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Tuesday, June 11, 2024

उत्कृष्टता के आग्रही निर्देशक


करीम आसिफ। उत्तर प्रदेश के इटावा में पैदा हुए। अपने मामू नसीर अहमद खान के साथ सत्रह बरस की उम्र में बांबे (अब मुंबई) पहुंचे। नसीर खान अपने समय के जाने माने फिल्म निर्माता निर्देशक थे। कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया था। करीम आसिफ अपने मामू के साथ बांबे पहुंचते हैं तो वहां कुछ समय के लिए एक फिल्म कंपनी में सिलाई का काम करते हैं। इसी दौर में वो करीम आसिफ से के आसिफ हो जाते हैं। इन्होंने अपने जीवन में दो ही फिल्में निर्देशित कीं, फूल और मुगल ए आजम। फिल्म फूल सफल रही। दूसरी ने तो इतिहास ही रच दिया। बहुधा इस बात की चर्चा होती है कि के आसिफ ने मुगल ए आजम के निर्माण में दस वर्ष लगा दिए। फिल्म पर होनेवाले खर्च को लेकर निर्माता और निर्देशक के बीच मतभेद के कारण काम रुक जाता था। फिल्म की भव्यता को लेकर के आसिफ छोटे से छोटा समझौता भी नहीं करना चाहते थे। ये कम ज्ञात है कि के आसिफ ने पहले भी मुगल ए आजम के नाम से फिल्म बनाने का असफल प्रयास किया था। पहली बार के आसिफ ने सिराज अली हकीम को अपनी फिल्म में पैसा लगाने के लिए राजी किया था। हकीम बांबे के बेहद धनवान व्यक्ति थे। 1946 में ही के आसिफ की फिल्म मुगल ए आजम फ्लोर पर चली गई थी। यह जानना दिलचस्प है कि मुगल ए आजम में अनारकली की भूमिका के लिए मधुबाला निर्देशक के आसिफ की पहली पसंद नहीं थीं। ना ही बादशाह अकबर के लिए पृथ्वीराज कपूर और शहजादा सलीम के लिए दिलीप कुमार। अगर के आसिफ की मूल परिकल्पना साकार होती तो अकबर की भूमिका चंदरमोहन निभाते और सलीम की सप्रू। अनाकरली के रूप में आज हम नर्गिस को देख रहे होते। नियति को कुछ और ही मंजूर था। फिल्म एक चौथाई शूट हो चुकी थी। अचानक चंदरमोहन का निधन हो गया। सबकुछ रुक गया। देश का विभाजन हो चुका था। विभाजन का असर भी फिल्म निर्माण पर पड़ा। फिल्म के फाइनेंसर सिराज अली हाकिम पाकिस्तान जाने की तैयारी करने लगे। एक दिन के आसिफ को सूचना मिली कि हाकिम साहब हिन्दुस्तान छोड़कर जा रहे हैं और वो फिल्म में निवेश नहीं कर पाएंगे। फिल्म रुक गई। कोई भी निवेशक फिल्म में के आसिफ के खर्चे उठाने को तैयार नहीं हो रहा था। उन्होंने काफी कोशिश की। सफलता नहीं मिल पाई। 

दो वर्ष बाद उनको बांबे के बड़े बिल्डर पिता-पुत्र शोपोरजी-पालनजी मिस्त्री का साथ मिला। फिल्म नए सिरे बनाने की योजना बनी। दुर्गा खोटे को छोड़कर पूरी स्टार कास्ट बदल दी गई। उसके बाद की कहानी इतिहास में दर्ज है। के आसिफ ने जिस उत्कृष्टता से फिल्म का निर्माण किया वो अप्रतिम है। फिल्म मुगल ए आजम का गीत याद करिए मोहे पनघट पर नंदलाल...। ये गाना जब आरंभ होता है तो बाल- कृष्ण का स्वरूप में झूले दिखता है। इस दृष्य को शूट करने की बारी आई तो के आसिफ ने कहा कि कृष्ण जी की सोने की मूर्ति बनवाई जाए। शोपोर जी तैयार नहीं थे। वो इस बात पर अड़े हुए थे कि मूर्ति किसी भी धातु की बनवाकर सुनहला रंग चढ़ा दिया जाए। के आसिफ का तर्क था कि बादशाह के दरबार में तो सोने की ही मूर्ति होनी चाहिए। उनका कहना था कि ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म में सोने की बनी मूर्ति का रंग और सुनहले रंग चढ़ा कर बनाई गई मूर्ति का रंग अलग दिखेगा। आखिरकार के आसिफ की ही चली। निर्देशक और निवेशक की तनातनी में फिल्म की शूटिंग कई दिन रुक गई। गाने में भगवान कृष्ण का सीन चंद फ्रेम का है लेकिन आसिफ माने नहीं। एक और दृष्य याद करिए। जब 14 वर्षों के बाद युद्ध कला में निपुण होकर शहजादा सलीम वापस महल में आनेवाले होते हैं तो जोधाबाई कहती है कि उनके बेटे का स्वागत मोतियों बरसा कर की जाए। मामला फिर फंस गया। आसिफ चाहते थे कि शहजादा जब दरबार में आएं तो उनका स्वागत असली मोतियों से हो। शोपोर जी कहने लगे कि दो चार सेकेंड के दृश्य के लिए इतने सारे असली मोती पर खर्च करना मूर्खता है। आसिफ डटे रहे। उनका तर्क था कि असली मोती की चमक नकली मोती में नहीं दिखेगी। नकली मोती पकड़ में आ जाएगी। असली मोती जब फर्श पर गिरेंगी तो उसकी आवाज नकली मोतियों के गिरने की आवाज से अलग होगी। बात इतवनी बढ़ गई कि के आसिफ ने फिल्म की शूटिंग रोक दी। महीने भर बाद शोपोर जी किसी तरह से तैयार हुए। असली मोती मंगवाए गए और शूट आरंभ हो सका। उत्कृष्टता के आग्रही के आसिफ और मुगल ए आजम से जुड़े इतने प्रामाणिक किस्से मौजूद हैं कि उनपर ही एक रोचक फिल्म बन सकती है। पर ये साहस कोई के आसिफ जैसा निर्देशक और शोपोर जी जैसा निवेशक ही कर सकता है। 


