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Saturday, January 18, 2025

आक्रामक दिखने का हास्यास्पद प्रयोग


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के बयान की राहुल गांधी ने आलोचना की। आलोचकों ने संघ को घेरने के लिए इय बयान के चुनिंदा अंश को आधार बनाया। सबसे पहले हम देखते हैं कि मोहन भागवत ने कहा क्या था। उन्होंने कहा कि, ‘प्रतिष्ठा द्वादशी, पौष शुक्ल द्वादशी का नया नामकरण हुआ। पहले हम कहते थे बैकुंठ एकादशी, बैकुंठ द्वादशी अब उसे प्रतिष्ठा द्वादशी कहना क्योंकि अनेक शतकों से परतंत्रता झेलने वाले भारत के सच्चे स्वतंत्रता की प्रतिष्ठा उसी दिन हो गई। स्वतंत्रता थी, प्रतिष्ठित नहीं हुई थी। भारत स्वतंत्र हुआ 15 अगस्त को राजनीतिक स्वतंत्रता आपको मिल गई। हमारा भाग्य निर्धारण करना हमारे हाथ में है। हमने एक संविधान भी बनाया एक विशिष्ट दृष्टि जो भारत के अपने स्व से निकलती है, उसमें से वह संविधान दिग्दर्शित हुआ, लेकिन उसके जो भाव है, उसके अनुसार चला नहीं और इसलिए हो गए सब स्वप्न साकार कैसे मान लें, टल गया सर से व्यथा का भार कैसे मान लें”। ऐसी परीस्थिति समाज की, क्योंकि जो आवश्यक स्वतंत्रता में स्व का अधिष्ठान होता है, वह लिखित रूप में संविधान से पाया है, लेकिन हमने अपने मन को उसकी पक्की नींव पर आरूढ़ नहीं किया है। हमारा स्व क्या है? राम कृष्ण शिव, यह क्या केवल देवी देवता हैं, या केवल विशिष्ट उनकी पूजा करने वालों के हैं? ऐसा नहीं है। राम उत्तर से दक्षिण भारत को जोड़ते हैं।‘ अपने वक्तव्य में वो आगे भी काफई कुछ कहते हैं । 

राहुल गांधी ने शतकों से परतंत्रता झेलने वाले भारत के सच्चे स्वतंत्रता की प्रतिष्ठा को असली आजादी बताकर संघ पर हमला किया। उन्होंने कहा कि आरएसएस के प्रमुख ने कहा कि भारत ने 1947 में स्वतंत्रता हासिल नहीं की, उन्होंने कहा कि भारत को सच्ची स्वतंत्रता तब मिली जब राममंदिर का निर्माण हुआ। वो इससे भी आगे चले गए और कहा कि भागवत का ये बयान देशद्रोह है और अगर वो दूसरे देश में होते तो उनको गिरफ्तार किया जा सकता था। आगे और भी बहुत कुछ बोले जिसमें सभी संस्थाओं पर संघ के कब्जे की बात से लेकर ये तक कह गए कि हमलोग बीजेपी, आरएसएस और भारतीय राज्य (इंडियन स्टेट) के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। पहली बात तो ये कि संघ प्रमुख ने कहा ही नहीं कि देश को असली आजादी राम मंदिर बनने के बाद मिली। उन्होंने कहा कि हमारी स्वतंत्रता उस दिन प्रतिष्ठित हुई। 15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता मिली लेकिन जिस स्व तंत्र की बात हो रही है क्या वो 1947 में मिल गई थी। इस संबंध में प्रसिद्ध राजनीति विज्ञानी रजनी कोठारी की पुस्तक पालिटिक्स इन इंडिया को देखना चाहिए। इसमें वो एक अध्याय का आरंभ ही इस बात से करते हैं कि स्वतंत्रता हासिल करने के बाद, बदलाव और पुनर्निर्माण की घोषणा होती है, लेकिन भारत में जो राजनीतिक परंपरा चली आ रही थी उसमें कोई गहन बदलाव नहीं आया। हिंदू परंपरा, पश्चिमी राजनीतिक विचार और पुनर्निमाणात्मक राष्ट्रवाद ने राष्ट्र के पुनर्निमाण का एक रास्ता तय किया। इसी क्रम में रजनी कोठारी आगे लिखते हैं कि 1947 के बाद जब कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनी तो एक ऐसा अभिजात वर्ग उभरा जो भारत छोड़कर जा रहे अंग्रेज अभिजात वर्ग के विचार और अनुभवों का पोषक था। वो तो यहां तक कह जाते हैं कि इस अभिजात्य विचार ने व्यक्तिगत और सांस्थानिक विचार को प्रभावित किया। कहने का तात्पर्य ये है कि स्वतंत्रता के बाद कोठरी जिस अंग्रेजी अभिजात्य विचार की बात करते थे वो खत्म नहो हो सका। स्व स्थापित नहीं हो सका।  

