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Saturday, May 16, 2020

पुरस्कारों को लेकर उदासीनता का भाव


पिछले दिनों भारतीय ज्ञानपीठ से पुरस्कृत लेखकों के उन वक्तव्यों को पढ़ रहा था जो उन्होंने सम्मान समारोह में दिए थे। इसी क्रम में 27 जनवरी 2001 को निर्मल वर्मा का वक्तव्य पढ़ रहा था। उसमें एक जगह वो कहते हैं कि ‘आज अगर साहित्य के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए खड़ा हूं तो सिर्फ इसलिए नहीं कि उसने जीने के मरुस्थल को थोड़ा बहुत सहनीय बनाया है बल्कि इसलिए भी कि उसने उन सब मरीचिकाओं के सम्मोहन को तोड़ने का दुस्साहस किया है जिन्होंने इस सदी के मनुष्य को इतना आहत, इतना दिग्भ्रमित किया था।‘ उनके इस वाक्य से साहित्य की महत्ता तो समझ आती ही है परोक्ष रूप से किसी पुरस्कार की अहमियत भी समझी जा सकती है। इस तरह के स्वर ज्ञानपीठ से पुरस्कृत लेखकों के वकतव्यों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सुनाई देते हैं। वो किसी भी भाषा का लेखक हो उसके मन में ये आकांक्षा रहती है कि उसका काम रेखांकित किया जा सके। काम को पहचान मिले। इस पहचान को रेखांकित करने के लिए भारत सरकार की संस्थाएं और भारत सरकार सं संबद्ध संस्थाएं पुरस्कार देती रही हैं। साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, भारतीय प्रेस परिषद, केंद्रीय हिंदी संस्थान के अलावा कई मंत्रालय भी लेखकों-पत्रकारों को पुरस्कार देती रही हैं। इससे लेखकों-पत्रकारों के ‘जीने के मरुस्थल को थोड़ा सहनीय बनाने में मदद मिलती है’। सराकरी पुरस्कारों के अलावा निजी क्षेत्र में भी कई पुरस्कार दिए जाते हैं। इनमें से कई पुरस्कार तो बेहद प्रतिष्ठित भी हैं।

अब जरा इनमें से कुछ सरकारी पुरस्कारों पर नजर डाल लेते हैं। सबसे पहले विचार करते हैं सूचना और प्रसारण मंत्रालय के भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार पर। वेबसाइट्स पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ये पुरस्कार हिंदी के पितामह भारतेन्दु हरिश्चंद्र के नाम पर 1983 में शुरू किया गया था। प्रतिवर्ष ये पुरस्कार कई श्रेणियों में दिया जाता था जिनमें पत्रकारिता और जनसंचार, महिलाओं के मुद्दों पर लेखन,और बच्चों पर लिखने के लिए दिया जाता था। आपको ये लग सकता है कि दिया जाता था क्यों लिखा। इसकी वजह ये है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय का ये पुरस्कार समारोह 2014 के बाद आयोजित नहीं किया जा सका है। 2014 में भी वर्ष 2011 और 2012 के लिए ये पुरस्कार दिया गया था। उस वक्त भी सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ही थे और संयोग से इस वक्त भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी प्रकाश जी के कंधों पर ही है। इस बीच अरुण जेटली, वेंकैया नायडू, स्मृति इरानी और राज्यवर्धन राठौर सूचना और प्रसारण मंत्री बने। स्मृति इरानी के कार्यकाल में इस बात की चर्चा हुई थी कि भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार दिए जाएंगें लेकिन उनका कार्यकाल छोटा रहा और पुरस्कार पर काम नहीं हो सका। कार्यकाल तो वेंकैया जी का भी छोटा रहा था। सूचना और प्रसारण मंत्रालय का ये पुरस्कार पिछले छह साल से आयोजित नहीं हुआ है और अभी किसी प्रकार का कोई संकेत भी नहीं मिल रहा है कि इस वर्ष शुरू हो पाएगा या नहीं। 2014 में आयोजित भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार समारोह की बारे में प्रकाशित खबरों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि प्रकाश जावड़ेकर ने तब ये घोषणा की थी ये पुरस्कार नियमित रूप से दिया ही नहीं जाएगा बल्कि हर वर्ष 9 सितंबर को भारतेन्दु के जन्मदिन पर पुरस्कार समारोह आयोजित किया जाएगा। पर ऐसा हो नहीं सका। 2014 के बाद न तो पुरस्कार दिए गए न ही समारोह आयोजित हुआ। पुरस्कार नहीं दिए जाने की कोई वजह भी सामने नहीं आ पाई है, क्या ये पुरस्कार लालफीताशाही की भेंट चढ़ गया? या इस पुरस्कार को किसी नीति के तहत बंद कर दिया गया या फिर अफसरशाही की लापरवाही के चलते ये प्रतिष्ठित पुरस्कार लंबे समय से स्थगित है। बंद होने की घोषणा नहीं हुई है इस वजह से स्थगित लिखा। इस वर्ष भारतेन्दु के जन्मदिन आने में करीब चार महीने हैं। अगर मंत्रालय पहल करे तो इस वर्ष ये पुरस्कार भारतेन्दु के जन्मदिवस पर दिए जा सकते हैं। जरूरत इस बात की है कि मंत्रालय में बैठे ‘यथास्थितिवाद के देवताओं’ को सक्रिय होना पड़ेगा। हो सकता है कि कोरोना की वजह से उत्पन्न हालात में इसपर विचार नहीं हो लेकिन अगर हमें कोरोना के साथ जीने की आदत डालनी है तो इसपर भी विचार तो किया ही जाना चाहिए।

