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Sunday, February 2, 2014

यौनिकता पर हो राष्ट्रीय बहस

अपनी आत्मकथा बियांड द लाइंस में कुलदीप नैयर ने लाल बहादुर शास्त्री से जुड़े कई बेहद दिलचस्प प्रसंग लिखे हैं । उनमें से एक सोवियत रूस के दौरे के दौरान बैले नृत्य देखने का है । शास्त्री जी के सोवियत रूस के दौरे के दौरान उनके सम्मान में वहां की सरकार ने लेनिनग्राद में बैले नृत्य का आयोजन किया गया था । कुलदीप नैयर, लालबहादुर शास्त्री और उनकी पत्नी ललिता शास्त्री नृत्य देखने पहुंचे । पूरे समारोह के दौरान शास्त्री जी बेहद असहज दिखे । नृत्य के बीच में शास्त्री जी से जब कुलदीप नैयर ने इसकी वजह जाननी चाही तो शास्त्री जी ने संकोच के साथ बताया कि वो इस वजह से असहज हैं कि नर्तकियों के पांव बहुत उपर तक बगैर कपड़ों के और खुले हुए हैं । शास्त्री जी की दलील थी कि चूंकि उनकी पत्नी भी साथ बैठ कर इस तरह का नृत्य देख रही हैं लिहाजा वो सहज नहीं महसूस कर रहे हैं । इलसके अलावा एक और प्रसंग से सामाजिक स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है । पंडित जवाहर लाल नेहरू जब प्रधानमंत्री थे तो उस वक्त ही नोबोकोब का मशहूर उपन्यास लोलिता का प्रकाशन हुआ था । तब लालबहादुर शास्त्री ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर लोलिता को भारत में प्रतिबंधित करने की वकालत की थी । शास्त्री के पत्र के जवाब में नेहरू जी ने एक लंबा पत्र लिखा और लोलिता को देश में प्रतिबंधित करने से मना कर दिया । नेहरू तो अपने खत में एक और कदम आगे चले गए और सलाह दी कि डी एच लॉरेंस का उपन्यास- लेडी चैटर्लीज लवर- भी पाठकों के लिए उपलब्ध होना चाहिए । तो ये दो तरह की धारा साफ तौर पर देखी जा सकती है । कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा में शास्त्री जी को रूढिवादी करार दिया है । अब इस पूरे प्रसंग से ये समझा जा सकता है कि हमारे देश की राजनीति के शीर्ष पर बैठनों वालों में से कई लोग स्त्री देह के खुलेपन और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर कितना संकोच करते थे । नेहरू जी हमेशा से अपने समय से आगे थे । उनकी सोच पश्चिमी देशों से प्रभावित थी इसलिए वो आधुनिक माने गए । भारतीय समाज नेहरू जी के वक्त भी और उनके बाद भी पारंपरिक समाज ही रहा है । अब भी स्त्री देह के सार्वजनिक प्रदर्शन और साहित्य में यौनिकता का खुला वर्णन आलोच्य है । हिंदी साहित्य में तो यौनिकता को लेकर बहस ही छिड़ी हुई है । कामनसूत्र के रचियता वात्सयायन के देश में लोग यौनिकता पर बात करने में परहेज करने लगे हैं । कालिदास की कृतियों में जिस तरह की सेंसुअलिटी है वो विश्व की किसी भी भाषा की श्रेष्ठ कृतियों को टक्कर दे सकती है । खैर यह एक अवांतर प्रसंग और यह विषय विस्तार से विमर्श की मांग करता है । इस पर फिर कभी चर्चा होगी ।
