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Sunday, September 27, 2015

मुक्तिबोध संचयन

वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने एक बार हिंदी कविता को लेकर बेहद दिलचस्प बात की । उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध की कविताओं के सामने आने के पहले हिंदी कविता के ज्यादातर महत्वूपूर्ण कवि उत्तरप्रदेश से होते थे । उनकी स्थापना के मुताबिक जब मुक्तिबोध की कविताओं ने हिंदी कविता में अपने को मजबूती से स्थापित किया तो उसके बाद से हिंदी कविता में मध्यप्रदेश के कवियों का दबदबा बढने लगा । अपने तर्क के समर्थन में नरेश जी ने उन्होंने अशोक वाजपेयी से लेकर राजेश जोशी और भगवत रावत तक के नाम गिनाए । इस बारे में मुक्तिबोध के एक और मित्र अशोक वाजपेयी से जब मैंने सवाल किया तो उन्होंने हंसते हुए कहा कि ये बहुत दूर की कौड़ी है लेकिन कौड़ी है अच्छी । अशोक वाजपेयी ने नरेश सक्सेना की बात को अपने अंदाज में लगभग स्वीकार कर किया । मुक्तिबोध को लेकर हिंदी कविता में लंबे समय से बहस चल रही है । उनकी कविताओं को अनेक तरह से व्याख्यायित किया जा रहा है । उनके निधन के बाद से लगातार उनकी कविताओं को लेकर आलोचकों के बीच विमर्श होता रहा है । डॉ रामविलास शर्मा ने उन्नीस सौ अठहत्तर में प्रकाशित अपनी किताब- नई कविता और अस्तित्ववाद में मुक्तिबोध की कविताओं का विस्तार से मूल्यांकन किया था । अपनी किताब में रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध की कविताओं को अस्तित्ववाद और रहस्यवाद से प्रभावित साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । डॉ शर्मा ने तो मुक्तिबोध को सिजोफ्रेनिया नामक बीमारी से ग्रस्त बताकर एक धुंध का वातावरण बना दिया । बाद में नामवर सिंह ने डॉ रामविलास शर्मा की मुक्तिबोध को लेकर स्थापना का जबरदस्त विरोध किया । इन दो आलोचकों के बीच इस बात को लेकर लंबे समय तक बहस हुई कि कि मुक्तिबोध की रचनाओं में संघर्ष दिखाई देता है वह उनका अपना संघर्ष है या फिर पूरे मध्यवर्ग का संघर्ष है । कालांतर में अन्य आलोचकों ने रामविलास शर्मा की स्थापनाओं पर सवाल उठाए । मुक्तिबोध पर रामविलास शर्मा की स्थापनाओं को आलोचक नंदकिशोर नवल उनके संकीर्णतावादी मार्क्सवादी होने का परिणाम करार देते हैं और कहते हैं कि मुक्तिबोध ना केवल मानसिक रोगी नहीं थे बल्कि अपने युग के सर्वाधिक सुगठित व्यक्तित्ववाले रचनाकार थे । यह मुक्तिबोध की कविताओं की ताकत है कि वो अब तक आलोचकों को चुनौती दे रही है । सितंबर उन्नीस सौ पैंसठ के ज्ञानोदय में कवि श्रीकांत वर्मा का एक लेख छपा था जिसमें उन्होंने कहा था – ‘अप्रिय’ सत्य की रक्षा का काव्य रचनेवाले कवि मुक्तिबोध को अपने जीवन में कोई लोकप्रियता नहीं मिली और आगे भी, कभी भी, शायद नहीं मिलेगी । श्रीकांत वर्मा ने अपने उसी लेख में आगे मुक्तिबोध के कवित्व के वैशिष्ट्य को व्याखायित भी किया था । कालांतर में श्रीकांत वर्मा की आशंका गलत साबित हुई और मुक्तिबोध को उनकी मृत्यु के बाद पर्याप्त ख्याति मिली ।  अब भीमिल रही है । पिछले साल उनकी जन्म शताब्दी के मौके पर हफ्ते भर का कार्यक्रम आदि हुए ।
