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Tuesday, September 3, 2013

बढ़ता बलात्कार, निस्तेज नैतिकता

हर साल जब भी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ें आते हैं तो महिलाओं के खिलाफ होनेवाले वारदातों में खतरनाक तरीके की बढ़ोतरी दिखाई देती है । महिलाओं के लिए सुरक्षित मानी जानेवाली जगहों में भी बलात्कार, यौन उत्पीड़न और तेजाब हमले जैसी घटनाएं होने लगी है । दिल्ली में मेडिकल की छात्रा से गैंगरेप की वारदात के बाद राजपथ से लेकर जनपथ तक जनउबाल दिखता है । मुंबई में महिला पत्रकार के साथ गैंगरेप से हमारा पूरा समाज उद्वेलित हो जाता है । न्यूज चैनलों और अखबारों में बलात्कार जैसे घिनौने वारदात के लिए सख्त से सख्त कानून की मांग की आवाज बुलंद होती है । लेकिन बलात्कारियों के लिए सख्त सजा की मांग के कोलाहल के बीच समाज में फैल रहे इस कैंसर के मूल में नहीं जा पाते हैं । हमें इस बात पर विचार करना होगा कि हमारे समाज में बलात्कार जैसी घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं । क्यों बलात्कार के बढ़ते मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट नियमित अंतराल पर चिंता जाहिर करता है । अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताते हुए पूछा था – हमारे समाज और सिस्टम में क्या खामी आ गई है कि पूरे देश में बलात्कार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं । सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि क्या ये सामाजिक मूल्यों में गिरावट का नतीजा है या पर्याप्त कानून नहीं होने की वजह से हो रहा है या फिर कानून को लागू करनेवाले इसको ठीक तरह से लागू नहीं कर पा रहे हैं । सुप्रीम कोर्ट के इन तीन सवालों का अगर हम जवाब ढूंढते हैं तो हमें लगता है कि इन तीन वजहों के अलावा भी एक दो वजहें हैं जो महिलाओं के प्रति इस जघन्य अपराध को बढ़ावा देती हैं ।
हमारा समाज सदियों से नैतिक मूल्यों के लिए शासक वर्ग और धर्म गुरुओं को अपना नायक मानता रहा है । लेकिन सत्तर के दशक के बाद से राजनेताओं और धर्मगुरुओं  के नौतिक मूल्यों में जिस तरह का ह्रसा हुआ है वह सभ्य समाज के लिए चिंता की बात हैं । महिलाओं को लेकर समाज के रहनुमाओं के मन में जो विचार रहते हैं वो बहुधा उनकी जुबान पर आते ही रहते हैं । अगर हम इन चार बयानों को देखें तो महिलाओं को लेकर हमारे समाज के रहनुमाओं की राय साफ हो जाएगी । शिया धर्म गुरु कल्बे जब्बाद कहते हैं – लीडर बनना औरतों का काम नहीं है, उनका काम लीडर पैदा करना है । कुदरत ने अल्लाह ने उन्हें इसलिए बनाया है कि वो घर संभालें, अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करें । रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष नृत्यगोपाल दास के मुताबिक- महिलाओं को अकेले मंदिर, मठ, देवालय में नहीं जाना चाहिए । अगर वो मंदिर, मठ या देवालय जाती हैं तो उन्हें पिता, पुत्र या भाई के साथ ही जाना चाहिए नहीं तो उनकी सुरक्षा को खतरा है । गोवा के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेसी नेता दिगंबर कामत ने कहा था- महिलाओं को राजनीति में नहीं आना चाहिए क्योंकि इससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । राजनीति महिलाओं को क्रेजी बना देती