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Wednesday, June 4, 2014

सोशल साइट्स का विजयपथ

अपनी फसल को किसान बेहद मेहनत से तैयार करता है और जब फसल लहलहाने लगती है और तैयार हो जाती है तो इलाके का दबंग जमींदार अपने कारकुनों के साथ पहुंच कर फसल कटवा लेता है । यह दृश्य कई फिल्मों में कई बार फिल्माया गया है । अस्सी के दशक में बिहार में बहुधा ऐसे वाकए सुनने को मिलते थे । इस बार लोकसभा के चुनाव में भी इससे ही मिलता जुलता वाकया देखने को मिला । यूपीए सरकार के खिलाफ अन्ना आंदोलन से जो जमीन तैयार हुई थी उसपर मोदी ने सियासी फसल काटी । दो हजार ग्यारह की बात है यूपीए सरकार के एक के बाद एक लाखों करोड़ के घोटाले उजागर हो रहे थे । देश में महंगाई अपने चरम पर थी । पेट्रोल के दाम लगातार बढ़ रहे थे । रुपए का लगातार अवमूल्यन हो रहा था । शेयर बाजार में सुस्ती छाई थी । पूरे देश की जनता एक तरह से यूपीए सरकार से उबी हुई लग रही थी । सरकार लाचार लग रही थी । प्रधानमंत्री हर बार महंगाई से निबटने के लिए एक नई तारीख दे रहे थे । सोनिया गांधी के अस्वस्थ होने की वजह से कांग्रेस की हालत बगैर कप्तान के टीम जैसी हो गई थी क्योंकि उपकप्तान अपनी धुन में मस्त था । वह आदर्शवाद और व्यावहारिकता में फर्क नहीं कर रहा था । महंगाई के खिलाफ देशभर में बीजेपी के प्रदर्शन की योजना टांय-टांय फिस्स हो चुकी थी । विपक्ष भी सुस्ता रहा था । ऐसे ही माहौल में अरविंद केजरीवाल ने जब अन्ना हजारे की अगुवाई में दो हजार ग्यारह में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू किया था तो उसे अपार जनसमर्थन मिला था । दिल्ली का रामलीला मैदान हो या जंतर मंतर दोनों जगह लाखों की भीड़ उमड़ी थी । अरविंद केजरीवाल की टीम ने दिल्ली में अन्ना हजारे के दोनों अनशन के दौरान सोशल मीडिया और नेटवर्किंग साइट्स के अलावा यूट्यूब का भी जमकर उपयोग किया था। अपनी बात को जनता तक पहुंचाने से लेकर जनता को मोबलाइज करने तक में । राजनीति पर बारीक नजर रखनेवालों ने उस आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया, नेटवर्किंग साइट्स और इंटरनेट की पहुंच और ताकत का अंदाज लगा लिया था । अनशन के पहले जब अन्ना हजारे को दिल्ली के मयूर विहार इलाके से गिरफ्तार किया गया था तो उनकी गिरफ्तारी के फौरन बाद टीम अन्ना ने उनका प्रीरिकॉर्डेड मैसेज यूट्यूब पर अपलोड कर दिया था । अन्ना के उस मैसेज का जोरदार असर हुआ और उनके तिहाड़ जेल पहुंचने से पहले हजारों की भीड़ वहां पहुंच चुकी थी । एक असर यह भी हुआ था कि तिहाड़ जेल के बाहर पहुंची हजारों की भीड़ कभी भी हिंसक नहीं हुई । अन्ना के आंदोलन के दौरान अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए बनाया गया इंडिया अगेंस्ट करप्शन का ट्विटर हैंडल के एक लाख से ज्यादा फॉलोवर थे । बाद में जब टीम अन्ना में दरार हो गई तो यह ट्विटर हैंडल उनके पास से निकल गया । लेकिन तबतक अरविंद केजरीवाल का अपना ट्विटर हैंडल खासा लोकप्रिय हो चुका था । इस पूरी कहानी को बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि देश में सियासत की फसल लहलहा रही थी, जरूरत थी तो उसको काटकर सत्ता का स्वाद चखने की । दिल्ली से दूर पश्चिम के एक राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी बारीकी से देश के हालात पर नजर रखे हुए थे । हम यहां नरेन्द्र मोदी की तुलना गांव के उस दबंग से तो नहीं कर सकते हैं जो खड़ी फसल को काट लेता है लेकिन केजरीवाल और अन्ना आंदोलन से जो सियासी जमीन तैयार हुई थी उसपर बहुमत की बुलंद इमारत उन्होंने खड़ी कर ली और देश के सर्वोच्च कार्यकारी पद तक जा पहुंचे ।
अन्ना आंदोलन से यूपीए सरकार के खिलाफ जो एक माहौल बना, नरेन्द्र मोदी ने उसमें अपने लिए संभावना तलाशी और योजनाबद्ध तरीके से अपनी पूरी टीम को सक्रिय कर दिया । सोशल मीडिया पर, नेटवर्किंग साइट्स पर, इंटरनेट पर और यूट्यूब पर मोदी के पक्ष में पूरी की पूरी टीम सक्रिय हो गई । देश के अलग अलग हिस्सों से ट्विटर पर मोदी के पक्ष में हवा बनाई जाने लगी । फेसबुक पर मोदी के पेज के लाइक्स की संख्या लाखों में पहुंचने लगी जो चुनाव तक एक करोड़ को पार कर गई । मोदी के एक मजबूत और निर्णायक नेता की छवि गढ़ने में ट्विटर और फेसबुक की अहम भूमिका रही । मोदी के पक्ष में आक्रामकता के साथ मुहिम और उनके विरोधियों पर टूट पड़ने को ट्विटर सेना मुस्तैदी के साथ डटी रहती थी । यह काम चौबीसों घंटे चलता था । मोदी के पक्ष में लिखी बात ट्विटर पर लगातार रीट्वीट होती रहती थी और जैसे ही कोई मोदी के खिलाफ कोई ट्वीट होता था तो लिखने वाले पर चौतरफा हमले शुरू हो जाते थे । बहुधा मर्यादा की सीमा भी लांघी जाती थी । इस चुनाव के दौरान ट्विटर, फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स का विश्लेषण करनेवालों का कहना है कि चुनाव के नतीजों के बाद इन साइट्स पर मोदी के पक्ष में सक्रियता काफी कम हो गई है । इससे इस बात के संकेत मिलते हैं कि फतह के बाद सेना बैरक में चली गई है ।  

अन्ना आंदोलन से बने माहौल. सोशल नेटवर्किंग साइट्स और इंटरनेट के बेहतरीन इस्तेमाल के अलावा मोदी ने अत्याधुनिक तकनीक का भी जमकर इस्तेमाल किया । तमिल, तेलुगू, बांग्ला से लेकर अन्य कई भाषाओं में मोदी की आवाज में डब किए गए उनके भाषण उनकी खुद की बेवसाइट के अलावा यूट्यूब पर फौरन अपलोड की जाती थी । इन भाषणों के लिंक फेसबुक से लेकर ट्विटर पर दनानन फैलते थे और हजारों की संख्या में हिट्स मिलते थे । इस चुनाव में थ्री डी तकनीक का इस्तेमाल कर मोदी ने अपने विरोधियों को तो मात दी ही जनता को भी कम नहीं चौंकाया । एक जगह बैठकर देश के कोने कोने में बैठे लोगों से चाय पर चर्चा करके भी मोदी देश के बहुसंख्यक मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाने में कामयाब रहे । सोलहवीं लोकसभा के चुनाव के पहले हमारे परंपरावादी राजनैतिक टिप्पणीकारों का यह मानना था कि जनतंत्र में जन के पास जाकर ही उनको संतुष्ट किया जा सकता है । तर्क यह भी दिया जाता था कि जो लोग जनता तक पहुंच पाते हैं वो आभासी माध्यमों के मार्फत जनता से संवाद स्थापित भले ही स्थापित कर लें लेकिन वोट लेने में कामयाब नहीं हो पाएंगे । मोदी के पक्ष में आए चुनावी नतीजों ने इन सारे मिथकों को चकनाचूर कर दिया । प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद भी मोदी को संवाद के इस आधुनिक टूल की अहमियत पता है लिहाजा वो हर वक्त ट्विटर पर सक्रिय रहते हैं और सरकारी विभागों को भी उन्होंने सक्रिय रहने का संदेश दे दिया है । शपथ लेने के चंद मिनट बाद प्रधानमंत्री कार्यालय की बेवसाइट का बदल जाना और उसपर देशवासियों के नाम मोदी का संदेश अपलोड होना इस बात की तस्दीक भी करता है । 

Sunday, March 16, 2014

अन्ना के असफल पड़ाव

भारतीय राजनीति और समाज सेवा के क्षेत्र में अन्ना हजारे एक ऐसा नाम हैं जिसे दो हजार ग्यारह के पहले महाराष्ट्र के एक इलाके के ही लोग जानते थे । महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धि को समाज सुधार के मॉडल के तौर पर देखा जाने लगा था । अन्ना हजारे ने वहां के सरपंच के साथ मिलकर पूरे इलाके की तस्वीर बदलने में अहम भूमिका निभाई थी । एक जमाने में गांव में शराब की दर्जनों दुकानें थी और वहां पानी की बेहद दिक्कत थी । अन्ना हजारे ने शराबबंदी के खिलाफ मुहिम सफलतापूर्वक मुहिम चलाई और वाटर हारवेस्टिंग के जरिए रालेगण सिद्धि को पानी के मसले में आत्मनिर्भर बनाया । अन्ना के प्रयासों का ही नतीजा था कि रालेगण सिद्धि में प्रति व्यक्ति औसत आय तकरीबन राजधानी दिल्ली के प्रति व्यक्ति औसत आय तक पहुंच गई । उनके आंदोलनों की वजह से महाराष्ट्र के कई मंत्रियों को कुर्सियां गंवानी पड़ी, कई नेताओं को जेल भी जाना पड़ा । इस तरह से अन्ना हजारे महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक योद्धा के रूप में जाने गए । कालांतर में अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र के प्रत्येक ब्लॉक में एक संयोजक नियुक्त किया जो उन्हें इलाके में हो रहे भ्रष्टाचार की जानकारी देता था और अन्ना के निर्देश के हिसाब से उसके खिलाफ काम करता था । बाद में जब अरविंद केजरीवाल ने अरुणा राय और उनके संगठन से अलग होकर जनलोकपाल की लड़ाई लड़ने का फैसला किया तो केजरीवाल को आंदोलन के लिए एक चेहरे की दरकार पड़ी । अन्ना हजारे के रूप में केजरीवाल को एक ऐसा शख्स मिला जो बुजुर्ग होने के साथ साथ धोती कुर्ता और गांधी टोपी पहनता था । जिसका कोई परिवार नहीं था और वो मंदिर में रहता था । भारतीय जनमानस को लुभाने के लिए एक आदर्श छवि थी । अन्ना हजारे के नेतृत्व में दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ एलान ए जंग हुआ । भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों का गुस्सा इतना था कि उस आंदोलन को अभूतपूर्व समर्थन मिला । अन्ना हजारे का चेहरा और अरविंद केजरीवाल की सूक्ष्मतम स्तर की योजना ने रंग दिखाया । उसके बाद की बातें इतिहास हैं ।

दो साल के अंदर जब अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक महात्वाकांक्षा ने आम आदमी पार्टी का गठन किया तो अन्ना हजारे ने अपने आपको केजरीवाल की महात्वाकांक्षा से खुल को अलग कर लिया । दोनों के बीच बढ़ रही संवादहीनता ने तल्खी को भी बढ़ाव दिया । दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले अन्ना हजारे ने अरविंद केजरीवाल को अपना नाम इस्तेमाल नहीं करने को कहा जिसे आम आदमी पार्टी ने लगभग मान लिया । इस बीच अन्ना हजारे और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने देशभर में जनतंत्र यात्रा की । इस यात्रा की सफलका को लेकर दो तरह के मत हैं । केजरीवाल के सिपहसालारों ने अन्ना के नए सहयोगियों पर उनको बरगलाने का आरोप लगाया । दोनों खेमों में जमकर आरोप प्रत्यारोप का दौर चला । इस बीच संसद से लोकपाल बिल पास होने के चंद दिन पहले अन्ना रालेगण सिद्धि में अनशन पर बैठ गए । उनके अनशन के दौरान संसद ने लोकपाल बिल पास कर दिया ।  बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने इस बात का श्रेय अन्ना हजारे को दिया । यह सब दिल्ली विधानसभा के चुनाव में आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद हो रहा था । कई राजनीति विश्लेषकों की राय थी कि अरविंद केजरीवाल के बढ़ते असर को कम करने के लिए कांग्रेस और बीजेपी ने मिलकर अन्ना को इसका श्रेय देने की रणनीति बनाई थी । इस दौरान किरण बेदी लगातार अन्ना के साथ डटी रहीं और केजरीवाल पर ट्विटर के जरिए हमले करती रहीं । गौरतलब है कि दो साल पहले तक किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल कंधे से कंधा मिलाकर दिल्ली में जनलोकपाल की लड़ाई लड़ रही थी । जब अन्ना और केजरीवाल के बीच टकराहट हुई तो बेदी ने अन्ना के साथ रहने का फैसला किया । बाद में किरण बेदी भी बीजेपी की और झुकी और अन्ना के सहयोगी जनरल वी के सिंह ने तो बकायदा बीजेपी का दामन थाम लिया और पार्टी की सदस्यता ले ली । किरण बेदी भी मोदी की शान में कसीदे पढ़ती नजर आई । अन्ना फिलहाल अलग थलग पड़ते नजर आए । टीम अन्ना में काफी बदलाव आ चुका था । हमेशा से अपने आपको राजनीति से अलग रहने का ऐलान करते रहे अन्ना हजारे के नए रणनीतिकारों ने उन्हें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीब पहुंचा दिया । अन्ना हजारे ने देश के कई पार्टी के नेताओं को पत्र लिखकर 17 बिंदुओं पर उनका राय मांगी । ममता बनर्जी ने अन्ना के खत का जवाब दिया तो अन्ना को ममता बनर्जी में देश का नया नायक नजर आने लगा । ममता बनर्जी के दूत मुकुल रॉय से मिलने के बाद अन्ना की दिल्ली में ममता बनर्जी से मुलाकात हुई । नतीजे में अन्ना ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों का लोकसभा चुनाव में समर्थन का ऐलान कर दिया । आनन फानन में अन्ना हजारे का तृणमूल को समर्थन का विज्ञापन टीवी चैनलों पर नजर आने लगा । अन्ना के नए रणनीतिकारों और ममता के सिपहसालारों को लगने लगा कि दिल्ली अब दूर नहीं है । इस पूरी रणनीति के पीछे हरियाणा के एक राजनेता उद्योगपति की बेहद सक्रिय भूमिका रही । इतना तक तो ठीक था । दिल्ली के ऐतिहासिक मैदान में अन्ना और ममता की संयुक्त रैली का आयोजन किया गया था लेकिन रैली में ना तो अन्ना पहुंचे और ना ही लोग । हजार दो हजार लोगों के सामने ममता बनर्जी ने दावा किया कि ये अन्ना की रैली थी लिहाजा भीड़ नहीं होने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है । इसके पहले एक नाटकीय घटनाक्रम में पश्चिम बंगाल के टीपू मस्जिद के इमाम ने ममता को अन्ना हजारे से दूर रहने की सलाह दी । इमाम साहब ने इशारों इशारों में ममता को चेतावनी देते हुए अन्ना को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आदमी बता दिया । अब ममता धर्मसंकट में थी । वो पश्चिम बंगाल के मुसलमानों के बीच गलत संदेश नहीं देना चाहती थी । ममता दिल्ली पहुंची, रैली में शामिल हुईं, अन्ना हजारे नहीं पहुंचे । अन्ना की खराब तबीयत का हालचाल लेने बीजेपी के नेता जनरल वी के सिंह तो पहुंचे लेकिन ममता बनर्जी नहीं पहुंची । संकेत सबकुछ ठीक-ठाक होने का नहीं है । दो साल में अन्ना हजारे के इतने सहयोगी बदल चुके हैं कि अन्ना की राष्ट्रव्यापी विश्वसीनयता संदिग्ध हो गई है । दिल्ली में रामलीला मैदान में फ्लॉप रैली से राजनीतिक दलों से अन्ना हजारे का खौफ भी कम होता दिख रहा है । यही सारे दल चाहते भी थे । सोचना तो उन राजनीतिक टिप्पणीकारों को भी पड़ेगा जो कि दो हजार ग्यारह में अन्ना को मिल रहे जनसमर्थन के आधार पर उनका मूल्यांकन कर बैठे । हड़बड़ी में इन राजनीतिक टीकाकारों ने अन्ना को छोटे गांधी से लेकर दूसरे महात्मा तक की उपाधि दे डाली थी । जबकि दो साल में यह बात साबित हो गई कि अन्ना हजारे में कोई राष्ट्रव्यापी सोच या दृष्टि नहीं है । गांधी के बरक्श अन्ना हजारे को खड़ा करनेवाले इन राजनीति पंडितों को ना तो इतिहास बोध है और हड़बड़ी में उन्होंने तुलनात्मकता के आधारभूत सिद्धांतों का पालन करना भूल गए ।अरविंद केजरीवाल उनको राष्ट्रीय फलक पर लेकर आए और उसके बाद से अन्ना कभी इनके तो कभी उनके साथ रहे । कोई विजन या कोई विकल्प जनता के सामने पेश नहीं कर पाए । रालेगण सिद्धि से दिल्ली की अन्ना हजारे की इस यात्रा में कई पड़ाव और अवसर मिले लेकिन वो इन अवसरों का अबतक लाभ नहीं उठा पाए हैं । इतिहास किस तरह अन्ना को याद करेगा यह लोकसभा चुनाव के मई में आनेवाले नतीजे के बाद तय हो जाएगा । 