Saturday, December 10, 2022

कला पर भारी अभिनेताओं की छवि


वर्ष 2022 समाप्त होने को है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में इस वर्ष को हिंदी फिल्मों पर आए संकट के तौर पर याद किया जाएगा। इस संकट के कारणों को लेकर भी वर्ष भर चर्चा हुई। सिनेमा हाल में दर्शकों की कमी पर लगातार चिंता प्रकट की जा रही है। फिल्मों के जानकार अलग अलग कारणों की पड़ताल करने में जुटे हुए हैं। अभिनय के अलावा कहानी, पटकथा, निर्देशन से लेकर एडिटिंग की कमजोरी तक को हिंदी फिल्मों के नहीं चल पाने की वजह बताई जा रही है। कलाकारों के अभिनय में अति नाटकीयता को भी कुछ फिल्म समीक्षक रेखांकित कर रहे हैं। जो लेखक-समीक्षक हिंदी फिल्मों में कलाकारों की अति नाटकीयता को रेखांकित कर रहे हैं वो दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्मों के हिट होने की कारणों को जब गिनाते हैं तो उसमें कलाकारों की अति नाटकीयता को नजरअंदाज कर देते हैं। दक्षिण भारतीय फिल्मों में अति नाटकीयता आम है। हिंदी फिल्मों को किसी एक कारण से कम दर्शक नहीं मिल रहे हैं बल्कि उसके अनेक कारण हैं। 

हिंदी फिल्मों के निर्माण के दौरान पहले निर्देशक अपने साथी कलाकारों के साथ फिल्म की कहानी, उसके संवाद, उसके गीत और दृष्यों को लेकर खूब चर्चा करते थे। अपने साथी कलाकारों के साथ चर्चा करने से फिल्म की शूटिंग के दौरान अभिनेता और निर्देशक के बीच एक सहज रिश्ता कायम हो जाता था। चूंकि अभिनेता या अभिनेत्री फिल्मों के दृष्यों पर या संवाद पर चर्चा में शामिल रहते थे इस वजह से उनके अभिनय में एक खास किस्म की स्वाभाविकता दिखाई देती थी। आर के स्टूडियो में राज कपूर की कुटिया में होने वाली बैठकी प्रसिद्ध है। पूरी पूरी रात वो अपने साथी कलाकारों के साथ फिल्म निर्माण पर, फिल्म के संगीत पर, फिल्म के संवाद पर बातें करते थे। इससे साथी कलाकारों और निर्देशकों के बीच एक रागात्मक संबंध विकसित होता था। सभी का सोच एक ही दिशा में जाता था। निर्देशक जिस फिल्म की परिकल्पना करता था, साथी कलाकार उस कल्पना को साकार करने में जुटते थे। वी शांताराम जैसे प्रसिद्ध निर्देशक भी अपने साथ काम करनेवाले कलाकारों के साथ फिल्म को लेकर लगातार बैठकें करते थे। के आसिफ जब मुगल ए आजम बना रहे थे तो उस दौरान अभिनेता चंद्रमोहन का निधन हो गया। प्रोड्यूसर सिराज अली हाकिम ने पाकिस्तान जाने का निर्णय किया जिसके कारण शूटिंग बंद हो गई थी। कई वर्षों के के बाद जब के आसिफ को दूसरे प्रोड्यूसर मिले और फिल्म पर नए सिरे से नए कलाकारों के साथ काम आरंभ हुआ तो तय किया गया कि फिल्म को अंग्रेजी और तमिल में भी बनाया जाएगा। आसिफ ने निणय लिया कि फिल्म की पटकथा नए सिरे से लिखी जाएगी। उन्होंने हिंदी फिल्म के लिए एहसान रिजवी, कमाल अमरोही, अमान और वजाहत मिर्जा को हिंदी पटकथा के लिए अनुबंधित किया। ये कलाकारों के साथ बैठकर मंथन का ही परिणाम था कि फिल्म मुगल ए आजम में जोधाबाई के संवाद के लिए हिंदी और उर्दू के शब्दों के साथ ब्रजभाषा के भी कई शब्दों का उपयोग किया गया। इस तरह के संवाद ने जोधाबाई के किरदार को पर्दे पर जीवंत कर दिया था। जब फिल्म की शूटिंग आरंभ हुई थी तो उसके पहले पृथ्वीराज कपूर के चलने के शाही अंदाज पर भी चर्चा हुई थी। तय किया गया था कि वो सीना तान कर अपेक्षाकृत धीरे-धीऱे चला करेंगे। इससे अकबर के व्यक्तित्व के चित्रण में सहायता मिली थी। हिंदी फिल्मों से जुड़े इस तरह के कई किस्से पुस्तकों में दर्ज हैं।    

