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Saturday, January 1, 2022

रचनात्मकता से भरपूर होगा नववर्ष


नववर्ष 2022। हिंदी साहित्य और प्रकाशन जगत को इस वर्ष से बहुत उम्मीदें हैं। समकालीन साहित्यिक और प्रकाशन परिदृश्य से जिस तरह का समाचार प्राप्त हो रहा है वो बेहद उत्साहजनक है। इस समय हिंदी साहित्य में कई पीढ़ियां एक साथ सृजनरत हैं। एक तरफ रामदरश मिश्र और विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे बुजुर्ग लेखक हैं तो दूसरी तरफ नवीन चौधरी और भगवंत अनमोल जैसे युवा लेखक अपनी रचनाशीलता से हिंदी साहित्य जगत की रचनात्मकता को जीवंत रखे हुए हैं। इनके बीच में यतीन्द्र मिश्र, मनीषा कुलश्रेष्ठ, रजनी गुप्त, रत्नेश्वर और संजय कुंदन की पीढ़ी के लेखक भी लगातार लिख रहे हैं। मैत्रेयी पुष्पा और उषाकिरण खान की भी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। हिंदी साहित्य की रचनाशीलता के हिसाब से ये वर्ष बेहद आश्वस्तिकारक लग रहा है। वाणी प्रकाशन से वरिष्ठ लेखिका पुष्पा भारती की एक महत्वपूर्ण पुस्तक का प्रकाशन इस वर्ष होगा जिसका नाम है अमिताभ बच्चन एक जीवनगाथा। पुष्पा भारती हिंदी की समर्थ लेखिका और धर्मवीर भारती की पत्नी हैं। धर्मवीर भारती और हरिवंशराय बच्चन के परिवार में निकटता रही है। पुष्पा भारती ने अमिताभ बच्चन के संघर्ष और सफलता को बहुत करीब से देखा है। उनके इस पुस्तक की साहित्य जगत को उत्सुकता से प्रतीक्षा है। हिंदी फिल्मों से जुड़े एक और व्यक्तित्व पर पुस्तक इस वर्ष प्रकाशित होगी। गीतकार, पटकथा लेखक और निर्देशक गुलजार के जीवन पर यतीन्द्र मिश्र की बहुप्रतीक्षित पुस्तक का प्रकाशन भी वाणी प्रकाशन से ही होगा। यतीन्द्र मिश्र ने हिंदी में पुस्तक लेखन की एक शैली विकसित की है जिसमें वो किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से लंब समय तक बातचीत रिकार्ड करते हैं फिर उसके आधार पर पुस्तक लिखते हैं। गुलजार से भी यतीन्द्र पिछले 15 साल से उनके जीवन और फिल्मों पर बातचीत रिकार्ड कर रहे थे। पिछले दो साल से वो इसको पुस्तक का स्वरूप देने में लगे थे। अब इस वर्ष उसका प्रकाशन होता दिख रहा है। यतीन्द्र मिश्र के मुताबिक इस पुस्तक में गुलजार और उनकी कला के बारे में, उनके कवि रूप के बारे में पाठकों को कई नई जानकारियां मिलेंगी। गुलजार ने जो फिल्में बनाई हैं या जो गीत लिखे हैं उसमें उन्होंने अनेक प्रयोग किए हैं। यतीन्द्र ने उन प्रयोगों को अपनी इस पुस्तक में संजोया है। 