पत्रकारों और लेखकों को एक और संस्था पुरस्कार देती है, वो है आगरा का केंद्रीय हिंदी संस्थान। ये संस्थान मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत आता है। केंद्रीय हिंदी संस्थान बारह श्रेणियों में  देश विदेश के अलग अलग क्षेत्रों में कार्यरत हिंदी सेवियों को सम्मानित करता रहा है। अभी इस संस्थान ने 2017 के पुरस्कारों की घोषणा की है। जब 2017 के पुरस्कारों की घोषणा तो कर दी गई लेकिन 2016 में घोषित किए गए पुरस्कारों का वितरण नहीं हो पाया है। 2016 के पुरस्कारों का वितरण नहीं हो पाने की एक बेहद दिलचस्प वजह है। मसला ये है कि केंद्रीय हिंदी संस्थान जिन हिंदी सेवियों को पुरस्कार के लिए चयनित करता है उनको राष्ट्रपति के हाथों से ये सम्मान मिलता रहा है। पुरस्कारों की घोषणा की गई तो तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 26 जून 2018 को अपने पत्र संख्या अ.शा.पत्र सं 2-1/हि.से.स/2018 के माध्यम से राष्ट्रपति से समय मांगा। इसके बाद 9 जुलाई 2019 को नए मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने भी राष्ट्रपति महोदय से पुरस्कार समारोह के लिए समय देने का अनुरोध किया। इस बीच मानव संसाधन वितास मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने राष्ट्रपति के निजी सचिव को 15 मार्च 2019 को पत्र लिखकर मंत्री के अनुरोध पत्र का हवाला देते हुए समय की मांग की थी। पता चला है कि कुछ दिनों पहले राष्ट्रपति भवन से मंत्रालय को ये सलाह दी गई है कि उपराष्ट्रपति से अनुरोध कर उनके कर कमलों से पुरस्कार वितरण करवा लें। ये सलाह देने में काफी समय लग गया और इस वजह से 2017 के पुरस्कारों की घोषणा टलती रही। पता नहीं किन कारणों से राष्ट्रपति पुरस्कार देने से बचने लगे हैं। पिछले वर्ष राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी उपराष्ट्रपति के हाथों दिया गया। इतनी पुरानी परंपरा को किस आधार पर परिवर्तित किया गया इसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। हर लेखक, कलाकार की इच्छा होती है कि राष्ट्रपति के हाथों उसका सम्मान हो। कलाम साहब तो पुरस्कार समारोह में कई घंटे रुका करते थे, इस परंपरा का निर्वाह प्रणब मुखर्जी तक हुआ। खैर ये अलग विषय है जिसपर कभी विस्तार से चर्चा होगी।
ये सिर्फ केंद्रीय हिंदी संस्थान या सूचना और प्रसारण मंत्रालय का हाल नहीं है। संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संगीत नाटक अकादमी के 2018 के पुरस्कारों की घोषणा भी पिछले साल जुलाई में हुई थी और परंपरा के मुताबिक दिसंबर तक पुरस्कार वितरण समारोह हो जाना चाहिए था पर वो हो न सका। अब मार्च से तो कोरोना संकट ही हम सबके सामने खड़ा है और अब तो ये अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है कि सम्मान समारोह आयोजित किए जाएं। लेकिन कोरोना संकट शुरू होने के पहले की स्थितियों को देखते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का भीष्म पितामह पर लिखा एक वाक्य याद आता है, ‘जान पड़ता है कि भीष्म में कर्तव्य अकर्तव्य के निर्णय में कहीं कोई कमजोरी थी। वह उचित अवसर पर उचित निर्णय नहीं ले पाते थे’। पुरस्कारों के मामले में मंत्रियों को अपने मंत्रालयों में बैठे उन भीष्म पितामहों की पहचान करनी चाहिए जो उचित अवसर पर उचित निर्णय नहीं ले पा रहे हैं।

Saturday, July 20, 2019

पुरस्कार बने राजनीति का औजार!