Wednesday, December 4, 2013

आदर्शवाद बनाम व्यावहारिकता

दिल्ली में अन्ना हजारे के नेतृत्व में जब भ्रष्टाचार के खिलाफ जनज्वार उठा था तब यह माना गया था यह आंदोलन लंबे समय तक चलेगा । कई उत्साही लोगों ने आंदोलन को आजादी की दूसरी लड़ाई और अन्ना को छोटे गांधी और फिर उस आंदोलन की तुलना इमरजेंसी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से की थी । दोनों ही तुलना अतिउत्साह में नतीजा निकालने की हड़बड़ी में किए गए थे । उस वक्त भ्रष्टाचार से बुरी तरह से ऊब चुकी जनता को अन्ना के रूप में एक चेहरा मिल गया था । एक ऐसा शख्स जो मंदिर में रहता था, कुर्ता-धोती पहनता था और उसके सर पर गांधी टोपी ने एक ऐसी छवि निर्मित की जिसमें देश की जनता को उम्मीद दिखाई दी । भ्रष्टाचार विरोधी उस आंदोलन के पीछे अरविंद केजरीवाल का दिमाग और उनकी सांगठनिक क्षमता को स्वीकार गया था । महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव रालेगणसिद्धि से उठाकर अन्ना को राष्ट्रीय फलक पर स्थापित करने के पीछे अरविंद का ही दिमाग था । अन्ना को आंदोलन का चेहरा बनाने के बाद केजरीवाल ने अपनी टीम के साथ योजनाबद्ध तरीके से पूरे आंदोलन का संचालन किया था । चाहे अन्ना की गिरफ्तारी का मामला हो या उसके बाद या पहले का घटनाक्रम हर जगह अरविंद केजरीवाल की योजना की छाप साफ तौर लक्षित की गई थी । उस आंदोलन को मिलने वाले जनसमर्थन के पीछे उसके नेतृत्व का गैर-राजनीतिक होना भी था । दो साल के संघर्ष के बाद आंदोलन के सूत्रधार अरविंद केजरीवाल ने इस तर्क का सहारा लिया कि बगैर सिस्टम के अंदर घुसे उसको ठीक नहीं किया जा सकता है । नतीजे में आम आदमी पार्टी का गठन हुआ। अन्ना उनकी इस राय से सहमत नहीं थे लिहाजा वो दरकिनार हो गए । सिद्धांतों पर महात्वाकांक्षा हावी हो गई । यहां भी अरविंद ने बेहतरीन चालें चलीं और इस बात का श्रेय केजरीवाल को अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होंने साल भर के अंदर दिल्ली की राजनीति को त्रिकोणीय बना दिया । मीडिया के उत्साह और सोशल मीडिया में आक्रामकता पर सवार होकर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करनेवाले केजरीवाल ने श्रमपूर्वक आम आदमी पार्टी को चर्चा में लाने का काम किया । यहां भी अरविंद ने जनता के मूड को भांपते हुए रणनीति बनाई । अपने को और अपनी पार्टी को चर्चा में लाने के लिए केजरीवाल ने देश के चोटी के लोगों पर संगीन आरोप लगाए । केजरीवाल ने चंद ऐसे लोगों को चुना जिनपर आरोप लगाने से लोग कतराते रहते थे । केजरीवाल ने इसी को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया और सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा से लेकर बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष नितिन गडकरी और भारत के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी तक पर आरोप लगाए । आरोपों को इस तरह से पेश किया गया जैसे कोई बड़ा खुलासा किया जा रहा हो जबकि वो तमाम बातें पहले भी छप छपा चुकी थी । मीडिया का भी इस्तेमाल हुआ । अरविंद इस बात को समझ चुके थे कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में अन्ना के साथ रहने से उनकी साख बहुत मजबूत हो चुकी है, लिहाजा अगर को किसी शख्स या कंपनी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाएंगे तो मीडिया में उन्हें खास तवज्जो मिलेगी । इनमें से कई आरोपों को तो वैधानिक रूप से गलत साबित करना मुश्किल है । इसलिए वैसी जगहों और शख्सियतों पर आरोप लगाते हुए उन्होंने नैतिकता का भी सवाल उठाया । कानूनी तौर पर राबर्ट वाड्रा ने कोई गलत काम नहीं किया लेकिन सवाल इस वजह से उठे कि वो सोनिया गांधी के दामाद हैं । अरविंद केजरीवाल ने एक खास रणनीति के तहत हर काम देश की जनता के नाम पर किया, हर सवाल देश की जनता की तरफ से पूछा, हर आरोप देश की जनता की तरफ से लगाए । लेकिन जब उनपर या उनकी टीम पर किसी भी तरह का आरोप लगा तो वो जांच की बात कह कर हुंकारने लगे । सरकार को जेल भेजने की चुनौती देते नजर आए । अपने खिलाफ लगे आरोपों पर हुंकारने वाले केजरीवाल ने जिन लोगों पर भी आरोप लगाए उसमें से किसी को भी अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करते दिखे तक नहीं । जब उनकी पार्टी के कई नेता एक स्टिंग ऑपरेशन में दिखाए गए तो खुद ही मुंसिफ बनकर चौबीस घंटे के अंदर उनको बेदाग करार दे दिया । क्या यहां नैतिकता का सवाल नहीं उठता है । क्या धरना प्रदर्शन की बातों के बीच में चंदा की बात करना कोई सवाल खड़े नहीं करता है । ये कुछ अनुत्तरित सवाल हैं जिसका जवाब जनता जानना चाहती है । इसी तरह से दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ रहे आम आदमी पार्टी के कई उम्मीदवारों पर सवाल उठे तो उसको भी उन्हीं तर्कों के आधार पर दरकिनार करने की कोशिश हुई जिसका इस्तेमाल कांग्रेस और भाजपा लंबे समय से करती आ रही है। हर बात में एक ही तर्क – विरोधियों की साजिश । भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग के योद्धा की छवि अगर केजरीवाल की ताकत है तो अपने और अपनी पार्टी के अलावा सभी को भ्रष्ट करार देने की रणनीति उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है । कई लोगों का मानना है कि केजरीवाल की पार्टी पाकिस्तान में इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ की तरह है जिसका जोर सिर्फ सोशल मीडिया और मीडिया में दिखाई देता है । ऐसा मानने वालों का दावा है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का हश्र भी इमरान खान की पार्टी जैसा ही होगा । हो सकता है आठ दिसंबर को जब चुनाव के नतीजे आएं तो केजरीवाल की पार्टी आम बनकर रह जाए या खास होकर उभरे लेकिन इस वक्त तो दिल्ली की राजनीति बगैर उसकी चर्चा के पूरी नहीं हो रही है ।
अपने को, अपनी पार्टी को चर्चा में लाना और पार्टी को सांगठनिक रूप से मजबूत करना दोनों अलहदा बातें हैं । हमेशा जनता की बात करनेवाले केजरीवाल को हो सकता है जनसमर्थन भी उनको हो लेकिन भारतीय राजनीतिक इतिहास में यह बात कई बार साबित हो चुकी है कि बगैर संगठन के मिली सत्ता स्थायी नहीं होती है । जयप्रकाश नारायण और संपूर्ण क्रांति आंदोलन के बाद बनी जनता सरकार का ढाई सालों में हुआ हश्र इस बात की तस्दीक करते हैं ।अब अगर हम थोड़ा इतिहास की ओर देखें तो पाते हैं कि जप्रकाश नारायण के आंदोलन और अन्ना के आंदोलन में कई समानताएं हैं । सत्तर के दशक में उड़ीसा में हो रहे चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार नंदिनी सत्पथी थी । उस वक्त उनपर चुनाव में अनाप शनाप पैसे खर्च करने के आरोप लग रहे थे । जयप्रकाश नारायण ने तब इंदिरा गांधी से मुलाकात कर नंदिनी सत्पथी की शिकायत की थी । इंदिरा ने तब जयप्रकाश नारायण को टका सा जवाब दिया था । उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी के पास दफ्तर चलाने के लिए तो पैसे हैं नहीं उम्मीदवार कहां से पैसे बांटेगा । इंदिरा के इस जवाब से जयप्रकाश नारायण बेहद दुखी हुए थे और कालांतर में यही मुलाकात और इंदिरा का जवाब संपूर्ण क्रांति आंदोलन की बुनियाद बनी । जयप्रकाश नारायण ने देश के गैरकांग्रेसी दलों को इकट्ठा कर जनता मोर्चा बनाया जो इमरजेंसी के बाद के हुए चुनाव में जनता पार्टी बनी । इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये से नाराज भारत की जनता ने नई नई बनी पार्टी को भारी बहुमत से देश की सत्ता सौंपी, लेकिन ढाई साल में ही जनता का प्यार नफरत में बदल गया । राजनीति के जानकारों का कहना है कि बगैर संगठन के बनी जनता पार्टी नेताओं की महात्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबकर दम तोड़ गई । यही हाल उन्नीस सौ नवासी में विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ भी हुआ । भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता की भावनाओं पर सवार होकर विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री बने लेकिन सालभर भी अपनी कुर्सी को बचाकर रखने में नाकाम रहे । पार्टी अपने अंतर्विरोधों के बोझ तले दबकर खंड-खंड हो गई । यहां भी संगठन की कमजोरी साफ तौर पर उजागर हुई । यह अरविंद केजरीवाल की जिद और सत्ता हासिल करने की जल्दबाजी का ही नतीजा है कि बगैर संगठन पर ध्यान दिए उसने नवजात पार्टी को चुनाव मैदान में धकेल दिया । यहां यह बताना भी जरूरी है कि केजरीवाल की साख ना तो जयप्रकाश नारायण जितनी है और ना ही विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसी लोकप्रियता । अन्ना के बगैर जनसमर्थन की परीक्षा भी शेष है ।
यह बात सही है कि अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और फिर उसका बाइप्रोडक्ट आम आदमी पार्टी भारतीय राजनीति में एक ताजा हवा के झौंके की तरह आया । इस वक्त यह लग भी रहा है कि दिल्ली की जनता उसे पसंद भी कर रही है । अपनी राजनीति की शुरुआत में केजरीवाल ने पहले मोटे तौर पर  युवाओं के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश की लेकिन चुनाव के नजदीक आते आते पार्टी ने झु्गगी झोपड़ी का रुख कर लिया है । वक्त के साथ एक शातिर राजनेता की तरह प्रथामिकताएं बदलने की प्रतिभा का प्रदर्शन । आदर्शवाद की राजनीति का दंभ भरनेवाले केजरीवाल यह बेहतर जानते हैं कि हमारे देश में राजनीति कोरे आदर्शवाद से नहीं चलती है उसको चलाने के लिए व्यावहारिकता की आवश्यकता है । दिल्ली विधानसभा चुनाव में इसी आदर्शवाद और व्यावहारिकता के बीच मुकाबला है । आदर्शवाद के पास कोई संगठन नहीं है , कार्यकर्ताओॆं के नाम पर चंद उत्साही कार्यकर्ता हैं जिनकी आंखों में बदलाव के सपने हैं । वहीं व्यावहारिकता के नाम पर सालों पुराना संगठन है, कार्यकर्ताओं की फौज है । लोकतंत्र में जनता सबसे बड़ी है । जिस जनता के नाम पर अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीति की इमारत खड़ी है, जिस जनता के नाम पर केजरीवाल ने अपने अलावा सभी लोगों को भ्रष्ट करार दिया है अब वो उसी जनता की अदालत में खड़े हैं । हिंदी फिल्म का एक गाना है – ये जो पब्लिक है वो सब जनाती है, मैं उसमें सिर्फ इतना जोड़ना चाहता हूं कि वो सब समझती भी है और समय आने पर अपनी समझ को जताने से हिचकती भी नहीं है ।आठ दिसंबर को जब दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आएंगे तो जनता की वह समझ भी सामने आ जाएगी और जनता के नाम पर सबकुछ करनेवालों की हकीकत भी ।

