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Saturday, September 2, 2023

पुरस्कारों में ‘सिस्टम’ का दखल


दिल्ली में आयोजित एक साहित्यिक समारोह में काफी दिनों बाद जाना हुआ। आमतौर पर साहित्यिक समारोहों के पहले और बाद में कुछ मित्र एक जगह जमा होकर साहित्यिक विषयों पर चर्चा करते हैं। उस आयोजन में कई मित्र मिल गए। शाम हो गई थी और दो घंटे के आयोजन के बाद सबको चाय की तलब हो रही थी। तय हुआ कि कहीं बैठकर चाय पी जाए। हम पांच मित्र पास की एक चाय दुकान पहुंचे। चाय बनाने को कहा गया। चाय आते ही चर्चा आरंभ हो गई। विभिन्न विधाओं में हो रहे साहित्यिक लेखन से चर्चा आरंभ हुई और फिर कब वो पुरस्कारों पर चली गई पता ही नहीं चला। कुछ ही दिनों पहले वर्ष 2023 के लिए श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको सम्मान की घोषणा हुई थी। इस वर्ष का सम्मान हिंदी उपन्यासकार मधु कांकरिया को देने की घोषणा हुई थी। ये पुरस्कार उर्वरक क्षेत्र की सहकारी संस्था इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव (इफको) लिमिटेड की ओर से दिया जाता है। सम्मानित होनेवाले साहित्यकार को ग्यारह लाख रुपए का चेक, एक प्रतीक चिन्ह और प्रश्स्ति पत्र दिया जाता है। मधु कांकरिया को पुरस्कार की घोषणा पर चर्चा होने लगी। उनका आरंभिक उपन्यास पत्ताखोर मैंने पढ़ा था। मुझे पसंद आया था इस कारण मैंने चयन की प्रशंसा कर दी। मेरी प्रशंसा सुनकर  एक मित्र ने कहा, काश! उपन्यासों की विषयवस्तु और लेखन शैली के आधार पर पुरस्कार दिए जाते। अगर ऐसा होता तो श्रीलाल जी की स्मृति में दिया जानेवाला ये पुरस्कार चित्रा मुद्गल या मैत्रेयी पुष्पा आदि को दिया जाना चाहिए था। उसके मुताबिक ये पुरस्कार एक विचारधारा विशेष से जुड़े लेखकों को दिया जाता है। उसका इशारा वामपंथी लेखकों की ओर था। हम पांच मित्रों में से दो तो घोर और घोषइत तौर पर वामपंथी लेखक थे। उनमें से एक ने फौरन इसका प्रतिवाद किया और कहा कि चित्रा जी और मैत्रेयी जी इस पुरस्कार या सम्मान के लिए उचित पात्रता नहीं रखती हैं। बेहतर होता कि पुरस्कार के निर्णय की आलोचना करने से पहले उसके नियमों को देखा जाता। इस पुरस्कार के नियमों के अनुसार न तो चित्रा जी की पात्रता है और न ही मैत्रेयी जी की। मेरे चेहरे पर सहमति का भाव उभरा था। मैंने तो उत्साह में कह भी दिया कि प्रत्येक पुरस्कार की पात्रता की नियमावली होती है। निर्णायक मंडल उसके आधार पर ही आपस में विचार विमर्श करता है और फिर किसी एक लेखक का चयन किया जाता है।

