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Wednesday, July 13, 2011

'सांस्कृतिक क्रांति' पर बवाल

चौथी दुनिया के अपने स्तंभ में कुछ दिन पहले मैंने बिहार सरकार के कला और संसकृति मंत्रालय के कॉफी टेबल बुक बिहार विहार के बहाने सूबे में सांस्कृतिक संगठनों की सक्रियता, उसमें आ रहे बदलाव और सरकारी स्तर पर उसके प्रयास की चर्चा की थी । अपने उस लेख में मैंने बिहार सरकार के हाल-फिलहाल में किए गए कामों को रेखांकित करते हुए लालू-राबड़ी राज को इन कला और सांस्कृतिक संस्थाओं की दुर्गति के लिए जिम्मेदार ठहराया था । मेरे इस लेख पर कई लोगों को सख्त आपत्ति है । उस लेख के जबाव में कई लेख लिखे गए । लेख के बहाने मुझ पर व्यक्तिगत टिप्पणियां की गई । लेकिन प्रतिलेख लिखनेवाले विद्वतजनों ने अपनी आपत्ति में जो तर्क दिए वो उनकी विद्वता के अनुकूल नहीं है । मेरे लेख की जबाव में लिखा गया लेख चूंकि प्रतिक्रिया में लिखे गए हैं इसलिए वो हल्के हैं । हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है लेकिन जब प्रतिक्रिया में बदले की भावना और वयक्तिगत राग-द्वेष शामिल हो जाए तो वह नरेन्द्र मोदी वाली प्रतिक्रिया हो जाती है । लोगों ने मुझपर ये भी आरोप लगाए कि मैं अपनी सवर्ण ग्रंथि के तहत लालू यादव को बिहार की बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराता हूं और नीतीश कुमार को उसी ग्रंथि के तहत शीर्ष पर पहुंचाता हूं । लालू यादव के बारे में लिखी गई मेरी टिप्पणी से वो इतने आहत हो गए कि उनलोगों ने यह भी पता लगा लिया कि मैं कितने पानी में हूं । मेरे लेख को सावधानी के पढ़े बगैर मेरी जाति और मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर राय बना लेनेवाले इन विद्वानों की समझ पर सिर्फ मुस्कुराया जा सकता है । हंसी तो कतई नहीं आती । बिहार में लालू यादव के शासनकाल के दौरान सूबे की क्या दुर्गति हुई थी इस बारे में किसी को कुछ कहने की या कुछ साबित करने की जरूरत ही नहीं है । जिस तरह से हर साल कोसी में बाढ़ आती है और पूरे इलाके में तबाही मचा देती है उसी तरह सरकारी विभागों में चारा,अलकतरा, बीएड घोटालों की बाढ़ ने पूरे सूबे के विकास की राह को तबाह कर दिया था । क्या लालू यादव की जय जयकार करनावालों को यह बताने की जरूरत है कि लालू-राबड़ी शासनकाल के दौरान बिहार में ग्रोथ रेट कहां से कहां तक पहुच गया था । क्या उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि किस तरह से सूबे के अफसरों को खुलेआम उनके दफ्तर में घुसकर उनके साथ बदतमीजी की जाती थी । क्या उन्हें यह याद दिलाना पड़ेगा कि लालू के राज में अपहरण एक उद्योग में तब्दील हो चुका था । क्या उन्हें यह भी याद दिलाना होगा कि लालू की शह पर शहाबुद्दीन जैसे नेता बिहार में फल फूल रहे थे । क्या उन्हें यह भी याद दिलाना होगा कि उन पंद्रह सालों में अस्पतालों से डॉक्टर, स्कूल से शिक्षक और दफ्तरों से बाबू गायब रहा करते थे । क्या उन्हें यह भी याद नहीं कि पंद्रह साल में बिहार में परिवहन वयवस्था चंद चुनिंदा लोगों की बपौती