Wednesday, August 1, 2012

प्रसिद्धि के बोझ से दबा आंदोलन

मोदी मानवता के हत्यारे हैं- संजय सिंह
इस कीचड़ में मुझे मत डाले- अन्ना हजारे
मोदी ना केवल सांप्रदायिक हैं बल्कि भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देते हैं- अरविंद केजरीवाल
मोदी इस देश के निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं और कोई उनसे मिले तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए- कुमार विश्वास
कालेधन पर बाबा के जंग में हम उनके साथ हैं – किरण बेदी
ये पांच बयान हैं जो दो दिनों के अंदर टीम अन्ना के अहम सदस्यों ने दिए हैं । इस बयान के केंद्र में है गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और बाबा रामदेव का मंच साझा करना और उसी मंच से रामदेव का नरेन्द्र मोदी की तारीफ करना । रामदेव और नरेन्द्र मोदी के एक साथ मंच पर आने से टीम अन्ना के अंदर का झगड़ा और मतभेद दोनों सामने आ गए । मोदी और रामदेव के मसले पर अन्ना हजारे, किरण बेदी और कुमार विश्वास गोलबंद हो गए हैं वहीं दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया हैं । रामदेव के मोदी के साथ मंच साझा करने और नितिन गडकरी की रामदेव के पांव छूती तस्वीर, फिछले साल दिल्ली में रामदेव के आंदोलन में हिंदूवादी साध्वी ऋतंभरा का शामिल होने  को अगर मिलाकर देखें तो एक साफ तस्वीर उभरती है । जो तस्वीर है वो धर्मनिरपेक्ष तो नहीं ही है । इन्हीं तस्वीरों के आधार पर कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह तो साफ तौर यह आरोप लगा चुके हैं कि रामदेव और अन्ना हजारे का पूरा आंदोलन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की योजना के मुताबिक चल रहा है । हम यहां याद दिला दें कि अन्ना हजारे भी एक बार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ कर चुके हैं । बाद में जब अन्ना हजारे घिरे तो मीडिया पर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाकर टीम अन्ना ने बेहद सफाई से अन्ना के उस बयान से पल्ला झाड़ लिया था । लेकिन जिस तरह से अब टीम अन्ना रामदेव के साथ कंधा से कंधा मिलाकर आंदोलन कर रही है उससे दिग्विजय सिंह के आरोप और गहराने लगे हैं । जंतर मंतर पर चल रहे अनशन के दौरान इस तरह का विवाद उठना अनशन और आंदोलन दोनों की विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा कर देती है । अन्ना हजारे बार बार पंथ निरपेक्षता की बात करते हैं लेकिन लगातार रामदेव के साथ गलबहियां भी करते नजर आते हैं । रामदेव की आस्था और प्रतिबद्धता दोनों बिल्कुल साफ है । अनशन के दौरान जंतर मंतर पर रामदेव अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के साथ हाथ खड़े कर हुंकार भरते हैं और अगले ही दिन अहमदाबाद जाकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की वंदना करने लग जाते हैं ।
मोदी-रामदेव मुलाकात पर जिस तरह से टीम अन्ना में मतभेद खुलकर सामने आया है वो आंदोलन के भविष्य और उसकी साख के लिए अच्छा नहीं है । जिस जनता की टीम अन्ना लगातार दुहाई देती है वही जनता आज टीम अन्ना से और विशेष तौर पर अन्ना हजारे से ये जानना चाहती है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी तारीफों के पुल बांधनेवाले रामदेव के बारे में उनकी राय क्या है । अन्ना हजारे को इस बारे में अपनी राय साफ करनी होगी कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर उनकी सोच क्या है । जो व्यक्ति दो हजार दो के गुजरात दंगों के लिए कठघरे में खड़ा हो, जिसके मुख्यमंत्रित्व काल में राज्य में तमाम संवैधानिक संस्थाओं की धज्जियां उड़ी हों, जिसके शासनकाल के दौरान राज्य में लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हो पाई हो उसके बारे में चुप्पी साधना टीम अन्ना की विश्वसनीयता के साथ साथ उनकी मंशा पर भी शक का धुंधलका बनकर छाने लग गई है ।
ऐसा नहीं है कि रामदेव और मोदी के मुद्दे पर ही टीम अन्ना के सदस्यों के बीच मतभेद हैं । और कई अन्य मुद्दे भी हैं जिसको लेकर मतैक्य नहीं है । एक ही मुद्दे पर अलग अलग बयान से जनता के बीच भ्रम फैलता है, जिससे आंदोलन के बिखर जाने का खतरा बन गया है । मसलन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को लेकर भी अन्ना और अरविंद केजरीवाल में मतभेद खुलकर सामने आ गए । अनशन के दौरान एक दिन अरविंद केजरीवाल ने सरेआम अन्ना हजारे से असहमति जताते हुए कहा कि कुछ लोग कह रहे हैं कि राष्ट्रपति बनने के बाद प्रणब मुखर्जी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए । अरविंद केजरीवाल जिन कुछ लोगों की बात कर रहे थे वो अन्ना हजारे और बाबा रामदेव थे जिन्होंने एक दिन पहले उसी मंच से ये ऐलान किया था कि राष्ट्रपति बनने के बाद प्रणब मुखर्जी के खिलाफ आरोप लगाने बंद होने चाहिए । अन्ना की मौजूदगी में अरविंद केजरीवाल ने महामहिम पर हमले किए । अरविंद केजरीवाल बेहद ईमानदार होंगे, उनके अंदर देशप्रेम का जज्बा भी होगा, वो देश के लिए वो बलिदान देने को भी तैयार होंगे लेकिन अरविंद केजरीवाल को यह बात समझनी होगी कि देश के राष्ट्रपति पद की कोई मर्यादा होती है और पूरा देश उस पद को एक इज्जत बख्शता है । लिहाजा प्रचारप्रियता के लिए देश के प्रथम नागरिक पर आरोप जड़ने से आम जनता के मन में केजरीवाल की क्रांतिकारी छवि नहीं बल्कि एक वैसे अराजक इंसान की छवि बनती है जो हर किसी को गाली देता चलता है । इसका नतीजा यह होता है कि उसकी गंभीरता कम होती है और लोग उनकी बातों को शिद्दत से लेना बंद करने लगेंगे ।  
इस तरह की बयानबाजियों और टीम के सदस्यों के बीच मतभिन्नता से ये साफ है कि इस आंदोलन को नेतृत्व देनेवालों के बीच मुद्दों को लेकर जबरदस्त मतभेद हैं । इंडिया अगेंस्ट करप्शन में भी सबकुछ ठीक नहीं चल रहा । पिछले एक साल से जिस तरह से कई लोगों ने संगठन में पारदर्शिता के आभाव और अरविंद केजरीवाल पर मनमानी के आरोप लगाते हुए खुद को अलग किया उससे भी जनता के बीच गलत संदेश गया । सोशल मीडिया में आंदोलन की कमान संभालने वाले शिवेन्द्र सिंह ने भी खत लिखकर टीम में चल रही राजनीति और टीम के नेतृत्व के गैरलोकतांत्रिक होने का मुद्दा उठाया था । लेकिन उन मुद्दों को तवज्जो नहीं दिए जाने से शिवेन्द्र सिंह ने अपने आपको समेट लिया । पिछले साल अपना सबकुछ छोड़ छाड़कर इस आंदोलन से जुड़े कितने ऐसे शिवेन्द्र हैं जिन्होंने नेतृत्व पर संगठन को गैरलोकतांत्रिक तरीके से चलाने के आरोप लगाते हुए टीम का साथ छोड़ दिया । इसके अलावा टीम के कई लोगों को तुरंत फुरंत मिली प्रसिद्धि ने भी काम बिगाड़ा । चौबीस घंटे न्यूज चैनलों के इस दौर में बहुत जल्दी प्रसिद्धि मिलती है उससे उस शख्स से अपेक्षा भी बढ़ जाती है । बहुधा होता यह है कि प्रसिद्दि के बोझ और नशे में जिम्मेदारियों से दूर हट जाते हैं । टीम अन्ना के कुछ सदस्यों के साथ भी ऐसा हो रहा है । प्रसिद्दि के दंभ में वो धरती छोड़ने  लगे है जो ना तो आंदोलन के लिए अच्छा है और ना ही उनके खुद के लिए

Saturday, February 25, 2012

कसौटी पर अन्ना आंदोलन

पिछले दिनों कई संपादकों की किताबें आई जिनमें आउटलुक के प्रधान संपादक विनोद मेहता की लखनऊ ब्यॉय और एस निहाल सिंह की इंक इन माई वेंस अ लाइफ इन जर्नलिज्म प्रमुख हैं । ये दोनों किताबें कमोबेश उनकी आत्मकथाएं हैं जिनमें उनके दौर की राजनीतिक गतिविधियों का संक्षिप्त दस्तावेजीकरण है । विनोद मेहता और एस निहाल सिंह की किताब के बाद युवा संपादक आशुतोष की किताब आई है - अन्ना-थर्टीन डेज दैट अवेकंड इंडिया । जैसा कि किताब के नाम से ही स्पषट है कि यह किताब अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को केंद्र में रखकर लिखी गई है । एक ओर जहां विनोद मेहता और निहाल सिंह की किताब एक लंबे कालखंड की राजनीतिक घटनाओं को सामने लाती है वहीं आशुतोष अपनी किताब में बेहद छोटे से कालखंड को उठाते हैं और उसमें घट रही घटनाओं को सूक्ष्मता से परखते हुए अपने राजनीतिक विवेक के आधार पर टिप्पणियां करते चलते हैं । किताब की शुरुआत बेहद ही दिलचस्प और रोमांचक तरीके से होती है । रामलीला मैदान में अपने सफल अनशन के बाद अन्ना मेदांता अस्पताल में इलाज करवा रहे होते हैं अचानक एजेंसी पर खबर आती है कि उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई है । जबकि कुछ घंटे पहले ही अन्ना के डॉक्टरों ने ऐलान किया था उन्हें पूरी तरह से ठीक होने में चार से पांच दिन लगेंगे । अचानक से आई इस खबर के बाद संपादक की उत्तेजना और टेलीविजन चैनल के न्यूजरूम में काम कर रहे पत्रकारों के उत्साह से लबरेज माहौल से यह किताब शुरू होती है । जिस तरह से खबर आगे बढ़ती है उसी तरह से रोमांच अपने चरम पर पहुंचता है । इसमें एक खबर को लेकर संपादक की बेचैनी और उसके सही साबित होने का संतोष भी लक्षित किया जा सकता है । आशुतोष ने अपनी इस किताब में भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई मुहिम को शुरुआत से लेकर अन्ना के मुंबई के असफल अनशन तक को समेटा है । अन्ना और उनके आंदोलन पर लिखी गई इस किताब को आशुतोष ने बीस अध्याय में बांटकर उसके पहलुओं को उद्घाटित किया है ।
एक संपादक के तौर पर आशुतोष उस वक्त चिंतित और खिन्न दिखाई पड़ते हैं जब बाबा रामदेव की अगुवाई के लिए प्रणब मुखर्जी के एयरपोर्ट जाने की खबर आती है । आशुतोष लिखते हैं- जब यह खबर आती है तो वो एडिटर गिल्ड की मीटिंग में प्रणब मुखर्जी के साथ मौजूद हैं । दफ्तर से जब यह पूछते हुए फोन आता है कि क्या प्रणब मुखर्जी बाबा रामदेव की अगुवानी के लिए एयरपोर्ट जा रहे हैं तो उसके उत्तर में वो कहते हैं- क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है । तुम ये सोच भी कैसे सकते हो कि प्रणब मुखर्जी रामदेव को रिसीव करने जाएंगे । रामदेव कोई हेड ऑफ स्टेट नहीं हैं । इसके बाद जब यह खबर सही साबित होती है तो आशुतोष इसे सरकार के संत्रास के दौर पर देखते हैं और उसके राजनीतिक मायने और आगे की राजनीति पर पड़नेवाले प्रभाव पर अपनी चिंता जताते हैं । दरअसल आशुतोष अन्ना के दिल्ली के आंदोलनों के चश्मदीद गवाह रहे हैं चाहे वो जंतर मंतर का अनशन हों या राजघाट का अनशन या फिर रामलीला मैदान का ऐतिहासिक अनशन जिसने सरकार को घुटने पर आने को मजबूर कर दिया था । आशुतोष की इस किताब को पढ़ने के बाद एक बात और साफ तौर उभर कर सामने आती है कि इस आंदोलन के दौरान उनके अंदर का रिपोर्टर बेहद सक्रिय था । संपादक के अंदर का वह रिपोर्टर का एक साथ टीम अन्ना और सरकार के अपने सूत्रों से जानकारियां ले रहा था । अपने सूत्रों से मिल रही जानकारियों से ना सिर्फ अपने प्रतियोगियों को पीछे छोड़ रहा था बल्कि दर्शकों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभा कर संतोष का अनुभव कर रहा था । अन्ना हजारे को जब उनके सहयोगियों अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के साथ दिल्ली के मयूर विहार से हिरासत में लिया गया था उस वक्त अरविंद के एसएमएस लगातर उनके पास आ रहे थे जो अन्ना की पल पल की गतिविधयों की जानकारी दे रहे थे । इसी तरह रामलीला मैदान में अनशन के दौरान भी उनके पास खबरें पहले आ रही थी ।

अपनी इस किताब में आशुतोष ने अन्ना के आंदोलन को ठीक तरीके नहीं निबट पाने के लिए गैर राजनीतिक मंत्रियों को जिम्मेदार माना है । उनके मुताबिक यह एक राजनीति आंदोलन था जिसे राजनीतिक रूप से ही निबटा जा सकता था । आशुतोष के मुताबिक दो गैरराजनैतिक वकील मंत्रियों ने इस पूरे मामले को मिसहैंडिल किया । जाहिर तौर पर उनका इशारा चिदंबरम और कपिल सिब्बल की ओर है । आंदोलन के दौरान सोनिया गांधी की देश से अनुपस्थिति को भी आशुतोष उसी मिसहैंडलिंग से जोड़कर देखते हैं । आशुतोष अन्ना के आंदोन में संघ की भागीदारी पर बेबाकी से कलम चलाते हैं और कई संदर्भों और लोगों की बातों को आधार बनाकर अपनी बात कहते हैं ।
इस किताब की खूबसूरती इस बात में है कि इसमें अन्ना के आंदोलन के समाने और परदे के पीछे के तथ्यों और गतिविधियों का प्रामाणिक दस्तावेजीकरण किया गया है । लेकिन जब भी जहां भी लेखक को लगता है वो अन्ना और उनकी टीम की आलोचना से भी नहीं हिचकते हैं । जब इमाम बुखारी के बयान के दबाव में अनशन स्थल पर रोजा खुलवाने जैसा कार्यक्रम आयोजित किया जाता है तो उसे आशुतोष सस्ता राजनीति हंथकंडा के तौर पर देखते हैं और कड़ी टिप्पणी करते हैं । किताब के अंत में एपिलॉग में आशुतोष ने मुंबई में अन्ना के आंदोलन के असफल होने की वजहें भी गिनाई हैं । इस किताब का प्राक्कथन मशहूर समाजवादी चिंतक आशीष नंदी और इंड्रोडक्शन योगेन्द्र यादव ने लिखा है । अगर हम समग्रता में देखें तो इस किताब में अन्ना के आंदोलन को एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा और परखा गया है । अन्ना के आंदोलन को जानने और समझने के लिए यह एक जरूरी किताब है ।

Saturday, January 7, 2012

क्यों दोराहे पर टीम अन्ना ?