अभी हाल ही में कवि राजेश जोशी ने मुक्तिबोध संचयन का संपादन किया है । इस संचयन में मुक्तिबोध की कविताओं के अलावा उनकी कहानियां और उनका एक उपन्यास विपात्र संकलित है । इस किताब को देखने के बाद यह लगा कि हिंदी में संचयन के प्रकाशन की परंपरा का पूर्णत विकास होना शेष है । संचयन हिंदी में अंग्रेजी के रास्ते आया है जहां सलेक्टेड वर्क्स की लंबी और समृद्धशाली परंपरा रही है । हिंदी में संचयन को बहुत कैजुअली लिया जाता है । अब अगर हम समीक्ष्य संचयन को ही देखें तो इसमें मुक्तिबोध की एक साहित्यक की डायरी से कुछ भी नहीं लिया गया है जबकि मुक्तिबोध के संचयन की कल्पना उन लेखों के बगैर कैसे की जा सकती है । इस किताब में राजेश जोशी ने दस पन्नों की छोटी से भूमिका लिखी है जिसमें मुक्तिबोध से जुड़े प्रसंगों को ज्यादातर अन्य लेखकों के हवाले से कहा गया है । साहित्यक कृतियों के अलावा उनके व्यक्तिगत प्रसंगों की चर्चा है । मुक्तिबोध का चाय प्रेम और गिरे हुए घर से उबलते हुए चाय को उठा लाना दिलचस्प प्रसंग है । इसी तरह शादी के दौरान चाय पीने के लिए उतर जाना और बारात का उनको छोड़कर आगे बढ़ जाना जैसा प्रसंग पाठकों के लिए रुचिकर है । लेकिन ये सब ऐसे प्रसंग है जो पहले ही विस्तार से लिखे जा चुके हैं ।  
संचयन के संपादक राजेश जोशी का आग्रह है कि मुक्तिबोध की कविताओं को उनकी अन्य रचनाओं के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए । जैसे अपनी भूमिका की शुरुआत में ही राजेश जोशी ने एक कविता उद्धृत की है – अगर मेरी कविताएं पसंद नहीं/उन्हें जला दो/ अगर उनका लोहा पसंद नहीं/उसे गला दो/अगर उसकी आग बुरी लगती है/दबा डालो/इस तरह बला टालो !/  । राजेश जोशी का आग्रह है कि इस कविता के के साथ ‘आत्म वक्तव्य’ शीर्षक कविता को मिलाकर पढ़ा जाए तो मुक्तिबोध की काव्य प्रक्रिया  और कविता के साथ उनके सरोकारों को समझा जा सकता है । उनकी बेचैनी, उऩके तनाव, उनकी कविता के बार-बार बनते बदलते, कई कई प्रारूप और उलके लंबे होते जाने को कुछ हद तक समझा जा सकता है । लेकिन इस संचयन के संपादक राजेश जोशी ने इस किताब में मुक्तिबोध की कविता- एक टीले और डाकू की कहानी को नहीं रखा । माना जाता है कि इस कविता में पहली बार आत्मसंघर्ष पहलीबार बहुत तीखे रूप में सामने आया था । दरअसल इस पूरी भूमिका में राजेश जोशी बहुधा एक पंक्ति लिखकर पूर्ववर्ती लेखको के मुक्तिबोध पर लिखे को कोट करते हैं । पाठकों की यह जिज्ञासा ये जानने में हो सकती है कि राजेश जोशी मुक्तिबोध के बारे में क्या सोचते हैं । एक कवि अपने पूर्ववर्ती कवि के बारे में क्या सोचता है । लेकिन ऐसा हो नहीं सका । मुक्तिबोध की राजनीतिक कविता के बारे में राजेश जोशी क्या सोचते हैं । इस बात पर प्रकाश डाला जाना चाहिए था कि मार्क्सवादी आलोचना से मुक्तिबोध की क्या शिकायत थी । यह जानना भी दिलचस्प होता कि राजेश जोशी इस बारे में क्या सोचते हैं । इस पूरे संचयन को देखने के बाद यह लगता है कि संपादक ने मुक्तिबोध की रचनाओं का चयन कर पाठकों के सामने पेश कर दिया । अच्छा होता अगर राजेश जोशी अपने इस चयन के आधार को विस्तार से सामने रखते । दरअसल येसंचयन ना होकर मुक्तिबोध की कहानियों, कविताओं और एक उपन्यास का संग्रह कहा जा सकता है जो लगभग साढे पांच सौ पन्नों का है । 

Sunday, July 22, 2012

लेखकों की राजनीति