बैले नृत्य में शास्त्री जी की असहजता उस भारतीय मानसिकता को प्रतिबिंबित करता है जो स्त्री देह के सार्वजनिक प्रदर्शन को अश्लीलता मानता रहा है । हमारे देश में लंबे समय से चली आ रही यही मानसिकता हमारी फिल्मों में भी प्रदर्शित होती रही है । वक्त बदलने के साथ साथ फिल्मों में खुलापन आने लगा । लेकिन सेंसर बोर्ड ने कुछ वर्जनाओं को कायम रखा । भारत में प्रदर्शित होनेवाली फिल्मों में चुंबन दृष्यों को तो आधुनिकता के नाम पर मंजूरी मिलनी शुरू हो गई लेकिन कामक्रीडा को दर्शाने की इजाजत अभी भी नहीं है । महिलाओं के शरीर के उपरी अंगों के खुले प्रदर्शन पर भी अबतक रोक रही है । कम कपड़ों में या फिर पारदर्शी कपड़ों में कहानी की मांग के नाम पर कुछ निर्देशक छूट लेते रहे हैं । राजकपूर ने अपनी फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम और राम तेरी गंगा मैली में बड़े गले के या फिर पारदर्शी कपड़ों में नायिकाओं को दिखाने की छूट सेंसर बोर्ड से हासिल कर ली थी । उस वक्त भी इसको लेकर काफी बहसें हुई थी । माना गया था कि निर्देशकों ने इस तरह के दृश्य को दिखाकर दर्शकों में उद्दीपन पैदा करने की कोशिश की है । इसी तरह जब उन्नीस सौ तेहत्तर में बी के आदर्श ने गुप्त ज्ञान नाम की फिल्म बनाई थी तो सेंसर बोर्ड के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया था । उस फिल्म में कई दृश्य ऐसे थे जिनको लेकर निर्माताओॆ की दलील थी कि वो यौनिकता को लेकर जनता को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से फिल्म में डाली गई हैं । लेकिन बोर्ड के कई सदस्यों को लग रहा था कि ये जनता की यौन भावनाओं को भड़का कर पैसा कमाने की एक चाल है । लंबी बहस के बाद गुप्त ज्ञान को बगैर किसी काट छांट के प्रदर्शन की इजाजत मिल गई । सिनेमाघरों में प्रदर्शन के बाद उस फिल्म के अंतरंग दृष्यों को लेकर बवाल बढ़ा तो चंद महीनों के भीतर उसको वापस लेना पड़ा था । सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने एक बार फिर से फिल्म गुप्त ज्ञान को देखा और उसपर जमकर कैंची चलाने के बाद ही प्रदर्शन की इजाजत मिली । इस पूरी प्रक्रिया में लगभग ढाई से तीन साल लग गए । उन्नीस सौ चौहत्तर में अपने प्रदर्शन के चंद महीनों में वापस ली गई ये फिल्म उन्नीस सौ सतहत्तर में सिनेमाघरों में पहुंच पाई। भारतीय सिनेमा में चाहे कितना भी खुलापन आ जाए नग्नता को अभी तक मंजूरी नहीं मिल पाई है चाहे वो आंशिक ही क्यों ना हो । उन्नीस सौ चौरानवे में फूलन देवी की जिंदगी पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन में भी स्त्री देह की नग्नता को लॉंग शॉट में ही दिखाने की इजाजत दी गई थी । स्त्री देह की आंशिक नग्नता को प्रतीकात्मक रूप में अबतक इजाजत मिलती रही है । कहीं उसे धुंधला कर तो कहीं उसे लांग शॉट में दिखाकर ।

इतने सालों बाद अब लगता है कि भारतीय फिल्म सेंसर बोर्ड में खुलेपन की बयार बहने लगी है । दो हजार तेरह में बनी विदेशी फिल्म - 12 इयर्स अ स्लेव - को भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शन की इजाजत मिली तो स्त्री देह की नग्नता को दिखाने की मंजूरी के साथ । ऐतिहासिकता को केंद्र में रखकर बनाई गई स्टीव मैक्वीन की इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने वयस्क फिल्म का प्रमाण पत्र दिया है । हमारे यहां वयस्क फिल्मों में भी स्त्री के शरीर के उपरी हिस्से को पूर्ण रूप से नग्न दिखाने पर एक रोक है । इस फिल्म में इस तरह के दृश्यों की इजाजत के पीछे तर्क वही है कि गुलामों पर बर्बर अत्याचार के दौरान उनको सार्वजनिक तौर पर नंगा करके जलील किया जाता था । निर्देशक का तर्क है कि इस तरह के दृश्य फिल्म की मांग है । कहानी की आवश्कता