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Monday, August 31, 2020

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ढकोसला


दिल्ली दंगों पर लिखी किताब ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन रोकने के प्रकाशक ब्लूम्सबरी के फैसले को लेकर वामपंथी लेखक-पत्रकार या कलाकार आदि बेहद खुश नजर आ रहे थे। उनको लग रहा था कि मोनिका अरोड़ा, सोनाली चीतलकर और प्रेरणा मल्होत्रा की इस किताब का प्रकाशन ब्लूम्सबरी प्रकाशन से रुकवाकर उन्होंने बड़ा तीर मार लिया है। लेकिन वो यह भूल गए कि ये भारत भूमि है जहां शब्दकोश में विकल्पहीनता शब्द नहीं है। ब्लूम्सबरी के प्रकाशन से इंकार के फौरन बाद गरुड़ प्रकाशन ने इस पुस्तक को प्रकाशित करने की घोषणा करते हुए प्री बुकिंग शुरू कर दी। पाठकों का इतना प्यार मिला कि एकबार तो गरुड़ प्रकाशन की वेबसाइट ही क्रैश कर गई। प्रकाशक के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी को बंपर ओपनिंग मिली और चंद घंटों में ही 15000 प्रतियों की प्री बुकिंग हो गई। यह तो खैर इसकी लोकप्रियता का एक पक्ष है। लेकिन इस पूरी घटना से वामपंथी बौद्धिकों का खोखलापन उजागर हो गया। वामपंथ के ये झंडाबरदार लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर छाती कूटते रहते हैं। हर छोटी बड़ी घटना पर उनको लगता है कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित किया जा रहा है और उनको जब ये लगता है तो सोशल मीडिया पर हाथों में तख्ती लेकर फोटो लगाने लगते हैं। इस बार जब उन्होंने दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी को रोकने के लिए अभियान चलाया तो वो ये भूल गए कि इस अभियान से उनकी खुद की पोल खुलने वाली है, उनका दुचित्तापन उजाहर होनेवाले है, उनके चेहरे पर लगा मुखौटा तार-तार होनेवाला है। जब वो इस किताब को रोक कर जश्न मनाने में लगे थे तो वो कुछ सालों पहले का एक वाकया भूल गए थे। भूल तो ये भी गए थे कि उस वक्त उन्होंने क्या क्या कहा था। वामपंथियों की स्मरण शक्ति कमजोर होती है लेकिन वो इतनी कमजोर होती है इसका अंदाजा नहीं था। ज्यादा समय नहीं बीते हैं छह साल पहले की ही बात है। हिंदू धर्म पर कई किताब लिखनेवाली लेखिका वेंडी डोनिगर की किताब- द हिंदूज, एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री को पेंग्विन बुक्स ने भारतीय बाजार से वापस लेने और छपी हुई अनबिकी प्रतियों को नष्ट करने का फैसला लिया । यह फैसला अदालत में उस किताब पर चल रहे केस के मद्देनजर याची के साथ समझौते के बाद हुआ । दरअसल दिल्ली की एक संस्था को इस किताब के कुछ अंशों पर आपत्ति थी और उस संगठन से जुड़े दीनानाथ बत्रा ने दो हजार ग्यारह में इस किताब के कुछ अंशों को हिंदुओं की भावनाएं भड़काने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज करवाया था। किताब के खिलाफ याचिका दायर होने के तीन साल बाद आउट ऑफ द कोर्ट एक समझौता हुआ जिसके तहत किताब को वापस लेने का फैसला हुआ । दीनानाथ बत्रा ने पुस्तक को पढ़ने के बाद उसपर अपनी आपत्ति जताई थी। वामपंथियों की तरह नहीं कि बगैर ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ को पढ़े उसके खिलाफ नारे लगाने लगे या षड़यंत्र करने लगे।

वेंडि डोनिगर की पुस्तक छपने के बाद से ही उसपर विवाद शुरू हो गया था, अमेरिका में इसको खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुआ, लंदन में तो लेखिका पर अंडे तक फेंके गए थे। तब पेंग्विन के फैसले के बाद कुछ लोग इसको अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला करार देने लगे थे। कुछ वामपंथियों ने इसको हिंदू संगठनों की कथित फासीवादी मानसिकता करार दिया था। सेक्युलरिज्म के नाम पर अपनी दुकान चलानेवालों को हिंदू संगठनों पर हमलावर होने का बहाना चाहिए होता है। पेंग्विन के उस फैसले में भी उनको संभावना नजर आई थी और वो