है । समाज के बदलाव में महिलाओं की महती भूमिका है और उन्हें आनेवाली पीढ़ी का ध्यान रखना चाहिए । इससे भी आगे जाकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और देश के रक्षा मंत्री रह चुके मुलायम सिंह यादव कहते हैं – अगर संसद में महिलाओं को आरक्षण मिला और वो संसद में आईं तो वहां जमकर सीटियां बजेंगी । और इस वक्त के कोयला मंत्री बयानवीर श्रीप्रकाश जायसवाल ने तो सारी हदें तोड़ दी थी और कहा था कि बीबी जब पुरानी हो जाती है तो मजा नहीं देती है । ये बयान अलग अलग धर्म और विचारधारा के मानने वालों के हैं जो अपने अपने समुदाय और विचारधारा की रहनुमाई करते हैं । समाज के रहनुमाओं के महिलाओं को लेकर इस तरह के बयानों से कम पढ़े लिखे लोगों के मन में कुत्सित विचार पैदा होते हैं और वो महिलाओं के प्रति अपराध की ओर प्रवृत्त होते हैं ।
लेकिन हमारे देश के राजनेताओं को इसकी कहां चिंता है । वो तो यह जानकर संतुष्ट हो जाते हैं कि महिलाओं के प्रति अपराध को लेकर पूरे विश्व में हम कई देशों से बहुत पीछे हैं । लेकिन आंकड़ों की ही बात करें तो हम पाते हैं कि 1990 से लेकर 2008 के बीच हमारे देश में बलात्कार के केस दोगुने से ज्यादा हो गए हैं।  मुंबई में तो सिर्फ एक साल में ही बलात्कर के मामलों में दोगुना इजाफा हुआ है । इन वारदातों में स्कूलों में बच्चों के साथ दरिंदगी, धर्म गुरुओं का भगवान के नाम पर भक्तों का यौन शोषण आदि सभी शामिल हैं । हमारे शासक वर्ग इन सबसे बेखबर सिर्फ संसद में कानून बनवाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ले रहा है । तमाम मसलों पर एक दूसरे के विरोध में तांडव करनेवाले सांसद सजायाफ्ता को संसद में पहुंचाने के लिए अपने सारे विरोध छोड़कर एक जुट हो जाते हैं । सुप्रीम कोर्ट ने दो साल से ज्यादा की सजा पाए नेताओं और चुनाव के वक्त जेल में रहनेवालों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी । लेकिन पक्ष और प्रतिपक्ष अपराधियों के चुनाव लड़ने को को लेकर इतने चिंतित हैं कि बहुत मुमकिन है कि संसद के इसी सत्र में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटनेवाला कानून पास हो जाए । इन सबका समाज में यही संदेश जाता है कि हमारा शासक वर्ग अपराधियों के साथ है । समाज में नैतिक मूल्यों के लिए कोई जगह ही नहीं बची । कानून बनानेवालों को समाज से ज्यादा सिर्फ अपनी चिंता है । तभी तो वोट मांगने के लिए जनता के सामने हाथ फैलानेवाली पार्टियां जनता को अपने आय के स्त्रोत जानने के हक से वंचित करने के लिए भी एकजुट हैं । ये ऐसे मुद्दे हैं जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं । जिनपर लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी है वही लोकतंत्र से मिले हक का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर रहे हैं, जनता की फिक्र नहीं ।