मध्य प्रदेश का भारत भवन अपने स्थापना काल से ही विवादों में रहा है । हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी की पहल पर भोपाल में बना यह साहित्य और संस्कृति का केंद्र एक बार फिर से विवादों में घिर गया है । इस बार विवाद की वजह है हिंदी के प्रगतिशील और जनवादी लेखक संगठनों से जुड़े तीन लेखकों की वो अपील जो उन्होंने जनवादी-प्रगतिवादी लेखक संगठनों से जुड़े कॉमरेड लेखकों से की है । इस अपील में इन संगठनों और विचारधारा से जुड़े साथी लेखकों से अनुरोध किया गया है कि वो भारत भवन, मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, उर्दू अकादमी समेत मध्य प्रदेश के कई सरकारी संस्थानों के कार्यक्रमों का बहिष्कार करें । इस अपील में दलील दी गई है कि मध्य प्रदेश की वर्तमान सरकार की अन्यथा स्पष्ट सांस्कृतिक नीतियों की वजह से इन संस्थानों का और साथ ही प्रदेश की मुक्तिबोध, प्रेमचंद और निराला सृजनपीठों का, वागर्थ, रंगमंडल आदि विभागों का पुछले आठ नौ सालों में सुनोयोजित तरीके से पराभव कर दिया गया । अब यहां सवाल यह उठता है कि अगर पिछले आठ नौ सालों से ये सुनियोजित साजिश चल रही थी तो अब तक लेखक और लेखकों के संगठन चुप क्यों बैठे थे । क्या जनवादी और प्रगतिशील पत्रिकाओं में मध्यप्रदेश शासन का विज्ञापन नहीं छपता रहा है । दरअसल मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव नजदीक आते ही इन लोगों को इन संस्थाओं के पतन और पराभव की याद आने लगी । चाहे वो प्रगतिशील लेखक संगठन हों या फिर जनवादी लेखक संगठन इनके सदस्यों का ना तो अपना कोई वजूद है ना तो अपनी कोई सोच ना ही अपनी कोई लाइन । हर तरह के कार्यक्रमों के लिए साहित्य के ये संगठन अपने राजनीतिक आकाओं का मुंह जोहते हैं और इतिहास इस बात का गवाह है प्रगतिशील लेखक संगठन और जनवादी लेखक संगठन से जुड़े लेखक हमेशा से सीपाआई और सीपीएम की विचारधारा के ही पोषक और प्रचारक रहे हैं । दरअसल अगर हम इस अपील को ठीक से पढ़ें और उसकी पड़ताल करें तो इसमें कुछ और खेल नजर आता है ।
इस अपील में लिखा गया है कि हमारा विरोध किसी राजनैतिक अनुशंसा से उतना नहीं है जितना क्योंकि व्यवस्था में इन पदों पर पहले भी राजैनतिक अनुशंसाओं ले लोग नामित किए जाते रहे हैं लेकिन वे सब असंदिग्ध रूप से हमारे समकालीन साहित्य के मान्य, समादृत हस्ताक्षर रहे हैं । इस वाक्य के बाद लेखकों की एक सूची दी गई है जिसमें वामपंथी विचारधारा के बाहर के भी कुछ लोगों के नाम शामिल कर अपील की साख को बढ़ाने की कोशिश की गई है । लेकिन इन तीन लोगों को यह याद दिलाने की जरूरत है कि जब अशोक वाजपेयी भारत भवन के कर्ता-धर्ता थे तो इन्हीं संगठनों से जुड़े लेखकों ने वाजपेयी पर जोरदार हमले किए थे । उन हमलों को अभी हिंदी साहित्य जगत भूला नहीं है । अशोक वाजपेयी का दोष तब इतना था कि उन्होंने भारत भवन पर कम्युनिस्ट पार्टी का झंडा लहराने से मना कर दिया था । लिहाजा उन पार्टियों से जुड़े लेखकों ने अशोक वाजपेयी औऱ उनसे जुड़े लेखकों को कलावादी कह किनारा लगाने की लगातार कोशिश की। उनको कल्चरल माफिया कहा गया तो भारत भवन को संस्कृति का अजायबघर । अशोक वाजपेयी के साथियों को अष्टछाप कह कर उनका मजाक उड़या गया । यही काम इन संगठन से जुड़े लेखकों ने हिंदी के हिरामन लेखक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के साथ भी किया और अब भी कर रहे है । भारत भवन के कामकाज में निसंदेह गिरावट आई है । जिस उद्देश्य के लिए उसकी स्थापना की गई थी उससे वह भटक गया है । लेकिन आठ सालों तक उसके कार्यक्रमों में दीप प्रजज्वलित करने और सक्रिय हिस्सेदारी के बाद चुनाव के वक्त उसका गिरता स्तर याद आना अपीलकर्ताओं की मंशा को संदेहास्पद बना रही है । अपीलकर्ताओं ने जो ईमेल अखबारों और लेखकों को भेजा है उसमें बार बार राजनीतिक भावना से काम न करने की सफाई दी है । बार-बार सफाई देना ही उस संदेह को बढ़ाने का पर्याप्त आधार है ।
