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Saturday, June 9, 2018

सफल होती नायिका प्रधान फिल्में


तीन साल पहले की बात है, कुमाऊं लिटरेचर फेस्टिवल में फिल्मों पर एक सत्र चल रहा था जिसमें फिल्मी शख्सियतों पर पुस्तकें लिखनेवाले लेखक शामिल थे। राजेश खन्ना के जीवनीकार गौतम चिंतामणि और यासिर उस्मान, शशि कपूर के जीवनीकार असीम छाबड़ा के अलावा अन्य लोग थे। सत्र का संचालन फिल्म पत्रकार मयंक शेखर कर रहे थे। इस चर्चा के दौरान किसी वक्ता ने ये कह दिया कि हिंदी में नायिकाएं अपने बूते पर फिल्मों को हिट नहीं करवा पाती हैं। इस बयान के बाद वहां मौजूद श्रोताओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई और श्रोताओं के हस्तक्षेप की वजह से चर्चा काफी गरम हो गई थी। मंच पर बैठे सभी वक्ता बैकफुट पर आ गए थे। मंचासीन सभी वक्ता इस बात पर एकमत हो गए कि उनके कहने का आशय ये था कि हिंदी फिल्मों के इतिहास में कोई महिला सुपरस्टार नहीं हुई जो अपने दम पर फिल्म को लगातार हिट करवा सके। किसी तरह बात संभली थी लेकिन इसके बाद चर्चा इस पर होने लगी थी कि बॉलीवुड नायक प्रधान क्यों है। क्यों नायिकाओं को नायकों से कम पैसे मिलते हैं। क्यों नायकों से नायिकाओं के बारे में उनकी पसंद पूछी जाती है, आदि आदि। यह बात उस वक्त होकर खत्म हो गई लेकिन उक्त वक्ता की टिप्पणी मन के किसी कोने अंतरे में धंसी रह गई।
हाल ही में कई फिल्में इस तरह की आईं है जिसमें नायिकाओं ने अपने बूते पर फिल्म को हिट करवाया। आलिया भट्ट ने अपने अभिनय के बूते पर फिल्म ‘राजी’ को 100 करोड़ के क्लब में शामिल करवा दिया। इस फिल्म में कोई स्टार नायक नहीं है, बावजूद इसके ये फिल्म सुपर हिट रही। इससे तो एक और दिलचस्प बात जुड़ी है कि इस फिल्म का निर्देशन भी एक महिला ने किया है, मेघना गुलजार। ‘राजी’ की रिलीज के चंद दिनों बाद एक और फिल्म आई ‘वीरे द वेडिंग’। इस फिल्म ने भी दो हफ्ते में करीब साठ करोड़ का बिजनेस किया है, जिसको बेहतर प्रदर्शन माना जा सकता है। इसमें भी कोई स्टार नहीं है बल्कि चार नायिकाएं करीना कपूर खान, सोनम कपूर आहूजा, शिखा और स्वरा भास्कर है। हलांकि इस फिल्म में सफल होने के लिए तमाम तरह का मसाला डाला गया । फिल्म में महिलाओं की बातचीत में गालियों की भरमार है, यौनिकता का प्रदर्शन है, स्वछंदता की वकालत की गई है और इसको फेमिनिस्ट फिल्म कहकर प्रचारित भी किया गया। फेमिनिज्म की आड़ में सेक्सुअलिटी से लेकर गाली गलौच को आधिनिक महिलाओं की जीवन शैली का हिस्सा बताकर पेश किया गया है। दरअसल कुछ फिल्मकारों को लगता है कि गाली गलौच करके, फ्री सेक्स की वकालत करके ही महिलाएं स्वतंत्र हो सकती हैं। फिल्म  ‘वीरे द वेडिंग’ के कर्ताधर्ता इसी दोष के शिकार हो गए। ऐसे फिल्मकारों को स्त्री स्वतंत्रता और स्वछंदता का भेद समझना होगा। फिल्म अच्छी कमाई करने की राह पर भले ही अग्रसर दिखाई देती हो लेकिन इस फिल्म का स्थायी महत्व होगा, इसमें संदेह है। हां, कमाई के लिहाज से इसको याद रखा जा सकता है। फेमिनिज्म पर पूर्व में भी कई फिल्में बनीं जो भारतीय हिंदी सिनेमा में आज भी याद की जा सकती हैं। स्मिता पाटिल और शबाना आजमी अभिनीत फिल्म ‘अर्थ’ में नारी स्वतंत्रता का जो चित्रण है वो स्थायी है। फिल्म के क्लाइमैक्स पर शादीशुदा कुलभूषण खरबंदा अपनी प्रेमिका स्मिता पाटिल को छोड़कर वापस अपनी पत्नी शबाना आजमी के पास पहुंचता है और माफी मांगता है। शबाना आजामी उसको माफी देने से मना करती है और कहती है कि अगर मैं किसी मर्द के साथ इतने दिन गुजारकर तुम्हारे पास वापस आती तो क्या मुझे माफ कर देते। फिल्म यहां खत्म हो जाती है। स्त्री स्वतंत्रता का उत्स है इस फिल्म में। बगैर किसी शोर शराबे के, बगैर किसी गाली गलौच के। उस फिल्म की नायिका जितनी बोल्ड और बिंदास थी, ‘वीरे द वेडिंग’ में वो बात नहीं है। खैर ये अलहदा मुद्दे हैं उसपर फिर कभी विस्तार से बात होगी।