इक्कसवीं शताब्दी के आरंभ में हिंदी में कई महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुए थे। इसमें मैत्रेयी पुष्पा का अल्मा कबूतरी, चित्रा मुद्गल का आवां, असगर वजाहत का कैसी आगी लगाई आदि प्रमुख हैं। उसके बाद भी उपन्यासों का प्रकाशन होता रहा लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उपन्यास लेखन कम हुआ। नई वाली हिंदी के सत्य व्यास ने अपने उपन्यासों से हिंदी साहित्य जगत में एक सार्थक हस्तक्षेप किया। लेकिन लंबे समय तक याद रखे जानेवाले उपन्यासों की कमी को आलोचक लगातार रेखांकित करते रहे। इस वर्ष कई महत्वपूर्ण उपन्यास आनेवाले हैं। एक तो चित्रा मुदगल का उपन्यास नकटौरा जो सामयिक प्रकाशन से प्रकाश्य है। लड़के के विवाह के लिए जब घर के पुरुष बारात चले जाते थे तो उस रात को घर की स्त्रियां नकटौरा आयोजित करती थीं। इसमें पास पड़ोस की स्त्रियां भी शामिल होती थीं। इसमें स्त्रियां एक तरह से स्वांग रचाती थीं और अपने मन की बातें किया करती थीं। कुछ महिलाएं, पुरुष का वेश बनाकर संवाद किया करती थीं। इसमें स्त्रियां उन प्रसंगों की चर्चा भी करती थीं जो आमतौर पर वो नहीं करती थीं। गाली से लेकर स्त्री पुरुष संबंध भी नकटौरा का विषय हुआ करती थी। नकटौरा में सिर्फ महिलाएं ही हुआ करती थीं। परंपरा ये थी कि जब सारे पुरुष बारात चले जाते थे तो नकटौरा के बहाने महिलाएं सारी रात जागती थीं ताकि किसी प्रकार की चौरी आदि की घटनाएं न हों। कुछ सालों पहले तक ये बेहद चर्चित परंपरा थी। चित्रा मुदगल के उपन्यास के नाम से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने इस पंरपरा को ही केंद्र में रखकर लिखा है। इस उपन्यास के कवर पर लिखा है कि हमारा समाज जैसा दिखाई पड़ता है वैसा है नहीं। वह अपने तमाम दुर्गुणों , विकृतियों, विडंबनाओं और विद्रूपताओं के बावजूद मनुष्यता के उच्चतम मूल्यों की परंपरा को पुरस्कृत करनेवाली विरासत का उत्तराधिकारी भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि चित्रा मुदगल ने नकटौरा के बहाने अपने विरासत में से सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को खोजकर पाठकों के लिए पेश किया होगा। 

चित्रा मुदगल  के अलावा राजकमल प्रकाशन समूह से ह्रषिकेश सुलभ का एक उपन्यास दातापीर भी इस वर्ष प्रकाशित होगा। इस उपन्यास में सुलभ ने कब्रिस्तान में काम करनेवालों को केंद्र में रखा है। उस उपन्यास में पटना शहर के पुराने इलाकों की भी कहानी साथ चलती रहती है।  लंबे समय तक कहानी और नाटक लिखने वाले सुलभ का ये दूसरा उपन्यास है। रत्नेश्वर ने भी एक उपन्यास त्रयी लिखी है जिसका नाम है महायुग। इसका पहला खंड है 32000 साल पहले, दूसरा खंड होगा हिमयुग में प्रेम और तीसरा खंड होगा प्रार्थना का आरंभ। इसका प्रकाशन भी इस वर्ष संभव है। उषाकिरण खान हिंदी और मैथिली की ऐसी लेखिका हैं जो अपनी लेखनी के माध्यम से लगातार युवा लेखकों को टक्कर देती रहती हैं। रचनाकर्म में वो कई युवा लेखकों और लेखिकाओं से अधिक सक्रिय हैं। उषाकिरण खान का मैथिली में एक बहुत चर्चित उपन्यास है पोखरि रजोखरि। इस वर्ष सामयिक प्रकाशन से उसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित होने जा रहा है जिसका नाम है कथा रजोखर। मैथिली से इस उपन्यास का हिंदी में अनुवाद मीना झा ने किया है। रजोखर मिथिला का एक बड़ा जल स्त्रोत है जिसके माध्यम से मिथिला की सत्तर साल की दशा-दुर्शा की कथा कही गई है। पुस्तक के कवर पर ये बताया गया है कि उषाकिरण खान ने कथा रजोखर में स्वतंत्रता आंदोलन, नेहरू-गांधी के स्वप्न, चरखा, खादी ग्रामोद्योग का गठन और उसके विघटनकारी तत्व, स्वातंत्र्योत्तर मिथिला के नवनिर्माण की सरकारी योजनाएं और उसका परिणाम, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्वार्थ की राजनीति, राजनीति का अपराधीकरण, छूआछूत, विधवा विवाह और पलायन जैसी समस्याओं पर सवाल उठाया है। 