फासीवाद-फासीवाद चिल्लाने लगे थे। तब भी मैंने सवाल उठाया था कि वर्ष दो हजार नौ में किताब छपी उसके पांच साल बाद इस किताब को वापस लेने का फैसला प्रकाशक ने लिया। इसमे फासीवाद कहां से आ गया था । क्या शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताना और संविधान से प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करना फासीवाद है? यह तो वैश्विक ट्रेंड है कि अगर किसी किताब पर या उसके अंश पर आपत्ति हो तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जाता है। वेंडि डोनिगर की पुस्तक के खिलाफ भी याचिकाकर्ता ने भी भारतीय संविधान के तहत मिले अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए कोर्ट में केस किया था । अदालत में मुकदमा चल ही रहा था कि दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया था।


प्रकाशक के उस फैसले के बाद लेखकों के एक बड़े समुदाय में इस बात को लेकर खासी निराशा का प्रदर्शन हुआ था।  विवादास्पद लेखिका अरुंधति राय से लेकर पत्रकार और लेखक सिद्धार्थ वरदराजन आदि भी उस वक्त विवाद में कूदे थे। सिद्धार्थ ने तो पेंग्विन से अपनी किताबों को नष्ट करने और क़ापीराइट वापस करने की मांग भी की थी। सिद्धार्थ वरदराजन ने अपने पत्र में साफ लिखा था कि उन्हें अब पेंग्विन पर भरोसा नहीं रह गया, लिहाजा वो गुजरात दंगों पर लिखी गई उनकी किताब- दे मेकिंग ऑफ अ ट्रेजडी- के अधिकार वापस कर दें । सिद्धार्थ वरदराजन ने तब कहा था कि ‘अगर किसी समूह की भावना इस किताब से आहत हो जाती है और वो भारतीय दंड विधान की धारा 295 के तहत केस कर देता है, तो संभव है कि पेंग्विन उनकी किताब को भी वापस लेने का फैसला कर दे’। पता नहीं उनकी पुस्तकें नष्ट की गई या नहीं लेकिन अब भी सिद्धार्थ वरदराजन की ये किताब पेंग्विन बेच रहा है। ये है इनका विरोध। समय पर घोषणा करो, प्रचार हासिल करो और फिर भूल जाओ। ये है मार्क्सवाद का अर्धसत्य। वामपंथियों का झूठ का प्रचार एक बार होकर रुकता नहीं है वो सतत चलता रहता है। वेंडि डोनिगर के मसले के दो साल बाद पीईएन इंटरनेशनल ने एक रिपोर्ट पेश की थी, इमपोजिंग साइलेंस, द यूज ऑफ इंडियाज लॉज टू सप्रेस फ्री स्पीच। पेन कनाडा, पेन इंडिया और यूनिवर्सिटी ऑफ टोरेंटो के फैकल्टी ऑफ लॉ ने संयुक्त रूप से इस अध्ययन को करने का दावा किया था। पेन इंटरनेशनल कवियों, लेखकों और उपन्यासकारों की एक वैश्विक संस्था, जिसका दावा है कि वो पूरी दुनिया में साहित्य और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए काम करती है। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर स्थिति बेहद विकट है । उस रिपोर्ट की आरंभिक पंक्तियों से ही शोधकर्ताओं के मंसूबे साफ दिखे थे– भारत में इन दिनों असहमत होनेवालों को खामोश कर देना बहुत आसान है...दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए ये स्थिति बेहद शर्मनाक है। भारत में धर्म पर लिखना मुश्किल होता जा रहा है।‘ इस संबध में वेंडी डोनिगर की ही किताब का उदाहरण दिया गया था। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पेन इंटरनेशनल की रिपोर्ट में ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन को रोकने का जिक्र होता है या नहीं। वो इस तरह का शोध प्रस्तुत करते भी हैं या नहीं। अगर इनकी की रिपोर्ट में एक पुस्तक के प्रकाशन को रोकने की इन चालों का जिक्र नहीं होता है तो इनकी साख पर बड़ा सवालिया निशान लगेगा। दरअसल ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन का ब्लूम्सबरी ने प्रकाशन नहीं होने देना एक प्रकार की साहित्यिक माफियागीरी भी है। जिस तरह से पाकिस्तानी पिता की संतान लेखक आतिश तासीर ने ब्रिटेन के लेखक विलियम डेलरिंपल को ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन को रोकने के लिए सार्वजनिक रूप से बधाई दी उससे भारत के खिलाफ अंतराष्ट्रीय साजिश के भी संकेत मिलते हैं। ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन रोका जाना कोई साधारण घटना नहीं है बल्कि इसके दूरगामी असर होंगे। 

