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Saturday, May 18, 2024

अमेठी में भावना और विकास का संघर्ष


सोमवार को लोकसभा के पांचवें चरण के लिए मतदान होना है। उत्तर प्रदेश की कई अन्य सीटों के साथ रायबरेली और अमेठी में भी इस दिन वोट डाले जाएंगे। 2019 में अमेठी से पराजित होने के बाद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी बगल की सीट रायबरेली से चुनाव लड़ रहे हैं। अबतक उनकी मां सोनिया गांधी रायबरेली से सांसद थीं। अमेठी से केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी के रूप में तीसरी बार चुनाव मैदान में हैं। उनके सामने लंबे समय से गांधी परिवार का कामकाज देखनेवाले किशोरी लाल शर्मा कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। अमेठी में कांग्रेस पार्टी की तरफ से प्रचार का जिम्मा प्रियंका गांधी वाड्रा ने ले रखा है। वो गली मोहल्लों में चुनावी सभा कर रही हैं। चुनाव को भावनात्मक रूप देने का भी प्रयत्न किया जा रहा है। वो निरंतर अपने पिता राजीव गांधी और उनके कार्यों के बारे में बोल रही हैं। तुलनात्मक रूप से अगर देखा जाए तो प्रियंका गांधी वाड्रा राहुल गांधी के अमेठी के सांसद के तौर पर 15 वर्षों के काम पर बहुत ही कम बोल रही हैं। लगभग हर सभा में गांधी परिवार और अमेठी के रिश्तों को रेखांकित करती हुई नजर आईं। इस रिश्ते पर अमेठी की जनता का कितना भरोसा था ये तो 2019 के चुनाव परिणाम में सामने आ गया था, जब स्मृति इरानी ने राहुल गांधी को 55 हजार से अधिक मतों से पराजित कर दिया था। गांधी परिवार के सदस्य की अमेठी से ये तीसरी हार थी। इसके पहले संजय गांधी भी 1977 का लोकसभा चुनाव वहां से हार चुके थे। बाद में मेनका गांधी भी राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़कर हारीं। राहुल गांधी की हार इस मायने में कांग्रेस की राजनीति का एक अहम मोड़ था क्योंकि वो तब पार्टी के अध्यक्ष थे। राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के पहले अध्यक्ष थे जो पद पर रहते हुए लोकसभा का चुनाव हारे थे। 

रही बात प्रियंका गांधी वाड्रा की तो उत्तर प्रदेश का 2022 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने प्रियंका गांधी की अगुवाई में लड़ा था और पूरे प्रदेश में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। पूरे प्रदेश में कांग्रेस का मत प्रतिशत भी दो ढाई प्रतिशत के करीब तक गिर गया था। राजनीतिक पंडित भी इस बात को मानते हैं कि अगर किसी पार्टी को चुनाव में छह प्रतिशत से कम वोट मिलते हैं तो उसको फिर से खड़ा होने में काफी समय लगता है। कांग्रेस इस समस्या से जूझ रही है। पिछले दिनों अमेठी और रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में जाने और वहां के मतदाताओं से मिलने और बात करने का अवसर मिला था। वहां ये पता चला कि 2003 में जब प्रियंका गांधी अमेठी आई थीं तो उनके साथ उनके पति राबर्ट वाड्रा भी आए थे। उस समय राबर्ट और प्रियंका का अमेठी के लोगों ने स्वागत किया था। कई गांव में उनको ले जाया गया था। अमेठी में पोस्टर भी लगे थे कि दीदी जीजा जी आए हैं नई रोशनी लाए हैं। उसके बाद हर चुनाव के समय पहले दीदी, फिर जीजा जी आते रहे, चुनावी वादे होते रहे। उन वादों को जमीन पर उतरने का अमेठी के लोगों को इंतजार ही रहा। जब वादे पूरे नहीं हुए तो प्रियंका वाड्रा को अमेठी की जनता की उदासीनता का सामना भी करना पड़ा था। कुछ लोग किशोरी लाल शर्मा के क्षेत्र से जुड़े होने का दावा करते नजर आए लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में किशोरी लाल शर्मा को कांग्रेस ने ही कम तवज्जो दी थी। तब राहुल गांधी के प्रतिनिधि चंद्रकांत दुबे थे। प्रियंका के सहयोगी धीरज श्रीवास्तव और राहुल के करीबी साथी कनिष्क सिंह चुनाव में अहम भूमिका निभा रहे थे। जब राहुल गांधी ने अमेठी ने न लड़ने का निर्णय लिया तो पार्टी को किशोरी लाल शर्मा की याद आई। किशोरी लाल शर्मा अच्छे चुनावी मैनेजर हो सकते हैं लेकिन एक नेता के तौर पर उनके काम का सामने आना अभी शेष है। अमेठी के जिन वोटरों से मैं मिला उनमें किशोरी लाल शर्मा को लेकर एक संशय दिखा। 

