Translate

Showing posts with label स्मृति ईरानी. Show all posts
Showing posts with label स्मृति ईरानी. Show all posts

Saturday, May 25, 2019

स्मृति की जीत से निकलते संदेश


ठीक से याद नहीं, पर घटना 21 या 22 मार्च 1977 की रात की है। उस रात हम अपने ननिहाल, बिहार के एक कस्बाई शहर जमालपुर के पास के गांव वलिपुर, में थे। देश से इमरजेंसी हटाई जा चुकी थी और चुनाव हो चुके थे। सबको चुनाव के नतीजों की प्रतीक्षा थी। चुनाव और उसके बाद के नतीजों को लेकर हमारे ननिहाल में भी खूब गहमागहमी थी। उस वक्त हमारी उम्र ककहरा सीखने की थी, राजनीति और उसकी भाषा बिल्कुल समझ नहीं आती थी, पर उत्सव का माहौल समझ आता था। चुनावी के उत्सवी माहौल में इतनी दिलचस्प बातें होती थीं कि मजा खूब आता था। रातभर रेडियो पर चुनावी नतीजे आते रहते थे। वो बैलेट का जमाना था और मतपत्रों की गिनती में तीन से चार दिन का समय लगता था। हमारे ननिहाल में एक बड़ा सा मरफी का रेडियो हुआ करता था। उसका एंटीना खपड़ैल के छज्जे में लगाया हुआ था। एंटीना काफी बड़ा था जिससे एक तार रेडियो तक आता था। कहने का मतलब ये है कि रेडियो को रखने का स्थान नियत था और उसको उधर उधर हटाया नहीं जा सकता था। रेडियो सुनने के लिए उसके पास जाना होता था। 21 या 22 मार्च की रात में रेडियो पर चुनाव के नतीजे आ रहे थे, गांव के काफी लोग वहां बैठे थे, किसी बड़े नतीजे की प्रतीक्षा में। रात ज्यादा होने से लोग ऊंघ भी रहे थे, अचानक रेडियो पर खबर आई कि इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गईं। इस खबर के बाद ऊंघ रहे लोगों की आंखें चमक उठीं, वो सभी खुशी में झूमते हुए शोर मचाने लगे, नारेबाजी होने लगी। पूरे गांव के लोग अपने अपने घरों से निकलकर सड़क पर आ गए। इस बीच किसी ने हमारे रेडियो की आवाज तेज कर दी थी। उसपर इंदिरा गांधी की हार की खबर के बाद एक गाना बजने लगा था- बरेली के बाजार में झुमका गिरा रे...। लोग उसपर झूमने लगे थे। इंदिरा गांधी को जनता पार्टी के उम्मीदवार और समाजवादी नेता राजनारायण ने करीब 55000 मतों से मात दी थी। उसी चुनाव में रायबरेली के बगल के संसदीय सीट अमेठी से इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी की हार भी हुई थी। गांधी परिवार के इन दो सदस्यों की हार आखिरी हार थी। उसके बाद के हुए सभी संसदीय चुनावों में गांधी परिवार के इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कोई हार नहीं हुई थी।
बयालीस साल बाद 23 मई को चुनाव के नतीजे आ रहे थे, शाम तक रुझानों से साफ हो गया था कि देश के मतदाताओं ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को प्रचंड बहुमत दे दिया है। सबकी निगाहें अमेठी पर जाकर टिक गई थीं। अमेठी से गांधी परिवार के राजनीतिक वारिस और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चुनाव मैदान में थे। वो यहां के अलावा केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़े थे। अमेठी में कांग्रेस अध्यक्ष के सामने थीं बीजेपी की फायरब्रांड युवा नेता और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी। वही स्मृति ईरानी जिसको राहुल गांधी 2014 