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Wednesday, May 3, 2017

AAP की बुनियाद उसकी चुनौती

एक के बाद एक हार के बाद दिल्ली की आम आदमी पार्टी अब आंतरिक कलह से जूझ रही है। दो ढाई साल पहले जिस पार्टी को दिल्ली ती जनता ने प्रचंड बहुमत से दिल्ली की गद्दी सौंपी थी वो इतने कम समय में ही इतने बड़े कलह का शिकार हो जाएगी किसी ने सोचा भी नहीं था। पंजाब में हार, दिल्ली उपचुनाव में तीसरे नंबर की पार्टी और फिर दिल्ली नगर निगम में हार के बाद पार्टी के संस्थापकों में से एक कुमार विश्वास ने बगावत का बिगुल फूंक दिया है। कुमार विश्वास की पीड़ा है कि पार्टी में उनकी पूछ नहीं हो रही और पार्टी के एक विधायक ने उनको भारतीय जनता पार्टी का एजेंट कह दिया। विधायक के इस आरोप के बाद भड़के कुमार को मनाने का दौर चल रहा है।पार्टी के नेता पहले उनको सार्वजनिक रूप से नसीहत भी देते हैं और फिर उनको मनाने उनके घर भी पहुंच जाते हैं। किसी का आंकलन है कि कुमार विश्वास अपनी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल पर दबाव बनाकर राज्यसभा की सीट पक्की करना चाहते हैं। दिल्ली में अगले साल जनवरी में तीन राज्यसभा की सीट खाली हो रही है। कुमार विश्वास को मनाने के लिए पार्टी के नेता क्यों परेशान हो रहे हैं यह समझ से परे है। क्या कुमार का इतना बड़ा जनाधार है कि वो आम आदमी पार्टी को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कुमार के जनाधार का टेस्ट होना अभी शेष है।
कुमार विश्वास को लेकर पार्टी में भले ही अलग अलग राय दिख रही हो लेकिन आम आदमी पार्टी की समस्या कुछ अलग है। पार्टी के नेताओं के झगड़े के बीच राजनीतिक विश्लेषक भी इस समस्या पर गंभीरता से विचार किए बिना सतही तौर पर अंतर्कलह के कारणों का विश्लेषण कर रहे हैं। अरविंद केजरीवाल का बड़बोलापन, उनकी नकारात्मक राजनीति, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मर्यादाहीन शब्दों से संबोधित करने आदि को जनता से उनके दूर जाने की वजह बता रहे हैं । जबकि इसके मूल में वजह कुछ और है। जब केजरीवाल ने अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को राजनीतिक पार्टी में बदलकर चुनावी राजनीति में आने का एलान किया था तब उनके पास भ्रष्टाचार से लड़ने के जज्बे की पूंजी थी। जब उन्होंने राजनीतिक दल बनाया तो उनका कोई वैचारिक आधार नहीं था। वो भ्रष्टाचार विरोधी लहर पर सवार थे और लोगों को लग रहा था कि एक ऐसा नेता आया है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ सकता है। उत्साह में उस वक्त कई लोगों ने केजरीवाल की तुलना ‘नायक’ फिल्म के हीरो अनिल कपूर के किरदार से करना शुरू कर दिया था। लेकिन कोई भी पार्टी बगैर वैचारिक आधार के लंबे समय तक राजनीति नहीं कर सकती है। केजरीवाल ने एक बार वैचारिक आधार के बारे में पूछे जाने पर सवाल का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि वैचारिकता से पेट नहीं भरता है। उन्होंने तब हल्के में ये भी कहा था कि जहां जनता का हित हो रहा होगा वहां वो लेफ्ट या राइट दोनों में से किसी विचारधारा से परहेज नहीं करेंगे।  
दरअसल अगर पूरी दुनिया पर नजर डालें तो एक मुद्दे की पार्टी बनकर कोई भी दल लंबे समय तक राजनीति में टिकी नहीं रह सकती है चाहे वो अमेरिका की प्रोहिबिशन पार्टी ही क्यों ना हो। जब वो पार्टी शुरू हुई थी तो उसको जोरदार जनसमर्थन मिला था जो समय के साथ छीजता चला गया। यूरोप में कई पार्टियां पर्यावरण आदि जैसे एक मुद्दे को लेकर चली लेकिन वो सफल नहीं हो पाईं।
आम आदमी पार्टी के दो-ढाई साल के कार्यकाल पर अगर गंभीरता से विचार करें तो इस पार्टी ने दिल्ली की जनता को सब्सिडी का लॉलीपॉप देने के अलावा कोई बिग टिकट आइडिया पर काम नहीं किया। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भले ही शिक्षा के क्षेत्र में हाथ-पांव मारे लेकिन वो नाकाफी थे। आधारभूत ढांचा ठीक करने की दिशा में क्या हुआ। दिल्ली की सड़कें बेहाल हैं, बारिश के मौसम में सड़कों पर पानी जमा हो जाता है। एमसीडी के साथ दिल्ली सरकार का तालमेल कभी बन ही नहीं पाया। दिल्ली की जनता ने कई बार सड़कों पर कूड़े का अंबार देखा। इसी तरह से ट्रैफिक जाम को काबू में करने के लिए आड ईवन का प्रयोग किया गया था लेकिन उसकी सफलता का आंकलन आना बाकी है।

आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसकी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़नेवाली पार्टी की छवि थी। डिमोनेटाइजेशन के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से पूरे देश के लोगों को ये संदेश दिया कि वो कालेधन के खिलाफ इस मुहिम में मजबूती से खड़ी है उसने आम आदमी पार्टी को इस मुद्दे पर भी कमजोर कर दिया। इसके अलावा आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से नोटबंदी का विरोध किया उसका भी जनता के बीच गलत संदेश गया। अब आम आदमी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़नेवाली पार्टी के तौर पर फिर से उभरने का उपक्रम करे। इसके अलावा सस्ती बिजली और पानी देकर जनता को लंबे समय तक खुश नहीं रखा जा सकता है । पार्टी को दिल्ली की जनता के उन समस्याओं को दूर करने के लिए कमर कसना होगा जिसे जनता का हर रोज सामना होता है। और इन सबसे ऊपर उनको दिल्ली के अपने जनाधार को मजबूत करना होगा ना कि देश के अन्य राज्यों में जाकर चुनाव लड़कर अपनी महात्वाकांक्षा की पूर्ति के यत्न में लगना होगा। जब जब केजरीवाल दिल्ली के बाहर जाकर चुनाव लड़ने की कोशिश करते हैं, असफल तो होते ही हैं, दिल्ली के जनाधार में सेंध लगती है। आमआदमी पार्टी की समस्या कुमार विश्वास नहीं बल्कि पार्टी के क्रियाकलाप हैं, उसको सुधारना होगा ।           

Thursday, February 16, 2017

वादों की कसौटी पर आम आदमी पार्टी सरकार

वेलेंटाइन डे के दिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार के दो साल पूरे हो गए । दो साल किसी भी सरकार के काम-काज का आंकलन करने के लिए काफी होता है । वेलेंटाइन डे वाली सरकार दो साल तक केंद्र सरकार से टकराव के रास्ते पर चलती रही और उनके कुछ मंत्री विवादों में पड़े । संभव है कि आम आदमी पार्टी ने टकराव को ही अपनी राजनीति का आधार बनाया हो लेकिन लोकतंत्र में जनहित के कामों को लेकर आंकलन किया जाना चाहिए लिहाजा दो साल बाद प्रधानमंत्री को साइकौपैथ कहने की बात हम नहीं करेंगे ना ही फर्जीवाड़े में फंसे कानून मंत्री जितेन्द्र तोमर को लेकर सवाल खड़े करेंगे और ना ही मंत्री के भ्रष्टाचार के आरोपों में बर्खास्त होने को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार पर ऊंगली उठाएंगे । हम तो चुनाव पूर्व जनता से किए वादों को परखने की कोशिश करेंगे । दिल्ली महानगर में तीन बुनियादी सवालों से हर रोज यहां की जनता को जूझना पड़ता है, सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य । सुरक्षा को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार पल्ला झाड़ लेती है कि दिल्ली पुलिस उसके पास नहीं है लिहाजा वो कुछ नहीं कर सकती । हलांकि चुनाव पूर्व रेडियो पर इस बात का धुंआधार प्रचार किया गया था कि राजधानी में ब्लैक स्पॉट को चिन्हित कर वहां रोशनी का इंतजाम किया जाएगा । इसका क्या हुआ पता नहीं । वादा तो सैंतालीस फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का भी था लेकिन जानकारी के मुताबिक अब तक एक भी नया फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं बनाया जा सका है बल्कि आरोप तो यह भी लग रहे हैं कि दो साल बीत जाने के बाद भी सरकार इस काम के लिए जरूरी धन मुहैया नहीं करवा पाई है ।
वादा तो ये भी किया गया था कि दिल्ली में बसों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे । वादे के मुताबिक महिलाओं की सुरक्षा को लेकर दिल्ली की करीब साढे तीन हजार बसों में सीसीटीवी कैमरा लगाया जाना था । लेकिन वादे हैं वादों का क्या । इसी तरह से फ्री वाई फाई सुविधा का भी अता-पता नहीं है । हो सकता है व्यवस्थागत दिक्कतें आ रही हों लेकिन अब तो ये चुटकुला चलने लगा है कि दिल्ली में फ्री वाई-फाई का पासवर्ड पंजाब है । खैर ये अलहदा बातें हैं । सुरक्षा के बाद सबसे जरूरी है शिक्षा । आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि वो दिल्ली में पांच सौ सरकारी स्कूल और बीस नए कॉलेजों की स्थापना करेगी । यह सही है कि दिल्ली सरकार ने पहले से बने स्कूलों में कमरों की संख्या बनाई है और सरकार के दावों के मुताबिक आठ सौ नए कमरे बनाए गए हैं । लेकिन स्कूलों में कमरों की संख्या को बढ़ाकर नए स्कूल खोलने के वादे को पूरा करने का तर्क समझ से परे हैं । शिक्षा के क्षेत्र में काम हो रहा है । हाल ही में पैरेंट्स-टीचर मीट भी हुए जो सरकारी स्कूलों में नहीं हुआ करते थे । लेकिन अगर गंभीरता से विचार करें तो ये सब कॉस्मेटिक बदलाव हैं जो शिक्षा की सुधार की दिशा में किए गए वादों की तुलना में ऊंट के मुंह में जीरे जैसी बात है ।
अब बात करते हैं स्वास्थ्य की । स्वास्थ्य के क्षेत्र में वादा किया गया था कि नौ सौ नए प्राइमरी हेल्थ सेंटर खोले जाएंगे और अस्पतालों में तीस हजार बेड बढाए जाएंगे । इस दिशा में आम आदमी पार्टी की सरकार ने एक सौ पांच मोहल्ला क्लिनिक खोलें हैं लेकिन अस्पतालों में बेड की संख्या बढ़ाने की दिशा में कोई ठोस काम नहीं हो पाया है । मोहल्ला क्लिनिक में भी मंत्री सतेन्द्र जैन की बेटी को कंसलटेंट बनाए जाने को लेकर विवाद हुआ था जिसके बाद उन्होंने पद छोड़ दिया था । बिजली बिल को आधा करने के वादे पर अमल हुआ था लेकिन उससे क्या फायदा हुआ । सरकार बिजली कंपनियों को सब्सिडी देकर उनकी ही तिजोरी भर रही है । आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि पांच साल में दिल्ली बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होगी लेकिन सिर्फ पिछले ही साल दिल्ली ने बाहर से करीब अट्ठाइस हजार मिलियन यूनिट बिजली खरीदी । बिजली के बाद पानी को लेकर आम आदमी पार्टी ने मुद्दा बनाया था और कहा था कि सरकार में आते ही देश की राजधानी में पानी माफिया को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे लेकिन शुरुआती दिनों में छापेमारी के बाद अब निर्बाध गति से पानी माफिया अपना काम कर रही है । यमुना को लेकर भी बड़े बड़े वादे किए गए थे लेकिन दिल्ली की जनता हर रोज देखती है कि यमुना का क्या हाल हो गया है । यमुना किनारे आरती का कार्यक्रम करने से इस मरती हुई नदी का भला नहीं हो सकता है । इसके लिए ठोस इच्छा शक्ति और कड़े प्रशासनिक फैसलों की दरकार है । यमुना टैक्सी तो दूर की बात है यमुना सफाई भी नहीं हो पाई।

