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Saturday, January 29, 2022

पद्म सम्मान पर सियासी विवाद


हर वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार पद्म सम्मानों की घोषणा करती है। पद्म सम्मान उन लोगों को दिया जाता है जो अपने अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हैं। ये राष्ट्रीय सम्मान है। पिछले कुछ वर्षों से पद्म सम्मान ऐसे लोगों को दिए गए हैं जिससे इस सम्मान की प्रतिष्ठा बढ़ी है। कई बार इस पुरस्कार पर राजनीतिक कारणों से विवाद उठते रहते हैं। इस वर्ष के पद्म सम्मानों की घोषणा को लेकर भी विवाद उठा। भारत सरकार ने इस वर्ष कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के नेता और बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को पद्मभूषण से सम्मानित करने की घोषणा की। इस घोषणा के चंद घंटे के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य की पार्टी की तरफ बयान आया कि उन्होंने पद्म सम्मान लेने से मना कर दिया है। एक और समाचार भी बंगाल से ही आया। बंगाली की मशहूर गायिका और बंगाल की लता मंगेशकर कही जानेवाली संध्या मुखर्जी की बेटी की तरफ से एक बयान आया। उसमें कहा गया कि उनकी मां ने पद्मश्री सम्मान लेने से मना कर दिया है। उस बयान के मुताबिक जब गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने उनकी सहमति लेने के लिए फोन किया तो उन्होंने ये कहकर इंकार कर दिया कि 90 वर्ष की अवस्था में पद्मश्री उनके लिए अपमान जैसा है। ये सम्मान अपेक्षाकृत कम उम्र के कलाकार को दिया जाना चाहिए। यह उनकी राय है जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। जब पद्म सम्मानों की सूची जारी हुई तो उसमें संध्या मुखर्जी का नाम नहीं था। संध्या मुखर्जी की पुत्री की तरफ से दिए गए बयान से एक बात स्पष्ट होती है कि पद्म सम्मान के पहले गृह मंत्रालय के अधिकारी संबंधित व्यक्ति को फोन कर उनकी सहमति लेते हैं।

अब एक बार फिर से लौटते हैं बुद्धदेव भट्टाचार्य के मामले पर। बुद्धदेव भट्टाचार्य का नाम पद्म सम्मान के लिए घोषित सूची में आया। कुछ घंटे के बाद उनकी तरफ से उनकी पार्टी ने सम्मान के अस्वीकार करने की बात कही। सवाल यही उठता है कि क्या बुद्धदेव भट्टाचार्य को सम्मानित करने के फैसले के पहले उनकी सहमति नहीं ली गई। क्या गृह मंत्रालय के किसी अधिकारी ने बुद्धदेव भट्टाचार्य को फोन नहीं किया। जब पद्मश्री से सम्मानित करने के लिए संध्या मुखर्जी की सहमति के लिए उनको फोन किया गया तो यह मानने की कोई वजह नहीं है कि सरकार की तरफ से बुद्धदेव भट्टाचार्य को फोन नहीं किया गया होगा। इस वर्ष पद्म सम्मान से सम्मनित होनेवालों में फिल्म निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी का भी नाम है। उन्होंने बताया कि गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने उनको सूची जारी होने के पहले फोन किया और पूछा कि क्या आप सम्मान ग्रहण करने की स्वकृति देते हैं। जब चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने सहमति दी तो उस अधिकारी ने अपना फोन नंबर भी दिया और कहा कि अगर कोई बात हो उनको सूचित करें । सहमति के बाद ही द्विवेदी का नाम पद्मश्री सम्मान के लिए घोषित किया गया। सवाल ये उठता है कि यही प्रक्रिया बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ भी अपनाई गई होगी। उनकी सहमति के लिए भी फोन किया गया होगा। उनके पास भी गृह मंत्रालय के अधिकारी ने फोन नंबर छोड़ा होगा। तो फिर पद्मभूषण अस्वीकार करने की बात सूची में नाम आने के बाद क्यों की गई? क्या पहले सहमति दी गई और जब कम्युनिस्ट पार्टी को ये बात पता चली तो उन्होंने बुद्धदेव बाबू का निर्णय बदलवा दिया? मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता इस तरह के द्वंद्व के शिकार होते रहे हैं

