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Saturday, August 1, 2020

बौद्धिक संपदा को सहेजने का भरोसा

पिछले दिनों सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की। नई शिक्षा नीति में भाषा और कला को लेकर कई उत्साहवर्धक घोषणाएं की गई हैं। इन घोषणाओं में साफ तौर पर यह कहा गया है कि संस्कृति को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि भाषा को मजबूती प्रदान की जाए। शब्दकोश से लेकर अनुवाद तक की महत्ता के बारे में बात की गई है। एक और महत्वपूर्ण बात जो इस नई शिक्षा नीति में कही गई है वो ये है कि ‘भारत इसी तरह सभी शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य का अध्ययन करनेवाले अपने संस्थानों और विश्वविद्यालयों का विस्तार करेगा और उन हजारो पांडुलिपियों को इकट्ठा करने, संरक्षित करने और अनुवाद करने और उनका अध्ययन करने का मजबूत प्रयास करेगा, जिस पर अभी तक ध्यान नहीं गया है। इसी प्रकार से सभी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में जिसमें शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य पढ़ाया जा रहा है, उनका विस्तार किया जाएगा। अभी तक उपेक्षित रहे लाखों अभिलेखों के संग्रह, संरक्षण, अनुवाद और अध्ययन के दृढ़ प्रयास किए जाएंगे।‘ इस शिक्षा नीति में यह एक बेहद महत्वपूर्ण प्रयास होगा। हमारे प्राचीन ग्रंथों को सहेजने का प्रयास होना चाहिए। कई बार कई तरह के सर्वेक्षणों में यह बात सामने आ चुकी है कि कि पूरी दुनिया में भारत के पास सबसे अधिक पांडुलिपियां है लेकिन साथ ही ये बात भी सामने आती हैं कि हमारे देश में इन पांडुलिपियों के संरक्षण की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में इस वक्त दो करोड़ से अधिक पांडुलिपियां हैं जिनको संरक्षित करने की सख्त आवश्यकता है। 
इन पांडुलिपियों को सहेजने की बात नई नहीं है और इस शिक्षा नीति में जो कहा गया है इस तरह के प्रयास पहले भी हो चुके हैं। जब अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने 2002 में पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से ‘राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन’ की घोषणा की थी। सात फरवरी दो हजार तीन को ‘राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन’ की विधिवत शुरुआत की गई थी। मिशन की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इसकी स्थापना पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय के अधीन की गई थी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को नोडल एजेंसी बनाया गया था। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ‘भविष्य के लिए अतीत का संरक्षण’ के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। इसके शुभारंभ के मौके पर अटल जी ने भी भाषा को लेकर चिंता जताई थी और कहा था कि ‘चूंकि 70 प्रतिशत पाण्डुलिपियां संस्कृत में हैं अत: इस भाषा के शिक्षण और अध्ययन को और प्रवर्तित करने की आवश्यकता होगी और अनेक संस्थान जो पहले से ही इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं उन्हें इस मिशन से जोड़ा जाना होगा और अंतत: पाण्डुलिपियों के निजी अभिरक्षकों को आगे बढ़कर अपनी पाण्डुलिपियां मिशन को सौंप देने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु एक बड़ा जागरूकता अभियान चलाना होगा|’ कुछ इसी तरह की बात नई शिक्षा नीति में भी की गई है। 