के चुनाव में एक लाख से अधिक वोटों से मात दे चुके थे। इस बार के चुनाव नतीजों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार पिछड़ रहे थे। अब जमाना रेडियो का रहा नहीं था यहां तो चुनाव आयोग की साइट पर गिनती के हर चक्र के बाद अपडेट आ रहा था। वोटों का फासला बढञता जा रहा था। हर किसी के हाथ में मोबाइल और मोबाइल पर सोशल साइट्स से लेकर न्यूज वेबसाइट्स पर पल-पल की जानकारी आ रही थी। देशभर के रुझान और नतीजे आने शुरू हो गए थे लेकिन अमेठी के नतीजे में देर हो रही थी। नतीजा आने के पहले ही शाम करीब साढे पांच बजे राहुल गांधी ने अमेठी लोकसभा क्षेत्र से अपनी हार सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर ली थी और स्मृति ईरानी को शुभकामनाएं दे दी थीं। स्मृति ने भी अपने ट्वीट से ये संकेत दे दिया था वो जीत गई हैं। उन्होंने मशहूर शायर दुष्यंत कुमार की एक पंक्ति उद्धृत की थी- ‘कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता’। रात करीब साढे ग्यारह बजे ये खबर आई कि राहुल गांधी को स्मृति ईरानी ने हरा दिया। तकनीक के उन्नत होने और लगातार जानकारी मिलने के बावजूद उत्सकुता में तो कमी नहीं हुई थी, लेकिन राहुल गांधी की हार के बाद कोई गाना नहीं बजा। मुझे 1977 की घटना याद थी इसलिए मैं ऑल इंडिया रेडियो भी सुन रहा था। मैं देखना चाहता था कि रेडियो पर क्या होता है। रेडियो ने सिर्फ खबर दी। इस नतीजे के बाद अमेठी में लोग झूमे, भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जश्न भी मनाया।  
स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को करीब 55000 वोटों से शिकस्त दी। यहां याद दिला दें कि करीब इतने ही मतों से इंदिरा जी भी रायबरेली हारी थीं। इसके अलावा भी कई समानताएं इन दोनों चुनावों में देखी जा सकती हैं। 1971 में राजनारायण जब इंदिरा गांधी से हारे थे तब उन्होंने कहा था कि रायबरेली की जनता का प्यार उनको मिला है और इसी धरती से वो इंदिरा गांधी को हराएंगे। कुछ ऐसा ही बयान स्मृति ईरानी ने भी 2014 में अमेठी में अपनी हार के बाद दिया था। 1977 के चुनाव में रायबरेली में जो हुआ लगभग वही 2019 के चुनाव में अमेठी में दोहराया गया। एक ताकतवर और नामदार उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा। पर अगर 2019 में अमेठी में राहुल गांधी की हार और 1977 में रायबरेली में इंदिरा गांधी की हार की तुलना करें तो ऐसा लगता है कि राहुल को हराना ज्यादा मुश्किल था। 1977 में इंदिरा गांधी के खिलाफ देशभर में गुस्सा था। लोग इमरजेंसी लगाए जाने को लेकर उनसे बेहद खफा थे। उनके खिलाफ पूरा विपक्ष लामबंद था, सीपीआई को छोड़कर। सीपीआई चूंकि इमरजेंसी में कांग्रेस के साथ थी इस वजह से वो चुनाव में भी इंदिरा जी के समर्थन में खड़ी थी। फासीवाद और तानाशाही की बात करनेवाली इस पार्टी का चाल, चरित्र और चेहरा देश की जनता ने इमरजेंसी के दौरान देख लिया था। इस बार पूरा विपक्ष राहुल गांधी के साथ था। राहुल गांधी को अखिलेश और मायावती के महागठबंधन का समर्थन हासिल था। अमेठी में मतदान के चंद दिनों पहले मायावती ने अपने कॉडर को राहुल गांधी को वोट करने के निर्देश दिए थे। स्मृति का राहुल से सीधा मुकाबला था। इसबार तो वहां से आम आदमी पार्टी का भी कोई उम्मीदवार नहीं था। 2014 के चुनाव में तो कुमार विश्वास भी अमेठी से चुनाव लड़े थे। सीधे मुकाबले में पारिवारिक गढ़ को ध्वस्त करना टेढी खीर था। स्मृति ने वो कर दिखाया।
अमेठी के चुनाव नतीजे ने इस धाऱणा को और पुष्ट किया है कि इस बार के चुनाव में देश के मतदाता ने बहुत समझदारी के साथ वोट किया। वो जात-पात की जकड़न से तो मुक्त हुआ ही, वोटरों ने अब अपने और अपने क्षेत्र के हितों की रक्षा करनेवाले उम्मीदवारों पर भरोसा जताकर भारतीय लोकतंत्र के मजबूत और मैच्योर होने के संकेत भी दे दिए। तमाम तरह के समीकरणों के आधार पर चुनाव लड़ने और जीतनेवालों को हार का मुंह देखना पड़ा। अमेठी की जनता ने ये भी बता दिया कि अगर आपको राजनीति करनी है तो आपको मेहनत करनी होगी। आपको जनता के साथ खड़े रहना होगा। यही मानदंड काम आएगा। कुछ विश्लेषकों ने मोदी पर ये आरोप लगाया कि वो चुनाव में सेना के पराक्रम का फायदा उठा रहे हैं। सेना ने पाकिस्तान में घुसकर आतंकवादी ठिकानों पर हमले किए थे, उसका श्रेय ले रहे हैं। जिसका मकसद लोकसभा चुनाव में फायदा उठाना है। कांग्रेस ने भी बालाकोट हमले को चुनावी मुद्दा बनाने को लेकर मोदी को घेरने की कोशिश की थी। पर कांग्रेस के लोग ये भूल गए कि 1972 के विधानसभा चुनाव के पहले इंदिरा गांधी का देश की जनता के नाम लिखा एक पत्र देशभर के समाचार पत्रों में विज्ञापन के रूप में छपा था। 10 मार्च 1972 को छपे इस विज्ञापन में इंदिरा गांधी ने देश की जनता को बांग्लादेश में पाकिस्तान पर विजय की याद दिलाई थी। बांग्लादेशी रिफ्यूजियों के उनके देश लौटाने की बात बताई गई थी। इसके साथ ही इंदिरा गांधी ने उस खतनुमा विज्ञापन में वोटरों से उनकी पार्टी को भारी बहुमत से विधानसभा चुनाव में विजयी बनाने की अपील भी की थी। जनता ने उस चुनाव में उनकी पार्टी को भारी बहुमत दिया। चुनाव में राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर इंदिरा गांधी ने फायदा उठाया था। पर अमेठी में तो जब छठे चरण में वोट डाले जा रहे थे तबतक बालाकोट का मुद्दा भी नेपथ्य में जा चुका था। अब चुनाव खत्म हो चुके हैं, नतीजा आ गया है। प्रतीत ये होता है कि अमेठी के चुनाव नतीजे का असर कांग्रेस पार्टी पर दिखाई देगा। कैसे? ये समय के गर्भ में है।

Saturday, October 27, 2018

संस्कृति को अज्ञानता की चुनौती


आधीरात को सीबीआई के निदेशक और विशेष निदेशक को छुट्टी पर भेजे जाने के केंद्र सरकार के फैसले के बाद जिस तरह का घटनाक्रम चला उसमें एक महत्वपूर्ण बहस दब गई। केंद्र सरकार के इस फैसले के ठीक पहले केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने मुंबई में एक बयान दिया था जो सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के संदर्भ में था। स्मृति ईरानी ने कहा कि उनका इस बात में विश्वास है कि उनको प्रार्थना या पूजा का अधिकार है लेकिन अपवित्र करने का अधिकार नहीं है।