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Saturday, August 8, 2026

संप्रुभता को डिजीटल चुनौती


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फेसबुक पर की गई पोस्ट को थोड़े समय के लिए हटाने के लिए फेसबुक चलानेवाली कंपनी मेटा ने भारत सरकार से माफी मांग ली है लेकिन इससे पूरा प्रकरण समाप्त नहीं हो जाता। इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले प्लेटफार्म्स के बारे में गंभीरता से विचार ही करने और एक ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है। जंतर-मंचर पर छात्रों के नाम पर जो आंदोलन हुआ और उसमें इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका रही उसपर राष्ट्रव्यापी बहस की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की व्यंग्यात्मक टिप्पणी के बाद अमेरिका में बैठा एक व्यक्ति काकरोच जनता पार्टी के नाम से इंस्टाग्राम हैंडल बनाता है। 78 घंटे में इस हैंडल को तीस लाख फालेवर्स मिल जाते हैं। कुछ और समय में ये संख्या दो करोड़ बीस लाख तक पहुंच जाती है। इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि क्या आर्गेनिक रूप से इतने फालोवर्स इतने कम समय में किसी भी हैंडल को मिल सकते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध विभिन्न स्त्रोतों के अनुसार भारत में इंस्टाग्राम पर करीब 55 करोड़ सक्रिय उपभोक्ता हैं। इस समूह में सबसे बड़ी संख्या 25-34 आयुवर्ग के उपभोक्ताओं की है और उसके बाद 18-24 वर्ष के यूजर्स है। इलके अलावा भारत में फेसबुक के करीब 70 करोड़ यूजर्स हैं। व्हाट्सएप का प्रयोग करनेवाले 85 करोड़ लोग हैं। ये तीनों प्लेटफार्म मेटा कंपनी के अंतर्गत आते हैं। मेटा अमेरिका की कंपनी है। 

इस पृष्ठभूमि में जंतर मंतर पर जुलाई में हुए काकरोच जनता पार्टी के धरने को देखते हैं। दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना आरंभ होता है। बहुत समर्थन नहीं मिलता है। काकरोच जनता पार्टी के लोग पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर मंतर पर लाते हैं। उनके अनशन पर बैठने के बाद उनके स्वास्थ्य को लेकर चर्चा होती है। काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को समर्थन मिलने लगता है लेकिन अपेक्षित नहीं। इंटरनेट मीडिया विशेषकर इंस्टाग्राम पर इस आंदोलन को लेकर रील आदि दिखने लगते हैं। काकरोच जनता पार्टी 20 जुलाई को संसद मार्च की घोषणा करती है। अनशन के कारण सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने लगती है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर रीलों की संख्या बढ़ने लगती है। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस सोनम वांगचुक को जंतर मंतर से उठाकर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करवा देती है। सुबह हुए पुलिस एक्शन की खूब सारी रीलें और वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल होती हैं। उन अकाउंट्स पर भी ये रीलें दिखने लगती हैं जो कभी इस तरह की रील नहीं देखते थे। मेरे एक मित्र ने बताया कि वो सिर्फ फिल्मों और पर्यटन से जुड़ी रीलें देखते थे लेकिन उन दिनों उनके वाल पर जंतर मंतर की ही रीलें दिखती थीं। आमतौर पर ये माना जाता है कि इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म एक अल्गोरिथम से काम करता है और आप जिस तरह का वीडियो देकते हैं उसी तरह के वीडियो आपको दिखाता है। सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती करवाने के बाद उन अकाउंट्स पर भी जंतर मंतर से संबंधित वीडियो दिखने लगे थे जिनकी रुचि इनमें नहीं थी। रीलों  के माध्यम से माहौल बनाया जाने लगा। इसके बाद ही जंतर मंतर पर भीड़ बढ़ने लगी थी। ये कसेंट मैनुफैक्चरिंग का उदाहरण है। इंटरनेट मीडिया के माध्यम से आंदोलन को गति दिया जाने लगा। 

इंटरनेट मीडिया के माध्यम से साइकोलाजिकल टेकओवर आफ पालिटिकल कंज्यूमर का खेल आरंभ हो चुका था। बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से किसी के भाषण का अंश, सोनम वांगचुक को अनशन स्थल से उठाकर ले जाने का विजुअल, किशोर छात्रों का सरकार के विरुद्ध बयान रील के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंचने लगे थे। भारत में यह एक नए तरह का प्रयोग था। इसके पहले विश्व के कई देशों में इस तरह के प्रयोग हो चुके हैं। बंग्लादेश और नेपाल में तो हाल ही में ऐसा हुआ था। योजना इस तरह से बनाई जाती है कि पहले कोई मुद्दा उठाया जाता है। इस बार पेपर लीक को मुद्दा बनाया गया। पेपर लीक ऐसा मुद्दा है जिससे युवा वर्ग सीधे जुड़ता है। इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में सत्ता विरोधी माहौल बनाया जाने लगा। शासक को तानाशाह बताकर उसकी छवि गढ़ने का प्रयत्न किया गया। डिजीटल के माध्यम से इस तरह के बयानों को प्रसारित और प्रचलित करवा कर इस छवि को गाढ़ा करवाया जाता है। सारा खेल लोकतंत्र को बचाने की आड़ में खेला जाता है। 

नेपाल और बंगलादेश के अलावा 2010 में मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में अरब स्प्रिंग का खेल हुआ था। 17 दिसंबर 2010 में ट्यूनीशिया में हुई घटना को याद करने की आवश्यकता है। एक ठेलेवाले के साथ हुए दुर्वव्यवहार पर विरोध का स्वर उठा। पूरे देश में ये इतनी तेजी से फैला कि वहां के राष्ट्रपति को 14 जनवरी 2011 को देश छोड़कर भागना पड़ा। ये सिर्फ ट्यूनीशिया की कहानी नहीं है। ऐसा कई देशों में हुआ। सब जगह सत्ता परिवर्तन की स्क्रिप्ट एक जैसी है। 2024 के चुनाव में जिस तरह से चुनाव प्रचार के दौरान इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स ने अपना अलगोरिथम बदला, जिस तरह से मोदी विरोधियों को प्रमुखता मिली वो एक अलग शोध की मांग करता है। डिजीटल और सोशल सेक्टर को साथ लेकर सरकार बनाने और गिराने का अंतराष्ट्रीय खेल खेला जाता है उसके बारे में चर्चा होनी चाहिए। भारत में भी बार-बार वो शक्तियां इस तरह का षडयंत्रकारी खेल रचती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी को तानाशाह बताया गया। नागरिक अधिकारों की कटौती और संविधान बदलने जैसे विमर्श केंद्र में आए। मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद ये वैश्विक ताकतें निष्क्रिय नहीं हुई हैं। निरंतर सरकार विरोधी माहौल बनाने में जुटी हैं। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इन वैश्विक ताकतों को लगता है कि भारत को कमजोर करने का यही तरीका है कि चुनी हुई सरकार के खिलाफ जनता में आक्रोश पैदा करो। इसके लिए वो छात्रों का और तथाकथित सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं को औजार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। 

इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका की चर्चा 2020 के अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी हुई थी। ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव लड़े और हारे थे। चुनाव के दरान ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को कुछ समय के लिए सस्पेंड किया गया था। चुनाव परिणाम के बाद ट्विटर (अब एक्स) ने डोनाल्ड ट्रंप के हैंडल पर बैन लगा दिया था। ट्रंप ने अपना प्लेटफार्म ट्रूथ सोशल लांच किया था। बाद में उनके समर्थक एलन मस्क ने ट्विटर खरीद लिया था और ट्रंप के अकाउंट से बैन हटाया था। ट्विटर नाम एक्स हुआ। ये अनायास नहीं है कि चीन इस तरह के प्लेटफार्म्स को अपने देश में घुसने नहीं देता। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स के बढ़ते दायरे के कारण भारत में उनका प्रभाव काफी बढ़ गया है। उनके पास उपभोक्ताओं की सारी जानकारी है। वो जब चाहें जिसको चाहें अपना मनचाहा कंटेंट दे सकते हैं। ये विशेष आयुवर्ग के लोगों को लक्षित कर दिया जा सकता है, विशेष भौगोलिक क्षेत्र को लक्षित कर दिया जा सकता है। यह एक नए तरह का उपनिवेशवाद है जो किसी भी देश की संप्रभुता पर आक्रमण करता है। इसके लिए राजनीतिक दल मायने नहीं रखते हैं। मायने रखती है अपना कारोबारी हित। सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि इस तकनीकी नवउपनिवेशवाद से राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा की जा सके। 


Thursday, February 24, 2022

चुनाव प्रचार में तकनीक का बोलबाला


उत्तर प्रदेश विधानसभा के चार चरणों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। पहले दो चरण के चुनाव पर कोरोना महामारी की छाया रही और ज्यादातर चुनाव प्रचार आभासी माध्यमों के जरिए हुए। बाद में चुनाव का पारंपरिक रंग देखने को मिला। इस चुनाव में एक नया ट्रेंड देखने का मिला वो है इंटरनेट मीडिया और तकनीक का चुनाव प्रचार में उपयोग। 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार देश की जनता ने तकनीक का कमाल देखा था। उस वक्त नरेन्द्र मोदी ने पहली बार अपने चुनाव प्रचार के दौरान होलोग्राम तकनीक का उपयोग किया था। इस तकनीक में वो अपने निवास से जमसभा को संबोधित करते थे, न्यूज चैनलों के स्टूडियो में लाइव दिखाई देते थे। इससे समय की बचत होती थी। उस चुनाव में फेसबुक और ट्विटर का भी उपयोग हुआ था। चुनाव में तकनीक का उपयोग उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी देखने को मिल रहा है। इस बार प्रचार में ट्विटर के स्पेसेज का जमकर उपयोग हो रहा है। इसमें किसी भी ट्वीटर हैंडल से आडियो के जरिए कहीं से भी जुड़ा जा सकता है। किसी भी विषय पर चर्चा आयोजित की जा रही है। हर दिन शाम को ट्विटर स्पेसेज पर राजनीतिक चर्चा सुनी जा सकती है। नेता और राजनीतिक दलों से जुड़े लोग अपने घर से या यात्रा के दौरान भी स्पेसेज पर जनता के सामने अपनी बात रखते हैं। स्पेसेज आयोजित करनेवाला होस्ट किसी को भी बोलने की अनुमति दे सकता है। चुनाव के आंरंभिक काल से ही बीजेपी उत्तर प्रदेश के हैंडल से नियमित अंतराल ट्विटर स्पेसज पर आयोजित हो रहा है। अलग अलग राजनीतिक दल भी स्पेसेज आयोजित करते हैं।

ट्विटर की कंटेंट पार्टनरशिप की इंडिया प्रमुख अमृता त्रिपाठी के मुताबिक स्पेसेज की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और संस्थान, राजनीतिक दल और पत्रकार भी इसका उपयोग राजनीतिक चर्चा के लिए कर रहे हैं। अमृता ने बताया कि ट्विटर भी लगातार अपनी इस सेवा में नए नए फीचर जोड़ने पर काम कर रहा है। ट्विटर स्पेसेज पर होनेवाली चर्चा को अब रिकार्ड भी किया जा सकता है ताकि बाद में भी लोग चर्चा को सुन सकें। स्पेसज पर आयोजित चर्चा को शेड्यूल भी किया जा सकता है और आयोजन का समय और विषय आयोजक के हैंडल पर चर्चा आरंभ होने तक दिखता है। ट्विटर के प्लेटफार्म पर आयोजित चर्चा में जितने लोग जुड़े दिखाई देते हैं उससे कहीं अधिक लोग उसे सुन रहे होते हैं। इसको इंटरनेट पर भी सुना जा सकता है जो संख्या चर्चा के दौरान दिखती नहीं है। इस प्लेटफार्म को आभासी चौपाल कहा जा सकता है। ट्विटर के अलावा फेसबुक रूम पर भी राजनीतिक चर्चा सुनी जा सकती है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान क्लबहाउस की लोकप्रियता भी दिखी थी। इस ऐप के जरिए उस समय राजनीतिक चर्चा और नेताओं से संवाद के कई कार्यक्रम हुए थे।

चुनाव के दौरान मैसेजिंग प्लेटफार्म का भी खूब उपयोग हो रहा है। व्हाट्सएप, टेलीग्राम और सिग्नल पर संदेशों और इमोजी का आदान-प्रदान पुरानी बात हो गई है। उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड, गोवा  आदि राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान मैसेजिंग एप पर राजनीतिक संदेशों वाले स्टिकर और जीआईएफ का प्रयोग देखने को मिला। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की भिन्न-भिन्न मुद्राओं वाले स्टिकर उपयोग में लाए जा रहे हैं। इन स्टीकरों ने चुनाव चिन्ह वाले बैज और बिंदी का स्थान ले लिया है। तकनीक के प्रयोग ने चुनाव प्रचार को एक नया आयाम प्रदान किया है।    



