Translate

Showing posts with label उत्तम पचारणे. Show all posts
Showing posts with label उत्तम पचारणे. Show all posts

Saturday, December 4, 2021

ललित कला अकादमी में विद्रोह


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक स्वयायत्त संस्था है ललित कला अकादमी। इस संस्था का शुभारंभ 5 अगस्त 1954 को उस समय के शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने किया था। इसका उद्देश्य चित्रकला, मूर्तिकला आदि के क्षेत्र में अध्ययन और शोध को बढ़ावा देना है। इसके अलावा क्षेत्रीय कला और कलाकारों के बीच संवाद का मंच प्रदान करना भी एक उद्देश्य है। इस वक्त इस संस्था के प्रोटेम (अस्थायी) अध्यक्ष उत्तम पचारणे हैं। इनका तीन वर्ष का कार्यकाल खत्म होने के बाद इनको इस वर्ष जून में छह महीने के लिए अस्थाई अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। ललिता कला अकादमी के संविधान में छह महीने के अस्थाई अध्यक्ष का प्रावधान है ताकि वो नए अध्यक्ष के चयन की औपचारिकताएं पूरी करवा सकें। ललित कला अकादमी पिछले कई वर्षों से अपने उद्देश्यों से भटक गई प्रतीत होती है। पिछले कई वर्षों से अकादमी लगातार विवादों में रही है। अकादमी से एम एफ हुसैन की पेंटिंग गायब होने की घटना सुर्खियों में रही थीं। अकादमी से मूल्यवान पेंटिंग्स के गुम होने को लेकर आरोप प्रत्यारोप का लंबा सिलसिला चला। पूर्व के चेयरमैन पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। इस संस्था के अध्यक्ष रहे अशोक वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान अनियमितताओं को लेकर सीबीआई जांच चल रही है। विवादों की इस शृंखला में इस संस्था का प्रशासन केंद्र सरकार ने अपने हाथ में भी लिया था। कुछ समय तक केंद्र से नियुक्त प्रशासक ने इसको चलाया। उस वक्त भी विवाद थम नहीं सका। 

ताजा विवाद अस्थाई अध्यक्ष के खिलाफ कार्यकारिणी के सदस्यों के विद्रोह का है। पिछले महीने की 25 तारीख को उपाध्यक्ष नंदलाल ठाकुर और कार्यकारिणी के सदस्यों ने संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव को एक पत्र लिखकर अध्यक्ष के असंवैधानिक कामों के बारे में उनका ध्यान आकृष्ट किया। अपने पत्र में इन लोगों में स्पष्ट रूप से अकादमी के अध्यक्ष उत्तम पचारणे पर ललित कला अकादमी के संविधान के हिसाब से काम नहीं करने का आरोप लगाया है। उस पत्र में आरोप है कि उत्तम पचारणे कार्यकारिणी के निर्णयों को बदलकर कार्यक्रम आयोजित करवा रहे हैं। कार्यकारिणी ने जिन कार्यक्रमों को तय किया है उसको नहीं करवा कर दूसरे कार्यक्रम करवा रहे हैं। उपाध्यक्ष और कार्यकारिणी के सदस्यों ने अपने पत्र में मंत्रालय को लिखा है कि उत्तम पाचरणे ने दिल्ली में आयोजित होनेवाले प्रिंट बिनाले को बगैर कार्यकारिणी की मंजूरी के मुंबई में कराने का आदेश जारी कर दिया है। अकादमी का संविधान उनको ऐसा करने की अनुमति नहीं देता है।  इसके अलावा स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर मुंबई में किए जानेवाले आर्ट कैंप का नाम बदलकर अनसंग हीरो-छत्रपति शिवाजी के नाम से कराने का फैसला किया है। कार्यकारिणी के सदस्यों ने छत्रपति शिवाजी को अनसंग हीरो कहे जाने का विरोध किया लेकिन अस्थाई अध्यक्ष सुनने को राजी नहीं थे।अस्थाई अध्यक्ष ने बैठक में घोषणा की कि वो इसको मुंबई के जे जे स्कूल आफ आर्ट में अपनी जिम्मेदारी पर आयोजित करवा रहे हैं। यह भी अकादमी के संविधान के खिलाफ निर्णय है। 