अन्ना हजारे एक ऐसा नाम जिसमें देश के कई लोगों को गांधी का अक्स नजर आता है । अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी मुहिम के अगुआ । अन्ना हजारे जिन्होंने देश की वर्तमान सरकार को अपने आंदोलन की ताकत की वजह से घुटनों पर झुका दिया । अन्ना हजारे जिन्होंने दिल्ली में दो बार ऐसा आंदोलन खड़ा किया कि जिसको कुछ राजनीतिक पंडितों ने जयप्रकाश नारयण के आंदोलन से बडा़ आंदोलन करार दिया । अन्ना हजारे जिन्होंने देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ऐसा जनज्वार पैदा किया जिसमें लोग क्रांति के बीज तलाशने लगे । अन्ना की इन तमाम सफलताओं के पीछे उनके अहम सहयोगी अरविंद केजरीवाल का दिमाग माना गया । उन्हें अन्ना का अर्जुन और पूरे आंदोलन का मास्टर स्ट्रैटजिस्ट माना गया । आंदोलन की रणनीति से लेकर सरकार से बातचीत और सरकार पर तमाम तरह के हमलों के अगुवा अरविंद केजरीवाल ही रहे । तमाम मंचों पर अन्ना के बाद अरविंद केजरीवाल का ही ओजस्वी भाषण होता रहा है । कई बार जब टीम अन्ना मीडिया से मुखातिब हो रही होती थी तो अन्ना को सरेआम सलाह देते हुए अरविंद को देखा गया था । अब अन्ना के उन्हीं सहयोगी अरविंद केजरीवाल के मुताबिक अन्ना हजारे आजकल उदास हैं, उन्हें लगता है कि सरकार ने उन्हें धोखा दिया है, सरकार के बर्ताव से वो बेहद आहत हैं । अन्ना उदास हैं और अरविंद देश की जनता से पूछ रहे हैं कि बताओ टीम अन्ना को क्या करना चाहिए । अरविंद अब जनता से आगे की रणनीति पूछ रहे हैं । लेकिन सवाल यह उठता है कि इस वक्त उन्हें जनता की याद क्यों आई । अब वो भारतीय जनता पार्टी से अपनी नजदीकियों पर सफाई दे रहे हैं । इतनी देर से इस बात की सफाई देने का कोई मतलब रह नहीं जाता जबकि यह बात लगभग हर तरफ चर्चा का विषय है कि टीम अन्ना भारतीय जनता पार्टी को लेकर थोड़ी उदार है । अब वो यह स्वीकार कर रहे हैं कि दिसंबर में सरकार के साथ पर्दे के पीछे बातचीत चल रही थी जबकि उस वक्त उन्होंने इस बात से साफ इंकार किया था कि सरकार से किसी भी तरह की कोई बातचीत चल रही थी । जनता को सरकार से अपनी बातचीत के हर कदम की चीख चीख जानकारी देनेवाले अरविंद जनता से बिना बताए सरकार से बात कर रहे थे, यह उनका खुद का खुलासा है जो हैरान करनेवाला है । अब वो अपने कांग्रेस विरोध को इस बिनाह पर जस्टिफाई कर रहे हैं कि उन्हें लोकपाल पर सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की वजह से ऐसा करने को मजबूर होना पड़ा था । अब वो जनता से पूछ रहे हैं कि क्या उन्हें कांग्रेस या यूपीए के खिलाफ प्रचार करना चाहिए । क्या हरियाणा के हिसार में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव प्रचार करने से पहले अरविंद केजरीवाल ने जनता से पूछा था । तब तो उन्हें इस बात का अंदाजा था कि हिसार सीट पर कांग्रेस की हार तय है । उस वक्त तो टीम अन्ना ने बगैर जनता से पूछे हिसार के चुनाव को लोकतंत्र का लिटमस टेस्ट घोषित कर दिया था । वहां कांग्रेस पार्टी की हार को टीम अन्ना ने लोकतंत्र की जीत के तौर और भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस के खिलाफ जनता के गुस्से की परिणति के तौर पर पेश किया था । लेकिन अब अचानक से जनता की याद आना हैरान करनेवाला है। कहीं ऐसा तो नहीं कि टीम अन्ना को यह लगने लगा हो कि उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की स्थिति बेहतर होनेवाली है । और अगर खुदा ना खास्ते ऐसा हो गया तो भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की हवा ही निकल जाएगी ।
अन्ना के दो अनशन की सफलता से उत्साहित टीम अन्ना को यह लगने लगा था कि पूरे देश की जनता उनके साथ है । दिल्ली के जंतर मंतर और रामलीला मैदान में जनसैलाब उमड़ा था उसमें कोई दो राय नहीं है । भ्रष्टाचार से तंग आ चुकी जनता को अन्ना में एक उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी थी । नतीजे में लोग घरों से बाहर सड़कों पर निकले । वह मध्यवर्ग घरों से निकला जिनके बारे में यह माना जाता था कि आमतौर पर वह ड्राइंगरूम में बहस कर संतोष कर लेता है । लेकिन किसी भी आंदोलन को शुरू करना उतना मुश्किल नहीं है जितना मुश्किल उसकी निरंतरता बरकरार रखना है । अरविंद केजरीवाल की तमाम बातों से इस बात के साफ संकेत मिल रहे हैं कि टीम अन्ना अपने आंदोलन को लेकर हतोत्साहित है ।
अब सवाल यह खड़ा होता है कि टीम अन्ना क्यों हतोत्साहित है क्या वजह है जिसने टीम के मनोबल पर असर डाला है । एक वजह तो साफ तौर पर है जो सतह पर दिखाई भी देती है वह यह है कि सरकार ने टीम अन्ना के जनलोपाल बिल को स्वीकार नहीं किया और उसके खंड खंड करके कई बिल बना दिए । सरकार ने जो लोकपाल बिल पेश किया वह भी उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा । लेकिन लोकपाल बिल पर टीम अन्ना से रणनीतिक चूक भी हो गई । जब दिसंबर के तीन दिनों में संसद में लोकपाल पर बहस रखी गई थी उस वक्त अन्ना का अनशन पर बैठने से जनता के बीच संदेश यह गया कि टीम अन्ना अपनी ही जिद पर अड़ी है । लोगों को यह लगा कि जब संसद में लोकपाल पर बहस हो रही है तो टीम अन्ना को उसके नतीजों का इंतजार करना चाहिए । लेकिन टीम अन्ना अपने पिछले अनुभव और उसकी सफलताओं से सातवें आसमान पर थी । उन्हें लग रहा था कि अन्ना के अनशन पर बैठे रहने से संसद और सांसद दबाव में आ जाएंगें । लेकिन ऐसा हो नहीं सका । मुंबई के एमएमआरडीए मैदान पर अन्ना के अनशन में लोगों की भीड़ अपेक्षा से बेहद कम रही वहीं लोकसभा ने लोकपाल और लोकायुक्त बिल को मंजूरी दे दी । लोकसभा से लोकपाल बिल पास होने के दूसरे दिन अन्ना की तबीयत बिगड़ जाने की वजह से अनशन खत्म करना पड़ा । लोकसभा से लोकपाल बिल पास होने को टीम अन्ना ने अपनी हार की तरह लिया जबकि होना यह चाहिए था कि वो उसको जश्न की तरह देखते और देश के लोगों को यह संदेश देते कि जो काम 44 साल में नहीं हो पाया वो हमने साल भर के अंदर कर दिखाया । वहीं से यह भी ऐलान करते कि मजबूत लोकपाल के लिए लड़ाई जारी रहेगी । इसका एक बडा़ फायदा यह होता कि जनता के बीच जीत का एहसास जाता जो कि ऐसे आंदोलनों की निरंतरता बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक है । दूसरी चूक जो टीम अन्ना से हुई वह यह कि अनशन खत्म होने के बाद भी मंच से कांग्रेस पर जोरदार हमला हुआ और भारतीय जनता पार्टी के बावत सवाल पूछे जाने पर कन्नी काट ली गई । नतीजा यह हुआ कि टीम अन्ना की भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नजदीकियों को लेकर जो संदेह का वातावरण कांग्रेस ने खड़ा किया था वो थोड़ा और गहरा गया ।
इन दो रणनीतिक चूक और मुंबई में जनता से अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाने से टीम अन्ना में हताशा है । अरविंद केजरीवाल अब कह रहे हैं कि आज भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम चौराहे पर खड़ी है । कहां जाना है इस बात को लेकर सशंकित है । आशंका इस बात को लेकर भी है कि एक गलत निर्णय इस पूरे मुहिम को बर्बाद कर सकता है इसलिए उन्हें जनता की राय चाहिए । अरविंद जी जनता उसी चौराहे पर खड़ी है जहां भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम खडा़ है जरूरत इस बात की है कि उसे हमेशा विश्वास में लेने की कोशिश की जानी चाहिए सिर्फ उस वक्त नहीं जब वो आपसे मुंह फेर ले । दूसरी बात कि सरकार के प्रतिनिधि ने जब आपसे दिसंबर में कहा था आप चुनाव की राजनीति में उनको नुकसान नहीं पहुंचा सकते हैं, चाहे कितना भी अनशन-आंदोलन कर लें तो इतने दिन तक आप खामोश क्यों रहे। क्या मुंबई के मंच से आपको जनता को यह बात नहीं बतानी चाहिए थी। किसी भी आंदोलन को लेकर सरकार का दंभ जितना खतरनाक होता है उतना ही खतरनाक आंदोलनकारियों के नेतृत्व का सेलेक्टिव ट्रासपेरेंट होना भी होता है

Wednesday, December 14, 2011

सिब्बल के सपने

अन्ना हजारे के खिलाफ सरकारी मुहिम के स्वयंभू अगुवा रहे कपिल सिब्बल लंबे समय से राजनीतिक परिदृश्य से गायब थे । विवादप्रिय नेता होने के बावदूद सिब्बल की मीडिया और विवाद से दूरी आश्चर्यचकित ही नहीं करती थी बल्कि चौंका भी रही थी । अन्ना हजारे की जनलोकपाल की मुहिम और उनके अनशन के दौरान कपिल सिब्बल के अडि़यल रुख और गैरराजनीतिक तरीकों ने सरकार की अच्छी खासी किरकिरी करवाई थी । कयास यह लगाए जा रहे थे कि उसके बाद सिब्बल को आलाकमान की तरफ से चुप रहने की सलाह दी गई थी । लेकिन एक बार जिसको विवादों का चस्का लग जाता है वह ज्यादा दिनों तक उससे दूर नहीं रह सकता है । कपिल सिब्बल ने एक बार फिर से उसको साबित भी कर दिया । इस बार सिब्बल बहुत दूर की कौड़ी लेकर आए हैं । उन्होंने इस बार सोशल मीडिया पर लगाम लगाने की कवायद शुरू की है । सिब्बल ने फेसबुक, गूगल और अन्य सर्विस प्रोवाइडर कंपनी के प्रतिनिधियों को अपने दफ्तर में बुलाकर उनको कंटेंट पर लगाम लगाने की हिदायत दी । अमेरिका के एक अखबार के मुताबिक सिब्बल ने फेसबुक और अन्य कंपनी के प्रतिनिधियों को बुलाकर साफ तौर पर कहा कि साइट्स पर सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह से जुड़ी आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियों पर पाबंदी लगाने या फिर उसे रोकने का का इंतजाम करें । सिब्बल ने इसके साथ ही धार्मिक भावनाएं भड़कानेवाले चित्रों पर भी ऐतराज जताया और कहा कि इस तरह के आपत्तिजनक कंटेट वहां न हों । फेसबुक और अन्य कंपनियों ने सरकार की इस सलाह को मानने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि इन बेवसाइट्स पर यूजर्स अपनी सामग्री डालते हैं और अगर उसपर कोई पाबंदी लगाई गई तो इन बेवसाइट्स का मूल चरित्र ही खत्म हो जाएगा । इसके अलावा सिर्फ फेसबुक के पूरे विश्व में अस्सी करोड़ यूजर्स हैं और किसी भी कंपनी के लिए इतने बड़े उपभोक्ता वर्ग द्वारा डाले जाने वाले कंटेंट पर निगाह रखना मुमकिन नहीं है । ऐसा लगता है कि सिब्बल अपने इस कदम से सरकार और पार्टी के आला नेताओं को साधने में लगे हैं । मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की सैकड़ों आपत्तिजनक तस्वीरें नेट पर मौजूद हैं । क्या सिर्फ सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लगाम लगाकर सिब्बल सोनिया और मनमोहन की आपत्तिजनक और अपमानजनक तस्वीरें हटवाने में कामयाब हो जाएंगे । लेकिन अचानक से कांग्रेसी मंत्री कपिल सिब्बल को लोगों की धार्मिक भावनाओं की फिक्र कहां से होने लगी । सिब्बल को अब धर्म और धार्मिक भावनाएं भड़कानेवाली तस्वीरों की याद आ रही है लेकिन उस वक्त सिब्बल कहां थे जब एम एफ हुसैन कथित तौर पर धार्मिक भावनाएं भड़कानेवाले पेंटिग्स बना रहे थे । उस वक्त अगर हुसैन की पेंटिग्स उत्कृष्ट कला का एक नमूना और एक कलाकार की अभिवयक्ति थी तो अब भी जो कुछ नेट पर किया जा रहा है या हो रहा है उसे भी उसी स्पिरिट में देखा जाना चाहिए । हुसैन का विरोध करनेवाले अगर अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला कर रहे थे तो सिब्बल इस वक्त क्या कर रहे हैं, इसपर भी कांग्रेस और लेफ्ट दोनों को सिर्फ विचार ही नहीं करना चाहिए बल्कि आत्मावलोकन भी करना चाहिए ।
कपिल सिब्बल चाहे जो भी सफाई दें और जिस भी वजह की आड़ में सोशल साइट्स पर पाबंदी लगाने की कोशिश करें लेकिन इतना साफ है कि यह सबकुछ अन्ना हजारे की मुहिम को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है । जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था तो सरकार ने माना था कि वो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नजर नहीं रख पाई । लिहाजा इस बार सरकार ने अपनी इस भूल को सुधारने की कोशिश की और लगात है कि उसका जिम्मा दूरसंचार मंत्री होने के नाते सिब्बल को दिया गया है । फोसबुक और ट्विटर की ताकत से सरकार अंजान नहीं है । चाहे वो मिस्त्र में तहरीर स्कावयर पर लाखों लोगों के जुटने का मामला हो, चाहे वो ट्यूनीशिया में सरकार के खिलाफ आंदोलन हो, चाहे वो अमेरिका में चल रहा ऑक्योपॉय वॉल स्ट्रीट हो या फिर अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो, सबमें फेसबुक और टि्वटर की बेहद ही अहम भूमिका रही है । उदाहरण के तौर पर अगर हम देखें तो फेसबुक पर पिछले साल नवंबर में इंडिया अगेंस्ट करप्शऩ का पेज बनाया गया और सालभर में तकरीबन साढे पांच लाख से ज्यादा लोग उसके सदस्य बन गए और इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है । उसी तरह अगर हम ट्विटर को देखें तो जनलोकपाल के नाम से पिछले ही साल ट्विटर अकाउंट खोला गया । टि्वटर को रेटिंग देनेवाली एजेंसी ने जनलोकपाल को एक मजबूत ब्रांड के तौर पर रेटिंग दी और शुरुआत में ही उसे दसवें नंबर पर रखा । लेकिन महीने भर में ही जनलोकपाल टॉप फाइव में पहुंच गया । और तब से वो लगातार दूसरे तीसरे नंबर पर बना रहता है । बावजूद इसके कि जनलोकपाल को फॉलो करनेवाले महज दो लाख के करीब लोग है । सरकार के पास ये सब आंकड़े तो जाते ही हैं । इन आंकड़ों की वजह और पिछले दो अनशन के दौरान अन्ना हजारे को मिले जनसमर्थन से यूपीए सरकार के कान खड़े हो गए । अन्ना हजारे एक बार फिर से अनशन करने के लिए हुंकार रहे हैं और दूसरे वो यह भी ऐलान कर चुके हैं कि अगर लोकपाल बिल पास नहीं होता है तो वो आठ दिनों के अनशन के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव प्रचार करेंगे । उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी की सक्रियता को लेकर कांग्रेस खासी सतर्क है । इस वजह से अन्ना के उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार के ऐलान और राजनेताओं के खिलाफ साइबर दुनिया में बन रहे माहौल को देखकर ही सिब्बल उसपर लगाम लगाने की मंशा पाले बैठे हैं । लेकिन सिब्बल जैसे कानून के जानकार यह भूल जाते हैं कि इस देश का संविधान प्री सेंसरशिप की इजाजत नहीं देता । हमारे संविधान के मुताबिक कोई भी प्रचार प्रसार- दृश्य या श्रव्य अगर आपत्तिजनक दिखाई देता है तो उसके खिलाफ शिकायत होनी चाहिए और दोषी पाए जाने पर बनाने वाले और उसे प्रचारित प्रसारित करनेवालों पर कानून के हिसाब से कार्रवाई होनी चाहिए । लेकिन कहीं भी प्री सेंसरशिप की बात नहीं कही गई है ।
प्रीसेंसरशिप की बात दो बार कांग्रेस के शासनकाल में ही कही गई है । एक बार इमरजेंसी के दौरान, जब प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दिया गया था और इंद्रकुमार गुजराल को हटाकर विद्याचरण शुक्ला को सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई थी । पद संभालने के बाद शुक्ला अपने दफ्तर में अखबार के संपादकों को बुलाकर यह बताते थे कि अखबार में क्या छापना है । इमरजेंसी लगने और पद संभालने के फौरन बाद ही विद्याचरण शुक्ला ने 26 जून 1975 को दिल्ली में अखबार के संपादकों के साथ एक बैठक करके उन्हें सेंसरशिप समझाया था । कुछ अखबारों ने उस दिन के अपने अंक में लिख दिया था कि आज के अखबार की खबरें सरकार द्वारा सेंसर की गई हैं । जिसपर विद्याचरण शुक्ला ने संपादकों को खूब खरी खोटी सुनाई थी । सेंसरशिप का नतीजा कांग्रेस ने भुगता । इसलिए एक बार जब राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में फिर से सेंसरशिप की बात चली तो उसे लागू करने का साहस सरकार नगहीं कर पाई । सिब्बल की सोशल मीडिया पर सेंसरशिप पर ही एक वयक्ति ने ट्विट किया- 1975 में भी एक वकील सिद्धार्थ शंकर रे ने श्रीमती गांधी को सलाह दी थी जिसका नतीजा कांग्रेस ने भुगता और अब फिर से एक वकील सरकार की तरफ से मोर्चा संभाले हैं तो दूसरी श्रीमती गांधी को इस बात पर गौर करना चाहिए ।

