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Saturday, June 17, 2017

पाठकीयता के भूगोल का हो विस्तार

इन दिनों हिंदी पर खूब बातें हो रही हैं लेकिन हिंदी को लेकर जितनी गंभीरता से कोशिश होनी चाहिए उतनी कोशिश हो नहीं रही है। छात्रों तक हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए जिस तरह के उद्यम की जरूरत है उतना हो नहीं पा रहा है। स्कूली बोर्ड में हिंदी में फेल होनेवाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है। अंग्रेजी स्कूलों में हिंदी को लेकर खास उत्साह नहीं होता है, माता पिता भी चाहते हैं कि उनके बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलें। इसमें अभिभावकों का भी दोष नहीं है। आजादी के सत्तर साल बाद भी हमारे गणतंत्र में अबतक हिंदी को रोजगार की भाषा नहीं बनाया जा सका है। भाषा को लेकर, उसके संवर्धन को लेकर, उसके भूगोल के विस्तार को लेकर जितना काम होना चाहिए उतना हो नहीं पा रहा है। इसपर से बोलियों को हिंदी से अलग करने की कोशिशें भी शुरू हो गई हैं। कई बोलियां को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का आंदोलन चलाया जा रहा है। बोलियों की अस्मिता जैसे भावनात्मक जुमले गढ़े जा रहे हैं । बोलियों को अलग करने को लेकर चल रही मुहिम ने हिंदी के सामने एक अलग तरह का संकट खड़ा कर दिया है। हिंदी भाषियों को बोलियों के नाम पर बांटने की कोशिशें शुरू हो गई है। ऐसे माहौल में साहित्य में नई वाली हिंदी की बातें जोर पकड़ने लगी है । ऐसी किताबें प्रकाशित की जाने लगी हैं जिसकी मार्केटिंग के लिए इस नई वाली हिंदी का सहारा लिया जा रहा है । इस नई वाली हिंदी में बोलचाल की भाषा को जस का तस रखा गया है । इसका नतीजा यह हुआ है कि कई किताबों में आधे आधे पन्ने अंग्रेजी में लिखे जा रहे हैं और नई वाली हिंदी के नाम पर छप भी रहे हैं। उसपर हिंदी में लहालोट होनेवालों की भी कोई कमी नहीं है लेकिन इस बात पर गंभीरता से विचार होना चाहिए कि इससे भाषा का कितना नुकसान या फायदा हो रहा है।  
इसको कई बार भाषा के विस्तार के तौर पर भी समझ लिया जाता है । एक खास आयुवर्ग के समाज पर लिखते वक्त अगर बोलचाल की भाषा को जस का तस रख दिया जाता है और तर्क यह दिया जाता है कि इससे पाठकीयता बढ़ती है। इस नतीजे पर पता नहीं कैसे पहुंच जाते हैं क्योंकि ऐसा कोई सर्वेक्षण आदि अभी हुआ नहीं है।
दरअसल साहित्य और पाठकीयता,यह विषय बहुत गंभीर है और उतनी ही गंभीर मंथन की मांग करता है । आजादी के पहले हिंदी में दस प्रकाशक भी नहीं थे और इस वक्त एक अनुमान के मुताबिक तीन सौ से ज्यादा प्रकाशक साहित्यक कृतियां छाप रहे हैं । प्रकाशन जगत के जानकारों के मुताबिक हर साल हिंदी की करीब दो से ढाई हजार साहित्यक किताबें छपती हैं । अगर पाठक नहीं हैं तो किताबें छपती क्यों है । यह एक बड़ा सवाल है जिससे टकराने के लिए ना तो लेखक तैयार