपील जारी करवा कर देश के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की गई थी। नोम चोमस्की, ओरहम पॉमुक समेत दुनिया भर के करीब एक सौ तीस बुद्धिजीवियों ने बयान जारी किया था । उनके बयान के शब्दों से साफ था कि उन्हें किस बात से दिक्कत थी । अमेरिका, कनाडा, यू के समेत कई देशों के प्रोफेसरों ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि भारत की मौजूदा सरकार असहिष्णुता और बहुलतावादी संस्कृति पर हमला कर रही थी । उन्होंने जेएनयू में कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी को शर्मनाक घटना करार दिया था । नोम चोमस्की की प्रतिबद्धता तो सबको मालूम ही है। उनके बयान में लिखा था कि जेएनयू परिसर में कुछ लोगों ने, जिनकी पहचान विश्वविद्यालय के छात्र के तौर पर नहीं हो सकी, कश्मीर में भारतीय सेना की ज्यादतियों के खिलाफ नारेबाजी की थी । नोम चोमस्की को शायद ये ब्रीफ नहीं दिया गया कि वहां भारत की बर्बादी के भी नारे लगाए गए थे। इस अपील को अपने कंधे पर लेकर भारत में शोर मचानेवाले कई चेहरे रजा उत्सव में दिखाई दे रहे थे। स्वार्थ की राजनीति के चक्कर में देश की छवि और साख से भी खेलने में इनको कोई परहेज नहीं है। जिस तरह से साहित्य और संस्कृति के कंधे पर चढ़कर राजनीतिक और व्यक्तिगत हित साधे जा रहे हैं उसकी पहचान आवश्यक है।