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध कई सांस्कृतिक संगठन हैं जो बहुधा विवादों में रहते हैं। ऐसी ही एक संस्था है ललित कला अकादमी जो हमेशा से विवादों में ही रही है। घपले-घोटाले से लेकर अकादमी की पेंटिग्स को बेचने के आरोप वहां से बाहर निकलते रहे हैं। केस मुकदमे भी होते रहे हैं। पिछले संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के कार्यकाल में ललित कला अकादमी को लेकर इतने तरह के फैसले हुए कि अब वहां की क्या स्थिति है, ये किसी को ज्ञात नहीं है। महेश शर्मा के कार्यकाल में अशोक वाजपेयी के ललित कला अकादमी के अध्यक्ष रहते अनियमिततताओं की सीबीआई जांच की सिफारिश की गई थी, पता नहीं उसका क्या हुआ? जांच हुई भी या नहीं। ललित कला अकादमी की पेंटिग्स के गायब होने को लेकर किसी तरह की जांच में कुछ मिला या नहीं? इन बातों की जानकारी सार्वजनिक होनी ही चाहिए, आखिरकार इस तरह की सारी अकादमियां चलती तो करदाताओं के पैसे से ही हैं और करदाताओं को ये जानने का पूरा अधिकार है कि वहां क्या हो रहा है। इसी तरह की एक दूसरी संस्था है संगीत नाटक अकादमी। इस संस्था के मौजूदा अध्यक्ष हैं मशहूर और प्रतिष्ठित कलाकार शेखर सेन। यह अकादमी भी लगातार विवादों में रही है। कभी मेघदूत थिएटर का नाम बदलकर अब्राहम अल्काजी के नाम पर करने की कोशिशों को लेकर। कभी मोदी के धुर विरोधी और चुनावों में मोदी के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान के अगुवा रहे सुनील शॉनबाग को अकादमी पुरस्कार देकर तो कभी अकादमी की सचिव हेलेन आचार्य को उनके पद से हटाने को लेकर। हेलेन आचार्य का मामला तो न्यायालय के विचाराधीन है। इसके अलावा भी वहां कई छोटे मोटे विवाद होते ही रहे हैं। अभी एक बड़ा विवाद संगीत नाटक अकादमी को लेकर फिर से हुआ है। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार को लेकर। कर्नाटक के नाट्य निर्देशक एस रघुनंदन ने संगीत नाटक अकादमी की घोषणा के बाद इसको नहीं लेने का एलान कर दिया। सबसे बड़ी बात है रघुनंदन ने इस पुरस्कार को नहीं लेने की जो वजहें गिनाईं। रघुनंदन ने साफ कहा कि धर्म और भगवान के नाम पर जिस तरह से देश में मॉब लिंचिंग हो रही है उसको देखते हुए वो इस पुरस्कार को ठुकराते हैं। रघुनंदन ने जो लिखा उसमें से जो संदेश निकलता है उसको रेखांकित किए जाने की जरूरत है। रघुनंदन ने साफ तौर पर लिखा है कि संगीत नाटक अकादमी ने पिछले वर्षों में अपनी स्वायत्ता को बचाए रखा है और उसने उनको पुरस्कार के लिए चुना है इसलिए अकादमी का धन्यवाद। रघुनंदन जब अकादमी को धन्यवाद करते हैं तो यह संदेश जाता है कि संगीत नाटक अकादमी ने पुरस्कारों को तय करते वक्त बहुत मेहनत की होगी। उपयुक्त पात्रों के चयन के लिए बहुत मेहनत की होगी। लेकिन इसके पीछे की कहानी बहुत ही विस्मयकारी है। दरअसल संगीत नाटक अकादमी में एक वामपंथी लेखक का बोलबाला है जो बीते लोकसभा चुनाव के पहले मोदी के विरोध में बुद्धिजीवियों के एक वर्ग को एकजुट करने में जुटे थे। अपील बनवाई और उसपर अन्य लोगों के साथ हस्ताक्षर करवाकर उसको जारी भी किया था। मजे की बात कि जब लोकसभा चुनाव में मोदी की ऐतिहासिक जीत हुई तो वही शख्स इस बात का तर्क देता नजर आ रहा था उसने मोदी का विरोध नहीं किया बल्कि उसने तो एक प्रवृत्ति के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की। सांस्कृतिक गलियारे में तो यहां तक चर्चा है कि उसकी पहुंच प्रधानमंत्री कार्यालय तक है। रघुनंदन को पुरस्कार देने के पीछे भी इस शख्स का ही दिमाग माना जा रहा है। इसके अलावा भी संगीत नाटक अकादमी में एक और शख्स को नामित किया गया जिसकी घोषित प्रतिबद्धता मोदी सरकार के खिलाफ है। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों को लेकर जो बैठकें होती हैं और जो भी सदस्य जिनका भी नाम प्रस्तावित करते हैं उनको सार्वजनिक किया जाना चाहिए। संगीत नाटक अकादमी की वेबसाइट पर प्रस्तावक और कमेटी की अनुशंसाओं को सार्वजनिक करना चाहिए।