एक और महत्वपूर्ण अनुवाद पुस्तक का प्रकाशन प्रभात प्रकाशन से होने जा रहा है। इस पुस्तक का नाम है छत्रपति शिवाजी महाराज। अंग्रेजी में ये पुस्तक शिवाजी द ग्रैंड रेबल के नाम से इस प्रकाशित है जिसके लेखक हैं डेनिस किनकेड। एक और रोचक पुस्तक प्रभात प्रकाशन से आ रही है रामायण से स्टार्टअप सूत्र, इसको लिखा है प्राची गर्ग ने। इसी कड़ी में एक और पुस्तक आएगी वेदांत व जीवन प्रबंधन जिसको कलमबद्ध किया है विक्रांत सिंह तोमर ने। पौराणिक ग्रंथों से प्रबंधन के सूत्र निकालकर पाठकों के सामने पेश करना एक श्रमसाध्य कार्य है। लेकिन ये हिंदी साहित्य के क्षितिज का विस्तार करनेवाली पुस्तकें हैं।

हिंदी के अलावा अगर हम अंग्रेजी की बात करें तो कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद की आत्मकथा भी इस वर्ष प्रकाशित होनेवाली है। इस पुस्तक की प्रतीक्षा राजनीति से जुड़े लोग उत्सुकता से कर रहे हैं। लंबे समय तक गांधी परिवार के साथ रहे गुलाम नबी आजाद का परिवार से मोहभंग हुआ। सब लोगों की निगाह इस पर टिकी है कि अपनी इस पुस्तक में वो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के बारे में क्या लिखते हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन रूपा पब्लिकेशंस से होनेवाला है। दिल्ली विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के सौवें वर्ष में प्रवेश करनेवाला है। समाचारों के मुताबिक इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी के संपादन में दिल्ली विश्वविद्यालय पर केंद्रित एक पुस्तक प्रकाशित होगी जिसमें विश्विद्यालय के पूर्व छात्र अपने अनुभवों को लिखेंगे। अंग्रेजी में कई अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों के प्रकाशन की खबर है, रामविलास पासवान और जार्ज फर्नांडिस की जीवनी के अलावा पत्रकार नीरजा चौधरी के राजनीतिक संस्मरणों की किताब भी इस वर्ष आएगी। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वर्ष 2022 रचनात्मकता से भरपूर होगा।   