2003 में स्थापित राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ने पिछले सत्रह साल में क्या काम किया ये अबतक ज्ञात नहीं हो पाया है। 2004 में एनडीए को पराजय का सामना करना पड़ा लेकिन पांडुलिपि मिशन बन गया था तो चलता रहा लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन में इस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। मिशन तो किसी काम को पूरा करने के लिए बनाया जाता है और उसकी एक निश्चित समयावधि होती है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का भी कार्यकाल तय था और अब इसको 2021 तक के लिए बढ़ाया गया है।   
पिछले दिनों वाराणसी के दो ऐसे स्थान पर जाने का अवसर मिला जहां हजारों पांडुलिपियां और प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध हैं। पांडुलिपियों को उचित रखरखाव और प्राचीन ग्रंथों को पुनर्प्रकाशित करने की आवश्यकता है। काशी के सपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पास हजारों दुर्लभ पांडुलिपियां हैं जिनपर काम करने की जरूरत है। उनको अनूदित करके शोधार्थियों या छात्रों के समक्ष लाने की जरूरत है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ने इस दिशा में जो प्रयास किया है वो नाकाफी है। सिर्फ बनारस में ही नहीं पूरे देश में जाने कितने पुस्तकालयों में पुरानी पांडुलिपियां पड़ी होंगी, इसका वास्तविक आकलन भी नहीं हो पाया है। सबसे बुरी स्थिति तो उन रजवाड़ों की बताई जा रही है जहां संपत्ति को लेकर विवाद के चलते संपत्तियां अदालतों के आदेश पर सील कर दी गई हैं। इन सील की गई कई संपत्तियों में उन राजघरानों के निजी पुस्तकालय भी हैं। उन पुस्तकालयों में ढेर सारी पांडुलिपियां हैं जो सालों से बगैर देखरेख के नष्ट हो गई हैं या नष्ट हो रही हैं। इसी तरह से देश के अलग अलग हिस्सों के लेखकों के घरों में पांडुलिपियां थीं जो या तो नष्ट हो गईं या नष्ट होने के कगार पर हैं। अगर नई शिक्षा नीति में पांडुलिपियों के प्रकाशन पर ध्यान दिया जाता है तो हम अपनी उन बौद्धिक संपदा को सहेज कर आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ा काम कर पाएंगे। 
सवाल यह भी उठता है कि अभी पांडुलिपि मिशन संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत है लेकिन जब नई शिक्षा नीति में इसपर काम करने की बात की गई है तो क्या ये माना जाए कि पांडुलिपि मिशन अब संस्कृति मंत्रालय से शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत होगा। शिक्षा नीति में तो मोटे तौर पर नीतिगत बातें की गई हैं, उसका क्रियान्वयन कैसे होगा इसपर विस्तृत जानकारी प्रतीक्षित है। अगर सरकार पांडुलिपियों को लेकर गंभीरता से काम करना चाहती है तो उसको पांडुलिपि मिशन को भंग करके राष्ट्रीय पांडुलिपि प्राधिकरण जैसी संस्था का गठन करना होगा। जैसे संस्कृति मंत्रालय ने 2010 में स्मारकों की सुरक्षा और उसके संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्मारक प्रधारिकरण का गठन किया था। अगर ऐसा हो पाता है तो पांडुलिपियों के संरक्षण के कार्य को गति भी मिलेगी और स्थायित्व भी। 
