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Saturday, July 4, 2020

वामपंथियों की दिनकर से चिढ़ पुरानी


चीन से जारी तनातनी के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लेह की यात्रा की और वहां सेना के जवानों को संबोधित करते हुए दिनकर की कविता की पंक्तियों को भी उद्धृत किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजनीति में अपने गैरपारंपरिक तौर तरीकों से चौंकाते रहे हैं। अब कूटनीति के एक नए आयाम में भी उन्होंने कविता के मार्फत संदेश देकर चौंकाना शुरू किया है। मोदी की साहित्य में रुचि रही है, गुजराती में छपी उनकी कविताओं को देखकर ये समझा जा सकता है। किताबों से उनको प्रेम है। किसी का स्वागत करने के लिए फूल की जगह किताब की पैरोकारी कर प्रधानमंत्री ने पुस्तकप्रेमियों को दिल जीत लिया था। इसी तरह से कुछ साल पहले एक पुरस्कार समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि हर घर मे पूजाघर की तरह एक पुस्तकालय अवश्य होना चाहिए। उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि घर बनाते समय आर्किटेक्ट से नक्शे में पुस्तकालय के प्रावधान के लिए अनुरोध किया जाना चाहिए। इसके अलावा जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं बने थे और संगठन का काम संभालते थे तो उस वक्त वो खूब पत्र लिखा करते थे। उन पत्रों को देखने से भी इस बात का पता चलता है कि मोदी में एक गहरी साहित्यिक अभिरुचि है। यह अकारण नहीं है कि वो समय-समय पर अपनी रैलियों में कविताओं का उपयोग करते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी उन्होंने ‘ये देश नहीं मिटने दूंगा’ जैसी ओजपूर्ण कविता के माध्यम से देश को संदेश दिया था। कविता के माध्यम से जनता से जुड़ने और उनके दिलतक अपनी बात पहुंचाने का उनका अपना एक अलग ही अंदाज है।

प्रधानमंत्री मोदी का दिनकर की कविताओं को उद्धृत करना कई लोगों को खल गया। कुछ लोग दिनकर की उन पंक्तियों को उद्धृत करने लगे जिनमें उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की प्रशंसा की थी। कई वामपंथी विचारधारा की तरफ झुकाव रखनेवाले लेखकों ने तो दिनकर को दक्षिणपंथी करार दे दिया। अपने कहे के समर्थन में वो प्रसंग उठा लाए जब दिनकर ने पांचजन्य पत्रिका के लिए छात्रों से बातचीत की थी। यहां सवाल दिनकर की रचनाओं को समझने का है। हिंदी में दिनकर अकेले ऐसे कवि हैं जो अपनी रचनाओं में खुद को अपने समय का सूर्य घोषित करते हैं – ‘मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूं मैं।‘ तो सूर्य का ताप उनकी कविताओं में भी दिखाई देता है। वामपंथियों ने लंबे समय तक दिनकर को हाशिए पर डालने की कोशिश की, उनके खिलाफ लिखा गया, उनकी उपेक्षा की गई। दिनकर को उनके जीवनकाल में ही साहित्य की परिधि पर धकेलने का प्रयास विदेशी विचारधारा के प्रभाव में काम कर रहे आलोचकों और लेखकों ने संगठित रूप से किया। उऩकी मृत्यु के बाद भी उनकी रचनाओँ का मूल्यांकन ना हो पाए, इस बात की कोशिश की गई। लेकिन दिनकर की रचनाओं में इतना दम है कि उसको दबाया नहीं जा सका।