बलात्कार के बढ़ते मामलों के लिए जटिल न्याययिक प्रक्रिया, इंसाफ मिलने में हो रही देरी और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीड़ित के साथ होनेवाला सलूक बहुत हद तक जिम्मेदार है । दिल्ली गैंगरेप की सुनवाई को फास्ट ट्रैक कोर्ट को सौंपे तकरीबन आठ महीने बीत चुके हैं लेकिन अभी तक उस मामले में फैसला नहीं आया है । आरोपियों ने अदालत को कानून दांव पेंच में उलझा दिया है । जिस पूरे मसले पर पूरे देश में गुस्से का गुबार उठा था उसका यह हाल है तो यह अंदाजा लगाना आसान है कि सुदूर आदिवासी क्षेत्र की महिलाओं को कितनी जल्दी और कितना न्याय मिल पाता है । बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून बना देने भर से इसपर अंकुश नहीं लगाया जा सकता है । इसके साथ जांच की प्रक्रिया में भी आमूल चूल बदलाव लाना होगा । इस बात को कानूनी जामा पहनाना होगा कि पीड़िता का बलात्कार के बारे में एक ही बार बयान हो और वो भी मजिस्ट्रेट के सामने हो ताकि वो बार बार उस घिनौनी हरकत को किसी और के सामने बताने के लिए अभिशप्त ना हो । इसका एक फायदा यह भी होगा कि न्यायिक प्रक्रिया में तेजी आएगी और आरोपियों को अलग अलग बयानों में से लूप होल ढूढने का अवसर प्राप्त नहीं होगा । दरअसल इस मसले में सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज है और उनके सवाल भी क्योंकि हमारे नायको की नैतिक आभा खत्म हो गई है । देश को इंतजार हैं एक ऐसे नायक की जो हमारे सामाजिक ताने बाने को सहेज कर रख सके और देश की जनता को प्रेरित भी कर सके । उम्मीद सिर्फ युवाओं से है ।
 

Saturday, January 5, 2013

राजनीति का दिवालियापन

उन्नीस सौ पैंसठ की जनवरी की बात है – तब यह तय किया गया था कि 26 जनवरी को अंग्रेजी की जगह हिंदी को भारत की राजभाषा बनाने का ऐलान किया जाएगा । दक्षिणी राज्यों के हुक्मरान इस बात के लिए तैयार भी हो गए थे लेकिन जनता में इस बात को लेकर गहरा रोष था कि हिंदी उनपर थोपी जा रही है । लिहाजा तमिलनाडु में हिंसात्मक प्रदर्शन हो रहे थे । तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री इंतजार करो और देखो की रणनीति अपना कर चुप बैठे थे । लेकिन मद्रास में हालात बेकाबू हो रहे थे और प्रदर्शनकारी लगातार उग्र हो रहे थे और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे थे । उस वक्त तमिलनाडू कांग्रेस के दिग्गज के कामराज की भी हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि वो तमिलनाडु के हिंसाग्रस्त इलाकों में जाएं और वो दिल्ली में ही रुके थे । ऐसे हालात में इंदिरा गांधी ने फैसला लिया कि वो तमिलनाडु जाएंगी । वो वहां पहुंच गई और मद्रास में प्रदर्शनकारियों के बीच जाकर उनसे बात की । उनकी मांगों को सुना और उन्हें जितना हो सकता है वो करने का आश्वासन दिया । इतिहास इस बात का गवाह है कि इंदिरा गांधी के मद्रास पहुंचने और आंदोलनकारियों से बात करने का जबरदस्त असर हुआ और हिंसा की आग में जल रहा मद्रास एकदम से शांत हो गया ।
पिछले दिनों दिल्ली में एक मेडिकल छात्रा के साथ गैंग-रेप के दौरान इंडिया गेट और राजपथ पर लोगों के प्रदर्शन के दौरान इंदिरा गांधी और मद्रास आंदोलन का प्रसंग शिद्दत से याद आ रहा था । गैंगरेप के खिलाफ जब आंदोलन अपने चरम पर था तो सोनिया गांधी ने जरूर अपने घर के बाहर निकलकर गेट पर चंद मिनट आंदोलनकारियों से बात चीत की थी । उनसे बातचीत भी हुई थी लेकिन अगले दिन उनके कारकुनों ने जिन छात्रों को उनसे मिलवाया उनके परिदृश्य से गायब होने से सोनिया की पहल हवा हो गई । इसके अलावा आंदोलन के काफी दिनों बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जंतर मंतर पर पहुंची थी । यह अलग बात है कि तबतक काफी देर