अगर समग्रता में आम आदमी पार्टी के वादों को देखें तो कमोबेश बहुत सारा काम अभी होना बाकी है । दिल्ली के कई इलाकों में सड़कों का बुरा हाल है । प्रदूषण रोकने के लिए ऑड इवन का प्रयोग कितना सफल रहा यह कहा नहीं जा सकता है क्योंकि सरकार ने इस प्रयोग की आवर्तिता बढ़ाई नहीं । आम आदमी पार्टी से दिल्ली की जनता को बहुत उम्मीदें थीं लेकिन दो साल बीतने के बाद जिस तरह से काम हो रहा है उससे लगता नहीं है कि ये उम्मीदों पर खरा उतर पाएगी । जिस तरह से इसके रहनुमा अन्य राज्यों की राजनीति में उतरते जा रहे हैं उससे दिल्ली पर ध्यान देने का वक्त उनको नहीं मिल पाता है । उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के सामने अब बड़ी चुनौती है कि बाकी बचे तीन सालों में इन वादों में से कुछ को तो पूरा कर दिखाएं । 

Sunday, April 24, 2016

खुद से ज्यादा प्रबंधकों पर भरोसा

आजादी के बाद भारतीय समाज ने कई तरह के पड़ाव और बदलाव देखे- राजनीति से लेकर समाज तक में । अस्सी के दशक तक राजनेताओं को अपनी लोकप्रियता पर भरोसा था, जो लोकप्रियता उनके संघर्षों और विचारों से बनता था । अस्सी के दशक के बाद इसका क्षरण शुरू हुआ और अब लोकप्रियता बनाने में चुनावी प्रबंधकों की भूमिका प्रबल होने लगी । देश में इमरजेंसी के बाद साझा सरकारों का दौर शुरू हुआ तो नेताओं की लोकप्रियता छीजती चली गई । जवाहरलाल नेहरू जब देश के प्रधानमंत्री बने थे तो वो उस वक्त राजनीति के पिरामिड में सरदार पटेल, मौलाना आजाद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जी बी पंत, बी जी खेर, विधानचंद राय जैसे नेता शामिल थे । कालांतर में राजनीति का ये मजबूत पिरामिड कमजोर होता चला गया । क्षेत्रीय क्षत्रपों का उदय होने लगा । जैसे जैसे संचार माध्यमों का फैलाव शुरू हुआ तो नेताओं की अखिल भारतीय छवि और लोकप्रियता कमजोर पड़ने लगी । अब तो सोशल मीडिया और बेहतर तकनीक के सहारे एक बार फिर से नेताओं ने अपनी छवि मजबूत करनी शुरू की है । दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने प्रशांत किशोर को अपना रणनीतिकार बनाया था । तब प्रशांत किशोर ने भारतीय चुनाव में कई नए तरह के प्रयोग किए थे । चाय पर चर्चा से लेकर थ्री डी और होलोग्राम तकनीक से एक ही वक्त कई जगहों पर जनता से रू ब रू होने का कार्यक्रम काफी सफल हुआ था । इसके अलावा नरेन्द्र मोदी की मजबूत छवि को बेहद सतर्कता और रणनीति के तहत भारतीय वोटरों के सामने पेश किया गया था । नतीजा सबके सामने था । आजादी के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत से केंद्र में कोई गैर कांग्रेसी सरकार बनी । इसके बाद पिछले साल प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के लिए  मोर्चा संभाला । एक फिर नतीजा सबके सामने था । उस वक्त कहा गया था कि ये प्रशांत किशोर की रणनीति का हिस्सा ही था कि नीतीश कुमार ने जीती हुई विधानसभा सीट से कम सीटों पर लड़ना तय किया था और लालू यादव से हाथ मिलाया था । बिहारी बनाम बाहरी जैसा नारा गढ़कर प्रशांत ने बीजेपी को बैकफुट पर ला दिया था । इस वक्त हालात ये है कि प्रशांत किशोर सबसे बड़ी राजनीतिक कमोडिटी बन चुके हैं । बाजार का नियम बड़ी कमोडिटी की ओर निवेशकों को खींचता है । हर दल और उसके नेता प्रशांत किशोर को अपने चुनावी चाणक्य के रूप में देखना चाहता है । देश में राष्ट्रीयता और अंबेडकर के सिद्धांतों पर जारी विमर्श के कोलाहल के बीच कांग्रेस पार्टी ने पंजाब में विधानसभा चुनाव में पार्टी की वैतरणी पार करवाने का जिम्मा प्रशांत किशोर को सौंपा है । प्रशांत ने वहां कॉफी विद कैप्टन और पंजाब का कैप्टन जैसे कार्यक्रम शुरू कर दिए हैं । जो कांग्रेस पंजाब में आंतरिक कलह से जूझ रही थी वो प्रशांत किशोर के आने के बाद से सक्रिय नजर आने लगी है । आंतरिक कलह की खबरें कम हो गई हैं और अभी हाल ही में अकाली दल लोंगोवाल का विलय भी कांग्रेस में हुआ । विधानसभा चुनाव में कितनी सफलता मिलती है ये तो भविष्य के गर्भ में है और प्रशांत किशोर के लिए चुनौती भी है । नेताओं को अब जनता की बजाए तकनीक और चुनावी प्रबंधन के विशेषज्ञ स्थापित करने लगे हैं । चुनावी प्रबंधन के माहिर माने जाने वाले प्रशांत किशोर पर कांग्रेस ने बड़ी जिम्मेदारी डाली है । पंजाब के अलावा उनपर यूपी में कांग्रेस को खड़ा करने की जिम्मेदारी है । वहां उन्होंने काम करना भी शूरू कर दिया है और जिला स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच प्रश्नावली बांट दी गई है। कहा तो यहां तक जाता है कि प्रशांत किशोर पार्टी की हर अहम बैठक में भीमौजूद रहने लगे हैं ।  