अपनी इस बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने यह भी सवाल पूछा था कि क्या कोई रजस्वला स्त्री अपने दोस्त के घर सैनिटरी नैपकिन लेकर जाती है। ईरानी की पूरी बात को समग्रता में समझे बगैर उसपर हंगामा मचा दिया गया। खुद को प्रगतिशील कहनेवाली चंद महिलाओं ने इस बयान को इस तरह के पेश किया जैसे कि रजस्वला स्त्री को अपवित्र कहा जा रहा है। ये किसी भी बात को संदर्भ से काटकर पेश करने का नमूना था। संदर्भ सबरीमला मंदिर का था जहां से इस तरह की खबरें आ रही थीं कि कुछ महिला कार्यकर्ता सैनिटरी नैपकिन लेकर मंदिर में प्रवेश करने की जुगत में थीं। दरअसल सबरीमला मंदिर को लेकर यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही थी कि वहां 10 से 50 साल की किशोरियों और महिलाओं को प्रवेश नहीं होता था। लेकिन 28 सितंबर के अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी आयुवर्ग की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की इजाजत दे दी थी। उसके बाद से मंदिर में प्रवेश को लेकर केरल में काफी विवाद हो रहा है। मंदिर में प्रवेश को लेकर ये विवाद काफी लंबे समय से चल रहा है, माना यह जाता रहा है कि इस तय आयुवर्ग में किशोरियां और महिलाएं रजस्वला हो जाती हैं तो उस दौर में मंदिर में ही नहीं जाना चाहिए। अब इसको परंपरा कह लें या रूढ़ियां कि ये आम भारतीय परिवारों में माना जाता है कि रजस्वला स्त्रियां पूजा पाठ नहीं करती हैं। स्त्रियां इसको स्वयं मानती हैं और उन दिनों में उसी के अनुसार काम करती हैं। दरअसल परंपरा और रूढ़ियों से ज्यादा ये मसला संस्कार और संस्कृति का है।   
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद महिला अधिकारों के झंडाबरदार काफी आगे चली गईं। उनको लगने लगा कि ये महिला अधिकारों का हनन है, स्त्री स्वातंत्र्य का गला घोंटा जा रहा है। उनको अगर ये महसूस हो रहा है तो यह उनका अधिकार है, लेकिन भारतीय समाज में स्त्रियों के जो संस्कार हैं या उनके त्याग के जो उदाहरण हैं वो अप्रतिम हैं। वो अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए अपने अंग तक काट सकती हैं और कई उदाहरण तो ऐसे हैं कि स्त्रियों ने अपने प्राण भी त्याग दिए। पौराणिक कथा है जिसको देखा जाना आवश्यक है। कहानी के मुताबिक उत्तरापथ जनपद में उत्पलावती नाम का एक शहर था। उस शहर में भयंकर अकाल की वजह से लोगों का जीना कठिन हो गया था, भोजन मिलना अत्यंत मुश्किल था। उस दौर में वहां रूपावती नाम की एक बेहद सुंदर स्त्री रहती थी। एक बार रूपावती शहर घूमने निकली और घूमते घूमते एक घर में पहुंची जहां एक स्त्री ने बच्चे को जन्म दिया था। जन्म देनीवाली स्त्री इतनी भूखी थी कि उसने अपने जन्म दिए हुए बच्चे को ही खाने की इच्छा जताई। यह जानकर रूपावती ने उससे पूछा कि ये क्या कर रही हो। उस स्त्री ने कहा कि बहुत भूखी हूं इस वजह से अपने बच्चे के मांस से ही भूख मिटाना चाहती हूं। रूपावती ने फिर पूछा कि क्या तुम्हारे घर में अन्न नहीं है, क्या क्योंकि संतान तो दुर्लभ होती है। स्त्री ने रूपावती को उत्तर दिया कि मेरे घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं है और संसार में सबसे दुर्लभ तो जीवन है। रूपावती उसको भरोसा देती है कि वो अपने घर जाकर खाने का कुछ सामान लेकर आती है, लेकिन