हिंदी में अनुवाद की हालत बेहद खराब है । जो अनुवाद हो भी रहे हैं वो बहुधा स्तरीय नहीं होते हैं । अनुवाद इस तरह से किए जाते हैं कि मूल लेखन की आत्मा कराह उठती है । हिंदी के लेखकों में अनुवाद को लेकर बहुत उत्साह भी नहीं है । अमूनन अनुवाद में लेखक तभी जुटते हैं जब उनके पास या तो काम कम होता है या नहीं होता है । जैसे ही काम मिलता है अनुवाद को लेकर वो उदासीन हो जाते हैं । इसलिए हिंदी में अनुवाद एक विधा के रूप में विकसित नहीं पाई और अनुवादक को उचित सम्मान नहीं मिल पाया । नतीजा यह हुआ कि अन्य भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनुवाद नहीं हो पाया और हिंदी के पाठक का परिचय विश्व की अन्यतम कृति से नहीं हो पाया ।
लेकिन अभी हाल के दिनों में हॉर्पर कालिन्स पब्लिकेशंस और पेंग्विन बुक्स ने भारतीय अंग्रेजी लेखकों के अलावा विश्व के अन्य भाषाओं की कृतियों का अनुवाद हिंदी में प्रकाशित करना शुरू किया है । यह एक स्वागत योग्य कदम है । हॉर्पर कालिन्स से अभी अद्वैत काला के उपन्यास ऑलमोस्ट सिंगल का अनुवाद मनीषा तनेजा ने किया है । लगभग तीन सौ पन्नों का उपन्यास बेहतरीन अनुवाद का एक नमूना है । मनीषा तनेजा दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पेनिश पढ़ाती हैं और इसके पहले भी गैबरील गारसिया मारक्वैज का उपन्यास एकाकीपन के सौ साल और पॉउलो नेरुदा के संस्मरण का हिंदी में अनुवाद किया है । अभी-अभी मैंने उनके द्वारा अनूदित अद्वैत काला के उपन्यास का हिंदी अनुवाद लगभग सिंगल पढ़ा । मैंने अद्वैत काला का अंग्रेजी में लिखा मूल उपन्यास भी पढ़ा था । मनीषा के अनुवाद में मूल की आत्मा की रक्षा की गई है जिससे उपन्यास के प्रवाह में बाधा नहीं आती । हिंदी अनुवाद में अंग्रेजी भाषा के शब्दों को लेकर कोई दुराग्रह दिखाई नहीं देता, बल्कि पात्रों के बीच बोलचाल में सहजता से जो अंग्रेजी के शब्द आते हैं उसे हिंदी अनुवाद में बदला नहीं गया है जिस वजह से अनुवाद बेहतर हो पाया है । दारू पीते हुए उपन्यास की बिंदास नायिका और उसकी दोस्त अंग्रेजी के शब्दों का प्रयास करती हैं और अनुवाद में उससे छेड़छाड़ नहीं की गई है ।
कुछ दिनों पहले मैंने वाणी प्रकाशन से प्रकाशित दो हजार चार के नोबेल पुरस्कार विजेता लेखिका फ्रेडरिक येलनिक के उपन्यास क्लावीयरश्पीलेरिन का हिंदी अनुवाद पियानो टीचर पढ़ा । उक्त उपन्यास का हिंदी अनुवाद विदेशी भाषा साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका सार संसार के मुख्य संपादक और जर्मन भाषा के जानकार अमृत मेहता ने किया था । पहली नजर में हिंदी अनुवाद ठीक-ठाक लगा था । मैंने अपने इस स्तंभ में ही उस उपन्यास पर लिखा भी था । लेकिन बाद में जमशेदपुर से लेखिका विजय शर्मा ने मेरा ध्यान कुछ त्रुटियों की ओर दिलाया तो फिर मैंने उसका अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा । उसको पढ़ने के बाद मुझे पता चला कि अमृत मेहता का अनुवाद बिल्कुल ही स्तरीय नहीं था । ट्रांसलिटरेशन के चक्कर में अमृत मेहता ने कुछ बेहद अश्लील शब्दों का इस्तेमाल किया जो गैरजरूरी था । साथ ही उपन्यास में वर्णित कुछ दृश्यों को भी उन्होंने बदल डाला । अमृत मेहता ने लिखा कि नायिका बाथ टब में अपने हाथ के नस काट लेती है जबकि मूल उपन्यास में येलनिक लिखा है कि नायिका बाथ टब में अपने यौनांग काट लेती है । अनुवाद में शब्दों के चयन की स्वतंत्रता तो अनुवादक ले सकता है लेकिन प्रसंग और घटनाओं को बदलने की छूट वो नहीं ले सकता है । इस तरह के लापरवाह अनुवाद का नतीजा यह होता है कि भविष्य के शोधार्थियों को गलत संदर्भ मिलते हैं और अर्थ का अनर्थ हो जाता है । इस मामले में मनीषा तनेजा ने सावधानी बरती है और उनके द्वारा अनूदिक उपन्यास लगभग सिंगल बेहतर बेहद पठनीय बन पडा है ।