2014 में जबसे मोदी की अगुवाई में सरकार बनी तब से ये वामपंथ के अनुयायी इसको प्रचारित करने में जुटे हैं कि मोदी सांस्कृतित संस्थाओं का भगवाकरण करने की कोशिशों में जुटी है। वो इन संस्थाओं में अपने विरोधी विचारधारा के लोगों को बाहर कर अपनी विचारधारा के लोगों को भर रही है। मोदी सरकार पर यह आरोप लगाना भी गलत है कि वो अपने वैचारिक विरोधियों को इन संस्थाओं में स्थान नहीं देती है। स्थान भी देती है, उनको सम्मान भी देती है, उनको प्रस्तावों को मानती भी है और उनके कहने पर पुरस्कार भी देती है। संगीत नाटक अकादमी साल दर साल इस बात को पुष्ट कर रही है। पिछले साल जब सुनील शॉनबाग को पुरस्कार देने का फैसला हुआ था तब भी कुछ लोगों ने इसका विरोध किया था लेकिन संगीत नाटक अकादमी के कर्ताधर्ताओं ने किसी तरह से उस विरोध को दरकिनार करने में सफलता प्राप्त कर ली थी। उस चक्कर में पुरस्कार की फाइल तत्कालीन संस्कृति मंत्री के यहां लंबे समय तक लंबित भी रही थी।   
जब इस वर्ष के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों की घोषणा हुई तो संगीत नाटक अकादमी से लंबे समय से जुड़े और उसको नजदीक से देखनेवाले एक शख्स ने बताया कि अकादमी के पुरस्कारों को इस तरह से तय कि. जाता है ताकि उसमें मौजूदा सरकार को बदनाम करने की गुंजाइश हो। रघुनंदन को पुरस्कार दिलवाना भी उसी षडयंत्र का हिस्सा था। पहले पुरस्कार दिलवाओ फिर उसको वापस करवाकर सरकार की किरकरी करने का अवसर पैदा करो। रघुनंदन के केस में भी तो यही हुआ, रघुनंदन की विचारधारा और उनका स्टैंड सबको पहले से ज्ञात था। उनके पुरस्कार वापसी की घोषणा के बाद एक बार फिर से पुरस्कार वापसी गिरोह सक्रिय हो गया। अशोक वाजपेयी से लेकर नयनतारा सहगल तक ने रघुनंदन के समर्थन में बयान जारी करने में देर नहीं लगाई। अगर गंभीरतापूर्वक इन सबका विश्लेषण किया जाए तो साफ तौर पर लगता है कि इसकी स्क्रिप्ट पहले से लिख ली गई थी और उसके अनुसार ही सबकुछ चरणबद्ध तरीके से घटित हुआ।
रघुनंदन ने जिस तरह से मॉब लिंचिंग को पुरस्कार ठुकराने की वजह बताया उससे तो स्थितियां और साफ हो जाती हैं। एक खास किस्म की विचारधारा के लेखक और पत्रकार जिस तरह से लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद से मॉब लिंचिंग को आधार बनाकर राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंचों पर अपने लेखन और वक्तव्यों से इस मुद्दे को उठा रहे हैं उसमें एक साम्य नजर आता है। मॉब लिंचिंग एक तरह का अपराध है और उसको धर्म से जोड़ना बिल्कुल गलत है। भीड़ की हिंसा के कई कारक होते हैं और उन कारकों में धर्म कभी कारक रहा हो इसके संकेत नहीं मिले हैं। चौरी-चौरा कांड भी भीड़ की हिंसा का एक उदाहरण है। 1922 में चौरी-चौरा में एक पुलिस स्टेशन को भीड़ ने आग लगा दी थी जिसकी वजह से उसमें मौजूद बाइस पुलिसकर्मी जिंदा जल गए थे। उस हिंसा के खिलाफ गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का एलान कर दिया था। चौरी-चौरा हत्याकांड में धर्म का कोई कोण नहीं था, उसकी अलग वजह थी। बाद में इतिहासकारों ने इन वजहों को विस्तार से व्याख्यित किया और इस निश्कर्ष पर पहुंचे कि भीड़ की हिंसा के कई सामाजिक कारक होते हैं, एक नहीं। इस तरह के निष्कर्ष पर पहुंचनेवालों में वामपंथी इतिहासकार भी शामिल थे लेकिन अब जिस तरह से भीड़ की हिंसा को लेकर बातें कही जा रही हैं उसमें सामाजिक कारणों की पड़ताल करने की कोशिश कम, सरकार को बदनाम करने की कोशिश ज्यादा दिखाई देती है। भीड़ का कोई धर्म नहीं होता। आपको याद दिला दें कि कुछ साल पहले नगालैंड में बालात्कार के आरोप में एक शख्स को जेल से निकालकर भीड़ ने बेरहमी से कत्ल कर दिया था। इसके बाद आगरा में भी एक लड़के को छेड़खानी के आरोप में पीट पीट कर मार डाला गया था। दिल्ली में भी ऐसी वारदातें हुई जहां भीड़ ने हिंसा में लोग मारे गए। दिल्ली की घटना को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की तरह देखा नहीं गया, देखा भी नहीं जाना चाहिए क्योंकि पहले ही कहा गया है कि भीड़ धर्म या जाति देखकर इस तरह का कृत्य नहीं करती है।
दरअसल संगीत नाटक अकादमी या ललित कला अकादमी में स्वायत्तता के नाम पर पूर्व में इतने तरह के घपले हुए हैं कि उसको समझ पाना आसान नहीं है। इन संस्थाओं में वामपंथी विचारधारा की जड़ें इतनी गही हैं कि वो इस तरह की बातें फैलाते हैं कि वामपंथ से इतर विचारधारा के लोगों के पास योग्य लेखक, कलाकार आदि हैं ही नहीं। इसी तर्क की आड़ में और स्वायतत्ता से मिली ताकत को अपनी राजनीति का औजार बनाकर कुछ लोग अपना खेल कर जाते हैं और जब खेल हो जाता है तब खामोशी ओढ़ लेते हैं। इन संस्थाओं के क्रियाकलापों में पारदर्शिता लाने और राजनीति के औजार के तौर पर इस्तेमाल करने पर तत्काल रोक लगाए जाने की आवश्यकता है।  

