Translate

Showing posts with label मुलायम सिंह. Show all posts
Showing posts with label मुलायम सिंह. Show all posts

Thursday, October 24, 2013

महात्वाकांक्षाओं का हवाई गठबंधन

लोकसभा चुनाव के करीब आने की वजह से अगली सरकार के विकल्पों को लेकर अटकलें तेज होने लगी हैं । चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भी आगामी लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी या गठबंधन को बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है । यूपीए और एनडीए से ज्यादा सीटें अन्य पार्टियों के खाते में जाती नजर आ रही हैं । इन कयासों के बीच तीसरे मोर्चे की संभावना पर विचार और मेल मुलाकातों का दौर शुरू हो गया है । लोकतंत्र में जनता से किसी भी राजनीतिक दल को ताकत मिलती है । विचारधारा जनता को पार्टी से जोड़ने का काम करती है ।  विचारधारा को जनता तक पहुंचाने के लिए मजबूत पर लचीले संवाहक की जरूरत होती है । संवाहक ऐसा हो जिसकी साख हो और जनता को उस साख पर भरोसा हो । संवाहक की साख ना हो तो विचारधारा में चाहे कितना भी ओज हो, वो जनता के बीच भरोसा पैदा नहीं कर सकती है । तीसरे मोर्चे के संभावित दलों और उनके नेताओं में इतने ज्यादा अंतर्विरोध है कि उनका साथ आना मुमकिन लगता नहीं है । विचारधारा की कोई डोर उनको एकजुट कर नहीं सकेगी । मायावती किसी भी हाल में मुलायम के साथ नहीं जा सकती, नीतीश और लालू एक साथ आ नहीं सकते, लेफ्ट और ममता बनर्जी एक मंच साझा नहीं कर सकते तो सरकार में कैसे शामिल हों , डीएमके और एआईएडीएमके की सत्ता में साझी भागीदारी हो नहीं सकती । वाईएसआर कांग्रेस और तेलगु देशम पार्टी भी एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते । ऐसे में तीसरे मोर्चे की अटकल या संभावना को हकीकत में बदल देना बहुत मुश्किल काम है । हमारे देश ने नब्बे के आखिरी दशक में तीसरे मोर्चे की सरकारों का दौर देखा है । उस दौर की राजनीति को याद करें तो सीपीएम नेता हरकिशन सिंह सुरजीत के बिना उसकी कल्पना नहीं हो सकती है।  चाहे वो वीपी सिंह की सरकार हो या उसके बाद के लिए चंद चंद महीनों के लिए बनी देवगौड़ा और गुजराल की सरकारें हों, सबके गठन में हरकिशन सिंह सुरजीत की जबरदस्त भूमिका रही है, बल्कि कह सकते हैं कि उस वक्त देश की राजनीति के सुरजीत धुरी थे । वाम दलों को एकजुट करने के अलावा सुरजीत ने सभी दलों को एकसाथ लाने में महती भूमिका निभाई थी । यह सुरजीत का ही कमाल था कि वी पी सिंह की सरकार को वामपंथी दलों के साथ साथ दक्षिणपंथी दल का भी समर्थन मिला । लेकिन इस वक्त की राजनीति में सुरजीत जैसा कोई विराट राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं है जो तमाम अलग अलग विचारधाराओं और महात्वाकांक्षओं को काबू में कर सके और उनको एक मंच पर ला सकें ।