हैं और ना ही प्रकाशक । क्या लेखक और प्रकाशक ने अपना पाठक वर्ग तैयार करने के लिए कोई उपाय किया । हम साठ से लेकर अस्सी के दशक को देखें तो उस वक्त पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने हमारे देश में एक पाठक वर्ग तैयार करने में अहम भूमिका निभाई । पीपीएच ने उन दिनों एक खास विचारधारा की किताबों को छाप कर सस्ते में बेचना शुरू किया । हर छोटे से लेकर बड़े शहर तक रूस के लेखकों की किताबें सहज, सस्ता और हिंदी में उपलब्ध होती थी । हिंदी के प्रकाशकों को उनसे सीखना चाहिए। उसके इस प्रयास से हिंदी में एक विशाल पाठक वर्ग तैयार हुआ । सोवियत रूस के विघटन के बाद जब पीपीएच की शाखाएं बंद होने लगीं तो ना तो हिंदी के लेखकों ने और ना ही हिंदी के प्रकाशकों ने उस खाली जगह को भरने की कोशिश की । फॉर्मूलाबद्ध रचनाओं ने पाठकों को निराश किया । नई सोच और नए विचार सामने नहीं आ पाए । यह प्रश्न उठ सकता है कि इससे पाठकीयता का क्या लेना देना है । संभव है कि इस प्रसंग का पाठकीयता से प्रत्यक्ष संबंध नहीं हो लेकिन इसने परोक्ष रूप से पाठकीयता के विस्तार को बाधित किया है । अगर किसी ने विचारधारा के दायरे से बाहर जाकर विषय उठाए तो उसे हतोत्साहित किया गया । नतीजा यह हुआ कि साहित्य से नवीन विषय छूटते चले गए और पाठक एक ही विषय को बार बार पढ़कर उबते से चले गए । विषयों की विविधता की कनी ने भी पाठकों को निराश किया। 
दरअसल नए जमाने के पाठक बेहद मुखर और अपनी रुचि को हासिल करने के बेताब हैं । नए पाठक इस बात का भी ख्याल रख रहे हैं कि वो किस प्लेटफॉर्म पर कोई रचना पढ़ेंगे । अगर अब गंभीरता से पाठकों की बदलती आदत पर विचार करें तो पाते हैं कि उनमें काफी बदलाव आया है । पहले पाठक सुबह उठकर अखबार का इंतजार करता था और आते ही उसको पढ़ता था लेकिन अब एक वर् ऐसा है जो अखबार के आने का इंताजर नहीं करता है । खबरें पहले जान लेना चाहता है । खबरों के विस्तार की रुचिवाले पाठक अखबार अवश्य देखते हैं । खबरों को जानने की चाहत उससे इंटरनेट सर्फ करवाता है । इसी तरह से पहले पाठक किताबों का इंतजार करता था । किताबों की दुकानें खत्म होते चले जाने और इंटरनेट पर कृतियों की उपलब्धता बढ़ने से पाठकों ने इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना शुरू किया । हो सकता है कि अभी किंडल और आई फोन या आई पैड पर पाठकों की संख्या कम दिखाई दे लेकिन जैसे जैसे देश में इंटरनेटका घनत्व बढ़ेगा वैसे वैसे पाठकों की इस प्लेटफॉर्म पर संख्या बढ़ सकती है । हलांलकि विदेशों में ई बुक्स को लेकर होनेवाले सर्वे के नतीजे उत्साहजनक नहीं हैं।