अब हिंदी फिल्म निर्माण में स्थितियां लगभग पूरी तरह से बदल गई हैं। निर्देशकों और कलाकारों के साथ बैठक की परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों से फिल्म मेकिंग की कला सीखकर आए निर्देशकों ने फिल्म निर्माण की बारीकियां तो सीखी हीं फिल्म निर्माण का कथित प्रोफेशनल अप्रोच भी सीख लिया। अब हो ये रहा है कि निर्देशक फिल्म निर्माण की प्रक्रिया को एक्सेल शीट पर बनाते हैं। इसको काल शीट कहते हैं। काल शीट में तिथि के अनुसार फिल्म निर्माण की गतिविधियां दर्ज होती हैं। कितने बजे कौन आएगा, कौन सा दृष्य फिल्माया जाएगा। अभिनेता कौन है, वो कितने बजे आएंगे, मेकअप में कितना समय लगेगा, कितने बजे शूट आरंभ होगा, कास्ट्यूम क्या होगा आदि के अलावा नजदीकी अस्पताल, एंबुलेंस के नंबर के साथ साथ सूर्योदय और सूर्यास्त का समय भी लिखा होता है। फिल्म निर्माण में अनुशासन और खर्च को व्यवस्थित करने के लिए काल शीट आवश्यक है। लेकिन जब काल शीट के अनुसार अभिनेताओं को अभिनय करने पर मजबूर किया जाता है तो उसका असर फिल्म पर पड़ता है। इस दौर के प्रसिद्ध अभिनेता ने एक किस्सा सुनाया। एक बार उनको काफी बुखार था। काल शीट के अनुसार उनको बारह बजे सेट पर पहुंचना था। उनपर काफी दबाव बनाया गया कि वो शूटिंग के लिए पहुंचे। सेट पर डाक्टर और एंबुलेंस की व्यवस्था रहेगी। वो दवा लेकर सेट पर पहुंचे। हर शाट के बीच डाक्टर उनकी नब्ज देखते थे और कहते थे कि सब ठीक है आप शूटिंग करिए। दवा खाकर तीन घंटे तक काल शीट के अनुसार उन्होंने अभिनय किया। बुखार का असर अभिनय पर फिल्म बनने के बाद भी दिखा। सुपर स्टार्स ने इसकी काट निकाल ली है। जब वो काल शीट के अनुसार नहीं आ पाते हैं तो कई शाट्स के लिए वो निर्माताओं से कहते हैं कि बाडी डबल का उपयोग कर लें। बाद में फेस रिप्लेसमेंट की तकनीक का उपयोग करके उसको स्वाभाविक दिखा दिया जाता है। 

हिंदी फिल्मों के निर्माण को जो एक दूसरी बात नुकसान पहुंचा रही है वो है स्टारडम। बड़े स्टार अब निर्देशकों की नहीं सुनते हैं। वो अपनी मर्जी से स्क्रिप्ट से लेकर सीन तक में बदलाव करवा लेते हैं। इतना ही नहीं वो इससे आगे जाकर अपनी वेशभूषा के बारे में भी निर्णय करने लगे हैं। कई सुपरस्टार को तो सेट पर निर्देशकों को निर्देशित करते हुए देखा जा सकता है। वो निर्देशक को बताते हैं कि फलां सीन को इस तरह से शूट किया जाए। इसका नुकसान ये होता है कि निर्देशक ने फिल्म के बारे में जो समग्र सोच बनाया है उसको सुरस्टार बाधित कर देते हैं। कुछ सुपर स्टार तो फिल्म के एडिट होने के बाद उसमें दृष्य जुड़वाते और कटवाते तक हैं। ये पहले भी होता था लेकिन उस समय अधिकतर सुपरस्टार अपने साथी कलाकारों के चयन में हस्तक्षेप करते थे। वो अपने मन मुताबिक नायिका का चयन करने के लिए निर्माता निर्देशक पर दबाव डालते थे। कई बार लोकेशन को लेकर भी। पर फिल्म निर्माण में दखल कम होता था। अब तो इन सुपरस्टार्स का दखल लगातार बढ़ता जा रहा है। उनको लगता है कि दर्शक उनके अभिनय को पसंद कर रहे हैं तो वो फिल्म को भी अपने हिसाब से बनवाएं। फिल्म निर्देशक बेचारगी में हथियार डाल देते हैं। उनको भी बड़ा बैनर और बड़ी फिल्म का नाम चाहिए होता है।  