Saturday, December 3, 2016

बदलते वक्त में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

इन दिनों देश में अभिव्यक्ति की आजादी और उसके खतरों को लेकर जमकर चर्चा हो रही है । संपादकीय लिखे जा रहे हैं, प्राइम टाइम में खबरिया चैनलों पर बहस हो रही है । होनी भी चाहिए क्योंकि इस तरह की लगातार बहसों से लोकतंत्र जीवंत रहता है । परंतु अगर गंभीरता से विचार करें तो अभिव्यक्ति की आजादी पर होनेवाली बहस सरकार के पक्ष और विपक्ष की बहस होकर रह जा रही है । कोई भी विशेषज्ञ या स्तंभकार बुनियादी सवालों की ओर जाने से कतराते हैं । इमरजेंस-इमरजेंसी कहकर वो एक तरह से इमरजेंसी की भयावहता को कम कर देते हैं । नई पीढ़ी को इससे भ्रम हो सकता है कि इमरजेंसी में इन दिनों जितनी उदारता थी । आज एक बार फिर से अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर देशव्यापी गंभीर बहस की आवश्यकता है । आज जिस तरह से कई न्यूज चैनलों पर खबरों के नाम पर फिक्शन को बढ़ावा दिया जा रहा है या अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जाता है उस पर यह बहस होनी चाहिए कि मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा कहां तक है या उसकी कोई सीमा है भी या नहीं । अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कई बार लक्ष्मण रेखा पार हो जाती है, ये कहना मुश्किल है कि जानबूझकर या अनजाने में । चंद दिनों पहले बिग बॉस सीरियल में मशहूर क्रिकेटर युवराज सिंह के भाई जोरावर सिंह और उनकी पत्नी आकांक्षा के बीच का पारिवारिक विवाद उछला । अदालत में विचाराधीन होने के बावजूद उनकी अलग रह रही पत्नी को शो में आमंत्रित कर अपना पक्ष प्रस्तुत करने का मौका दिया गया । शो के आगाज के वक्त आकांक्षा ने दर्शकों के सामने मंच से सरेआम जोरावर की प्रतिष्ठा को तार तार कर दिया । जोरावर को इस तरह से पेश किया गया जैसे उसने एक लड़की की जिंदगी बरबाद कर दी ।एकतरफा बातें हुई, जोरावर पर कई आरोप लगे, शो के दौरान भी बातीचत में ये मसला उठा । दूसरा पक्ष अपनी सफाई देने के लिए मौजूद नहीं था ।
अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तो संविधान के पहले संशोधन के वक्त बहुत साफ कर दी गई थी । श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अखंड भारत के भाषणों पर लगाम लगाने के लिए और नेहरू- लियाकत समझौते को पूरी तरह से लागू करने को लेकर पहला संविधान संशोधन किया गया । तब बहाना बना था मद्रास से निकलनेवाली पत्रिका क्रासरोड और राष्ट्रीय संघ से जुड़ी पत्रिका आर्गेनाइजर में छप रहे लेख । क्रासरोड में नेहरू की नीतियों की जोरदार आलोचना की जाती थी, जिससे वो खफा रहते थे । दोनों मामलों में अदालत ने पत्रिकाओं की स्वंतत्रता पर अंकुश लगाने से मना कर दिया था । नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल के साथियों के साथ विचार करने के बाद संविधान में मिले अभिव्यक्ति की आजादी की लगभग पूर्ण स्वतंत्रता पर ही अंकुश लगाने का बिल संसद में दस मई उन्नीस सौ इक्यावन को पेश किया जिसे कि अठारह जून को पास कर दिया गया । मूल संविधान में प्राप्त अधिकारों में कई शर्तों का बंधन लगाया गया जिससे अभिव्यक्ति की आजादी की परिधि खींच दी गई । जबकि उस वक्त भी भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ए मौजूद थी जिसको लगाकर अभिव्यक्ति की आजादी की पूर्णता को बाधित किया जा सकता था ।