Saturday, May 13, 2017

सांस्कृतिक नीति की आवश्यकता

इन दिनों साहित्य कला जगत में सरकार के एक कदम को लेकर खासी चर्चा है। सरकार ने इन संस्थाओं को कहा है कि वो अपने बजट का तीस फीसदी अपने आंतरिक स्त्रोत से इकट्ठा करें। इस संबंध में साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय के बीच सत्ताइस अप्रैल को एक करार हुआ है। इस करार के मुताबिक साहित्य अकादमी को इस बाबत कोशिश करनी होगी। इसी तरह का करार अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए प्रस्तावित है । माना जा रहा है कि निकट भविष्य में ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र जैसी संस्थाओं को भी अपनी बजट का तीस फीसदी हिस्सा अपने आंतरिक स्त्रोत से इकट्ठा करना होगा। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर गहन विचार-विमर्श के बाद फैसला किया जाना चाहिए था। इस फैसले के दो पक्ष हैं और दोनों पर विचार करते हुए अगर किसी नतीजे पर पहुंचते तो बेहतर होता। साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी में पूर्व में कई तरह की गड़बड़ियां हुई हैं। कई साल पहले साहित्य अकादमी के और अब ललित कला अकादमी के सचिव को उनके पद से हटाया भी जा चुका है। संसदीय समितियों ने इनके कामकाज में भी कई गड़बड़ियां पाई थीं। उसके बाद बनी हाई पॉवर कमेटी ने भी कई तरह की सिफारिशें की थीं। बावजूद इसके इन संस्थानों के बजट में कटौती और उनको संसाधन जुटाने के लिए कहना उचित नहीं है।साहित्य,कला और संस्कृति हमेशा से राज्याश्रयी रही है। बगैर राज्याश्रय के कला-संगीत कभी फला-फूला नहीं है। साहित्य अकादमी ने जो करार संस्कृति मंत्रालय के साथ किया है वो उनकी बेवसाइट पर मौजूद है। उसको ध्यान से पढ़ने के बाद संस्कृति मंत्रालय के इस प्रस्ताव की विसंगतियां समझ में आती हैं। साहित्य अकादमी को सरकार से अलग अलग मदों के लिए अनुदान मिलता है। जैसे वेतन के लिए अलग, कार्यक्रमों के लिए अलग, लेखकों की यात्रा के लिए अलग और सलाना अकादमी पुरस्कारोंम के लिए अलग । अगर सूक्ष्मता से तीस फीसदी संसाधन जुटाने के प्रस्ताव को देखें तो यह प्रस्ताव हास्यास्पद लगता है। अकादमी अपने कर्मचारियों के वेतन का तीस फीसदी किस तरह से और कहां से जुटाएगी? सवाल उठता है कि करार बनानेवालों ने इस बात पर विचार किया या करार पर दस्तखत करनेवालों ने इस बाबत अपनी आपत्ति दर्ज की।
अकादमी लेखकों को हर साल दिए जानेवाले पुरस्कार की राशि का तीस प्रतिशत कहां से लाएगी इस बारे में सोचा जाना चाहिए था। इसका तो एक ही उपाय सूझता है कि ये अकादमियां अपने पुरस्कारों के लिए स्पांसरशिप ढूंढें। कुछ सालों पहले साहित्य अकादमी के पुरस्कार को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने स्पांसर करने का प्रस्ताव किया था, लेकिन लेखकों के विरोध आदि को देखते हुए वो जना परवान नहीं चढ़ सकी थी। साहित्य, कला और संस्कृति की इन संस्थाओं को बाजार की बुरी नजर से बचाकर रखने की कोशिश होनी चाहिए। अगर सरकार इन अकादमियों के खर्चे से अपने को अलग करना चाहती है तो उनको सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी फंड को इन अकादमियो को दिलवाने के लिए आदेश जारी करना चाहिए। निजी क्षेत्र का पैसा जैसे ही इन अकादमियों में लगेगा तो फिर उन कंपनियों की शर्तें भी लागू करनी पड़ेंगी।
दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी कला केंद्र की स्थिति इन अकादमियों से थोड़ी अलग है। दिल्ली के मध्य में इसके पास करीब बीस पचीस एकड़ का परिसर है। इस परिसर का व्यावसिक उपयोग होता रहा है। यहां साहित्यक मेलों से लेकर फूड फेस्टिवल तक आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के लिए कला केंद्र अपने लॉन से लेकर हॉल तक किराए पर देती है। उनको इससे आमदनी होती है। बस इस तरह की बुकिंग को बढ़ाना होगा। इसी परिसर में राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का दफ्तर भी है, जो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को हर महीने लाखों रुपए किराया देती है। तो इंदिरा गांधी कला केंद्र के लिए सरकार से मिलनेवाले अनुदान का तीस प्रतिशत अपने स्त्रोतों से जुटाना मुश्किल काम नहीं है। इसके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के पास सौ करोड़ की संचित निधि भी है जिसका ब्याज भी सालों से उनको मिलता रहा है, जो सरकार से मिलने वाले अनुदान के अतिरिक्त होता है। लेकिन साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी के परिसर ना तो बड़े हैं और ना ही उनको किराए आदि से भारी भरकम रकम मिलती है। कला प्रदर्शनी पर अगर टिकट लगाते हैं तो जो थोड़े दर्शक आते हैं वो भी इनसे मुंह मोड़ लेंगे। इसी तरह से संगीत नाटक अकादमी अगर टिकट लगाना शुरू कर देगी तो वहां भी दर्शकों, श्रोताओं को जमा करना बहुत मुश्किल होगा। साहित्य अकादमी अवश्य किताबों का प्रकाशन करती है, लेकिन वो किताबों का मूल्य बाजार के हिसाब से तय नहीं करती है बल्कि पाठकों की सहूलियत के हिसाब से तय की जाती है । इन अकादमियों का उद्देश्य देश में कला, साहित्य और संस्कृति के माहौल का निर्माण करना है और अगर ये व्यावसायिक गतिविधियों में लगकर धन इकट्ठा करने लगेंगी तो फिर मूल उद्देश्य से भटकने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
सरकार में बैठे संस्कृति के कर्ताधर्ताओं को इस पहलू पर विचार करना चाहिए। दरअसल होता यह है कि सरकार में बैठे आला अफसर साहित्य कला और संस्कृति को भी अन्य विभागों की तरह चलाना चाहते हैं। गड़बड़ी यहीं से शुरू होती है। नीति बनाते समय इन संस्थाओं के उद्देश्यों को समझते हुए उसके असर का भी आंकलन करना आवश्यक होता है। यह सुनने देखने में बहुत अच्छा लगता है कि स्वायत्तशासी संस्थाओं को वित्तीय रूप से भी स्वायत्त होना चाहिए। जब इस सिद्धांत को साहित्य कला और सांस्कृतिक संगठनों पर लागू करने के बारे में फैसला लेने की घड़ी आती है तो भारत सरकार के लोक-कल्णकारी स्वरूप को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अगर हम देश के अन्य राज्यों की अकादमियों पर गौर करें तो राज्य सरकारों ने उनको लगभग पंगु बना दिया है । इन अकादमियों को राज्य सरकारों ने अपना प्रचार विभाग बना दिया है चाहे वो दिल्ली की हिंदी अकादमी हो या बिहार की संगीत नाटक अकादमी। बिहार की इस अकादमी को तो राज्य सरकार ने इवेंट मैनेजमेंट कंपनी बना दिया है। सरकार को जब कोई कार्यक्रम आदि करना होता है तो वो अकादमी को एक निश्चित राशि अनुदान के तौर पर दे ती है। इस अनुदान के साथ यह आदेश भी आता है कि अमुक कार्यक्रम, अमुक संस्था या अमुक व्यक्ति को दिया जाए। उदाहरण के लिए प्रकाश पर्व के वक्त अकादमी को करीब दो करोड़ रुपए का अनुदान मिला था, साथ ही ये आदेश भी आया था कि ये राशि दिल्ली के भाई बलदीप सिंह से जुड़े अनाद फाउंडेशन को दिया जाए जो कि उस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करेगी। । ऐसा ही हुआ भी । इसी तरह से आगामी सितंबर अक्तूबर में बिहार में विश्व कविता सम्मेलन का आयोजन किया जाना है। इस आयोजन का बजट तीन करोड़ का है और इसका आयोजन बहुत संभव है कि बिहार संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से हो। इस आयोजन को करने का जिम्मा अशोक वाजपेयी या उनकी संस्था को दिया जाना भी लगभग तय है। ऐसी स्थिति में अकादमी के करने के लिए क्या बचता है। दरअसल बिहार सरकार ने ऐसी व्यवस्था बना दी है कि अगर किसी कार्यक्रम में किसी तरह की गड़बड़ी हो तो उसकी जिम्मेदारी अकादमी पर डाल कर निकल लिया जाए। अब अगर विश्व कविता सम्मेलन सफल होता है तो सेहरा अशोक वाजपेयी और बिहार सरकार के सर बंधेगा और अगर किसी तरह की गड़बड़ी होती है तो अकादमी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाएगा।
बिहार में संगीत नाटक अकादमी की दुर्दशा और स्वयत्ता को खत्म करने के खिलाफ किसी भी कोने अंतरे से आवाज नहीं उठती है। कोई जनवादी लेखक संघ, कोई प्रगतिशील लेखक संघ या कोई जन संस्कृति मंच इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाता है। इसके राजनीतिक कारण हैं जो बिल्कुल साफ हैं। यहां इनको संस्कृति पर कोई खतरा भी नजर नहीं आता है। बिहार के भी जो क्रांतिकारी लेखक आदि हैं वो भी खामोश हैं।