Saturday, June 6, 2020

साहित्य के ‘लाइव काल’ का संकट

कोरोना वायरस के संकट के बीच जब पूर्ण लॉकडाउन चल रहा था और साहित्यिक सभाएं और गोष्ठियां बंद हो गई थीं, तो हिंदी साहित्य से जुड़े लेखकों ने फेसबुक पर एकल गोष्ठियां करनी शुरू कर दीं। कई साहित्यिक संस्थाओं और प्रकाशकों ने भी हिंदी की विभिन्न विधाओं के लेखकों का लाइव करना शुरू किया। धीरे धीरे तो ऐसा लगा कि संपूर्ण हिंदी साहित्य लाइव मोड में ही आ गया है। हर समय किसी ने किसी फेसबुक पेज पर या लोगों के व्यक्तिगत अकाउंट पर लाइव करते लेखक नजर आने लगे। जब भई आप अपने फेसबुक अकाउंट में लॉगइन करें तो आपकी टाइमलाइन पर लाइव होता दिखने लगा। क्या युवा, क्या अधेड़, क्या बुजुर्ग, सभी वय के लेखक फेसबुक पर अपनी मन की बात करते नजर आने लगे। कुछ लेखकों ने तो दिन में दो वक्त लाइव करना शुरू दिया। फेसबुक पर साहित्यिक लाइव की मानो बाढ़ सी आ गई। इस स्थिति को देखते हुए यह भी कहा गया कि आज अगर नामवर सिंह जीवित होते तो बेहद खुश होते क्योंकि जिस वाचिक परंपरा को उन्होंने अपनाया और लेखन को छोड़कर व्याख्यान की ओर गए उसको पल्लवित और पुष्पित होते देखकर वो आनंद से भर उठते। लेकिन कोरोना संकट के इस दौर में लेखकों के लाइव को देखने के बाद एक महत्वूपूर्ण तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। दरअसल आभासी माध्यम बेहद पारदर्शी है, वो हाथ के हाथ ये बता देता है कि आपको कितने लोग सुन रहे हैं या आपके लाइव का वीडियो कितने लोगों तक पहुंचा। तो हम जिस महत्वपूर्ण तथ्य की बात कह रहे थे वो ये कि बुजुर्ग और वरिष्ठ लेखकों को सुनने के लिए ही ज्यादा श्रोता या दर्शक फेसबुक पर पहुंचे। इनकी तुलना में युवाओं को बहुत ही कम दर्शक या श्रोता मिले। लगभग नगण्य। हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ऊषाकिरण खान हों या मैत्रेयी पुष्पा या फिर विनोद कुमार शुक्ल या अशोक वाजपेयी ही क्यों न हों, इनको उन युवा लेखकों के मुकाबले ज्यादा लोगों ने सुना और देखा जो खुद को साहित्य का सितारा मानते हैं। अगर इस संख्या को लोकप्रियता का पैमाना माना जाए तो हमारे वरिष्ठ लेखक अब भी युवाओं पर भारी हैं। हिंदी साहित्य की आभासी दुनिया में जो भी उपस्थिति हो उसको ही पैमाना मानें तो ये बात और स्पष्ट हो जाती है। बहुत कम युवा लेखक ऐसे रहे जिनको सुनने के लिए सौ दर्शक फेसबुक पर लाइव जुड़े या फिर बाद में उनके वीडियो की पहुंच एक हजार लोगों तक हुई। साहित्य के भविष्य के लिए यह बहुत ही चिंता की बात है।
इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि हमारे युवा लेखक जो खुद को साहित्य का सितारा मानते हैं, श्रेष्ठता बोध इतना कि वो अपने आगे न तो रामचंद्र शुक्ल को कुछ मानते हैं और न ही प्रेमचंद को। एक वाक्य बोलकर या लिखकर अपने पूर्वज लेखकों का सब किया धरा लीप-पोत कर रखने की कोशिश करते हैं। हिंदी साहित्य के इसी लाइव काल में फेसबुक पर एक निरर्थक बहस चली जिसमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल को लेकर न सिर्फ अनाप-शनाप कहा गया बल्कि उनके योगदान को खारिज करने जैसी बातें भी हुईं। रामचंद्र शुक्ल को खारिज करने के लिए कम से कम उनका लिखा पढ़ना आवश्यक है। बगैर रामचंद्र शुक्ल को पढ़े, सुनी सुनाई बातों के आधार पर और उनके नाम में लगे शुक्ल के आधार पर उनपर हमले किए गए। जिन लोगों ने भी रामचंद्र शुक्ल पर हमले किए या उनके साहित्यिक अवदान को न्यूनतम बताने की कोशिश की उनकी टिप्पणियां बेहद स्तरहीन और मूर्खतापूर्ण थीं। शुक्ल जी को कबीर विरोधी करार देनेवाले फेसबुक वीर अतिउत्साह में शुक्ल जी को ब्राह्मणवादी आलोचक तक करार देने में नहीं हिचके। काशी हिंदू विश्वविद्लय से जब हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को जाना पड़ा था तब वो कुछ पंक्तियां कहा करते थे, उनमें से एक पंक्ति क्षमा सहित थोड़े बदलाव के साथ कि ‘वे द्विज और होंगे जो उल्लू के नखों की चोट से घायल हो जाते हैं।‘ 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की स्थापनाओं पर प्रश्न खड़े करने के लिए नामवर सिंह को भी ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी पुस्तक लिखनी पड़ी लेकिन उसमें भी नामवर सिंह ने बहुत संभलकर शुक्ल जी की आलोचना की। उद्धरणों के सहारे ही शुक्ल जी के लेखन पर सवाल उठाए। कई युवा लेखक आत्ममुग्धता में इतने पर भी नहीं रुकते हैं बल्कि वो इस बात में गौरव महसूस करते हैं कि वो हिंदी परंपरा को नहीं जानते हैं। वो बहुत गर्व से कहते हैं कि वो पंत और महादेवी को नहीं जानते या सिर्फ इतना जानते हैं कि वो हिंदी में ‘कुछ’ लिखते थे। इस तरह की टिप्पणियां अहंकारी लग सकती हैं पर दरअसल ये अज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन है। अस्वीकार का साहस भी उन लेखकों के पास ही होता है जिसे अपनी परंपरा का ज्ञान होता है। नामवर सिंह ने भी दूसरी परंपरा की खोज लिखा था तो उसकी भूमिका में उल्लेख किया था, ‘अनपेक्षित प्रसंग वे कहे जा सकते हैं जहां अन्य विद्वानों की आलोचना है, लेकिन उसके बिना द्विवेदी जी के वैचारिक संघर्ष का संदर्भ अस्पष्ट और अमूर्त रह जाता। इसलिए शिष्टता पर स्पष्टता को तरजीह क्षम्य होनी चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि पूर्वपक्ष के ऋषि कुछ कम पूज्य नहीं-यह एहसास मुझमें है। लेकिन इन दिनों तो शिष्टता पर मूर्खता को तरजीह मिल रही है।‘ यह भी एक वजह हो सकती है कि जिससे उन युवा लेखकों को दर्शक या श्रोता नहीं मिल पा रहे हैं जिनको हिंदी साहित्य की परंपरा का ज्ञान नहीं है इसलिए जब वो विषय विशेष को उठाते हैं तो उसमें न तो गंभीरता रहती है और न ही कोई ऐसा रोचक प्रसंग जो दर्शक या श्रोता को समृद्ध कर सके। दरअसल लाइव अपने श्रोताओं से पाठकों से या दर्शकों के समझ जाना और उनको बांधे रखना एक अलग ही किस्म की कला है। या तो आपकी वक्तृत्व कला ऐसी हो जो दर्शकों को बांध सके या फिर आपके कहने में ऐसा कंटेंट हो जिसको सुनने के लिए लोग वक्ता के साथ जुड़े रह सकें। इन दोनों ही कसौटी पर हमारे दौर के वरिष्ठ लेखक युवाओं पर भारी पड़ते हैं।
किसी भी साहित्य में चलने वाले विमर्श, साहित्यकारों के बीच के नोंक-झोंक, हास परिहास और रचनात्मक आक्रमण उसकी जीवंतता को भी इंगित करते हैं लेकिन अगर फेसबुक पर चलनेवाले इन लाइव को हिंदी साहित्य का विमर्श मान लें तो जीवंतता कम आत्ममुग्धता ज्यादा दिखाई देती है। इसके अलावा एक और प्रवृत्ति है जिसको भी रेखांमकित करना आवश्यक है वो है युवा लेखकों में अपनी रचनाओं की कमी के बारे में सुनने का धैर्य नहीं होना। अपनी रचना में कमी या कमजोरी को वो सुनना नगीं चाहते हैं और अगर कोई वरिष्ठ साहित्यकार इस ओर ध्यान दिलाना चाहता है तो वो अपने मित्रों के साथ उनपर ही टूट पड़ते हैं। आलोचना और आलोचक को लेकर एक अजीब किस्म की उदासीनता और उपेक्षा का भाव दिखाई देता है। ज्यादातर युवा लेखक फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को आलोचकों की जगह रखते हैं और इसको लिखकर स्वीकार भी करते हैं। नतीजा यह है कि अभी अभी लिख रही युवा पीढ़ी का कोई अपना आलोचक तैयार नहीं हो सका जो उनकी रचनाओं के अर्थ खोलकर पाठकों तक पहुंचा सके। ऐसी परिस्थिति में अगर कोई युवा लेखक अपनी रचना को लेकर पाठकों के बीच भी जाता है और लाइव करता है तो उसको भी अपेक्षित संख्या नहीं मिल पाती है। इन स्थितियों पर विचार करने से स्थिति स्पष्ट होगी। 