अगर संपूर्णता में विचार करें तो पाठकीयता के बढ़ने घटने के लिए कई कड़ियां जिम्मेदार हैं । पाठकीयता को एक व्यापक संदर्भ में देखें तो इसके लिए कोई एक चीज जिम्मेदार नहीं है इसका एक पूरा ईकोसिस्टम है । जिसमें सरकार, टेलीकॉम, सर्च इंजन, लेखक, डिवाइस मेकर, प्रकाशक, मीडिया सब शामिल हैं । इन सबको मिलाकर पाठकीयता का निर्माण होता है । सरकार, प्रकाशक और लेखक की भूमिका सबको ज्ञात है । टेलीकॉम यानि कि फोन और उसमें लोड सॉफ्टवेयर, सर्च इंजन, जहां जाकर कोई भी अपनी मनपसंद रचना को ढूंढ सकता है भी अहम है। पाठकीयता के निर्माण का एक पहलू डिवाइस मेकर भी हैं । डिवाइस यथा किंडल और आई प्लेटफॉर्म जहां रचनाओं को डाउनलोड करके पढ़ा जा सकता है । प्रकाशक पाठकीयता बढ़ाने और नए पाठकों के लिए अलग अलग प्लेटफॉर्म पर रचनाओं को उपलब्ध करवाने में महती भूमिका निभाता है ।
हिंदी साहित्य को पाठकीयता बढ़ाने के लिए सबसे आवश्यक है कि वो इस ईको सिस्टम के संतुलन को बरकरार रखे । इसके अलावा लेखकों और प्रकाशकों को नए पाठकों को साहित्य की ओर आकर्षित करने के लिए नित नए उपक्रम करने होंगे । पाठकों के साथ लेखकों के बाधित संवाद को बढ़ाना होगा । देश भर के अलग अलग शहरों में हो रहे करीब साढे तीन सौ लिटरेचर फेस्टिवल भी इसको बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं । इसके अलावा लेखकों को इंटरनेट के माध्यम से पाठकों से जुड़ कर संवाद करना चाहिए और अपनी रचनाओं पर फीडबैक भी लें । फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे की लेखिका ई एल जेम्स ने ट्राइलॉजी लिखने के पहले इंटरनेट पर एक सिरीज लिखी थी और बाद में पाठकों की राय पर उसे उपन्यास का रूप दिया । उसकी सफलता अब इतिहास में दर्ज हो चुकी है और उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है । इन सबसे ऊपर हिंदी के लेखकों को नए नए विषय भी ढूंढने होंगे । जिस तरह से हिंदी साहित्य से प्रेम गायब हो गया है उसको भी वापस लेकर आना होगा । आज भी पूरी दुनिया में प्रेम कहानियों के पाठक सबसे ज्यादा हैं । हिंदी में बेहतरीन प्रेम कथा की बात करने पर धर्मवीर भारती की गुनाहों की देवता और मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास कसप ही याद आता है । इस वर्ष जनवरी में दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में पुस्तक प्रेमों की भारी भीड़ ने एक बार फिर से साबित किया कि लोगों में पढ़ने की भूख है । जरूरत है पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर लिखा जाए और अगर इसपर आपत्ति हो तो पाठकों के अंदर की रुचि का परिष्कार करने का उपक्रम किया जाए ताकि पाठतों में साहित्य पढ़ने का एक संस्कार विकसित हो सके । हिंदी को इस मामले में अन्य भारतीय भाषाओं के साथ मिलकर कदम आगे बढ़ाना चाहिए ।
एक और पहलू है जिसपर हिंदी और हिंदी साहित्य को गंभीरता से विचार करना चाहिए वह है बाल साहित्य। हिंदी में बाल साहित्य की कमी भी पाठकों की कमी का एक कारण हो सकती है। है भी। इस ओर ध्यान देकर गंभीरता से काम होना चाहिए ताकि भविष्य के पाठक तैयार हो सकें । तभी हिंदी का भी विस्तार होगा और हिंदी मजबूत होगी।


