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Saturday, October 10, 2026

साहित्यिक वक्ताओं की तैयारी पर प्रश्न


बात कड़वी लग सकती है लेकिन सच्चाई यही है। हद तो यह हो गई कि एक वक्ता कुंवर नारायण की जगह निर्मल वर्मा पर बोलने लगे। टोकने पर उसको स्मृति दोष बताने लगे। यह बात भी उचित है कि कुछ वक्ताओं को ही हर विषय पर बोलने के लिए बार-बार क्यों बुला जाता है। असल में रजा न्यास दरबारियों को प्राथमिकता देता है। दो दिन तक में इस कार्यक्रम में बतैर श्रोता मौजूद रहा, और एकाध वक्ताओं को छोड़ दें तो किसी ने भी कुंवर नारायण को पढ़ा नहीं था। यह कहने के बाद हो सकता है कि रजा न्यास मुझे बतौर श्रोता भी आमंत्रित नहीं करे लेकिन जिस तरह से सरकारी संस्थाओं में इस तरह के आयोजन रस्मी होते हैं रजा न्यास के आयोजन भी उसी तरह के होते हैं, जिसमें चमचों को माइक दिया जाता है। यह कठोर टिप्पणी लिखी है दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक और हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक प्रभात रंजन ने। प्रभात रंजन बात कर रहे हैं हिंदी कवि कुंवर नारायण के जन्मशताब्दी के अवसर पर रजा न्यास के दो दिवसीय आयोजन की। रजा न्यास लेखक अशोक वाजपेयी की साहित्यिक दुकान है। ये संस्था नियमित रूप से कार्यक्रम आदि आयोजित करती है। इनके कार्यक्रमों में कुछ ऐसे लोगों को आमंत्रित किया जाता है जो अशोक वाजपेयी के हर कार्यक्रम में उपस्थित होते हैं। चाहे उनको पुरस्कार दिया जा रहा हो या फिर किसी लेखक कवि पर केंद्रित गोष्ठी आयोजित की जा रही हो। हिंदी के वर्तमान साहित्यिक परिदृष्य में बहुत ही कम ऐसे लेखक हैं जो किसी गोष्ठी में जाने के लिए मना करते हैं। अध्ययन हो या न हो। 

प्रभात रंजन की टिप्पणी हिंदी साहित्य की किसी राजनीति के अंतर्गत नहीं लिखी गई है बल्कि क्षोभ से उपजी हुई है। कुंवर नारायण समकालीन हिंदी साहित्य के ऐसे कवि या लेखक हैं जिनका रचना संसार विस्तृत है। उन्होंने श्रेष्ठ कवितें लिखी हैं। उनकी कविताओं में कई परतें हैं जिनको समझने के लिए भारतीय काव्य परंपरा का गहन अध्ययन होना चाहिए। काव्य परंपरा के साथ साथ भारतीय परंपराओं का ज्ञान भी होना चाहिए। कुंवर नारायाण ने अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के बहाने विश्व सिनेमा पर भी बहुत गंभीर टिप्पणियां की थीं जो उनके अध्ययन क्षेत्र का सूचक है। हिंदी साहित्य में कम ही ऐसे लेखक और कवि हुए हैं जिन्होंने अंतराष्ट्रीय सिनेमा पर अधिकारपूर्वक लिखा हो। ऐसे लेखक के जन्म शताब्दी समारोह में इस तरह के हल्के, अज्ञानी और लापरवाह वक्ताओं को बुलाकर दिवंगत लेखक का अपमान करना ही माना जाएगा। आप कल्पना करिए कि जन्म शताब्दी समारोह कुंवर जी की मनाई जा रही हो और मंच से कोई वक्ता निर्मल वर्मा पर बोलने लगे। यह तो लेखक और मंच दोनों का अपमान है। लापरवाही की हद तब होती है जब उनको याद दिलाया गया तो वो कहने लगे कि स्मृति दोष के कारण कुंवर जी की बजाए निर्मल जी पर बोलने लगे थे। यह बहुत ही गैर जिम्मेदारी वाला अप्रोच है। इस तरह की घटनाएं हिंदी साहित्य की गोष्ठियों में आम है। आप किसी विषय पर सुनने जाएंगे लेकिन इसकी गारंटी नहीं है कि वक्ता उसी विषय पर बोलें। वक्ता अपनी मर्जी से बोलते हैं और वक्तव्य के बीच में एक दो बार विषय का नाम ले लेते हैं ताकि ऐसा प्रतीत हो कि वो विषय पर बोल रहे हैं।  जन्म शताब्दी जैसे आयोजनों में तो ये खूब होता है। आप अपने पूर्वज लेखक की रचनाशीलता और उसके विभिन्न कोणों के बारे में जानने सुनने के लिए ऐसी गोष्ठियों में जाते हैं लेकिन वक्ता अपने और उनके संबंधों के बारे में बखान करने लग जाते हैं। उनको लगता है कि श्रोताओं को उनकी चतुराई समझ नहीं आती। श्रोता सब समझते हैं.  