जिस मित्र ने चित्रा जी और मैत्रेयी जी का नाम लिया था वो अपने मोबाइल में कुछ ढूंढने में व्यस्त था। अचानक उसका चेहरा चमका और वो कुछ पढने लगा- मूर्धन्य कथाशिल्पी श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में वर्ष 2011 में शुरु किया गया यह सम्मान प्रत्येक वर्ष हिंदी के ऐसे लेखक को दिया जाता है जिसकी रचनाओं में मुख्यत: ग्रामीण और कृषि जीवन तथा विस्थापन, हाशिए का समाज और भारत के बदलते यथार्थ का चित्रण किया गया हो। उसके इतना कहते ही एक वामपंथी मित्र ने कहा कि तुमलोग हर जगह व्हाट्सएप युनिवर्सिटी का ज्ञान देने लगते हो। ये साहित्य की दुनिया है यहां व्हाट्सएप फार्वर्ड से कुछ भी न तो साबित होगा न ही स्थापित। जब वो ये तंज कर रहा था तो नियम पढनेवाला मित्र मुस्करा रहा था। इस बीच दूसरे वामपंथी मित्र ने भी अपने कामरेड की बातों से सहमति जताते हुए प्रश्न उछाला, साहित्य में भी अब व्हाट्सएप ज्ञान चलाओगे क्या। मुस्कुरा रहे मित्र ने फिर से अपने मोबाइल को देखा और विनम्रता से कहा कि आप दोनों ठीक कह रहे हैं। मैंने व्हाट्यएप पर ही आए संदेश को पढ़ा। लेकिन ये फार्वर्ड संदेश बल्कि इफको की प्रेस रिलीज है। अगर प्रेस रिलीज में सही लिखा गया है तो समकालीन रचनाकारों में मैत्रेयी पुष्पा से अधिक किसने ग्रामीण जीवन औऐर हाशिए के समाज पर लिखा है। चाक से लेकर अलमा कबूतरी जैसे उनके उफन्यासों को याद करिए। चित्रा जी ने भी हाशिए के समाज पर भी लिखा है। बदलते भारत के यथार्थ का चित्रण भी उनकी रचनाओं में है। वो निरंतर बोले जा रहा था। दोनों कामरेड असहमत थे। लेकिन उनके पास तर्क नहीं थे तो उन्होंने निर्णायक मंडल के विवेक की आड़ ली। 

बात निर्णायक मंडल के विवेक पर आ गई थी। मैंने पिछली बार की तरह ही तर्क दिया कि पुरस्कार तो निर्णायक मंडल ही तय करेगा। उसको मधु कांकरिया की रचनाएं बेहतर दिखी होंगी। मैं ये कहकर चर्चा समाप्त करना चाहता था। परंतु जिस मित्र ने रचना के आधार पर पुरस्कार की बात आरंभ की थी वो तो डटा हुआ था। उसने कहा अच्छा चलो जरा निर्णायक मंडल के नाम देख लेते हैं। उसने फिर मोबाइल में व्हाट्सएप खोला और इफको की प्रेस रिलीज से पढ़कर बताया कि निर्णायक मंडल में असगर वजाहत, अनामिका, प्रियदर्शन, रवीन्द्र त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उत्कर्ष शुक्ल थे। नाम सुनकर मेरे वामपंथी मित्र ने तर्क उछाला कि इतने वरिष्ठ लेखकों के निर्णायक मंडल के निर्णय पर प्रश्न कैसे खड़ा किया जा सकता है। इतना सुनते ही वो बोले कि कि जरा निर्णायक मंडल में शामिल लेखकों की विचारधारा और लेखक संगठनों से जुड़ाव देख लो। असगर वजाहत और मुरली मनोहर प्रसाद सिंह तो जनवादी लेखक संघ से सक्रिय रूप से संबद्ध हैं। अनामिका को छोड़कर जो दो लोग हैं उनका रुझान भी वामपंथ की ओर है जो साहित्य जगत में ज्ञात है। युवा लेखक की मैं नहीं जानता। इतना सुनते ही दोनों वामपंथी मित्र भड़क गए। कहने लगे कि लेखक संगठनों से जुड़े होने का क्या मतलब है। सरकारी पुरस्कारों पर टिप्पणी करने लगे कि सरकार भी तो अपने लोगों को पुरस्कृत करती है। अपनी विचारधारा के लोगों को सम्मानित करती है आदि आदि। 