सवाल वही है कि नरेन्द्र मोदी, नीतीश कुमार के बाद क्या वो राहुल गांधी को दो हजार उन्नीस में सफलता का स्वाद चखा पाएंगें । 
सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी ने भी दिल्ली में चुनावी प्रबंधन से सफलता पाई थी । दिल्ली के हर विधानसभा की प्रोफाइलिंग करके रणनीति बनाई गई थी । दरअसल प्रोफाइलिंग का एक फायदा उम्मीदवार चुनने से लेकर स्थानीय मुद्दों को उठाने और नेताओं के भाषण आदि में मदद मिलती है । इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है क्षेत्र के डेमोग्राफी के हिसाब से मुद्दे तय किए जाते हैं । झुग्गियों में वहां के हिसाब से मुद्दे उठाए जाते हैं । दिल्ली विधानसभा चुनाव दो हजार तेरह के वक्त आम आदमी पार्टी ने ट्विटर और फेसबुक का तो इस्तेमाल किया ही था कई तरह के ऐप का भी इस्तेमाल किया था । इससे चंदा जुटाने से लेकर लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में मदद मिली थी । अब पंजाब में भी आम आदमी पार्टी ने अपने टेक्नोक्रैट दुर्गेश पाठक को लगाया है । दुर्गेश भी आंकड़ों के बाजीगर माने जाते हैं और चुनावी चक्रव्यूह रचने के उस्ताद हैं । पंजाब चुनाव में आम आदमी पार्टी को सबसे ज्यादा भरोसा व्हाट्सएप ग्रुपों पर है । वहां दर्जनों ग्रुप चल रहे हैं जिनसे उनके नेता जुड़े हुए हैं । यहां कई बार नेताओं को कार्यकर्ताओं से संवाद करने में मदद मिलती है । व्हाट्सएप ग्रुप्स में एक तरह की निजता भी होती है कि जितने लोग हैं वही संदेश प्राप्त कर सकते हैं या दे सकते हैं । इसी तरह से गोवा में आम आदमी पार्टी फेसबुक के जरिए अपनी सियासत को लोगों के बीच पहुंचा रही है । हर पार्टी की रणनीति का सोशल मीडिया एक आवश्यक तत्व है । नेताओं के ट्विटर फेसबुक पर सक्रिय रहने से कार्यकर्ताओं को दिशा मिल जाती है । सोशल मीडिया और आंकड़ों से खेलनेवाले लोगों का सबसे पहले इस्तेमाल अमेरिका के राष्ट्रपति बरात ओबामा ने अपने 2008 के चुनाव के वक्त किया था । 2007 के शुरुआती महीने में बराक ओबामा एक अनाम सीनेटर थे । लेकिन उनकी टीम ने जिस तरह से डेटाबेस तैयार किया था उससे उनको काफी लाभ मिला । उस वक्त अमेरिका में ओबामा के चुनाव अभियान को फेसबुक इलेक्शन भी कहा गया था । तब उनका ट्विटर आउटरीच काफी सफल रहा था । ओबाम की जीत के बाद अमेरिका के अखबारों ने लिखा था कि ये पहला राष्ट्रपति चुनाव है जो वेबस्पेस पर लड़ा और जीता गया । आंकड़ों और इलाकों की प्रोफाइलिंग करनेवाली उनकी टीम ने उनको सफलता दिलाई थी । अमेरिका से शुरू होकर ये भारत पहुंचा और यहां भी अबतक सफल रहा है ।
एक जमाना था जब हमारे देश के नेता जनता के बीच जाकर उनसे सीधा संवाद करते थे और अपने लिए वोट मांगते थे । अब भी वो जनता से सीधा संवाद ही कर रहे हैं लेकिन चुनावी प्रबंधकों और रणनीतिकारों ने राजनीति के बेसिक्स की चूलें कस दी हैं । अब तो आंकड़ों के बाजीगर नेताओं की उम्मीदवारी तय कर रहे हैं, रणनीति बना रहे हैं, आलाकमान को सलाह दे रहे हैं । नेताओं की लोकप्रियता और जनता से जुड़ाव आंकड़ों से तय हो रहा है । प्रशांत की सफलता के बाद इस तरह के रणनीतिकारों की मांग बढ़ गई है । अभी तो हमारे देश में इंटरनेट का फैलाव काफी कम है उस स्थिति की कल्पना करनी चाहिए जब इंटरनेट घनत्व पचहत्तर फीसदी से ज्यादा होगी । भारतीय राजनीति में यह पोलस्टर का बढ़ता दबदबा एक अहम बदलाव है जिसको रेखांकित किया जाना जरूरी है ।