Saturday, May 6, 2017

बाल साहित्य की उपेक्षा क्यों?

स्कूलों में गर्मी की छुट्टियां होनेवाली हैं और बच्चों को महीने डेढ महीने के लिए भारी भरकम बस्तों से भी छुट्टी मिलनेवाली है। इंटरनेट और इलेक्ट्रानिक गेम के चलन के पहले इस दौर में बच्चों की कई पत्रिकाएं निकलती थी। जो इन दिनों को ध्यान में रखकर विशेषांक आदि प्रकाशित करते थे । हमें याद है कि उन दिनों में बच्चों के अभिभावक अखबार डालनेवालों या फिर पुस्तक विक्रेताओं के पास जाकर बच्चों की पत्रिकाओं की अग्रिम बुकिंग करवा कर आते थे ताकि उनके बच्चों को पत्रिका के अंक मि सकें। पहले टीवी पर कार्टून ने और फिर इंटरनेट और इलेक्ट्रानिक गेम ने बच्चों के सामने विकल्प बढ़ा दिए। इन माध्यमों के तेजी से लोकप्रिय होते जाने से बच्चों की पत्रिकाएं धीरे धीरे बंद होने लगीं। इंद्रजाल कॉमिक्स से लेकर अमर चित्र कथा तक का प्रकाशन बंद हो गया। अब तो हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कम से कम हिंदी साहित्य जगत में बच्चों की भागीदारी बहुत ही कम, बल्कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनकी भागीदारी नगण्य हो चुकी है। लेखकों की प्राथमिकता में बाल साहित्य रहा नहीं । अधिकतर लेखक बच्चों के लिए रचनाएं लिखने से कन्नी काटते हैं । इसके पीछे के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है। आखिक क्यों लेखक बास पाठकों के लिए नहीं लिखना चाहते हैं। चंद लेखकों को छोड़ दें तो हाल के दिनों में सामने आई नई पीढ़ी के कथित युवा लेखकों में तो बाल साहित्य के प्रति अनुराग तो दूर की बात रुचि का भी आभाव दिखाई देता है। लेखकों को यह समझना होगा कि अगर श्रेष्ठ बाल साहित्य उपलब्ध नहीं होगा तो फिर उनकी अन्य रचनाओं को पढ़ने वाले पाठक कहां से मिलेंगे । दरअसल बाल साहित्य से किसी भी भाषा के साहित्य के पाठक ना केवल संस्कारित होते हैं बल्कि उनमें पठने की रुचि पैदा होती है । हिंदी में बाल साहित्य का ये आभाव, हो सकता है, पाठकों की कमी की वजह रही हो।

लेखकों से इतर अगर प्रकाशन की दुनिया पर नजर डालें तो वहां भी बाल साहित्य के नाम पर लगभग सन्नाटा ही दिखाई देता है। मेरी नजर में तो कोई भी हिंदी का प्रकाशक योजनाबद्ध तरीके से बच्चों की छुट्टियों को ध्यान में रखकर बाल साहित्य छापने का उपक्रम नहीं करता है। इससे इतर अन्य भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य की स्थिति बेहतर नजर आती है। यहां तक कि असमिया में भी बाल साहित्य को लेकर नए लेखक सृजनरत हैं। असमिया की युवा लेखिका रश्मि नारजेरी को बाल साहित्य के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसी तरह की स्थिति मलयालम और तमिल में भी देखी जा सकती है। फिर सवाल उठता है कि हिंदी के युवा लेखकों में बाल साहित्य के प्रति उपेक्षा का भाव क्यों है। दरअसल हिंदी साहित्य का जो पिछला करीब ढाई दशक का कालखंड है जो कुछ नारों और आंदोलनों के इर्द गिर्द के लेखन का काल है। चाहे वो स्त्री विमर्श हो, दलित लेखन हो या फिर फॉर्मूलाबद्ध वैचारिक लेखन हो। इन आंदोलनों और नारेबाजी के लेखन में बाल साहित्य कहीं सिसकी भर रहा है । गुलजार ने अवश्य बच्चों के लिए लगातार लिखा है और अब भी लिख रहे हैं । हिंदी साहित्य की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि युवा लेखक बाल साहित्य की प्रवृत्त हों और अपने भविष्य के पाठक तैयार करने की ही सोचकर बाल साहित्य की रचना करें। आवश्यक तो यह प्रकाशकों के लिए भी है वो बच्चों की कृतियों के लिए योजनाबद्ध तरीके से लेखकों से लिखवाने का उपक्रम करें।  