हम चारों मित्र इस चर्चा में शामिल थे। हमारा पांचवां मित्र चुपचाप चाय पी रहा था और मुस्कुरा रहा था। जैसे बातचीत का आनंद ले रहा हो। अचानक वो पुरस्कारों पर सवाल उठानेवाले मित्र को देखकर बोला कि भाई, तुमको द कश्मीर फाइल्स फिल्म का वो संवाद याद करना चाहिए जिसमें कहा गया है कि सरकार भले बदल गई हो लेकिन सिस्टम तो हमारा ही चलता है। वही सिस्टम चल रहा है। सिस्टम के पसंदीदा लोग पुरस्कृत हो रहे हैं। देखा नहीं कुछ दिनों पहले भारत सरकार ने केंद्रीय हिंदी निदेशालय, दिल्ली और केंद्रीय हिंदी संस्थान के सभी पुरस्कार बंद कर दिए। उधर वित्त मंत्रालय के अधीन आनेवाले बैंक आफ बड़ौदा ने 61 लाख रुपए के पुरस्कार बांट दिए। उसकी निर्णायक समिति देख लो। अध्यक्षता बुकर पुरस्कार विजेता गीतांजलिश्री ने की और उसमें अरुण कमल, पुष्पेश पंत, अनामिका आदि थे। इनमें से अधिकांश की विचारधारा ज्ञात है। गीतांजलिश्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मुखर आलोचक हैं, सरकार की भी। अरुण कमल लंबे समय तक प्रगतिशील लेखक संघ में रहे। इन सबने 25 लाख के प्रथम पुरस्कार के लिए उर्दू उपन्यास अल्लाह मियां का कारखाना को चुना। अब दोनों वामपंथी मित्र ढीले पड़ने लगे थे। मैंने सोचा कि बात बदली जाए। मैंने फिल्म की चर्चा आरंभ करने का प्रयास किया। लेकिन पाचवें मित्र रुके नहीं। कहने लगे कि चुनाव वर्ष में सरकार ने अपने अधिकतर साहित्यिक और भाषाई पुरस्कार बंद कर दिए लेकिन सिस्टम वाले पुरस्कार दे रहे हैं। इफको का पुरस्कार भले ही सरकारी नहीं हो लेकिन बैंक आफ बड़ौदा का पुरस्कार तो पूरी तरह से सरकारी है। इफको भी भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय से किसी न किसी तरह से तो जुड़ा ही है। पता नहीं क्यों सरकार ‘सिस्टम’ को खुलकर खेलने का अवसर प्रदान कर रही है। बात राजनीति की ओर मुड़ते देख मैंने चाय पर चर्चा खत्म करवाई। घर लौटते समय पांचवें मित्र की बात दिमाग में कुलबुला रही थी। 


Monday, May 19, 2014

राजनीति, महिला और विद्रूपता

राजेन्द्र यादव को अपने जीवन काल में इस बात का अफसोस था कि राजनीतिक हत्या पर हिंदी में कोई उपन्यास नहीं लिखा गया । वो हमेशा कहते थे कि हिंदी के उपन्यास लेखक राजनीति की बजबजाती दुनिया पर तो लिख लेते हैं लेकिन राजनेताओं के हत्या के इर्दगिर्द रचना करने का साहस उनमें नहीं है । उन्होंने एक बार कहा था कि वेद प्रकाश शर्मा इकलौते हिंदी के लेखक हैं जिन्होंने वर्दी वाला गुंडा नामक उपन्यास लिखा जो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या पर आधारित है । लेखक ने प्लॉट अवश्य वहां से उठाया है लेकिन उसमें कल्पना के आधार पर काफी घटनाओं और स्थितियों का समावेश किया है । राजेन्द्र यादव की इस बात से असहमति का कोई आधार नहीं है साथ ही इस बात से भी अलग राय नहीं हो सकती है कि राजनीति को केंद्र में रखकर कई उपन्यास लिखे गए । श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी से लेकर विभूति नारायण राय के तबादला तक भारतीय समाज में राजनीति के खेल पर से पर्दा हटाने की कोशिश की गई है । प्रेमचंद के जमाने में गांव के लोग अपनी सारी बदमाशियों के बावजूद कुछ मूल्यों पर डटे रहते थे लेकिन वही गांव जब श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास राग दरबारी में चित्रित होता है तो उसका स्वरूप बदल चुका होता है ।  