वामपंथियों की दिनकर से चिढ़ पुरानी है। 1962 में चीन से पराजय के बाद जब दिनकर ने परशुराम की प्रतीक्षा लिखा को उनके खिलाफ इस विचारधारा के लोगों ने काफी दुष्प्रचार किया था। दिनकर ने लिखा भी है कि ‘‘परशुराम की प्रतीक्षा’ से तीन प्रकार के लोग नाराज हुए। एक तो वे, जो गांधीवाद का अर्थ यह समझते हैं कि कि दुश्मन जब धावा करे, तब उसे रोकने के लिए निहत्थे आदमियों को सरहद पर लेट जाना चाहिए। दूसरे वे लोग, जो यह समझते थे कि चूंकि चीन कम्युनिस्ट है, उसलिए उसके विरुद्ध उत्पन्न क्रोध की लपट प्रगतिशील भावनाओं को भी आंच पहुंचा सकती है। और तीसरे वे लोग, जो समझती थे कि सरकार अकर्मण्य रहना चाहती है, अतएव इस कविता के विरोध से सरकार के नेता खुश हो जाएंगें।‘  दिनकर को इस बात का भान था कि कम्युनिस्ट उनकी इस रचना के खिलाफ हैं और वो चीन को ललकारने की भावना को बढ़ाना नहीं देना चाहते हैं। इस वजह से भी उन्होंने दिनकर की इस कृति का नोटिस नहीं लिया। तब दिनकर ने लिखा था कि उनकी नजर में समाचारपत्रों के वे संपादक साहसी थे जिन्होंने ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ की समीक्षाएं प्रकाशित की थी। ऐसा प्रतीत होता है कि दिनकर उन दिनों कम्युनिस्टों से इस बात को लेकर झुब्ध थे कि वो चीनी आक्रमण के बाद भी चीन की निंदा नहीं कर रहे थे। दिनकर ने लिखा, ‘कम्युनिस्टों ने खुली आलोचनाएं तो बहुत कम लिखीं, किन्तु कानाफूसी के जरिए उन्होंने अपनी नाराजगी का समाचार सरहद के पार तक पहुंचा दिया था। इसलिए मुझे आश्चर्य हुआ कि पिछले 8 अक्तूबर 1964 ई. को साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित अपने स्वागत समारोह में श्री चेलीशेव ने यह कहा कि ‘चीनी आक्रमण के समय आपलोगों ने क्या लिखा, यह रूस में हम नहीं जान सके। हमने तो केवल ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ को पढ़ा और उसी काव्य की चर्चा हमारे देश में फैली है। आश्चर्य, संभव है, कुछ साम्यवादी पंडितों को भी हुआ हो।‘ तो यह कहा जा सकता है कि दिनकर ने अपनी रचनाओं में बहुधा वामपंथियों के दोहरे चरित्र को उजागर किया और उनके असली चेहरे को सामने लाने में हिचके नहीं। वो कहते भी थे कि उनको क्रेमलिन से आया फरमान कतई मंजूर नहीं है।
इस वक्त जो वामपंथी दिनकर की आलोचना करने में लगे हैं या फिर दिनकर को कांग्रेसी और नेहरू का चमचा कह रहे हैं उनको न तो दिनकर के बारे में पता है और न ही इतिहास बोध। वो तो बस उस सूखे पुआल के रखवाले की तरह हैं जो अंगार से डरता है। अब वामपंथी विचारधारा सूखा हुआ पुआल हो चुका है और ये वामपंथी उनके रखवाले जो दिनकर की रचनाओं के अंगार से भयाक्रांत दिखाई देते हैं। डर इस बात का है कि अगर इतिहास की लिखी सारी बातें अंगार के रूप में सामने आ जाएंगी तो सूखे पुआल को जलते देर नहीं लगेगी। दरअसल ये समझना होगा कि दिनकर की कविताओं में जो राजनीतिक चेतना है उसके आधार में राष्ट्र का हित है। नेहरू से वामपंथी इस वजह से भी चिढ़ते थे कि वो लगातार नेहरू के वामपंथ के प्रभाव से मुक्त होने की बात भी करते थे। एक बार दिनकर ने कह दिया था कि जैसे जैसे मार्क्स के सिद्धांत काल के गियर से छूटते गए वैसे वैसे पंडित जी की आस्था मार्क्स पर कम होती गई। इस तरह के बेबाक बोल उस वक्त की ताकतवर विचारधारा के कर्ताधर्ताओं को नहीं भाता था।  