Friday, October 28, 2011

उच्च मानदंड की अपेक्षा

जब टीम अन्ना की सहयोगी किरण बेदी पर हवाई यात्राओं के लिए ज्यादा पैसे वसूलने का आरोप लगा तो पहले ज्यादा पैसा लेने को लोगों की भलाई के लिए लिया गया पैसा करार देकर उसको जायज ठहराने की कोशिश की गई । बाद में किरण ने यह ऐलान कर अपनी ईमानदारी का परचम लहराने की कोशिश की कि वो उन संगठनों के पैसे वापस कर देंगी जिनसे ज्यादा पैसे वसूले गए थे। सवाल पैसे वापस करने का नहीं है । सवाल यह है कि टीम अन्ना की अहम और मुखर सदस्य किरण बेदी ने जिस तरह से अपनी यात्रा के लिए गैर सरकारी संगठनों से ज्यादा पैसे वसूले वो उनकी इंटेग्रेटी पर बड़ा सवाल खड़े करता है । सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और शुचिता का डंका पीटनेवाली किरण बेदी ने एक नहीं बल्कि कई संगठनों से अपनी हवाई यात्रा के एवज में ज्यादा धन लिया । उनपर आरोप है कि उन्होंने इकॉनामी क्लास में यात्रा की और बिजनेस क्लास के टिकट के बराबर भुगतान हासिल किया । अपने उपर लग रहे आरोपों से तिलमिलाई किरण बेदी कहा कि यात्रा टिकट से जो पैसे बचे वो लोगों की भलाई के लिए उन्होंने अपने एनजीओ में जमा करवा दिए । टेलीकॉम घोटाले में जेल में बंद तमिलनाडू के पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि की बेटी कनिमोड़ी ने भी अपने एनजीओ में ही धन लिया था । उनका संगठन भी लोगों की भलाई के ही काम करता है । तो क्या उनके भी गुनाह माफ कर दिए जाने चाहिए । लिहाजा किरण बेदी की इन दलीलों में दम नहीं है । जिस नैतिकता और शुचिता की बात करते हुए किरण बेदी ने हमारे देश के नेताओं को कठघरे में खड़ा किया था उन्हीं के भंवर में वो फंस गई हैं । इल्जाम इतने पर ही नहीं रुके । आरोप यह भी है कि उन्होंने एक ही शहर की यात्रा के लिए दो अलग अलग संगठनों से पैसे लिए । किरण बेदी को गैलेंटरी अवॉर्ड की बिनाह पर यात्रा में छूट मिलती है । किरण बेदी ने वो छूट भी हासिल की और फिर किराए का पूरा पैसा भी वसूला । यह तो सीधे तौर पर घपला है। सरकारी छूट भी हासिल करो उसको भुना भी लो ।ईमानदारी का डंका भी बजाओ और जहां मौका मिले वहां माल भी काट लो । इनके अगुवा अन्ना हजारे चूंकि मौन व्रत पर हैं इस वजह से उनके प्रमुख सहयोगी अरविंद केजरीवाल ने किरण बेदी के समर्थन में मोर्चा संभाला और अपनी चिरपरिचित शैली में किरण का बचाव करते हुए कहा कि यह सब जनलोकपाल के मुद्दे से देश का ध्यान हटाने की साजिश के तहत किया जा रहा है । केजरीवाल पहली बार डिफेंसिव और दलीलों में लचर लग रहे थे । सिर्फ जनलोकपाल के मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश की आड़ में किरण का बचाव करने में असमर्थ केजरीवाल ने आनन फानन में बुलाई अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में तो यहां तक कह डाला कि उन्हें पूरे मामले की जानकारी नहीं है । सवाल यह उठता है कि अगर आपको पूरे मामले की जानकारी नहीं थी तो फिर मीडिया के सामने आकर बयानबाजी क्यों कर रहे हैं । क्या बयान देने से पहले पूरे मामले की जानकारी हासिल करने की जरूरत नहीं समझी गई । जब सवालों के तीर ज्यादा चलने लगे तो अरविंद ने इशारों-इशारों में मीडिया को इस मामले में केस दर्ज करवाने की नसीहत दे डाली । सवाल अब भी सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ा है कि क्या किरण बेदी ने गलत नहीं किया । क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का एक तथाकथित बड़ा चेहरा छोटे से लाभ के लिए अपने रास्ते से भटक नहीं गया । क्या वीरता के लिए मिले छूट का बेजा इस्तेमाल नहीं किया । क्या लोगों की भलाई करने के लिए भ्रष्ट तरीके से पैसा जुटाना जायज है । अरविंद और अन्ना हजारे हमेशा से पारदर्शिता की बात करते रहे हैं लेकिन किरण बेदी के मामले में जो गड़बड़झाला है उससे उसकी हवा निकल जाती है ।
दूसरा संगीन इल्जाम लगा है टीम अन्ना के एक और अहम सदस्य डॉक्टर कुमार विश्वास पर । अन्ना आंदोलन के दौरान कुमार विश्वास बड़े जोश-ओ-खरोश के साथ रामलीला मैदान में मंच संचालन करते नजर आए थे । उसके बाद गाहे बगाहे खबरिया चैनलों ने भी उनको तवज्जो दी । कुमार विश्वास ने भी खुद को टीम अन्ना का प्रवक्ता साबित करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । कुमार विश्वास ने खुद को टीम अन्ना के अहम सदस्य के तौर पर स्थापित भी कर लिया । लेकिन इन सबके बीच कुमार यह भूल गए कि वो गाजियाबाद के लाजपत राय कॉलेज में शिक्षक भी हैं । आरोप है कि बेईमानी के खिलाफ ईमानदारी का झंडा थामे कुमार विश्वास ने क्लास लेना बंद कर दिया । देश के लिए बड़ी जिम्मदारी निभाने वाला शख्स छात्रों के प्रति अपनी जिम्मेदारी भुला बैठा । छात्र कॉलेज आते रहे और शिक्षक के गैरहाजिर रहने पर मायूस होकर लौटते रहे । कॉलेज प्रशासन के मुताबिक कुमार विश्वास बगैर किसी जानकारी से अनुपस्थित रहते हैं । कुमार विश्वास कवि सम्मेलनों में जाकर ज्ञान का अलख जगा रहे हैं, पैसे भी कमा रहे हैं । पैसा कमाना गलत नहीं है लेकिन नौकरी करते हुए बगैर छुट्टी के आंदोलन में शामिल होना, चुनाव में दौरे पर जाना कितना जायज है । क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है कि जिस काम के लिए आपको पैसे मिलते हैं उसको आप उचित ढंग से नहीं कर रहे हैं । अरविंद केजरीवाल ने कुमार विश्वास के मसले पर भी सफाई देने की कोशिश की और इस मुद्दे को भी जनलोकपाल से ध्यान भटकाने वाला करार दिया । लेकिन क्या टीम अन्ना पर उठनेवाला हर सवाल जनलोकपाल से भटकाने के लिए उठाया जा रहा है । अरविंद जैसे समझदार आदमी से इस तरह के लचर तर्क की अपेक्षा नहीं थी। यहां यह जानना दिसचस्प होगा कि कुमार विश्वास ने अगर अपने कॉलेज से छुट्टी ली तो वजह क्या बताई । सवाल यह है कि टीम अन्ना अगर ईमानदारी और नैतिकता की बात करेंगे तो उन्हें पहले खुद ही उसका पालन करना होगा ।
टीम अन्ना ने जब भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान किया था तो पूरे देश ने उन्हें सर आंखों पर बिठा लिया था । टीम अन्ना के हर सदस्य को लेकर, टीम अन्ना के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं को लेकर समाज में एक इज्जत बनी थी । जब दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे अनशन पर बैठे थे तो तिरंगा हाथ में लिए लोगों को, बाइक सवार युवकों को लोग अपनी गाड़ियां रोककर रास्ता देते थे । यह उसी प्रकार की श्रद्धा का प्रदर्शन था जैसा कि लोग कांवड़ियों को रुककर रास्ता देते वक्त करते हैं । कहने का मतलब यह कि देश की जनता के मन में टीम अन्ना और उसकी विश्वसनीयता की बेहद उंची जगह बनी थी । टीम अन्ना भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ऐसे प्रतीक के तौर पर उभरी थी जिसपर पूरा देश आंख मूंदकर श्रद्धाभाव से यकीन कर रहा था । आंदोलन शुरू होने के बाद टीम अन्ना के कई सदस्यों पर संगीन इल्जाम लगने शुरू हो गए । सबसे पहले प्रशांत भूषण को नोएडा में फॉर्म हाउस के लिए जमीन आवंटन का मामला उछला । उस जमीन का आवंटन भी टेलीकॉम स्पेक्ट्रम की तरह पहले आओ पहले पाओ की नीति के तहत किया गया था । नोएडा की जमीन का मामला थमा भी नहीं था कि इलाहाबाद के उनके घर की रजिस्ट्री की फीस का मामला सामने आया । प्रशांत भूषण के बाद अरविंद केजरीवाल को इंकम टैक्स विभाग की तरफ से बकाया राशि चुकाने का नोटिस मिला । लेकिन जब ये आरोप लग रहे थे तो अन्ना आंदोलन अपने चरम पर था और लोगों को लगा कि सरकार और चंद लोग टीम अन्ना को बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं । प्रशांत और अरविंद पर लग रहे आरोपों का असर उल्टा हुआ था । देश की जनता और मजबूती के साथ टीम अन्ना से जुड़ती चली गई ।
अब वक्त आ गया है कि टीम अन्ना को उन्हीं उच्च मानदंडों पर खरा उतरना होगा जिसके लिए वो आंदोलन कर रहे हैं । गांधी जब कोई बात कहते थे तो पहले खुद उसपर अमल करते थे । गांधी उपदेश कम देते थे मिसाल कायम करके जनता को वो काम करने के लिए प्रेरित ज्यादा करते थे । गांधी के अनुयायियों ने भी उसी सिद्धांत पर अमल किया । टीम अन्ना से भी देश उसी ईमानदारी और नैतिकता की अपेक्षा रखता है ।