हो चुकी थी और आंदोलनकारियों ने उन्हें वहां रुकने की इजाजत नहीं दी । देर ही सही शीला दीक्षित ने यह साहस तो दिखाया कि वो आंदोलनकारियों के बीच जाएं । गैंगरेप के खिलाफ लगभग हफते भर तक इंडिया गेट और विजय चौक पर जमा लोगों से मिलने के लिए किसी भी दल का राजनेता नहीं पहुंचा । उम्मीद तो सत्ता पक्ष के नेताओं से काफी थी कि कोई वहां पहुंचकर आक्रोशित आंदोलनकारियों से बात करेगा । लेकिन कांग्रेस का कोई नेता यह साहस नहीं दिखा पाया जबकि दिल्ली की सातों लोकसभा सीट से कांग्रेस के पार्टी के ही सांसद हैं । यहीं से एक सांसद महिला एवं बालविकास मंत्रालय की मंत्री हैं । आंदोलनकारियों से राजनीतिक तौर पर निबटने की बजाए उन्हें दिल्ली पुलिस के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया ।
सत्तपक्ष से तो अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन में चूक हुई ही, विपक्षी दल भी अपनी भूमिका के निर्वहन में नाकाम रहे । देश की मुख्य विपक्षी पार्टी , भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने अपने घरों से चंद मीटर की दूरी पर हो रहे प्रदर्शन में शामिल होने की बात तो दूर आंदोलनकारियों से बात तक करने की जहमत नहीं उठाई । लोकसभा में विपक्ष की नेता और भारतीय जनता पार्टी में प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश पाले सुषमा स्वराज सिर्फ ट्विटर पर बयानबाजी करती नजर आई । सुषमा जी ने अपनी पोजिशनिंग एक ऐसी भारतीय नारी की बनाई है जो तमाम भारतीय परंपराओं का पालन करती हुई भी राजनीति के शीर्ष पर ना केवल पहुंची है बल्कि वहां लंबे समय से जमी हुई हैं । जब भी जनता के बीच जाने की बात आती है तो सुषमा जी कहीं नजर नहीं आती है । गैंग रेप के मामले में लगातार ट्विटर पर अपनी बात कहने वाली सुषमा स्वराज का ज्यादा जोर संसद का विशेष सत्र बुलाने को लेकर था । क्या हमारे देश के आज के नेताओं को लगता है कि जनता के बीच जाने का सबसे बेहतरीन जरिया संसद है । संसद जनता की समस्याओं को उठाने का मंच हो सकता है लेकिन संसद जनता से संवाद कायम करने का माध्यम नहीं हो सकता है । आज बीजेपी के नेताओं को लगने लगा है कि संसद में साल में दो बार लच्छेदार भाषण देकर, जिसे देशभऱ के तमाम न्यूज चैनल एक साथ चलाते हैं, जनता पर चमत्कारिक प्रभाव पैदा किया जा सकता है । बीजेपी के दूसरे कद्दावर नेता और प्रधानमंत्री पद के एक और सुयोग्य उम्मीदवार अरुण जेटली भी इस पूरे आंदोलन के दौरान कहीं नजर नहीं आए । जेटली साहब भी शानदार वक्ता हैं लेकिन जनता से सीधे संवाद कायम करने में उनकी कोई रुचि दिखाई नहीं देती है । मुझे उस वक्त का एक वाकया याद आ रहा है जब भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने कोलकाता से जम्मू तक की भारत एकता यात्रा की थी तब जम्मू  में उसमें शरीक होने पर अरुण जेटली को हिरासत में लिया गया था । उस वक्त बीजेपी की तरफ से जो खबरें आ रही थी उसमें इस बात पर जोर दिया जा रहा था कि जेटली साहब को हिरासत में लेकर जिस कार में बैठाया गया है उसमें एयरकंडीशनर नहीं लगा है । यह हमारे देश के विपक्ष के नेताओं की एयरकंडीशनर राजनीति की मानसिकता का उत्स था । भारतीय जनता महिला मोर्चा की अध्यक्षा स्मृति ईरानी न्यूज चैनलों पर संघर्ष करती नजर आई लेकिन लोगों के बीच जाने का साहस उनमें भी नहीं था ।