Saturday, April 23, 2016

प्रेम रहेगा तो प्रेम-पत्र भी रहेंगे

बद्री नारायण की एक कविता है – प्रेम पत्र । इस कविता में बद्री प्रेत, गिद्ध, बारिश, चोर, आग, सांप, झींगुर, कीड़े आदि का नाम लेकर कहते हैं कि इन सबके निशाने पर प्रेम पत्र होगा । आगे वो कहते हैं- प्रलय के दिनों में सप्तर्षि मछली और मनु / सब वेद बचाएंगें/ कोई नहीं बचाएगा प्रेमपत्र/ कोई रोम बचायेगा कोई मदीना/ कोई चांदी बचाएगा कोई सोना/ मैं निपट अकेला कैसे बचाऊंगा तुम्हारा प्रेमपत्र ।‘  इस कविता में कवि प्रेम पत्र को बचाने की चिंता करता है । चिंता वाजिब भी है तकनीक के दौर में पत्रों का चलन तो कम हो गया लेकिन प्रेमपत्र ना तो खत्म हुए हैं और ना ही खत्म होंगे । मुझे तो लगता है कि जबतक बचा रहेगा प्रेम, तबतक रहेंगे प्रेमपत्र । अभी हाल ही में फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौट और कथित रूप से ऋतिक रोशन के बीच के ईमेल सार्वजनिक हुए हैं । कथित तौर पर ऋतिक रोशन इस वजह से कि ये मामला अभी कोर्ट में है और ऋतिक के वकीलों का दावा है कि ऋतिक के नाम से किसी ने फर्जी ईमेल आईडी बनाई थी।अब अमेरिकी कंपनी से अनुरोध किया जा रहा है कि वो ऋतिक रोशन के कथित ईमेल अकाउंट की जानकारी मुहैया करवाएं । खैर हम तो बस प्रेम पत्रों तक अपनी बात को सीमित रखेंगे ।
एक सौ चालीस करेन्क्टर के ट्विटर के दौर में भी प्रेम पत्र का बचा होना प्रेम के बचे होने की आश्वस्ति देता है । आज अपने रिश्तों को, अपने संबंधों को, अपनी विरासत को, अपने अतीत को, अपने पूर्वजों को, अपने शिक्षकों को, अपने साथियों को, अपने दोस्तों, अपनी प्रेमिकाओं को, अपने प्रेमियों को भूलने का दौर है । इस अकल्पनीय युग में अगर हम प्रेम पत्र को नहीं भूल पा रहे हैं तो ये प्रेम की ही ताकत है । प्रेम में वो ताकत है जिसके सैकड़ों परमाणु बम मिलकर भी खत्म नहीं कर सकते हैं । सृष्टि बची रहेगी तो प्रेम भी बचा रहेगा । प्रेम बचेगा तो प्रेम पत्र भी बचे रहेंगे । संभव है कि प्रेम पत्रों का रंग रूप, मन-मिजाज, आकार प्रकार आदि बदल जाएं पर प्रेम की अभिव्यक्ति का ये माध्यम कायम रहेगा । ऐसा शायद ही कोई शख्स होगा जिसने अपनी जिंदगी में प्रेम पत्र ना लिखा हो । कई वीर पुरुष अपने प्रेम पत्रों को गंतव्य तक पहुंचा देते हैं तो कई डरपोक किस्म के आशिक प्रेम पत्रों को तह लगाकर तकिए के नीचे रखकर जिंदगी गुजार देते हैं । स्कूली दिनों से कॉलेज के दिनों तक प्रेम पत्र लिखने के कई तरह के किस्से आम हैं । प्रेमिका तक उसके छोटे भाई और उसकी बहन के मार्फत प्रेम-पत्र पहुंचाने की परंपरा रही है । प्रेमिका के छोटे भाई या बहन के मार्फत भेजे जानेवाले प्रेम पत्र बहुधा पकड़ भी लिए जाते थे और फिर मोहब्बत का फसाना आम हो जाता था । कभी प्रेमी की पिटाई तो कभी प्रेमिका पर बंदिश लगाकर मोहब्बत पर ब्रेक लगाने की कोशिश की जाती रही है लेकिन प्रेम पत्रों को रोकना नामुमकिन होता है । तमाम बाधाओं के बाद भी प्रेम पत्र अपने गंतव्य तक पहुंचते रहे हैं । बदलते जमाने के साथ तो प्रेम पत्रों को फॉर्मेट भी बदल गया है । पहले याहू चैट, फिर जीमेल चैट, फिर एसएसएस संदेश के मार्फत इजहार ए मोहब्बत और अब तो सबसे ज्यादा लोकप्रिय है व्हाट्सएप चैट । तकनीक के उन्नत होने के दौर ने लंबे लबे प्रेम पत्रों की परंपरा अवश्य खत्म की लेकिन व्हाट्सएप जैसे एप के मार्फत होनेवाले लंबे चैट ने उसकी जगह ले ली । अब तो प्रेमी प्रेमिकाओं के पास अपने संवेदनाओं को प्रेषित करने के साथ साथ अपनी तस्वीरें भेजने का विकल्प भी है ।