दरअसल अब वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार को एक ठोस सांस्कृतिक नीति बनानी चाहिए । जब इन अकादमियों का गठन हुआ था तब देश की स्थिति अलग थी, अब परिस्थियां काफी बदल गई हैं। बदलते वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए यह आवश्यक है कि एक नई सांस्कृतिक नीति बनाई जाए जिसमें इन अकादमियों के काम काज को बारीकी से तय किया जाए, उनके संसाधनों को भी। इस प्रस्तावित नीति पर राष्ट्रव्यापी बहस हो, विचार हो, मंथन हो और फिर किसी नतीजे पर पहुंचा जाए। सांस्कृतिक नीति बनाते वक्त अफसरशाही से ज्यादा इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की राय को तवज्जो दिया जाना चाहिए ताकि व्यावहारिकता का ध्यान रखा जाना चाहिए।               

Saturday, May 6, 2017

‘मेघदूत’ पर नाहक विवाद को हवा

‘समय- समय पर अनेक वादों और आदर्शों ने उम्मीदें दी थीं। जिन पर ठिठुरते हुए हमने अपने हाथों को सेंका था, आज उनके कोयले मद्धिम हो चले हैं। सिर्फ राख बची रही गई है जो फूंक मारने से कभी दायीं ओर जाती है, कभी बाईं ओर। जिस दिशा में जाती है, हम उस तरफ भागते हुए कभी दक्षिणपंथी हो लेते हैं, कभी वामपंथी लेकिन राख-राख है, उसके पीछे अधिक दूर तक नहीं भागा जा सकता। आखिर में अपने पास लौटना पड़ता है।‘ हिंदी के मूर्धन्य लेखक निर्मल वर्मा की ये बातें कब कही गईं थी, उसका काल ठीक से याद नहीं पड़ता लेकिन इस वक्त भी उनकी कही बातें एकदम सटीक मालूम पड़ती हैं। जब ठिठुरते हुए हाथ सेंके जा रहे थे तो उन कोयलों का रंग ‘लाल’ होता था, जो मद्धिम पड़ा और फिर अब जब राख बनकर हवा में उड़ रहा है तब कभी कभार ऐसा होता है कि वो राख आपकी आंखों में पड़ जाए और आपको तकलीफ दे। आंखों में राख पड़ने से कोई नुकसान नहीं होता है लेकिन वो कुछ समय के लिए काफी तकलीफदेह होता है। अभी हाल ही में संगीत नाटक अकादमी में इस तरह की राख उड़ी थी जो अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन की आंखों में जा पड़ी और उसने उनको तात्कालिक रूप से तकलीफ पहुंचाई। दरअसल हुआ यह कि संगीत नाटक अकादमी ने एक इब्राहिम अल्काजी की याद में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। जब कार्ड का ड्राफ्ट तैयार होकर आया तो उसको मीडिया में लीक कर दिया गया। लीक किए कार्ड से भ्रम फैला कि दिल्ली के रवीन्द्र भवन स्थित मेघदूत थिएटर का नाम बदलकर इब्राहिम अल्काजी ने नाम पर किया जा रहा है। उस कार्ड के आधार पर सोशल मीडिया से लेकर अखबारों आदि में शोरगुल मचना शुरू हो गया। संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन की घेरबंदी शुरू हो गई। शेखर सेन पर इस बात को लेकर हमले शुरू हो गए कि वो इब्राहिम अल्काजी को कालिदास से अहम मानते हैं। अजीब अजीब से तर्क गढ़े जाने लगे। बैगर तथ्यों को जाने समझे शोर मचाने की ये एक ऐसी मिसाल है जिसपर कला-संस्कृति जगत से जुड़े लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। जब शोरगुल ज्यादा बढ़ा तो थिएटर से गहरे जुड़ी वाणी त्रिपाठी ने विस्तार से लेख लिखकर भ्रम के इस जाले को साफ किया। वाणी ने अपने लेख में मेघदूत थिएटर की ऐतिहासिकता और इब्राहिम अल्काजी के थिएटर के योगदान को रेखांकित किया। वाणी ने इस बात को भी साफ किया कि रवीन्द्र भवन के परिसर के इस खुले रंगमंच का नामकरण अल्काजी ने ही किया था । वाणी त्रिपाठी के लेख के बाद इस पूरे विवाद पर से जाला हटना शुरू हो गया। फिर संगीत नाटक अकादमी की तरफ से भी इस पूरे विवाद पर चेयरमैन शेखर सेन अपनी सफाई पेश की। अगर हम समग्रता में विचार करें तो संगीत नाटक अकादमी से जुड़े पुराने लोगों ने विवाद उठाने की गरज से नए सिरे से काम करना शुरू किया है। उन्होंने गलत बातों को फैलाकर विवाद की आंधी खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दी है। लेकिन पंखे की हवा से बनाई गई कृत्रिम आंधी का कोई असर नहीं होता है। फिर वामपंथ के अनुयायी लेखकों-कलाकारों- संस्कृतिकर्मियों का एक ऐसा संगठित तंत्र है जहां किसी भी बात को या तथ्य को अपनी सुविधा के हिसाब से फैलाकर जनमानस को प्रभावित या भ्रमित करने की कोशिश होती है। कितनी सफलता मिलती है इसका आंकलन होना शेष है। वामपंथी गणेश जी देशभर में दूध पिलाने की घटना को आरएसएस से जोड़कर उनके अफवाह तंत्र को निशाने पर लेते रहे हैं। लेकिन खुद वामपंथियों का अफवाह तंत्र बेहद मजबूत है और वो जब चाहें, जैसे चाहें किसी को भी नाम दिला दें, बदनाम कर दें। पुरस्कार दिला दें या तिरस्कृत कर दें। अपनी इस ताकत के बूते पर वो परसेप्शन की लड़ाई भी लड़ते रहे हैं, अब भी लड़ रहे हैं। गंभीर विषयों की चाशनी में दरअसल वो अपनी विचारधारा को मार्ग प्रशस्त कर रहे होते हैं।    