वो स्त्री भूख से इतनी व्याकुल थी कि उसने कहा कि जब तक तुम घर जाकर खाना लाओगी तबतक मेरी मृत्यु हो जाएगी। अब रूपावती के सामने संकट था। वो सोच रही थी कि अगर बच्चे को लेकर गई तो स्त्री भूख से मर जाएगी और अगर बच्चे को छोड़कर गई तो ये स्त्री उसको खा लेगी। उसी वक्त रूपावती सोचती है कि अगर वो अपने आत्मतेज, बल और उत्साह का सहारा लेकर इस स्त्री को अपने मांस से तृप्त कर दे तो दोनों की जान बच जाएगी। रूपावती ने उस स्त्री से पूछा कि तुम्हारे घर में कोई हथियार है। उस स्त्री ने उसको वह जगह बताई जहां कटार रखी थी। रूपावती ने उस तीखी कटार से अपने दोनों स्तन काटकर उस स्त्री को रक्त और मांस से तृप्त कर दिया। उसके बाद रूपावती ने उस स्त्री से वादा लिया कि वो जबतक अपने घर से उसके लिए खाने का सामान लेकर आती है तबतक वो अपने बच्चे को सुरक्षित रखेगी। रूपावती अपने घर पहुंची को उसके शरीर से रक्त बहता देख पति ने पूछा कि क्या हुआ तो उसने पूरा वाकया बताया और अनुरोध किया कि खाना लेकर उसके घर जाओ।
यह सुनकर उसके पति ने कहा कि भोजन लेकर तो तुम ही जाओगी। रूपावती के पति ने सत्य की शपथ की और कहा कि तेरे जिस सत्य वचन से इस प्रकार का आश्चर्यमय अभूतपूर्व धर्म हुआ है वह कभी ना तो देखा गया और ना ही कभी सुना गया। उस सत्य की महिमा से तेरे दोनों स्तन पूर्ववत हो जाएं। सत्य के शपथ के उच्चारण के साथ ही महिला के दोनों स्तन पूर्ववत हो गए। कहा जाता है कि रूपावती के इस त्याग को देखकर इंद्र का सिंहासन भी हिल उठा था। इंद्र भेष बदलकर रूपावती के मन की थाह लेने पहुंचे और पूछा कि तुम्हारे मन में क्या विचार आए थे जो तुमने ऐसा किया। रूपावती ने कहा कि उसने उसने जो किया वो न तो राज्य के लिए, न भोगों के लिए , न इंद्रपद के लिए और न चक्रवर्ती राजाओं जैसे साम्राज्य के लिए था।
दरअसल सच्चे कार्यकर्ता का जो त्याग होता है उसका ध्येय यही होता है कि जो बंधन में हैं वो बंधन मुक्त हो जाएं, जो निराश हैं उनके अंदर आशा का संचार हो और मुष्य के अंदर के दुख को समाप्त किया जाए। उसके लिए भाव महत्वपूर्ण हैं।
भारतीय संस्कृति में भाव बेहद महत्वपूर्ण हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भी इस भाव को देखा जाना आवश्यक है और मुझे तो कई बार लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय को अपने फैसले के बाद इन घटनाओं पर भी नजर रखना चाहिए। होना ह चाहिए कि कोर्ट के फैसले के बाद कोई रजस्वला स्त्री अगर चाहे जो जाए और पूजा और दर्शन करके लौट आए। यही भाव होना चाहिए। अपने रजस्वला होने का प्रदर्शन करते हुए पूजा करने जाना तो मंशा पर सवाल खड़े करता ही है। जब कोई स्त्री अपने रसजस्वला होने का प्रदर्शन कर मंदिर जा रही होती तो उसका भाव पूजा का या भगवान के दर्शन का नहीं होता है बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि वो प्रदर्शन के लिए जा रही हैं। स्मृति ईरानी का बयान इसी भाव को ध्यान में रखकर दिया गया प्रतीक होता है। उन्होंने तो इस बयान के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किए। उनके बयान को छद्म-प्रगतिशीलता के आईने में देखा गया और बेवजह वितंडा खड़ा