है । सेंसर बोर्ड पूर्व में इस तरह के तर्कों को खारिज करता रहा है । विदेशी फिल्मों पर भी उसकी कैंची चलती रही है । फिल्म फायर के दृश्यों से लेकर डर्टी पिक्चर तक पर अच्छा खासा विवाद हुआ लेकिन सेंसर बोर्ड ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया था । लेकिन 12 इयर्स अ स्लेव में गुलामों के अत्याचार के नाम पर इस तरह के दृश्यों की इजाजत देना हैरान करनेवाला है । यहां सवाल यह उठता है कि क्या हमारा समाज इस तरह के दृश्यों को देखने और उसको सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए परिपक्व हो चुका है । हमारी सामाजिक संरचना और समाज को प्रतिबिंबित करनेवाले मानदंड तो यह बताते हैं कि हमारा समाज इतने खुलेपन के लिए अभी तैयार नहीं है । समाज में शिक्षा की स्थिति, महिलाओं को लेकर सामाजिक वर्जनाएं और फिर यौनिकता को समझ नहीं पाने से पैदा हुई कुंठा इस बात की ओर इशारा करती है कि भारत का समाज अभी फिल्मों में स्त्री देह के आंशिक रूप से नग्न प्रदर्शन के लिए तैयार नहीं है । कई समाज विज्ञानियों की तो दलील है कि फिल्मों में इस तरह के दृश्यों और अशिक्षा के मेल से जो मानसिकता बनती है वो स्त्रियों के खिलाफ अपराध को बढ़ावा देती है । कई ऐसे मामले सामने भी आए हैं जब स्त्रियों के खिलाफ होनेवाले अपराध के पीछे इस तरह की वजहें सामने आई हैं । सेंसर बोर्ड को इस तरह के खुलेपन और नग्नता के सार्वजनिक प्रदर्शन के पहले समाजिक संरचना को भी ध्यान में रखना चाहिए । फिल्मों में इजाजत के बाद अब तो टेलीविजन पर भी देर रात एक खास वक्त और टाइम बैंड पर वयस्क फिल्मों और वयस्क कार्यक्रमों को दिखाने के लिए मुहिम शुरू हो गई है । हमारा मानना है कि इस तरह के फैसले के पहले एक राष्ट्रव्यापी बहस की जानी चाहिए ताकि पूरे देश की सहमति हासिल हो सके । चंद लोगों की कमेटी को कमरों में बैठकर इस तरह सार्वजनिक रूप से नग्नता के प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी जा सकती है । 

Monday, January 14, 2013

आत्मकथा से दरकती छवि

अभिज्ञानशाकुन्तल का एक श्लोक है – यद्यत्साधु न चित्रे स्यात् क्रियते तत्तदन्यथा । तथापि तस्या लावण्यं रेखया किंचिदन्वितम् ।।  यह बात उस प्रसंग में कही गई है जब राजा दुश्यंत ने शकुन्तला की एक पेंटिंग बनाई थी । उस पेंटिंग को देखने के बाद दुश्यंत ने कहा था कि अगर चित्र में जो जैसा है वैसा नहीं बन पाता है तो उसे अलग तरीके का बना दिया जाता है । भारत के प्रख्यात पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता कुलदीप नैयर की आत्मकथा बियांड द लाइंस पढते हुए मुझे अभिज्ञानशाकुन्तल का ये श्लोक याद आ रहा था । अपनी इस पूरी आत्मकथा में कुलदीप नैयर ने ‘तत्तदन्यथा’ का भरपूर इस्तेमाल किया है । यानि अगर किताब के हिसाब से तथ्य अगर ना बन पाएं तो उसे अन्यथा कर दो, अपने हिसाब से उसकी व्याख्या कर दो । कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा बियांड द लाइंस में इस तरकीब का जमकर इस्तेमाल किया है । कहीं वो तथ्यों को बेहतर तरीके से पेश कर बेहतरीन तस्वीर बना देते हैं तो कहीं जो तस्वीर बनती है उससे कुछ और ही निकल कर सामने आ जाता है । जैसे अपनी आत्मकथा में विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री बनने के दौरान और बाद की परिस्थितियों की जो वो तस्वीर पेश करते हैं वो इसी ‘तत्तदन्यथा’ का नमूना है जिसपर आगे विस्तार से चर्चा है ।