फिलहाल हम बात कर रहे हैं नायिका के केंद्रीय रोल में फिल्मों के सफल होने की। इसी तरह की एक फिल्म आई थी ‘हिचकी’। ये फिल्म भी रानी मुखर्जी ने अपने बूते पर सफल करवाई। ‘हिचकी’ फिल्म की नायिका ‘टूरेट सिंड्रोम’ से पीड़ित होती है जिसके बारे में कम लोगों को पता था। ये एक न्यूरोसाइकेट्रिक समस्या है जो किसी को भी बचपन से ही हो सकती है। इस फिल्म को भी पर्याप्त सफलता मिली। इसके पहले ‘मॉम’ फिल्म भी सफल रही। ऐसा नहीं है कि नायिका प्रधान फिल्में पहले हिट नहीं होती रही हैं। नायिका प्रधान फिल्मों के हिट होने का एक लंबा इतिहास है । फिल्म ‘मदर इंडिया’ से लेकर फिल्म ‘लज्जा’ तक और फिर फिल्म ‘कहानी’ से से लकर ‘क्वीन’ तक। हर दौर में महिला प्रधान फिल्में बनती रही हैं, लेकिन हाल के दिनों में महिला प्रधान फिल्मों के सफल होने की संख्या बढ़ी है। समकालीन समय में हम ‘क्वीन’ को इस सफलता का प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं। 2014 में रिलीज हुई इस फिल्म ‘क्वीन’ में कंगना रनौट ने अपने अभिनय के बल पर शानदार सफलता हासिल की थी। फिल्मी दुनिया के ट्रेड पंडितों के मुताबिक ‘क्वीन’ के निर्माण पर करीब 13 करोड़ रुपए खर्च हुए थे और फिल्म ने सौ करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया था। इस तरह से देखें तो इस फिल्म ने अपनी लागत के करीब नौ गुना ज्यादा रकम का बिजनेस किया। श्रीदेवी की फिल्म ‘मॉम’ भी सफल रही थी। उसने भी अपने लागत से कई गुणा ज्यादा का बिजनेस किया था।
ऐसा नहीं है कि इस दौर में सभी नायिका प्रधान फिल्म सुपरहिट ही रहीं। विद्या बालन की फिल्म ‘बेगम जान’ जिसे मशहूर निर्देशक श्रीजित मुखर्जी ने निर्देशित किया था वो ज्यादा बिजनेस नहीं कर पाई। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब बीस करोड़ में बनी ये फिल्म तीस करोड़ का ही बिजनेस कर पाई। हलांकि विद्या की ही एक और फिल्म ‘तुम्हारी सुलु’ ने औसत बिजनेस किया। बीस करोड़ की लागत से बनी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 50 करोड़ का कारोबार किया।
दरअसल स्त्रियों को लेकर वही फिल्में ज्यादा दर्शकों को अपनी ओर खींच रही हैं जिसमें स्त्री पात्रों को लेकर ज्यादा जिम्मेदार किस्म की कथानक पर फिल्में बन रही हैं। हमारे देश में 1991 में आर्थिक उदारीकरण के दौर और खुले बाजार की वजह से कई ऐसी फिल्में आई जिनमें स्त्री चरित्रों का इस्तेमाल फिल्मकारों ने अपने व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखते हुए किया और खुलेपन के तर्क की ओट में नायिकाओं के कपड़े कम करते चले गए। यह उन्नीस सौ सत्तर या उन्नीस सौ अस्सी के दौर की फिल्मों से अलग थी। ब्रिटिश अभिनेत्री एमा थॉमसन का हॉलीवुड फिल्मों को लेकर एक मशहूर कथन है- ‘1980 या उस दौर के आसपास बनने वाली फिल्में का नैतिक स्तर बिल्कुल शून्य था। मुनाफा ही उसका उद्देश्य था, जिसका सीधा संबंध उन भूमिका से रहा है जो फिल्मों में नायिकाओं को दी जाती रही हैं। उस दौर में स्त्री का मतलब या तो भोली भाली स्त्री या नायकों को अपने हाव-भाव से लुभानेवाली नायिका।