आज जब आमिर खान और अक्षय कुमार जैसे सुपरस्टार्स की फिल्में एक के बाद एक फ्लाप हो रही हैं तो निर्माताओं को इन कारणों पर ध्यान देने की जरूरत है। खुद को फिल्म में सबसे उत्तम दिखने की सुपरस्टार्स की मानसिकता निर्देशकों को महत्वहीन कर रही है। इस प्रवृत्ति को कम करना होगा। निर्देशकों को छूट देनी होगी कि वो अपने हिसाब से फिल्म बनाएं। काल शीट को लचीला बनाया जाए, कलाकारों के साथ फिल्म निर्माण को लेकर, उसको बेहतर बनाने को लेकर संवाद हो। सुपरस्टार्स निर्देशकों की सुनें और अपनी मनमानी कम करें। ये फिल्म जगत के लिए भी अच्छा होगा और कलाकारों के लिए भी। इन प्रवृत्तियों पर बात होनी चाहिए। 


Monday, July 5, 2021

माहिम पुलिस थाने से 'मदर इंडिया'


माहिम पुलिस स्टेशन में एक नौजवान पुलिस इंस्पेक्टर तैनात था। उसको फिल्मों में काम करने का बेहद शौक था। उसका दिन पुलिस की नौकरी से अधिक फिल्मों में लगता था। फिल्मी दुनिया में उसके कई दोस्त थे। पुलिस की नौकरी करते हुए उसके कई फिल्मों में छोटी मोदी भूमिकाएं कर भी ली थीं, जिसमें रंगीली, घमंड और लाखों में एक जैसी फिल्में थीं। उसने भले ही कई फिल्मों में काम किया लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में उसकी खास पहचान नहीं बन पाई थी और वो माहिम पुलिस थाने में पुलिस की नौकरी ही कर रहा था, पर चाहत तो बड़े फिल्म में केंद्रीय भूमिका करने की थी। सबकी होती है। पुलिस इंसपेक्टर साहब अपनी इस हसरत को अपने मित्रों के साथ साझा किया करते थे। वक्त निकला जा रहा था लेकिन इंसपेक्टर साहब को फिल्मों में अच्छी भूमिका नहीं मिल पा रही थी। एक दिन वो माहिम थाने में बैठे थे, शाम हो चुकी थी। अचानक उनका एक मित्र थान पहुंचा और उनको कल सुबह महबूब खान से मिलने के लिए कहकर चला गया। उस वक्त तक महबूब खान बड़े निर्देशक के तौर पर जाने जाने लगे थे। अगले दिन अपने मित्र के बताए समय पर इंसपेक्टर साहब महबूब खान से मिलने पहुंच गए। वहां उनका वो दोस्त भी मिला। वो महबूब खान का सहायक था। इंसपेक्टर साहब का दोस्त उनको लेकर महबूब खान के पास पहुंचा और उनसे कहा कि ‘ये बहुत अच्छे कलाकार हैं और एक अच्छी फिल्म की तलाश में हैं। इनको मदर इंडिया में कोई रोल दे दीजिए’। उस समय महबूब खान अपनी फिल्म ‘मदर इंडिया’ की कास्टिंग कर रहे थे। महबूब खान ने इंसपेक्टर साहब को ऊपर से नीचे तक देखा और गहरी सांस लेकर पूछा कि क्या आप फिल्मों में शौकिया तौर पर काम करना चाहते हैं या फिर संजीदगी से फिल्मों को अपना करियर बनाना चाहते हैं। इंसपेक्टर साहब ने महबूब खान को कहा कि वो फिल्मों में अभिनय को ही अपना करियर बनाना चाहते हैं, इंसपेक्टर की नौकरी छोड़कर अभिनेता बनने के लिए भी तैयार हैं। इंसपेक्टर साहब ने अपने अंदाज में अपनी बात जारी रखी और अपने मित्र की ओर इशारा करते हुए कहा कि ‘इसने मुझे बताया कि आप एक बड़ी फिल्म बना रहे हैं और मुझे सलाह दी कि मैं आपसे बात करूं’। 