कुलदीप नैयर भारत के सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारों में से एक हैं । इसके पहले भी उनकी कई किताबें प्रकाशित होकर खासी चर्चित हो चुकी हैं । दो हजार छह में जब उनकी किताब स्कूप छपकर आई थी तो उससे  यह अंदाजा हो गया था कि कुलदीप नैयर अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं और वो जल्द ही प्रकाशित होनेवाली है । कुलदीप नैयर की आत्मकथा के छपकर आने के बाद से उनकी सरकारी पत्रकार की छवि और मजबूत हो गई है । नैयर ने अपने करियर की शुरुआत एक उर्दू दैनिक से की लेकिन उनका करियर सरकार की पब्लिसिटी के लिए बनाए गए प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो की नौकरी करने के बाद से ही परवान चढ़ा । पहले वो  उस वक्त के गृह मंत्री गोविन्द वल्लभ पंत के सूचना अधिकारी के रूप में नियुक्त हुए फिर उनको लाल बहादुर शास्त्री के साथ काम करने का मौका मिला । इस दौरान कुलदीप नैयर ने अखबारों के लिए लिखना जारी रखा था । उन्होंने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया है कि स्वतंत्र न्यूज एजेंसी यूएनआई ज्वाइन करने के बाद भी वो अनौपचारिक रूप से लाल बहादुर शास्त्री को उनकी छवि मजबूत करने के बारे में सलाह देते रहते थे । अपनी आत्मकथा के अध्याय- लाल बहादुर शास्त्री एज अ प्राइम मिनिस्टर में पृष्ठ 141 पर उन्होंने स्वंय माना है कि उनकी स्टोरी से मोरार जी देसाई को काफी नुकसान हुआ । जवाहर लाल नेहरू की मौत के बाद जब पूरा देश शोक में डूबा था उसी वक्त कुलदीप नैयर ने यूएनआई की टिकर में एक खबर लगाई – पूर्व वित्त मंत्री मिस्टर मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उतरनेवाले पहले शख्स हैं । ऐसा माना जा रहा है कि उन्होंने अपने करीबियों को इस बारे में बता दिया है । ये भी माना जा रहा है कि देसाई चुनाव के पक्ष में अड़े हुए हैं और वो किसी भी कीमत में रेस से बाहर नहीं होंगे । इसी खबर में दूसरी लाइन लिखते हैं- बगैर पोर्टफोलियो के मंत्री लाल बहादुर शास्त्री भी प्रधानमंत्री पद के दूसरे उम्मीदवार माने जा रहे हैं, हलांकि वो अनिच्छुक बताए जा रहे हैं । शास्त्री के करीबियों के मुताबिक वो चुनाव टाल कर आमसहमति के पक्ष में हैं ।  कुलदीप नैयर ने खुद माना है कि उनकी इस खबर से मोरारजी देसाई को काफी नुकसान हुआ और वो उस वक्त प्रधानमंत्री नहीं बन पाए । बाद में लाल बहादुर शास्त्री और कामराज ने उन्हें इलके लिए धन्यवाद भी दिया । हलांकि वो यह सफाई देते हैं कि उनकी मंशा मोरारजी को नुकसान पहुंचाने की नहीं थी लेकिन अगर हम समग्रता में पढ़े और शास्त्री की छवि मजबूत करने में सहायता वाली बात को जोड़कर देखें तो यह साफ तौर पर उभरता है कि एक पत्रकार के तौर पर नैयर ने वही किया जिसके वो इन दिनों खिलाफ हैं । इस वजह से वरिष्ठ पत्रकार और प्रधानमंत्री के सूचना सलाहकार रह चुके हरीश खरे ने भी लिखा है कि कुलदीम नैयर भारत में एंबेडेड जर्निज्म करनेवाले पहले पत्रकार हैं। हरीश की इन बातों को कुलदीप की किताब में लिखे गए तथ्यों से काफी बल मिलता है । कुलदीप नैयर लंबे समय तक सत्ता के साथ रहे और अपनी लेखनी से उनको लाभान्वित भी करते रहे ।