राजनीति की गंदगी गांव के जिंदगी में इस तरह से रच बस गई कि पंचायतों और ग्रामसभाओं के चुनाव में उस तरह के तमाम हथकंडे और दंद-फंद अपनाए जाने लगे जो प्रदेश और देश की राजनीति में अपनाए जाते थे । उससे आगे बढ़ते हुए विभूति नारायण राय के उपन्यास तबादला में तो वो राजनीति और घिनौने रूप में उपस्थित होती है । यह उपन्यास मूलत उत्तर प्रदेश के सर्वजनिक निर्माण विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की कहानी है जिसमें तबादला तंत्र को प्रभावित करनेवाले राजनेताओं अफसरों और दलालों की साठगांठ का वर्णन है । सरकारी तंत्र के विद्रूप के अलावा इस उपन्यास में स्त्री शोषण का भी एक आयाम है । यही आयाम अब रजनी गुप्त के नए उपन्यास ये आम रास्ता नहीं है के केंद्र में है । रजनी गुप्त के इस उपन्यास में शीर्षक के नीचे कोष्ठक में लिखा है – राजनीति के चक्रव्यूह में स्त्री । इससे पाठकों को इस बात का अंदाज हो जाता है कि उपन्यास की कहानी क्या कहती है ।

इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र मृदु है जो पिछड़े वर्ग से आती है और अपने पति और दो बच्चों के साथ खुशी-खुशी पारिवारिक जीवन बिता रही होती है । उसकी जिंदगी में बेहद अहम मोड़ तब आता है जब वो एक दिन एक व्यूटी कांटेस्ट में चुन ली जाती है । घरेलू महिला होने के बावजूद मृदु के जीने का सलीका अन्य महिलाओं से अलहदा है । वो बिंदास है, वो खूबसूरत है, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती है और समाज के लिए कुछ करना भी चाहती है । इस उपन्यास में लेखिका ने साफ तौर पर इस बात को उकेरा है कि राजनीति के दलदल में महिलाओं के लिए खुद को बचा लेना लगभग असंभव सा है । इस उपन्यास से यह ध्वनित होता है महिलाओं को अगर राजनीति में ऊपर चढ़ना है तो उन्हें अपने शरीर को पायदान की तरह इस्तेमाल करना होगा । यह बात पात्रों के बीच होनेवाली बातचीत और स्थितियों से कई बार स्पष्ट होती है । एक अंग्रेजी पत्रिका में हिंदी की मशहूर लेखिका रमणिका गुप्ता, जो कि खुद लंबे समय तक राजनीति में रही हैं, ने माना था कि किस तरह से राजनेता महिलाओं के साथ व्यवहार करते हैं । किस तरह से खूबसूरत महिलाओं को अपने आपको बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है जो ज्यादातर नाकाम रहती है । अपने इस उपन्यास में रजनी गुप्त ने राजनीति की इस विद्रूपता को उजागर तो किया ही है लेकिन इसके साथ एक महात्वाकांक्षी पति के नापाक इरादों को भी उघाड़ कर रख दिया है । मृदु का पति अपनी तरक्की के लिए अपनी खूबसूरत पत्नी का इस्तेमाल करना चाहता है । वो अच्छी पोस्टिंग के लिए उसे मंत्री