Friday, July 4, 2014

भरोसे का छलात्कार

एक पार्टी है जिसका नाम है आम आदमी पार्टी । उसके नेता हैं अरविंद केजरीवाल । दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त देश के राजनीतिक क्षितिज पर धूमकेतु की तरह चमके थे । उसी चमक के आलोक में देश पर शासन का सपना देखने लगे थे । लोकसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस से ज्यादा लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए । जब चुनाव के नतीजे आए तो सबसे ज्यादा उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने का रिकॉर्ड बना । पार्टी के बनने के दो साल के पहले ही राजनीति का ये सितारा अस्ताचल की ओर क्यों चल पड़ा है । यह गंभीर मंथन और चिंतन की मांग करता है । राजनीतिशास्त्र के छात्रों के लिए केस स्टडी भी है । आम  आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के व्यक्तित्व के इर्द गिर्द बनी यह पार्टी उनकी ही महात्वाकांक्षा, जिद और दूसरे की नहीं सुनने की आदत का शिकार हो गई । मैंने पहले भी आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की सियासी चालों को परखते हुए कई लेख लिखे हैं । उन लेखों में इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि केजरीवाल की महात्वाकांक्षा और मैं सही बाकी सब गलत का एटीट्यूड पार्टी को ले डूबेगी । वही होता नजर आ रहा है । अरविंद केजरीवाल अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज हैं । कई लोग उनको अन्ना हजारे के आंदोलन का रणनीतिकार भी मानते हैं । होंगे भी । अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली में हुए आंदोलन के दौरान से लेकर अगर अब तक अगर केजरीवाल के कदमों का विश्लेषण किया जाए तो साफ है कि पारदर्शिता की बात करनेवाले केजरीवाल सियासत के माहिर और शातिर खिलाड़ी हैं और उतनी ही बातें सामने लाते हैं जितनी बातों से उनको लाभ होता है । जब अन्ना हजारे का आंदोलन चल रहा था तब भी केजरीवाल मंच से लगातार पारदर्शिता का दावा करते थे । अनशन के वक्त रामलीला मैदान के अनशन मंच से बार बार ये एलान किया जाता था कि सरकार से पर्दे के पीछे कोई बात नहीं चल रही है । बाद में माना कि सरकार से बैक चैनल से बात हो रही थी । जनता को सरकार से अपनी बातचीत के हर कदम की चीख चीख जानकारी देनेवाले अरविंद जनता से बिना बताए सरकार से बात कर रहे थे, यह उनका खुद का खुलासा है जो हैरान करनेवाला है । बाद में केजरीवाल ने अपनी इस सिसासी बिसात को और आगे बढ़ाया और कहा कि वो अहम फैसले जनता की राय से करेंगे । उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस के साथ सरकार बनाने के पहले रायशुमारी का दांव चला था । जोर शोर से प्रचारित किया गया था कि भारत में ये अपनी तरह का अनूठा प्रयोग है । लेकिन उसके पहले भी वो एक बार जनता से इस बाबत पूछ चुके थे कि क्या उन्हें कांग्रेस या यूपीए के खिलाफ प्रचार करना चाहिए या नहीं । उस वक्त भी हरियाणा के हिसार में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव प्रचार करने से पहले अरविंद केजरीवाल ने जनता से नहीं पूछा था । उस वक्त भी केजरीवाल कंपनी ने बगैर जनता से पूछे हिसार के उपचुनाव को लोकतंत्र का लिटमस टेस्ट घोषित कर दिया था । वहां कांग्रेस की हार को लोकतंत्र की जीत और भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस के खिलाफ जनता के गुस्से की परिणति के तौर पर पेशकिया था । दरअसल केजरीवाल या ये दोहरा रवैया बार बार दोहराया जाता रहा और बार बार जनता छली जाती रही । दिल्ली में सरकार बनाने से पहले रायशुमारी और छोड़ने का फैसला अकेले का । साथियों तक से न पूछा और ना उनकी राय मानी ।  