2019 में जब अमेठी लोकसभा चुनाव हो रहे थे तब भी मैं उस क्षेत्र में गया था। चुनाव के बाद भी कई बार गया। इस बार अमेठी में जो बदलाव देखने का मिला वो कई मायनों में गेमचेंजर हो सकता है। चार पांच वर्ष पहले अमेठी के कई गांवों में छप्पर वाले घर दिखाई देते थे। अब कम गांवों में ही छप्पर वाले घर दिखाई देते हैं। गौरीगंज से जामों जानेवाली सड़क पर दुबे जलपान गृह में हमलोग कुछ देर के लिए रुके थे। वहां माधोपुर गांव के कुछ लोग बैठे थे। उनसे जब इस बारे मे बात की तो उनकी भी राय थी कि अमेठी लोकसभा क्षेत्र में छप्पर वाले घर बहुत कम हो गए हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना में लोगों के घर पक्के हो गए हैं। शौचालय बन गए हैं। वहां बैठे रामाधर सिंह ने बताया कि छप्पर कम होने से अमेठी में आग लगने की घटनाएं बहुत कम हो गई हैं। पहले अमेठी में आग लगने की काफी घटनाएं होती थीं। यह अनायस नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी स्मृति इरानी यह दावा करती हैं कि उनके क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत एक लाख चौदह हजार घर बने और चार लाख से अधिक शौचालय बने। वो ये भी बताती हैं कि इतना काम तीन वर्षों में ही हो पाया क्योंकि दो वर्ष कोरोना महामारी की भेंट चढ़ गए। इस जलपान गृह में काफी देर तक हमलोग अमेठी की राजनीति को समझने का प्रयत्न करते रहे। यहां कुछ कांग्रेस समर्थक भी आए। पहले तो उन्होंने आते ही प्रत्याशी किशोरी लाल की प्रशंसा आरंभ की। थोड़ी देर बाद वो खुले तो उनका दर्द झलक गया और कहने लगे कि राहुल गांधी अपने आसपास के लोगों से इतना घिरे रहते हैं कि जनता उनसे मिल ही नही पाती है। उनमे में से एक बुजुर्ग व्यक्ति ने बहुत मार्के की बात कही, राजीव गांधी और संजय गांधी अमेठी से भावनात्मक संबंध इस कारण बना पाए थे कि उनके पास सतीश शर्मा, जे एन मिश्रा और किशोर उपाध्याय जैसे समर्पित व्यक्ति थे, जो निरंतर क्षेत्र की जनता के साथ संवाद और संपर्क में रहते थे। अपने नेता और जनता के बीच दीवार नहीं बनते थे। 