यह अकारण नहीं है कि हिंदी साहित्य से जुड़ी गोष्ठियों में श्रोता नहीं या कम मिलते हैं। गोष्ठियों में श्रोताओं को कुछ नया मिलना लगभग बंद हो गया है। जो भी वक्ता आते हैं उनमें से अधिकतर बगैर किसी तैयारी के अपने ज्ञानदंभ के साथ आते हैं। जो मन आता है वो बोलकर चले जाते हैं। श्रोता बेचारा ठगा रह जाता है। अशोक वाजपेयी का ही उदाहरण लीजिए। वो अच्छे वक्ता माने जाते हैं। लच्छेदार हिंदी और अंग्रेजी बोलते हैं। उनके पास संस्मरणों का खजाना भी है। पर तय विषय पर उनको बोलते कम ही सुना गया है। आखिरी बार किसी गोष्ठी में तय विषय पर अशोक वाजपेयी कब बोले इसपर तो शोध हो सकता है। उनकी विशेषता है कि वो मंच पर आते हैं। आरंभ कुछ हल्की फुल्की बातों से करते हैं। फिर एकाध संस्मरण सुनाते हैं और तय विषय को छूते हुए निकल जाते हैं। बात रामचंद्र शुक्ल के कविता क्या है जैसे लेख पर होगी तो वो ये बताएंगे कि उनका रामचंद्र शुक्ल का अध्ययन कितना कम है। अरे भले आदमी अगर आपका अध्ययन कम है तो मत बोलिए। मंच और माइक का लोभ संवरण कर पाना बहुत कठिन कार्य है। नामवर सिंह भी अपने आरंभिक दिनों में बहुत तैयारी के साथ बोलते थे। उनके व्याख्यानों में तथ्य और तर्क दोनों होते थे। इसलिए लोग उनको सुनने के लिए घंटों प्रतीक्षा करते थे। बढ़ती अवस्था के साथ-साथ मंच और माइक के आकर्षण ने उनको भी वक्तव्य पूर्व की तैयारी से दूर कर दिया। वो भी अपने अनुभवों के आधार पर बोलने लगे थे। परिणाम होता था कि जब नामवर सिंह किसी पुस्तक लोकार्पण में जाते थे तो मंच पर ही पुस्तक को उलटते-पलटते थे। अपने भाषण में पुस्तक की दो-तीन पंक्तियां उद्धृत करते हुए लेखक पर तले जाते थे। यह अकारण नहीं था कि बाद के दिनों में नामवर सिंह मंच से हर किसी की प्रशंसा करने लगे थे। प्रशंसा कर देने से प्रश्न नहीं उठते हैं। 