दरअसल अगर हम इस पूरे उठान और पतन का विश्लेषण करें तो देखते हैं कि अन्ना के दो अनशन की सफलता से उत्साहित टीम अन्ना को यह लगने लगा था कि पूरे देश की जनता उनके साथ है । भ्रष्टाचार से तंग आ चुकी जनता को अन्ना में एक उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी थी । नतीजे में लोग घरों से बाहर सड़कों पर निकले । वह मध्यवर्ग घरों से निकला जिनके बारे में यह माना जाता था कि आमतौर पर वह ड्राइंगरूम में बहस कर संतोष कर लेता है । लोगों ने बदलाव का एक सपना देखा था । अन्ना में उन्हें एक ऐसा भारतीय नजर आया था जो मंदिर में रहता है, जिसका कोई परिवार नहीं है । गांधी टोपी पहनता है । बदलाव की अकुलाहट में जनता ने उनको समर्थन दिया । बाद में टीम अन्ना खंड खंड होकर बिखर गई । अलग होनेवाले सभी साथियों ने केजरीवाल पर तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया था । जब केजरीवाल ने अन्ना से अलग होने का फैसला किया तो मीडिया का चतुराई से इस्तेमाल करते हुए टीम केजरीवाल नाम चलवा दिया । टूटी और बिखरी हुई टीम अन्ना के बरक्श टीम केजरीवाल खड़ी होने लगी । मीडिया के कैमरों और टेलीविजन के तरंगों पर सवार होकर टीम केजरीवाल और उनका संदेश घर घर तक पहुंचने लगा । कंसेंट मैन्युफैक्टर होने लगे । दिल्ली में बिजली पानी की बढ़ती कीमतों के खिलाफ केजरीवाल की मुहिम को समर्थन मिलने लगा । नेताओं को चोर लुटेरा कहने से बॉलीवुड फिल्मों की तरह उनकी सभाओं में तालियां बजने लगी थी । तालियों की गड़गड़ाहट ने केजरीवाल की महात्वाकांक्षाओं को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया । उन्हें लगने लगा कि ताकतवर लोगों को गाली देने से जनता उनपर खुश हो जाएगी । जनता की इसी खुशी को भुनाने के लिए केजरीवाल ने राजनीति के अलावा उद्योग जगत के लोगों को भी भ्रष्ट कहना शुरू कर दिया । पुराने उपलब्ध कागजातों के आधार पर सनसनीखेज खुलासों का दावा किया जाने लगा । अबतक मीडिया उनपर मेहरबान थी । बीजेपी नेता गडकरी अपने उपर लगे आरोपों के खिलाफ कोर्ट गए तो अपनी जिद में केजरीवाल को जेल जाना पड़ा । न्यायपालिका के आगे ना तो जिद चली और ना ही जेल जाने का सियासी ड्रामा हिट हो सका ।
दिल्ली का मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद केजरीवाल की आक्रामकता बढ़ने लगी थी । फिल्म नायक का किरदार हकीकत में दिखाई देने लगा था । सियासत इतना क्रूर होता है कि वहां फिल्मी किरदार और लटके झटके चलते नहीं हैं । उसपर से उस वक्त केजरीवाल से एक रणनीतिक चूक हो गई । दिल्ली में लोकपाल के मुद्दे पर उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया । लोकसभा चुनाव खत्म होने तक अपने पद छोड़ने को जायज ठहराते रहे । चुनाव में पार्टी की और खुद की करारी हार के बाद सचाई को स्वीकारते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए जनता से माफी मांगते हुए कह रहे हैं कि एक बार और मौका दें अब पद नहीं छोड़ूंगा । उनचास दिन के कार्यकाल में कई विवाद उठे । उन विवादों के बावत सवाल पूछ जाने पर उन्होंने मीडिया पर भी बिकने का आरोप लगा दिया । केजरीवाल की सबको बेईमान बताने से जनता उबने लगी थी । सबको बेईमान कहने में यह छुपा होता था कि वो ही ईमानदार हैं । लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी की कथित ईमानदारी को भी कई लोगों ने देखा ।

अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी में जनता ने जो भरोसा दिखाया था उसके साथ पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने छलात्कार किया । अब ना केवल भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की हवा निकल गई है बल्कि केजरीवाल की राजनीति भी चौराहे पर खड़ी है । उन्हें कहां जाना है इस बात को लेकर भ्रम में हैं । कभी दिल्ली में सरकार बनाने की कोशिश करते नजर आते हैं तो कभी चुनाव में जाने की बात करते हैं । अरविंद केजरीवाल को यह समझना होगा कि जनता भी उसी चौराहे पर खड़ी है जहां उनकी राजनीति खड़ी है । सबको बेईमान, चोर, लुटेरा कहने से राजनीति नहीं चलती । राजनीति का यथार्थ बेहद खुरदरा और रास्ता पथरीला होता है । अगर संभल कर नहीं चले तो लुढ़कने का खतरा रहता है, चुनाव नेता को करना होता है । 

Sunday, November 10, 2013

करिश्मे के केजरीवाल

एक पार्टी है आम आदमी पार्टी । उसके नेता है अरविंद केजरीवाल । केजरीवाल दिल्ली में विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं । उनका दावा है कि वो चुनाव जीतेंगे । वो अपने अलावा सभी को नेताओं को भ्रष्ट मानते हैं । पहले अन्ना हजारे के साथ थे । अब नहीं हैं । पहले अरुणा राय के साथ थे । अब नहीं हैं । पहले रामदेव और किरण बेदी के साथ थे । अब नहीं हैं । यह सूची उनके सार्वजनिक जीवन के महीनों की संख्या से लंबी है । केजरीवाल वैकल्पिक राजनीति का स्वप्न दिखाते हैं । वो सार्वजनिक जीवन में शुचिता और पारदर्शिता की बात करते हैं । भ्रष्टाचार के घुन से देश को बचाना चाहते हैं । वो गर्व के साथ ये ऐलान करते हैं कि उनकी आम आदमी पार्टी जाति, धर्म, संप्रदाय आदि आदि से अलग हटकर काम करती है । उन्होंने दिल्ली चुनाव के पहले ये भी ऐलान किया था कि विधानसभा क्षेत्र की जनता ही उम्मीदवारों का चुनाव करेगी । कुछ ऐसा दिखाने का यत्न भी किया गया । लेकिन कई विधानसभा क्षेत्र के उम्मीदवारों के नाम जनता की अदालत में जाने से पहले ही सामने आ गए । यह सब बताने का मकसद यह है कि अरविंद केजरीवाल जो भारतीय राजनीति में जरा अलग हटकर दिखने की युक्ति करते हैं दरअसल वो भी भारतीय राजनीति व्यवस्था का ही एक हिस्सा हैं सिर्फ अपनी पैकेजिंग अलग तरीके से की है । पैकेजिंग अलग होने के साथ साथ आकर्षक भी है जो बहुधा लोगों को पहली नजर में लुभाती भी है ।
जैसे जैसे दिल्ली चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है वैसे वैसे आम आदमी पार्टी की वैकल्पिक राजनीति की पैकेजिंग की असलियत सामने आने लगी है । अभी हाल ही में केजरीवाल ने बरेली जाकर विवादित मुस्लिम नेता तौकीर रजा से मुलाकात की । तौकीर रजा दो हजार दस के बरेली दंगों के दौरान भड़काऊ भाषण देने के आरोप में जेल की हवा खा चुके हैं । उसके पहले निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन के खिलाफ फतवा जारी कर उनको किताबें जलाने की नसीहत दे चुके हैं । पहले तो केजरीवाल ने बेहद मासूमियत से तौकीर रजा के अतीत के बारे में जानकारी होने से इंकार करते रहे । अब अपनी उस मुलाकात को संयोग से घटित होना बता रहे हैं । उनकी राय है कि तौकीर रजा बरेली इलाके के प्रतिष्ठित और सम्मानित शख्सियत हैं, लिहाजा वो उनसे मिलने चले गए । उधर मौलाना तौकीर ने कहा कि केजरीवाल उनसे मिलने उनके घर पर आए थे। मौलाना के मुताबिक चूंकि केजरीवाल बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ हैं लिहाजा उनके विचार मिलते जुलते हैं । वो केजरीवाल की सादगी पर भी फिदा हो गए । जब विचार भी मिले और शख्सियत भी पसंद आ जाए तो फिर समर्थन लाजमी है, सो मौलाना ने केजरीवाल को समर्थन का भरोसा दे दिया । यही भरोसा केजरीवाल की छवि की चमक को फीकी कर गया । सभी राजनीतिक दलों से अलग तरीके की राजनीति का दावा करनेवाले केजरीवाल