करने की कोशिश की गई। अगर बयान के भाव को समझा गया होता, अगर भारतीय संस्कृति और संस्कार का ध्यान रखा जाता तो इस तरह से विवाद खड़ा नहीं होता। विवाद खड़ा के लिए आवश्यक था कि बयान के साथ साथ पूरे मसले को इस तरह से पेश किया जाए कि इससे स्त्री का अपमान हुआ है। और यह कोई नई बात नहीं है, इस तरह से भारतीय संस्कृति को नीचा दिखाने की पहले भी कोशिश हुई है। स्मृति ने कहीं ऐसा नहीं कहा कि मंदिर में रजस्वला स्त्री को नहीं जाना चाहिए। उसने कहीं नहीं कहा कि रजस्वला स्त्री अपवित्र होती है लेकिन इसको प्रचारित इसी तरह से किया गया। स्त्री को अधिकार दिलाने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाई जाए, सैकडों सालों से चली आ रही मान्यताओं पर प्रहार किया जाए। कुरीतियों पर प्रहार जरूरी है लेकिन कुरीति, रूढ़ी और परंपरा में अंतर है और इस अंतर को जब प्रगतिशीलता का झंडा उठानेवाले लोग समझ जाएंगें तो इस तरह के अज्ञानतापूर्ण विवाद खड़े नहीं होंगे।

Saturday, August 19, 2017

एक्ट में बदलाव से बदलेगी सूरत

हाल ही में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड जिसे आमतौर पर लोग सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं, का पुर्नगठन किया गया और अध्यक्ष समेत कई सदस्यों को बदला गया। हटाए गए अध्यक्ष पहलाज निहलानी के कार्यकाल में फिल्मों के सेंसरशिप को लेकर काफी हो हल्ला मचता रहा। उनके विवादास्पद बयानों ने भी उनके विरोधियों को काफी मसाला दे दिया। बोर्ड के अंदर ही सदस्यों के बीच मतभेद शुरू हो गए थे। दरअसल पहलाज निहलानी ने सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनते ही ऐसे काम शुरू कर दिए किए कि बोर्ड तो को संस्कारी बोर्ड कहा जाने लगा था। सेंसर बोर्ड ने जब जेम्स बांड की फिल्म में कांट-छांट की थी तो संस्कारी बोर्ड हैश टैग के साथ कई दिनों तक वो मसला ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा था । फिल्म में चुंबन के दृश्य पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली थी । उस वक्त पहलाज निहलानी का तर्क था कि भारतीय समाज के लिए लंबे किसिंग सीन उचित नहीं हैं और उन्होंने आधे से ज्यादा इस तरह के सीन को हटवा दिया था । बांड की फिल्म में कट लगाने के बाद पूरी दुनिया में सेंसर बोर्ड और उसके अध्यक्ष की फजीहत हुई थी । अभी हाल ही में प्रकाश झा की फिल्म लिपस्टिक अंडर बुर्का को लेकर भी काफी विवाद हुआ। विवादित फिल्मों की काफी लंबी सूची है। अब जब सेंसर बोर्ड का नए सिरे से गठन किया गया है और प्रसून जोशी को उसका अध्यक्ष बनाया गया है तो फिल्मकारों को उम्मीद जगी है कि अब उनका काम आसान होगा। पर क्या सच में यह इतना आसान है। क्या फिल्मों पर कैंची चलनी रुक जाएगी। शायद नहीं।