बनकर रह गई । बिहार परिवहन निगम की खूबसूरत इमारत खंडहर में तब्दील हो गई। उस वक्त के कानून व्यवस्था की बात करने से शरीर में सिहरन हो जाती है । लालू यादव के शासन काल में बिहार सिर्फ निगेटिव ग्रोथ और छवि हासिल कर पाया । जिन लोगों लालू यादव सामजिक क्रांति के मसीहा और समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों के मसीहा नगर आते हैं उनको मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि उन दबे कुचलों ने ही उनको सत्ता से च्युत कर दिया । शासन सिर्फ नारों और जुमलों और मसखरेपन से नहीं चलता । उसके लिए ठोस कार्य और अहम फैसले करने होते हैं । दरअसल लालू यादव के बिहार विधानसभा में करारी हार के बाद कुछ लोगों को लालू में अपना भविष्य नजर आने लगा है और वो उनमें संभावना तलाशने लगे है। अब अगर मैं ये कहूं कि उनकी जातिवादी मानसिकता उनको ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है तो मैं भी उसी ग्रंथिदोष का शिकार हो जाऊंगा जिसका आरोप मुझपर लगाया गया है ।
मेरे उस लेख की प्रतिक्रिया में जिसतरह से बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह और बाबा साहब भीराव अंबेडकर का उल्लेख किया गया वो भी बेहद हास्यास्पद और मनोरंजक है । उसपर मैं कुछ नहीं कहना चाहता ।
दूसरी बात जो साबित करने की कोशिश की गई वो यह कि लालू यादव के शासनकाल में बिहार में जमकर सांस्कृतिक गतिविधियां होती थी । इस क्रम में यह बताया गया कि लालू यादव के समय में बिहार विधान परिषद की साहित्यिक गतिविधियां ‘सुगढ़’ फ थी । इस सुगढ़ता के लिए दो उदाहरण दिए गए–एक तो उस वक्त की परिषद पत्रिका साक्ष्य और संवाद राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो रही थी । अब इस कथन का क्या किया जाए । राष्ट्रीय स्तर की तो बात छोड़िए मैं तो सिर्फ इतना कह सकता हूं कि ये पत्रिकाएं अब भी साहित्यिक हलके में अपनी जगह और पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही हैं । जाबिर हुसैन हमारे मित्र हैं, मैं भी उन पत्रिकाओं को लगातार देखता रहा हूं । लेकिन राष्ट्रीय लोकप्रियता का कथन अति उत्साह में दिया गया प्रतीत होता है। दूसरे ये कि विधान परिषद में राजेन्द्र यादव, गुलजार, सीताराम येचुरी जैसे बौद्धिक वहां की गतिविधियों में शामिल होते थे । ये सच है कि जाबिर हुसैन के बिहार विधानसभा के सभापति रहते परिषद में कुछ साहित्यिक गतिविधियां हुई थी । उसकी तारीफ भी हुई थी । खुद जाबिर हुसैन की किताब पर लिखते हुए मैंने भी उनकी साहित्यिक सक्रियता को सराहा था । लेकिन क्या उतना भर ही काफी है । क्या मुझपर आरोप लगानेवाले यह जानते हैं कि उस वक्त कला और संसकृति मंत्री कौन थे या फिर उस मंत्रालय की पहल पर क्या सार्वजनिक कार्य किए गए ।