यहां से गौरीगंज के कांग्रेस कार्यालय होते हुए हमलोग आलोक ढाबा पहुंचे। 2014 में इसी आलोक ढाबा से स्मृति इरानी ने अपना चुनाव लड़ा था। वहां चुनावी सरगर्मी बनी रहती है। इस ढावा के मालिक आलोक जी सह्दय व्यक्ति हैं। बोलते कम, सुनते और मुस्कुराते ज्यादा हैं। वहीं पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता मतदाता जागरूक रैली की तैयारी कर रहे थे। वो बहुत उत्साहित थे। वहां पर विद्यार्थी परिषद के सुल्तानपुर और अमेठी के संगठन मंत्री प्रिंस कुमार मिले। उनसे राजनीति की बहुत बातें होती रहीं। उनकी बातों में राजनीतिक परिपक्वता झलक रही थी। अमेठी चुनाव और कार्यकर्ताओं को लेकर उनकी टिप्पणी उचित प्रतीत हुई। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी परिषद से जुड़े कई कार्यकर्ताओं के घर के बड़े कांग्रेसी हैं, जिस कारण वो मुखर नहीं हो पा रहे हैं। जब हम वापस लौटने को हुए तो प्रिंस ने एक बेहद सधी हुई टिप्पणी कर दी। उन्होंने कहा कि अमेठी में कांग्रेस पार्टी नहीं, प्रथा है। किसी भी प्रथा को समाप्त करने में समय लगता है। बाल विवाह प्रथा को समाप्त करने के लिए समाज सुधारकों को काफी लंबा संघर्ष करना पड़ा था। लेकिन अब भी पूरी तरह से ये प्रथाएं समाप्त नहीं हुईं कहीं न कहीं इसके अवशेष देखने को मिल ही जाते हैं। इस राजनीतिक आब्जर्वेशन से चौंका पर ट्रेनिंग तो विद्यार्थी परिषद की है। 


Saturday, December 9, 2023

मोदी विजय रथ को रोक पाएंगे राहुल?


राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर चर्चा आरंभ हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के हौसले बुलंद हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव में हैट्रिक का विमर्श शुरु कर दिया है। उधर कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों में मायूसी का वातावरण है। तेलांगना के विधानसभा चुनाव में जीत के बावजूद कांग्रेस पार्टी अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार नहीं कर पा रही है। कुछ दिनों पूर्व बने विपक्षी दलों के गठबंधन आईएनडीआईए को लेकर कुछ ठोस सामने नहीं आ रहा है। विशेषज्ञ ऐसा होगा तो ऐसा होगा के तर्कों के सहारे भारतीय जनता पार्टी की कठिनाइयों को गिनाने में लगे हैं। चुनावी विश्लेषक विधानसभा चुनाव में विपक्षी दलों को मिले वोटों की संख्या के आधार पर लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के सामने चुनौती पेश करने का प्रयास कर रहे हैं। यही विश्लेषक ये कहते हुए नहीं थकते थे कि विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में मतदान का पैटर्न अलग होता है। स्मरणीय है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा का चुनाव हार गई थी लेकिन अगले ही वर्ष 2019 में जब लोकसभा का चुनाव हुआ तो भारतीय जनता पार्टी को 2014 में मिली सीटों से अधिक सीटें प्राप्त हुईं। इसी तरह से दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को बंपर जीत मिली थी लेकिन लोकसभा चुनाव में सातों सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत का परचम लहराया। आंकड़ों से संकेत तो मिल सकते हैं लेकिन उसे परिणाम का सटीक आकलन नहीं लग सकता है। 