इमरजेंसी के बाद के दौर में तो कुलदीप नैयर ने पत्रकारिता करते हुए पूरी तरह से राजनीति शुरू कर दी थी और विपक्ष के साथ हो लिए थे । नैयर ना केवल अपनी लेखनी से बल्कि विपक्षी दलों के नेताओं के साथ घुलमिलकर इंदिरा को पद से हटाने का उपक्रम कर रहे थे । क्या ये पत्रकारिता के उन सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है जो पत्रकारों से तटस्थ रहने की अपेक्षा करता है । यह भी सही है कि अगर लोकतंत्र की हत्या का खेल खेला जा रहा हो तो पत्रकारों को उसके खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए, यह उनका दायित्व भी है, लेकिन किसको क्या पद मिले इससे पत्रकारों को क्या लेना देना है, वो इन पचड़ों में क्यों पड़े । वीपी सिंह के प्रधानमंत्री पद के चुनाव के वक्त भी कुलदीप नैयर ने बेहद सक्रिय भूमिका निभाई । उनका दावा है कि चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए जो फॉर्मूला बना था वो उनका ही तैयार किया हुआ था (पृ 315) । उनके फॉर्मूले पर चलकर ही पहले देवीलाल को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना गया और बाद में देवीलाल ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया । कुलदीप नैयर का दावा है कि उनके इस फॉर्मूले की जानकारी पंजाब केसरी के संपादक अश्विनी कुमार को भी थी । सवाल यही उठता है कि एक पत्रकार के तौर पर कुलदीप नैयर क्या लॉबिंग नहीं कर रहे थे । बाद में वी पी सिंह ने उन्हें ब्रिटेन का उच्चायुक्त नियुक्त किया था । हलांकि उस वक्त नैयर के मन में यह सवाल उठा था कि एक पत्रकार के तौर पर सरकार का हिस्सा बनना कितना उचित है लेकिन वो सवाल कहीं बिला गया और कुलदीप नैयर ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के तमाम असहयोग के बावजूद उच्चायुक्त का पद संभाल लिया था।     
इमरजेंसी के पहले के दौर में उनका इंदिरा गांधी से मोहभंग अवश्य हो गया था । इमरजेंसी के दौर में वो जेल भी गए । लेकिन इमरजेंसी में जेल जाने की घटना का जिस उल्लास और उत्साह से उन्होंने वर्णन किया है वो भी हैरान करनेवाला है । नैयर लिखते हैं कि जब पुलिसवाले उनको गिरफ्तार करके निकल रहे होते हैं तो वायरलेस पर मैसेज देते हैं- शेर पिंजरे में आ गया है । उसके बाद जिस तरह से पुलिस का आला अधिकारी उनके पास आता है और उनके लेखन की तारीफों के पुल बांध देता है ।  कुलदीप नैयर की आत्मकथा को पढ़ते हुए जब वो अपनी तारीफों के पुल बांध रहे होते हैं तो उन प्रसंगों को पढ़ते हुए में हिंदी के वरिष्ठ कवि विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता की कुछ पंक्तियां जो कुछ इस तरह से हैं – जाते-जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब/तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा/और कुछ भी नहीं में /सबकुछ होना बचा रहेगा / - बरबस याद आने लगती है । नैयर ने अपनी आत्मकथा में अपनी प्रशंसा के अलावा आजाद भारत के कई दिलचस्प प्रसंगों को भी कलमबद्ध किया है । जैसे जब नोबोकोब का मशहूर उपन्यास लोलिता का प्रकाशन हुआ तो लाल बहादुर शास्त्री ने फौरन उसको भारत में प्रतिबंधित करने की वकालत करते हुए उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा । अपनी आदत के मुताबिक नेहरू ने अगले ही दिन लाल बहादुर शास्त्री को विस्तार से पत्र