‘ इस कथन के आलोक में हम हिंदी फिल्मों के 1990 से लेकर 2000 तक के दौर को देख सकते हैं बल्कि दो चार साल आगे तक भी। लेकिन अब जब नए लेखकों का दौर आया है तो उन्होंने हिंदी फिल्मों में भारतीय स्त्रियों की परंपरागत छवि को ध्वस्त करते हुए उसका एक नया रूप गढ़ा है।इस नए रूप में कई बार विचलन भी देखने को मिलता है लेकिन वो ज्यादातर यथार्थ के करीब होती हैं। जैसे अगर हम दो हजार ग्यारह में आई फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ को देखें, जो दक्षिण भारतीय फिल्मों की नायिका सिल्क स्मिता की जिंदगी पर बनी थी, में तमाम मसालों और सेक्सी दृश्यों की भरमार के के बावजूद यथार्थ बहुत ही खुरदरे रूप में मौजूद था। नायिका प्रधान फिल्मों की सफलता इस ओर भी संकेत दे रही है कि अगर कहानी अच्छी हो, उस कहानी का फिल्मांकन बेहतर हो तो वो सफल हो सकती है। यह भी प्रतीत होता है कि हिंदी दर्शकों की रुचि का भी परिष्कार हो रहा है और अब वो यथार्थवादी फिल्मों को तुलनात्मक रूप से ज्यादा पसंद करने लगा है। उदाहऱम के तौर पर अगर हम 2016 में रिलीज हुई फिल्म ‘पिंक’ का उदाहरण लें तो वो फिल्म अपनी कहानी और उसके बेहतरीन चित्रण की वजह से दर्शकों को खूब पसंद आई। 23 करोड़ की लागत से बनी फिल्म ने 100 करोड़ से ज्यादा बिजनेस किया। इस तरह की फिल्मों की सफलता से यह उम्मीद जगी है कि अगर हिंदी फिल्मों में स्त्री पात्रों का चित्रण यथार्थपरक तरीके से किया जाए तो वो समाज पर असर भी डालेंगी और कारोबार भी अच्छा करेगी।

Saturday, May 12, 2018

विभाजन, युद्ध और प्यार की फिल्में


हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद से दोनों देशों के बीच का रिश्ता ऐसा है जो एक दूसरे मुल्क की रचनात्मकता को भी गहरे तक प्रभावित करता रहा है। साहित्य, कला, संगीत, फिल्म में इस रिश्ते और उसके साथ साथ घटित होनेवाली घटनाओं पर बहुतायत में लिखा और रचा गया है। दोनों देशों की आवाम से लेकर वहां के हुक्मरानों के बीच एक ऐसा रिश्ता है जिसमें नफरत और प्यार दोनों दिखाई देता है। विभाजन पर भीष्म साहनी ने ‘तमस’ जैसा उपन्यास लिखा तो इंतजार हुसैन ने भी दोनों देशों के रिश्तों पर कई बेहतरीन कहानियां लिखीं।कई पाकिस्तानी शायरों को भारत में ज्यादा पाठक मिले तो लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी के दीवाने पाकिस्तान में भी हैं। यह सूची बहुत लंबी है। लेकिन हाल के दिनों में पाकिस्तान ने जिस तरह से भारत की सरजमीं पर नफरत और आतंक को अंजाम देना शुरू किया तो उसके बाद से ये रिश्ता प्यार का कम नफरत का ज्यादा हो गया। लगभग हर दिन भारतीय सीमा पर पाकिस्तान की तरफ से गोलीबारी, भारतीय फौज पर हमले, कश्मीर में आतंकवादियों के मार्फत अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने की कोशिशों ने पाकिस्तान को एक ऐसे पड़ोसी में तब्दील कर दिया जिससे एक दूरी जरूरी हो गई। पाकिस्तानी कलाकारों का आतंक की घटनाओं पर चुप रहना भारतीयों को उद्वेलित करता रहता है। इसका खामियाजा भी उन कलाकारों को भुगतना पड़ा।