Sunday, February 5, 2017

फेसबुक की सफलता की परीकथा

कौन जानता था कि तेरह साल पहले हॉवर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए बनाई गई बेवसाइट फेसबुक पूरी दुनिया में इस कदर छा जाएगी कि वो संचार के वैकल्पिक साधन के तौर पर उपयोग में आने लगेगी । तेरह साल के सफर में ही करीब हर महीने दो अरब सक्रिय उपभोक्ताओं के साथ फेसबुक की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है । फेसबुक ने पिछली तिमाही के जो आंकड़ें जारी किए उसके मुताबिक सवा अरब लोग हर दिन फेसबुक पर सक्रिय रहते हैं । आज फेसबुक पूरी दुनिया की करीब सत्तर भाषाओं में उपलब्ध है और हर दस मिनट में करीब एक लाख फ्रेंड्स रिक्वेस्ट का आदान प्रदान होता है और औसतन करीब तीन लाख हर मिनट पर अपना स्टेटस अपडेट करते हैं । यही नहीं प्रति मिनट फेसबुक पर कमेंट करनेवालों की संख्या भी पांच लाख से उपर है और हर सेकेंड 8 नए उपभोक्ता फेसबुक से जुड़ते हैं । ये आंकड़े काल्पनिक लग सकते हैं लेकिन इसको हाल ही में फेसबुक ने खुद ही जारी किया है । दरअसल अगर हम देखें तो तेरह साल में सफलता की यह कहानी किसी परीकथा जैसी लगती है । चार फरवरी दो हजार चार को मार्क जुकरबर्ग, डस्टिन मोस्कोविज, क्रिस ह्यूसेस, एंड्र्यू मैकलम और एडुवर्डो सेवरिन के साथ मिलकर फेसबुक की औपचारिक शुरुआत की थी । औपचारिक शुरुआत के करीब तीन महीने पहले नार्क जुकरबर्ग ने हॉवर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए फेसमास ने एक साइट बनाई थी । फेसमास के लॉंच होने के चार घंटे के अंदर ही करीब पांच सौ विजिटर वहां पहुंचे जिन्होंने बीस हजार से ज्यादा फोटो देखा । फेसमास की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसपर प्रतिबंध लगा दिया लेकिन जुकरबर्ग और उनके साथियों ने इसकी सफलता की आहट को भांप लिया था और फेसमास पर पाबंदी के तीन महीने के अंदर ही उन्होंने फेसबुक नाम से सोशल नेटवर्किंग साइट की शुरुआत कर दी । बाकी बातें तो इतिहास हैं ।
अब फेसबुक सोशल नेटवर्किंग साइट से आगे बढ़कर दूसरे स्तर पर जाना चाहता है और उसके ही प्रयास में है । इन दिनों फेसबुक पर वीडियो की भरमार दिखाई देती है । फेसबुक अन्य बेवसाइट्स को उनके पेज पर किसी भी इवेंट को लाइव करने की सहूलियत प्रदान करने लगा है। फेसबुक के करीब उनासी फीसदी उपभोक्ता मोबाइल के माध्यम से वहां सक्रिय रहते हैं । फेसबुक को इसमें अपार संभावना नजर आई और उसने उपभोक्ताओं को मोबाइल से किसी भी घटना को लाइव करने या फिर सीधे अपना वीडियो पोस्ट करने की सहूलियत दे दी । वीडियो और लाइव करने की इस सहूलियत ने फेसबुक पर लाइक्स की संख्या बहुत बढ़ा दी। अब हर मिनट फेसबुक पर पांच लाख लाइक्स के बटन दबते हैं । लाइक्स के बटन के साथ फेसबुक ने लव, हा-हा, वाऊ, सैड और एंग्री के बटन दिए जिसने उपभोक्ताओ के ट्रैफिक को बढ़ाया । दरअसल फेसबुक अब वीडियो को तरजीह देकर यूट्यूब से पिछड़ने की भारपाई करना चाह रहा है । फेसबुक के लगभग साल भर बाद ही शुरु हुए यूट्यूब ने वीडियो का खजाना बनाकर इससे बहुत पैसा कमाया । पिछले दो तीन सालों से फेसबुक किसी ना किसी तरह से यूट्यूब को मात देने की जुगत में लगा है । अभी जियो के फ्री डाटा ऑफर और उसके बाद अन्य मोबाइल कंपनियों के डाटा दर में कमी के बाद फेसबुक की सही रणनीति ने उसकी पहुंच बहुत बढ़ा दी है । फेसबुक की चौथी तिमाही की रिपोर्ट में इस बात का माना भी गया है कि फ्री डाटा की वजह से उसको फायदा हुआ है । टेक्सट से ज्यादा वीडियो को तरजीह देने और फ्री डाटा की वजह से फेसबुक को इस तिमाही में इक्यावन फीसदी का मुनाफा हुआ । फेसबुक अब भारत के गावं गांव में पहुंच रहा है क्योंकि उन इलाकों में इंटरनेट का घनत्व बढ़ रहा है और सस्ते स्मार्टफोन लोगों की मुट्ठी में आ गए हैं । हमारे देश में जिसके हाथ में स्मार्ट फोन है लगभग उन सभी के पास फेसबुक भी है ।
हाल ही में हुए एक सर्वे के मुताबिक फेसबुक के उपभोक्ता हैं सप्ताह में एक बार कोई ना कोई वीडियो अवश्य देखते हैं । मोबाइल ओनली की अवधारणा को अपने विस्तार का आधार बनाने वाली फेसबुक ने माना है कि भारत उसके लिए सबसे मजबूत बाजार है जहां विस्तार की अपार संभावनाएं हैं । अब फेसबुक वीडियो से आगे जाकर इसको टीवी में बदलना चाहता है । उसकी योजना के मुताबिक वो अपने प्लेटफॉर्म पर ग्राहकों को टीवी की सहूलियत देना चाहती है लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइट से टीवी में बदलना या टीवी की सहूलियतें देना इतना आसान नहीं है । टीवी चलानेवाले लोग भी फेसबुक कई इस योजना के बाद सतर्क हो गए हैं और उन्होंने भी अपने ग्राहकों, उपभोक्ताओं के टीवी देखने के पैटर्न का विश्लेषण कर आवश्यक बदलाव करने शुरू कर गिए हैं । खबरों के लिए फेसबुक का सहारा नहीं लिया जा सकता है । फेसबुक ने भले ही लोगों के अकाउंट वेरीफाई किए हैं लेकिन खबरों की सत्यता जांचने का कोई टूल अभी विकसित नहीं हुआ है । फेसबुक को अगर टीवी की जगह लेनी है तो उसको कोई ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जिसमें साख पर सवाल ना उठे ।