Saturday, June 4, 2016

बाल साहित्य को मिले अहमियत

अभी हाल ही में अंग्रेजी के लेखक देवदत्त पटनायक की बच्चों को ध्यान में रखकर लिखी दो किताबें प्रकाशित होकर बाजार में आई हैं । दोनों ही किताबें भारतीय विरासत और मिथकीय चरित्रों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं । इनको बच्चों के लिए रुचिकर बनाने के लिए देवदत्त पटनायक ने स्केच के माध्यम से कहानी कही है और बच्चों को उन रेखाचित्रों में रंग भरने का विकल्प दिया गया है । मजे के साथ कहानी या खेल खेल के साथ पढाई । अब इन दोनों किताबों को देखकर मेरे मन में हिंदी प्रकाशन और लेखक जगत को लेकर कई प्रश्न अंकुरित होने लगे । किस तरह से अंग्रेजी के प्रकाशक योजनाबद्ध तरीके से पाठकों को और उनकी सहूलियतों को ध्यान में रखकर प्रकाशन करते हैं । स्कूलों में गर्मी की छुट्टियां हो गईं तो बच्चों को वक्त बिताने के लिए कुछ चाहिए । इसी चाहत की पूर्ति के लिए देवदत्त पटनायक की दो किताबें बाजार में पेश कर दी गई । यहीं आकर हमारा हिंदी प्रकाशन जगत पिछड़ जाता है । वहां योजनाबद्ध तरीके से ज्यादातर प्रकाशक काम नहीं करते हैं । काल और परिस्थिति के मद्देनजर पुस्तकों के प्रकाशन की योजना नहीं बनती बल्कि लेखक और किताब के आधार पर प्रकाशन को प्राथमिकता दी जाती है । इसी तरह से दो हजार सात में जब देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम की डेढ सौवीं सालगिरह आई थी तो अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति पर अंग्रेजी में कई किताबें आई थीं । ऐसा कई मौकों पर देखने को मिलता है कि अंग्रेजी के प्रकाशन अग्रिम योजना बनाकर उसपर अमल करने में हिंदी के प्रकाशकों से आगे निकल जाते हैं । इस पर हिंदी के प्रकाशकों को ध्यान देना चाहिए । अब एक दो प्रकाशकों ने योजनाबद्ध तरीके से किताबें लिखवाने का काम शुरू किया है जिसे हम हिंदी प्रकाशन जहत के लिए सुखद संकेत मान सकते हैं ।

दूसरी बात यह है कि हिंदी में बाल साहित्य पर बहुत काम ध्यान दिया जाता है । बाल साहित्य लिखने वाले चुनिंदा लेखक हैं । एक बार गुलजार ने कहा था कि बाल साहित्य लिखना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है और लेखकों को इस चुनौती को स्वीकार करना चाहिए । हिंदी में बाल साहित्य की बेहद कमी है । घूम फिरकर पंचतंत्र आदि की कहानियां ही छपती रहती हैं । टी एस इलियट ने कहा था कि केवल अतीत ही वर्तमान को प्रभावित नहीं करता है बल्कि वर्तमान भी अतीत को प्रभावित करता है । इलियट के इस तर्क के आधार पर अबतक हर युग में साहित्य का मूल्यांकन हुआ है  लेकिन मुझे लगता है कि हिंदी में बाल साहित्य की उपलब्धता के आलोक में भी इस कथन को देखा जाना चाहिए । हिंदी में हम पाठकों की कमी का रोना रोते हैं लेकिन उसके मूल कारण में जाने की जरूरत महसूस नहीं करते हैं । हिंदी में रुचिकर बाल साहित्य के कम सृजन की वजह से बच्चे अंग्रेजी में लिखे जा रहे बाल साहित्य की ओर चले जाते हैं । इसकी और भी वजहें संभव है लेकिन यह भी एक वजह है । हम यह कह सकते हैं कि बाल साहित्य बच्चों को साहित्य की ओर ले जाने की नर्सरी है । हिंदी के ज्यादातर लेखक बाल साहित्य को कम अहमियत देते हैं उनको लगता है कि उनके नाम के साथ अगर बाल साहित्यकार लग गया तो उन्हें मुख्यधारा के साहित्यकारों के बीच अहमियत नहीं मिलेगी । इस मानसिकता और मनोविज्ञान ने हिंदी के लेखकों को बाल साहित्य से दूर किया । अंग्रेजी में ऐसा नहीं है । देवदत्त पटनायक जैसा मशहूर लेखक बाल साहित्य सृजन कर रहा है । इस बात को मजबूती के साथ रेखांकित किया जा सकता है कि अगर हिंदी में बाल साहित्य प्रचुरता में उपलब्ध होता तो हिंदी के पाठकों की कमी का रोना ना तो प्रकाशक रोते और ना ही लेखक । 