टेलीविजन चैनलों की बहुतायत और इस माध्यम के जनमानस को प्रभावित करने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए अभिव्यक्ति की आजादी या उसकी चौहद्दी को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है । न्यूज और मनोरंजन दोनों को मिलाकर इस मामले पर विचार किया जाना चाहिए । दरअसल टेलीविजन के कार्यक्रमों की सफलता का आकंलन जिस रेटिंग से होता है उसको लेकर कई बार प्रोड्यूसर्स में भ्रम की स्थिति रहती है । बहुधा चैनलों के कर्ताधर्ताओं को ये लगता है कि दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए सेलिब्रिटी से जुड़े विवादों को हवा देने से रेटिंग हासिल की जा सकती है । इसी भ्रम में लक्ष्मण रेखा पार हो जाती है ।  हलांकि शोज के दौरान होनेवालों सर्वेक्षणों या वोटिंग से ये अवधारणा निगेट ही होती रही है । अगर इस तरह का आंकलन सही होता तो बिग बॉस के दर्शक जोरावर से अलग रह रही उनकी पत्नी आकांक्षा शर्मा को बनाए रखते ना कि दूसरे ही सप्ताह में उसको बिग बॉस के घर से बाहर निकाल देते । सवाल वही कि क्या टी आर पी हासिल करने के लिए किसी की निजता का हनन किया जा सकता है । निजता के हनन का मामला पहले भी पेश आ चुका है जब टेनिस स्टार सानिया मिर्जा और पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब की शादी का एलान हुआ था । कई बार कल्पना के आधार पर शोएब की पुरानी लव स्टोरीज परोसी गई थी । अभिषेक बच्चन की शादी के वक्त भी एक महिला उसकी पत्नी का दावा करते सामने आई थी और घंटों न्यूज चैनलों पर लाइव रही थी । क्या यहां किसी तरह की रोक होनी चाहिए । न्यूज चैनलों और अन्य टीवी चैनलों के स्वनियमन का मैकेनिज्म है लेकिन उसके दायरे को बढ़ाते हिए उसको मजबूत किए जाने की जरूरत है । मुंबई पर हुए आतंकी हमले के वक्त न्यूज चैनलों के कवरजे को लेकर सवाल उठे थे जिसके बाद सरकार ने आतंकवादी हमले के दौरान कवरेज को लेकर एक गाइडलाइन तो बना दी थी लेकिन न्यूज चैनलों के सबसे पहले की आपाधापी में गड़बड़ी हो जाती है । इसी तरह से अगर देखें तो हमारे चैनलों ने इस्लामिक स्टेट के बगदादी को कई बार मारा और फिर कई बार जिंदा कर दिया । उससे जुड़ी वारदातों को इस तरह से मिर्च मसाला लगाकर पेश किया जाता है जैसे लगता है कि कोई क्राइम थ्रिलर चल रहा हो । वीभत्स वीडियो को बार बार दिखाया जाता है और कई बार तो उसके कारनामे उसको समर्थकों के बीच हीरो भी बना देते हैं । अभिव्यक्ति की आजादी संविधान हमें देता है लेकिन वही संविधान कुछ जिम्मेदारियां भी तय करता है । हम सबको उसका गंभीरता से पालन करना चाहिए वर्ना सरकार को इस संवैधानिक अधिकार पर अंकुश लगाने के मौके मिलते रहेंगे । सत्ता अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करती है और उसपर लगाम लगाने के मौके ढूंढती रहती है । अभिव्यक्ति की आजादी निर्बाध चलती रहे इसके लिए जरूरी है कि पत्रकारों की हर तरह से सुरक्षा की गारंटी हो। पत्रकारों को पेशेगत जोखिम उठाने होते हैं लेकिन उन जोखिमों को कम करने की कोशिशों से अभिव्यक्ति की आजादी मजबूत होगी और संविधान में मिले अधिकारों की रक्षा भी हो सकेगी।


Saturday, November 12, 2016

आजादी की आड़ में अराजकता ? ·


निजी न्यूज चैनल एनडीटीवी पर एक दिन की पाबंदी के दौरान अभियव्क्ति की आजादी को लेकर खूब हो हल्ला मचा । देशभर में पत्रकारों के कई छोटे-बड़े संगठनों ने सरकार के इस फैसले को इमरजेंसी की याद दिलानेवाला करार दिया । करीब हफ्ते भर चले विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार ने पाबंदी को स्थगित कर दी । इस पूरे घटनाक्रम के दौरान एक बार फिर से अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर देशव्यापी गंभीर बहस की आवश्यकता महसूस की गई । आज जिस तरह से कई न्यूज चैनलों पर खबरों के नाम पर फिक्शन को बढ़ावा दिया जा रहा है या फिर कई बार तो अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता की आड़ में अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जाता है उसपर यह बहस होनी चाहिए कि मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा कहां तक है या उसकी कोई सीमा नहीं है । अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तो