Wednesday, December 23, 2015

आतंक से मुक्त हो सोशल साइट्स

देश में इंटरनेट के फैलाव के बाद तेजी से सोशल मीडिया ने अपने पांव-पसारे हैं । शहरों से लेकर गांवों तक में फेसबुक के कंज्यूमरों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है । ट्विटर के यूजर्स भी लगातार बढ़ रहे हैं । प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के मंत्रियों और विभागों के ट्विटर पर सक्रिय होने की वजह से आम आदमी के बीच भी इस माध्यम को लेकर उत्सुकता बढ़ी है । इसका नतीजा यह हुआ है कि फेसबुक और ट्विटर हमारे देश के गांवों तक अपनी पैठ बनाने में कामयाब हो चुका है । स्मार्ट फोन और इंटरनेट पैक के सस्ता होने से भी फेसबुक की लोकप्रियता में खासा इजाफा हुआ है । डिजीटल क्रांति के इस दौर में ये बेहतर है कि हम भी दुनिया के अन्य देशों की तरह ही सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म का उपयोग करने में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं । लेकिन इस मीडिया के अपने खतरे भी हैं । इन खतरों से सचेत रहने और उसको रोकने की दिशा में भी कदम उठाने की आवश्यकता है । अभी हाल ही में खबर आई कि जयपुर में रहने वाला एक तीस साल का मार्केटिंग मैनेजर खूंखार आतंकवादी संगठन आई एस के संपर्क में था और उसके लिए काम कर रहा था । उसकी गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में ये बात सामने आई कि वो देश के युवाओं को सोशल मीडियाके माध्यम से प्रतिबंधिक आतंकवादी संगठन आई एस में भर्ती करने का काम कर रहा था । उसके फेसबुक पर अपनी कई फेक आईडी बनाई हुई थी जिसके मार्फत वो हजारों लोगों के संपर्क में था और आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दे रहा था । वो ना केवल फेसबुक पर सक्रिय था बल्कि व्हाट्स एप और टेलीग्राम जैसे नेटवर्किंग टूल्स का भी इस्तेमाल कर रहा था । वो फेसबुक पर डायरी ऑफ अ मुजाहदीन के नाम से एक पेज भी चला रहा था । इस पेज के माध्यम से वो सिस्टम से खपा युवकों की तलाश कर उसको आतंकवादी बनाने की कोशिश करता था । पुलिस की आगे की जांच में पता चलेगा कि उसके मंसूबे क्या थे लेकिन जो जानकारियां छन कर आ रही हैं उसके हिसाब से उसके मंसूबे बेहद खतरनाक थे । इसी तरह से पुणे की एक सोलह साल की लड़की को आई एस ने अपने चंगुल में ले लिया । कॉंन्वेंट स्कूल की छात्रा को आई एस के श्रीलंका के एक ऑपरेटिव ने पहले अपने चंगुल में फंसाया और फिर उससे फेसबुक और ट्विटर के जरिए उसका ब्रेनवॉश शुरू हो गया । उसके बाद कई मैसेज इस बात की पुष्टि करते हैं कि आई एस ने उस नाबालिग लड़की को सीरिया में आतंकवादी संगठन ज्वाइन करने के लिए राजी कर लिया था और वो चंद दिनों बाद वहां जाने को तैयार हो गई थी । इससे भी खतरनाक बात यह हुई कि जब से वो आई एस के आतंकवादियों के संपर्क में आई तो उसने जीन्स और शर्ट पहनना छोड़कर बुर्का पहनना शुरू कर दिया । ये दो उदाहरण है कि किस तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर आतंकवादी संगठन हमारे देश में पांव पसार रहे हैं । इस साल फरवरी में केंद्र सरकार ने आई एस पर बैन लगा दिया था और कहा था कि ये आतंकवादी संगठन भारत समेत पूरी दुनिया के युवाओं को दिग्भ्रमित कर रैडिकलाइज कर रहा है । इस प्रतिबंध के बावजूद सोशल मीडिया के जरिए ये आतंकवादी संगठन पूरे देश में सक्रिय है

बावजूद इसके सोशल मीडिया आतंकवादी संगठन आई एस और उसके समर्थकों के पेज को हटाने को तैयार नहीं है । खबरों के मुताबिक पैरिस में हुए आतंकवादी हमले के बाद एक शख्स ने आई एस के पेज को लेकर शिकायत भेजी थी लेकिन फेसबुक ने कहा था कि वो उसके कम्युनिटि स्टैंडर्ड और नीतियों के खिलाफ नहीं है । दरअसल इन फैन पेज पर जाने के बाद वहां सक्रिय लोग विजिटर को आई एस के नियंत्रण वाले बेवसाइटस पर रिडायरेक्टर कर देते हैं । यही हालत ट्विटर की भी है जहां कोई भी खलीफा न्यूज जैसे कई हैंडल सक्रिय हैं जो आई एस की जानकारियां साझा करते रहते हैं । ट्विटर पर आई एस के समर्थकों की पूरी फौज है जिनकी पहचान करना आसान नहीं है लेकिन वो खामोशी के साथ अपने काम को अंजाम देते रहते हैं । कुछ दिनों पहले तक पाकिस्तानी आतंतवादी हाफिज सईद भी ट्विटर पर खासा सक्रिय था बाद में उसके अकाउंट को सस्पेंड किया गया । इसी तरह से यूट्यूब पर आई एस की आतंकवादी करतूतों के कई दिल दहलाने वाले वीडियो मौजूद हैं । इस वक्त हमारे देश को आतंकवादियों से जबरदस्त खतरा है ऐसे में सोशल मीडिया साइट्स की निगरानी आवश्यक है । इसका मतलह यह कतई नहीं है कि इन साइट्स पर किसी भी तरह की सेंसरशिप होनी चाहिए बल्कि सोशल मीडिया पर आतंकवादी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कोई मैकेनिज्म बनाया जाना चाहिए । दरअसल ये साइट्स पूरी दुनिया में लोग उपयोग करते हैं, लिहाजा आतंकवादी संगठनों के समर्थकों पर नजर रखना काफी मुश्किल काम है । परंतु हमारे देश में फेसबुक पर फेक आईडी बनाकर आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देनेवालों और अफवाह फैलाने वालों पर लगाम लगाने के लिए फोन नंबर या आधार कार्ड नंबर को प्रोफाइल के साथ अनिवार्य किया जा सकता है । मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगों के दौरान फेसबुक का कितना गलत इस्तेमाल हुआ ये पूरी दुनिया ने देखा । कई बार तो अफवाह फैलाने वालों की पहचान हो जाती है लेकिन कई बार जब फेक आई डी विदेश से बनाई जाती है और उसका इस्तेमाल किया जाता है तब उसको ट्रैक करना बहुत मुश्किल होता है । कार्रवाई करना तो लगभग नामुमकिन ही होता है । इसके अलावा इन सोशल साइट्स को भारत में अपने सर्वर लगाने की भी आवश्यकता है । फेसबुक और ट्विटर भारत सरकार के साथ कई महात्वाकांक्षी योजनाओं को आगे बढ़ाने का मंसूबा पाले बैठे हैं लेकिन उनको पहले बारत की इन चिंताओं पर भी ध्यान देना होगा । 