1996 में बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया गया था। उस वक्त भी पार्टी के नेताओं ने ज्योति बसु पर दबाव बनाकर उनसे प्रधानमंत्री का पद अस्वीकार करवा दिया था। तब सीपीएम क नेताओं ने तर्क दिए थे कि गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री बनकर ज्योति बसु मार्क्सवादी एजेंडे को लागू नहीं करवा पाएंगे। ज्योति बाबू ने पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ता की तरह उस निर्णय को स्वीकार कर लिया था लेकिन मन मसोस कर। चंद महीने बाद ही ज्योति बाबू का दर्द छलक आया था। उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं के निर्णय को ऐतिहासिक भूल करार दिया था। ज्योति बाबू लंबे समय तक बंगाल के मुख्यमंत्री रहे, पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ता रहे लेकिन इस मसले पर उन्होंने पार्टी की आलोचना की थी। कहा जाता है कि ज्योति बाबू ने एक ही बार पार्टी के निर्णय को सार्वजनिक रूप से गलत बताया था। बाद में सीपीएम के कई नेताओं ने पार्टी के उस फैसले से असहमति जताते हुए गलती मानी। दरअसल सीपीएम अपने स्थापना काल से ही द्वंद्वात्मक राजनीति का शिकार होती रही है। स्वाधीनता के आंदोलन में  जब बापू ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया था तब कम्युनिस्टों ने उसका विरोध किया था। इसी तरह से अमेरिका के साथ परमाणु करार के समय पार्टी की लाइन नहीं मानने पर सीपीएम ने सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल दिया था। ये हास्यास्पद फैसला था क्योंकि सोमनाथ चटर्जी उस समय लोकसभा के स्पीकर थे। स्पीकर किसी पार्टी का सदस्य नहीं होता है। बाद में सोमनाथ चटर्जी ने अपनी संस्मणात्मक पुस्तक कीपिंग द फेथ, मेमोयर्स आफ अ पार्लियामेंटेरियन में अपनी पूर्व पार्टी की द्वंद्वात्मक राजनीति पर विस्तार से लिखा। संभव है सीपीएम को कई सालों बाद बुद्धदेव के पद्मभूषण सम्मान लौटाने के फैसले पर अफसोस हो। 

दूसरा विवाद उठा गुलाम नबी आजाद पद्म भूषण से सम्मानित करने के निर्णय को लेकर। इस सूचना के सार्वजनिक होते ही कांग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री जयराम रमेश ने बुद्धदेव भट्टाचार्य के पद्मभूषण अस्वीकार के एक ट्वीट को रिट्वीट करते हुए लिखा कि वो आजाद रहना चाहते हैं गुलाम नहीं। उनकी इस टिप्पणी को गुलाम नबी आजाद पर सीधा हमला माना गया। उसके बाद पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार, कपिल सिब्बल के साथ साथ पूर्व मंत्री कर्ण सिंह भी गुलाम नबी आजाद के समर्थन में आ गए। कर्ण सिंह ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय सम्मान को पार्टी के अंदरुनी कलह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। विवाद के बीच कांग्रेस के एक नेता ने तो दूरदर्शन पर हुई एक चर्चा में गुलाम नबी आजाद को गद्दार तक कह दिया। गुलाम नबी पर बीजेपी से साठगांठ का आरोप तक जड़ दिया। जब कि कांग्रेस के नेता ये भूल गए कि पिछले ही वर्ष कांग्रेस के नेता और असम के मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई को मरणोपरांत पद्म सम्मान से सम्मानित किया गया था। कांग्रेस के ही नेता रहे नगालैंड के पूर्व मुख्यमंत्री एस सी जमीर को भी पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। इन दोनों को सम्मानित करने पर तो कांग्रेस के नेताओं को कोई आपत्ति नहीं हुई। 