इसको इस तरह से भी कहा जा सकता है कि भारतीय परंपरा और भारतीय विचार को पूर्ण रूप से नहीं अपनाया जा सका। वो जिन संस्थाओं की बात कर रहे हैं उसमें भी अंग्रेजों के अभिजात्य विचार का प्रभाव बना रहा। शिक्षा से लेकर सांस्कृतिक प्रतिष्ठान तक उससे प्रभावित रहे। इस तरह के विचार कोठारी के अलावा कई अन्य राजनीति विज्ञानी मानते और कहते रहे हैं। तो क्या ये मान लिया जाए कि वो सभी लोग देशद्रोही और संविधान विरोधी थे। वासुदेव शरण अग्रवाल से लेकर कुबेरनाथ राय तक जिस सांस्कृतिक परंपरा की व्याख्या करते रहे हैं, वो 1947 के बाद के वर्षों में स्थापित हो पाई। जिस स्व की बात हमारे मनीषी करते थे क्या वो हस्तगत हो पाया। इसपर विचार की आवश्यकता है। संघ प्रमुख ने संविधान में स्व की दृष्टि और भाव की बात की जिसको राहुल गांधी संविधान का अपमान बता रहे हैं। 

राहुल गांधी इन दिनों संविधान की बहुत बात करते हैं। संविधान को लेकर एक दिलचस्प प्रसंग। तय हुआ कि संविधान सभा के सभी सदस्य संविधान पर हस्ताक्षर करेंगे। राहुल गांधी की दादी के पिता जवाहरलाल नेहरू भी संविधान सभा के सदस्य थे। उन्होंने सबसे पहले दस्तखत कर दिया। अब संविधान सभा के अध्यक्ष डा राजेन्द्र प्रसाद के सामने संकट कि वो कहां हस्ताक्षर करें। उन्होंने नेहरू जी के दस्तखत के ऊपर हिंदी और अंग्रेजी दोनों में अपने हस्ताक्षर किए। जिसको देखकर ही लगता है कि जगह बनाकर किसी तरह अध्यक्ष ने अपने हस्ताक्षर किए। जब देश में पहला आमचुनाव होने जा रहा था तो उसके परिणाम के पहले ही नेहरू जी ने संविधान में पहला संशोधन करवा दिया। होना ये चाहिए था कि जन प्रतिनिधि निर्वाचित होते और नई संसद का गठन होता उसके बाद संविधान में संशोधन होता। पर नेहरू जी ने मनमानि की। सिर्फ नेहरू जी ने ही क्यों उनके बाद उनकी पुत्री ने तो संविधान का मजाक ही बना दिया। देश में इमरजेंसी लगाई। बाद में इंदिरा जी के पुत्र राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए संसद के द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की कोशिश की। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में भी ऐसी ही एक कोशिश हुई। केबल और टेलीविजन एक्ट में संशोधन करके न्यूज चैनलों पर काबू करने का असफल प्रयास हुआ था।