इस वक्त तक महबूब खान ‘मदर इंडिया’ के लिए नर्गिस, सुनील दत्त और राजेन्द्र कुमार को फाइनल कर चुके थे। उनको ‘शामू’ के रोल के लिए किसी अभिनेता की तलाश थी। उन्होंने फौरन अपने असिस्टेंट से कहा कि इंसपेक्टर साहब का शामू के चरित्र के हिसाब से मेकअप करो, हम इनका स्क्रीन टेस्ट लेना चाहते हैं। जब इंसपेक्टर साहब मेकअप के लिए गए तो उनके एक दूसरे सहायक ने महबूब खान से कहा कि ये शख्स शामू के रोल के लिए उपयुक्त नहीं होगा क्योंकि इसके चेहरे पर एक आक्रामकता है। अनीत पांध्ये ने अपनी पुस्तक में इस प्रसंग को विस्तार से लिखा है। थोड़ी देर बाद इंसपेक्टर साहब का स्क्रीन टेस्ट हुआ और वो पास हो गए। ये इंसपेक्टर साहब राज कुमार थे। ‘मदर इंडिया’ रिलीज होने के बाद की कहानी तो इतिहास बन गई है। शामू के रोल से राज कुमार को जो पहचान मिली उसने उनको काफी काम दिलवाया और वो कुछ ही समय बाद शीर्ष के अभिनेताओं में शुमार होने लगे। फिल्म ‘वक्त’ ने तो उनको बेहद लोकप्रिय बना दिया। बाद के दिनों में तो राज कुमार को लेकर अनेक तरह के किस्से फिल्मी दुनिया में मशहूर हुए। उनकी संवाद अदायगी से लेकर उनकी अभिनय कला अनूठी थी। सौदागर फिल्म में जब वो शूटिंग के लिए आते थे तो उनके साथ चार गाड़ियों का काफिला चला करता था। एक में राज कुमार बैठते थे, दूसरी गाड़ी में उनके सहायक और बाकी दो गाड़ियों में उनके कपड़े, जूते, हैट इत्यादि रखे जाते थे। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो’ में इस प्रसंग को बेहद रोचक तरीके से लिखा है। आज से पच्चीस साल पहले 3 जुलाई को ये बेहतरीन और स्टाइलिश अदाकार इस दुनिया को अलविदा कह गया।  

(https://www.jagran.com/entertainment/bollywood-vishesh-interesting-facts-about-legendary-actor-rajkumar-in-mother-india-movie-entry-21795172.html)