एक किस्सा कई बार सुनाया जाता है कि एक बार किसी कार्यक्रम में दिनकर और जवाहरलाल नेहरू दोनों पहुंचे थे। कार्यक्रम स्थल पर जाने के दौरान नेहरू सीढ़ियों पर लड़खड़ा गए थे, उस वक्त दिनकर ने उनका हाथ थाम लिया था। जवाहरलाल नेहरू ने दिनकर को धऩ्यवाद कहा। इस धन्यवाद के उत्तर में दिनकर ने कहा था ‘जब जब सत्ता लड़खड़ाती है तो सदैव साहित्य ही उसे संभालती है।‘ दिनकर ने ये बात भले ही मजाक में कही हो लेकिन उस वक्त नेहरू की लड़खड़ाती सत्ता पर ये कड़ा व्यंग्यात्मक प्रहार था। आज दिनकर की आलोचना करनेवाले ये भूल जाते हैं कि उन्होंने राज्यसभा सांसद रहते कई मुद्दों पर नेहरू की आलोचना भी की थी। चाहे वो भाषा का मुद्दा हो या फिर भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का, दिनकर ने खुलकर अपनी बात रखी थी। उस वक्त की सरकार को कभी अपनी रचनाओं के माध्यम से तो कभी भाषणों से कठघरे में खड़ा किया था।

Friday, October 23, 2015

कम्युनिस्टों का फासिज्म

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी ने एक बार फिर से अजीबोगरीब फरमान जारी कर पूरी दुनिया को चौंका दिया है । वहां के शासक दल के नए हुक्मनामे के मुताबिक पार्टी कॉडर के गोल्फ खेलने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है । तर्क यह दिया गया है कि इससे भ्रष्टाचार को रोकने में मदद मिलेगी । चीन ती कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमिटी के नए फरमान के मुताबिक पार्टी के करीब पौने नौ करोड़ सदस्यों के लिए जिस आठ सूत्रीय नैतिक फॉर्मूले को जारी किया गया है उसमें गोल्फ के अलावा होटलों में अधिक खाने पीने की मनाहीतो है ही विवाहेत्तर संबंधों पर रोक भी लगा दी गई है । गोल्फ से तो कम्युनिल्ट पार्टी का पुराना बैर रहा है । माओ ने इसको बुर्जुआ खेल मानते हुए इसपर पाबंदी लगाई थी । उसके बाद देंग के शासनकाल में गोल्फ को अनुमति मिली थी लेकिन लगातार इस खेल के खिलाफ चीन में मुहिम चलती रही । चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के इस नए निर्देशों के बाद पूरी दुनिया में मानवाधिकार को लेकर सचेत लोगों ने विरोध के स्वर तेज कर दिए हैं लेकिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को मानवाधिकार की कहां फिक्र है । सेंट्रल कमटेी ने अपने कॉडर से साफ तौर पर कहा है कि वो व्यक्तिगत बातों को पार्टी के साथ साझा करें और फैसले की जिम्मेदारी पार्टी पर छोड़े । कार्यकर्ताओं की रुचि से लेकर उसकी व्यक्तिगत जिंदगी तक तो पार्टी के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है । ‘उनका चेयरमैन हमारा चेयरमैन’ का नारा लगानेवाली प्रगतिशील जमात चीन के इस कदम पर खामोश है । इस खामोशी से ही भारत में प्रगतिशील जमात ने अपनी साख गंवा दी है । दरअसल कम्युनिस्ट पार्टियों का ये अमानवीय चेहरा नया नहीं है । जे चांग और जॉन हैलीडे ने अपनी किताब ‘द अननोन स्टोरी माओ‘ में इस तरह के कई वाकयों का जिक्र किया है । कुछ इसी तरह का जिक्र तो शौकत कैफी ने अपनी किताब ‘यादों की रहगुजर’ में भी किया है । जब कैफी और शौकत की शादी हुई थी तो वो कम्यून में रहते थे । उनका जीवन सामान्य चल रहा था । उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ था । अचानक सालभर में बच्चा टी बी का शिकार होकर काल के गाल में समा गया । इस विपदा से शौकत पूरी तरह से टूट गई थी । अपने इस पहाड़ जैसे दुख से उबरने की कोशिश