इन सबसे अलग हटकर भी अगर देखा जाए तो संविधान में या जिन संस्थाओं में भारतीय धर्म प्रतीकों की बात हमारे संविधान निर्माताओं ने अंगीकार किया था क्या हमारा देश अबतक उस दिशा में चल पाया है। रजनी कोठारी भी ये मानते हैं कि राज्य को स्वतंत्रता की स्थितियां पैदा करनी चाहिए उसमें बाधा नहीं खड़ी करनी चाहिए। 1947 के बाद अगर देखा जाए तो कांग्रेस के शासनकाल में कई बार स्वतंत्रता की स्थितियों में बाधा उत्पन्न की गईं। जिसका विस्तार से जिक्र ऊपर किया जा चुका है। राहुल गांधी अंग्रेजी में बोलते हैं। उनको ये समझना होगा कि भाषा केवल शब्दों का समूह भर नहीं है उससे प्रभाव पैदा होता है, निर्मिति होती है। शब्दों का अपना संस्कार होता है इस कारण से सार्वजनिक जीवन में रहनेवालों को शब्दों के संस्कार और उसकी परंपरा से परिचित होना आवश्यक है। अन्यथा उनके वक्तव्य हास्यास्पद हो जाते हैं। देशद्रोही ऐसा ही एक शब्द है। विचार तो इस बात पर भी होना चाहिए कि क्या स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी हम संविधान निर्माताओं के सोच या भाव को राष्ट्र-जीवन में उतार सके हैं। क्या स्व की अवधारणा तक पहरुंचने में हमें सफलता प्राप्त हुई है।   