Sunday, October 23, 2011

क्यों मिलता अन्ना को समर्थन

पिछले दिनों जब दिल्ली में अन्ना हजारे का अनशन हुआ था तो रामलीला मैदान में उमड़ी भीड़ को देखकर अचंभा हुआ था । दिल्ली में लाख लोग एक जगह किसी खास मकसद को लेकर जमा हो जाएं ये लगभग अविश्वसनीय था । लेकिन वो हुआ और लोग खुद से अन्ना के आंदोलन को समर्थन देने चले आए । अन्ना के समर्थन में रामलीला मैदान में सिर्फ दिल्ली की जनता ही नहीं पहुंची थी बल्कि देश के अलग अलग हिस्सों से लोग वहां जमा हुए थे । वहां जाकर ये समझने की कोशिश की थी कि कौन सी वजह है जो लोगों को वहां खींच ला रही है । लोगों से बात कर कुछ समझ में आया लेकिन जिस निष्ठा और कनविक्शन के साथ लोग वहां पहुंच रहे थे उसको समझ नहीं पा रहा था । कई लोगों से बात की – एक मित्र ने बताया कि एक दिन उनकी पत्नी घर से उनके दफ्तर पहुंची और रिसेप्शन पर कार की चाबी के साथ एक चिट छोड़ा जिसमें लिखा था- मैं अन्ना हजारे के आंदोलन में शरीक होने के लिए रामलीला मैदान जा रही हूं । अगर तुमको वक्त मिले तो मुझे लेने आ जाना वर्ना मैं मेट्रो से घर आ जाउंगी । मैं उन दोनों, पति-पत्नी, को कई वर्षों से जानता हूं । पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करने के बारे में भाभी सोच भी सकती हैं यह मेरे समझ से परे था । मेरे मित्र ने बाद में बताया कि वो अन्ना इफेक्ट था । इस तरह के कई वाकए मेरे सामने आए तो मेरे मन में यह जानने की जिज्ञासा और प्रबल हो गई कि अन्ना में क्या जादू है जो लोग खिंचे चले जाते हैं । काफी लोगों से बात की, काफी लेख पढ़े लेकिन फिर भी वजह का पता नहीं चल पाया । लेकिन अचानक से मेरा ज्ञानचक्षु खुल गया । वाकया बेहद मजेदार है, आप भी सुनिए ।
तकरीबन चार महीने पहले किसी काम की वजह से स्टैंप पेपर खरीदना पड़ा था । गलत गणित की वजह से तकरीबन दस हजार रुपए के स्टैंप पेपर की ज्यादा खरीद हो गई । हमें लगा कि पैसे बर्बाद हो गए लेकिन हमारे वकील ने बताया कि स्टैंप पेपर वापस लौटाने का भी प्रावधान है । उसके लिए एडीएम के कार्यालय में जाना पड़ेगा । वकील साहब ने आनन- फानन में इस बाबत एक आवेदनपत्र तैयार कर दिया और कहा कि उसको जाकर एडीएम के दफ्तर में जमा करवा दीजिए । मैं रजिस्ट्रार के दफ्तर से एडीएम साहब के दफ्तर में पहुंचा । वहां संबंधित बाबू से मिला तो उन्होंने बताया कि जिस वेंडर से स्टैंप पेपर खरीदा गया है उससे प्रमाणित करवा कर लाना होगा कि उक्त स्टैंप पेपर उसने ही बेचा है । मैंने उनको ये बताने की कोशिश की कि स्टैंप पेपर के पीछे तो बेचनेवाले वेंडर की मुहर लगी है और उसका पूरा पता भी अंकित है लिहाजा फिर से प्रमाणित करवाने की आवश्कता नहीं है । लेकिन बाबू तो ठहरे बाबू । लकीर के फकीर । टस से मस नहीं हुए और फिर से वही दुहरा दिया । मेरे पास कोई विकल्प नहीं था । घर लौट आया । हफ्ते भर बाद जब दफ्तर से साप्ताहिक अवकाश मिला तो सुबह सुबह तकरीबन ग्यारह बजे रजिस्ट्रार के दफ्तर पहुंचा । वहां स्टैंप विक्रेता से मिला तो उसने कहा कि दो बजे आइए । मेरे पास इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था । तपती दुपहरी में कचहरी परिसर में इंतजार करता रहा । ठीक दो बजे उनके पास पहुंचा तो उन्होंने वादे के मुताबिक स्टैंप पेपर पर लिख कर दे दिया । अब मैं विजेता के भाव से कचहरी परिसर से निकला और तीन चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित एडीएम के दफ्तर पहुंचा और वहां बाबू के टेबल पर उसी विजयी भाव से स्टैंप पेपर रखा और कहा कि चलिए इसको लौटाने की कार्रवाई शुरू करिए । मेरे उत्साह पर चंद पलों में पानी फेरते हुए उन्होंने कहा कि आप पोस्ट ऑफिस से एक रजिस्ट्री का लिफाफा खरीद कर और उसपर अपना पता लिखकर दे दीजिए । मैं भागकर नीचे पोस्ट ऑफिस पहुंचा् तबतक पोस्ट ऑफिस बंद हो चुका था । मैं हारे हुए योद्धा की तरह बाबू के पास पहुंचा । उनसे बताया कि पोस्ट ऑफिस बंद हो चुका है । बाबू साहब जल्दी में लग रहे थे । उन्होंने बेहद अनौपचारिक अंदाज में कहा कि कोई बात नहीं कल दे जाना । मेरे बहुत अनुरोध करने पर वो इस बात के लिए राजी हो गए कि मैं किसी और से वो लिफाफा भिजवा दूंगा । मैंने अपने एक मित्र से अनुरोध किया और उनको वो लिफाफा भिजवा दिया । मेरे मित्र को साहब बहादुर ने बताया कि अब तीन महीने बाद आकर रिफंड ले जाएं । मुझे संतोष हुआ कि चलो तीन महीने बाद पैसे मिल जाएंगे । तब तक कचहरी और एडीएम ऑफिस के चार चक्कर लग चुके थे ।
तकरीबन साढे तीन महीने बाद एक दिन मेरी पत्नी ने मुझे याद दिलाया कि हमें स्टैंप का कुछ रिफंड मिलना है । अगले ही साप्ताहिक अवकाश में मैं एडीएम साहब के दफ्तर पहुंचा । बाबू साहब अपनी सीट पर मौजूद थे । मैंने नमस्कार कर अपना नाम बताया । बेहद ही तत्परता से उन्होंने फाइल निकाली और कहा कि मैं अपने किसी परिचय पत्र की फोटो कॉपी उन्हें दूं । मैं मूर्ख अज्ञानी बगैर फोटो कॉपी लिए वहां चला गया था । खैर पास की ही एक दुकान से फोटो कॉपी करवाकर उनको सौंप दिया । उन्होंने भी मुझे स्टैंप पेपर के पीछे लिखकर दे दिया और कहा कि नीचे की मंजिल पर कोषागार कार्यालय है वहां जाकर जमा करवा दूं । जब मैं उठने को हुआ तो बाबू साहब ने मुझे पोस्ट ऑफिस की रजिस्ट्री वाला लिफाफा पकड़ाया और कहा कि रख लो तुम्हारे काम आएगा । मैं हैरान कि अगर वापस ही करना था तो फिर मंगवाया क्यों । लेकिन ये बात पूछने का साहस नहीं था सो लिफाफा लेकर नीचे उतर आया ।
नीचे आकर जब मैं कोषागार के काउंटर पर पहुंचा और वहां मौजूद साहब को स्टैंप पेपर देकर कहा कि मेरा रिफंड दे दीजिए । उन्होंने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई जुर्म कर दिया है । उन्होंने कहा कि आपके रिफंड का चेक बनेगा । और चेक बनने के लिए आपको बैंक से अपने दस्तखत को प्रमाणित करवा कर लाना पड़ेगा । मैं झल्लाया और कहा कि अगर आप अकाउंट पेयी चेक बना रहे हैं तो दस्तखत को प्रमाणित करवाने की क्या जरूरत है । बाबू बहस करने के मूड में नहीं था । उन्होंने मुझे सहायक कोषाधिकारी के पास भेज दिया । वहां पहुंचा तो सफारी शूट में एक बुजुर्ग शख्स बैठे थे । मैंने उनसे अपनी व्यथा सुनाई और अनुरोध किया कि रिफंड का चेक बनवा दें । उन्होंने बड़े रौब से और अहसान जतानेवाले अंदाज में कहा कि कि बैंक से प्रमाणित करवा कर ला दीजिए तो दो एक दिन में चेक बनवा दूंगा । अब तक मेरा धैर्य मेरा साथ छोड़ने लगा था । मैंने सहायक कोषाधिकारी महोदय से पूछा कि किस नियम के तहत वो ऐसा कर रहे हैं, मुझे वो नियम दिखाएं । मेरे इतना पूछते ही वो भड़क गए । कहा पंद्रह साल पहले का शासनादेश है मैं कहां से लाउं । बहस होते होते गर्मागर्मी हो गई । मैंने कहा कि मैं आठ चक्कर लगा चुका हूं लेकिन अभी तक रिफंड नहीं मिला है । लिफाफे की बात भी उन्हें बताई । उनका तर्क था कि उनके विभाग में तो मैं पहली बार आया हूं, इसलिए मेरी नाराजगी नाजायज है । वो सरकारी नियमों का हवाला देकर बैंक से दस्तखत प्रमाणित करवा कर जमा करवाने पर अड़े रहे । इसी बहस के दौरान मैंने उनसे कहा कि आप जैसे लोगों की वजह से ही अन्ना हजारे को अनशन करना पड़ता है । इतना सुनते ही वो ऐसे भड़के जैसे सांड को लाल कपड़ा दिखा दिया हो । अन्ना के नाम पर ही वो अड़ गए, उनकी इच्छा थी कि मैं अन्ना वाली बात वापस लूं । लेकिन मैं उसपर कायम रहा । लाख बहस करने के बाद भी अधिकारी महोदय नहीं माने । मुझे दो चक्कर और लगाने पड़े । तब जाकर मुझे रिफंड का चेक मिला । मेरे घर से कोषागार कार्यालय की दूरी बारह किलोमीटर है । इस चक्कर में मैं बुरी तरह से खिन्न हो चुका था । लेकिन इस बात की खुशी थी कि मुझे मेरे प्रश्न का जवाब मिल चुका था कि अन्ना हजारे को समर्थन क्यों मिला और हर तबके के लोग उनके साथ क्यों जुडे़ । अन्ना का विरोध करनेवालों को ना तो ये वजह समझ आएगी और ना ही जनता का मिजाज ।

Sunday, September 4, 2011

लोक से दूर लेखक

बचपन से सुनता था कि उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद कहा करते थे कि साहित्य समाज का दर्पण होता है । एक और बात सुनता था कि साहित्य राजनीति के पीछे नहीं बल्कि समाज के आगे चलनेवाली मशाल है । मैं इसे सुनकर यह सोचता था कि अगर साहित्य मशाल हैं तो साहित्यकार उस मशाल की लौ को लगातार जलाए रखने का काम करते हैं । भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का दिल्ली में ऐतिहासिक अनशन खत्म हो गया है । अब तमाम तरीके से लोग उस जन उभार और आंदोलन को मिले व्यापक जनसमर्थन का आकलन कर रहे हैं । यह वो वक्त था जब साहित्य और साहित्यकारों के सामने यह चुनौती थी कि वो साबित करे कि राजनीति के पीछे चलनेवाली मशाल नहीं है । लेकिन अन्ना के आंदोलन के दौरान कमोबेश साहित्यकारों का जो ठंडा या विरोध का रुख रहा उससे घनघोर निराशा हुई । हंस के संपादक और दलित विमर्श के पुरोधा राजेन्द्र यादव को को अन्ना के आंदोलन में आ रहे लोग भीड़ और उनका समर्थन एक उन्माद नजर आता है । उस भीड़ और उन्माद को दिखाने-छापने के लिए वो मीडिया को कोसते नजर आते हैं । उनका मानना है कि अन्ना के आंदोलन के पीछे व्यवस्था परिवर्तन का विचार कम और एक समांतर सत्ता कायम करने की आकांक्षा ज्यादा है । पता नहीं राजेन्द्र यादव को इसमें समानंतर सत्ता खड़ा करने के संकेत कहां से मिल रहे हैं, जबकि अन्ना हजारे और उनके लोग मंच से कई कई बार ऐलान कर चुके हैं कि वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं । अन्ना हजारे ने तो कई बार अपने साक्षात्कार में इस बात को दोहराया है कि अगर वो चुनाव लड़ते हैं तो उनकी जमानत जब्त हो जाएगी । टीम अन्ना भी हर बार व्यवस्था परिवर्तन की बात करती है । दरअसल ये जो सोच है वो अपने दायरे से बाहर न निकलने की जिद पाले बैठे है । राजेन्द्र यादव तो दूसरी शिकायत है कि अन्ना हजारे का जो आंदोलन है वो लक्ष्यविहीन है और जिस भ्रष्टाचार खत्म करने की बात की जा रही है वो एक अमूर्त मुद्दा है । उनका मानना है कि जिस तरह से आजादी का लड़ाई में हम अंग्रेजों की सत्ता के खिलाफ लड़े थे या फिर जयप्रकाश आंदोलन के दौरान इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता के खिलाफ पूरा देश उठ खड़ा हुआ था वैसा कोई साफ लक्ष्य अन्ना के सामने नहीं है । भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लड़ाई लड़ी जा रही है वह अदृश्य है । करप्शन व्यापक रूप से समाज और नौकरशाही की रग रग में व्याप्त है, उसे खत्म करना आसान नहीं है । एक तरफ तो राजेन्द्र यादव कहते हैं कि ये समांतर सत्ता कायम करने की आंकांक्षा है तो दूसरी तरफ उन्हें कोई मूर्त लक्ष्य दिखाई नहीं देता है । राजेन्द्र यादव को अन्ना का आंदोलन बड़ा तो लगता है लेकिन इसके अलावा उन्हें सबसे आधारभूत आंदोलन नक्सलवाद का लगता है । उनका मानना है कि नक्सलवादी आंदोलन सारे सरकारी और अमानवीय दमन के बावजूद व्यवस्था परिवर्तन के लिए सैकड़ों लोगों को बलिदान के लिए प्रेरित कर रहा है । यादव जी को नक्सलवादी आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लगता है जबकि अन्ना का आंदोलन समांतर सत्ता कायम करने की आकांक्षा । क्या यादव जी यह भूल गए कि भारतीय सत्ता को सशस्त्र विद्रोह में उखाड़ फेंकने के सिद्धांत पर ही नक्सवाद का जन्म हुआ लगभग पांच दशक बाद भी नक्सलवादी उसी सशस्त्र विद्रोह के सिद्धांत के लिए प्रतिबद्ध हैं और उनका अंतिम लक्ष्य दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना है । जबकि अन्ना का आंदोलन ना तो कभी सत्ता परिवर्तन की बात करते है और न ही हिंसा की ।