में जैसे ही शौकत को पता चला कि वो फिर से मां बनने जा रही हैं तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । अपनी इस खुशी को शौकत ने कम्यून में साझा की । उस वक्त तक शौकत कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले चुकी थी । जब शौकत की पार्टी को इसका पता चला तो तो पार्टी ने शौकत से गर्भ गिरा देने का फरमान जारी किया। उस वक्त शौकत पार्टी के इस फैसले के खिलाफ अड़ गईं थी और तमाम बहस आदि के बाद उनको बच्चे की अमुमति मिली थी । दरअसल ये कम्युनिस्टों का बेहद अमानवीय चेहरा है । इस वजह से जब वो नारी स्वतंत्रता की बात करते हैं या फिर जीने से लेकर अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं तो खोखलापन नजर आता है ।
ऐसा नहीं है कि इस तरह के फरमान सिर्फ चीन में ही जारी होते रहे हैं, रूस में इस तरह के वाकयों का लंबा इतिहास रहा है । जो गाहे बगाहे बाहर भी आते रहे हैं । यह अकारण नहीं है कि हॉवर्ड फास्ट जैसे मशहूर लेखक अपनी कृति दे नेकेड गॉड में कहते हैं कि – कम्युनिस्ट पार्टी एक ऐसी मशीन है जिसमें प्राय: अच्छे लोग प्रवेश करते हैं जो अन्नत: बुरे लोगों में परिवर्तित हो जाते हैं । सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टियों में इस प्रक्रिया से बच पाना आमतौर पर जान देने की कीमत पर ही होता है ।‘ अब अगर हम हॉवर्ड फास्ट, शौकत कैफी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी के हालिया फरमान पर नजर डालें तो यह लगता है कि कम्युनिस्ट विचारधारा फासिस्ट है जो फासिज्म का डर दिखाकर फलती फूलती रही है ।

Saturday, November 6, 2010

फासीवाद का दर्शन

चीन से एक दिल दहला देनेवाली खबर आई है । कानून का जबरदस्ती और कड़ाई से पालन करवाने की कई खबरें चीन से आती ही रहती हैं लेकिन अभी जो खबर बाहर निकल कर आई है वो एक विकसित राष्ट्र और शासन करनेवाली पार्टी की विचारधारा पर कलंक की तरह है । चीन के पूर्वी तट के पास सीमिंग में एक छत्तीस वर्षीय महिला ने एक बच्चे के रहते दूसरे संतान को जन्म देने का इरादा किया और गर्भवती हो गई । जब उसका गर्भ आठ महीने का हो गया तो सरकारी अधिकारियों को इस बात का पता चला । इस जानकारी के बाद तकरीबन दो दर्जन सरकारी चीनी अधिकारियों ने उस महिला के घर पर धावा बोल दिया । आठ माह की गर्भवती पर सरकारी अधिकारियों ने लात-घूंसों की बरसात कर दी । उसके दोनों हाथ पीछे बांधकर उसके सिर को दीवार से टकराया और पेट पर कई प्रहार किए ताकि गर्भपात हो जाए । जब वो कामयाब नहीं हुए तो सरकारी अधिकारियों ने आईयिंग नाम की उस महिला को घसीट कर अस्पताल में भर्ती करवाया और गर्भपात का इंजेक्शन लगवा कर जबरन आठ माह के गर्भ को गिरवा दिया ।
बच्चा पेट में इतना बड़ा हो गया था कि गर्भपात के बावजूद उसके कुछ अंश पेट में रह गए थे जिसको निकालने के लिए आईयिंग की मंजूरी के बगैर ऑपरेशन भी करना पड़ा, एक ऐसा ऑपरेशन जिसमें उसकी जान भी जा सकती थी। इंसानियत को शर्मसार कर देनेवाली यह घटना चीन में होने वाली अन्य ज्यादतियों की तरह दबकर रह जाती । लेकिन उस महिला ने अस्पताल में अपने फोटो खींचने की इजाजत दे दी । नतीजा यह हुआ कि उसी दास्तां और चोट के निशान वाले फोटोग्राफ इंटनेट के जरिए सारी दुनिया के सामने आ गए ।