Saturday, June 18, 2011

कांग्रेस का संघ ऑब्सेशन

काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़नेवाले योद्धाओं और केंद्र सरकार के बीच तलवारें खिंच गई हैं । लोकपाल बिल पर टीम अन्ना ने सरकार पर सीधे-सीधे धोखाधड़ी का आरोप लगया । सरकार ने भी अन्ना और उनके सहयोगियों के प्रति कड़ा रुख अपना लिया है । दोनों पक्षों के बीच जारी रस्साकशी के बीच अन्ना हजारे ने फिर से जंतर-मंतर पर अनशन करने का ऐलान कर दिया है। सरकार इस बात पर अमादा है कि लोकपाल बिल में उसकी ही चले । जनलोकपाल के कड़े प्रावधानों को डाल्यूट कर दिया जाए । अगर कांग्रेस के प्रधानमंत्री बेहद ईमानदार हैं तो उन्हें लोकपाल के दायरे में आने में दिक्कत क्या है । अगर जजों से ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है तो उनको लोकपाल के दायरे में लाने में सरकार घबरा क्यों रही है । दरअसल सरकार की मंशा ही उसे फिर से लटका देने की है और उसका ठीकरा वो टीम अन्ना पर ठोंकना चाहती है । इसकी पृष्ठभूमि कुछ दिनों पहले से तैयार हो रही थी । बाबा रामदेव के अनशन पर पुलिसिया कार्रवाई करने के बाद से ही सरकार के हौसले बुलंद हो गए थे। उसके बाद के कांग्रेस नेताओं के बयानों को एक साथ जोड़कर देखें तो कांग्रेसी रणनीति की तस्वीर साफ तौर पर नजर आती है । रामदेव के अनशन खत्म होने के चंद घंटों के भीतर ही कांग्रेस के बड़बोले महासचिव दिग्विजय सिंह ने बाबा के अनशन को नाटक करार दिया । दिग्विजय के बयान के कुछ ही देर बाद कांग्रेस के बड़े नेता और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी उनसे भी आगे बढ़ते हुए बाबा रामदेव के आंदोलन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रायोजित बता कर उनपर जोरदार हमला बोला । सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी यहीं नहीं रुके उन्होंने ये दावा भी कर डाला कि रामदेव के पीछे पूरी भगवा ब्रिगेड है । उन्होंने यहां तक कह डाला कि जो पार्टी चुनावों में हार गई है वो अब बाबा को आगे बढ़ाकर आंदोलन चला रही है । आंदोलन के पीछे सरकार को अस्थिर करने की साजिश है । जाहिर सी बात है कि वित्त मंत्री का इशारा भारतीय जनता पार्टी की ओर था । हैरत की बात है कि प्रणब मुखर्जी जैसा मंझा हुआ राजनेता बाबा के अनशन खत्म होने के बाद यह बात कहता है कि उनके आंदोलन को संघ का समर्थन था । यही बात अब कुछ कांग्रेसी अन्ना और उनेक सहयोगियों के बारे में कहने लगे हैं । टीम अन्ना पर भी भगवा ब्रिगेड का एजेंडा आगे बढाने का आरोप लगा है । लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या प्रणब मुखर्जी को यह बात तब नहीं पता थी जब वो अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ बाबा रामदेव की अगुवाई करने दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचे थे । क्या सरकार को अन्ना के अतीत के बारे में पता नहीं था जब रातों रात लोकपाल कमेटी के बारे में सरकारी गजट जारी किया गया । क्या दिल्ली के पांच सितारा होटल में बाबा रामदेव के साथ बैठने वाले केंद्रीय मंत्रियों को इस बात का पता नहीं था कि बाबा संघ के इशारे पर सरकार को अस्थिर करने की साजिश रच रहे हैं । क्या अन्ना के साथ बैठकों का दौर जारी होने तक यह पता नहीं था कि वो बीजेपी और संघ के मुखौटा है । क्या ये मान लिया जाए कि पूरी यूपीए सरकार संघ का एजेंडा चला रहे अन्ना और बाबा की चाल भांपने में नाकाम रही ।
दरअसल ऐसा है नहीं । ये कांग्रेस पार्टी की पुरानी फितरत है । जब भी किसी व्यक्ति या संगठन को डिस्क्रेडिट करना हो तो उसका नाम संघ के साथ जोड़कर ये संदेश दो कि ये लोग सांप्रदायिक ताकतों के हाथ खेल रहे हैं ।संघ का हौवा दिखाकर कांग्रेस वर्षों से वोट बैंक की राजनीति करती रही है । कांग्रेस की यह एक बड़ी ट्रेजडी है । आजादी के आंदोलन में जो राष्ट्रवाद कांग्रेस की ताकत हुआ करती थी उसको पार्टी ने थाली में परोस कर संघ और बीजेपी को पेश कर दिया । राष्ट्रवाद को सांप्रदायिक बनाने के चक्कर में कांग्रेस ने अपनी ताकत खो दी । अब कांग्रेस में कोई राष्ट्रवाद की बात नहीं करता । उनके नेताओं ने यह मान लिया है कि देश, देशहित, देशप्रेम आदि आदि की बात करना सांप्रदायिकता है और जो इन बातों की पैरोकारी करेगा वो सांप्रदायिक है या फिर सांप्रदायिक ताकतों के हाथ की कठपुतली ।