दरअसल राजेन्द्र यादव भी उसी तरह की भाषा बोल रहे हैं जिस तरह की माओवादियों की समर्थक लेखिका अरुंधति राय बोल रही हैं । अरुंधति राय को भी जनलोकपाल बिल में समानंतर शासन व्यवस्था की उपस्थिति दिखाई देती है । अन्ना के आंदोलन में पहले भारत माता की तस्वीर लगाने और उसके बाद गांधी की तस्वीर लगाने और वंदे मातरम गाने पर भी ऐतराज है । ऐतराज तो अन्ना के मंच पर तमाम मनुवादी शक्तियांयों के इकट्ठा होने पर भी है । लेकिन अन्ना के साथ काम कर रहे स्वामी अग्वनवेश और प्रशांत भूषण तो अरुंधति के भी सहयोगी हैं । अरुंधति को इस बात पर आपत्ति थी कि अनशन के बाद अन्ना एक निजी अस्पताल में क्यों गए । इन सब चीजों को अरुंधति एक प्रतीक के तौर पर देखती हैं और उन्हें यह सब चीजें एक खतरनाक कॉकटेल की तरह नजर आता है । पता नहीं हमारे समाज के बुद्धिजीवी किस दुनिया में जी रहे हैं । अन्ना के समर्थन में उमड़े जनसैलाब में दलितो,अल्पसंख्यकों और आदिवासियों को ढूंढने में लगे हैं । बड़े लक्ष्य को लेकर चल रहे अन्ना हजारे के आंदोलन में जिस तरह से स्वत: स्फूर्त तरीके से लोग शामिल हो रहे हैं वह आंखें खोल देनेवाला है । घरों में संस्कार और आस्था जैसे धार्मिक चैनलों की जगह न्यूज चैनल देखे जा रहे थे, जिन घरों से सुबह-सुबह भक्ति संगीत की आवाज आया करती थी वहां से न्यूज चैनलों के रिपोर्टरों की आवाज या अन्ना की गर्जना सुनाई देती थी। अन्ना के समर्थन में सड़कों पर निकले लोगों के लिए ट्रैफिक खुद ब खुद रुक जाता था और आंदोलनकारियों को रास्ता देता था । ये सब एक ऐसे बदलाव के संकेत थे जिसे पकड़ पाने में राजेन्द्र यादव और अरुंधति जैसे लोग नाकाम रहे । अन्ना हजारे के आंदोलन से तत्काल कोई नतीजा न भी निकले लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे जिसको समझने में राजेन्द्र-अरुंधति जैसे महान लेखक चूक गए ।

लेखकों के अलावा हिंदी में काम कर रहे लेखक संगठनों की भी कोई बड़ी भूमिका अन्ना के आंदोलन के दौरान देखने को नहीं मिली । अगर किसी लेखक संगठन ने चुपके से कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी हो तो वह ज्ञात नहीं है । यह एक ऐतिहासिक मौका था जिसमें शामिल होकर हिंदी के मृतप्राय लेखक संगठन अपने अंदर नई जान फूंक सकते थे । लेकिन विचारधारा के बाड़े से बाहर न निकल पाने की जिद या मूर्खता उन्हें ऐसा करने से रोक रही है । समय को न पहचान पाने वाले इन लेखक संगठनों की निष्क्रियता पर अफसोस होता है ।प्रगतिशील लेखक संघ अपने शुरुआती सदस्य प्रेमचंद की बात को भी भुला चुका है । साहित्य समाज का दर्पण तो है पर आज के साहित्यकार उस दर्पण से मुंह चुराते नजर आ रहे हैं । जब लेखकों के सामने यह साबित करने की चुनौती थी कि साहित्य राजनीति का पिछलग्गू नहीं है तो वो खामोश रहकर इस चुनौती से मुंह चुरा रहे हैं । इस खामोशी से लेखकों और लेखक संगठनों ने एक ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया है । ऐसा नहीं है कि हिंदी के सारे साहित्यकार अन्ना के आंदोलन के विरोध में हैं – कई युवा और उत्साही लेखकों के अलावा नामवर सिंह और असगर वजाहत जैसे वरिष्ठ लेखकों को अन्ना का आंदोलन अहम लगता है । नामवर सिंह कहते हैं कि अन्ना का आंदोलन समाज को एक नई दिशा दे सकता है,यह सदिच्छा से किया गया आंदोलन है और इसका अच्छा परिणाम होगा । वहीं असगर वजाहत को भी लगता है कि अन्ना का आंदोलन एक नया रास्ता खोल रहा है । नामवर और असगर जैसे और कुछ लेखक हो सकते हैं, होंगे भी लेकिन बड़ी संख्या में जन और लोक की बात करनेवाले लेखक जन और लोक की आंकांक्षाओं को पकड़ने में नाकाम रहे ।

Saturday, August 13, 2011

मंजिल से भटका सफर

आज देश आजादी का जश्न भले ही मना रहा हो लेकिन देश की जनता के बीच अपनी इस आजादी को लेकर एक संदेह, एक आशंका, एक रोष पैदा हो गया है । इस संदेह की वजह यह है कि पूर् देश में इस वक्त भ्रष्टाचार का बोलबाला है । समाज के सबसे निचले स्तर से लेकर देश के शीर्ष स्तर को भ्रष्टाचार की विषबेल ने जकड़ लिया है । चाहे वो पौने दो लाख करोड़ का टेलीकॉम घोटाला हो, सत्तर हजार करोड़ का कॉमनवेल्थ घोटाला हो, हजारों करोड़ का अंतरिक्ष घोटाला हो, चाहे देश के शहीदों के परिवारों को मिलने वाले घर का आदर्श घोटाला हो या फिर आईपीएल घोटाला । आज जिधर नजर दौड़ाइये घोटाले उधर ही मुंह बाए खड़े हैं । सारे घोटालों के केंद्र में या यों कहें कि हर भ्रष्टाचार की धुरी या तो कोई कांग्रेस का नेता है या फिर कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार को समर्थन दे रही पार्टी का नेता । हर घोटाले के बाद कांग्रेस पार्टी यह दलील देती नजर आती है कि अमुक घोटाले के लिए फलां नेता और मंत्री जिम्मेदार है । लेकिन इस बात को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठता कि जिस मंत्रिमंडल के सदस्य घोटाले कर रहे हैं उनके मुखिया की कोई जिम्मेदारी बनती भी है या नहीं । हर कोई इस बात की दुहाई देता नजर आता है कि देश के प्रधानमंत्री बहुत साफ सुथरे छवि के हैं । उनके दामन पर दाग नहीं है । अरे भाई उस साफ सुथरी छवि को लेकर देश की जनता क्या करे । देश छवि से नहीं चलता । देश चलाने के लिए कड़े फैसले लेने होते हैं । उस भले और ईमानदार आदमी का हम क्या करें जिनकी नाक के नीचे घोटाले हो रहे हैं लेकिन वो और उनके कारिंदे कहते हैं ये सब उनकी जानकारी में नहीं हुआ । क्या हम यह मान लें कि आजादी के लगभग साढ़े छह दशक बाद प्रधानमंत्री नाम की संस्था को गठबंधन की राजनीति ने कमजोर कर दिया है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बहुत ईमानदार हैं, होंगे, लेकिन जिस तरह उन्होंने भ्रष्टाचार की तरफ से आंखें मूंद ली है उससे एक संदेह का वातावरण तो उनके इर्द गिर्द भी बन ही जाता है । आप लाख ईमानदार हों लेकिन आपके सहयोगी भ्रष्टाचारी हैं तो उसके छींटे तो आपके दामन पर भी पड़ेंगें ही । अंग्रेजी में एक मशहूर कहावत है – अ मैन इज नोन बाइ हिज कंपनी, ही कीप्स ।
ऐसा नहीं है कि देश में सिर्फ कांग्रेस पार्टी और उसके नेता ही भ्रष्ट हैं । देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में भी येदुरप्पा जैसे लोग हैं जिनका दामन दागदार है । येदुरप्पा पर जमीन घोटाले के आरोप लगे लेकिन बीजेपी को उनपर कार्रवाई करने में लोकायुक्त की रिपोर्ट का इंतजार करना पड़ा । सार्वजनिक जीवन में शुचिता और उच्च सामाजिक मानदंड की वकालत करनावली पार्टी बीजेपी, झारखंड में शिबू सोरेने के साथ मिलकर सरकार चला रही है । शिवू सोरेन पर पहले भी भ्रष्टाचार समेत हत्या और हत्य़ा की साजिश रचने के संगीन इल्जाम लग चुके हैं । उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की सरकार पर भी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन समेत कई सरकारी योजनाओं में घपले घोटाले की जांच चल रही है । मायावती पर आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा विचाराधीन है । उत्तर प्रदेश सरकार पर कैग की ताजा रिपोर्ट में बेहद गंभीर आरोप लगे हैं । तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता पर भी भ्रष्टाचार का मुकदमा चल रहा है । समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और हरियाणा के चौटाला पिता पुत्र के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में आय से अधिक संपत्ति का केस जारी है । लालू यादव और कई सूबों के और नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच चल रही है, यह सूची बहुत लंबी है । अभी-अभी आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रेड्डी की संपत्ति की जांच के आदेश दिए हैं ।
यह अकारण नहीं है कि देश के तीस मुख्यमत्रियों की कुल संपत्ति करीब ढाई सौ करोड़ रुपये हैं । इस अनुमान के मुताबिक राज्यों के मुख्यमंत्रियों की औसत संपत्ति आठ करोड़ रुपये है । लेकिन अगर उसमें से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और तमिलनाडू के मुख्यमंत्री(अब पूर्व) करुणानिधि की संपत्ति हटा दी जाए तो देश के मुख्यमंत्रियों की औसत संपत्ति घटकर करीब चार करोड़ रुपए रह जाएगी । तकरीबन 87 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और दलित नेता मायावती देश की सबसे अमीर मुख्यमंत्री हैं । दो हजार दस में मायावती ने बताया था कि उनकी संपत्ति तीन साल में 35 करोड़ रुपये बढ़ गई है यानि की तीन साल में बावन करोड़ से बढ़कर सत्तासी करोड़, तकरीबन सड़सठ फीसदी का इजाफा । केंद्रीय मंत्रियों की लिस्ट पर भी अगर नजर डालेंगे तो यह अमीरी नजर आएगी । कहां से आ रहे हैं ये पैसे, ये तो घोषित संपत्ति है, क्या कोई अघोषित संपत्ति भी है । इस तरह के सवाल पूरे देश को मथ रहे हैं । कोई कहता है कि उनके समर्थक चंदा देते हैं तो कोई अपने कारोबार के बूते करोड़पति बनने की बात कर रहा है । नतीजा यह हो रहा है कि पूरे देश में इस वक्त पॉलिटिकल क्लास को लेकर जनता के मन में एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है । आजादी के तकरीबन चौंसठ साल बाद भी आज देश की जनता अपने चुने हुए नेताओं पर भरोसा नहीं कर पा रही है तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक बात है । देश की आजादी की वर्षगांठ पर पॉलिटिकल क्लास के लोगों के लिए आत्ममंथन का भी वक्त है ।
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि सत्ताधरी पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करनेवाली संस्थाओं पर ही हमले करने लगे हैं । जब सीएजी की रिपोर्ट में दिल्ली की मुख्यमंत्री के खिलाफ आता है तो कांग्रेस के प्रवक्ता उस संस्था को ही सवालों के घेरे में ले लेते हैं । उसके पहले टेलीकॉम घोटाले में कैग की रिपोर्ट की जांच कर रही संसद की लोकलेखा समिति पर भी कांग्रेस के लोगों ने इस तरह से ही सवाल खड़े कर दिए थे । भ्रष्टाचारियों को बचाने या फिर उनके समर्थन के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं पर हमले से ऐसा लगता है कि कांग्रेस को भ्रष्ट लोगों की ज्यादा चिंता है बजाए संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा की । आजादी के बाद जिस तरह से उन्नीस सौ पचास में सीएजी को बनाकर उसे संवैधानिक आजादी दी गई और जिसे जवाहरलाल नेहरू ने अपने शासनकाल में मजबूकी दी आज उसपर ही इस वक्त के कांग्रेसी उंगली उठा रहे हैं ।
पूरा देश यह भी देख रहा है कि किस तरह से अन्ना हजारे, जो कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के प्रतीक बन चुके हैं, को परेशान किया जा रहा है । उनकी आवाज को दबाने या फिर उनको या उनकी टीम को परेशान करने का कोई मौका सरकार नहीं छोड़ रही है । चाहे वो दिल्ली में अनशन करने देने के लिए जगह देना का मामला हो या फिर लोकपाल बिल में मनमानी करने का । अन्ना के खिलाफ खड़े होकर सरकार ने इतनी बड़ी गलती कर दी है जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं है । दरअसल आज कांग्रेस के पास आजादी के आंदोलन से तपकर निकले जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, एस राधाकृष्णन और डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जौसे नेता नहीं हैं जो एक नैतिक उदाहरण पेश कर सकें । अन्ना ने ईमानदारी की जो नैतिक चुनौती सरकार को दी है उसका जवाब देने के लिए कांग्रेस के पास कोई नेता नहीं है । कपिल सिब्बल हों या फिर चिदंबरम या फिर विवादित बयानों के लिए चर्चित दिग्विजय सिंह- इन सबमें वो नैतिक ताकत नहीं है जो अन्ना हजारे का मुकाबला कर सके । लेकिन उससे भी चिंता की बात यह है कि देश में इन भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कार्रवाई ना होते देख जनता क्षुब्ध होने लगी है, उनका धैर्य जवाब देने लगा है । आज जश्ने आजादी के बीच पॉलिटिकल क्लास को जनता की इस नाराजगी का संज्ञान लेना चाहिए ।