संविधान के पहले संशोधन के वक्त बहुत साफ कर दी गई थी । आजादी के बाद जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी अखंड भारत को लेकर आंदोलनरत थे तो उस वक्त उनके भाषणों को पाकिस्तान युद्धोन्माद बढ़ानेवाला मानते हुए आपत्ति जता रहा था । पाकिस्तान की शिकायत और नेहरू लियाकत समझौते के बाद तय हुआ कि अभियक्ति की आजादी की सीमा तय की जाए और फिर संविधान का पहला संशोधन हुआ जिसमें इसकी सीमा तय कर दी गई । तब बहाना बना था मद्रास से निकलनेवाली पत्रिका क्रासरोड और राष्ट्रीय संघ से जुड़ी पत्रिका आर्गेनाइजर में छप रहे लेख । अब जमाना बहुत बदल चुका है । संविधान के संशोधन के वक्त टीवी माध्यम या तो था नहीं या फिर उसका जनमानस पर उतना प्रभाव नहीं था । टेलीविजन चैनलों के जोर के बाद अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर इस वक्त सचमुच एक देशव्यापी बहस की जरूरत है । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में मीडिया को अराजक होने का लाइसेंस नहीं मिल जाता है । बहुधा यह देखा गया है कि इसकी आड़ में मशहूर शख्सियतों पर कीचड़ उछालने का काम भी किया जाता है । हालिया उदाहरण बिग बॉस के शो का है जहां क्रिकेटर युवराज सिंह के भाई जोरावर सिंह से अलग रह रहा पत्नी को शो में प्रतिभागी बनाया गया और उसने जोरावर सिंह के खिलाफ बेहद संगीन इल्जाम लगाए, जबकि ये पूरा मामला अदालत में विचाराधीन है । सवाल यह कि अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में क्या मीडिया किसी की इज्जत उछालने के लिए मंच दे सकता है या आरोपों में मिर्च मसाला लगाकर पेश करने की इजाजत दी जा सकती है। लोकप्रिय टीवी शो बिग बॉस में जिस तरह से मशहूर क्रिकेटर युवराज सिंह के भाई जोरावर सिंह पर इल्जाम लगे और उनकी तरफ से ना तो कोई पक्ष सामने आया उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं । शो में जब जोरावर सिंह की अलग रह रही पत्नी आकांक्षा शर्मा का परिचय करवाया जा रहा था तो लग रहा था कि जैसे उन्होंने कितने जुल्म सहे हैं और जोरावर कितने निर्दयी हैं । दोनों के बीच कई अदालतों में मामला विचाराधीन है और सवाल यही कि अदालतों में चल रहे मामलों के एक पक्ष को चैनल आरोप लगाने के लिए मंच मुहैया करवा सकता है । क्या ये अदालत की कार्रवाई में दखल का मामला नहीं है ।
जोरावर सिंह उसी युवराज सिंह के भाई हैं जिन्होंने कैंसर जैसी बीमारी को मात देते हुए देश को क्रिकेट का वर्ल्ड कप दिलाने में केंद्रीय भूमिका निभाई थी । शो के आगाज के वक्त आकांक्षा ने सलमान खान के सामने मंच पर खड़े होकर जोरावर की प्रतिष्ठा को तार तार कर दिया । जोरावर को इस तरह से पेश किया गया जैसे उसने एक लड़की की जिंदगी बरबाद कर दी ।आकांक्षा के परिवारवाले भी नाटकीय ढंग से सामने लाए गए और आकांक्षा को उसके कथित संघर्ष में साथ देने का वादा किया गया ।  इस पूरे मामले में अदालतों में चल रहे केस से कुछ अलहदा तस्वीर सामने आती हैं । जब आकांक्षा शर्मा ने जोरावर सिंह पर आरोप लगाए थे और काफी हो हल्ला मचाया था तब भी जोरावर ने आकांक्षा पर किसी तरह का इल्जाम नहीं लगाया और एक मर्यादा में रहे थे । अगर सोशल मीडिया पर इस पूरे विवाद की तफ्तीश करेंगे तो कई तरह के किस्से वहां मौजूद हैं जिसमें आकांक्षा के उपर भी ड्रग्स आदि के संगीन इल्जाम हैं । लेकिन सोशल मीडिया पर जो अराजकता है वो मुख्यधारा की मीडिया को नहीं दी सकती है और उनसे एक खास तरह की जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है । टेलीविजन  के कार्यक्रमों को बनाने वालों को या फिर उनके कर्ताधर्ताओं को ये लगता है कि दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए सेलिब्रिटी से जुड़े विवादों को हवा दी जा सकती है ।