इस पत्र में ये आरोप भी लगाया गया है अस्थायी अध्यक्ष कार्यक्रमों के आयोजन में मनमानी करते हैं और कार्यकारिणी को विश्वास में नहीं लेते हैं। ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों को लेकर मंत्रालय जांच करेगी या नहीं ये भविष्य में पता चलेगा। अगर जांच होती भी है तो संभव है कि जांच  आरंभ होने तक अस्थायी अध्यक्ष का छह महीने का कार्यकाल समाप्त हो जाए। उनका छह महीने का कार्यकाल इस महीने ही पूरा हो रहा है। जिस काम, नए अध्यक्ष के चुनाव, के लिए अस्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति की गई थी उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। सर्च कमेटी बनी या नहीं इस बारे में भी अकादमी की बेवसाइट पर कोई जानकारी नहीं है। अगर दिसंबर में अस्थाई अध्यक्ष का कार्यकाल बगैर नए अध्यक्ष के चयन के खत्म हो जाता है तो क्या एक बार फिर से अस्थाई अध्यक्ष की नियुक्ति की जाएगी। क्या संस्कृति मंत्रालय फिर से उत्तम पचारणे के नाम की सिफारिश राष्ट्रपति से करेगी और राष्ट्रपति उसको मान लेंगे। अगर ऐसा होता है तो यह नियमों की खामियों की आड़ लेना होगा। तब सवाल ये भी उठेगा कि क्या उत्तम पचारणे तबतक ललित कला अकादमी के अस्थाई अध्यक्ष बने रहेंगे जबतक कि नए अध्यक्ष का चयन नहीं हो जाता है। नियमों की खामियों की आड़ लेकर ऐसा होता है तो फिर अस्थाई अध्यक्ष नए अध्यक्ष का चयन क्यों होने देगा। इसके पहले जब उत्तम पचारणे नियमित अध्यक्ष थे तब भी उन्होंने अपना कार्यकाल तीन साल से पांच साल करने का प्रस्ताव मंत्रालय को भेजा था जिसपर संस्कृति मंत्रालय की मुहर नहीं लग पाई थी। तब उत्तम पचारणे को पद छोड़ना पड़ा था लेकिन कुछ ही दिन बाद संस्कृति मंत्रालय ने अस्थाई अध्यक्ष के तौर पर उत्तम पचारणे के नाम का अनुमोदन कर राष्ट्रपति को भेज दिया था। 

दरअसल अगर देखा जाए तो उत्तम पचारणे की नियुक्ति के समय से ही विवाद आरंभ हो गया था। इनकी नियुक्ति में तय प्रक्रिया के पालन नहीं होने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में एक केस चल रहा है। पर लंबी कानूनी प्रक्रिया की वजह से उसपर निर्णय कब आएगा इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों को लेकर अन्य कई केस भी अदालत में लंबित हैं। करदाताओं के पैसे का जो सदुपयोग कला के विकास में होना चाहिए वो कानूनी पचड़ों में खर्च हो रहा है। नियुक्तियों में भी अनियमितताओं के आरोप लग रहे हैं। ललित कला अकादमी में काम रही एक महिला को बिना किसी आरोप पत्र के सस्पेंड कर दिया गया, वो केस भी अदालत में लंबित है। ललित कला अकादमी को नजदीक से जानने वालों का कहना है कि अकादमी जितना धन मुकदमों की पैरवी में खर्च कर रही है उसमें तो कई कार्यक्रम या कार्यशाला आयोजित किए जा सकते हैं। 