सुरजीत के निधन के बाद हाल के वर्षों में वाम दलों की जनता के बीच प्रासंगिकता भी लगभग खत्म होती नजर आ रही है । वाम दल तीसरे मोर्च की धुरी बन सकते थे लेकिन ये दल खुद ही हाशिए पर हैं । ऐसा नहीं है कि वाम दल सिर्फ पश्चिम बंगाल में हाशिए पर हैं । बिहार और अन्य सूबों की राजनीति में हमेशा से वामपंथी पार्टियां एक तीसरी ताकत के साथ मजबूती से उपस्थित रही हैं । अब इन सूबों में भी वाम दलों की उपस्थिति नगण्य मात्र है । अगर त्रिपुरा को छोड़ दें तो वो कहीं सत्ता में नहीं है । केंद्र की राजनीति में भी वो अलग थलग पड़े हुए हैं और अपनी भूमिका की तलाश के लिए हाथ-पांव मारते भी नजर नहीं आ रहे हैं । ले देकर सांप्रदायिकता के नाम पर धर्मनिरपेक्ष दलों को एकजुट करने का एक प्रयास हो रहा है । जनता को जोड़ने के बजाए वो नेताओं को जोड़ने में ज्यादा श्रम करते नजर आ रहे हैं । उससे तो यह लगता है कि जिस पार्टी की पहचान ही संघर्ष और जुझारूपन था वही सुस्त पड़ गई है । वाम दलों के नेताओं में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश भी दिखाई नहीं देती । क्या बुर्जुआ से लोहा लेने का नारा बुलंद करनेवाले वाम दलों के नेता खुद बुर्जुआ होकर आराम परस्त हो गए हैं । लंबे समय तक वाम दलों की राजनीति करनेवाले और लोकसभा के पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने वाम दलों की इस गत के लिए शीर्ष नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया है । ।
देश में सबसे ज्यादा लोकसभा सीट वाले राज्य उत्तर प्रदेश में हालत सबसे ज्यादा उलझी हुई है । अस्सी सीटों वाले इस सूबे में चतुष्कोणीय मुकाबला होता दिख रहा है । अगर भाजपा को मोदी फैक्टर का लाभ होता है तो उसकी सीटें बढ़ सकती हैं । मायावती और मुलायम की सीटें बीस से तीस के आसपास रहने की उम्मीद है । कांग्रेस को यहां जबरदस्त नुकसान होता दिख रहा है । ऐसे में मुलायम और मायावती को एक साथ लाकर तीसरे मोर्चे के स्वपन को साकार करना टेढी खीर है । अन्य दलों के बीच मुलायम की विश्वसनीयता भी संदिग्ध है । राष्ट्रपति चुनाव के वक्त मुलायम ने जिस तरह से ममता बनर्जी को धोखा दिया था उसको ममता भूल नहीं पाईं होंगी । उधर बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के तीन बड़े नेता की महात्वाकांक्षा भी हिलोरें ले रही हैं । नीतीश कुमार चाहे लाख इंकार करें कि वो प्रधानमंत्री पद की रेस में नहीं हैं लेकिन वो अपने आपको बेहद चालाकी से पोजिशन कर रहे हैं । नीतीश कुमार की रणनीति यह है कि वो अपने आपको नो नानसेंस और विकास पुरुष के तौर पर पेश करें । नीतीश कुमार की दिक्कत यह है कि भाजपा से गंठबंधन टूटने के बाद लोकसभा में उनके सदस्यों की संख्या कम हो सकती है । अगर ऐसा होता है तो उनकी महात्वाकांक्षा पर लगाम लगेगी और उनकी दावेदारी भी कमजोर होगी । उधर ममता बनर्जी के मूड और स्वभाव में उतार चढ़ाव को देखते हुए अन्य पार्टियों के उनके नाम पर सहमत होना संभव नहीं हैं । ले देकर बचते हैं नवीन पटनायक । नवीन पटनायक सौम्य हैं , ओडिशा में उनके शासनकाल में जबरदस्त विकास भी हुआ है । पाइलीन तूफान के वक्त पूरे देश ने उनकी प्रशासनिक क्षमता को भी देखा । इस बात की भी संभावना है कि उनकी पार्टी को लोकसभा में सीटें भी ठीक ठाक आ जाएं । लेकिन नवीन को अगर सबसे समर्थन का भरोसा नहीं होगा तो वो ओडिशा से निकलने में हिचक दिखाएंगें ।