दरअसल अगर भारतीय समाज के मानस का विश्लेषण करें तो लोगों को दूसरे के परिवारों में क्या चल रहा है ये जानने की आकांक्षा होती है । इसी चाहत को भुनाने में टीवी चैनल बहुधा लक्ष्मण रेखा पार कर जाते हैं । हलांकि शोज के दौरान होनेवालों सर्वेक्षणों या वोटिंग से ये अवधारणा निगेट ही होती है । अगर इस तरह का आंकलन सही होता तो बिग बॉस के दर्शक आकांक्षा शर्मा को बनाए रखते और जोरावर के कथित जुल्म के किस्सों में उनकी रुचि होती तो दर्शक आकांक्षै को शो में बनाए रखते ना कि दूसरे ही सप्ताह में चलता कर देते । सवाल फिर वही कि संविधान की कौन सी धारा या केबल या टेलीविजन रेगुलेशन एक्ट का कौन सा सेक्शन इस तरह के कारनामों की इजातत देता है । कोई महिला किसी पर भी उलजलूल आरोप लगाएगी और एक प्रतिष्ठित चैनल बगैर दूसरे पक्ष को जाने उसका टेलीकास्ट कर देगी तो ये अव्यक्ति की कौन सी आजादी है । और अगर सरकार इसको आधार बनाकर किसी तरह का कोई नोटिस जारी कर देती है तो फिर देश में इमरजेंसी जैसे हालात का रोना शुरू हो जाएगा । इसी शो में जिस तरह से एक कथित बाबा और कई केस में नामजद ओम जी का मजाक बनाया जा रहा है उसपर भी आपत्ति होनी चाहिए । एक विशेष धर्म के चोगे में मौजूद .ह शख्स जिस तरह की हरकतें कर रहा है उससे धर्मगुरुओं के बारे में गलत संदेश जा रहा है । क्या दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए क्या किसी की छवि धूमिल की जा सकती है । क्या टी आर पी हासिल करने के लिए किसी की इज्जत उछालने की इजाजत दी जा सकती है ।
अगर आपको याद हो तो अभिषेक बच्चन की शादी के वक्त भी एक महिला सामने आ गई थी और उसने अभिषेक की पत्नी होने का दावा किया था । उसको टी वी चैनलों पर घंटों तक दिखाया गया था । एक तरफ अभिषेक बच्चन के घर में शादी की शहनाई बज रही थी, ऐश्वर्या के हाथों में मेंहदी रचाई जा रही थी तो दूसरी तरफ वो महिला न्यूज चैनलों में लाइव होकर ये बता रही थी कि उसने कहां और कब अभिषेक बच्चन से कथित तौर पर शादी की थी । उसके जो मन में आ रहा था वो आरोप अभिषेक बच्चन पर लगा रही थी और बगैर किसी फिल्टर के वो एयर पर जा रहा था । इसी तरह का केस युवराज के भाई जोरावर के मामले में भी दिखाई दिया कि जो भी आकांक्षा इल्जाम लगा रही थी वो एयर पर जा रहा था, संभव है कि चैनल ने कुछ संपादन किया हो लेकिन दर्शकों को ऐसा प्रतीत नहीं हुआ था । इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हैं । टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की शादी के वक्त भी जमकर तमाशा हुआ था और न्यूज चैनलों ने इस तमाशे को जमकर भुनाया था । सानिया के पति शोएब के निकाहनामे तक दिखाए गए थे, पता नहीं ये किस तरह की अभिव्यक्ति की आजादी है । सानिया की शादी के वक्त तो उसके घऱ वाले काफी परेशान भी हुए थे लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी जैसे बड़े मुद्दे के सामने एक परिवार की परेशानी की क्या बिसात ।
दरअसल न्यूज चैनलों और अन्य टीवी चैनलों के स्वनियमन का जो मैकेनिज्म है वो बहुत कारगर नहीं है । उसको और मजबूत किए जाने की जरूरत है । मुंबई पर हुए आतंकी हमले के वक्त न्यूज चैनलों के कवरजे को लेकर सवाल उठे थे जिसके बाद सरकार ने आतंकवादी हमले के दौरान कवरेज को लेकर एक गाइडलाइन को बना दी थी लेकिन बहुधा उत्साह और न्यूज चैनलों के सबसे पहले की आपाधापी में गड़बड़ी हो जाती है । इसी तरह से अगर देखें तो हमारे चैनलों ने इस्लामिक स्टेट के बगदादी को कई बार मारा और फिर कई बार जिंदा कर दिया । उससे जुड़ी वारदातों को इस तरह से मिर्च मसाला लगाकर पेश किया जाता है जैसे लगता है कि कोई क्राइम थ्रिलर चल रहा हो । वीभत्स वीडियो को बार बार दिखाया जाता है और कई बार तो उसके कारनामे उसको समर्थकों के बीच हीरो भी बना देते हैं । अभिव्यक्ति की आजादी संविधान हमें देता है लेकिन वही संविधान कुछ जिम्मेदारियां भी तय करता है । हम सबको उसका गंभीरता से पालन करना चाहिए वर्ना सरकार को मौके मिलते रहेंगे ।


Tuesday, March 23, 2010

मकबूल पर फिदा क्यों हों ?