और आला अधिकारियों के पास भेजता है लेकिन मृदु अपने दृढ स्वभाव और दबंगई की वजह से बच कर निकल आती है । अपने पति की इस नीच हरकत से वो प्रतिक्रयावादी हो जाती है और पति की नाराजगी मोल लेकर राजनीति की ओर कदम बढ़ा देती है । वहां उसे एक नेता मिलता है जिसके साथ लांग ड्राइव पर जाना और उसकी नजदीकी उसे अच्छी लगती है । लेकिन नियति का चक्र कुछ ऐसा चलता है कि वो सबकुछ छोड़छाड़ कर पीड़ित लड़कियों के आश्रम में पहुंच जाती है । डेढ सौ पन्ने के इस छोटे से उपन्यास में कई कथाएं एक साथ चलती हैं । राजनीति के अलावा यह उपन्यास उसके दोनों बेटों के मनोभावों और पिता के बहकावे में आकर मां के साथ बदतमीजियों की दास्तान भी कहता है । मां के लिए अपने संतान की तड़प स्वाभाविक है लेकिन पिता अपनी चालों से इसको और बढ़ाता रहता है । इस उपन्यास में कई ऐसे विषय हैं जिसको पाठक हाल की घटनाओं से जोड़कर देख सकते हैं । लेकिन एक लेखक के लिए यही तो सफलता है कि वो किस तरह से अपने आसपास घट रही घटनाओं को अपनी रचना का विषय बनाकर समाज को झकझोरता है । रजनी गुप्च के इस उपन्यास में राजनीति के अलावा किशोर मन के मनोविज्ञान का भी चतित्रण है । किशोर मन का यह मनोविज्ञान रजनी के पिछले उपन्यास कुल जमा बीस का विषय भी रहा है । कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि रजनी गुप्त का यह नया उपन्यास इस विषय को स्पर्श करने का एक सार्थक प्रयास है । 

Monday, November 14, 2011

लेखको, माफी मांगो !

पिछले दिनों लखनऊ में हिंदी के महान रचनाकारों में से एक श्रीलाल शुक्ल जी का निधन हो गया । मैं श्रीलाल जी से दो बार मिला । एक बार राजकमल प्रकाशन के लेखक से मिलिए कार्यक्रम में और दूसरी बार राजेन्द्र यादव के जन्मदिन की पार्टी में । लेखक से मिलिए कार्यक्रम में तो बेहद ही औपचारिक सी मुलाकात थी । लेकिन कवि उपेन्द्र कुमार के घर पर हुई राजेन्द्र यादव की पार्टी में पर तो मेरा अनुभव एकदम ही अलहदा था । किस वर्ष की बात है ये ठीक से याद नहीं है । लेकिन इतना याद है कि नब्बे के दशक के उत्तर्राद्ध की बात है । यादव जी की पार्टी चल रही थी । दिल्ली का पूरा साहित्यिक समाज वहां मौजूद था । पार्क स्ट्रीट के बंगले में हो रही पार्टी में जमकर रसरंजन भी हो रहा था । रसरंजन के बाद खाने का इंतजाम था । पार्टी अपने शबाब पर थी । जमकर रसरंजन हो रहा था । नामवर जी, अजित कुमार, श्रीलाल शुक्ल एक ही टेबल पर जमे हुए थे । हमलोग खाना खाने पहुंचे तो देखा कि श्रीलाल जी भी आ रहे हैं । कतार में खड़े सभी लोगों ने श्रीलाल जी के लिए जगह छोड़ दी । शुक्ला जी ने खाना लिया और प्लेट लेकर गेट की ओर बढ़ चले । सभी लोग अपनी मस्ती में थे, रसरंजन का भी असर था । खाना लेकर श्रीलाल जी जब गेट से बाहर हो गए तो हम दो तीन लोग लपके । लेकिन श्रीलाल जी कहां मानने वाले थे वो तो सड़क पार करके जाकर डिवाइडर पर बैठ गए । अब सोचिए कि हिंदी का इतना बड़ा