अब इन सबसे अहम बात यह है कि तीसरे मोर्चे की सरकार को भाजपा या काग्रेस के समर्थन की भी जरूरत पड़ेगी । तथाकथित तीसरे मोर्चे की पार्टियों की विचारधारा को देखते हुए इस वक्त यह बात कही जा सकती है कि वो कांग्रेस के करीब है । भाजपा के समर्थन से सरकार बनाने में ममता बनर्जी से लेकर नीतीश, मुलायम और नवीव पटनायक को दिक्कत होगी । लिहाजा सांप्रदायिकता की दुहाई देकर उनको कांग्रेस का ही समर्थन लेना होगा । अब कांग्रेस की वैशाखी पर चलनेवाली सरकार के सामने यह मजबूरी भी होगी कि उसकी नीतियों से हटे ना । कांग्रेस पार्टी भी अपने समर्थन की जमकर कीमत वसूलेगी । एक सिपाही की तैनाती पर चंद्रशेखर की सरकार गिरा देनेवाली पार्टी लगातार इस कोशिश में रहेगी कि किस तरह से सरकार चला रहे लोगों को डिसक्रेडिट किया जाए और फिर साख के सवाल पर सरकार गिराकर चुनाव के मैदान में ताल ठोंकी जाए । कहावत है कि इतिहास खुद को दोहराता है । लेकिन सवाल यह है कि तीसरे मोर्च की सरकार देश के लिए कितना फायदेमंद है । अभी तक के तीसरे मोर्च की सरकारों का अनुभव देश के लिए बहुत बुरा रहा है । क्षेत्रीय क्षत्रपों की महात्वाकांक्षाओं के टकराव में नीतिगत निर्णयों से लेकर नियमित प्रशासनिक फैसलों में भी देरी होती है जो किसी भी देश के लिए ठीक नहीं है । इन सारी परिस्थियों के मद्देनजर 2014 का चुनाव हमारे लोकतंत्र की मैच्युरिटी का भी टेस्ट होगा । 