एक और बात इस नई शिक्षा नीति में कही गई है कि ‘भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित की जाएगी जिसमें हर भाषा के श्रेष्ठ विद्वान एवं मूल रूप से वह भाषा बोलनेवाले लोग शामिल रहेंगे ताकि नवीन अवधारणाओं का सरल किन्तु सटीक शब्द भंडार तय किया जा सके तथा नियमित रूप से नवीन शब्दकोश जारी किया जा सके।... इसी प्रकार व्यापक पैमाने पर बोली जानेवाली अन्य भारतीय भाषाओं की अकादमी केंद्र अथवा/ और राज्य सरकारों द्वारा स्थापित की जाएंगीं।‘ अब ये भी कोई नई बात नहीं है अभी एक साहित्य अकादमी है जो संविधान में उल्लिखित भाषाओं के लिए काम करती हैं और केंद्रीय हिंदी संस्थान शब्दकोश बनाने का काम करता है। पिछले दिनों केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक नंदकिशोर पांडे ने बहुत श्रमपूर्वक शब्दकोश पर काम करवाया और 45 शब्दकोश का प्रकाशन हो गया और छह पर काम चल रहा है। राज्यों में भी भाषाई अकादमियां हैं उनमें से ज्यादातर की हालत बहुत खराब है क्योंकि उनके पास पर्याप्त बजट नहीं है। ये देखना दिलचस्प होगा कि इन अकादमियों का गठन होगा तो साहित्य अकादमी का क्या होगा, केंद्रीय हिंदी संस्थान का क्या होगा, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर का क्या होगा, केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान, चेन्नई का क्या होगा? क्या सरकार इन संस्थानों के पुनर्गठन की सोच के साथ नई शिक्षा नीति को लेकर आई है। इसमें से कुछ संस्थान तो शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं लेकिन कई संस्थान संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं। अगर पुनर्गठन की सोच है तो ये एक अच्छी पहल हो सकती है क्योंकि संस्कृति मंत्रालय की कई ऐसी संस्थाएं हैं जिनको अगर शिक्षा मंत्रालय के साथ कर दिया जाए तो बेहतर होगा। 

Saturday, March 24, 2018

देशव्यापी बहस की दरकार


पिछले दिनों भाषा को लेकर दो बहुत अहम खबर आई जिसपर भारतीय समाज में खासतौर पर हिंदी समाज को चर्चा करने की आवश्यकता है। पहली खबर आई देश के महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में नामांकन के लिए हुई परीक्षा के लिए हिंदी विभाग में एमफिल और पीएचडी के लिए सात सौ उनचास परीक्षार्थियों ने आवेदन किया लेकिन जो परिणाम आया वो बेहद चौंकानेवाला था। सात सौ उनचास अवेदनकर्ताओं से सिर्फ चार ने प्रवेश परीक्षा पास की और उऩको साक्षात्कार के लिए बुलाया गया । सात सौ उनचास में से सिर्फ चार यानि कि सफल परीक्षार्थियों का प्रतिशत लगभग आधा है। पूरे देश में जहां हिंदी पढ़ने जानने समझने वालों की संख्या देश की आधी आबादी से ज्यादा है वहां हिंदी को लेकर इस तरह की खबर हिंदी समाज को चिंतित करने के लिए काफी हैं। लेकिन इस पर हिंदी समाज से किसी तरह की चिंता व्यक्त की गई हो ऐसा ज्ञात नहीं हो सका। हमारे देश में हिंदी को लेकर उदासीनता क्यों है, अगर इसकी पड़ताल करते हैं तो जिस सबसे बड़े यथार्थ से मुठभेड़ होता है वह है हिंदी का रोजगार की भाषा नहीं बन पाना। इसपर बहुत बातें होती हैं लेकिन इस दिशा में कोई ठोस काम होता नहीं दिख रहा है। हिंदी के नाम पर खुले विश्वविद्यालयों में जिस तरह से काम हो रहे हैं वो संतोषजनक नहीं हैं या कह सकते हैं कि नाकाफी हैं। हिंदी को रोजगार से जोड़ने और साहित्य के अलावा अन्य विधाओ का सृजन हिंदी में नहीं होने पर भी काफी सालों से बातें हो रही हैं। 