Saturday, April 23, 2011

लोकतंत्र को शर्मसार करता वाकया

अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता के जश्न और उसके बाद ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों पर आरोपों की बौछार ने पूरे देश में ऐसा माहौल बना दिया जैसे की वही देश की सबसे बड़ी समस्या हो । इस पूरे विवाद में सीडी के सरताज अमर सिंह की एंट्री ने उस गंभीर मुद्दे को मनोरंजक बना दिया । सीडी के शोर के बीच एक ऐसी खबर दबकर रह गई जिसने पूरे देश को शर्मसार कर दिया, साठ साल से ज्यादा के हमारे गणतंत्र पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया । देश में सबसे ज्यादा साक्षर लोगों के प्रदेश केरल में एक ऐसा वाकया हुआ जो सभ्य समाज के मुंह पर करारा तमाचा है । केरल सरकार में एक वरिष्ठ दलित अधिकारी के रिटायर होने के दिन ही उनके दफ्तर में काम करनेवाले लोगों ने पूरे दफ्तर का शुद्धीककरण किया । सूबे के रजिस्ट्री विभाग में इंसपेक्टर जनरल के पद पर काम करनेवाले ए के रामकृष्णन जब इकत्तीस मार्च को सेवानिवृत्त हुए तो उस दिन उनकी विदाई के बाद उनके ही दफ्तर में काम करनेवाले कुछ लोगों ने उनकी कार को पहले पानी से धोया गया और फिर मंत्रोच्चार के बीच सार्वजनिक रूप से कार का शुद्धीकरण किया गया । बात इतने पर ही नहीं रुकी अगले दिन तो रजिस्ट्रार के दफ्तर के लोगों ने और आगे बढ़कर रामकृष्णन के बैठनेवाले कमरे और उनकी कुर्सी को भी पवित्र पानी में गाय के गोबर को घोलकर उससे साफ किया । पानी में गाय के गोबर को मिलाकर शुद्धीकरण करने की केरल में पुरानी मान्यता है । एक सरकारी दफ्तर में सरेआम इस तरह का वाकया हो और पूरा दफ्तर खामोश रहकर देखता रहे तो इस बात का पता चलता है कि हमारे समाज में जाति व्यवस्था कितने अंदर तक पैठ चुकी है । केरल की राजधानी में यह सब कुछ तब घटित हो रहा था जब कि लगभग एक पखवाड़े बाद सूबे में विधानसभा का चुनाव होनेवाला था। अफसोस की किसी भी राजनीतिक दल ने इस शर्मनाक वाकए को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया । उस कांग्रेस पार्टी ने भी इस मुद्दे पर कोई जनआंदोलन नहीं छेड़ा ना ही कोई मुहिम चलाई जो अपने आपको महात्मा गांधी की विरासत का वारिस कहते नहीं थकती । उस कांग्रेस पार्टी के नेताओं को भी यह मुद्दा नहीं लगा जिसके केरल के ही नेता और अब केंद्र में मंत्री व्यालार रवि के बेटे के विवाह के बाद गुरुवयूर मंदिर को शुद्ध किया गया था । सामाजिक समानता की बात करनेवाली वामपंथी पार्टी जो कि इस वक्त तक केरल में सत्ता में है,उसने भी इस मामले के सामने आने के बाद कोई कार्रवाई नहीं की। इस मामले में शिकायत मिलने के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग ने सरकार के राजस्व विभाग से पूरे मामले की रिपोर्ट तलब की है । रिपोर्ट आने के बाद क्या कोई कार्रवाई हो पाएगी इस सवाल का जबाव तो अभी समय के गर्भ में ही है । एक जमाने में केरल के समाज में जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता समाज में गहरे तक धंसा था । स्वामी विवेकानंद ने केरल के समाज में भेदभाव की उस स्थिति पर गहरी चिंता जताई थी और महात्मा गांधी ने भी केरल के मंदिरों में दलितों के प्रवेश के लिए सत्याग्रह भी किए थे । केरल के प्रसिद्ध गुरुवयूर मंदिर में भी दलितों और गैर हिंदुओं के प्रवेश को लेकर लंबे समय तक जनआंदोलन चला था । लेकिन तमाम आंदलनों और समाज में शिक्षा के प्रचार प्रसार ने भी इस सामजिक बुराई को कम किया हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है । ऐसा नहीं है कि दलितों के साथ भेदभाव सिर्फ केरल में ही हो रहा हो । चंद साल पहले उत्तर प्रदेश के न्यायिक अधिकारी ने भी इसी तरह के आरोप लगाए थे कि उनके दफ्तर के सहयोगी ने उनके बैठने की जगह का शुद्धीकरण किया था । उस मामले में भी शिकायत हुई थी लेकिन क्या कार्रवाई हुई यह अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है ।
केरल के अलावा हिमाचल प्रदेश के एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर में अब भी एक बोर्ड प्रमुखता से मंदिर के बाहर टंगा है - लंगर में शूद्रों का प्रवेश वर्जित है । यह किस तरह के समाज की तस्वीर जहां उसके ही लोगों का प्रवेश किसी धार्मिक स्थान में वर्जित है । देश की आजादी के चौंसठ साल बाद भी सार्वजनिक रूप से इस तरह के बोर्ड मंदिरों में लगे हैं और प्रशासन सो रहा है, सरकारों को इसकी फिक्र नहीं है । इससे तो यही प्रतीत होता है कि सरकार की मूक सहमति इस तरह की मान्यताओं के पक्ष में है या फिर वो इस तरह की समाजिक कुरीतियों को हचाने के प्रति उदासीन है । मंदिर में दलितों को प्रवेश नहीं मिलेगा, मंदिर के गर्भ गृह में महिलाओं को भी प्रवेश नहीं मिलेगा, लेकिन हम प्रगतिशील समाज हैं, हम आधुनिक हैं । इस तरह के दकियानूसी और घटिया विचार के लिए हमारे समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए । आज हमारा देश विश्व में सुपर पॉवर बनने का सपना देख रहा है । विश्व में हमारी अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी अर्थवयवस्था होने का ख्बाब देख रही है ,लेकिन समाज में इन विसंगतियों की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है । आज पूरे देश में भ्रष्टाचार को लेकर बड़ा आंदोलन किया जा रहा है । तथाकथिकत सिविल सोसाइटी के नुमाइंदे और सरकार के आला मंत्री भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए लोकपाल बिल के ड्राफ्ट बनाने में जुटे हैं । कांग्रेस के हाई प्रोफाइल नेता दिग्विजय सिंह लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं । लेकिन किसी के पास यह सोचने की फुरसत नहीं है कि समाज के निचले पायदान पर जीवन जी रहे लोगों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और वो किस तरह जहालत और अपमानजनक जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं । दलितों के घर में रात बिताने और उनके हाथ का खाना खाने वाले कांग्रेस पार्टी के युवराज राहुल गांधी को भी देश में दलितों के उत्थान की चिंता हो सकती है लेकिन उनकी तरफ से दलितों के उत्थान के लिए कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है । क्या दलितों के घर में खाना भर खा लेने या उनके घर में रात बिता लेने से समाज में उनको मान्यता या फिर बराबरी का हक मिल पाएगा । दलितों के उत्पीड़न के खिलाफ कड़े कानून भर बना देने से उनका हित हो जाएगा या फिर उनपर अत्याचार रुक जाएंगे यह सोचना भी गलत है । कानून को सख्ती से लागू करना और समाज में उसका भय होना जरूरी है और यह तभी हो पाएगा जब ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई होगी और दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिलेगी ।
समाज से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जारी जंग जायज है, इस मुहिम को हर तरह का और हर तबके का समर्थन मिलना चाहिए । लेकिन देश में भ्रष्टाचार से बड़ी समस्या अब भी दलितों की समाज में दयनीय स्थिति है । इस दिशा में देश के कर्ताधर्ताओं के साथ साथ सिविल सोसाइटी को भी विचार करना होगा । गांधी जी ने अप्रैल 1921 में अहमदाबाद में सप्रेस्ड क्लास कॉंफ्रेंस के अपने भाषण में कहा था- जबतक देश का हिंदू समाज छूआछूत को अपने धर्म का हिस्सा मानता रहेगा, जब तक हिंदू समाज अपने समाज के साथ रहनेवाले कुछ लोगों को छूना पाप समझता रहेगा तबतक स्वराज को पाना मुमकिन नहीं है । गांधी का यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है । हम चाहे भ्रष्टाचार के खिलाफ जितनी भी बड़ी लड़ाई लड़ लें, उसमें चाहे हमें कितनी भी बड़ी सफलता हासिल हो जाए लेकिन जब तक हमारे समाज में केरल जैसी घटनाएं घटती रहेंगी, तबतक हमारी उस जीत का कोई मतलब नहीं रह जाएगा ।

Friday, April 15, 2011

जश्न में दबे बड़े सवाल

चार दिनों से दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी बुजुर्ग समाजसेवी अन्ना हजारे का जनलोकपाल बिल को लेकर जारी आमरण अनशन खत्म हो गया । अन्ना के अनशन और देशभर में उसको मिल रहे अपार जनसमर्थन को देखकर सरकार के हाथ पांव फूल गए । भारत सरकार के कर्ता-धर्ता और वरिष्ठ मंत्रियों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद अन्ना की सभी मांगे मान ली गई । चार दिन तक चले एक व्यक्ति के आंदोलन ने भारत सरकार को जनता की भावनाओं को समझने और अन्ना की मांग मानने के लिए मजबूर कर दिया । दो दिन पहले जिस सरकार की एक वरिष्ठ मंत्री अंबिका सोनी दहाड़ते हुए बयान दे रही थी कि चंद मुट्ठी भर लोगों के दबाव में सरकार झुकने वाली नहीं है । उन्हीं चंद मुट्ठीभर लोगों ने सरकार से अपनी सभी मांगे मनवा ली । अन्ना के आह्वान पर देशभर में जिस तरह से हर वर्ग के लोग स्वत:स्फूर्त घर से बाहर आंदोलन के लिए निकले वो इस अनशन की सबसे बड़ी उपलब्धि है । वैश्वीकरण के इस दौर में कई विद्वानों की राय थी कि जिस तरह से देश का नया मध्यवर्ग बाजार के प्रभाव में है उसमें वो सिर्फ अपने बारे में सोचती है और उनके सामाजिक सरोकार खत्म हो गए हैं । आम जनता से जनआंदोलन की अपेक्षा करने की तो वो सोच भी नहीं सकते थे । नतीजा यह हुआ कि देश के नेताओं के मन में जनादेश को लेकर जो आदर होना चाहिए था वो खत्म होने लगा था । जनता का डर कम होने के इस भाव से नेताओं के मन में यह बैठ गया कि वो कुछ भी करके बेदाग निकल सकते हैं । जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों-करोड़ों रुपए डकार कर भी वो मजे में रह सकते हैं । उनके मन से जनता का डर और आमजन के प्रति आदर का भाव खत्म होने लगा था जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत था । लेकिन अन्ना के अनशन ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि अगर कोई विश्वसनीय व्यक्ति जनता से जुड़े मुद्दे को लेकर खड़ा होता है तो देश की जनता का ना केवल उसे समर्थन मिलता है बल्कि देश के हर तबके का आदमी उसकी एक आवाज पर घर से निकल कर उसके कदम से कदम मिलाकर सरकार से लोहा लेने तो भी तैयार हो जाते हैं । अन्ना के अनशन ने एक बार फिर से देश के नेताओं में जनता के लिए आदर और जनता का डर कायम कर दिया । अन्ना का अनशन खत्म हो गया देशभर में अभी जीत का जश्न मनाया जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी जंग जीत ली है । दरअसल पूरा भारतीय मानस जो है वो बेहद इमोशनल है, एक छोटी सी उपलब्धि में भी वह मानस जश्न में डूब जाता है । लेकिन जीत के इस जस्न के बीच कई सवाल भी मुंह बाए खड़े हो गए हैं । सबसे पहला और बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि अन्ना के इस अनशन से हासिल क्या हुआ । अगर हम उपरी तौर पर देखें तो लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की जनता को बड़ी जीत और कामयाबी हासिल हुई है । देश में इस तरह का एक वातावरण बन गया है जिसमें आम जनता को लगने लगा है कि लोकपाल बिल भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बडा़ हथियार होने जा रहा है जिसे भ्रष्टाचार रूपी राक्षस का वध संभव हो सकेगा । लेकिन क्या सचमुच ऐसा संभव हो पाएगा । अगर कुछ देर के लिए यह मान लिया जाए कि जनदबाव में प्रधानमंत्री, मंत्री और देश के आला अफसर लोकपाल के दायरे में आ जाते हैं और लोकपाल को किसी को मुजरिम करार देकर सजा देने का अधिकार भी दे दिया जाता है तो क्या इससे भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा । अगर यह भी मान लिया जाए कि माथापच्ची के बाद बिल ोक कानूनी जामा पहना कर लागू कर दिया जाता है । तो क्या सिर्फ कानून बना देने भर से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा । लेकिन सिर्फ कानून बना देने भर से जुर्म कम नहीं होता । जरूरत होती है कानून को सही तरीके से लागू करने की और ऐसा वातावरण तैयार करने की जिसमें मुजरिमों के मन में कानून का भय पैदा हो जाए । भ्रष्टाचार से निबटने के लिए हमारे देश में पहले से प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट है । उसमें भी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कई सख्त प्रावधान हैं तो कई खामियां भी हैं । जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए एक नया कानून बनाने के बजाए वर्तमान में लागू कानून की कमियों को दूर किया जाए । जैसे अफसरों या मंत्रियों को आरोपी बनाने के पहले जो इजाजत लेने का प्रावधान है उसको खत्म किया जाना चाहिए । वर्तमान कानून में स्पेशल जज से सुनवाई का प्रावधान है लेकिन बहुधा ऐसा हो नहीं पाता है । जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार के मामले में न्यायिक प्रक्रिया को तेज किया जाए और दोषी को जल्द से जल्द सजा दिलवाया जाए । एक और अहम सवाल उठता है कि क्या इसती आसानी से लोकपाल को इतने तरह के अधिकार दे दिए जा सकते हैं । देश के मौजूदा कानून और संवैधानिक संस्थाओं को संविधान से मिले अधिकारों के मद्देनजर यह इतना आसान नहीं है । इसमें कई संवैधानिक अड़चनें आएंगी – ड्राफ्ट कमिटी का गठन जितनी आसानी से नोटिफाई हो गया है प्रस्तावित बिल का मसौदा बनाने में उतनी ही दिक्कतें आएंगी । लोकपाल बिल के कानून बनने के बाद भी हर आरोपी के पास राइट टू अपील तो होगा ही । किसी भी तरह के कानून से अपील के इस अधिकार को ना तो खत्म किया जा सकता है और ना ही ऐसा किया जाना चाहिए । क्योंकि अगर ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक बात होगी । राइट टू अपील आरोपी के हाथ एक ऐसा अधिकार है जिसका इस्तेमाल करके वो लंबे समय तक खुला घूम सकता है, संसद और विधानसभा का सदस्य बन सकता है । देश का कोई भी कानून आरोपी को चुनाव लड़ने से नहीं रोकता है । एक अजीब विडंबना और भी है कि अगर कोई संसद सदस्य या मंत्री या विधानसभा का सदस्य किसी जुर्म में दोषी भी करार दे दिया जाता है तो उसकी सदस्यता खत्म नहीं होती है और सिर्फ आरोपी है तो वह ठाठ से लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर का सम्मानित सदस्य बना रह सकता है । जरूरत इस बात की है कि इस तरह के कानूनों में संशोधन किया जाए । अगर भ्रष्टाचार पर लगाम लगानी है तो न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने और मुकदमों के जल्द से जल्द निबटारे की आवश्यकता है, जिसकी ओर अन्ना को ध्यान देना चाहिए था । इस मामले में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बेहद अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है । वहां के अपराधियों के खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई करवाकर जल्द से जल्द मुकदमे का निबटारा करवाया और मुजरिमों को सजा मिली । नतीजा यह हुआ कि सूब में लोगों के मन में कानून के प्रति एक विश्वास जगा और अपराधियों के मन में कानून का भय । अंत में एक बात और कि अन्ना को इस अनशन के दौरान कई उत्साही लोगों ने छोटे गांधी कह डाला लेकिन गांधी और अन्ना में बुनियादी अंतर है । गांधी हमेशा व्यक्ति में बदलाव की बात करते थे और अन्ना संस्थागत बदलाव की बात करते हैं । गांधी हमेशा आदर्श स्थिति और रामराज्य की कल्पना करते थे । उनका मानना था कि लोगों का मन इतना साफ हो कि वो भ्रष्टाचारी बनें ही ना जबकि अन्ना हजारे कानून बनाकर उसे रोकने की बात करते हैं ।गांधी का लक्ष्य और आदर्श दोनों बेहद बड़े थे । इसलिए गांधी से अन्ना की तुलना बेमानी है । लेकिन उत्साह में बहुधा तुलना में गलती हो जाती है