लेखक पार्टी से निकलकर डिवाइडर पर बैठकर खाना खा रहा है । पार्क स्ट्रीट पर ठीक-ठाक ट्रैफिक होता है । लेकिन पार्टी के शोरगुल से बेफिक्र श्रीलाल जी खाने में मगन थे । हम लोग उनके आसपास खड़े थे । मैं मंत्रमुग्ध सा उनको देख रहा था । हिंदी के इतने बड़े साहित्यकार से इतने नजदीक से मिलने का मौका । जब खाना खत्म होने लगा तो उन्होंने कहा कि सब्जी चाहिए । खैर हमारे कहने पर माने और खुद चलकर अंदर आ गए । लेकिन तबतक रसरंजन का असर काफी हो चुका था । किसी तरह हम उनको लेकर अंदर आए और फिर वहां बिठाया । यह मेरे लिए एक स्वपन सरीखा था । राग दरबारी जैसी कालजयी कृति के रचियता से बातचीत कर मैं धन्य हो रहा था । खैर पार्टी खत्म हो गई और हम अपने अपने घर चले गए । लेकिन तबतक कई लोगों से श्रीलाल जी के बारे में बात कर काफी जान चुका था । कई सालों बाद जब तद्भव के प्रवेशांक में श्रीलाल शुक्ल पर रवीन्द्र कालिया का संस्मरण पढ़ा तो यादव जी के जन्मदिन की घटना एक बार फिर से स्मरण हो आया । कालिया जी ने लिखा था- लखनऊ में मेरे एक आईएएस मित्र हैं, एक बार उनसे मिलने उनके निवास स्थान पर गया । बाहर एक चौकीदार तैनात था । मैंने उससे पूछा, साहब हैं ? हां हैं । क्या कर रहे हैं ? शराब पी रहे हैं । उसने निहायत सादगी से जवाब दिया । श्रीलाल शुक्ल जब इलाहाबाद नगर निगम के प्रशासक थे, तो अक्सर उनसे भेंट होती थी, उनका चौकीदार भी कुछ कुछ लखनऊ के मित्र के चौकीदार जैसा था । एक बार उनसे मिलने गया और चौकीदार से यह पूछने पर कि श्रीलाल जी घर पर हैं या नहीं, उसने बताया, साहब हैं । क्या कर रहे हैं- मैंने पूछा । बाहर बगीचे में बैठे हैं और टकटकी लगाकर चांद की तरफ देख रहे हैं । उसने बगीचे की ओर संकेत करते हुए कहा था । बाद में कालिया जी को श्रीलाल जी ने पत्र लिखकर उपरोक्त प्रसंग पर हल्की सी नाराजगी भी दिखाई थी और लिखा था कि काल्पनिक आईएएस मित्र की बजाए सीधे सीधे उनका नाम भी लिख देते तो कुछ नहीं हो जाता । तद्भव का वह अंक बेहतरीन था । लकिन वो अंक मेरे पास नहीं हैं , बाद में राजकमल से ही अखिलेश के संपादन में श्रीलाल शुक्ल की दुनिया के नाम से वो पुस्तकाकार छपा । श्रीलाल जी को जानने के लिए वो किताब मुकम्मल है । तकरीबन दस साल बाद लखनऊ जाना हुआ । श्रीलाल जी से मिलने के लिए उनके घर फोन किया । यह याद नहीं कि किसने उठाया लेकिन यह बताया गया कि उनकी तबियत खराब है और मुलाकात मुमकिन नहीं है ।
श्रीलाल जी के निधन से एक और हसरत मन में ही रह गई । दो हजार दो में मेरे श्वसुर (अब स्वर्गीय) प्रो प्रियवत नारायण सिंह जी ने मुझे रागदरबारी का पहला संस्करण भेंट किया । मेरे लिए यह एक अमूल्य भेंट थी । मेरे पास राग दरबारी का पेपर बैक संस्करण था । राग दरबारी का पहला संस्करण 1968 में राजकमल प्रकाशन प्रा लिमिटेड दिल्ली-6 से छपा था । उस संस्करण पर उपन्यास का मूल्य 15 रु अंकित है । पहले संस्करण का कवर रिफार्मा स्टूडियो, दिल्ली