पाकिस्तान के साथ बदलते रिश्तों का प्रकटीकरण हिंदी फिल्मों में भी देखने को मिलता है, कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप से । इस पार और उस पार के प्यार की कई दास्तां रूपहले पर्द पर आई। दोनों देशों के बीच लड़े गए युद्ध को लेकर भी कई फिल्में बनीं, चाहे वो 1965 का युद्ध हो या फिर 1971 का युद्ध या फिर करगिल युद्ध हो। इसके अलावा दोनों देशों के विभाजन की आड़ में सांप्रदियकता और महिलाओं पर होनेवाले अत्याचार पर भी कई फिल्में बनीं। दोनों देशों के तनावपूर्ण रिश्तों और युद्ध के माहौल में जासूसों की अहम भूमिका है। रॉ और इंटेलिजेंस ब्यूरो जैसी संस्थाओं के जाबांजों को केंद्र में रखकर भी लगातार फिल्में बनीं और बन भी रही हैं। इन फिल्मों में से कई फिल्में तो उपन्यासों पर भी बनीं। अभी अभी रिलीज हुई फिल्म ‘राजी’ भी सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कमांडर हरिंदर एस सिक्का के उपन्यास ‘कॉलिंग सहमत’ पर बनी है। इस फिल्म में एक कश्मीरी लड़की की शादी पाकिस्तान फौज के आला अफसर के बेटे से होती है जो खुद पाकिस्तानी फौज में अफसर होता है। कश्मीरी लड़की का नाम सहमत है और इसकी भूमिका निभाई है आलिया भट्ट ने। सहमत पाकिस्तान फौज के उस आला अफसर के घर में बहू बनकर रहती है, परिवार का दिल जीतती है लेकिन वो दरअसल होती है रॉ की एजेंट जो अपने वतन के लिए अपनी जान खतरे में डालकर, अपना सबकुछ दांव पर लगाकर ये काम करने को राजी होती है। दिल्ली युनिवर्सिटी की एक मासूम सी लड़की वतन पर कुर्बान होने की अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाती है। कहा जा रहा है कि ये एक सच्ची कहानी है। आलिया ने अपने शानदार अभिनय से इस किरदार को एक ऊंचाई दी है। फिल्म के आखिरी हिस्से में ‘रॉ’ के ऑपरेशन में उसका पति मारा जाता है, तब वो दोनों देशों के बीच जाकी हिंसा और उसको रास्ते में आनेवाले लोगों को मार डालने की एजेंसियों की ट्रेनिंग को अंजाम देने के काम से ऊब चुकी होती है। अपने मिशन में कामयाब होकर जब सहमत वापस अपने मुल्क लौटती है तो उसे पता चलता है कि वो गर्भवती है। अस्पताल के बेड पर बैठी सहमत कहती है कि वो अपना गर्भ नहीं गिराएगी क्योंकि वो और कत्ल नहीं करना चाहती है। यह वाक्य बहुत कुछ कह जाता है। कहानी बहुत अच्छी है जिसका ट्रीटमेंट भी सधा हुआ है, गुलजार के गीत है, उनका बेटी मेघना का निर्देशन है। पूरी फिल्म के दौरान एक रोमांच बना रहता है कि आगे क्या? किसी भी कहानी की सफलता यही होती है कि पाठक या दर्शक को हमेशा ये लगता रहे कि आगे क्या होगा। नामवर सिंह ने इस आगे क्या जानने की पाठकों की उत्सकुता को कहानी की विशेषता बताया था। उनका मानना है कि कहानी ही पाठकों को आगे देखने या चलने के लिए प्रेरित करती है जबकि कविता तो पीछे लेकर जाती है । अगर अच्छी कविता होती है तो उसके पाठ के बाद श्रोता कवि से एक बार फिर से उन पंक्तियों को दुहराने को कहते हैं। नामवर सिंह के इस कथन के आलोक में अगर देखें तो फिल्म ‘राजी’ दर्शकों को जबरदस्त सस्पेंस से गुजारती है। हर वक्त दर्शकों के मन में ये चलता रहता है कि अब सहमत के साथ क्या होगा, उसको लेकर एक डर बना रहता है।यह उत्सकुकता अंत तक बनी रहती है।   