ललित कला अकादमी में विवादों की शुरुआत एक तरह से नौकरशाह और कवि अशोक वाजपेयी के कार्यकाल से हुई। उन्होंने अपने कार्यकाल में कला के विकास के नाम पर कई ऐसे कार्यक्रम आरंभ किए जिसमें उन्होंने अपने मित्रों को बढ़ावा दिया। उनपर विदेशी कला प्रर्दर्शनियों में हिस्सा लेने को लेकर भी विवाद है। नियुक्तियों और गैलरी आवंटन को लेकर भी विवाद उठे थे। उसके बाद से तो जो भी इस पद पर आया उसमें से अधिकतर ने मनमानी की। ललित कला अकादमी का संविधान है. जिसके हिसाब से इसके अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों को काम करना होता है। दिक्कत तब होती है जब इस संविधान के हिसाब से काम नहीं होता है। उत्तम पचारणे का कार्यकाल खत्म होने के पहले ही संस्कृति मंत्रालय ने नए अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए सक्रियता क्यों नहीं दिखाई। क्यों इस बात का इंतजार करते रहे कि अस्थाई अध्यक्ष नियुक्त करने की नौबत आए। संस्कृति मंत्रालय के नौकरशाहों ने इस मंत्रालय से जुड़ी संस्थाओं का बेड़ा गर्क करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अगर इन संस्थाओं में सही समय पर नियमित नियुक्तियां हों जाएंगी तो अफसरों को मनमानी का अवसर नहीं मिलेगा।  रिटायरमेंट के बाद राघवेन्द्र सिंह को सालभर के लिए संस्कृति सचिव बनाया गया था। उनसे उम्मीद थी कि वो कुछ बेहतर करेंगे लेकिन उन्होंने अपने सालभर के कार्यकाल में इन स्वायत्त संस्थाओं में कोई नियुक्ति नहीं की या नहीं होने दी। अगर इन संस्थाओं को विवादों से दूर रखना है तो इसके लिए स्पष्ट नियम बनाने होंगे। मंत्रियों को यह देखना होगा कि सही समय पर नियुक्तियां हों। संसद के चालू सत्र में राज्यसभा में सोनल मानसिंह ने संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं के शीर्ष पदों के खाली रहने का विषय उठाया है, देखते हैं उसका क्या असर होता है। 