1910 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित हुआ था जिसमें भी हिंदी को लेकर चिंता की गई थी और उसको मजबूत करने का रोडमैप पेश किया गया था। कालांतर में साहित्य सम्मेलन के तीसरे अधिवेशन में भी पुरुषोत्तमदास टंडन के प्रस्ताव पर चर्चा हुई थी जिसमें हिंदी को बढ़ाने के लिए मानविकी, समाज शास्त्र वाणिज्य, विधि तथा विज्ञान और तकनीकी विषयों की पुस्तकों को लिखवाना और प्रकाशित करवाने पर जोर दिया गया था। प्रस्ताव पर चर्चा हुई थी और सबों की राय समान थी कि हिंदी को विस्तार देने और उसको मजबूती देने के लिए यह कार्य प्रारंभ करना होगा। आजादी के बाद इस दिशा में जो भी प्रयत्न हुए वो नाकाफी रहे। सरकार और संस्थागत स्तर पर अगर इस तरह के काम हुए भी तो बहुत कम थे। अंग्रेजी का दबदबा बना रहा जो आजतक कायम है। नब्बे के दशक में जब हमारे देश में अर्थव्यवस्था खुलने लगी उस वक्त भी अगर हिंदी को लेकर कोशिश की गई होती तो आज स्थिति बेहतर हो सकती थी। शायद बाजार के दबाव में कुछ हो पाता। दरअसल आजादी के बाद कई सालों तक कॉलेज और विश्वविद्यालय खोलने पर जोर रहा। शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर बढ़ाने और हिंदी को उसमें मजबूती से स्थापित करने का उपक्रम गंभीरता से नहीं किया गया। कॉलेज और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को हिंदी में शोध करने,हिंदी में छात्रों से संवाद करने, हिंदी में शोध पत्र प्रस्तुत करने के लिए जितने  प्रोत्साहन की जरूरत थी उतना हो नहीं सका। शिक्षकों ने भी अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझा। नतीजा यह हुआ कि हिंदी को लेकर छात्रों में भी उदासीनता बढ़ती चली गई। हालात इतने बुरे होते चले गए कि कई कॉलेजों में हिंदी के छात्रों की संख्या शिक्षकों से कम रह गई । छात्र आ जाएं तो कक्षा लगती थी वर्ना शिक्षकों के पास कोई काम नहीं होता था। स्थिति बद से बदतर होती चली गई और छात्रों की पीढ़ी दर पीढ़ी हिंदी से विमुख होती गईं। आज अगर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इस तरह के हालात पैदा हो रहे हैं तो वो वर्षों की लापरवाही और गलत नीतियों का परिणाम है।
दूसरी खबर आई नागपुर में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक से। 9 से 11 मार्च तक चली इस प्रतिनिधि सभा में भाषा को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास किया गया जिसमें भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर जोर दिया गया। सभा का मत था कि ‘भाषा किसी भी व्यक्ति एवं समाज की पहचान का एक महत्त्वपूर्ण घटक तथा उसकी संस्कृति की सजीव संवाहिका होती है। देश में प्रचलित विविध भाषाएं व बोलियां हमारी संस्कृति, उदात्त परंपराओं, उत्कृष्ट ज्ञान एवं विपुल साहित्य को अक्षुण्ण बनाये रखने के साथ ही वैचारिक नवसृजन हेतु भी परम आवश्यक हैं…आज विविध भारतीय भाषाओं व बोलियों के चलन तथा उपयोग में आ रही कमी, उनके शब्दों का विलोपन व विदेशी भाषाओं के शब्दों से प्रतिस्थापन एक गम्भीर चुनौती बन कर उभर रहा है।‘ भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए सरकारों, नीति निर्धारकों और स्वयंसेवी संगठनों से प्रयास करने की अपील की गई। अपील में कहा गया है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा या अन्य भारतीय भाषा हो, सरकारें इस दिशा में उचित नीतियों का निर्माण कर आवश्यक प्रावधान करे। उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य सरकारें आरएसएस की प्रतिनिधि सभा की अपील पर ध्यान देंगी और इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाएंगी।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा में तकनीकी और आयुर्विज्ञान सहित उच्च शिक्षा के लिए शिक्षण सामग्री, पाठ्य सामग्री और परीक्षा का विकल्प भारतीय भाषाओं में सुलभ करवायया जाए। यह एक ऐसा काम है जो सरकारों से गंभीरता की अपेक्षा करती है। इसके लिए एनसीईआरटी से लेकर राज्य सरकारों को भी पहल करनी होगी। अगर ऐसा हो पाता है तो हिंदी को भी इसका लाभ होगा और वो रोजगार से जुड़ने की दिशा में अग्रसर हो सकती है। इसके अलावा इस प्रस्ताव में शासकीय और न्यायिक कार्य में भी भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की बात की कही गई है, अंग्रेजी पर भारतीय भाषा को तरजीह देने की अपेक्षा की गई है। नाटकों,लोककलाओं आदि के प्रोत्साहन की बात कही गई है जो कि अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय भाषाओं को मजबूत करेगी। आखिर में कहा गया है कि – ‘प्रतिनिधि सभा सरकारों, स्वैच्छिक संगठनों, जनसंचार माध्यमों, पंथ-संप्रदायों के संगठनों, शिक्षण संस्थाओं तथा प्रबुद्धवर्ग सहित संपूर्ण समाज से आवाहन करती है कि हमारे दैनन्दिन जीवन में भारतीय भाषाओं के उपयोग एवं उनके व्याकरण, शब्द चयन और लिपि में परिशुद्धता सुनिश्चित करते हुये उनके संवर्द्धन का हर सम्भव प्रयास करें।‘ यह एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव है जिसपर गंभीरता से राष्ट्रव्यापी बहस होनी चाहिए थी। सरकारों को आगे आकर इस दिशा में काम को आगे बढ़ाने की इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करना था। समाज में इसपर बहस होनी चाहिए।
बौद्धिक वर्ग के एक खास विचारधारा वाले लोगों से प्रतिनिधि सभा के इस प्रस्ताव पर बहुत उत्साह की अपेक्षा मुझे नहीं है क्योंकि ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रस्ताव है । आरएसएस के नाम से ही उनमें एक उदासीनता का भाव व्याप्त हो जाता है । प्रस्ताव चाहे लाख अच्छा हो, उससे समाज और देश का भला हो रहा हो, भाषा मजबूत हो रही हो, लेकिन अगर उसमें आरएसएस का नाम जुड़ गया है तो उसको प्रयासपूर्वक हाशिए पर डालने की कोशिश होती रही है, आगे भी होती रहेगी। लेकिन अगर हम चाहते हैं कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसी स्थिति नहीं आए तो राजनीति और विचारधारा को छोड़कर हमें अपनी भाषा को मजबूत करने के लिए एकजुट होना पड़ेगा। उसको एक मुहिम के तौर पर चलाना होगा, देश की सभी राज्य सरकारों को आगे बढ़कर भाषा को मजबूती देने का काम करना होगा। इसके अलावा हिंदी के लोगों को उस षड़यंत्रकारी सिद्धांत को भी निगेट करना होगा जिसमें सालों से ये प्रचारित किया जाता रहा है कि हिंदी मजबूत होगी तो वो अन्य भारतीय भाषाओं को कमजोर कर देगी। यह एक दुश्प्रचार है क्योंकि अगर हिंदी मजबूत होती है, उसका विस्तार होता है तो स्वाभाविक रूप से सभी भारतीय भाषाएं मजूबत होंगी। अन्य भाषाओं के साहित्य को हिंदी का विशाल पाठक वर्ग मिलेगा। पिछले दिनों पूर्वोत्तर के कई लेखकों ने इस बात को स्वीकारा कि हिंदी में उनकी कृतियों के अनुवाद होने से उनको लाभ हुआ और उनको अखिल भारतीय पहचान मिली। इस तरह की बातों को लगातार प्रचारित करना होगा, गोष्ठियों सेमिनारों में हिंदी के लोगों को जोर देकर अपना पक्ष रखना होगा। दिनकर ने भी कभी कहा था कि हिंदी को पूरे देश में उसी तरह से लागू किया जाना चाहिए जिस तरह कि अन्य भारतीय भाषा के लोग चाहते हैं। दिनकर की इस राय को ही मूलमंत्र मानते हुए सभी भारतीय भाषाओं को एकजुट होना होगा और इन भाषाओं के उपयोगकर्ताओं को भी सरकारों पर दबाव बनाना होगा कि हमें हमारी भाषा में काम करने का माहौल दो। लोकतंत्र में लोक का दबाव सर्वापरि होता है, इसको समझना होगा।