लिखकर लोलिता को प्रतिबंधित करने से मना कर दिया । नेहरू ने साथ ही ये दलील भी दी कि डी एच लारेंस का लेडी चैटर्लीज लवर भी बाजार में मौजूद होना चाहिए । नैयर लिखते हैं कि शास्त्री नैतिकतावादी तो नहीं थे लेकिन रूढ़िवादी थे । इस प्रसंग में उन्होंने लेनिनग्राद में बैले नृत्य के प्रसंग का उदाहरण देते हुए बताया कि लाल बहादुर शास्त्री कैसे असहज हो गए थे । उन्होंने नृत्य के बीच में जब शास्त्री से पूछा कि कैसा लग रहा है तो शास्त्री ने जवाब दिया कि पूरे नृत्य के दौरान वो इस वजह से असहज रहे कि नर्तकियों के पांव उपर तक खुले थे और वो अपनी पत्नी के साथ बैठे थे ।
कुलदीप नैयर की आत्मकथा इस मायने में भी थोड़ी अहम है कि उसमें आजाद भारत की राजनीति का इतिहास है थोड़ा प्रामाणिक लेकिन बहुधा सुनी सुनाई बातों पर आधारित । कुलदीप नैयर स्कूप के लिए जाने जाते रहे हैं लेकिन उनके स्कूप कई बार सुनी सुनाई बातों या राजनीतिक गॉसिप का अंग रहे हैं । जैसे संजय गांधी की मौत के बाद एक जगह नैयर लिखते हैं – इंदिरा गांधी ने दुर्घटनास्थल का एक बार फिर से दौरा किया और कोई चीज ढूंढकर अपने पास रख ली । वह क्या चीज थी, यह आजतक रहस्य बना हुआ है । क्या वह संजय के स्विस खाते का नंबर था ?  संजय गांधी की मौत के बाद इस तरह की अफवाहें काफी फैली थी । तो गॉसिप को स्कूप की चासनी में पेश करने का काम भी नैयर ने अपनी पत्रकारिता में किया और उसको अपनी आत्मकथा में भी तमगे की तरह से प्रस्तुत किया । जैसे एक जगह वो लिखते हैं कि जब जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला दिया था तो उनके फैसले के बारे में जानने के लिए उनकी धार्मिक प्रवृत्तियों को देखते हुए साधु संन्यासियों का इस्तेमाल किया गया । कोई प्रमाण नहीं, लेकिन कोई कंडन करनेवाला भी नहीं ।  उसी तरह से जब जस्टिस सिन्हा ने अपने फैसले के खिलाफ अपील करने के लिए इंदिरा गांधी को पंद्रह दिनों का समय दिया था । नैयर ने लिखा- एक स्थानीय वफादार वकील वी एन खरे ने खुद ही अपनी तरफ से अपील दाखिल की (पृ 224) । यहां तो ठीक था लेकिन उसके बाद उन्होंने एक लाइन लिख दी कि खरे बाद में भारत के मुख्य न्यायधीश बने । इस तरह से उन्होंने वी एन खरे की वफादारी को उनकी योग्यता बता दिया । संदेह पैदा कर गए ।
कुलदीप नैयर भारत के सबसे ज्यादा पढ़े जानेवाले पत्रकारों में से एक हैं । उनकी योग्यता और उनकी साख पर कोई सवाल भी नहीं है । उनकी लगभग चार सौ पन्नों की यह किताब आजाद भारत का राजनीतिक इतिहास हो सकता था लेकिन नैयर साहब ने कई जगह पर सुनी सुनाई बातों और घटनाओं का वर्णन किया है जिसको भविष्य के इतिहासकार मानेंगे या नहीं इसमें संदेह है । जैसे उन्होंने अपने स्टेटसमैन से हटाए जाने का जो प्रसंग लिखा है और उसी प्रसंग को लेकर जो अन्य संपादकों की किताबें हैं वो अलग अलग तथ्य बयान करती है । लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि कुलदीप नैयर की इस किताब को पूरी तरह से खारिज कर दिया जाए । इसमें कई घटनाओं का प्रामाणिक और फर्स्ट हैंड चित्रण है । अंत में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि बियांड द लाइंस उनकी आत्मकथा है लेकिन इसमें वो बियांड और बिटवीन द लाइंस के बीच उलझ कर रह गए हैं जिससे उनकी पत्रकार की छवि पुष्ट होने के बजाए दरकती है ।