Saturday, August 17, 2019

स्वायत्ता की आड़ में अराजकता


हाल ही में ललित कला अकादमी ने अपना स्थपना दिवस समारोहपूर्वक मनाया। दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में भारत सरकार के संस्कृति मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल समेत कला जगत के कई मूर्धन्य उपस्थित थे। अपने संबोधन में ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और प्रतिष्ठित कलाकार उत्तम पचारणे ने संस्कृति मंत्रालय पर अकादमी के कामकाज में बाधा डालने की बात कही। मंत्री की मौजूदगी में कही गई उनकी इन बातों का मंत्री ने नोटिस तो लिया लेकिन बेहद संजीदगी से उन्होंने नसीहत दी कि इल तरह की बातें सार्वजनिक मंच से ना होकर आपसी संवाद के जरिए की जानी चाहिए। बात आई-गई हो गई लेकिन ललित कला अकादमी के अध्यक्ष की बातों से ऐसा लगा कि मंत्रालय और अकादमी के बीच सामंजस्य की कमी है। ये भी लगा कि कुछ तो है जिसकी परदादारी है और वो बाहर आने के लिए बेचैन है। दरअसल ललित कला अकादमी काफी समय से विवादों में रही है। अलग अलग समय पर अलग अलग कारणों से विवाद होते रहे हैं। अब तो अध्यक्ष ने साफ तौर पर कह दिया है कि मंत्रालय और अकादमी के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। तो ऐसे में मंत्रालय और अकादमी दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि संवादहीनता और कामकाज की बाधाओं को दूर किया जाए।
दिल्ली के रवीन्द्र भवन में तीन अकादमियां चलती हैं, संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी और साहित्य अकादमी। संगीत नाटक अकादमी अभी हाल में अपने पुरस्कारों को लेकर विवाद में रही। साहित्य अकादमी भी 2015 के बाद काफी चर्चा में रही है। पिछले दिनों इस तरह की खबरें आईं कि साहित्य अकादमी के प्रतिनिधिमंडल को चीन जाने की अनुमति संस्कृति मंत्रालय से नहीं मिली और इसकी वजह से लंबे समय से चीन के साथ चली आ रही विचार-विनिमय की परंपरा बाधित हुई। लेकिन ललित कला अकादमी का मामला इन दोनों अकादमियों से अलग है। इसके पूर्व सचिव सुधाकर शर्मा को लेकर भी काफी विवाद हुआ था। अशोक वाजपेयी जब ललित कला अकादमी के अध्यक्ष थे तो उन्होंने सुधाकर शर्मा को सचिव पद से हटा दिया था। फिर बहाली हुई, फिर हटाए गए। अशोक वाजपेयी का कार्यकाल भी विवादित रहा। उनपर भी कई तरह के आरोप लगे। इन आरोपों की सीबीआई जांच भी कर रही है। गवाहों के बयान आदि भी हो चुके हैं। सीबीआई चार्जशीट की प्रतीक्षा है। अशोक वाजपेयी के बाद के के चक्रवर्ती ललित कला अकादमी के अध्यक्ष बने। इनका कार्यकाल भी विवादित रहा, इनके समय में भी सुधाकर शर्मा को सस्पेंड किया गया। के के चक्रवर्ती भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और उनको बीच में ही हटाकर मंत्रालय ने ललित कला अकादमी को अपने अधीन कर लिया। ललित कला अकादमी के संविधान में ये प्रावधान है कि अगर मंत्रालय को ये लगता है कि वहां गड़बड़ियां हो रही हैं तो वो संस्थान के प्रशासन को अपने अधीन कर प्रशासक नियुक्त कर सकता है। मंत्रालय ने कृष्णा शेट्टी को अकादमी का प्रशासक नियुक्त कर दिया। प्रशासक का काम ललित कला अकादमी का चुनाव करवाकर महा-परिषद और कार्यकारी बोर्ड का गठन करवाना होता है। परंतु शेट्टी अपने कार्यकाल में इसका गठन नहीं करवा पाए। कृष्णा शेट्टी के बाद मंत्रालय ने अपने एक संयुक्त सचिव को प्रोटेम चेयरमैन नियुक्त कर दिया। ललित कला अकादमी के संविधान की किस धारा के अंतर्गत प्रोटेम चेयरमैन बनाए गए इसपर कलाकारों के बीच लंबे समय तक चर्चा होती रही थी। इन सबके बीच मामला कोर्ट में भी गया था लेकिन पता नहीं किन परिस्थितियों में महा-परिषद का चुनाव नहीं हो पाया। समय समय पर मंत्रालय के कई अधिकारियों को यहां का कामकाज देखने की जिम्मेदारी दी गई। थोड़ा वक्त और बीता और उत्तम पचारणे को यहां का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। अकादमी की बेवसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अबतक महा-परिषद के सदस्यों का चुनाव नहीं हो पाया। जाहिर सी बात है कि जब महा-परिषद का गठन ही नहीं हो पाया तो कार्यकारी बोर्ड कैसे बनती, क्योंकि इसके कुछ सदस्य तो महा-परिषद के सदस्यों के बीच से ही चयनित होते हैं। महा-परिषद के नहीं होने से ललित कला अकादमी के कामकाज में पारदर्शिता नहीं दिखाई देती है। इनमें से ज्यादातर घटनाएं पूर्व संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के कार्यकाल में हुईं। सबसे दिलचस्प तो सुधाकर शर्मा का केस है। वो सचिव पद से कई बार हटाए और बहाल किए गए और आखिरकार जब वो रिटायर हुए तो सस्पेंड ही थे। स्वायत्ता के नाम पर अराजकता के उदाहरण के तौर पर ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों को देखा जा सकता है।   