Saturday, October 26, 2013

खत्म होते पुस्तकालय

आजकल हिंदी साहित्य के तमाम मसले सोशल नेटवर्किंग साइट् फेसबुक पर हल हो रहे हैं । विवाद से लेकर विमर्श तक । कुछ लेखकों को फेसबुक की अराजक आजादी ने एक ऐसा मंच मुहैया करवा दिया है जहां वो अपनी अपनी कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं । कोई वहां बेहतरीन कवि, कहानी, उपन्यासकार, आलोचक और पत्रकार की सूची चिपकाते रहते हैं तो कई लोग उसको अपने प्रचार का प्लेटफॉर्म मानकर उपयोग कर रहे हैं । फेसबुक किसी भी मुद्दे या घटना के खिलाफ या समर्थन के अभियान का मंच भी बन गया है । इस आभासी दुनिया की अराजक आजादी के दौर में कुछ गंभीर मसले भी अभी फेसबुक पर उठ रहे हैं । इसी तरह का एक गंभीर अभियान फेसबुक पर चल रहा है - चलो करनाल । साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों से करनाल जाने की अपील इस वजह से की जा रही है कि वहां के पाश पुस्तकालय को बंद करने की साजिश हो रही है । पाश पुस्तकालय ने करनाल और आसपास के इलाके में साहित्यक सांस्कृतिक चेतना जगाने का और एक सांस्कृतिक संस्कार विकसित करने का काम किया है । वहां पुस्तकालय के अलावा देश भर के लेखकों और रंगकर्मियों का जमावड़ा होता रहा है । लेकिन अब उस साहित्यक सांस्कृतिक केंद्र को बंद करने की कोशिश की जा रही है । हिंदी का साहित्य समाज इससे उद्वेलित है । कुछ दिनों पहले इस तरह की खबरें आई थी कि दिल्ली की मशहूर और ऐतिहासिक लाइब्रेरी – दिल्ली बल्कि लाइब्रेरी के कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल पा रहा है । दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बदहाल है वहां मूलभूत सुविधाओं का आभाव है । कर्मचारियों के वेतन पर संकट के अलावा पुस्तकालय की किताबों और पत्र-पत्रिकाओं को सहेजने के लिए भी आवश्यक धनराशि की कमी है । लिहाजा ऐतिहासिक महत्व की किताबें नष्ट हो रही हैं या उनके नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो गया है । कमोबेश यही हालत देशभर के पुस्तकालयों का है । यह हालत तो तब है कि जबकि पुस्तकालयों में किताबों की सरकारी खरीद के लिए लंबा चौड़ा बजट है । किताबों की खरीद के लिए संस्कृति मंत्रालय के अधीन राजा राम मोहन राय के नाम से एक ट्रस्ट है । यह ट्रस्ट देशभर के सरकारी और गैरसरकारी पुस्तकालयों को किताबों की खरीद के लिए अनुदान देता है । इस ट्रस्ट में विभिन्न मंत्रालयों और सरकारी विभागों के अधिकारियों की अलग अलग समिति होती है । इसके अलवा सांसदों के स्थानीय विकास निधि में भी एक निश्चित धनराशि पुस्तकों के लिए आरक्षित करने का भी प्रावधान है। सांसद उस धनराशि का उपयोग हर साल अपने इलाके के स्कूलों में किताबें खरीदने के लिए अनुदान के तौर पर दे सकते हैं । बावजूद इसके हमारे देश में पुस्तकालय मरणासन्न हो रहे हैं । एक जमाना था जब पुस्तकालयों की अहमियत इतनी ज्यादा थी कि उसके बगैर छात्रों और शोधार्थियों का काम ही नहीं चलता था । मैं कई ऐसे लेखकों को जानता हूं जो किसी लेखक की रचनावली पर काम करने के सिलसिले में कोलकाता के नेशनल लाइब्रेरी में महीनों तक किताबें और पत्र-पत्रिकाएं छानते रहे हैं । मुझे नब्बे के दशक के अपने दिल्ली विश्वविद्यालय के शुरुआती दिन भी याद आते हैं जब हम अपने छात्र जीवन के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस के सेंट्रल रेफरेंस लाइब्रेरी में नियमित जाया करते थे । यह नियमितता वैसी ही थी जैसी कि दफ्तर जाने की होती है । तय समय पर घर से निकल जाना और फिर भोजनावकाश के बाद फिर से वहां जाकर शाम तक डटे रहना । पुस्तकालय में पढ़ने के माहौल के अलावा भी नियमितता की एक अन्य वजह थी । वह वजह थी वहां पहुंचने वालों छात्रों की भीड़ । अगर आप दस मिनट भी लेट हो गए तो आपको लाइब्रेरी में जगह नहीं मिलती थी और आपको निराश होकर वापस लौटना पड़ता था । लेकिन अब वहां के हालात भी बदलने लगे हैं । सभी लाइब्रेरी की तरह वो भी उदासनीता का शिकार होने लगा है ।