अगर यह मान भी लिया जाए कि अन्ना और बाबा को संघ का समर्थन हासिल है तो उससे क्या आंदोलन का उद्देश्य कमजोर हो जाता है । क्या जिन सवालों को लेकर अन्ना हजारे या बाबा रामदेव आंदोलन कर रहे हैं वो बेमानी हो जाते हैं । क्या आज हमारे देश में भ्रष्टाचार और काला धन राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है । क्या देश और जनता से जुड़े इन मुद्दों को राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने का हक नहीं है ।
बात यह भी नहीं है । दरअसल कांग्रेस की इस रणनीति को समझने के लिए हमें कुछ पहले चलना होगा । अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद जब लोकपाल को लेकर सरकार दबाव में आ गई थी और उसने यह मान लिया था कि सिविल सोसाइटी के सदस्यों के साथ मिल बैठकर लोकपाल बिल के मसौदे को तैयार किया जाएगा और उस बिल को संसद के मॉनसून सत्र में पेश कर दिया जाएगा । लोकपाल कमेटी के साथ दो तीन बैठकों के बाद सरकारी नुमाइंदो को यह अहसास हो गया कि सिविल सोसाइटी के सदस्यों से आसानी से अपनी बातें नहीं मनवा पाएगी । फिर वही खेल शुरू हुआ । सिविल सोसाइटी के सदस्यों पर व्यक्तिगत हमले शुरू हुए । उनकी संपत्ति और उनके आंदोलन को चलाने के आय के स्त्रोत को लेकर खबरें सामने आने लगी । सावधान अन्ना की टोली ने अपने संगठन की बेवसाइट पर अपने व्यक्तिगत संपत्ति और सहयोग राशि के स्त्रोत का खुलासा कर कांग्रेस के षडयंत्र की हवा निकाल दी । उसी तरह से बाबा रामदेव और उनके योग ट्रस्ट की संपत्तियों को लेकर सवाल खड़े किए गए । मकसद सिर्फ बाबा को डिस्क्रेडिट करना था, जिसमें कुछ हद तक सरकार कामयाब भी रही । बाबा रामदेव ने अगर गलत तरीके से संपत्ति अर्जित की है तो उसकी जांच अबतक हो हो जानी चाहिए थी। लेकिन मंशा जांच कराने की नहीं बदनाम करने की है । सरकार ने काले धन के खिलाफ अनशन का ऐलान कर चुके बाबा रामदेव को ज्यादा तवज्जो देकर अन्ना और उनकी टोली को दरकिनार करने का खेल भी खेला । बाबा को अहमियत देने के फैसले के बाद ही प्रणब मुखर्जी समेत सरकार के चार कैबिनेट मंत्री बाबा से मिलने एयरपोर्ट जा पहुंचे । जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की गई कि बाबा सरकार के लिए बेहद अहम हैं और सरकार काला धन के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध है । लेकिन बाबा रामदेव के साथ बात नहीं बनी । जो सरकार अन्ना के खिलाफ बाबा को खड़ा करना चाहती थी उसकी ही कार्रवाई ने बाबा और अन्ना को और मजबूती से एक कर दिया । बाबा रामदेव के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के विरोध में अन्ना हजारे एक दिन के लिए राजघाट पर उपवास पर बैठे । तपती दोपहरी में लोगों की भीड़ ने सरकार को यह संकेत दे दिया कि भ्रष्टाचार और काला धन के मुद्दे को सरकार हल्के में नहीं ले सकती । काला धन और भ्रष्टाचार आज देश में एक ऐसा मुद्दा बन चुका है जिसको लेकर जनता सरकार से कोई ठोस कार्रवाई चाहती है । वक्त आ गया है कि सरकार अपनी हरकतों से बाज आए, कांग्रेस पार्टी बजाए हमलावर होने के लोगों की सुने । जिन मुद्दों को अन्ना हजारे या बाबा रामदेव उठा रहे हैं उनको तवज्जो दे और उसके सर्वमान्य हल खोजने की दिशा में सार्थक पहल करे, ताकि जनता के बीच सरकार को लेकर विश्वास कायम हो सके । लोकतंत्र में सरकार से लोक का भरोसा उठना अच्छा संकेत नहीं होता । सोनिया गांधी और प्रणब मुखर्जी से बेहतर इसे कोई नहीं समझ सकता क्योंकि दोनों लंबे समय तक इंदिरा गांधी के साथ रहे हैं, इमरजेंसी लगाने के दौरान भी और इमरजेंसी खत्म के होने के बाद भी ।