Friday, June 14, 2019

कुल जमा ढाई फिल्म लेकिन निर्देशक कालजयी


सिर्फ ढाई फिल्म का निर्देशन और महान निर्देशक के रूप में पहचान, ढाई इस वजह से कि दो फिल्में उनके जीवनकाल में रिलीज हुई और एक फिल्म उनके निधन के बाद। नाम करीमुद्दीन आसिफ, जिसे लोग के आसिफ के नाम से जानते हैं और उनकी अनमोल कृति है ‘मुगल-ए-आजम’। के आसिफ ने दो फिल्में निर्देशित की। उनकी पहली फिल्म थीं ‘फूल’ जो 1945 में रिलीज हुईं। दूसरी फिल्म थी ‘मुगल-ए-आजम’ जो 1960 में रिलीज हुई। एक और फिल्म का निर्देशन वो कर रहे थे ‘लव एंड गॉड’ जो उनके जीवन काल में पूरी नहीं हो सकी। ये फिल्म उनके निधन के बाद रिलीज हुई। मुगल-ए-आजम को बनाने में के आसिफ साहब को एक दशक से अधिक वक्त लगा था। पहले वो चंद्रमोहन सप्रू और नर्गिस को लेकर ‘मुगल-ए-आजम’ बनाना चाहते थे जो बन नहीं पाई। लेकिन ये कहानी उनके मन में कुलबुलाती रही, उसपर फिल्म बनाने को लेकर वो बेचैन रहते थे. ‘मुगल-ए-आजम’ को बेहद भव्य तरीके से बनाना चाहते थे, उसके सेट से लेकर गीत और संगीत पर भी वो कुछ अनूठा करना चाहते थे, कुछ ऐसा जो कालजयी हो। इसी सोच के तहत उन्होंने दिलीप कुमार और मधुबाला को लेकर फिल्म बनाने का फैसला किया। के आसिफ ने जब नए सिरे से फिल्म बनाने का फैसला किया तो अपनी पुरानी योजना का सबकुछ बदल दिया। एक दिन वो नौशाद साहब के पास पहुंचे और कहा कि आपको ‘मुगल-ए-आजम’ का संगीत देना है। नौशाद साहब उन दिनों ‘उड़न खटोला’ फिल्म के म्यूजिक पर काम कर रहे थे। उन्होंने के आसिफ को अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए मना कर दिया। नौशाद साहब के मन में कहीं ना कहीं ये बात चल रही थी कि के आसिफ ने अनिल बिस्वास को म्यूजिक के लिए साइन कर रखा है तो उनको उन्हीं से करवाना चाहिए। बातचीत के बीच अचानक के आसिफ ने अपने पॉकेट से एक लाख रुपए की गड्डी निकाली और नौशाद साहब के होरमोनियम पर रख दिया। फिर बोले कि फिल्म का म्यूजिक तो आपको ही देना होगा और ये रहा आपका एडवांस। नौशाद साहब बिगड़ गए और उन्होंने साफ शब्दों में के आसिफ को बोल दिया कि ‘सबकुछ पैसे से नहीं खरीदी जा सकती। अपना पैसा उठाइए मैं इस फिल्म के लिए काम नहीं कर पाऊंगा। आसिफ साहब डटे थे, बोले करना तो आपको ही है ये फिल्म, अगर आपको अधिक पैसे चाहिए तो बताइए।‘ नौशाद इसको सुनकर बिफर गए। नौशाद ने इस वाकए को बयान करते हुए लिखा है कि जब पैसे की बात पर आसिफ साहब डट गए तो उन्होंने एक लाख की गड्डी उठाई और उसको अपने कमरे से बाहर छत पर फेंक दिया। ये सब देखकर भी के आसिफ को कोई फर्क नहीं पड़ा और वो मुस्कुराते रहे। इस बीच नौशाद का नौकर उन दोनों के लिए चाय लेकर छत पर आया। उसने वहां नोटों को उड़ते देखा। वो फौरन भागकर नीचे गया और नौशाद की पत्नी को बताया कि पूरी छत पर नोट बिखरे हैं। नौशाद की पत्नी के कहा कि फिल्मों में शूटिंग के लिए नकली नोट मंगवाएं होंगे वही बिखर गए होंगे। नौकर ने जब जोर देकर अपनी मालकिन को कहा कि असली नोट बिखरे हुए हैं तो वो नीचे से छत पर देखने आईं। वहां तो असली नोट पूरी छत पर बिखरे हुए थे। नौशाद साहब गुस्से में लाल पीले हो रहे थे और के आसिफ खड़े खड़े मुस्कुरा रहे थे। नौशाद साहब  की पत्नी ने जब नोट बिखरने के बारे में जानना चाहा तो मुस्कुराते हुए आसिफ ने कहा कि अपने पति से पूछिए। खफा नौशाद बोले कि ‘ये पैसे आसिफ मुगल-ए-आजम में काम करने के लिए एडवांस के तौर पर देने आए थे। मेरे मना करने पर भी जब नहीं माने तो मैंने फेंक दिए।