इस तरह की गोष्ठियों और वक्ताओं से हिंदी साहित्य समृद्ध नहीं होता। ना ही लेखक की कृति पर चर्चा हो पाती है। तात्कालिक रूप से लेखकों को अच्छा लग सकता है कि नंच से उसकी प्रशंसा हुई पर कुछ समय बाद उसको कोई याद भी नहीं रखता क्योंकि कोई सार्थक बात तो हुई नहीं। दूसरी तरफ अशोक वाजपी जैसे वक्ताओं को जो बेहतर बोल सकते हैं वो भी संस्मरणात्मक घटनाओं से आगे नहीं बढ़ पाते हैं। संस्मरणों की हल्की फुल्की बातें सुनाकर श्रोतों का मनोरंजन तो हो सकता है लेकिन ज्ञानवर्धन नहीं। विषय के साथ न्याय के लिए आवश्यक है कि उसपर बोलने के लिए पर्याप्त तैयारी की जाए। कुछ ऐसा विश्लेषण या तथ्य प्रस्तुत किया जा सके जिससे श्रोता समृद्ध हो सकें, साहित्य की चौहद्दी बढ़े। किसी कृति पर बोलने के पहले यह भी आवश्यक है कि उसकी लेखन प्रकृत्ति की परंपरा को रेखांकित करते हुए इस बात का आकलन किया जाए कि अमुक कृति ने उस परंपरा को आगे बढ़ाया या उसमें कुछ जोड़ा या नहीं। पाठकों के सामने कृति के उस पक्ष को रखा जाना चाहिए जिसको लेखक स्पष्ट नहीं कर पाया हो। यही काम तो आललोचना का भी था और यही काम गोष्ठियों में अपने विचार प्रस्तुत करनेवालों का भी है। प्रभात रंजन की टिप्पणी में दरबारियों और चमचों की भी बात की गई है। कम से कम ये साहित्य का भला तो नहीं कर सकते। 