नवगठित बोर्ड में दोबारा नामित वाणी त्रिपाठी के बयानों से लगता है कि जबतक सिनेमेटोग्राफी एक्ट में बदलाव नहीं किया जाएगा तो बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है। वाणी त्रिपाठी जिस ओर इशारा कर रही हैं उसपर विचार करना बहुत आवश्यक है । सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) को देखे जाने की जरूरत है। इस धारा के अंतर्गत बोर्ड के सदस्यों को यह छूट मिलती है कि वो शब्दों को अपने तरीके से व्याख्यायित कर सकें । इस धारा के मुताबिक - किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए । मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं – पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए । अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है । अब नए बोर्ड में ही अगर हम देखें तो प्रसून और वाणी के लिए शालीनता और नैतिकता की परिभाषा अलग हो सकती है वहीं नरेन्द्र कोहली की व्य़ाख्या इनसे अलग हो सकती है। और यहीं से मतभेद और विवाद की शुरुआत होती है।
इस एक्ट के तहत सालों से विवाद होते रहे हैं । उन्नीस सौ तेहत्तर में बी के आदर्श की फिल्म ‘गुप्त ज्ञान’ को लेकर काफी बवाल मचा था । तत्कालीन बोर्ड के कई सदस्यों को लग रहा था कि ये जनता की यौन भावनाओं को भड़का कर पैसा कमाने के लिए बनाई गई फिल्म है जबकि निर्माताओं का तर्क था था वो समाज को शिक्षित करना चाहते हैं । लंबी बहस के बाद ‘गुप्त ज्ञान’ को बगैर किसी काट छांट के प्रदर्शन की इजाजत तो दी गई थी।  फिल्म के प्रदर्शन के बाद उसके अंतरंग दृष्यों को लेकर इतनी आलोचना हुई कि चंद महीने में ही उसको सिनेमाघरों से वापस लेना पड़ा था । उन्नीस सौ चौरानवे में दस्यु सुंदरी फूलन देवी की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में भी स्त्री देह की नग्नता को लॉंग शॉट में ही दिखाने की इजाजत दी गई थी । फिल्म ‘फायर’ से लेकर ‘डर्टी पिक्चर’ तक पर अच्छा खासा विवाद हुआ लेकिन सेंसर बोर्ड ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया था । फिल्म ‘12 इयर्स अ स्लेव’ में गुलामों के अत्याचार के नाम पर नग्नतापूर्ण दृश्यों की इजाजत देना हैरान करनेवाला था । जब दो हजार में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सीईओ घूसखोरी के आरोप में सीबीआई के हत्थे चढ़े तो स्थितियां साफ होने लगी थीं कि किस वजह से मानदंड को अलग अलग तरीके से किसी के हक में इस्तेमाल किया जाता है। सीईओ की गिरफ्तारी के बाद कई सुपरस्टार्स और निर्देशकों ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उनको अपनी फिल्मों में गानों को पास करवाने के लिए घूस देना पड़ा था । एक सेंसर बोर्ड सैफ अली की फिल्म ‘ओमकारा’ में गालियों के प्रयोग की इजाजत देता है तो दूसरा सेंसर बोर्ड प्रकाश झा की फिल्म में गाली हटाने को कहता है ।फिल्म प्रमाणन बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद भ्रम है । फिल्मों को सर्टिफिकेट देने की गड़बड़ी शुरू होती है क्षेत्रीय स्तर की कमेटियों से जहां वैसे लोगों का चयन होता है जिनको सिनेमा की गहरी समझ नहीं होती है । इसके बाद फिल्म प्रमाणन बोर्ड में भी कई स्तर होते हैं और एक्ट के शब्दों को अपनी तरह से व्याख्यित कर अध्यक्ष अपनी मनमानी चलाते हैं ।