‘ इस बीच नौशाद साहब की पत्नी छत पर बिखरे नोटों को समेटने लगी थीं। तब के आसिफ ने मनुहार करते हुए कहा कि ‘जिद छोड़िए, आपको ही ये फिल्म करनी है। मुगल-ए-आजम में संगीत आप ही देंगे।‘ नौशाद को तबतक बात समझ में आ गई थी कि आसिफ मानेगा नहीं। उन्होंने हंसते हुए कहा कि ‘अपने पैसे ले जाइए, मैं आपकी फिल्म करूंगा।‘ फिल्म पूरी होने तक यानि दस सालों तक कभी नौशाद साहब ने पैसे नहीं मांगे। फिल्म खत्म होने के बाद के आसिफ ने नौशाद को पैसे दिए।
ऐसा ही एक और वाकया हुआ। एक दिन के आसिफ ने नौशाद से कहा कि वो फिल्म में एक सीन डालना चाहते हैं जिसमें तानसेन मंडप में बैठकर गा रहे हों। नौशाद ने कहा कि वो धुन तो बना देंगे लेकिन गाएगा कौन। आसिफ ने उनसे पूछा तो नौशाद ने बड़े गुलाम अली खान का नाम लिया। तय किया और दोनों जा पहुंचे बड़े गुलाम अली खान के पास। के आसिफ ने उनसे ‘मुगल-ए-आजम’ के बारे में बताया और कहा कि वो उनसे इस फिल्म में गवाना चाहते हैं। बड़े गुलाम अली खान साहब ने अपने अंदाज में कहा कि ‘नौशाद मियां, मैं फिल्मों में नहीं गाता। कोई संगीत सम्मेलन हो तो मुझे आमंत्रित करिएगा मैं अवश्य आऊंगा। फिल्म वाले बहुत तरीके की पाबंदियां लगाते हैं जो मुझे मंजूर महीं।‘ नौशाद कुछ बोल पाते इसके पहले ही के आसिफ बोल पड़े, ‘खान साहब ये गाना तो आप ही गाएंगे।‘ अब चौंकने की बारी खान साहब की थी। उन्होंन नौशाद से पूछा कि ये साहब कौन हैं। नौशाद ने बताया कि ये के आसिफ हैं जो मुगल-ए-आजम बना रहे हैं। खान साहब ने कहा कि ‘मियां, ये तो बड़े अजीब आदमी हैं, मैं मना कर रहा हूं और ये जनाब हैं कि कह रहे हैं कि गाएंगे तो आप ही।‘ ये सुनकर आसिफ ने फिर कहा कि ‘जी, खान साहब, ये गाएंगे तो आप ही, चाहे आप जितना पैसा लें, हम देने को तैयार हैं।‘ खान साहब ने फिर कहा कि वो नहीं गा सकते। के आसिफ डटे रहे और फिर बोले कि गाना तो आपको पड़ेगा। नौशाद बीच में फंसे थे। खान साहब नौशाद को लेकर बाहर निकले और बोले कि ये पैसे की बात कर रहा है, मैं इसको इतना पैसा बताता हूं कि ये अभी भाग जाएगा। इस बीच नौशाद ने भी खान साहब को मनाने की कोशिश की लेकिन वो नहीं माने। खैर दोनों वापस कमरे में लौटे जहां के आसिफ बैठे-बैठे मुस्कुरा रहे थे। खान साहब ने उनसे पूछा कि अच्छा तो जनाब आप मुझे मुंहमांगी रकम देने को तैयार हैं । के आसिफ ने कहा जी बिल्कुल। खान साहब बोले कि वो एक गाने के लिए पच्चीस हजार रुपए लेंगे। के आसिफ ने कहा कि ‘बस! पच्चीस हजार और बहात मान ली। अब खान साहब के सामने और कोई विकल्प था नहीं। बाद की बातें इतिहास है। इस तरह ‘प्रेम जोगन बन के’ में बड़े गुलाम खान साहब की आवाज का जादू पिरोया गया। ये वो जमाना था जब बेहतरीन गायकों को भी फिल्मों में एक गाने के लिए तीन सौ से हजार रुपए तक फीस मिला करती थी। आज ही के दिन के आसिफ जैसा फिल्म निर्देशक इस धरती पर आया था। उनकी स्मृति को नमन।     