दिल्ली के एक समाजवादी कवि-उपन्यासकार ने भी फोन करके मुझसे बहस की । उनकी पहली लाइन थी – बेबसाइट्स पर चौथी दुनिया में छपे आपके लेख पर खूब बहस हो रही है । मैंने पढ़ा नहीं है लेकिन जैसा कि लोगों ने मुझे बताया कि आपने बिहार की सांस्कृतिक हलचल पर लिखा है । पहले तो वो फेसबुक पर लिखत-पढ़त में बहस करना चाहते थे लेकिन बाद में मौखिक बहस हुई । उनका कहना था कि बिहार की अकादमियां बहुत बुरे हाल में है । मैं उनकी राय से सौ फीसदी सहमत हूं । अकादमियों की हालत बुरी है । लेकिन फिर से मैं उसी तर्क पर लौटता हूं कि वर्तमान हालत को पिछले शासनकाल के बरक्श रखकर देखिए आपको हकीकत का पता चल जाएगा । क्या उन अकादमियों की बेहतरी की दिशा में सोचा नहीं जा रहा । क्या उनके कर्मचारियों के वेतन और अन्य सुविधाओं के बारे में सरकार ने धन मुहैया कराने की कार्ययोजना नहीं बनाई । उनको सक्रिय करने की दिशा में पहल नहीं हो रही । ये सच है कि बिहार सरकार की प्राथमिकता में कला संस्कृति नहीं है । लेकिन ये प्राथमिकता तो किसी भी सरकार की नहीं रही है और ना ही आगे रहेगी । हिंदी के नाम पर राजनीति करनेवालों को यह भी याद नहीं कि विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन होता है । हम सिर्फ बिहार की अकादमियों के बारे में ही क्यों सोचते हैं । आप देशभर की अकादमियों की तफ्तीश करके देख लीजिए- कमोबेश हर जगह आपको एक जैसे हालात नजर आएंगे । लेकिन इस तर्क पर बिहार के अकादमियों की बदहाली को जायज नहीं ठहराया जा सकता है । बिहार सरकार की कला और संस्कृति मंत्रालय की इस बात के लिए तो सराहना करनी ही चाहिए कि उसने सुधार की दिशा में कदम उठाए हैं । कवि मित्र मुझे यह भी समझाने की कोशिश करने लगे कि वो बिहार की मंत्री सुखदा पांडे की समझ को जानते हैं और उनसे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है । मैंने उनसे निवेदन भी किया कि किसी की वयक्तिगत क्षमता को उसकी विचारधारा के आधार पर नहीं बल्कि उसके काम के आधार पर आंका जाना चाहिए । लेकिन उनका गुस्सा चरम पर था और वो कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं थे और वही संवाद टूटने की वजह बना । बातचीत खत्म होने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि उन्होंने तो बगैर मेरे लेख को पढ़े किसी के कहने के आधार पर अपनी राय बना ली । खैर हिंदी की दुर्दशा के लिए यही चीज- बिना पढ़े राय बनाना- बहुत हद तक जिम्मेदार है ।
अंत में सिर्फ इतनी बात कहना चाहूंगा कि किसी विचार पर सार्थक बहस हो, तर्कों का सहारा लेकर एक दूसरे पर हमले हों। लेकिन लेखन में एक न्यूनतम मर्यादा का पालन तो हो । आजकल बेवसाइट पर हर किसी को गाली गलौच करने और व्यक्तिगत जीवन पर कीचड़ उछालने की हासिल छूट को जो बेजा इस्तेमाल हो रहा है वो चिंता की बात है । मैं उस तरह के लोगों का नाम लेकर उनको वैधता नहीं प्रदान करना चाहता लेकिन उन कुंठित लोगों के बारे में हिंदी समाज को गंभीरता से सोचना होगा, नहीं तो आनेवाले दिनों में ये लंपटई हम सब पर भारी पड़ सकती है ।

Tuesday, July 12, 2011

बिहार में 'सांस्कृतिक क्रांति'