सवाल यह उठता है कि पद्म पुरस्कार को राजनीति के अखाड़े में क्यों घसीटा जाता है। पद्म पुरस्कार कोई दल या कोई व्यक्ति नहीं देता है। भारत के इस प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान को दलगत राजनीति से उपर उठकर देखा जाना चाहिए। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि पिछले कुछ सालों से जिस तरह के लोगों का चयन पद्म सम्मानों के लिए हो रहा है उसने इस सम्मान की प्रतिष्ठा बढ़ी है। उसको एक दो नामों के आधार पर विवादित करने या उसके आधार पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। आज पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। अमृत महोत्सव वर्ष में सभी दलों के नेताओं को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समाज के अपने नायकों का सम्मान करना चाहिए। बुद्धदेव भट्टाचार्य या गुलाम नबी आजाद को पद्म सम्मान से सम्मानित करने के समावेशी निर्णय को स्वीकार करते हुए सभी दलों को सहिष्णुता का परिचय देना चाहिए था। 

Saturday, January 28, 2017

लेखन को सम्मान

पूरी दुनिया में रामकथा अलग अलग रूपों में मौजूद है । हमारे देश में ही लगभग हर भाषा में राम कथा मौजूद हैं । वाल्मीकि रामायण के अलावा हर भाषा में रामकथा लिखे गए जिनमें देश काल और परिस्थिति के हिसाब से बदलाव भी लक्षित किया जा सकता है । हमारे समय में रामकथा को आधुनिकता के साथ पेश करनेवाले नरेन्द्र कोहली को भारत सरकार ने पद्धश्री से सम्मानित करने का एलान किया है । यह हिंदी के उन लेखकों का भी सम्मान है जो किसी वाद या पंथ के खूंटे से बंधे बगैर पाठकों को ध्यान में रखकर लेखन करते हैं । नरेन्द्र कोहली को एक खास विचारधारा के लोगों ने लगातार साहित्य की कथित मुख्यधारा से अलग रखा और कोशिश करके उनको हाशिए से साहित्य के केंद्र में नहीं आने दिया । यह तो पाठकों के साथ की ताकत थी अपने लेखन पर भरोसा कि नरेन्द्र कोहली उपेक्षा के इस दंश को झेल गए । लगभग छह दशकों से लेखन कर रहे नरेन्द्र कोहली को अब जाकर पद्म सम्मान के लायक समझा गया जबकि पिछले दिनों तो ऐसे ऐसे लोगों को पद्म पुरस्कार दिए गए जिनके बारे में लिखना भी व्यर्थ है । नरेन्द्र कोहली यह मानते हैं कि विचारधारा के ध्वजवाहकों ने उनकी साहित्यक हत्या की कोशिश की लेकिन अपने लेखन के दम पर वो प्रासंगिक बने रहे । खैर यह अवांतर प्रसंग है । हाल के दिनों में पौराणिक कथाओं और आख्यानों को लेकर एक उत्सुकता का वातावरण बना है । हिंदी में नरेन्द्र कोहली के लेखन के बाद अंग्रेजी में भी कुछ युवा लेखकों ने पौराणिक आख्यानों को लेकर लेखन प्रारंभ किया है । नरेन्द्र कोहली ने हिंदी के जिस विशाल पाठकवर्ग को अपने साथ जोड़ा उसमें अंग्रेजी के लेखकों को भी संभावनाएं नजर आईं । परोक्ष रूप से एक कार्यक्रम में अमिष त्रिपाठी ने इस बात को स्वीकार भी किया । यह अच्छी बात है कि साहित्य का एक वर्ग वापस अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं ।