Sunday, August 31, 2014

बाल साहित्य की उपेक्षा

दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में मशहूर गीतकार और लेखक गुलजार ने हिंदी में बाल साहित्य की उपेक्षा पर क्षोभ प्रकट किया था । गुलजार ने कहा कि हमारे साथी साहित्यकार बच्चों को ध्यान में रखते हुए छिटपुट लिख रहे हैं, जो किसी भी पीढ़ी को संस्कारित करने के लिए नाकाफी है । गुलजार ने कहा कि हमारे समाज में बच्चों को लेकर एक खास किस्म की उपेक्षा दिखाई देती है जो हमारी जिंदगी के हर क्षेत्र में है । चाहे वो बाल मजदूरी को लेकर कानूनी खामियां हों या फिर बच्चों के यौन शोषण का मामला । समाज की इस उपेक्षा से हिंदी साहित्य भी अछूता नहीं है । गुलजार ने जिस समस्या की ओर ध्यान दिलाया दरअसल वह हमारे साहित्य समाज की तो बड़ी समस्या है ही उसका असर भी बहुत दूरगामी है । अगर हम हिंदी समाज में बाल साहित्य के परिदृश्य पर नजर डालें तो लगभग सन्नाटा नजर आता है । बच्चों की कई स्तरीय पत्रिकाएं बंद हो गईं । जो निकल रही हैं उनकी रचनाओं में विविधता का अभाव साफ तौर पर देखा जा सकता है । एक जमाने में अमर चित्रकथा समेत कई कॉमिक्स बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय थे लेकिन अब सब गायब । अभी हाल ही में प्राण का निधन हुआ । उन्होंने चाचा चौधरी और साबू जैसे मशहूर चरित्र को गढा और बच्चों के बीच उसे दीवानगी की हद तक लोकप्रिय बना दिया था । बच्चे उस श्रृंखला की नई कॉमिक्स का शिद्दत से इंतजार करते थे । पता नहीं किस बिनाह पर उसका प्रकाशन बंद कर दिया गया । माना यह गया कि घाटे की वजह से प्रकाशन बंद कर दिया गया । उसी तरह से एक बड़े प्रकाशन गृह से निकलनेवाली बच्चों की एक पत्रिका लोकप्रियता के चरम पर बंद कर दी गई । वजह वही बताया गया कि पत्रिका से मुनाफा नहीं हो रहा था । बाल प्रकाशनों में सवाल मुनाफे का नहीं होना चाहिए यह तो एक पूरी पीढ़ी को पढ़ने की आदत डालने के लिए किए जाने वाले निवेश की तरह देखा जाना चाहिए । एक ऐसा निवेश जो आगे जाकर कारोबारी और समाज दोनों को फायदा पहुंचा सकता है । अगर बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित ही नहीं होगी तो बड़ा होकर वो अखबार और अन्य पत्र पत्रिकाएं कैसे पढे़गा । इस मामूली सी बात को समझ कर बच्चों के प्रकाशनों पर कंपनियों को निवेश करना चाहिए था ।
अगर हम साहित्य को देखें तो वहां भी बच्चों को लेकर एक अजीब किस्म की उदासीनता देखने को मिलती है, सिर्फ मराठी, बांग्ला और मलयालम को छोड़कर, जहां जमकर बाल साहित्य लिखा और छापा जा रहा है  । इसका नतीजा वहां साफ दिखता है । इन भाषाओं में साहित्य के गंभीर पाठक हैं और नई पीढ़ी की भी पढ़ाई में रुचि है जो इन भाषाओं में बिकनेवाली किताबों की संख्या में साफ तौर पर दिखाई देती है  । हिंदी साहित्य की ही बात करें तो वहां पिछले चार पांच दशकों से बाल साहित्य पर गंभीरता से कोई काम ही नहीं हुआ  है। अब भी बच्चों को महाभारत की काहनियां, रामायण की प्रेरक कहानियां और पंचतंत्र की कहानियां पढ़ाकर बड़ा किया जाता है । जो लोग भी बाल साहित्य लिखते हैं उनको साहित्य जगत में मेनस्ट्रीम का लेखक नहीं माना जाता है । यह अकारण नहीं हो सकता कि जैसे जैसे एक खास विचारधारा का साहित्य में दबदबा बढ़ा वैसे वैसे हिंदी साहित्य में बाल साहित्य हाशिए पर चला गया ।बाल साहित्य के प्रति लेखकों की उदासीनता को समझा जा सकता है । अब अगर हम साहित्य और साहित्यकारों से इतर हटकर अखबारों को देखें तो इक्का दुक्का अखबारों को छोड़कर, बच्चों के लिए वहां पढ़ने की सामग्री नहीं के बारबर होती है। जो होती भी हैं वो साप्ताहिक परिशिष्ठों के अंत में बच्चों का कोना में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती हैं । टेलीविजन चैनलों पर तो और भीबुरा हाल है । कार्टूनों की बहुलता ने बच्चों को पढ़ाई से दूर करने में अहम भूमिका का निर्वाह किया है । बाल साहित्य को लेकर इस उदासीनता से तो एक बात साफ है कि हमारा समाज चाहे वो किसी भी तबके का हो अपने बच्चों और उसके भविष्य को लेकर गंभीर नहीं हैं । मध्यवर्ग में हर माता पिता चाहता है कि उनका बच्चा अच्छी शिक्षा हासिल करे लेकिन बच्चों को नैतिक शिक्षा देने को लेकर कोई पहल दिखाई नहीं देती है । इसी समस्या से जुड़ा है बच्चों की शिक्षा पद्धति । पिछले दो तीन दशकों में पूरे देश में अंग्रेजी स्कूलों की दुकानें गली मुहल्ले में खुलीं । कॉंन्वेंट स्कूल या अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर माता पिता बच्चों को धड़ल्ले से वहां भेज रहे हैं । इस तरह के स्कूलों में साहित्य के नाम पर आर्चीज और ऐरी आदि काफी लोकप्रिय हैं । इन स्कूलों के फैलाव ने हिंदी के बाल साहित्य पर काफी बुरा असर डाला क्योंकि अभिभावकों ने भी बच्चों को अंगेजी में पढ़ने के लिए प्रेरित करना शुरू किया ।
अब वक्त आ गया है कि हमें यह समझना होगा कि देश को अगर सचमुच विकसित राष्ट्र बनाना है तो समाज में बच्चों की उपेक्षा का जो अंधकारपूर्ण माहौल है उसको को खत्म करना होगा । हमारे नौनिहाल हमारे देश के भविष्य हैं और अपने भविष्य की उपेक्षा करनेवाला राष्ट्र एक हद से ज्यादा आगे नहीं जा सकता है । इस काम में देश के नागरिकों और सरकार को कंधे से कंधा मिलाकर काम करना होगा । यह बात तो हिंदी के कर्ताधर्ताओं को भी समझनी होगी और रचनाकर्म से जुड़े लोगों को भी ताकि बाल साहित्य में जो एक सन्नाटा है उसको तोड़ा जा सके । इससे बच्चों के साथ साथ साहित्य के लिए भी एक बड़ी जमीन तैयार होगी ।