हिंदी फिल्मों में भारत-पाकिस्तान के विभाजन और उसमें हिंदू मुस्लिम, पारसी, सिख परिवारों के द्वंद पर भी कई फिल्में आईं। भारत पाकिस्तान विभाजन को केंद्र में रखते हुए और उसके वजहों को दर्शाती पहली फिल्म मानी जाती है ‘धर्मपुत्र’ ।ये फिल्म यश चोपड़ा ने बनाई थी और 1961 में रिलीज हुई थी। ये फिल्म आचार्य चतुरसेन शास्त्री की इसी नाम की कृति पर आधारित थी। ये फिल्म कट्टरता, सांप्रदायिकता आदि आदि को शिद्दत से रेखांकित करती है।ये पारिवारिक फिल्मी कहानी है जिसमें दो परिवारों का द्वंद सामने आता है। इसके बाद एक फिल्म इस्मत चुगताई की कहानी पर आई ‘गरम हवा’। ये फिल्म काफी चर्चित रही थी और उसको काफी प्रशंसा और पुरस्कार दोनों मिले थे। इसको एस एस सथ्यू ने निर्देशित किया था। इस फिल्म को कला फिल्मों की शुरुआत के तौर पर भी माना जाता है। फिल्म भले ही आगरा के इर्द गिर्द है लेकिन इसका व्यापक फलक भारत-पाकिस्तान रिश्ता और बंटवारे के बाद का द्वंद है। साहित्यक कृतियों पर बनने वाली इस तरह की फिल्मों की एक लंबी सूची है । भीष्म साहनी के बेहद चर्चित उपन्यास ‘तमस’ पर इसी नाम से अस्सी के दशक में टेली-फिल्म का निर्माण हुआ था। इस फिल्म में भारत विभाजन के बाद हिंदू और सिख परिवारों की यंत्रणाएं चित्रित हुई थीं। खुशवंत सिंह के उपन्यास ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इसमें भी विभाजन की त्रासदी है।  
विभाजन के बाद भारत पाकिस्तान में हुए युद्ध पर भी कई फिल्में बनीं। फिल्म ‘राजी’ जिस तरह से 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध की पृष्ठभूमि पर है इसी तरह सत्तर के दशक के शुरुआती वर्ष में चेतन आनंद ने ‘हिन्दुस्तान की कसम’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी। इस फिल्म में 1971 के युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के शौर्य को दिखाया गया था। इस फिल्म में वायुसेना के वेस्टर्न सेक्टर के अभियान ‘ऑपरेशन कैक्टस लिली’ को केंद्र में रखा गया था। इसी नाम से एक और फिल्म बनी थी जिसमें अजय देवगन और अमिताभ बच्चन थे। आमतौर पर माना जाता है कि भारत पाकिस्तान युद्ध या दोनों देशों के रिश्तों पर बनी हिंदी फिल्में अच्छा कारोबार करती हैं लेकिन इन दोनों फिल्मों ने औसत कारोबार किया था। दूसरी बार बनी ‘हिन्दुस्तान की कसम’ को तो बंपर ओपनिंग मिली थी लेकिन वो अपनी सफलता को कायम नहीं रख पाई थी।
विभाजन की विभीषिका और भारत पाक युद्ध के अलावा दोनों देशों के प्रेमी-प्रमिकाओं को केंद्र में रखकर भी दर्जनों फिल्में बनीं। सनी देवल की ‘गदर एक प्रेम कथा’ जाट सिख लड़के और एक मुस्लिम लड़की के प्रेम पर आधारित एक्शन फिल्म थी। इस फिल्म को भी लोगों ने काफी पसंद किया था। इसी तरह से यश चोपड़ा की फिल्म ‘वीर जारा’ भी लोगों को खूब पसंद आई। इसमें एक एयरफोर्स अफसर वीर को पाकिस्तानी लड़की जारा से प्रेम हो जाता है। तमाम मुश्किलों और बाधाओं के बाद भी दोनों मिल जाते हैं। नफरत पर प्रेम की जीत का संदेश। सलमान खान ने भी कई फिल्में की। ‘बजरंगी भाई जान’ में एक पाकिस्तानी लड़की जो भटक कर हिन्दुस्तान आ जाती है उसको उसके घर तक पहुंचाने के लिए पवन कुमार चतुर्वेदी, जिसकी भूमिका सलमान ने निभाई है, जान की बाजी लगा देता है। अंत में फिर नफरत पर प्यार की जीत। कबीर खान की इस फिल्म को जमकर दर्शक मिले। कबीर खान ने ही ‘एक था टाइगर’ बनाई जिसमें एक भारतीय एजेंट महिला पाकिस्तानी एजेंट से प्यार हो जाता है। इसका सीक्वल भी बना, ‘टाइगर जिंदा है’। इसमें तो उत्साही निर्देशक ने रॉ और पाकिस्तान का बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को साथ ऑपरेशन करते भी दिखा दिया, जो कल्पना की हास्यास्पद परिणति है। नफरत पर प्यार की जीत दिखाने के चक्कर में इस तरह की हास्यास्पद स्थितियों के चित्रांकन से बचना चाहिए अन्यथा दर्शकों का विवेक फिल्म को नकार भी सकता है।