पुस्तकालयों के प्रति उदासीनता और उनकी बदहाली के लिए हमें इसके सामाजिक और अन्य कारणों की पड़ताल करनी चाहिए । जब हम अपने आसपास देखते हैं तो ये सारी वजहें हवा में तैरती नजर आती है । कई विद्वानों का मानना है कि पुस्तकालयों की दुर्गति के लिए इंटरनेट जिम्मेदार है । अब लोगों की मुट्ठी में मौजूद इंटरनेट युक्त मोबाइल फोन और टैबलेट पर गूगल बाबा हर वक्त हर तरह की मदद को तैयार रहते हैं । आपने कुछ सोचा और पलक झपकते वो आपके सामने लाखों परिणाम के साथ हाजिर है । इस तर्क में ताकत है और हो सकता है कि पुस्तकालयों के प्रति हमारी उपेक्षा का यह भी एक कारण हो । लेकिन पुस्तकालयों के प्रति उपेक्षा की जो सबसे बड़ी वजह है वो है हमारी शिक्षा पद्धति । हमारी शिक्षा पद्धति ही इतनी दोषपूर्ण है कि वहां पुस्तकालयों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता है । जिस तरह से देशभर में अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का जाल फैला है उसने भी पुस्तकालयों को स्कूल की शोभा भर बना दिया है । अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में इस बात पर जोर तो रहता है कि छात्रों को खेलकूद, नृत्य संगीत से लेकर स्केटिंग में रुचि विकसित की जाए, लेकिन क्या इन स्कूलों में छात्रों को पुस्तकालयों से उपन्यास या कहानी या कोई अन्य किताब पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता है । अगर हम इसका उत्तर ढूंढते हैं तो अंधकार दिखाई देता है । आज हमारी शिक्षा प्रणाली में परीक्षा में आनेवाले अंक इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि उसके अलावा किसी अन्य चीज पर छात्रों, अध्यापकों और अभिभावकों का फोकस ही नहीं रहता है । छात्रों की इस तरह से कंडीशनिंग की जाने लगी है कि उसके लिए पाठ्य पुस्तकों के अलावा अन्य किसी पुस्तक का महत्व ही नहीं रह गया है । अन्य पुस्तकों का महत्व रहे भी क्यों क्योंकि वो पाठ्य पुस्तक तो हैं भी नहीं ।
आज हालात यह है कि नई पीढ़ी के छात्र-छात्राओं को लाइब्रेरी कार्ड का तो पता है लेकिन उनको लाइब्रेरी का कैटलॉग देखना आता हो इसमें संदेह है । कार्ड तो इसलिए पता है क्योंकि नामांकन के साथ ही आपका लाइब्रेरी कार्ड बन जाता है । कैटलॉग देखना सीखने के लिए तो पुस्तकालय जाना होगा । वहां जाना किसी भी स्कूल में अनिवार्य नहीं है । इन अंग्रेजी स्कूलों में लाइब्रेरी पीरियड भी होता है लेकिन उसमें बच्चे पुस्तकालय से ज्यादा वक्त स्कूल परिसर से लेकर खेल के मैदान में बिता देते हैं । स्कूल के अलावा अगर हम इसके सामाजिक वजहों को देखों तो वहां भी पुस्तक को लेकर एक खास किस्म की उपेक्षा का भाव दिखाई देता है । आज बच्चों के जन्मदिन के मौके पर दिए जानेवाले उपहार में किताब नहीं ही होते हैं । इलेक्ट्रॉनिक गेम्स से लेकर बल्ले और गेंद तक उपहार में दिए जा रहे हैं । मां-बाप के अंदर भी अपने बच्चों को पुस्तक देने की प्रवृत्ति लगभग खत्म होती जा रही है । इन सामाजिक वजहों से जब पुस्तक को लेकर उपेक्षा का भाव लगातार मजबूत होता जा रहा है तो उसके आलय यानि पुस्तकालय का उपेक्षित होना तो स्वाभाविक है ।
दूसरी बात जो पुस्तकालयों की उपेक्षा को लेकर है वह है पुस्तकालयों में किताबों की खरीद । पूरे हिंदी जगत को यह तथ्य पता है कि राजा राम मोहन राय ट्रस्ट में किताबों की खरीद या फिर उसकी अनुशंसा में किस तरह के खेल होते हैं । अंट-शंट किताबों की सरकारी खरीद होती है । कुछ गंभीर पाठक जब नई कृतियों की तलाश में अपने पास के पुस्तकालय में पहुंचता है तो वहां स्तरहीन किताबें देखकर उसका मन खट्टा हो जाता है । अगली बार पुस्तकालय जाने से पहले वो दस बार सोचता है । अगर कहीं जाने के लिए किसी को भी दस बार सोचना पड़े तो समझ लीजिए की उपेक्षा की जमीन तैयार हो रही है । हमारे देश के पुस्ताकालयों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है । अगर हमें अपने देश में पुस्तकालय या पढ़ने की संस्कृति का विकास करना है तो सर्वप्रथम हमारी शिक्षा प्रणाली की खामियों को दूर करना होगा । पाठ्य पुस्तकों के अलावा अन्य पुस्तकों के बारे में एक ऐसा मैकेन्जिम बनाना होगा कि नई पीढ़ी के लड़के-लड़कियां उन्हें भी पढ़ें । इसके अलावा समाज में जागृति पैदा करने के लिए सरकारी और गैरसरकारी संगठनों को काम करना होगा ताकि मां-बाप अपने बच्चों को किताबों के करीब ले जाएं । सरकारी खरीद में हो रहे घपलों पर लगाम लगाने के लिए भी जतन करने होंगे । अगर हम ये तीन काम भी कर लेते हैं तो हमें विश्वास है कि कोई भी पाश पुस्तकालय को बंद करने की साजिश नहीं रच पाएगा, मशहूर पुस्तकालय उपेक्षा के शिकार नहीं होंगे । अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो फिर पुस्तकालय इतिहास के खंडहर बन जाएंगें ।

Wednesday, December 14, 2011

सिब्बल के सपने

अन्ना हजारे के खिलाफ सरकारी मुहिम के स्वयंभू अगुवा रहे कपिल सिब्बल लंबे समय से राजनीतिक परिदृश्य से गायब थे । विवादप्रिय नेता होने के बावदूद सिब्बल की मीडिया और विवाद से दूरी आश्चर्यचकित ही नहीं करती थी बल्कि चौंका भी रही थी । अन्ना हजारे की जनलोकपाल की मुहिम और उनके अनशन के दौरान कपिल सिब्बल के अडि़यल रुख और गैरराजनीतिक तरीकों ने सरकार की अच्छी खासी किरकिरी करवाई थी । कयास यह लगाए जा रहे थे कि उसके बाद सिब्बल को आलाकमान की तरफ से चुप रहने की सलाह दी गई थी । लेकिन एक बार जिसको विवादों का चस्का लग जाता है वह ज्यादा दिनों तक उससे दूर नहीं रह सकता है । कपिल सिब्बल ने एक बार फिर से उसको साबित भी कर दिया । इस बार सिब्बल बहुत दूर की कौड़ी लेकर आए हैं । उन्होंने इस बार सोशल मीडिया पर लगाम लगाने की कवायद शुरू की है । सिब्बल ने फेसबुक, गूगल और अन्य सर्विस प्रोवाइडर कंपनी के प्रतिनिधियों को अपने दफ्तर में बुलाकर उनको कंटेंट पर लगाम लगाने की हिदायत दी । अमेरिका के एक अखबार के मुताबिक सिब्बल ने फेसबुक और अन्य कंपनी के प्रतिनिधियों को बुलाकर साफ तौर पर कहा कि साइट्स पर सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह से जुड़ी आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियों पर पाबंदी लगाने या फिर उसे रोकने का का इंतजाम करें । सिब्बल ने इसके साथ ही धार्मिक भावनाएं भड़कानेवाले चित्रों पर भी ऐतराज जताया और कहा कि इस तरह के आपत्तिजनक कंटेट वहां न हों । फेसबुक और अन्य कंपनियों ने सरकार की इस सलाह को मानने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि इन बेवसाइट्स पर यूजर्स अपनी सामग्री डालते हैं और अगर उसपर कोई पाबंदी लगाई गई तो इन बेवसाइट्स का मूल चरित्र ही खत्म हो जाएगा । इसके अलावा सिर्फ फेसबुक के पूरे विश्व में अस्सी करोड़ यूजर्स हैं और किसी भी कंपनी के लिए इतने बड़े उपभोक्ता वर्ग द्वारा डाले जाने वाले कंटेंट पर निगाह रखना मुमकिन नहीं है । ऐसा लगता है कि सिब्बल अपने इस कदम से सरकार और पार्टी के आला नेताओं को साधने में लगे हैं । मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की सैकड़ों आपत्तिजनक तस्वीरें नेट पर मौजूद हैं । क्या सिर्फ सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लगाम लगाकर सिब्बल सोनिया और मनमोहन की आपत्तिजनक और अपमानजनक तस्वीरें हटवाने में कामयाब हो जाएंगे । लेकिन अचानक से कांग्रेसी मंत्री कपिल सिब्बल को लोगों की धार्मिक भावनाओं की फिक्र कहां से होने लगी । सिब्बल को अब धर्म और धार्मिक भावनाएं भड़कानेवाली तस्वीरों की याद आ रही है लेकिन उस वक्त सिब्बल कहां थे जब एम एफ हुसैन कथित तौर पर धार्मिक भावनाएं भड़कानेवाले पेंटिग्स बना रहे थे । उस वक्त अगर हुसैन की पेंटिग्स उत्कृष्ट कला का एक नमूना और एक कलाकार की अभिवयक्ति थी तो अब भी जो कुछ नेट पर किया जा रहा है या हो रहा है उसे भी उसी स्पिरिट में देखा जाना चाहिए । हुसैन का विरोध करनेवाले अगर अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला कर रहे थे तो सिब्बल इस वक्त क्या कर रहे हैं, इसपर भी कांग्रेस और लेफ्ट दोनों को सिर्फ विचार ही नहीं करना चाहिए बल्कि आत्मावलोकन भी करना चाहिए ।
कपिल सिब्बल चाहे जो भी सफाई दें और जिस भी वजह की आड़ में सोशल साइट्स पर पाबंदी लगाने की कोशिश करें लेकिन इतना साफ है कि यह सबकुछ अन्ना हजारे की मुहिम को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है । जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था तो सरकार ने माना था कि वो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नजर नहीं रख पाई । लिहाजा इस बार सरकार ने अपनी इस भूल को सुधारने की कोशिश की और लगात है कि उसका जिम्मा दूरसंचार मंत्री होने के नाते सिब्बल को दिया गया है । फोसबुक और ट्विटर की ताकत से सरकार अंजान नहीं है । चाहे वो मिस्त्र में तहरीर स्कावयर पर लाखों लोगों के जुटने का मामला हो, चाहे वो ट्यूनीशिया में सरकार के खिलाफ आंदोलन हो, चाहे वो अमेरिका में चल रहा ऑक्योपॉय वॉल स्ट्रीट हो या फिर अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो, सबमें फेसबुक और टि्वटर की बेहद ही अहम भूमिका रही है । उदाहरण के तौर पर अगर हम देखें तो फेसबुक पर पिछले साल नवंबर में इंडिया अगेंस्ट करप्शऩ का पेज बनाया गया और सालभर में तकरीबन साढे पांच लाख से ज्यादा लोग उसके सदस्य बन गए और इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है । उसी तरह अगर हम ट्विटर को देखें तो जनलोकपाल के नाम से पिछले ही साल ट्विटर अकाउंट खोला गया । टि्वटर को रेटिंग देनेवाली एजेंसी ने जनलोकपाल को एक मजबूत ब्रांड के तौर पर रेटिंग दी और शुरुआत में ही उसे दसवें नंबर पर रखा । लेकिन महीने भर में ही जनलोकपाल टॉप फाइव में पहुंच गया । और तब से वो लगातार दूसरे तीसरे नंबर पर बना रहता है । बावजूद इसके कि जनलोकपाल को फॉलो करनेवाले महज दो लाख के करीब लोग है । सरकार के पास ये सब आंकड़े तो जाते ही हैं । इन आंकड़ों की वजह और पिछले दो अनशन के दौरान अन्ना हजारे को मिले जनसमर्थन से यूपीए सरकार के कान खड़े हो गए । अन्ना हजारे एक बार फिर से अनशन करने के लिए हुंकार रहे हैं और दूसरे वो यह भी ऐलान कर चुके हैं कि अगर लोकपाल बिल पास नहीं होता है तो वो आठ दिनों के अनशन के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव प्रचार करेंगे । उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी की सक्रियता को लेकर कांग्रेस खासी सतर्क है । इस वजह से अन्ना के उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार के ऐलान और राजनेताओं के खिलाफ साइबर दुनिया में बन रहे माहौल को देखकर ही सिब्बल उसपर लगाम लगाने की मंशा पाले बैठे हैं । लेकिन सिब्बल जैसे कानून के जानकार यह भूल जाते हैं कि इस देश का संविधान प्री सेंसरशिप की इजाजत नहीं देता । हमारे संविधान के मुताबिक कोई भी प्रचार प्रसार- दृश्य या श्रव्य अगर आपत्तिजनक दिखाई देता है तो उसके खिलाफ शिकायत होनी चाहिए और दोषी पाए जाने पर बनाने वाले और उसे प्रचारित प्रसारित करनेवालों पर कानून के हिसाब से कार्रवाई होनी चाहिए । लेकिन कहीं भी प्री सेंसरशिप की बात नहीं कही गई है ।
प्रीसेंसरशिप की बात दो बार कांग्रेस के शासनकाल में ही कही गई है । एक बार इमरजेंसी के दौरान, जब प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दिया गया था और इंद्रकुमार गुजराल को हटाकर विद्याचरण शुक्ला को सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई थी । पद संभालने के बाद शुक्ला अपने दफ्तर में अखबार के संपादकों को बुलाकर यह बताते थे कि अखबार में क्या छापना है । इमरजेंसी लगने और पद संभालने के फौरन बाद ही विद्याचरण शुक्ला ने 26 जून 1975 को दिल्ली में अखबार के संपादकों के साथ एक बैठक करके उन्हें सेंसरशिप समझाया था । कुछ अखबारों ने उस दिन के अपने अंक में लिख दिया था कि आज के अखबार की खबरें सरकार द्वारा सेंसर की गई हैं । जिसपर विद्याचरण शुक्ला ने संपादकों को खूब खरी खोटी सुनाई थी । सेंसरशिप का नतीजा कांग्रेस ने भुगता । इसलिए एक बार जब राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में फिर से सेंसरशिप की बात चली तो उसे लागू करने का साहस सरकार नगहीं कर पाई । सिब्बल की सोशल मीडिया पर सेंसरशिप पर ही एक वयक्ति ने ट्विट किया- 1975 में भी एक वकील सिद्धार्थ शंकर रे ने श्रीमती गांधी को सलाह दी थी जिसका नतीजा कांग्रेस ने भुगता और अब फिर से एक वकील सरकार की तरफ से मोर्चा संभाले हैं तो दूसरी श्रीमती गांधी को इस बात पर गौर करना चाहिए ।