लोकसभा के चुनाव में जनता यह तय करती है कि कौन सा नेता ऐसा है जो राष्ट्रीय नेतृत्व प्रदान कर सकता है। वैश्विक मंच पर राष्ट्रीयय हित को मजबूती से पेश कर सकता है। पूरे देश को साथ लेकर चल सकता है और जिसकी नीतियों से देश का विकास होगा। किस नेतृत्व में स्थायित्व और स्थिरता प्रदान करने की क्षमता है। वर्तमान राजनीति परिदृष्य में नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के सर्वमान्य नेता हैं और पार्टी 2024 का लोकसभा चुनाव मोदी के नेतृत्व में लड़ेगी। विपक्ष में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है और उसकी उपस्थिति हर राज्य मैं है। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भले ही मल्लिकार्जुन खड़गे हैं लेकिन अगर प्रधानमंत्री बनने की नौबत आई तो राहुल गांधी ही आगे आएंगे। आईएनडीआईए में भी सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण कांग्रेस का नामित नेता ही उसका नेतृत्व कर सकता है। यहां भी राहुल गांधी का ही नाम आ सकता है। इस बात की संभवाना कम है कि राहुल गांधी किसी अन्य के नेतृत्व में 2024 के लोकसभा चुनाव मैदान में जाएं। राहुल गांधी के कुछ स्वयंभू सलाहकार और गठबंधन के कुछ दल राहुल गांधी के नाम पर असहमति जता सकते हैं लेकिन जिस प्रकार अन्य दलों के नेताओं के नाम पर मतभिन्नता है उसमें राहुल के नाम पर ही मतैक्य हो सकता है। विपक्षी गठबंधन नेतृत्व के प्रश्न को लोकसभा चुनाव के बाद के लिए टालने की घोषणा कर सकते हैं लेकिन उसका कोई लाभ होगा, इसमें संदेह है। स्वाभाविक है कि विपक्षी गठबंधन मजबूरी में ही सही लेकिन राहुल गांधी को नेता चुन सकते हैं। अगर राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों का गठबंधन आईएनडीआए चुनाव मैदान में जाता है तो फिर मुकाबला नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के बीच होगा। 

राहुल गांधी के बारे में देश में एक राय है। कांग्रेस पार्टी में भी। सोमवार को पूर्व राष्ट्रपति और लंबे समय तक कांग्रेस पार्टा के महत्वपूर्ण नेता रहे प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी की पुस्तक बाजार में आ रही है। पुस्तक का नाम है प्रणब, माई फादर। इस पुस्तक में सोलह स्थानों पर राहुल गांधी का उल्लेख है और कई स्थानों पर तो प्रणब मुखर्जी के डायरी के अंश भी उद्धृत किए गए हैं। प्रणब मुखर्जी की डायरी के अंश संभवत: पहली बार सार्वजनिक होने जा रहे हैं। प्रसंग 29 जनवरी 2009 के कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक का है।  प्रणब मुखर्जी अपनी डायरी में लिखते हैं, राहुल गांधी ने गठबंधन के विरोध में अपनी बात जोशीले अंदाज में रखी। मैंने (प्रणब) उनसे कहा कि जोश तो ठीक है लेकिन अपने आयडिया को विस्तार से कारण समेत व्याख्यायित करें। प्रणब मुखर्जी के इतना कहने पर राहुल गांधी ने उनकी तरफ देखा और कहा कि वो उनसे अलग से बात कर लेंगे। उसके बाद प्रणब मुखर्जी ने राहुल के बारे में अपनी डायरी में लिखा कि वो बेहद शिष्ट हैं और उनके मन में काफी प्रश्न कुलबुलाते रहते हैं जो ये दर्शाते हैं कि वो सीखना चाहते हैं लेकिन अभी राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से परिपक्व होना बाकी है। परिपक्वता के प्रश्न पर ही प्रणब मुखर्जी 27 सितंबर 2013 की एक घटना का उदाहरण देते हैं। उस दिन राहुल गांधी दिल्ली में अजय माकन के एक प्रेस कांफ्रेंस में पहुंच गए थे और उन्होंने एक अध्यादेश की काफी सार्वजनिक रूप से फाड़ दी थी। भन्नाए प्रणब मुखर्जी लिखते हैं कि राहुल गांधी खुद को क्या समझते हैं? वो कैबिनेट के सदस्य नहीं हैं। वो होते कौन हैं जो कैबिनेट के निर्णय को सार्वजनिक रूप से फाड़ डालें। प्रदानमंत्री विदेश में हैं। उनको(राहुल) को इस बात का अनुमान भी है कि उनके इस कदम का परिणाम और प्रधानमंत्री पर क्या असर होगा? राहुल को प्रधानमंत्री को इस तरह अपमानित करने का अधिकार किसने दिया? राहुल में गांधी-नेहरू खानदान से होने अहंकार तो है लेकिन राजनीतिक कौशल नहीं। कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन उपाध्यक्ष की इस हरकत को लेकर प्रणब मुखर्जी बेहज नाराज दिखते हैं और कहते हैं कि राहुल का यह कार्य कांग्रेस पार्टी के लिए ताबूत की आखिरी कील साबित हुई। वो प्रश्न उठाते हैं कि लोग कांग्रेस को इसके बाद वोट क्यों देंगे। वो इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं हैं कि राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी को फिर से सक्रिय कर पाएंगे। वो लिखते हैं कि सोनिया जी राहुल को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहती हैं लेकिन उनमें (राहुल) करिश्मा और राजनीतिक समझ की कमी के कारण कठिनाई हो रही है। 