Friday, March 30, 2012

अखिलेश की चुनौती

उत्तर प्रदेश चुनाव में समाजवादी पार्टी की जीत के बाद राजनीतिक टिप्पणीकार सूबे में बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं । सूबे की जनता में अपने युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को लेकर जबरदस्त उत्साह है । मायावती के शासनकाल के दौरान सांस्थानिक भ्रष्टाचार से त्रस्त और उसके पहले मुलायम सिंह यादव के राज में गुंडई से पस्त जनता को अखिलेश में एक ऐसा ताजा चेहरा दिखाई दिया जो प्रदेश को गुंडागर्दी से दूर कर सकता है । जनता ने प्रचंड बहुमत से अखिलेश को देश के सबसे बड़े राज्य का सबसे युवा मुख्यमंत्री चुन लिया । लेकिन जनता के इस विश्वास के बाद अखिलेश से उनकी अपेक्षाएं भी सातवें आसमान पर जा पहुंची हैं । अखिलेश को जनता की इन लगातार बढ़ती अपेक्षाओं पर उतरने की बहुत बड़ी चुनौती है । जब अखिलेश सूबे के मुख्यमंत्री बने तो राजनीतिक पंडितों का आकलन था कि उनके चाचा शिवपाल यादव हर कदम पर बाधाएं खड़ी करेंगे लेकिन यह आकलन इस वजह से गलत साबित हुआ कि मुलायम ने अपने राजनीतिक कौशल से उनको साध लिया और यह इंतजाम कर दिया कि शिवपाल अपने भतीजे की राह में रोड़े ना अटका सकें । जिस वक्त शिवपाल को केंद्र की राजनीति में जाने का प्रस्ताव दिया गया उसी वक्त यह तय हो गया था कि शिवपाल अगर सूबे में मंत्री बनते हैं तो अपने मंत्रालय तक सीमित रहेंगे। इसके अलावा आजम खां को भी स्पीकर बनाने का दांव चलकर मुलायम ने उस बाधा को भी खत्म कर दिया ।
तमाम राजनीतिक पंडितों की भविष्वाणियों के उलट अखिलेश के लिए जो सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रहे हैं वो हैं उनके पिता मुलायम सिंह यादव। अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पिता की छाया से निकलकर खुद को स्थापित और साबित करने की है । जब अखिलेश मुख्यमंत्री बने तो उनके सामने जो पहला बड़ा काम था वो था मंत्रिमंडल गठन का और मंत्रियों के बीच विभागों के बंटवारे का । अखिलेश को अपना मंत्रिमंडल बनाने में पसीने छूट गए और विभागों का बंटवारा तो हफ्ते भर से ज्यादा वक्त तक नहीं हो पाया । मंत्रियों को विभागों का वंटवारा होने के पहले एक मंत्रिमंडल विस्तार उनको करना पड़ा, जिसमें मुलायम के आदमियों को जगह दी गई । आजाद भारत के इतहास में ऐसा कम ही हुआ है कि अपने बल पर बहुमत पानेवाली पार्टी सरकार बनाने के बाद पहले मंत्रिमंडल विस्तार करे फिर मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा । अखिलेश के मंत्रिमंडल पर मुलायम सिंह यादव की गहरी छाप और छाया साफ दिखाई देती है । मुलायम के तमाम विश्वस्त सहयोगियों को मंत्रिमंडल में जगह दी गई । हद तो तब हो गई पूर्ण बहुमत के बावजूद निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को मंत्री बनाकर उनकी पसंद का मंत्रालय सौंप दिया गया । अखिलेश ने जब अपने मंत्रियों के बीच विभागों का वंटवारा किया तो अपनी पसंद के मंत्रियों को कम अहम मंत्रालय दे सके । अभिषेक मिश्रा उनकी पसंद हैं, पढ़े लिखे समझदार युवा नेता हैं । प्रबंधन में वो सिद्धहस्त हैं लेकिन उनको मंत्रालय मिला प्रोटोकॉल, जहां करने के लिए बहुत कुछ है नहीं । इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मंत्रालयों के बंटवारे में भी अखिलेश की नहीं बल्कि मुलायम सिंह यादव की चली । अखिलेश का जो मंत्रिमंडल है उसे चाचाओं का मंत्रिमंडल कहा जा सकता है जिसमें अधिकांश मुलायम के सहयोगी और हमउम्र रह चुके हैं और अखिलेश को बच्चा समझते हैं । अखिलेश के सामने अपने पिता के इन सहयोगियों से काम करवाने की बेहद कड़ी चुनौती होगी । हर मंत्री अखिलेश को बच्चा और खुद को मुलायम का समकालीन मानता है । उनसे काम करवाना अखिलेश के लिए मुश्किल हो सकता है ।