ललित कला अकादमी में इन तमाम विवादों को देखते हुए संसद में 17 दिसंबर 2013 को सस्कृति मंत्रालय से संबद्ध स्थायी समिति रिपोर्ट का स्मरण हो रहा है। संस्कृति संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपने 201वें प्रतिवेदन में अकादमियों के संबंध में कहा था, ‘हमारे संस्थापकों ने संस्कृति को राजनीति से दूर रखने के लिए इन्हें स्वायत्ता दी थी, परंतु आज ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीति इसमें पिछले दरवाजे से गुपचुप तरीके से प्रवेश कर गई है। इन संस्थाओं के संस्थापकों को लेखकों और कलाकारों क समुदाय की एकता पर दृढ़ विश्वास था और आज वे इन संस्थाओं को बाधित करनेवाली समस्याओं का पूर्वानुमान नहीं लगा पाए। इसके परिणामस्वरूप प्रक्रिया में पारदर्शिता परिणाम से संबंध में जवाबदेही का अभाव है। वस्तुत: पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना उसकी स्वयत्ता एक दोधारी हथियार बन गई है जिसका कोई भी अरनी सुविधानुसार उपयोग कर सकता है। प्रशासनिक शब्दावली में जवाबदेही का अर्थ नियंत्रण नहीं है बल्कि वह जिम्मेदारी है जिसके लिए स्वयत्तता का प्रयोग किया जाना है।....संकट की यह स्थिति संस्कृति मंत्रालय की उदासीनता, ध्यान नहीं देने और कभी कभी असाहयता वाली भूमिका के कारण और भी गंभीर हो जाती है। मंत्रालय द्वारा उनके कार्यों में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोई तंत्र मौजूद नहीं है।‘ संसद की इस समिति ने अध्यक्ष और सचिव के बीच कार्य विभाजन को स्पष्ट करने पर भी बल दिया था क्योंकि इनके गठन के दस्तावेजों इन दोनों के अधिकारों की सीमा अस्पष्ट थी। इसका नतीजा यह होता था कि कई बार अध्यक्ष ऐसी शक्तियों का उपयोग करने की चेष्टा करते थे जो उनको प्राप्त नहीं होती है और वो रोजमर्रा के कामकाज में सीधे हस्तक्षेप करने लगते थे। ललित कला अकादमी में तो स्थिति बहुत विषम है। वहां तो लंबे समय से महा-परिषद या कार्यकारी परिषद है ही नहीं लिहाजा अराजकता ज्यादा है। अध्यक्ष के निर्देशों के कार्यान्वयित करवाने में किसी प्रकार की चूक या नियमों के उल्लंघन के लिए सचिव जिम्मेदार होते हैं इस वजह से बहुधा दोनों के बीच तनातनी चलती रहती है। ललित कला अकादमी के सचिव के बार-बार सस्पेंड होने की वजह ये भी हो सकती है। संगीत नाटक अकादमी में भी सचिव पर गाज गिरी ही थी। वहां की सचिव रही हेलेन आचार्य का मामला तो कोर्ट-कचहरी तक गया था। इस समिति ने सरकार को इन अकादमियों के संविधान में स्पष्टता लाने के लिए एक हाई पॉवर समिति बनाने को कहा था। समिति बनी भी। उसने मई 2014 में अपनी रिपोर्ट भी दे दी। रिपोर्ट में ललित कला अकादमी के अध्यक्ष का कार्यकाल पांच वर्ष से तीन वर्ष तक करने की सिफारिश की गई। साथ ही अध्यक्ष को लगातार दो कार्यकाल देने पर भी आपत्ति जताई गई थी। हाई पवॉर समिति कि सिफारिशों के आधार पर ललित कला अकादमी के नए नियमों को मंत्रालय ने 26 अप्रैल 2018 को अधिसूचित कर दिया जिसका प्रकाशन भारत के राजपत्र में 27 अप्रैल को हो गया। इस बात को भी सालभर से ज्यादा हो गए लेकिन अबतक ललित कला अकादमी के महा-परिषद का गठन नहीं हो पाया है। चेयरमैन ही वहां के सर्वेसर्वा हैं और कोई नियमित सचिव भी नहीं हैं। एक सचिव नियुक्त भी हुए थे लेकिन वो कुछ ही दिनों में इस्तीफा देकर चले गए। जाहिऱ सी बात है कि इन सबकी अनुपस्थिति में चेयरमैन को असीमित शक्तियां मिली हुई हैं।
केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद संस्कृति के क्षेत्र में बड़ी चुनौती है। अकादमियों की वजह से जिस तरह से विवाद उठ रहे हैं उसके पीछे कई वजहें हैं। कुछ संस्थानों में निदेशक ऐऔर चेयरमैन नहीं हैं जैसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में नियमित निदेशक का पद महीनों से खाली है और चेयरमैन भी नहीं है। अब वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार को एक ठोस संस्कृति नीति के बारे में विचार करना चाहिए। संस्कृति नीति के अभाव में इन सांस्कृतिक संस्थानों में तदर्थ आधार पर कामकाज हो रहा है। प्रह्लाद सिंह पटेल अनुभवी हैं और संस्कृति के क्षेत्र में रुचि लेते दिख भी रहे हैं तो उनसे ये अपेक्षा की जा सकती है कि वो देश की संस्कृति-नीति के निर्माण की दिशा में सकारात्मकता के साथ विचार करेंगे। इससे इन संस्थानों के काम-काज में तो पारदर्शिता आएगी ही भारतीय प्राच्य विद्या के संरक्षण और संवर्धन का काम भी गंभीरता से हो सकेगा।