राहुल गांधी को लेकर सिर्फ प्रणब मुखर्जी की ही ये राय नहीं है। अपनी पुस्तक अमेठी संग्राम लिखने के दौरान मैंने युवक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष से बात की थी तो उन्होंने भी कमोबेश इसी तरह की बात कही थी। उन्होंने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही थी वो ये राहुल गांधी अगर किसी नेता से नाराज होते हैं तो वो उसको दंडित नहीं करते हैं और जब खुश होते हैं तो पारितोषिक भी नहीं देते। खफा होने से उससे बातचीत बंद कर देते हैं जिसका नुकसान संगठन को होता है। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी हैं जो दोनों स्थितियों में निर्णय लेते हैं। 2024 का लोकसभा चुनाव अगर नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी होता है तो आज की स्थिति में मोदी का हैट्रिक तो तय ही है। राहुल गांधी या आईएनडीआईए को अगर नरेन्द्र मोदी को चुनौती देनी है तो उनको एक परिपक्व राजनीतिक चेहरा ढूंढकर उसपर सभी दलों के बीच सहमति बनानी होगी। उस नेता को अपनी  नीतियों और विजन को जनता के सामने रखना होगा। आईएडीआईए ने अबतक दो ढाई दिन ही काम किया है। विपक्षी गठबंधन की तरफ से हाल ही में एक बैठक आहूत करने का समाचार आया था लेकिन अज्ञात कारणों से वो बैठक टाल दी गई। आमचुनाव में छह महीने से भी कम समय बचा है। भारतीय जनता पार्टी अपनी चुनावी तैयारियां कर चुकी है लेकिन विपक्षी गठबंधन को बहुत कुछ करना शेष है। अगर विपक्ष ने समय का सदुपयोग नहीं किया तो परिणाम हैट्रिक की ओर ही जाता दिख रहा है। 