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मशहूर किताब संस्कृति के चार अध्याय में कहा है कि – विद्रोह, क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका विस्फोट अचानक होता है । घाव भी फूटने के पहले बहुत दिनों तक पकता रहता है । दिनकर जी की ये पंक्तियां उनके अपने गृह राज्य पर भी पूरी तरह से लागू होती है। बिहार में लालू यादव और उनकी पत्नी श्रीमती रावड़ी देवी के तकरीबन डेढ दशक के शासन काल में सूबे की सारी संस्थाएं एक एक कर नष्ट होती चली गई या फिर प्रयासपूर्वक उनको बरबाद कर दिया गया । जो बिहार में एक जमाने में शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में विश्व में मशहूर था, जहां नालंदा विश्वविद्यालय जैसे उच्च कोटि के शिक्षा केंद्र हुआ करते थे, उन पंद्रह सालों के दौरान सबकुछ खत्म सा हो गया । जिस बिहार में कला संस्कृति की एक समृद्ध परंपरा थी वहां कला –संस्कृति मजाक बनकर रह गए । जो सूबा शिक्षा का अप्रतिम केंद्र हुआ करता था वहां से हर साल उच्च शिक्षा के लिए हजारो छात्र पलायन कर दिल्ली और अन्य शहरों का रुख करने लगे । जिस सूबे में ज्ञान की गंगा बहा करती थी वहां अपराध और रंगदारी का बोलबाला हो गया । राज्य के संवैधानिक मुखिया होने के नाते यह सारी जिम्मेदारी लालू-रावड़ी की की बनती है कि उन्होंने बिहारी गौरव को बिहारी गाली में तब्दील कर दिया । लालू यादव का फूहड़पन और उनके रिश्तेदारों के रंगदारी के किस्सों पर फिल्में बननी लगी और उन फिल्मों के अहम किरदारों में आपको उन लोगं की झलक साफ तौर पर दिखाई देने लगी । बिहारी शब्द हास्य और व्यंग्य का प्रतीक बन गया । लेकिन जैसा कि दिनकर जी ने लिखा है कि विद्रोह क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं कि उसका विस्फोट अचानक होता है । उसी तरह जनता के गुस्से का विस्फोट होने में सालों लग गए । बिहार की जनता ने समझदारी दिकाते हुए सूबे में सरकार बदल दी । पहले तो कुछ अंदेशे के साथ लेकिन दूसरी बार जब भरोसा हो गया तो प्रचंड बहुमत के साथ। इस प्रचंड बहुमत के साथ ही जनता की आशाएं और आकांक्षाएं भी सातवें आसमान पर जा पहुंची है ।
यह वर्ष बिहार राज्य के स्थापना के सौ वर्ष के रूप में साल भर जश्न के रूप में मनाया जा रहा है । राज्य की नीतीश सरकार ने साल भर के कई कार्यक्रम बनाए हैं जिनमें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर गोष्ठी सेमिनार तो हैं ही उसके अलावा कई पुस्तकों का प्रकाशन और सांस्कृतिक रूप से लुप्त हो रही कलाओं के संरक्षण का काम भी शुरू किया गया है । इस काम में बिहार का कला संस्कृति मंत्रालय बेहद शिद्दत से जुटा है । इसी कड़ी में मंत्रालय ने बिहार विहार नाम से एक कॉफी टेबल बुक का प्रकाशन किया है । इस किताब में बिहार की कला संस्कृति एवं युवा विभाग की मंत्री सुखदा पांडे ने मर्म पर चोट की है – मैकाले के हवाले से उन्होंने लिखा है – हिंदुस्तानी यदि अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक इतिहास को जान जाएं तो हम उनको गुलाम नहीं कर पाएंगे इस लिए उन्हें उनके इतिहास को नहीं जानने दो । बिहार में तकरीबन डेढ दशत में यही हुआ । बिहार की नई पीढ़ी को उसके सांसक्कृति और वैचारिक इतिहास की जानकारी से वंचित रखने का षडयंत्र रचा जाता रहा और प्रयासपूर्वक ऐसा किया भी गया । लेकिन अब सुखदा पांडे के नेतृत्व में बिहार का यह मंत्रालय मैकाले के इस सिद्धांतो को झुठलाने में लगा है । सुखदा पांडे शिक्षण कार्य से जुड़ी रही हैं और उनसे .ह उम्मीद भी की जा सकती है कि कला और संस्कृति के क्षेत्र में बिहार के गौरव को वापस लाने में महती भूमिका निभाएंगी ।