भी वोट के लिए तुष्टीकरण के दलदल में जा घुसे । ये पहला मौका नहीं है जब केजरीवाल ने ऐसा किया है । अगस्त 2011 में अन्ना हजारे के रामलीला मैदान के अनशन के दौरान भी जब जामा मस्जिद के इमाम बुखारी ने उस आंदोलन को गैर इस्लामिक करार दिया था तो उसके बाद मंच पर टोपीधारी मुसलमानों की संख्या बढ़ी थी और रामलीला मैदान शाम की नमाज के बाद रोजा इफ्तार शुरू हुआ था । अन्ना आंदोलन पर किताब लिखनेवाले आशुतोष ने अपनी किताब में इस पूरे प्रसंग को सस्ता राजनीतिक हथकंडा करार दिया है । रामलीला मैदान में अन्ना हजारे का अनशन तुड़वाने के लिए भी एक दलित और एक मुस्लिम बच्ची का लाया गया था । संदेश साफ है । अरविंद केजरीवाल का हर कदम सोच समझकर एक संदेश देने के लिए उठता है । कुछ दिनों पहले बटला हाऊस एनकाउंटर पर भी सवाल खड़े हुए थे ।
दरअसल अगर हम अरविंद केजरीवाल की यात्रा को देखें तो एक बात साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है कि ये शख्स बेहद जल्दी में है । हो सकता है सत्ता पाने की भी जल्दी भी हो । अरविंद में लोगों को इस्तेमाल कर लेने की अद्भुत क्षमता भी है । जब लोकपाल के मुद्दे पर अरुणा राय ने उनको थोड़ा इंतजार की सलाह दी तो वो अन्ना हजारे को ढूंढ लाए । अन्ना की गांधी टोपी और निर्दोष व्यक्तित्व के सहारे आगे बढ़े । ना सिर्फ आगे बढ़े बल्कि अन्ना के आंदोलन के दौरान इस बात को भी योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया कि असल रणनीतिकार वही हैं । जब खुद को स्थापित कर लिया तो अन्ना नेपथ्य में चले गए । अन्ना के नेपथ्य में जाने के बाद अन्ना के आसपास के उन सभी लोगों को किनारे लगाना शुरू किया जो अन्ना के भी करीब थे और अरविंद केजरीवाल से बराबरी पर बात कर सकते थे । अन्ना आंदोलन में अरविंद के साथ हर मौके पर कंधे से कंधा मिलाकर चलनेवाली किरण बेदी हों या फिर अन्ना आंदोलन के दौरान पर्दे के पीछे से सोशल मीडिया संभालने वाले शिवेन्द्र सिंह हों सभी एक एक कर हाशिए पर धकेल दिए गए । ठीक उसी तरह से जिस तरह से इंदिरा गांधी ने अपने राजनैतिक प्रतिद्वदियों को किनारे लगा दिया । उनकी टोपी भी मैं अन्ना हूं से मैं आम आदमी हूं । बहुत संभव है कि चंद दिनों बाद उसपर लिखा हो- मैं केजरीवाल हूं ।  
अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीति की शुरुआत से ही बड़े लोगों के खिलाफ शक पैदा कर आगे बढ़ने की रणनीति अपनाई । खुलासा दर खुलासा किया । बड़े उद्योगपति से लेकर राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष के दामाद तक पर सनसनीखेज आरोप लगाए । एक से एक संगीन इल्जाम ।  उन आरोपों को अंजाम तक पहुंचाने की मंशा नहीं थी । तर्क ये कि जाचं का काम तो एजेंसियों का है । लेकिन क्या अपने आरोपों पर अरविंद ने कभी भी पलटकर सरकार से ये पूछने कि कोशिश की कि क्या हुआ । वो सिर्फ सनसनी के लिए थे लिहाजा वो सनसनी पैदा कर खत्म होते चले गए । तात्कालिक फायदा यह हुआ कि अरविंद केजरीवाल देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ योद्धा के तौर पर स्थापित होते चले  गए । लोगों के मन में एक उम्मीद जगी कि ये शख्स अलग है । कुछ कर दिखाना चाहता है । लेकिन तौकीर रजा से समर्थन मांग कर अरविंद केजरीवाल देश के बाकी अन्य दलों के साथ उसी कतार में खड़े हो गए जो वोट की खातिर कुछ भी कर सकता है । कहीं भी जा सकता है । उसे चाहिए बस वोट जो सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी की बुनियाद मजबूत कर सके । दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले इस तरह की रणनीतिक चूक केजरीवाल पर कितना भारी पड़ेगा इसके लिए हमें आठ दिसंबर तक इंतजार करना पड़ेगा जिस दिल्ली चुनावों के नतीजे आएंगे । तब तक के लिए एक सपने के टूटने और छले जाने की टीस दिल में रह रहकर हूक बनकर उठती रहेगी ।