दरअसल साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़ी अकादमियों और संस्थानों पर भले ही दो हजार चौदह में सरकार बदलने के बाद से पुरानी व्यवस्था में बदलाव कर दिए गए हो लेकिन यह बदलाव शीर्ष स्तर पर हुए हैं। चेयरमैन, अध्यक्ष आदि की भले ही नियुक्ति हो गई लेकिन उनको काम करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी आदि नहीं दिए गए हैं। अभी तो इन संस्थानों के मुखिया को अपने कर्माचरियों के लिए ही मंत्रालय से संघर्ष करना पड़ रहा है, वो नया करने की सोचने की हालत में ही नहीं है। कलाकारों को इन संस्थाओं का अगुआ बनाकर अच्छी पहल की गई है लेकिन इन कलाकारों के साथ एक कुशल प्रशासक की नियुक्ति भी आवश्यक है। कुशल प्रशासक इस वजह से कि सालों से जड़ जमाए बैठी विचारधारा को अगर चुनौती देनी है तो पहले इस व्यवस्था को चुनौती देनी होगी । इसके अलावा जो लोग इन संस्थानों के कार्यकारी परिषद आदि में मनोनीत किए गए हैं वो पुरानी व्यवस्था को बदलना तो चाहते हैं लेकिन कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते हैं, किसी तरह के विवाद में पड़े बगैर शांति से संस्था को चलाने की कोशिश हो रही है। जबकि जरूरत इस बात की है कि सालों से जंग खाई व्यवस्था को एक बारगी तो जोरदार तरीके से हिलाने की जरूरत है। यहां इस बात की परवाह भी छोड़नी होगी कि विरोधी खेमे के लोग क्या कहेंगे। अगर विरोधियों की चिंता की गई तो बदलाव के नतीजों में संदेह है। दिल्ली के सांस्कृतिक गलियारे में इस बात की काफी चर्चा है कि नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट की पुरानी समिति ने दो हजार बीस तक के कार्यक्रमों को तय कर दिया है । अब अगर दो हजार बीस तक का संस्था का काम तय है तो नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट जो नए डायरेक्टर जनरल नियुक्त किए गए हैं वो क्या करेंगे । उन उड़ती हुई राख को बैठकर उड़ाते रहेंगे? क्योंकि इनके करने के बहुत कुछ तो है नहीं । यह सिर्फ नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट की स्थिति नहीं है। मंत्रालय में बैठे कुछ अधिकारी भी नई सरकार के नामित इन संस्थाओं के मुखिया की राह आसान बनाने की बजाए उसपर कांटे बिछाते रहते हैं। लालफीताशाही के फंदे में फंसाकर बदलाव को रोकना अफसरशाही के लिए काफी आसान होता भी है। लालफीताशाही से इन संस्थाओं को चलानेवाले इतने खफा हो गए थे कि उन्होंने दिल्ली में एक बैठक कर सामूहिक रूप से अपनी नाराजगी का इजहार किया था। उच्चस्तरीय दखल के बाद उसके बाद से संस्कृति मंत्रालय में काम को गति मिली थी। 
सवाल यह है कि इस सरकार पर सांस्कृतिक संस्थाओं पर कब्जे के आरोप भी लग रहे हैं, वामपंथियों का अफवाह तंत्र इसको फैलाने के लिए बेहद सक्रिय भी है और किसी भी बड़े छोटे मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता है। बावजूद इस स्थिति के काम ज्यादातर वही हो रहे हैं जो पहले से तय कर दिए गए हैं। हद तो तब हो जाती है कि इन्हीं संस्थाओं में से एक के खर्चे पर विदेश जाकर एक इतिहासकार भारत के प्रधानमंत्री और मौजूदा सरकार को कठघरे में खड़ा कर देती हैं, अपनी ही देश की चुनी हुई सरकार को फासिस्ट आदि कह देती हैं। दरअसल यह तब होता है जब आपको अपने बौद्धिक सामर्थ्य पर भरोसा होता है लेकिन जब आप विचारधारा वाले तर्क पेश करते हैं तो वो अंधविश्वास के रूप में सामने आता है। विचारधारा की इस लड़ाई में वामपंथ के योद्धा हर तरह के हथियार से लैस हैं। पस्त जरूर हैं, लेकिन उनके अंदर इतनी ताकत तो शेष बची है कि वो किसी को भी शक के घेरे में खड़ा कर देने के लिए काफी है। किसी भी कार्यक्रम को वादित कर सकते हैं। उनसे वैचारिक रूप से लड़ा जा सकता है लेकिन वैचारिक लड़ाई में वो जिस तरह के गैर वैचारिक औजारों का इस्तेमाल करते हैं उनसे निबटने के लिए यह आवश्यक है कि सामने वाले भी उसको भांपकर अपनी तैयारी करें। संगीत नाटक अकादमी में ङी अगर वाणी त्रिपाठी ने मोर्चा नहीं संभाला होता तो उन्होंने अकादमी को बदनाम करने और शेखर सेन को लेकर एक भ्रम की ल्थिति तो बना ही दी थी। उनको एक तरीके से परंपरा और विरासत विरोधी बताने की महिम शुरू हो चुकी थी। अब भी वक्त है कि इस वैचारिक लड़ाई में अपने सामने वाले की चालों को समझा जाए और उनको निश्क्रिय करने के लिए उसी तरह की कोशिशें भी की जाएं । 