Saturday, March 6, 2021

हिंदू नवजागरण के अनुत्तरित प्रश्न


पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद सभी राजनीतिक दल एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के सामने भारतीय जनता पार्टी एक बड़ी चुनौती लेकर खड़ी है। कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्षरत दिखाई दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल का चुनाव देश के अन्य राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव से थोड़ा अलग हटकर है। यहां बंगाल की संस्कृति और बंगाली अस्मिता भी प्रमुख चुनावी मुद्दा बनते हैं। भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस लगातार वहां की संस्कृति की बात कर रही है। तृणमूल कांग्रेस खुद को बंगाल की संस्कृति का ध्वजवाहक बताते हुए चुनाव मैदान में है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के कई नेता लेखकों, कलाकारों और फिल्म अभिनेताओं के संपर्क में हैं। उधर भारतीय जनता पार्टी के नेता भी सोनार बांगला के नारे के अंतर्गत बंगाल की खोई हुई अस्मिता को वापस लाने की बात करते हुए लगातार बुद्धिजीवियों के संपर्क में हैं। जब ममता बनर्जी बंगाल में वामपंथियों के खिलाफ पहली बार चुनाव लड़ रही थीं तब कोलकाता की सड़कों पर कई होर्डिंग लगे थे जिसमें महाश्वेता देवी समेत कई लेखकों कलाकारों के चित्र लगे थे और उसमें बांग्ला में लिखा था ‘परिवर्तन’। तब ये माना गया था कि इन होर्डिंग्स का मतदताओं पर असर पड़ा था। पश्चिम बंगाल में अब भी लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों को गंभीरता से लिया जाता है और लोग उनका आदर भी करते हैं। इस आदर की ऐतिहासिक वजहें हैं। माना जाता है कि बंगाल के महापुरुषों ने सबसे पहले एक राष्ट्र का स्वप्न देखा था। भारतीयता के अराधक राजा राममोहन राय बंगाल की धरती पर पैदा हुए थे। राजा राममोहन राय से लेकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर तक जो परंपरा चली जिसे नवजागरण के नाम से जानते हैं उसमें केंद्र में भी भारत और भारतीयता है। इस नवजागरण का जब विश्लेषण किया जाता है तो इस बात को छोड़ दिया जाता है कि दरअसल ये नवजागरण, हिंदू नवजागरण था। इस राष्ट्रवादी चेतना के उत्थान के सूत्र राजा राममोहन राय से लेकर गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के लेखन और उनके कार्यों में स्पष्ट रूप में दिखाई देते हैं।

जब राममोहन राय बंगाल में सक्रिय हो रहे थे तो उनका उद्देश्य हिंदू धर्म के यथार्थ और वास्तविक स्वरूप से बंगाल की जनता का परिचय करवाना था। हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और कर्मकांडों के विरोध में उन्होंने बड़ा अभियान चलाया, उनको सफलता भी मिली। बंगाल में इस हिंदू नवजागरण का आरंभ करनेवाले राममोहन राय को समाज सुधारक के तौर पर पेश कर उनकी इसी छवि को मजबूत किया गया। उनके कृतित्व का वो पक्ष सायास ओझल कर दिया जिसमें वो हिंदू धर्म को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। उनको हिंदू धर्म से इतना लगाव था कि वो धर्म के नाम पर हो रहे विचलन को दूर करने के लिए लगातार कोशिश कर रहे थे। अपनी लेखनी के माध्यम से हिंदू धर्म के सामने उपस्थित खतरों को लेकर जनता को सावधान कर रहे थे। उन्होंने न केवल वेद और उपनिषदों को आधार बनाकर विपुल लेखन किया बल्कि 1820 में उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई ‘हिंदू धर्म की रक्षा’। अपनी इस पुस्तक में राममोहन राय ने हिंदू धर्म को लेकर अपनी सोच और इसको मजबूती प्रदान करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की चर्चा की थी। राममोहन राय के अलावा अगर हम बंकिमचंद्र के लेखन को देखें तो उसमें भी हिंदू धर्म को लेकर एक चिंता दिखाई देती है। उनकी रचना वंदे मातरम और उपन्यास ‘आनंदमठ’ की तो खूब चर्चा होती है, इन रचनाओं में व्याप्त देशभक्ति की भावना को लेकर भी बहुत कुछ लिखा गया है। परंतु बंकिमचंद्र के उपन्यास ‘सीताराम’ की इतनी चर्चा नहीं होती है। बंकिम की इस रचना के बिना उनका समग्र मूल्यांकन संभव नहीं है। इस उपन्यास में बंकिम ने मुस्लिम आक्रांताओं के बारे में विस्तार से लिखकर इस बात के संकेत दिए थे कि हिंदूओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। कहना ना होगा कि बाद के दिनों में बंकिम के इस उपन्यास पर इसलिए अधिक चर्चा नहीं की गई क्योंकि इसमें हिंदुओं पर आक्रांताओं के अत्याचार और फिर उसके प्रतिकार की कहानी है। अगर समग्रता में बंकिम के लेखन पर विचार हो तो उनको राष्ट्रीयता का ऋषि कहने में कोई संकोच नहीं होगा। बंकिम की परंपरा में ही केशवचंद्र सेन जैसे हिंदू धर्म और दर्शन के विद्वान को भी रखना होगा। बंगाल की धरती पर कई ऐसे सपूत पैदा हुए या उस धरती को अपनी कर्मभूमि बनाया, जिन्होंने हिंदू धर्म और दर्शन की चिंता की जिनमें रमेशचंद्र दत्त, माइकल मधुसूदन दत्त, दीनबंधु मित्र, भूदेव मुखोपाध्याय से लेकर विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर प्रमुख हैं।इस हिंदू नवजागरण की चर्चा तब तक पूर्ण नहीं होती जबतक कि हम 1867 में स्थापित ‘हिंदू मेला’ नामक संस्था की चर्चा नहीं करते। इसकी स्थापना गणेन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी। इस संस्था का उद्देश्य अंग्रेजों के सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का प्रतिकार तो था ही, भारतीयता को मजबूती के साथ स्थापित करना था। ‘हिंदू मेला’ ने ही भारत में स्वदेशी आंदोलन के लिए जमीन भी तैयार की थी।