दूसरा अहम उपन्यास हॉर्पर कालिन्स ने प्रकाशित किया वह है - बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखक अरविंद अडिगा का द वाइट टाइगर । प्रकाशक का दावा कि इस उपन्यास की सिर्फ भारत में दो लाख प्रतियां बिक चुकी हैं । किताब के बैक पर कवर पर इस सूचना के प्रकाशन से हिंदी प्रकाशन जगत सकते में पड़ सकता है । हिंदी में उपन्यासों का संसकरण पांच सौ या फिर अब तो तीन सौ का ही होता है । और मेरे जानते हाल के दिनों में हिंदी का कोई उपन्यास दस हजार भी नहीं बिका है । दो लाख प्रतियां बिकने की बात तो हिंदी में सोची भी नहीं जा सकती है । जबकि भारत में हिंदी के पाठकों की संख्या अंग्रेजी पाठकों से कई गुणा ज्यादा है । ये एक बेहद अहम सवाल है, जिसपर हिंदी समाज को विचार करने की जरूरत है ।
अब बात अरविंद अडीगा के उपन्यास द वाइट टाइगर की बात । अरविंद के इस उपन्यास का अनुवाद मनोहर नोतानी ने किया है । मनोहर पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन एक लंबे अरसे से अनवाद का काम कर रहे हैं, लेकिन किसी उपन्यास का अनुवाद करने का यह उनका पहला अनुभव है । वाइट टाइगर में मध्य भारत के गांव में जन्मे रिक्शा चालक के बेटे बलराम की कहानी है । लेकिन जब उसे स्कूल से निकाल दिया जाता है तो वो चाय की दुकान पर सफाई और बरतन धोने का काम करता अपने भविष्य के सपने बुनता है । उसकी तकदीर तब बदलती है जब उसके गांव का एक अमीर जमींदार उसे अपना ड्राइवर बनाकर दिल्ली ले आता है । महानगर की चकाचौंध में बलराम की एक नए तरीके से शिक्षा होती है । इस उपन्यास का अनुवाद थोड़ा शास्त्रीय किस्म का है जो पाठ को बाधित करता है । इस उपन्यास के अनुवाद के क्रम में मनोहर नोतानी ने हिंदी के खांटी शब्दों के इस्तेमाल के साथ-साथ स्थानीय शब्द का भी इस्तेमाल किया है । एक बानगी- उस रात, एक बार फिर आंगन झाड़ने का बहाना करते हुए हम चमरघेंच और उसके बेटों के नजीक जा फटके, वे लोग एक बेंच पर बिराजे बतियाते रहे, हाथ में गिलास और गिलास में चमचम दारू । इस दो वाक्य में तीन शब्दे ऐसे हैं जो बिल्कुल स्थानीय भाषा के हैं - चमरघेंच, नजीक और चमचम दारू । इस तरह के कई शब्दो का इस्तेमाल अनुवादक ने किया है जिससे उनके मेहनत का पता चलता है ।
एक तीसरी किताब जो हाल में प्रकाशित हुई है वो है शिक्षाविद् और सांसद रह चुकी भारती राय की आत्मकथा- ये दिन, वे दिन । ल रूप से बांग्ला में लिखी गई इस आत्मकथा का हिंदी अनुवाद सुशील गुप्ता ने किया । सुशील गुप्ता का नाम हिंदी के पाठकों के लिए जाना पहचाना है । उन्होंने बांग्ला की कई चर्चित लेखकिओं और लेखकों की कृतियों का अनुवाद हिंदी में किया है । भारती राय ने अपनी इस आत्मकथा में पांच पीढियों की कहानी लिखी है । ये कहानी शुरू होती है उनकी परनानी शैलबाला उर्फ सुंदर मां के साथ । कथा के दूसरे पड़ाव पर हैं लेखिका की नानी मां । तीसरे पड़ाव पर लेखिका की मां से पाठकों की मुलाकात होती है और चौथे पड़ाव पर हैं और पांचवें भाग में कई अहम सवाल हैं । इस किताब की प्रस्तावना वरिष्ठ लेखिका और पत्रकार मृणाल पांडे ने लिखी है । इस किताब से एक लंबे काल खंड का इतिहास सामने आता है । का ने पारिवारिक स्थितियों के बहाने बंगाल और देश की राजनीतिक और साहित्यिक परिदृश्य का सुरुचिपूर्ण चित्र खींचा है । हिंदी में आत्मकथा के बहाने जो एक आत्म प्रचार का दौर चल पड़ा है यह किताब उससे पूरी तरह से अलग है । इस वजह से ही मुझे उम्मीद है कि यह किताब हिंदी के पाठकों को पसंद आएगी । अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुदित होकर आ रही ये कृतियां एक उम्मीद जगाती हैं ।