नरेन्द्र कोहली ने व्यंग्य लेखन भी किया ।व्यंग्य लेखन की शुरुआत की कहानी भी बेहद मार्मिक है । सत्तर के दशक की बात उनके घर जुड़वा बच्चों ने जन्म लिया । जन्म के बाद ही दोनों बहुत बीमार पड़ गए और उनको दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती करवाना पड़ा जहां उनकी बच्ची की मौत हो गई और बेटा लंबी बीमारी से उबर कर घर लौटा । नरेन्द्र कोहली ने बातचीत में बताया कि अपने बच्चों की बीमारी के वक्त उन्होंने व्यवस्थागत संवेदनहीनता को बेहद नजदीक से देखा । यह संवेदनहीनता ही उनको व्यंग्य लेखन की ओर ले गया । विवेकानंद पर भी उन्होंने– तोड़ो कारा तोड़ो -के नाम से दो खंड लिखे । उन्होंने रामकथा पर भी विस्तार से लिखा और तुलसी और वाल्मीकि के रामायण को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया । महाभारत के चरित्रों को केंद्र में रखकर भी नरेन्द्र कोहली ने विपुल लेखन किया । महाभारत को पढ़ते हुए बहुधा उसके पात्रों को याद रखना मुश्किल होता है लेकिन कोहली जी ने बेहद कुशलता से कुछ पात्रों को पकड़े रखा और बाकियों को छोड़कर रोचकता के साथ प्रस्तुत कर दिया । रामकथा और महाभारत पर लिखने के बाद कोहली जी ने गीता पर लिखना प्रारंभ किया । वाणी प्रकाशन से प्रकाशिक अपनी पुस्तक शरणम में वो स्वीकार करते हैं कि उनको ना तो संस्कृत का ज्ञान था और ना ही गीता के दर्शन का लेकिन अपने परिवार में गीता के पाठ ने उनको गीता पर लिखने के लिए प्रेरित किया। सतहत्तर साल की उम्र में भी कोहली जी का लगातार लेखन आश्वस्तिकारक है । उनके लेखन को लेकर हिंदी साहित्य में व्याप्त उदासीनता बी अब दरकने लगी है यह भी संतोष की बात है । कोहली जी को पद्म सम्मान मिलने पर बधाई ।      

Wednesday, April 22, 2009

भज्जी,धोनी ने गलती की मगर....