बिहार के गौरवशाली इतिहासल को सामने लाने के लिए संस्कृकि मंत्रालय ने एक किताब बिहार-विहार छापी है य़ इस किताब का संपादन राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त लेखक विनोद अनुपम ने किया है । विनोद अनुपम ने अएपने संपादकीय में बिहारकी होने की पीड़ा से ही सुरुआत की है कि किस तरह से जब वो 1992 में फिल्म एप्रिशिएशन का कोर्स करने के लिए पुणे गए थे तो उनके साथ के लोगों को इस बात का आश्चर्य होता था और व्यंग्यात्मक लहजे में पूछते थे कि कैसा है आपका बिहार । विनोद अनुपम के मुताबिक - अब बदलते वक्त में भी लोग बिहार के बारे में जानना चाहते हैं लेकिन अब वो लोग बिहार के इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं, बिहार में हो रहे नवीनतम बदलाव के बारे में जानना चाहते हैं । जनता वह सबकुछ जानना चाहती है जो शायद हम भी नहीं जानते। शायद इसलिए कि उन्हें पता है कि बदलाव की इबारत बिहार से ही लिखी जानी है , देश में भविष्य की रोशनी बिहार से ही आनी है । बिहार को करीब से जानने की इसी क्षुधा की पूर्ति की छोटी सी कोशिश है – बिहार विहार । दरअसल इस कॉफी टेबल बुक से बिहार की संस्कृति और समृद्ध लोक कलाओं की एक छोटी से झलक भर ही मिलती है । संकेत मिलते हैं कि हमारे बिहार की कला परंपराएं कितनी समृद्ध रही है । बिहार का होने के बावजूद इस किताब को पढ़ने के बाद मेरी जानकारी में भी जबरदस्त इजाफा हुआ । इस किताब से भी एक दिलचस्प प्रसंग जुड़ा है । विनोद अनुपम ने जब फोन पर मुझे कहा कि बिहार की कला संस्कृति पर वो बिहार सरकार की तरफ से प्रकाशित होनेवाली कॉफी टेबल बुक का संपादन कर रहे हैं तो मुझे लगा था कि वो मजाक कर रहे हैं । पहले तो मुझे लगा था कि सरकार की कला संस्कृति में क्यों दिलचस्पी होगी । और उसपर से कॉफी टेबल बुक । जब भी हमारी बातचीत होती थी तो विमोद अनुपम उलके बारे में बताते थे लेकिन हर बार मैं सोचता था कि वो दिवास्वप्न देख रहे हैं और मैं सपने तोड़ने में यकीन नहीं रखता हूं इसल वजह से उनको कुछ कहता नहीं था लेकिन कालांतर में पता चला कि बिहार विहार को जो सपना था और जिसे मैं दिवा-स्वपन सोच समझ रहा था, दरअसल वो हकीकत था और सपना पूरा भी हुआ ।
कॉफी टेबल बुक की योजना के बारे में विवेक कुमार सिंह ने अपनी पूर्व पीठिका में लिखा है – देश विदेश में घूमते हुए मुझे कॉफी टेबल बुक की उपयोगिता का एहसास हुआ। विषय विशेष में रुचि जगाने के लिए कॉफी टेबल बुक हमेशा से एक बेहतर माध्यम रही है । यह विषय की विस्तार से जानकारी भले ही ना दे, उसके प्रति दिलचस्पी अवश्य जगाती है । बिहार विहार की परिकल्पना बिहार के प्रति दुनिया की दिलचस्पी जगाने के लिए ही की गई है । विवेक कुमार सिंह को नजदीक से जानने वाले यह बताते हैं कि इस प्रशासनिक अधिकारी ने