आज पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव के समय एक बार फिर से वही हिंदू अस्मिता विमर्श के केंद्र में है। यह अनायास नहीं है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक अनिर्वाण गांगुली पिछले कई महीनों से बंगाल के कोने कोने में जाकर स्थानीय स्तर के लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों आदि के साथ संवाद कर रहे हैं। ममता बनर्जी के लिए भी कई सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। कई जगहों पर उन्होंने भाषा और कला को लेकर भी अपनी बात रखी। दरअसल स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद जब बंगाल में वामपंथियों का शासन आरंभ हुआ तो इस हिंदू नवजागरण की परंपरा थोड़ी धूमिल पड़ने लगी। सायास नवजागरण के दौर के लेखकों की उन रचनाओं को भुलाने की कोशिशें तेज हो गईं जिनमें हिंदू अस्मिता की चर्चा थी या उन पुस्तकों को ओझल करने का खेल शुरू हुआ जिनमें हिंदू धर्म और उसपर होनेवाले प्रहारों का उल्लेख था या इस पृष्ठभूमि पर लिखा गया था। यह अनायास नहीं है कि जब ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री थे तो 28 अप्रैल 1989 को पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने पत्रांक एसवाईएल/89/1 के जरिए एक निर्देश जारी किया। इस पत्र में सभी माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्यों को निर्देश दिया गया था कि ‘मुस्लिम काल की कोई निंदा या आलोचना नहीं होनी चाहिए, मुस्लिम शासकों और आक्रमणकारियों द्वारा मंदिर तोड़े जाने का जिक्र कभी नहीं किया जाना चाहिए।‘ इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि इतिहास की पुस्तकों से क्या क्या हटाया जाना है। स्पष्ट है कि वामपंथी शासन की मंशा क्या रही होगी। वामपंथियों ने पश्चिम बंगाल में चौंतीस साल तक शासन किया और उसके बाद से ममता बनर्जी वहां की मुख्यमंत्री हैं। क्या अब ये प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए कि हिंदू नवजागरण के नायकों की स्मृति को मिटाने या उनको विस्मृत करने या उसको नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सार्थक कार्य क्यों नहीं किया गया? क्यों वामपंथी शासनकाल में हुई गलतियों को पिछले दस साल में ठीक करने की कोशिशें नहीं की गईं। क्या बंगाल के सांस्कृतिक नायकों का स्मरण सिर्फ चुनावों के समय किया जाएगा या फिर उस धरती के जिन राष्ट्रवादी मनीषियों ने जो स्वप्न देखा था उसको पूरा करने का उपक्रम भी किया जाएगा। लोकतंत्र में चुनाव एक ऐसा ही अवसर होता है जब जनता इन प्रश्नों को पूछ सकती है। बंगाल की जनता जरूर इन प्रश्नों के उत्तर मतदान के दिन तलाशेगी भी और उम्मीद की जानी चाहिए कि जिन्होंने गलतियां की उनको सबक भी सिखाएगी।