प्राय: यह माना जाता है कि साहित्य की दुनिया में प्रवेश करनेवाले ज्यादातर लेखक प्रेम पत्रों के जबरदस्त लेखक होते हैं । एक जमाना था जब साहित्य में भी प्रेम पत्रों की खासी अहमियत होती थी । सारिका जैसी साहित्यक पत्रिका ने, मेरे जानते, दो अंक सिर्फ प्रेम पत्रों पर केंद्रित किए थे । अभी हाल ही में प्रतिलिपि डॉट कॉम और हिंदी अकादमी की पत्रिका इंद्रप्रस्थ भारती ने प्रेम पत्रों को तवज्जो देने का ऐलान किया है । प्रतिलिपि डॉट कॉम ने तो प्रेम पत्रों को पुरस्कृत करने का एलान किया है वहीं हिंदी अकादमी की उपाध्यक्षा मैत्रेयी पुष्पा ने अपने संस्थान से निकलनेवाली पत्रिका के लिए प्रेम पत्र लेखकों को आमंत्रित किया है । इन्हें हम प्रेम पत्र की वापसी का दौर तो नहीं मान सकते हैं क्योंकि वापसी तो उसकी होती है जो खत्म हो चुका होता है, हां इतना अवश्य कह सकते हैं कि साहित्य के लोगों ने एक बार फिर से प्रेम पत्रों की ओर ध्यान दिया है । अभी पिछले दिनों ज्ञानपीठ ने पुष्पा भारती के धर्मवीर भारती को लिखे प्रेम पत्रों का संकलन छापा था । यह एक बेहद दिलचस्प किताब बनी है । कहानियों और उपन्यासों में तो प्रेम पत्रों के महत्व पर कई लेखकों ने प्रकाश डाला है । लेकिन यथार्थ की खुरदरी जमीन पर प्रेम सूखने लगा था और कहानियों, उपन्यासों आदि से प्रेम गायब होने लगे थे । विचारधारा के कोलाहल के बीच, नारेबाजी के बोलबाले के दौर में लिखे जानेवाले साहित्य ने कविता से लेकर कहानी और उपन्यास हर जगह प्रेम को नेपथ्य में भेज दिया । यह अकारण नहीं है कि धर्मवीर भारती के गुनाहों के देवता और मनोहर श्याम जोशी के कसप के बाद कोई दूसरा प्रेम उपन्यास पाठकों के बीच उतना लोकप्रिय नहीं हो सका । आज भी पुस्तक मेलाओं में गुनाहों का देवता और कसप के पीछे पाठक पागल रहते हैं । कविता की दुनिया से भी प्रेम लगभग ओझस नजर आता है । एक बड़ी लाइन और फिर छोटी लाइन वाली कविता से प्रेम गायब है । कुछ कवि अवश्य प्रेम कविताएं लिख रहे हैं लेकिन उन कविताओं में प्रेम को लेकर एक हिचक है, हिचक विचारधारा से खौफ का है । कहा गया है कि आधे मन से किया गया गया कोई कभी वो प्रभाव नहीं छोड़ता जो पूरे नम से किया गया काम छोड़ता है । इधर कुछ नए लेखकों के उपन्यासों में प्रेम बगैर सेंसर किए रूप में प्रकट होने लगा है । उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंदी का कोई लेखक तकनीक के इस उन्नत दौर में प्रेम-पत्रों के लिए कुछ करेगा अन्यथा बद्री नारायण जैसे कवि को एक बार फिर से प्रेम पत्रों को लेकर चिंता प्रकट करनी पड़ सकती है ।