बिहार में कला संस्कृति के विकास के लिए बहुच कार्य किए हैं और कई मृत प्राय संस्थाओं में नई जान फूंक दी थी । लेकिन कॉफी टेबल बुक की उपयोगिता उसकी उपलब्धता पर भी निर्भर करती है । अगर बिहार सरकार सिर्फ किताब छापकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेगी तो इसका उद्देश्य पराजित हो जाएगा । जरूरत इस बात की है कि इस किताब को उन खास लोगों तक पहुंचाया जाए जहां से किसी भी सूबे की छवि निर्मित होती है । अन्यथा यह किताब भी अन्य सरकारी प्रकाशनों की तरह गोदाम में धूल फांक रही होगी और इसके प्रकाशम से जुड़े लोग अपनी पीठ थपथपा रहे होंगे ।
इस किताब में बेहद श्रमपूर्वक सामग्री का चयन किया गया है लेकिन इसमें जो चित्र लगे हैं वो इस किताब की कमजोरी हैं । हो सकता है वक्त की कमी के चलते ऐसा हुआ हो या फिर कोई और कारण रहे हों लेकिन सामग्री के हिसाब से ना तो चित्रण कमजोर हैं चाहे वो रामलीला के पहले के चित्र हों राजाओं का चित्रण हो । लेकिन हमें इस प्रयास की सराहना करनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की और सामग्री सामने आएं, कमजोरियां तो दूर हो ही जाती है । बस जैसा कि मैंने उपर भी कहा कि इसे टारगेट पाठक वर्ग तक पहुंचावने का काम होना चाहिए ।

Sunday, April 5, 2009

बिहार में नीतीश की ‘जय हो’

लगभग चार सालों के बाद कुछ दिनों पहले मुझे बिहार जाने का मौका मिला । जब ट्रेन गया रेलवे स्टेशन पर रुकी और मैं उतरा तो सबकुछ आशा के अनुरूप ही था । शोरगुल-भीडभाड़, धक्का-मुक्की । किसी तरह बाहर आया तो बेतरतीब ढंग से गाड़ियां खड़ी थी । किसी तरह पार्किंग से निकलकर अपने गंतव्य की तरफ बढ़ा तो रास्ते में एक निर्माणाधीन फ्लाईओवर दिखा, बेसाख्ता मुंह से निकला, बिहार में फ्लाईओवर । लेकिन लगभग हफ्ते भर गया में रहने के दौरान समाज के हर तबके से बातचीत करने के बाद ये लगा कि कुछ बदलाव तो है । बिहार के कई शहरों में हर ओर बेहतरी के लिए काम हो रहा है । मुझे विश्वास है कि अगर आनेवाले दिनों में राजनैतिक नेतृत्व में यही इच्छा शक्ति रही तो बिहार भी किसी अन्य विकसित राज्य से कम नहीं होगी । बिहार में रहने के दौरान दौरान मेरी बातचीत समाज के कई तबके के लोगों से हुई । सब लोग कमोबेश नीतीश सरकार से संतुष्ट नजर आए । अखबारों में अपराध की खबरें बिल्कुल ही कम नजर आई । बातचीत से ये लगा राज्य में बेहतर शिक्षा का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है ।
मैं चार साल के बाद अपने गृह राज्य गया था, जाहिर है कानून व्यवस्था को लेकर मेरे मन में उसी जमाने की स्थिति चल रही थी । खबरिया चैनल में काम करते हुए बिहार के बाहुबली विधायकों के कारनामे आते ही रहते थे । जाहिर है जब बिहार में विकास की हचलच और उच्च शिक्षा में सुधार महसूस किया तो स्वाभाविक रूप से बाहुबलियों के बारे में जानने की इच्छा हुई । बातों बातों में टाल क्षेत्र के एक बड़े जमींदार से इसकी चर्चा कर दी । उन्होंने जो कहानी बताया उसे सुनकर दिल को बड़ा ही सुकून मिला । पता ये चला कि नीतीश सरकार ने चुनचुनकर बाहुबलियों के इलाके