अखिलेश यादव ने जब सूबे की कमान संभाली को उनको विरासत में जो नौकरशाही मिली वो राजनीति में आकंठ डूबी और करीब करीब भ्रष्ट हो चुकी थी । उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में हर अफसर किसी न किसी राजनेता का आदमी है । कोई मुलायम का तो कोई मायावती का तो कोई बीजेपी का । अखिलेश के सामने इस राजनीतिक और भ्रष्ट अफसरशाहों पर लगाम लगाने की चुनौती है । सूबे में अहम पदों पर अफसरों की तैनाती में मुलायम सिंह यादव की छाप ही देखी जा सकती है । अखिलेश की सचिवों की तैनाती में भी मुलायम की ही चली, जो मुलायम के शासन काल में पंचम तल पर बैठते थे उनकी फिर से वापसी हुई है । ऐसे में इस युवा मुख्यमंत्री की चुनौती और बढ़ जाती है कि उनको उन अफसरों से काम करवाना है जिनकी राजनैतिक आस्था कहीं और है और वो अपनी नियुक्ति के लिए अखिलेश नहीं बल्कि किसी और को जिम्मेदार मानता है । इसके अलावा बेलगाम और सांस्थानिक भ्रष्टाचार को प्रश्रय देने वाले अफसरों और बाबुओं को काबू में करना और उनसे रचनात्मक और विकास के काम करवाना भी टेढी खीर साबित हो सकता है । यहीं पर अखिलेश के राजनैतिक और प्रशासनिक कौशल की परीक्षा होगी । अगर वो सफल हो जाते हैं तो इतिहास पुरुष बन जाएंगे और अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो इतिहास में गुम हो जाएंगें ।
तीसरी बड़ी चुनौती भी अखिलेश के सामने मुलायम सिंह यादव के साथी संगी हैं और जिन्होंने पिछले पांच साल तक इस आस में नेताजी का साथ दिया कि सत्ता बदलेगी तो उसका स्वाद चखेंगे । इस आस के उल्लास का उत्पात में बदलते चले जाना और फिर उसका अपराध की सीमा में प्रवेश कर जाना अखिलेश को सीधे चुनौती दे रहा है । सात मार्च से लेकर बारह मार्च तक जिस तरह से समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने उत्पात मचाया वो आने वाले दिनों का एक संकेत तो देता ही है । भदोही, सीतापुर, इलाहाबाद, बरेली, अंबेडकरनगर हरदोई, मुरादाबाद, प्रतापगढ़, औरैया में जिस तरह से हत्याएं हुई और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आगजनी और रंगदारी की उससे एक बार फिर से उत्तर प्रदेश में अपराध और अपराधियों के बोलबाला होने का खतरा मंडराने लगा है । जिस तरह से अखिलेश यादव के शपथ ग्रहण समारोह के बाद सपाइयों ने मंच पर चढ़कर उत्पात किया वो भी आने वाले समय की बानगी पेश कर रहा था । अखिलेश ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले और बाद में भी अपराधमुक्त उत्तर प्रदेश का वादा किया था जिसकी मंत्रिमंडल गठन में ही धज्जी उड़ गई । जिस तरह से बाहुबली निर्दलीय विधायक राजा भैया को मुलायम के दबाव में मंत्रिमंडल में शामिल करना पड़ा उससे अखिलेश की बड़ी फजीहत हुई । इसके अलावा ब्रह्माशंकर शंकर त्रिपाठी, दुर्गा यादव, शिव कुमार बेरिया, राजकिशोर सिंह जैसे आपराधिक छवि के लोगों के साथ कैबिनेट में बैठकर अपराधमुक्त प्रदेश का वादा जरा खोखला लगता है ।
अखिलेश यादव युवा हैं, उत्तर प्रदेश को लेकर उनका एक सपना है, उसको वो पूरा भी करना चाहते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें घर और पिता की छाया और उनकी मित्र मंडली से बाहर निकलना होगा और कुछ कड़े और बड़े फैसले लेने होंगे । चुनाव के वक्त जिस तरह से डी पी यादव को पार्टी में नहीं लेने पर वो अड़ गए थे उसी तरह के कड़े फैसलों की ही प्रतीक्षा उत्तर प्रदेश की जनता कर रही है । अखिलेश को भी मालूम है कि उनके पास ज्यादा समय नहीं है और वक्त रहते अगर गुंडों पर काबू और विकास की पहिए को रफ्तार नहीं दी गई तो जनता की अदालत में उनका भविष्य तय हो जाएगा । जनता की अदालत में फैसला आने में भले ही पांच साल लग जाए लेकिन लोकतंत्र में उस फैसले को मानने के अलावा कोई विकल्प बचता नहीं है । उसको सभी को स्वीकार करना पड़ता है, अखिलेश को भी ।