जब मैंने मकबूल फिदा हुसैन के भारत छोड़ने और कतर की नागरिकता स्वीकार करने पर सेक्युलरवादियों के दोहरे चरित्र को उजागर करता हुआ लेख हाहाकार पर लिखा तो मेरे विवेक और मेरी समझ,मेरी विचारधारा, मेरी शिक्षा, मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर लोगों ने सवाल किए ।मुझे कालिदास का कुमार संभव पढ़ने की और खजुराहो की प्रसिद्ध मूर्तियां देखने समझने के अलावा प्राचीन भारतीय मूर्तिकला के बारे में अपने ज्ञान को बढ़ाने का उपदेश दिया गया । मुझे इस बात पर घेरने की कोशिश की गई कि मेरी बातें भगवा ब्रिगेड या संघियों से क्यों मिलती जुलती हैं । जिन लोगों ने मुझे इस तरह की सलाह दी मुझे नहीं मालूम कि उनकी समझ कितनी बेहतर है, उन्होंने कालीदास को कितना पढ़ा है । उन्होंने कितनी बार खजुराहो की मूर्तियां देखी है, लेकिन उन्हें मैं ये बता दूं कि हुसैन ने अपनी जीवनी और अपनी एक पेंटिंग दस्तखत करके मुझे दिए हैं जो मेरे लिए अमूल्य धरोहर हैं । हुसैन की पेंटिंग को समझने का दावा करनेवाले उनके तथाकथित समर्थकों में अभिवयक्ति की आजादी को लेकर घोर चिंता है और उन्हें लगता है कि हुसैन के भारत चोड़कर चले जाने से संविधान द्वारा प्रदत्त इस अधिकार पर हमला हुआ है । उन्हें यह सोचने समझने की जरूरत है कि जब भी कोई अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए ज्यादा स्वतंत्रता की अपेक्षा करता है तो स्वत: उससे ज्यादा उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार भी अपेक्षित हो जाता है । भारत माता का नंगा चित्र बनाने पर हुसैन के खिलाफ दायर याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस संजय किशन कौल ने खारिज कर दिया, साथ ही अपने फैसले में कला और उसकी समझ को लेकर कुछ कठोर टिप्पणियां भी की । लेकिन हुसैन के उन्नीस सौ सत्तर में बनाए गए सरस्वती और दुर्गा की नंगी तस्वीरों के एक दूसरे मामले में दो हजार चार में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस जे डी कपूर का भी एक फैसला आया था । जस्टिस कपूर ने आठ अप्रैल दो हजार चार के अपने फैसले में लिखा- इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि देश के करोड़ो हिंदुओं की इन देवियों में अटूट श्रद्धा है- एक ज्ञान की देवी हैं तो दूसरी शक्ति की । इन देवियों की नंगी तस्वीर पेंट करना इन करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना तो है ही साथ ही उन करोड़ों लोगों की धर्म और उसमें उनकी आस्था का भी अपमान है । शब्द, पेंटिंग, रेखाचित्र और भाषण के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा हासिल है जो कि हर नागरिक के लिए अमूल्य है । कोई भी कलाकार या पेंटर मानवीय संवेदना और मनोभाव को कई तरीकों से अभिवयक्त कर सकता है । इन मनोभावों और आइडियाज की अभिवयक्ति को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है । लेकिन कोई भी इस बात को भुला या विस्मृत नहीं कर सकता कि जितनी ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतनी ही ज्यादा जिम्मेदारी भी होती है । अगर किसी को अभिवयक्ति का असीमित अधिकार मिला है तो उससे यह अपेक्षित है कि इस अधिकार का उपयोग अच्छे कार्य के लिए करे ना कि किसी धर्म या धार्मिक प्रतीकों या देवी देवताओं के खिलाफ विद्वेषपूर्ण भावना के साथ उन्हे अपमानित करने के लिए । हो सकता है कि ये धर्मिक प्रतीक या देवी देवता एक मिथक हों लेकिन इन्हें श्रद्धाभाव से देखा जाता है और समय के साथ ये लोगों के दैनिक धर्मिक क्रियाकलापों से इस कदर जुड़ गए हैं कि उनके खिलाफ अगर कुछ छपता है, चित्रित किया जाता है या फिर कहा जाता है तो इससे धार्मिक भावनाएं बेतरह आहत होती है । किसी भी खास धर्म के देवी देवताओं की आपत्तिजनक या नीचा दिखाने वाले रेखाचित्र या फिर पेंटिंग समाज में वैमनस्यता और एक दूसरे के प्रति नफरत पैदा करते हैं । अगर यह मान लिया जाए कि इस तरह के कार्य कला का एक नमूना है तब भी इस बात को विस्मृत नहीं किया जा सकता है कि इस तरह के कृत्य जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या फिर अपमानित करने के दायरे में आता है, क्योंकि ये देवी देवता करोड़ों लोगों के अराध्य हैं । एक बार फिर मैं ये कहता हूं कि ये देवी देवता एक मिथक हो सकते हैं लेकिन जब भी इस तरह से नग्न रूप में उनको चित्रित किया जाता है तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं । अभिवयक्ति की आजादी के नाम पर किसी व्यक्ति को किसी भी वर्ग या समाज की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ की इजाजत नहीं दी जा सकती है । यह बात याचिकाकर्ता ( हुसैन) को समझनी चाहिए कि वो एक अलग धर्म से संबंधित हैं । अगर याचिकाकर्ता को लोगों की धार्मिक भावनाओं की गहराई का एहसास नहीं है तो वो अपने धर्म या फिर किसी और धर्म पर हाथ अजमाकर देखें तो उन्हें पता चल जाएगा कि धार्मिक भवानाओं की जड़ें कितनी गहरी होती हैं । इस तरह के काम दो अलग-अलग धर्मों को मानने वालों के बीच वैमनस्यता की खाई को और गहरा करती हैं, साथ ही सामाजिक सदभाव और आपसी भाईचारे के बीच बाधा बनकर खड़ी हो जाती है । याचिकाकर्ता ने महाभारत की पात्र द्रोपदी, जिन्हें हिंदू धर्म को मानने वाले लोग इज्जत की नजरों से देखते हैं, को भी पूरी तरह से निर्वस्त्र चित्रित किया है, जबकि चीरहरण के वक्त भी द्रोपदी निर्वस्त्र नहीं हो पाई थी । इस पेंटिंग में जिस तरह से द्रोपदी का चित्रण हुआ है वह साफ तौर से हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचानेवाला और नफरत पैदा करनेवाला है । अपने बारह पन्नों के जजमेंट में विद्वान न्यायाधीश ने और कई बातें कही और अंत में आठ शिकायतकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी क्योंकि धार्मिक भावनाओं को भड़काने, दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने आदि के संवंध में जो धाराएं (153 ए और 295 ए) लगाई जाती हैं उसमें राज्य या केंद्र सरकार की पू्र्वानुमति आवश्यक होती है, जो कि इस केस में नहीं थी । सनद रहे कि जब केस चल रहा था तो केंद्र में बीजेपी की सरकार थी । ये तो हुई अदालत और न्यायाधीश की बात । आपको एक और उदाहरण देते चलें जिससे कि हुसैन की महानता(?) और उनके पूर्वाग्रह पर से परदा हटता है । हुसैन ने एक बार महात्मा गांधी, कार्ल मार्क्स, अलबर्ट आइंस्टीन और हिटलर की पेंटिंग बनाई जिसमें हिटलर को उन्होंने नंगा दिखाया । जब उनसे इसके बार में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि किसी को अपमानित करने का यह उनका यह अपना तरीका है । इसके बाद मुझे लगता नहीं है कि कुछ कहने की जरूरत है । मार्क्स के अंध भक्तो धर्मनिरपेक्षता और अभिवयक्ति की आजादी के खतरे पर विलाप करना बंद करो । अपनी आंखों पर चढ़ा लाल चश्मा उतारो, तभी तर्क संगत बातें भी होंगी और विमर्श भी । ( जस्टिस कपूर के जजमेंट के चुनिंदा अंशों के अनुवाद में हो सकता है कोर्ट की भाषा में कोई त्रुटि रह गई हो लेकिन भाव वही हैं )