Sunday, February 7, 2016

कविता के बाद कहानी पर नजर

समकालीन साहित्यक परिदृश्य में इस बात को लेकर सभी पीढ़ी के लेखकों में मतैक्य है कि कविता भारी मात्रा में लिखी जा रही है । यह हिंदी साहित्य का सौभाग्य है कि कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह जैसे बुजुर्ग कवि अब भी रचनारत हैं वहीं बाबुषा कोहली जैसी एकदम युवा कवयित्री भी कविता कर्म में लगी है । किसी भी साहित्य के लिए ये बेहतर बात हो सकती है कि एक साथ करीब पांच पीढ़ियां कविकर्म में सक्रिय हैं । लेकिन जब हम कवियों की संख्या पर नजर डालते हैं तो एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त करीब पंद्रह बीस हजार कवि एक साथ कविताएं लिख रहे हैं । इंटरनेट और सोशल मीडिया के विस्तार ने हिंदी में कवियों की एक नई पौध के साथ साथ एक नई फौज भी खड़ी कर दी है । जब देश में नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ था तो दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में मैनेजमेंट पढ़ानेवाले संस्थानों की भरमार हो गई थी । उस वक्त ये जुमला चलता था कि दिल्ली के भीड़भाड़ वाले बाजार, करोलबाग, में अगर पत्थरबाजी हो जाए तो हर दूसरा जख्मी शख्स एमबीए होगा । कहने का मतलब ये था कि उस वक्त एमबीए छात्रों का उत्पादन भारी संख्या में हो रहा था क्योंकि हर छोटी बड़ी कंपनी में मैनजमेंट के छात्रों की मांग बढ़ रही थी । मांग और आपूर्ति के बाजार के नियम को देखते हुए मैनजमेंटके कॉलेज खुलने लगे थे और उत्पाद की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं गया था । नतीजा हम सबके सामने है । नब्बे के दशक के आखिरी वर्षों में पांच से छह हजार के मासिक वेतन पर एमबीए छात्र उपलब्ध थे । बाद में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए मैनजमेंट के ये संस्थान धीरे-धीरे बंद होने लगे । सोशल मीडिया और इंटरनेट के फैलाव ने कविता का भी इलस वक्त वही हाल कर दिया है । एमबीए छात्रों पर कहा जानेवाले जुमला कवियों पर लागू होने लगा है । साहित्यक गोष्ठियों मं कहा जाने लगा है कि वहां उपस्थित हर दूसरा शख्स कवि है । दरअसल सोशल मीडिया ने इसको अराजक विस्तार दिया। साठ के दशक में जब लघु पत्रिकाओं का दौर शुरू हुआ तो कवियों को और जगह मिली लेकिन उनको पत्रिकाओं के संपादकों की नजरों से पास होने के बाद स्तरीयता के आधार पर ही प्रकाशित होने का सुख मिला था । कालांतर में लघु पत्रिकाओं का विस्तार हुआ और हर छोटा-बड़ा लेखक पत्रिका निकालने लगा । यह इंटरनेट का दौर नहीं था । साहित्यक रुझान वाले व्यक्ति की ख्वाहिश साहित्यक पत्रिका का संपादक बनने की हुई । ज्यादातर तो बने भी । चूंकि इस तरह की पत्रिकाओं के सामने आवर्तिता को कायम रखने की चुनौती नहीं होती थी और वो अनियतकालीन होती थी लिहाजा एक अंक निकालकर भी संपादक बनने का अवसर प्राप्त हो जाता था । संपादक को अपनी कविताएं अन्यत्र छपवाने में सहूलियत होने लगी । सत्तर से लेकर अस्सी के अंत तक सहूलियतों का दौर रहा । इक्कीसवीं सदी में जब इंटरनेट का फैलाव शुरु हुआ और फेसबुक और ब्लॉग ने जोर पकड़ा तो कवियों की आकांक्षा को पंख लग गए । संपादक की परीक्षा से गुजरकर छपने का अवरोध खत्म हो गया । हर कोई स्वयं की मर्जी का मालिक हो गया । जो लिखा वही पेश कर दिया । इस सुविधा ने कवियों की संख्या में बेतरह इजाफा कर दिया । एक बड़ी लाइन और फिर एक छोटी लाइन की कविता लिखने के फॉर्मूले पर कविता धड़ाधड़ सामने आने लगी । वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने अपने एक साक्षात्कार में कहा भी था कि - हिंदी कविता को लेकर एक तरीके का भ्रम व्याप्त है और इस भ्रम को वामपंथी आलोचकों ने बढ़ावा दिया । वामपंथी आलोचकों ने इस बात पर जोर दिया कि कथ्य महत्वपूर्ण है और शिल्प पर बात करना रूपवाद है । नरेश सक्सेना ने कहा था कि कथ्य तो कच्चा माल होता है और शिल्प के बिना कविता हो नहीं सकती । इन दिनों कविता का शिल्प छोटी बड़ी पंक्तियां हो गई हैं । नरेश सक्सेना के मुताबिक इन दिनों खराब कविताओं की भरमार है । वो साफ तौर पर कहते हैं कि बगैर शिल्प के कोई कला हो ही नहीं सकती है । वो कहते हैं कि सौंदर्य का भी एक शिल्प होता है । नरेश सक्सेना के मुताबिक इंटरनेट और सोशल मीडिया में कोई संपादक नहीं होता, वहां तो उपयोग करनेवाले स्वयं प्रकाशक होते हैं । प्रकाशन की इस सहूलियत और लोगों के लाइक की वजह से लिखने वाला भ्रम का शिकार हो जाता है ।  कवियों की संख्या में इजाफे की एक और वजह हिंदी साहित्य में दिए जानेवाले पुरस्कार हैं । कविता पर जिस तरह से थोक के भाव से छोटे बड़े, हजारी से लेकर लखटकिया पुरस्कार दिए जा रहे हैं उसने भी कविकर्म को बढ़ावा दिया । खैर ये तो रही कविता की बात लेकिन अब साहित्य में एक नई प्रवृत्ति सामने आ रही है ।