Saturday, February 7, 2009

महानायक का खंडित व्यक्तित्व

अमिताभ बच्चन- सदी का महानायक,भारतीय फिल्म जगत का सबसे बड़ा नाम, विश्व मंच पर भारतीय फिल्म उद्योग का सबसे विश्वसनीय चेहरा. पैंसठ साल से ज्यादा की उम्र में भी भारतीय फिल्म निर्माताओं का सबसे भरोसेमंद और चहेता अभिनेता । बिग बी के नाम से मशहूर अमिताभ बच्चन की प्रशंसा की ये सूची और भी लंबी हो सकती है । लेकिन अगर सदी के इस महानायक के पूरे व्यक्तित्व पर विचार करें तो ये खंडित और विवादित नजर आता है । लार्जर दैन लाइफ की छवि वाले सदी के इस महानायक के मन में भी बिल्कुल ही एक आम आदमी की तरह ही हर तरह की चाहतें हिलोरे लेती है और अपनी इन चाहतों के लिए वो तमाम तरह के दंद-फंद भी करते हैं । फिल्म जगत का ये सबसे विश्वसनीय चेहरा और करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करनेवाला ये महानायक जब मुलायम सरकार की प्रशंसा वाले विज्ञापन में ये कहता था कि - यूपी में दम है क्योंकि जुर्म यहां कम है - तो उनकी विश्वसनीयता पर एक बडा़ सवालिया निशान लग जाता था । बिग बी को ये विज्ञापन करने की क्या मजबूरी थी ये राज आजतक नहीं खुल पाया है, हां मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद ये पता चला कि अमिताभ को इस विज्ञापन के एवज में कोई भुगतान नहीं किया गया । अमिताभ बच्चन जब भी जहां भी मौका मिलता है ये कहने से नहीं चूकते कि उन्होंने राजनीति से पूरी तरह तौबा कर ली है और अब आगे राजनीति में जाने का उनका कोई इरादा नहीं है । लेकिन यूपी के हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान प्रत्यक्ष तो नहीं लेकिन परोक्ष रूप से राजनीति में आए ही, समाजवादी पार्टी के लिए परोक्ष रूप से विज्ञापन के जरिए वोट जुटाने की कोशिश की ही गई । मित्रता निभाने के लिए ही सही ।
अंग्रेजी में एक कहावत है - ए मैन इज नोन बाय द कंपनी ही कीप्स । इस लिहाज से हम अमिताभ बच्चन की मित्रमंडली पर जरा गौर फरमा लें - छोटे भाई अमर सिंह, पितातुल्य मुलायम सिंह यादव, सहारा के कर्ता-धर्ता सुब्रत राय और अनिल अंबानी । अगर अनिल अंबानी को छोड़ दिया जाए तो बाकी की ख्याति क्या है ये बताने की जरूरत नहीं है । भारत की जनता जब अपने महानायक अमिताभ बच्चन को मुलायम के आगे झुकता देखती है तो उसे पचा नहीं पाती । फिल्मों में क्रांतिकारी तेवरों वाले अपने नायक को राजनेताओं की प्रशस्ति गाते सुनना भारतीय जनमानस को भाता नहीं है । यहां ये तर्क दिया जा सकता है कि रील और रीयल लाइफ में फर्क होता है । चलिए अगर इस बात को मान भी लिया जाए तो अमिताभ जैसे सदी के महानायक,जो करोडों भारतीयों के आदर्श हैं, को लोग रियल लाइफ में एकदम विपरीत भूमिका में देखना पसंद नहीं कर पाते ।
अमिताभ बच्चन भारतीय फिल्म जगत के अबतक के सबसे बड़े स्टार माने जा सकते हैं । लगभग चार दशकों से बॉलीवुड पर एकछत्र राज कर रहे हैं । उम्र के इस पड़ाव पर आकर भी जिस तरह की चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं वो सफलतापूर्वक निभा रहे हैं उसको तो सिर्फ सलाम ही किया जा सकता है । अपनी भूमिकाओं को लेकर बच्चन ने लगातार जितने प्रयोग किए हैं वो भी काबिले-तारीफ है । बच्चन की अदाकारी का रेंज इतना व्यापक है कि अब भी बॉलीवुड का कोई कलाकार रेंज के मुकाबले में उनके सामने नहीं टिक सकता है । चाहे वो ब्लैक फिल्म में अंधी लड़की रानी मुखर्जी के टीचर की भूमिका हो या फिल्म नि:शब्द में किशोरी पर फिदा एक बूढे का अभिनय हो या फिल्म चीनी कम में पैंसठ साल के प्रौढ का अपने से आधी उम्र की लड़की से प्यार करने की भूमिका हो , सबमें अमिताभ ने अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया । फिल्म झूम बराबर झूम में मस्ती का जो अंदाज अमिताभ की आंखों से झलकता है उसे देखना और महसूस करना काफी आनंददायक है ।
लेकिन अगर अभिनेता अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्व पर समग्रता में विचार करें तो हर तरह के विवाद में अमिताभ रहे हैं । कुछ दिनों पहले इंकम टैक्स विभाग के नोटिस की वजह से अमिताभ सुर्खियों में रहे । इसके बाद एक विदेशी कार के टैक्स की किचकिच में भी बिग बी फंसे । पहले खबर आई कि भाई अमर सिंह ने भतीजे अभिषेक को जन्मदिन का तोहफा दिया है लेकिन जब कार के टैक्स और रजिस्ट्रेशन शुल्क को लेकर बवाल मचा तो अमर सिंह ने कहा कि उन्होंने अपने उपयोग के लिए ये गाड़ी मुंबई में रखी है । कुछ दिनों पहले बाराबंकी में फर्जीवाड़े से जमीन अपने नाम कराने का मामला इलाहाबाद हाइकोर्ट के लखनऊ बेंच तक पहुंचा । आरोप ये लगा कि मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में ग्रामसभा की जमीन बच्चन ने अपने नाम करवा ली । और इसके आधार पर पुणे में पावना डैम के पास खेती योग्य पांच एकड़ जमीन खरीदी । उस इलाके में ये नियम है कि कोई भी व्यक्ति जो किसान है वही वहां जमीन खरीद सकता है । इस मामले पर जब जमकर विवाद हुआ तो सदी के महानायक ने दरियादिली दिखाते हुए दोनों जमीनें दान करने का ऐलान कर दिया । अमिताभ से जुडा़ ही दूसरा मामला बंबई हाइकोर्ट में है – ये मामला है फेमा यानि विदेशी मुद्रा के गड़बड़झाले से जुडा़ । जिसपर भी नोटिस जारी किया जा चुका है ।
तो अगर हम महानायक के गढे हुए व्यक्तित्व और असली व्यक्तित्व को एक साथ समग्रता में देखें तो हमें महानायक की छवि में कई चेहरे नजर आते हैं । रील लाइफ का कद्दावर महानायक रियल लाइफ में बिल्कुल ही साधारण और आम आदमी की तरह हर तरह के दंद-फंद में व्यस्त ।