Monday, February 13, 2017

मोहब्बत की मिसाल 'पाकीजा'

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो काल से होड़ लेती हुई कालजयी हो जाती हैं । ऐसी ही एक फिल्म है ‘पाकीज़ा’ । आज से करीब साठ साल पहले यानि सत्रह जनवरी 1957 में एक फिल्म का मुहूरत हुआ था और मुहूरत के पंद्रह साल बाद 4 फरवरी 1972 में ये फिल्म रिलीज हो पाई । यह एक ऐसी ऐतिहासिक फिल्म थी जिसको लेकर फिल्मी दुनिया में कई किवदंतियां अब भी मौजूद हैं । कहा जाता है कि जब फिल्म ‘पाकीज़ा’ बनकर तैयार हो गई तो कमाल अमरोही ने फिल्म के जानकारों और समीक्षकों को यह फिल्म दिखाई । फिल्म के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया उनको मिली उससे उनका दिल टूट गया । उन्होंने जमकर शराब पी और घर लौटकर फिर शराब पीने लगे । उस दिन कमाल अमरोही ने जितनी शराब पी थी उतनी कभी नहीं पी थी । शराब के नशे में उन्होंने अपने बच्चों को पास बुलाया और कहा कि उनके मरने के बाद वो स्टूडियो और कामकाज को अच्छी तरह से संभालें । कमाल के परिवारवाले उनकी यह हालत देखकर बेहद परेशान हो गए । उन्होंने मीना कुमारी के पास जाकर कमाल की हालत बतलाई, तब मीना कुमारी उनसे अलग रहने लगी थी । जब 1964 में मीना कुमारी कमाल का घर छोड़कर बाहर निकली थीं तो उन्होंने कसम खाई थी कि उस घर में कभी नहीं जाएंगीं । लेकिन कमाल की हालत में वो उनके घर तक आई और बाहर ही गाड़ी में बैठी रहीं । उनके बच्चों से कहा कि सब ठीक हो जाएगा । जब रात ढलने लगी तो कमाल के बच्चों ने गाड़ी में बैठी मीना कुमारी को बताया कि वो सो गए हैं तो मीना कुमारी अपने घर लौट आईं । इस तरह के कई किस्से इस फिल्म से जुड़े हैं ।
दरअसल फिल्म ‘दायरा’ के फ्लॉप होने के बाद कमाल अमरोही के दिमाग में ‘पाकीज़ा’ का आइडिया आकार लेने लगा था । वो दस्तों से कहते थे कि मीना कुमारी को लेकर ऐक ऐसी फिल्म बनाना चाहते हैं जो ना केवल ऐतिहासिक हो बल्कि अपनी महबूब पत्नी की प्रतिभा को सर्वोत्तम तरीके से उभार सके । उनके करीबी बताते हैं कि कमाल साहब हमेशा कहते थे कि शाहजहां ने अपनी मोहब्बत के लिए ताजमहल बनवाया और वो अपनी मोहब्बत के लिए ‘पाकीज़ा’ बनाना चाहते हैं । ‘पाकीज़ा’ फिल्म के संवाद की हर पंक्ति इस बात की गवाही देती है कि वो मीना कुमारी को ध्यान में रखकर लिखी गई थी । फिल्म ‘पाकीजा’ को बनाते वक्त कमाल अमरोही के दिमाग में के आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ थी और वो चाहते थे कि भव्यता और विजुअल ट्रीटमेंट में ‘पाकीज़ा’ उससे आगे निकल जाए । ‘पाकीज़ा’ पहले व्लैक एंड व्हाइट में शूट होनी शुरू हुई, तकनीक बदली तो फिर से कलर फिल्म पर शूट होने लगी उसके बाद सिनेमास्कोप का जमाना आया तो उसमें शूटिंग हुई । पहले के सारे शूट रद्दी में डाल दिए गए ।
सिनेमास्कोप को लेकर भी एक दिलचस्प प्रसंग इस फिल्म से जुडा़ हुआ है । कमाल अमरोही को परफैक्शनिस्ट के तौर पर जाना जाता है । वो फिल्म के लोकेशन से लेकर हर शॉट का बेहद बारीकी से ध्यान रखते थे । जब उन्होंने पाकीजा के कलर शूट को रद्दी में डालकर सिनेमास्कोप में शूट शुरू किया तो उन्हें लगा कि सिनेमास्कोप के जिस लैंस से वो शूटिंग कर रहे थे उसका फोकस ठीक नहीं था । उस जमाने में एमजीएम नाम की विदेशी कंपनी से लैंस आता था कभी किराए पर तो कभी अन्य शर्तों पर । कमाल अमरोही उस जमाने में इस लैंस के लिए पचास हजार रुपए महीने चुका रहे थे । कमाल अमरोही ने लेंस के फोकस की त्रुटि के बारे में एमजीएम कंपनी को खत लिखा । कंपनी के नुमाइंदों ने लेंस की जांच की तो अमरोही की शिकायत सही पाई गई । बाद में उस लेंस को कंपनी ने कमाल अमरोही को उपहार के तौर पर भेंट कर दिया ।
पाकीजा को तकनीक से आधुनिक बनाने के कमाल अमरोही के जुनून के बीच उनका और मीना कुमारी के संबंध में खटास आनी शुरू हो गई थी । लोकेशन को लेकर कमाल अमरोही ने इतनी यात्राएं की कि उस वक्त ये भी कहा जाने लगा था कि इस फिल्म का नाम ‘इंडिया ट्रिप’ रख देना चाहिए । मीना कुमारी की ज्वेलरी के लिए भी उन्होंने बनारस, जयपुर और त्रिवेन्द्रम तक की यात्रा की । फिल्म के शुरू होने के सात वर्षों के बाद मार्च उन्नीस सौ चौंसठ में मीना कुमारी और कमाल अमरोही अलग हो गए । जब कमाल अमरोही और मीना कुमारी अलग हो गए तो लगा था कि ये फिल्म कभी रिलीज नहीं हो पाएगी । इस बीच इस फिल्म में काम करने वाले कई लोग इस प्रोजेक्ट से अलग हो गए तो कइयों की मौत हो गई । मीना कुमारी भी अपना इलाज करवाने विदेश गईं, लौट कर आईं लेकिन फिल्म की गाड़ी पटरी पर लौट नहीं रही थी । मीना कुमारी की बॉक्स ऑफिस पर तूती बोल रही थी । आखिरकार कमाल अमरोही ने 25 अगस्त 1968 को मीना कुमारी को एक पत्र लिखा- ‘सिर्फ पाकीज़ा की रिलीज ही बच गई है । तुमने एक शर्त रखी है कि जबतक मैं तुमको तलाक नहीं दूंगा तबतक तुम पाकीज़ा पूरी नहीं करोगी । मैं तुम्हें इस बंधन से आजाद कर दूंगा अगर तुम अपनी पाकीजा को पूरा रना चाहोगी तो मुझे खुशी होगी ।‘ अब ये इस पत्र का कमाल था या फिर कुछ और मीना कुमारी मे फिल्म में दोबारा काम करने की हामी भर दी । फिल्म पूरी हुई लेकिन बॉक्स ऑफिस पर अच्छी शुरुआत नहीं मिली । लेकिन इस बीच मीना कुमारी अस्पताल में भर्ती हो गईं और उनकी बीमारी की खबर फैलने लगी थी । 31 मार्च को उन्होंने अंतिम सांसे ली । उनकी मौत के बाद ‘पाकीज़ा’ देखने दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी थी । कहा गया कि पहले तो मीना कुमारी ने अपने पैसों से फिल्म पाकीज़ा बनाई और फिर अपनी मौत से ।