दरअसल चीन ने बढ़ती जनसंख्या का पर काबू करने के लिए एक संतान नीति लागू किया हुआ है । वहां जुड़वां बच्चों के अपवाद को छोड़कर दूसरी संतान पैदा करने पर पूरी तरह से पाबंदी है। इस नीति का उल्लंघन करनेवाले को भारी जुर्माना चुकाना पड़ता है । इस कानून की आड़ में ही कानून का पालन करवाने की जिम्मेदारीवाले सरकारी अफसरों ने हैवानियत का नंगा नाच किया । चीन के उन सरकारी अधिकारियों को ना तो उस महिला का दर्द समझ में आया , ना ही उस महिला के पति की भवानाओं को समझने की कोशिश की और ना ही उनपर उस महिला के दस साल की बच्ची की गुहार काम आई जो पिछले आठ महीने से अपने घर में छोटे भाई बहन की राह देख रही थी । चीन में जिस विचारधारा के आधार पर वहां का शासन चल रहा है वहां ना तो भावनाओं की कद्र है ना ही संवेदना के लिए कोई जगह है । वहां तो दबाई जाती है सिर्फ आवाज । थ्येनमान चौक पर छात्रों को टैंक से कुचले जाने की घटना अब भी लोगों के जेहन में है ।
हाल ही में प्रकाशित एमनेस्टी इंटरनेशनल की रुपोर्ट के मुताबिक चीन में अब भी पांच लाख लोग बगैर किसी गंभीर इल्जाम के जेल की हवा खा रहे हैं । वहां बगैर किसी जुर्म के घर में कैद कर देना, लोगों की व्यक्तिगत आजादी पर सरकारी निगरानी, आम आदमी की आवाज को दबाने के लिए पुलिस फोर्स का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल आम बात है । चीन की जेल में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ता ली जियाबो को जब शांति का नोबल पुरस्कार दिया गया तो उसके बाद वहां की सरकार की भौंहे तन गई । चीनी सरकार को लगा कि ली जियाबो को नोबल पुरस्कार मिलने से देश में मानवाधिकार के लिए काम करनेवाले लोगों की सक्रियता बढ़ सकती है लिहाजा ली के नजदीकी लोगों की निगरानी तेज कर दी गई । बगैर किसी शक या संदेह के हफ्तेभर में तकरीबन चालीस लोगों को हाउस अरेस्ट कर दिया गया । ली के समर्थक संगठनों पर जबरदस्ती शुरू कर दी गई । ली जियाबो से नजदीकी के शक में शंघाई के एक हाउस चर्च पर पहले निगरानी शुरू की गई फिर कई दिनों तक पुलिस ने उसे अपने घेर में ले लिया । चर्च के नेता झू योंग और उनकी पत्नी के घर से निकलने पर ना केवल पाबंदी लगा दी गई बल्कि घर का जरूरी सामान खरीदने के लिए पुलिस के घेरे में निकलने पर मजबूर किया गया । जनता की सरकार और लोगों के बीच समानता के सिद्धांत की वकालत करनेवाली इस विचारधारा के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यहां कहा कुछ जाता है और किया कुछ जाता है । दरअसल ऐसा सिर्फ चीन में नहीं होता है जहां भी इस विचारधारा का बोलबाला है वहां ऐसी ही तानाशाही पूर्ण रवैया देखने को मिलता है ।
हमारे देश में भी वामपंथी विचारधारा को माननेवाले हमेशा से तानाशाही और फासीवाद के विरोध करते रहे हैं । उनका यह विरोध सिर्फ दिखावे के लिए और अपने हित में उसका उपयोग करने के लिए होता है । चीन में हुई उस मार्मिक घटना के बारे में जानते ही जेहन में कौंध गई प्रख्यात कवि और शायर कैफी आजमी की बेगम शौकत कैफी की किताब- याद की रहगुजर- का एक प्रसंग। कैफी के एक साल के लड़के खैयाम की असायमयिक मौत हो गई थी जिसने उनको और उनकी पत्नी शौकत को अंदर से तोड़कर रख दिया था । हर वक्त, हर पल अपने पहले संतान की मौत का गम झेल रही शौकत और उनके पति कैफी दोनों वामपंथी