दरअसल प्रगतिशील लेखक संघ और जनवादी लेखक संघ दोनों लेखकों के बड़े समुदाय से कट गए है । लेखकों की बेहतरी और उनके कल्याण के लिए उनके पास कोई ठोस योजना नहीं है । उनका काम सिर्फ लेखकों की मौत पर शोकगीत लिखना रह गया है । हिंदी के वरिष्ट कथाकार अरुण प्रकाश का जब  निधन हुआ था तो उनके पड़ोस में रहनेवाले जनवादी और प्रगतिशील संगठनों से जुड़े उनके साथी लेखकों के पास उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने का वक्त नहीं था । दुख की उस घड़ी में परिवार के साथ खड़े होने से ज्यादा जरूरी उन संगठनों को सारे अखबारों को शोक संदेश प्रेषित करना लगा । जो लेखक अरुण प्रकाश के घर से चंद मीटर की दूरी पर रहते थे उनके दुख का पता अखबारों से चला । प्रचारप्रियता की पराकाष्ठा । दरअसल इन संगठन से जुड़े लेखक अब लेखक रहे नहीं वो पूरे तौर पर नेता हो गए हैं और उन्हीं की तरह के राजनीतिक दांव-पेंच चलते हैं । नेताओं की तरह का व्यवहार भी करते हैं और उनका वर्गचरित्र भी नेताओं वाला ही हो गया है । लेखकों का काम लिखना है राजनीति करना नहीं । इन लेखक संगठनों ने लेखकों को राजनीति करना सिखा दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि उनसे जुड़े लेखकों की साख नेताओं की तरह संदिग्ध हो गई । लेखक अपने पाठकों से और रचनाओं से दूर होते चले गए । आज हालात यह है कि हिंदी समाज चंद लेखकों को छोड़कर किसी को जानता नहीं है, जानते हैं साहित्य की दुनिया में आवाजाही करनेवाले चंद लोग । लेखक संगठनों ने लेखकों को राजनीति के ऐसे दलदल में ढकेल दिया था कि जितना वो उससे निकलने की कोशिश करते थे उतना ही उसमें फंसते चले गए ।
मध्यप्रदेश के ये तीन कवि जो अपने सूबे की संस्थाओं के गिरते स्तर और पतनशीलता पर जार-जार हो रहे हैं उनको साथी लेखिका तसलीमा नसरीन का दर्द याद नहीं आता है । तसलीमा हर दिन घुट रही है लेकिन उसके लिए क्या कभी कोई प्रयास किया गया । एम एफ हुसैन के लिए बुक्का फाड़ विरोध करनेवाले इन लेखक संगठनों ने सलमान रश्दी के भारत आने पर मुल्लाओं के विरोध में चुप्पी साध ली थी । वजह बहुत साफ है उसको कहने की आवश्यकता नहीं है । जनवादिता और प्रगतिशीलता जब अपने आपको एक दायरे में समेट लेती है या विरोध या प्रशंसा का पैमाना विचारधारा और परोक्ष रूप से विचारधारा के लिए वोट जुटाना हो जाता है तो लेखकों का व्यवहार राजनेताओं सरीखा हो जाता है । लेखन से ज्यादा राजनीति करने का नतीजा यह होता है कि पाठकों के बीच उनकी साख कम से कमतर होती चली जाती है । आज संस्थाओं से ज्यादा जरूरी, गंभीर और बुनियादी समस्याएं लेखकों के सामने हैं । आज हिंदी में किताबों की उपलब्धता, हिंदी समाज के फैलाव के बावजूद साहित्यिक किताबों की कम बिक्री, लेखकों की रॉयल्टी, लेखकों की सहायता के लिए आकस्मिक कोष की कमी जैसी समस्याएं हैं जिनपर तवज्जो की जरूरत है । लेखक संगठन के कर्ताधर्ताओं और उनसे जुड़े लेखकों को इनपर ध्यान देना चाहिए और हालात की बेहतरी के लिए काम करना होगा । लेकिन इन समस्याओं को लेकर कभी हल्ला-गुल्ला नहीं मचता, कोई आंदोलन नहीं होता , कभी कोई अपील नहीं जारी की जाती । इसकी वजह है कि उससे कोई दलगत हित नहीं सधता । जरूरत इस बात की है कि इन मुद्दों पर गंभीर विमर्श हो वर्ना लेखक समुदाय एक दिन मृतप्राय लेखक संगठनों का शोकगीत लिख डालेंगे ।