हमारे देश में आजादी के बाद से ही वामपंथी पार्टियों ने अपने आपको जन और वाद का रहनुमा बताया और कई मौकों पर वाम दलों ने आंदोलनों की रहनुमाई की लेकिन दिल्ली गैंगरेप के मुद्दे पर उनके नेता भी जनता के साथ खड़े नहीं दिखे । लोक और जन की भलाई और उनके बीच समानता के सिद्धांतों की बुनियाद पर खड़ी ये पार्टियां भी जन और लोक की भावनाओं को समझने में बुरी तरह से नाकाम रही । गैंगरेप के खिलाफ आक्रोशित जनता को नेतृत्व देनेवाला कोई सामने नहीं आ सका । बैगर नेतृत्व के किसी आंदोलन का जो हश्र हो सकता है वही इस आंदोलन का भी हुआ । आंदोलन के बीच कुछ गुंडे और मवाली किस्म के लोग घुस आए और उन्होंने कुछ ऐसी हरकतें की जिसकी वजह से पुलिस को कार्रवाई का मौका मिल गया । कई जानकारों का कहना है कि पुलिस ने ही इन लोगों को आंदोलनकारियों के बीच में घुसाया । यह जांच का विषय हो सकता है ।
भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाकर जंग छेड़नेवाले अरविंद केजरीवाल पर राजनीति का रंग चढ़ गया है । गैंगरेप के खिलाफ आंदोलन जब अपने चरम पर पहुंचा तो उन्हें लगा कि मौका हाथ से निकल ना जाए लिहाजा तीन चार दिन बाद वो अपने सहयोगियों के साथ आंदोलनकारियों के बीच जाकर बैठ गए । टेलीविजन चैनलों के लिए बातें की, विजुअल बनवाए और फिर वहां से चलते बने । अरविंद केजरीवाल एंड आम आदमी कंपनी भी आंदोलन के दौरान चंद घंटों के लिए वहां नजर आई । अब उनके लोग तर्क दे रहे हैं कि रेप जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे का वो राजनीतिकरण नहीं करना चाहते थे लिहाजा केजरीवाल एंड कंपनी वहां से लौट आई । उनका यह तर्क बेहद ही हास्यास्पद है , अगर उनको इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति नहीं करनी थी तो दो दिन भी वहां जाने का कोई औचित्य नहीं था । लेकिन केजरीवाल चर्चा में बने रहने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते हैं लिहाजा उन्होंने ये मौका भी नहीं छोड़ा ।
गैंगरेप के दौरान लोगों के गुस्से और दिल्ली के इंडिया गेट और विजय चौक पर लगातार हफ्ते भर चले आंदोलन ने भारत के राजनीतिक वर्ग के दिवालिएपन को उजागर कर रख दिया है । आज देश में राजनीतिक समस्याओं का प्रशासनिक हल निकालने की लगातार बढ़ती प्रवृत्ति से लोकतंत्र की स्थापित मान्यताओं के बिखर जाने का खतरा भी पैदा हो गया है । आज देश को एक ऐसे नेता की जरूरत है जो जनता के बीच जा सके और उनकी समस्याओं को उनके बीच बैठकर बात करे । देश की जनता तैयार है वैसे नेताओं को अपने सर आंखों पर बैठाने के लिए जो जनता की भावनाओं को वाणी दे सके । विपक्ष में होने की वजह से भारतीय जनता पार्टी की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि उनके नेता वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर बयानबाजी करने के बजाए जनता के बीच जाएं और उनके दुख दर्द में भागीदार बने और उसको वाणी दें । कांग्रेस के लिए तो बस वही कहा जा सकता है जो इंदिरा गांधी ने पहली बार अध्यक्ष चुने के सालभर बाद पद छोड़ने पर कहा था- आजादी के आंदोलन के दौरान जो कांग्रेस एजेंट ऑफ चेंज थी वही कांग्रेस अब चुनावी मशीन बन कर रह गई है । वक्त बेवक्त राहुल गांधी चेंज की बात करते हैं लेकिन बातें हैं , बातों का क्या