विचारधारा से जुड़े संगठन भारतीय जन नाट्य संघ यानि इप्टा में सक्रिय थे । जलसे, जुलूस, प्रदर्शन रोज के काम थे । लेकिन जब बेटे का गम लिए शौकत अपने कॉमरेडों के पास जाती तो उनके साथी कन्नी काट जाते थे, साथियों की संवेदनहीनता से शौकत को बेहद दुख पहुंचा । अपनी किताब में शौकत ने इस दर्द को बयां करते हुए लिखा- अहिस्ता अहिस्ता मुझे एहसास होने लगा कि लोग गमजदा लोगों से घबराने लगते हैं और चुपचाप उठकर चले जाते हैं । मैंने यह सोचकर अपने गम पर काबू पाने की कोशिश शुरू की ।
लेकिन पूरा मामला यहीं खत्म नहीं होता है । संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पर पहुंचना अभी बाकी था । कुछ दिनों बाद शौकत आजमी फिर से गर्भवती हुई । अपने पहले बच्चे की मौत का गम भुलाने की कोशिश में लगी शौकत के लिए यब सुकून देनेवाला पल था । लेकिन अपना सबकुछ पार्टी पर न्योछावर करने के लिए उनकी पार्टी ने क्या हुक्म सुनाया आप शौकत की ही जुबानी सुनिए- शबाना होने को थी । क्योंकि मेरा पहला बच्चा गुजर गया था इसलिए मैं तो बहुत खुश थी लेकिन पार्टी को यह बात पसंद नहीं आई । ऑर्डर हुआ एबॉर्शन करवा दिया जाए । क्योंकि कैफी अंडर-ग्राउंड हैं । मैं बेरोजगार हूं । बच्चे की जिम्मेदारी कौन लेगा । मुझे बेहद तकलीफ पहुंची । यह आपबीती है एक ऐसे कॉमरेड की और एक ऐसे पार्टी की जो जनपक्षधरता और वयक्तिगत आजादी का सबसे ज्यादा शोर मचाती है, जो तानाशाही के खिलाफ होने का लगातार दंभ भरती है । लेकिन वक्त पड़ने पर इस विचारधारा का पालन करने और करवानेवाले सबसे बड़े तानाशाह के तौर पर उभरते हैं।
अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब पार्टी की बात नहीं माने जाने पर सीपीएम ने अपने वरिष्ठ सदस्य सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया । अगर सोमनाथ चटर्जी की मानें तो इस निष्कासन के पहले ना तो उन्हें कोई नोटिस दिया गया और ना ही पार्टी की नीति निर्धारण करनेवाली सर्वोच्च समिति पोलित ब्यूरो के सभी सत्रह सदस्यों की सहमति ली गई । सिर्फ पांच सदस्यों ने महासचिव के इशारे पर आनन फानन में सोमनाथ चटर्जी जैसे पार्टी के कद्दावर नेता को बाहर का दरवाजा दिखा दिया । अपनी किताब -–कीपिंग द फेथ- मेमॉयर ऑफ अ पार्लियामेंटेरियन में यह दावा किया है उनका निष्कासन पार्टी के संविधान के खिलाफ और अलोकतांत्रिक था । पार्टी संविधा तो दूर की बात है, राजनीति में एक सामान्य परंपरा है कि नोटिस देने के बाद पार्टी से निष्कासन होता है । लेकिन सोमनाथ के मामले में सीपीएम ने इस सामान्य से नियम का भी पालन नहीं किया । ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो उस विचारधारा से जुड़े लोगों, संगठन और सरकार के हैं जो सबसे ज्यादा जनपक्षधरता,सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक प्रक्रिया, नागरिक स्वतंत्रता, समान अधिकार, समान अवसर आदि के बारे में दुहाई देते हैं । कथनी और करनी के इसी फर्क ने इस विचारधारा की बुनियाद पर टिकी कई शक्तिशाली व्यवस्थाओं से लोगों का मोहभंग कर दिया । नतीजा यह हुआ कि किसी जमाने में विश्व में एक वैकल्पिक विचारधारा के रूप में देखे जानेवाली यह व्यवस्था अब चीन और कुछ अन्य देशों में सरकार के सहारे अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं ।