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Saturday, March 25, 2023

राजनीतिक कोलाहल में गुम होता विमर्श


संसद के बजट सत्र में लगातार हंगामा होता रहा है। फिर मानहानि केस में दो साल की सजा के बाद राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त हो गई। संसद से लेकर सड़क तक हंगामा और बढ़ गया। आरोप प्रत्यारोप की राजनीति तेज हो गई है। बयानों के कोलाहल में संसद से जुड़ी कुछ समितियों की सिफारिशें और सरकार का उत्तर कहीं दब सा गया। एक वर्ष के बाद लोकसभा का चुनाव होना है। देश में राजनीति चरम पर है। पर संसदीय व्यवस्था का जो विमर्श लोगों तक पहुंचना चाहिए उसको बाधित करने का अधिकार राजनीति को नहीं है। संसदीय व्यवस्था के विमर्श को बाधित करने से जनता अंधेरे में रह जाती है और ये लोकतंत्र को कमजोर करता है। संसद के बजट सत्र में हुए हंगामे के कारण देश की संस्कृति से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण विमर्श पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो पाई। संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति ने संस्कृति मंत्रालय की बजट राशि में बढोतरी की बात की। समिति का कहना है कि इस वर्ष के बजट का सिर्फ 0.075 प्रतिशत ही संस्कृति मंत्रालय को आवंटित किया गया है। जबकि चीन, ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका और आस्ट्रेलिया अपने कुल बजट का दो से पांच प्रतिशत संस्कृति के विकास और संरक्षण पर आवंटित करता है। संसदीय समिति की इस टिप्पणी पर संस्कृति मंत्रालय ने अपनी स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय के मुताबिक भारत जैसे विकासशील देश में जहां ग्रामीण इलाके में आधारभूत ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन की स्थिति प्राथमिकता में है वहां जनता के अधिक धन को संस्कृति और कला के विकास पर खर्च करना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है। मंत्रालय की तरफ से ये भी कहा गया कि जिन देशों में कला और संस्कृति के विकास पर अधिक खर्च किया जा रहा है उनमें से अधिकांश राशि निजी क्षेत्रों के सहयोग से जुटाई जा रही है। संस्कृति मंत्रालय भी कला और संस्कृति के विकास के लिए देश की निजी कंपनियों को प्रोत्साहित कर रही है। अनेक ऐसी योजनाएं भी आरंभ की गई हैं जहां स्मारकों और पौराणिक इमारतों के रखरखाव का कार्य निजी कंपनियों को सौंपा गया है। 

ये एक ऐसा विषय है जिसपर राष्ट्रव्यापी चर्चा होनी चाहिए। यह सही है कि विकासशील देश की अलग प्राथमिकताएं होती हैं और विकसित देश की अलग। भारत जैसे समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले देश को ये भी सोचना होगा कि क्या संस्कृति इसकी प्राथमिकता में है या नहीं? यह ठीक है कि शिक्षा,स्वास्थ्य और ग्रामीण इलाकों में आधारभूत संरचनाएं हमारे देश की प्राथमिकता है लेकिन क्या हम इन चीजों के साथ संस्कृति को जोड़कर नहीं देख सकते हैं। परिवहन, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय की स्थायी समिति की रिपोर्ट संख्या 315 में कहा गया था कि संस्कृति का विकास किसी भी देश के विकास का अभिन्न हिस्सा है। संस्कृति के विकास से आर्थिक विकास को भी गति मिलती है। इससे रोजगार सृजन होता है और दूसरे क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है। संस्कृति के समग्र विकास से देश की एकता और अखंडता को भी शक्ति मिलती है। संस्कृति का संरक्षण और विकास हमारे देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संजोती है। संस्कृति को संजोने की बात तो प्रधानमंत्री भी कर चुके हैं। 

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमृतकाल के पांच प्रण बताए थे। उसमें तीसरा प्रण देश की विरासत पर गर्व है। विरासत पर गर्व तो तभी कर सकेंगे जब आनेवाली पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत के बारे में बता सकेंगे। आनेवाली पीढ़ी के लिए अपनी विरासत को संजो कर, उसको संरक्षित कर सकेंगे। किसी भी विरासत को संजोने और संरक्षित करने में धन की आवश्यकता होती है। संसदीय समिति के अवलोकन और संस्कृति मंत्रालय के उत्तर से ये स्पष्ट होता है कि सरकार अपनी विरासत को संजोने और उसको संरक्षित करने के लिए अब निजी क्षेत्र को भागीदार बनाना चाहती है। निजी क्षेत्र को भागीदार बनाया जाना चाहिए। बनाया जा भी रहा है। लेकिन यह भी देखना होगा कि जो कार्य सरनरेन्काद्रर मोदी या सरकारी विभाग कर सकते हैं उसको निजी क्षेत्र के लोग उसी जिम्मेदारी से निभा पा रहे हैं या नहीं। आज जब पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है तो क्या ये माना जाए कि सरकार देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को निजी क्षेत्रों के भरोसे संरक्षित और उसके विकास के रास्ते पर चलने का मन बना चुकी है। कला संस्कृति के विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी लंबे समय से रही है। दिल्ली से लेकर मुंबई और कोलकाता से लकर बेंगलुरू और चेन्नई तक में निजी क्षेत्र की भागीदारी से कला संस्कृति को बल मिल रहा है। चाहे वो सांस्कृतिक केंद्र की स्थपना हो या कलाओं को सहेजने का उपक्रम। निजी क्षेत्र की भागीदारी है और बढ़ भी रही है।  

संस्कृति को लेकर एक महत्वपूर्ण बात ये है कि अबतक केंद्रीय बजट में संस्कृति मंत्रालय को जितनी धनराशि का आवंटन किया जा रहा है उसका सही उपयोग हो पा रहा है नहीं। आजकल संस्कृति से जुड़ी सरकारी संस्थाओं में एक ऐसी प्रवृत्ति देखी जा रही है जिसको अविलंब तर्कसंगत बनाए जाने की आवश्यकता है। आज स्थिति ये है कि संस्कृति से जुड़ी संस्थाएं लगातार कार्यक्रमों के आयोजन करने में लग गई है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर विशेष आयोजन होना उचित था। उसके बाद भी लगातार आयोजनों से क्या हासिल हो रहा है। इसका परीक्षण तो किसी न किसी स्तर पर किया ही जाना चाहिए। संस्कृति के विकास का दायित्व जिन संस्थाओं पर है वो कुछ ठोस करने की बजाए आयोजनों में जुटी हैं। जिन संस्थाओं पर संरक्षण की जिम्मेदारी है वो भी प्रदर्शनियों आयोजित कर रही हैं। अधिकारियों के लिए बहुत आसान होता है कि वो किसी मंत्री या नेता को बुलाकर आयोजन का शुभारंभ करवा कर अपने नंबर बढ़वा लें। जबकि कुछ ठोस करने के लिए श्रम करना होगा। संस्कृति से जुड़े ग्रंथों के पुनर्प्रकाशन या नए ग्रंथों के प्रकाशन के कार्य में सुपात्र के चयन से लेकर उसके प्रकाशन तक में मेहनत की आवश्यकता होगी। जिस मेहनत की आवश्यकता आयोजनों में नहीं होती। सांस्कृतिक संस्थाओं की देखा देखी अब विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भी आयोजनों की भरमार हो गई है। 

संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी इन संस्थाओं के आयोजनों में जो खर्च होता है वो तो बजट में आवंटित राशि से ही होता है। इस धनराशि का उपयोग पौराणिक इमारतों और स्मारकों के संरक्षण पर किया जाना चाहिए। पूरे देश में आर्कियोलाजी सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) के संरक्षित इमारतों में से ज्यादातर की हालत बहुत अच्छी नहीं है। इस स्तंभ में कई स्मारकों और उसके संरक्षण में लापरवाहियों का उल्लेख किया जा चुका है। ऐसी स्थिति में सरकार को सांस्कृतिक विकास के लिए एक संतुलन बनाकर चलना होगा। निजी क्षेत्र को सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करने के लिए प्रेरित करना, उनको संरक्षण पर धन खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करें ।साथ ही सरकारी विभागों को आवंटित धन राशि को लेकर एक ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें उसका सदुपयोग हो सके। संस्कृति मंत्रालय को ये भी देखना चाहिए कि जिन विभागों के पास सांस्कृतिक धरोहरों को बचाकर रखने की जिम्मेदारी है वहां पर्याप्त मानव संसाधन है कि नहीं। संस्कृति मंत्रालय की स्थायी समिति ने एएसआई में विशेषज्ञों और कर्मचारियों की कमी की ओर भी ध्यान आकर्षित करवाया था। मंत्रालय को उनकी नियुक्ति में तेजी लानी चाहिए। संस्कृति से जुड़ा एक काम नीति आयोग को भी करना चाहिए। उसको कई मंत्रालयों में संस्कृति से जुड़े कार्यों का आकलन करना चाहिए और फिर केंद्र सरकार को संस्कृति मंत्रालय के पुनर्गठन का सुझाव देना चाहिए। इससे संस्कृति से जुड़े सभी कार्य एक ही मंत्रालय से हो सकेंगे और धन भी बचेगा। 