हिंदी के ज्यादातर कवियों में अब कहानी लिखने की आकांक्षा और महात्वाकांक्षा जाग्रत हो गई है । कविता के बाद अब कहानी पर कवियों की भीड़ बढ़ने लगी है । दरअसल इसके पीछे प्रसिद्धि की चाहत तो है ही इसके अलावा उनके सामने खुद को साबित करने की चुनौती भी है । कविता की दुनिया से कहानी में आकर उदय प्रकाश, संजय कुंदन, नीलेश रघुवंशी, सुंदर ठाकुर आदि ने अपनी जगह बनाई और प्रतिष्ठा अर्जित की । उदय प्रकाश ने तो एक के बाद एक बेहतरीन कहानियां लिखकर साहित्य जगत में विशिष्ठ स्थान बनाया । उनकी लंबी कहानियां उपन्यास के रूप में प्रकाशित होकर पुरस्कृत भी हुई । इसी तरह से संजय कुंदन ने भी पहले कविता की दुनिया में अपना मुकाम हासिल किया और फिर कहानी और उपन्यास लेखन तक पहुंचे । लेकिन पद्य के साथ साथ गद्य को साधना बेहद मुश्किल और जोखिम भरा काम है । हाल के दिनों में जिस तरह से फेसबुक आदि पर सक्रिय कविगण कहानी की ओर मुड़े हैं उससे कहानी का हाल भी कविता जैसा होने की आशंका पैदा हो गई है । लघु पत्रिकाओं के धड़ाधड़ छपने और बंद होने के दौर में नामवर सिंह ने एक बार कहा था – हिंदी में अच्छी कहानियां नहीं लिखी जा रही हैं, यह चिंता का विषय नहीं है, बल्कि चिंता का विषय यह है कि उसमें अच्छी और बुरी कहानियों की पहचान लुप्त होती जा रही है । नामवर जी की वो चिंता वाजिब थी । बल्कि अब तो ये खतरा पैदा होने लगा है कि अच्छी कहानियां बुरी कहानियों दबा ना दें । आज लिखी जा रही कहानियों को देखें तो दो तीन तरह की फॉर्मूलाबद्ध कहानियां आपको साफ तौर पर दिखाई देती हैं । एक तो उस तरह की कहानी बहुतायत में लिखी जा रही है जो बिल्कुल सपाट होती है । इन कहानियों में रिपोर्ताज और किस्सागोई के बीच का फर्क धूमिल हो गया है । भोगे हुए या देखे हुए यथार्थ को नाम पर घटना प्रधान कहानी पाठकों के सामने परोसी जा रही है जिसके अंत में जाकर पाठकों को चौंकाने की तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है । इसके अलावा कुछ कहानियों में भाषा से चमत्कार पैदा करने की कोशिश की जाती हैं। ग्राम्य जीवन पर लिखनेवाले कहानीकार अब भी रेणु की भाषा के अनुकरण से आगे नहीं बढ़ पाए हैं । ग्राम्य जीवन चाहे कितना भी बदल गया हो हिंदी कहानी में गांव की बात आते ही भाषा रेणु के जमाने की हो जाती है । इस दोष के शिकार बहुधा वरिष्ठ कथाकार भी हो जा रहे हैं । सुरेन्द्र चौधरी ने एक जगह लिखा भी था कि – रचनाधर्मी कथाकार जीवन के गतिमान सत्य से अपने को जोड़ता हुआ नए सत्यों का निर्माण भी करता है । नए सत्यों के निर्माण पर कुछ लोग मुस्कुरा सकते हैं । उनके अनुसार सत्य का निर्माण तो वैज्ञानिकों का क्षेत्र है साहित्यकार का नहीं ।  सत्य के निर्माण से हमारा तात्पर्य भाव-संबंधों के निर्माण से है, वस्तु निर्माण से नहीं । रचनाधर्मी कथाकार समाज द्वारा गढ़े गए नए सत्यों से भावात्मक संबंध स्थापित करता हुआ उन्हें नए परिप्रेक्ष्य के योग्य बना देता है । सामयिकता का शाब्दिक रूप से पीछा करनेवाले लोग रचनाधर्मी नहीं होते ।‘ सुरेन्द्र चौधरी ने ये बातें काफी पहले कही थीं लेकिन आज भी वो मौजूं है । ग्राम्य जीवन से इतर भी देखें तो आज की कहानी में आधुनिकता के नाम पर वर्तमान का पीछा करते हुए कहानीकार लोकप्रिय बनने की चाहत में दिशाहीन होता चला जा रहा है । मानविीय संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने के चक्कर में ऊलजूलल लिखकर पाठकों और आलोचकों का ध्यान खींचने की जुगत शुरू हो गई है ।  जिसकी वजह से आज हिंदी कहानी के सामने पठनीयता का संकट खड़ा होने की आशंका बलवती हो गई है । दरअसल साहित्य में इस तरह के दौर आते जाते रहते हैं लेकिन इस बार ये दौर सोशल मीडिया के अराजक प्लेटफॉर्म की वजह से गंभीर खरते के तौर पर सामने है । यह देखना दिलचचस्प होगा कि अच्छी कहानी खुद को किस तरह से बचा पाती है ।   