भज्जी और धोनी पद्म पुरस्कार लेने नहीं गए । इसपर जमकर विवाद हुआ, कहा तो यहां तक गया खिलाड़ियों ने मं6लय के फोन तक नहीं उठाए । खेल पत्रकार अभिषेक दूबे ने इस विषय पर हाहाकार के लिए खास तौर पर ये लेख लिखा है ।
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पांच साल पुरानी बात है, तभी मैं क्रिकेट का दीवाना अधिक पत्रकार कम था। मेरा एक दोस्त क्रिकइनफो के लिए एक लेख लिखने के सिलसिले में हरभजन सिंह के घर जालंधर जा रहा था, मैं साथ में चल लिया।
हरभजन के बारे में काफी कुछ सुन रखा था, निगेटिव अधिक, पोजिटिव कम। जालंधर की गलियों से होते हुए जैसे-जैसे मैं हरभजन के घर के नजदीक आता चला गया, अपने घर की याद आने लगी। मैं हरभजन से पहली बार मिल रहा था, लेकिन जैसे-जैसे घर में समय बीतता गया मुझे एक पल के लिए नहीं लगा कि मैं कबाब में हड्डी बनकर चला आया हूं। लगा कि मैं कॉलेज के समय के एक करीब दोस्त से मिल रहा हूं।
जल्द ही हम हरभजन के ड्राइंग रूम से बेडरूम में आ गए और जैसे ही पहली बार इंटरव्यू की चर्चा की, तो आवाज आई बेटा तुमलोग खाना खाओगे तभी इंटरव्यू मिलेगा। दरअसल वो आवाज हरभजन की मां की थी। मेरा दोस्त, मैं और भज्जी खाना खाने बैठे ही थे। मां-बहन खुद खाना परोस रही थी, घर की गर्मा-गर्म रोटी देखती ही, मुंह में पानी आ गया। पहला निवाला लिया ही था कि बहन बोल पड़ी- भैया आप लोग खुद गाड़ी चलाकर आए हो, मैंने दबी जुबान में कहा- साथ ड्राइवर आया है तभी मां ने फरमान जारी किया- उसे बाहर क्यों छोड़ दिया, बेचारा भूखा होगा। चंद ही मिनटों में ड्राइवर हमारे साथ बैठकर खाना खा रहा था। खाने-पीने के बाद इंटरव्यू का दौर शुरू हुआ। भज्जी हर मुद्दे पर दिल खोलकर बोल रहे थे, कई ऐसी बातें जिसे मैं चाहकर भी आपके साथ नहीं बांट सकता।
हाल में हरभजन और धोनी पद्म पुरस्कार लेने नहीं आए और इसे लेकर काफी बवाल मचा। तरह-तरह की प्रतिक्रिया आई। मुझे भी दुख हुआ और मैंने अपनी पीड़ा को अपने चैनल के जरिए लोगों के सामने रखा। जब मैं अपने चैनल पर इसकी आलोचना कर रहा था, तो हरभजन के घर में मेरे दोस्त के साथ बिताए हर पल याद आ रहे थे। मैं ऐसे ही ना जाने कितने अतीतों को जोड़कर मैं समझना चाह रहा था कि इन्होंने ऐसा क्यों किया। दरअसल जो हरभजन, मुनाफ, आरपी, पठान और रैना जैसे क्रिकेटरों की सबसे बड़ी ताकत है, वही सबसे बड़ी कमजोरी भी। जिसने धोनी ब्रिगेड को मैचविनर बनाया है, वही लोगों के आंखों की किरकिरी भी।
क्रिकेट मुंबई-दिल्ली, राजवाड़े और बड़े घरानों से निकलकर अब भारत के दूर-दराज इलाकों में फैल चुका है। जालंधर के हरभजन सिंह, मेरठ के प्रवीण कुमार, मुरादनगर के सुरेश रैना, भरूच के मुनाफ बिंदास नजरिया लेकर क्रिकेट मैदान पर आ रहे हैं। नजफगढ़ के सहवाग को सामने खड़े गेंदबाज के शख्सियत की परवाह नहीं। भज्जी या प्रवीण हेडन या पीटरसन को वैसा ही समझकर गेंद फेंक रहे होते हैं जैसे वो अपने मुहल्ले के बबलू या बंटी को फेंकते आए हैं। ऐसे क्रिकेटर इतिहास के बोझ तले भी दबे नहीं होते। शायद इसलिए जब इनसे पूछा जाता है कि क्या आपको अंदाजा है कि टीम इंडिया अबतक न्यूजीलैंड में हारती आई है तो ये हंसकर जवाब देते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर हम बढ़िया खेलेंगे तो जीतेंगे, अगर खराब खेले तो हारेंगे।
आपको सहवाग का पाकिस्तान में दिया गया मशहूर बयान याद ही होगा। राहुल द्रविड़ के साथ सहवाग ओपनर के तौर पर पंकज रॉय और वीनू मांकड़ की जोड़ी का वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ने के करीब थे। पत्रकार ने जब वीरू से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा- कौन पंकज रॉय, मैंने तो इनके नाम तक नहीं सुने। किसी को भला लगे या बुरा, अगर ये वीरू की कमजोरी है तो सबसे बड़ी ताकत भी। लब्बोलुआब ये है कि अगर क्रिकेट के लोकतांत्रिकरण ने भारत को बिंदास खिलाड़ियों की फौज दी है, तो ऐसे कैरेक्टर भी जिन्हें इतिहास, मूल्यों और उसूलों का अंदाजा नहीं।