Saturday, October 29, 2016

यश-भारती के यश पर सवाल

उत्तर प्रदेश के समाजवादी कुनबे में कलह जारी है । सियासत से लेकर अंत:पुर में खेले जाने दांव-पेंच पर पूरे देश की नजर है । तमाम राजनीति विश्लेषक हर रोज रिश्तों की नई व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं । कोई मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर दांव लगा रहा है तो कोई शिवपाल-अमर सिंह की जोड़ी के पक्ष में बैटिंग कर रहा है । इन तमाम सियासी कोलाहल के बीच साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर भी उत्तर प्रदेश इन दिनों चर्चा में है । पिछले हफ्ते करीब डेढ दशक बाद संगीत नाटक अकादमी अवार्ड बांटे गए । दरअसल दो हजार तीन से लेकर दो हजार आठ तक के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों का ऐलान महीनों पहले किया गया था लेकिन पुरस्कार बांटे जाने को लेकर कोई तिथि तय नहीं की गई थी । जिनके नामों का पुरस्कार के लिए ऐलान हुआ था वो भी अंधेरे में थे और कई तो बातचीत में निराशा भी जाहिर कर चुके थे कि उनको पुरस्कार नहीं मिल पाएगा । पिछले हफ्ते आनन फानन में इन पुरस्कारों को बांट दिए गए लेकिन बताया जा रहा है कि कई पुरस्कृत शख्सियत वक्त पर इत्तला नहीं मिलने की वजह से मौके पर उपस्थित नहीं हो सके । खबरों के मुताबिक इस समारोह में सड़सठ कलाकारों को अकादमी अवॉर्ड और बारह को अकादमी रत्न पुरस्कार दिया गया । इस सम्मान समारोह में पुरस्कृत कलाकारों लेखकों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि जल्दी जल्दी नाम पुकारे जाने लगे जिससे अव्यवस्था फैल गई । कलाकारों को पुरस्कार के तौर पर दिए गए ताम्रपत्र पर पुरस्कार राशि अंकित करने से भी कलाकारों में क्षोभ दिखा । पंडित शंभू महाराज के बेटों को दो हजार तीन और चार के लिए अकादमी अवार्ड दिया गया । इन दोनों ने जब ताम्रपत्र पर दस हजार एक रुपए की राशि का अंकन देखा तो नाराज हो गए और कहा कि ताम्रपत्र पर राशि का उल्लेख गैरजरूरी है । भारी संख्या में बंटे इन पुरस्कारों को लेकर चर्चा अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि उत्तर प्रदेश सरकार ने थोक के भाव से यशभारती पुरस्कार बांट डाले । यश भारती पुरस्कार को लेकर इस बार इस वजह से सवाल खड़े हो रहे कि पहले सरकार ने ऐलान किया था कि चौवन लोगों को इस पुरस्कार से नवाजा जाएगा । उसके बाद इसकी संख्या बढ़कर चौंसठ हो गई और अंतत: तिहत्तर लोगों को प्रदेश के सबसे बड़े पुरस्कार से नवाजा गया । हद तो तब हो गई जब पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान दो लोगों के नाम जोड़े गए । यशभारती पुरस्कार अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव ने शुरू किया था और यह पुरस्कार साहित्य, कला, सिनेमा, चिकित्सा, खेल, पत्रकारिता, हस्तशिल्प, शिक्षण, संस्कृति, संगीत, नाटक और उद्योग के अलावा समाजसेवा और ज्योतिष विद्या के लिए भी दिया जाता है । इस पुरस्कार के तहत पुरस्कृत व्यक्ति को ग्यारह लाख नकद और आजीवन पचास हजार रुपए हर महीने पेंशन के तौर पर दिया जाता है । इस वर्ष के पुरस्कार वितरण समारोह से मुलायम सिंह यादव दूर रहे और उनके पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पूरे समारोह के दौरान मुलायम सिंह का नाम लेते रहे । उन्होंने तो यहां तक कहा कि नेताजी विभूतियों का सम्मान करने में कभी नहीं हिचके और वो उनके घर तक जाकर उनको सम्मानित किया । इस संदर्भमें अखिलेश यादव ने हरिवंश राय बच्चन का उदाहरण दिया जिन्हें यश भारती से सम्मानित करने के लिए मुलायम सिंह यादव मुंबई तक गए थे । बच्चन जी के स्वास्थ्य की वजह से मुंबई में उनके घर पर उनको यश भारती से सम्मानित किया गया था । हलांकि उसके बाद मुख्यमंत्री सम्मानित शख्सियतों के साथ मुलायम सिंह यादव के घर पहुंचे औप सबकी उनसे मुलाकात करवाई । ये तो हुई सियासत की बातें लेकिन सियासत की बात यहीं खत्म नहीं होती है । सियासत या लापरवाही के संकेत तो यशभारती पुरस्कार से सम्मानित किए गए महानुभावों की सूची को देखने पर भी मिलते हैं । पुरस्कार वितरण समारोह के चंद दिनों पहले जो सूची जारी की गई उसमें बांदा के शिल्पकार शाहिद हुसैन का भी नाम था लेकिन जब बांदा के जिलाधिकारी से शाहिद हुसैन को सूचना देने के लिए संपर्क किया गया तो जो बात पता चली उससे पुरस्कारों की सूची तैयार करनेवालों के होश उड़ गए । बांदा के जिलाधिकारी ने राज्य सरकार को सूचित किया कि शाहिद हुसैन नाम का कोई शिल्पकार उनके जिले में नहीं है । बांदा के डीएम ने अपने पत्र में किसी हामिद हुसैन के नाम का उल्लेख कियाऔर बताया कि वो एक शिल्पकार के पास काम करते हैं । इस पत्र के बाद संस्कृति विभाग ने आनन फानन में शाहिद हुसैन का नाम पुरस्कृत होनेवालों की सूची से हटा दिया । लापरवाही का आलम तो वरिष्ठ उर्दू शायर शारिब रुदौलवी के नाम के साथ भी देखने को मिला । विभागों की फाइल में उनका नाम शादाब रुदौलबी लिखा था और विभागीय लोग इस नाम के शख्स को ढूंढने में रात दिन एक किए हुए थे ष बात में पता चला कि उनका सही नाम शारिब रुदौलवी है । फिर जाकर सूची में संशोधन किया गया । दरअसल इस तरह के वाकए सरकारी विभागों में होते रहते हैं । कमलेश्वर के निधन के बाद आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में उनको निमंत्रण देने के लिए विदेश मंत्रालय के अफसरों ने उनके घर पर फोन किया था और बगैर कुछ बताए ये सूचना फोन उठानेवाले को दी और फोन रख दिया । गनीमत ये रही कि किसी तरह विदेश मंत्रालय को समय रहते कमलेश्वर के निधन की जानकारी मिल गई वर्ना तो उनका नाम भी सूची में प्रकाशित कर दिया गया होता ।
अब अगर समग्रता में इस साल दिए गए यश भारती सम्मान से नवाजे गए लोगों की सूची पर नजर डालें तो यह बात साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है कि सम्मानित विभूतियों में भी सामाजिक समीकरणों का ध्यान रखा गया है । संभव है कि मेधा को भी प्राथमिकता दी गई हो लेकिन जिस तरह से नाम जोड़े और घटाए गए उससे साफ है कि अकलियत से लेकर जातिगत समीकरणों का भी ध्यान रखा गया । पुरस्कारों के बहाने से राजनीतिक तौर पर समुदायों और जातियों को खुश करने की कोशिश भी दिखाई दे रही है । साहित्य, कला, संस्कृति, क्रिकेट, समाजसेवा और पत्रकारिता आदि के लिए यश भारती सम्मान के नामों का चुनाव करते वक्त अगले साल होनेवाले विधानसभा चुनावों को भी ध्यान में रखा गया । वर्ना ये कैसे संभव था कि बांदा के एक ऐसे शिल्पकार का नाम सूची में घोषित कर दिया जाता जिस नाम का उस जिले में तो क्या पूरे सूबे में कोई शिल्पकार ज्ञात नहीं है । क्या सिर्फ नाम देखकर शाहिद हुसैन को पुरस्कार देना तय कर लिया गया । क्या ये जरूरी नहीं था कि संबंधित विभाग नामों का ऐलान करने के पहले उसकी जांच करवा लेता । संस्कृति विभाग क सचिव खुद बेहतरीनन शायर हैं और कला संस्कृति और साहित्य जगत से गहरे जुड़े हुए भी हैं । बावजूद इसके ऐसा हुआ तो इससे तो ये भी लगता है कि संस्कृति सचिव को उपर से नाम भेजकर उसका ऐलान करने को कहा जा रहा था । अपने स्तर से जब उन्होंने जांच करवाई तो कई खामियां नजर आईं लेकिन तबतक तो तीर कमान से निकल चुका था । सवाल यही उठता है कि इन सरकारी पुरस्कारों को लेकर कोई ठोस पारदर्शी नीति क्यों नहीं बनाई जाती है । कोई मानक क्यों नहीं तय किया जाता है । जनता को ये क्यों नहीं बताया जाता है कि अमुक नाम के चयन के पीछे की वजह ये रही है । क्या जनता के पैसे से दिए जानेवाले इन भारी भरकम पुरस्कारों के बारे में जनता को जानने का हक नहीं है । उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री की छवि अबतक साफ सुथरी है लेकिन इस तरह के वाकयों से ये तो साफ होता है कि वो भी राजनीति की काली कोठरी में आकर उससे बचकर निकल नहीं पा रहे हैं । दरअसल हमारे देश में पुरस्कारों को लेकर कोई ठोस नीति नहीं है । जैसे यूपी में तो यश भारती पुरस्कारों की संख्या भी निश्चित नहीं है । जो सत्ता में है वो अपने जितने चाहे उतने चहेतों को पुरस्कृत कर सकता है । ये पुरस्कार भी सरकारी स्कीमों की तरह राजनीति की शिकार होती रही हैं । सत्ता बदलने पर पुरस्कार या तो बंद कर दिए जाते हैं या दिए ही नहीं जाते हैं । क्या सरकारें कोई ठोस नीति बनाकर इसको स्थायी नहीं कर सकती हैं जिसमें पारदर्शिता हो और पुरस्कारों की प्रतिष्ठा भी स्थापित हो सके । संगीत नाटक अकादमी और यश भारती पुरस्कार इतनी भारी संख्या में बांटे गए कि लगता है कि कोई बच ही नहीं पाएगा । रही सही कसर हिंदी संस्थान के पुरस्कार पूरी कर देते हैं । नब्बे के आखिरी दशक में दिल्ली में एक मजाक चलता था कि अगर करोलबाग में पत्थर फेंका जाए तो हर दूसरा जख्मी शख्स एमबीए डिग्रीधारक होगा । यही हाल उत्तर प्रदेश में पुरस्कारों को लेकर है ।