Saturday, April 22, 2017

हिंदी की बाधाएं

हाल के दिनों में दो खबरें ऐसे आईं जिसको लेकर भाषा के पैरोकारों की पेशानी पर बल पड़ने लगे। पहली खबर तो ये आई कि सीबीएसई के स्कूलों में दसवीं तक हिंदी की शिक्षा को अनिवार्य किया जा रहा है और दूसरी खबर ये आई कि हिंदी पर बनाई गई संसदीय समिति की कुछ सिफारिशों को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है । इन सिफारिशों में ये भी शामिल था कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री अपना भाषण हिंदी में देंगे, जिसको भी मंजूरी मिली, लेकिन शर्त के साथ। शर्त ये इनको हिंदी आती हो और वो इस भाषा में सहज हों। सीबीएसई ने हिंदी को अनिवार्य करने की खबरों से इंकार कर दिया और कहा कि भाषा को लेकर जो फॉर्मूला चल रहा है वही जारी रहेगा। लेकिन संसदीय समिति की सिफारिशों के खिलाफ एक माहौल बनाने की कोशिश की जाने लगी है। यह सत्य और तथ्य है कि भारत के लगभग साठ करोड़ लोग हिंदी बोलते और समझते हैं। यह भी माना जाने लगा है कि हिंदी एक तरीके से पूरे देश में संपर्क भाषा के तौर पर विकसित हो चुकी है और कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से कोलकाता तक सबलोग हिंदी समझते हैं। तो फिर हिंदी का विरोध क्यों। इसका उत्तर एक शब्द का है, राजनीति।
अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए गैर हिंदी प्रदेश के कुछ नेता इसको मुद्दा बनाकर जनता की भावनाएं भड़काना चाहते हैं। इन भावनाओं को भड़काने के पीछे भाषा से कुछ लेना देना हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है। बल्कि ये संकेत मिलते हैं कि इसके पीछे वोटबैंक की राजनीति है। डीएमके नेता एम के स्टालिन ने पिछले चुनाव के वक्त कई इलाकों में हिंदी में अपनी पार्टी के पोस्टर लगवाए थे। अब संसदीय समिति की सिफारिश के बाद वो भी हिंदी के विरोध का झंडा लेकर खड़े हो गए हैं । इसके पहले भी वो हाईवे पर बोर्ड में हिंदी में शहरों के नाम लिखवाने को मुद्दा बनाने की कोशिश में लगे थे जो परवान नहीं चढ़ सकी। इन विरोधों के बीच केंद्र की तरफ से बार-बार ये कहा गया है कि हिंदी किसी पर थोपी नहीं जाएगी ।
दरअसल हिंदी को सरकारी नोटिफिकेशन आदि से सर्वामान्य भाषा के तौर पर स्थापित किया भी नहीं जा सकता है। इसके लिए हिंदी अपना रास्ता खुद बना रही है। हिंदी के विकास में दो सबसे बड़ी बाधा है पहली तो अंग्रेजी के पैरोकार जो खुद औपनिवेशिक मानसिकता में जी रहे हैं। उनको लगता है कि हिंदी का अगर दबदबा कायम हुआ तो उनकी धमक कमजोर हो जाएगी । इसके लिए वो लगातार प्रयत्न करते हैं कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं एक दूसरे से झगड़ती रहें। जबकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में किसी तरह का कोई झगड़ा है नहीं। अन्य भारतीय भाषाओं की कृतियों का जितना अनुवाद हिंदी में होता है उतना किसी अन्य भाषा में नहीं होता है। हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं को यह समझना होगा कि हित इसी में हैं कि वो साथ साथ चलें। कहा भी गया है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं सहोदर हैं तो फिर झगड़ा कैसा और क्यों? हिंदी के विकास में दूसरी बाधा उसका अपना तंत्र है। हिंदी को सर्वमान्य बनाने के लिए भाषा में नए शब्दों के गढ़ने की जरूरत है। कई बार हिंदी में शब्दों की कमी नजर आती है और उसके लिए अंग्रेजी के वैकल्पिक शब्द का प्रयोग करना पड़ता है । जैसे हिंदी में रोमांस, डेट आदि के लिए शब्द गढ़ने की जरूरत है । हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए और युवाओं के बीच पैठ बनाने के लिए एक तरह का खुलापन भी लाना होगा। अतिशुद्धतावाद से बचना होगा और अगर अन्य भाषा के शब्द सहजता से आ रहे हैं तो उसका स्वागत भी करना होगा ।