ने बनाया था । लेकिन जब मुझे राग दरबारी का पहला संस्करण मिला तो उसका कवर नहीं था । मैंने यूं ही राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक महेश्वरी को पहले संस्करण की प्रति के बारे में चर्चा की । उन्होनें सुनते ही प्रस्ताव रखा कि मैं उनको पहले संस्करण की प्रति दे दूं, बदले में वो मुझे राग दरबारी की पांच प्रतियां दे देंगे । मैंने विनम्रतापूर्वक उनके प्रस्ताव को मना कर दिया । थोड़ी निराशा उनके चेहरे पर अवश्य दिखी लेकिन मेरी भावनाओं को उन्होंने समझा । मेरे पास राग दरबारी का कवर नहीं था। मैंने अशोक जी से एक कवर मांग लिया । अब मेरे पास जो राग दरबारी है वो पहला संस्करण है लेकिन कवर बाद के संस्करण का है । मैं जब भी लखनऊ जाता था तो सोचता था कि इस बार श्रीलाल शुक्ल से मिलूंगा और उनसे किताब पर दस्तखत लूंगा और कवर के बारे में मालूम करूंगा । लेकिन श्री लाल जी के निधन के बाद ये इच्छा पूरी नहीं हो सकी ।
लेकिन श्रीलाल जी की बीमारी और उनके निधन के बहाने मैं एक और बात शिद्दत से उठाना चाहता हूं । जब श्रीलाल जी बीमार थे और लखनऊ के अस्पताल में भर्ती थे तो अचानक से एक दिन दिल्ली के कुछ लेखकों की ओर से एक अपील जारी हुई । जिसमें सरकार से श्रीलाल जी की बीमारी के मद्देनजर सरकार से उनके समुचित इलाज की व्यवस्था करवाने की अपील की गई थी । अपील पर दस्तखत करनेवालों में सर्वश्री अशोक वाजपेयी, राजेन्द्र यादव, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, चंचल चौहान, पंकज विष्ट और रेखा अवस्थी के नाम प्रमुख हैं । इस मुहिम के अगुवा मुरली मनोहर प्रसाद थे । श्रीलाल जी वरिष्ठ आईएएस अफसर थे और उत्तर प्रदेश में प्रमुख सचिव के पद से रिटायर हुए थे । लिहाजा उनके पास सीजीएचएस की सुविधा होनी चाहिए । उसके अलावा उनका भरा पूरा समृद्ध परिवार है जो उनके इलाज के लिए स्वत सक्षम है । दिल्ली में 3 नवंबर को श्रीलाल जी की श्रद्धांजलि सभा का भव्य आयोजन हुआ था । उससे भी जाहिर होता है कि परिवार को कोई कमी नहीं है । लेखकों ने इस तरह की अपील जारी कर श्रीलाल जी का अपमान किया । बेवजह उनको दयनीय बनाने की कोशिश की गई । मुझे लगता है कि अगर जीते जी श्रीलाल जी को इस बात का पता चल गया होता तो तो वो बेहद नाराज होते । लखनऊ के उनके कई करीबी लोगों से मेरी बात हुई सबने यही कहा कि श्रीलाल जी बेहद स्वाभिमानी व्यक्ति थे और अगर वो इसका प्रतिरोध करने की स्थिति में होते तो जरूर करते । मेरे हिसाब से सरकार से मदद की अपील अनावश्यक और गैरजरूरी थी । यह अपील जारी करके लेखकों ने श्रीलाल जी का घोर अपमान किया है और उसको माफी मांग कर अपनी गलती को सुधारना चाहिए । क्या अशोक वाजपेयी, राजेन्द्र यादव, पंकज बिष्ठ, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह यह साहस दिखा पाएंगे और श्रीलाल जी और उनके परिवार से माफी मांग कर मिसाल कायम करेंगे । करना चाहिए । बड़प्पन इसी में है ।