टीम इंडिया में एक ऐसे मशहूर क्रिकेटर हैं जो इंटरव्यू देना पसंद नहीं करते। टी-20 वर्ल्ड कप के सिलसिले में मैं दक्षिण अफ्रीका में था। प्रिंट के एक पत्रकार ने जब इस क्रिकेटर से कहा कि अगर तुम लम्बी रेस का घोड़ा बनना चाहते हो, तो तुम्हें मीडिया को साथ लेकर चलना होगा। हंसते हुए उस क्रिकेटर ने जवाब दिया- एक बात मैं अच्छे से जानता हूं अगर मैं अच्छा खेला तो आप मेरी तारीफ करने पर मजबूर होंगे और अगर मैं बुरा खेला तो आप लाख चाह लो, मुझे बचा नहीं पाओगे। जैसे ही प्रिंट मीडिया का वो पत्रकार आगे गया, उस क्रिकेटर ने मुझसे कहा- ये दादा को नहीं बचा पाए, मैं किस खेत की मूली हूं।
ऐसा ही एक और वाकया मुझे याद आता है। भारत के सुदूर इलाके से आने वाले एक क्रिकेटर ने मेथ्यू हेडन को आउट करने के बाद जमकर गाली दी। मैच खत्म होने के बाद जैसे ही हमने इस बारे में उस क्रिकेटर से चर्चा की तो उन्होंने कहा- पता है भैया, हमारे बीते जेनेरेशन ने इन कंगारुओं का दिमाग खराब कर दिया है। वो इन्हें बाउंसर फेंकने बाद सॉरी कहते थे। मेरा तो फंडा साफ है, मैं बाउंसर भी फेंकता हूं और दबाकर गाली भी देता हूं।
आत्मविश्वास, बिंदास नजरिया और किसी की परवाह नहीं करना दुधारी तलवार है। अगर इस नजरिए का पोजिटिव इस्तेमाल हो, तो वो मौजूदा टीम इंडिया की तरह चैंपियन टीम बनाती है। अगर इसने अराजक रूप ले लिया तो ये पाकिस्तान क्रिकेट टीम का ड्रेसिंग रूम जैसा माहौल बनाती है। पाकिस्तान में जबतक ऐसे क्रिकेटरों को नेतृत्व करने वाला इमरान खान जैसा लीडर मिला, तो उस टीम का बेहतरीन प्रदर्शन रहा। जैसे ही इमरान ने क्रिकेट को अलविदा कहा पाकिस्तान का ड्रेसिंग रूम अराजकता का प्रतीक बनता गया। अगर भारतीय टीम में भज्जी-वीरू-धोनी जैसे बिंदास क्रिकेटर हैं, तो सचिन, राहुल और लक्ष्मण जैसे अनुभवी और जागरूक इंसान भी जो इन्हें उड़ते वक्त नियंत्रण में रखते हैं।
सवाल ये है कि त्रिमूर्ति की विदाई के बाद ऐसा कौन करेगा। अगर मैं अपने अनुभव को आधार मानूं तो इस लिहाज से गौतम गंभीर में वो माद्दा है। अपने बेहतरीन खेल से वो ना सिर्फ मिसाल बनकर टीम की अगुवाई कर सकते हैं, बल्कि सोच और उसूलों के मामले में वो मौजूदा क्रिकेटरों को सही दिशा भी दे सकते हैं। सच कहता हूं, अगर बिंदास क्रिकेटरों के ब्रिगेड को कोई बिंदास मुखिया मिल गया, तो भारतीय क्रिकेट का बहुत बुरा होगा।
हरभजन और धोनी ने पद्म पुरस्कार के लिए नहीं जाकर बहुत बुरा किया। वो रोल मॉडल हैं और उनके इस रवैये से गलत संदेश जाता है। मैं कतई उनका बचाव नहीं कर रहा। साथ ही मैं दो सवाल छोड़ रहा हूं-पहला सवाल..क्या हम अपने दिल पर हाथ रखकर ये पूछ सकते हैं कि क्या हम राष्ट्रीय प्रतीकों और सम्मानों को उतना ही सम्मान करते हैं जितना हमारे माता-पिता करते आए, क्या अगले जेनेरेशन के मन में उनके लिए उतनी ही इज्जत है जितनी हममें हैं? दूसरा सवाल- क्या भज्जी, पठान, रैना, सहवाग जैसे क्रिकेटरों के आने से भारतीय क्रिकेट मजबूत नहीं हुआ...क्या ऐसे क्रिकेटरों ने तिरंगे की शान को नहीं बढ़ाया?
आजमगढ़ अगर आज कामरान दे रहा है और भरूच मुनाफ, मेरठ अगर प्रवीण दे रहा है और कोच्ची श्रीसंत, इससे भारतीय क्रिकेट का सम्मान बढ़ा है। ये बिंदास जरूर हैं, लेकिन दिल से भोले भी। राजे-राजवाड़ो और पारंपरिक क्रिकेट स्कूलों से आए क्रिकेटरों की तरह ये एलीट तो नहीं, लेकिन मकसद दिखाए जाने पर ये जी-जान लगाना जानते हैं।
जरूरी है इन्हें राष्ट्रीय और समाजिक तौर पर जागरूक करने की, इनकी ताकत को सही दिशा देने की और इनके भोले मन में वसूलों के लिए इज्जत पैदा करने की। ऐसे क्रिकेटरों को लीडरशिप के लिए पहले कॉनवेंट में पढ़े गांगुली चाहिए था और अब एक और कॉनवेंट में पढ़े गंभीर चाहिए। जरूरी है कि हम इन्हें इतना जागरूक करें, कि आने वाले कल में वो अपना लीडर खुद बन सकें।