वाणी त्रिपाठी इस बात को जोर देकर कहती हैं कि फिल्म प्रमाणन बोर्ड में सुधार के लिए श्याम बेनेगल समिति की सिफारिशों को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए। अरुण जेटली जब सूचना और प्रसारण मंत्री थे तब श्याम बेनेगल की अध्क्षता में एक समिति बनाई थी। इस समिति में राकेश ओमप्रकाश मेहरा और पियूष पाडें सदस्य थे। सीबीएफसी में सुधारों को लेकर इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी लेकिन उसको लागू नहीं किया जा सका है।जहां तक ज्ञात हुआ है कि श्याम बेनेगल समिति ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया में बदलाव की सिफारिश की थी । यह भी कहा जा रहा है कि बेनेगल कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक अब इस संस्था को सिर्फ फिल्मों के वर्गीकरण का अधिकार रहना चाहिए । वो फिल्म को देखे और उसको किस तरह के यू , ए या फिर यूए सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए, इसका फैसला करे । इस सिफारिश को अगर मान लिया जाता है तो फिल्म सेंसर के इतिहास में बदलाव की शुरुआत हो सकेगी। सूचना और प्रसारण मंत्रालय संभालने के बाद जिस तरह से स्मृति ईरानी ने फिल्म प्रमाणन बोर्ड से लेकर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की आयोजन से जुड़ी समितियों में बदलाव किया है उससे उम्मीद जगी है कि बेनेगल समिति की सिफारिशों को लागू किया जा सकेगा। फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सदस्य ही बेनेगल समिति की सिफारिशों को लेकर उत्साहित हैं तो संभव है कि उसको लागू करने का प्रक्रिया में तेजी आए। बेनेगल कमेटी की सिफारिशों को लागू करते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसमें भी सिनेमेटोग्राफिक एक्ट की धारा 5 बी(1) का ख्याल रखने की सलाह दी गई है। सारी समस्या की जड़ में तो यही धारा है ।
यह भी ज्ञात हुआ है कि बेनेगल समिति की सिफारिशों के मुताबिक फिल्मकारों के लिए ये बताना जरूरी होगा कि वो किस श्रेणी की फिल्म बनाकर लाए हैं और उन्हें किस श्रेणी में सर्टिफिकेट चाहिए । उसके बाद सीबीएफसी के सदस्य फिल्म को देखकर तय करेंगे कि फिल्मकार का आवेदन सही है या उनके वर्गीकरण में बदलाव की गुंजाइश है । उसके आधार पर ही फिल्म को सर्टिफिकेट मिलेगा । बेनेगल कमेटी ने अपनी सिफारिशों में फिल्मों के वर्गीकरण का दायरा और बढा दिया गया है । यू के अलावा यूए श्रेणी को दो हिस्सों में बांटने की सलाह दी गई है । पहली यूए + 12 और यूए +15 । इसी तरह से ए कैटेगरी को भी दो हिस्सों में बांटा गया है । ए और ए सी । ए सी यानि कि एडल्ट विद कॉशन । इसके अलावा कमेटी ने बोर्ड के कामकाज में सुधार के लिए भी सिफारिश की है । उन्होंने सुझाया है कि बोर्ड के चेयरमैन समेत सभी सदस्य फिल्म प्रमाणन के दैनिक कामकाज से खुद को अलग रखेंगे और इस काम की रहनुमाई करेंगे । पहलाज निहलानी के साथ एक दिक्कत यह भी थी कि वो रोजाना बोर्ड के दफ्तर में बैठते थे और हर छोटे बड़े फैसलों को लेकर बयान देने के लिए उपलब्ध रहते थे। अबतक की छवि के मुताबिक प्रसून जोशी बेहद संजीदगी से काम करते हैं और विवादों से दूर रहते हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके कार्यकाल में विवादित बयान कम आएंगे लेकिन फिल्मों पर कैंची चलनी कम हो जाएगी यह उम्मीद तबतक बेमानी है जबतक कि बेनेगल कमेटी की सिफारिशों को सुधारों के साथ लागू नहीं कर दिया जाता है ।