में ऐसे अफसरों की तैनाती कर दी है, जिन्होंने बाहुबलियों पर नकेल कस दी है । इस बात का समाज पर मनोवैज्ञानिक असर हुआ और छुटभैये अपराधियों और अपराध पर खुद-ब-खुद लगाम लग जाती है । इस दौरान मेरी बात मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के धुर विरोधियों से भी हुई । सबों से बात करके ये नतीजा निकला कि राज्य में कानून और व्यवस्था की हालात में सुधार हुआ है । ये नहीं है कि स्थिति बिल्कुल सुधर गई है । लेकिन अपहरण और दिन दहाड़े गाड़ी लूट या फिर शो रूम से गाड़ी उठा ले जाने जैसी घटना लगभग बंद हो गई है । छोटे मोटे अपराध तो अब भी हो रहे हैं लेकिन लोगों के मन में इस बात का विश्वास पैदा हुआ है कि अपराधी पकड़े भी जा सकते हैं । शासन में लोगों का विश्वास जमना लोकतंत्र की मजबूती की निशानी है और पिछले तीन वर्षों के शसान काल में नीतीश सरकार ने लोगों के मन में ये विश्वास तो पैदा कर ही दिया है । राष्ट्रकवि दिनकर ने भी संसकृति के चार अध्याय में लिखा है कि विद्रोह, क्रांति या बगावत ऐसी चीज नहीं जिसका विस्फोट अचानक होता है । घाव भी फूटने के पहले अनेक काल तक पकते रहते हैं । अगर दिनकर जी की बातों में हम बदलाव को भी जोड़ लें तो बिहार के संदर्भ में सटीक बैठेगी । किसी भी तरह के बदलाव के लिए वक्त और राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है । उसके बगैर न तो विकास हो सकता है और न ही बदलाव । मैं नीतीश कुमार की बहुत सी नीतियों का समर्थक नहीं हूं लेकिन ये देखना और सुनना अछ्छा लगता है कि मेरे राज्य का कोई मुख्यमंत्री कंप्यूटर और विदेशी निवेश की बात करता है . सन 1991 में भारत की इकॉनोमी में बदलाव शुरु हुए लेकिन बिहार में सिवाए दूरसंचार के किसी भी क्षेत्र में उस तरह से बदलाव महसूस नहीं किया जिस तरह से देश के अन्य राज्यों का विकास हुआ । बिहार में लगभग दो दशकों तक विकास की बात ही नहीं हुई । बात हुई तो भूरा बाल की, जातिवाद की, और नरसंहार और प्रतिनरसंहार की। नीतीश कुमार के पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों ने न तो राज्य में कंप्यूटरीकरण और न ही विदेशी निवेश की बात की, प्रयास तो दूर की बात । आज जब हर राज्य में जमकर विदेशी निवेश हो रहा है तो बिहार में इसके लिए प्रयास शुरु हुए हैं । लगभग दो दशक पीछे चल रहा है बिहार । राज्य में किसी तरह का कोई निवेश नहीं हुआ तो इसके लिए सिर्फ शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व और उनकी सोच जिम्मेदार है । अगर बिहार में निवेशकों के लिए माहौल बनाया जाता और प्रयास किए जाते तो कोई वजह नहीं थी इस राज्य में निवेश नहीं होता । लेकिन अब राज्य में इस तरह की बातें भी होने लगी है तो जाहिर तौर पर काम भी शुरु हो गया है । जरूरत सिर्फ इस बात की है कि राजनैतिक इच्छा शक्ति बनी रहे और अभी नीतीश कुमार जिस तरह बिना किसी दबाव मे आए काम कर रहे हैं उसी तरह करते रहें, तो भूरा बाल साफ करने की बात करनेवाले लोग साफ हो जा सकते हैं । लोकसभा चुनाव में जनता विकास के दुश्मनों को करारा जवाब देने का मन बना चुकी है ।