Tuesday, November 25, 2008

अंग्रेजी अखबारों का उपेक्षा भाव

भारतीय भाषाओं के लिए दिया जानेवाला पुरस्कार ज्ञानपीठ इस बार हिंदी के वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण को देने का ऐलान किया गया है । ये पुरस्कार कुंवर जी को वर्ष दो हजार पांच के लिए दिया गया है । कुंवर जी को ये पुरस्कार देकर ज्ञानपीठ का ही सम्मान बढ़ा है । लेकिन में ये इस पुरस्कार की सूचना देने के लिए नहीं लिख रहा हूं बल्कि बेहद क्षुब्ध होकर आप सबों के सामने एक बात रख रहा हूं । कुंवर जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार का ऐलान हआ लेकिन अंग्रेजी के अखबारों की उदासीनता तकलीफनाक रही । किसी भी अंग्रेजी दैनिक ने इस खबर को छापने लायक भी नहीं समझा । जहां छपा भी वो इतना छोटा छपा कि किसी भी पाठक का ध्यान आकर्षित नहीं कर सका । ये बात मेरे लिए हैरान करनेवाली नहीं थी क्योंकि अंग्रेजी मीडिया का हिंदी साहित्या को लेकर एक उपेक्षा का भाव रहा है जो नियमित तौर पर समाने आता रहा है । अंग्रेजी अखबारों में काम करनेवाले पत्रकार हिंदी के लेखकों को हीम समझते हैं और जब भी मौका मिलता है उसे प्रदर्शित भी करते हैं । कुंवर जी का उदाहरण आपके सामने है, जबकि कुंवर जी की कविताएं जिन्होंने पढ़ी हैं उनको ये मानने में कोई गुरेज नहीं होगा कि वो समकालीन हिंदी कविता के सबसे अहम कवि हैं । सवाल ये उठता है कि अंग्रेजी दैनिकों की हिंदी लेखकों को लेकर इस उदासीनता का कारण क्या उनकी ये उदासीनता है या फिर वो औपनिवेशिक मान्यता कि हिंदी वाले बेहतर काम कर ही नहीं सकते और अंग्रेजी तो हमेशा से श्रेष्ठ रही है । मैं आप सबों के सामने ये सवाल छोड़ता हूं कि कि इस उपेक्षा की वजह पर अपनी राय दें ताकि इस बहस को आगे बढाया जा सके