      

Saturday, February 25, 2017

भारतीय भाषाओं के हक की सिफारिश

क्या यह बिडंबना नहीं है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी देश के उच्च और सर्वोच्च न्यायलयों में भारतीय भाषाओं में काम-काज नहीं हो पा रहा है । कई बार हाईकोर्ट में स्थानीय भाषाओं में सुनवाई और फैसलों का प्रस्ताव सामने आया लेकिन वो योजना परवान नहीं चढ़ पाई और इन अदालतों में अब भी अंग्रजी में ही कामकाज हो रहा है । अब उच्च न्यायलयों में अंग्रेजी के दबदबे को खत्म करने की दिशा में कानून मंत्रालय की संसदीय समिति ने बेहद अहम प्रस्ताव रखा है । संसदीय समिति ने देश के सभी चौबीस उच्च न्यायलों में हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में कामकाज करने की सिफारिश की है । संसदीय समिति के प्रस्ताव के मुताबिक संविधान में केंद्र सरकार को इस बारे में फैसला लेने का अधिकार दिया गया है । संसदीय समिति ने अपनी सिफारिश में इस बात पर भी जोर दिया है कि इस मसले पर अदालतों की सलाह लेने की जरूरत नहीं है । संसदीय समिति ने न्यायिक सलाह नहीं लेने पर जोर इस वजह से दिया लगता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अक्तूबर दो हजार बारह में गुजरात, तमिलनाडू, कर्नाटक, छत्तीससगढ़ पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के उच्च न्यायलयों में स्थानीय भाषाओं में कामकाज के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था । सुप्रीम कोर्ट ने उन्नीस सौ सत्तानवे और उन्नीस सौ निन्यानबे के अपने पुराने फैसलों के हवाले से इन प्रस्तावों को खारिज किया था । पिछले दिनों भी इस मसले पर एरक याचिका दायर की गई थी जिसपर उस वक्त के मुख्य न्यायधीश ने याचिकाकर्ता पपर कठोर टिप्पणी की थी । अब संसदीय समिति की इस रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि अगर संबंधित राज्य सरकारें इस तरह का प्रस्ताव देती है तो केंद्र सरकार संविधान में मिले अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए उसको लागू करने का फैसला ले सकती है । इस मसले पर संविधान में तो प्रावधान है लेकिन उन्नीस सौ पैंसठ में कैबिनेट के एक फैसले से न्यायलयों से इस बारे में सलाह लेने की परंपरा की शुरुआत हुई थी जो अबतक चली आ रही है । अब अगर केंद्र सरकार संसदीय समिति की सिफारिशों को लागू करना चाहती है तो उसको कैबिनेट के फैसले पर पुनर्विचार करना होगा । मौजूदा सरकार को इस मसले पर संजीदा रुख अख्तियार करना होगा ।

अदालतों में हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में कामकाज करने का विरोध यह कहकर किया जाता है कि इससे न्यायधीशों को दिक्कत होगी और उच्च न्यायलयों में किसी प्रदेश के जज को किसी भी प्रदेश में स्थानांतरण की प्रक्रिया बाधित होगी । संभव है कि ऐसा हो, लेकिन इसके लिए कोई मैकेनिज्म बनाया जा सकता है ताकि न्यायाधीशों को दिक्कत ना हो और उनके स्थानांतरण को लेकर भी प्रक्रिया बाधित ना हो ।लेकिन न्यायलयों में हिंदी में काम नहीं होने पर कई बार केस मुकदमे में अदालत पहुंचे पीड़ितों को अदालत की भाषा या वहां जारी बहस समझ नहीं आती है और वो मूकदर्शक बने रहते हैं । निर्भया के मामले में भी ऐसा हो रहा था । उसकी मां लगातार सुप्रीम कोर्ट जाती थी और कई बार बगैर कुछ समझे बूझे वहां से वापस हो लेती थी । बाद में उनकी मदद की गई । अगर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को उच्च न्यायलयों में कामकाज की एक भाषा बनाने का फैसला होता है तो इससे भाषा का गौरव बढ़ेगा, साथ ही ज्यादातर पीड़ितों को भी इंसाफ की भाषा समझ में आ सकेगी । अगर अदालतों की बात को छोड़कर भाषा के सवाल पर विचार करें तो हमें लगता है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी हम अपनी भाषा को लेकर कोई ठोस नीति नहीं बना पाए । अब वक्त आ गया है कि भाषा संबंधी ठोस नीति बने और उसको बगैर किसी सियासत के लागू किया जा सके ।