Wednesday, December 22, 2010

लीक ने उतारा मुखौटा

इस बात के पर्याप्त सबूत हैं रहे हैं कि भारत के मुस्लिम समुदाय में कुछ तत्व ऐसे हैं, जिनको लश्कर ए तोयबा का समर्थन हासिल है। लेकिन ज्यादा बडा़ खतरा कट्टरपंथी हिंदू संगठनों का हो सकता है । ये संगठन मुस्लिम समुदाय से धार्मिक तनाव और राजनीतिक कट्टरता पैदा करते हैं । ये कथित बातें कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर को 20 जुलाई 2009 को कहा । दरअसल ये कथित बातचीत रोमर और राहुल के बीच तब हुई जब अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत आई हुई थी और प्रधानमंत्री ने उनके सम्मान में दावत दी थी । उस दावत में जब रोमर ने राहुल से लश्कर की गतिविधियों और भारत पर आसन्न खतरे के बारे में पूछा तब राहुल गांधी ने उनसे यह बातें कही थी । दोनों के बीच की बातचीत भारत अमेरिका डिप्लोमैटिक संदेशों में दर्ज है । जिसका खुलासा विकिलीक्स ने किया है । जाहिर सी बात है कि इस खुलासे के बाद देशभर में बहस छिड़ गई । बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राहुल गांधी के इस बयान को बचकाना करार दिया । लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि जिस वयक्ति में कांग्रेस देश का भविष्य़ देख रही है, जिस वयक्ति को देश के सर्वोच्च पद के लिए तैयार किया जा रहा है, वो शख्स इतनी हल्की बातें कैसे कर सकता है । हल्की इसलिए कि एक ओर जहां भारत आतंकवाद से जूझ रहा है और पूरे विश्व में आतंकवाद और उसके आका पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाने में जुटा है, वहीं देश पर शासन करनेवाली पार्टी का एक अहम नेता हिंदू कट्टरपंथियों को लश्कर से बड़ा खतरा बता रहा है । क्या ये मान लिया जाए कि राहुल गांधी विश्व के सबसे खूंखार आतंकी संगठन लश्कर-ए-तोयबा से अंजान हैं, क्या यह भी मान लिया जाए कि राहुल गांधी संयुक्त राष्ट्र संघ के उस प्रस्ताव से भी अंजान हैं जिसमें लश्कर को आतंकी संगठन घोषित कर विश्व मानवता के लिए खतरा बताते हुए उसपर पाबंदी लगा दी गई है। जिसके बाद से लश्कर ने अपना नाम बदल लिया । क्या यह भी मान लिया जाए कि मुंबई हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान को जो तमाम डॉजियर सौंपे थे उसकी जानकारी भी राहुल गांधी को नहीं है । क्या यह भी मान लिया जाए कि राहुल गांधी को लश्कर के खिलाफ भारत के मुहिम की जानकारी नहीं थी । यह संभव ही नहीं है कि इन सारी बातों से राहुल गांधी अनजान हों ।
दरअसल कांग्रेस पार्टी देश की अल्पसंख्यक आबादी की तुष्टीकरण के लिए किसी भी हद तक जा सकती है । कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं पर बारीकी से नजर रखनेवालों का मानना है कि वोट बैंक की राजनीति के लिए कांग्रेस का एक तबका इस तरह के बयानबाजी करता रहता रहता है । 26/11 के मुंबई हमलों के बाद उस वक्त केंद्र में मंत्री और किसी जमाने में महाराष्ट्र के कद्दावर नेता ए आर अंतुले ने एटीएस चीफ हेमंत करकरे की शहादत पर सवाल खड़े किए थे । अंतुले ने कहा था कि हेमंत करकरे की मौत को संदेहास्पद करार दिया था और साथ ही यह भी जोडा़ ता कि मालेगांव धमाकों की जांच कर रहे थे । इशारों-इशारों में उन्होंने करकरे की शहादत को मालेगांव धमाके की जांच से जोड़ दिया था । उस वक्त पूरा राष्ट्र मुंबई हमले के जख्मों को झेल रहा था, लिहाजा अंतुले के बयान की चौतरफा आलोचना शुरू हो गई । पाकिस्तानी मीडिया ने भी इसे खूब प्रचारित करना शुरू कर दिया । दबाव बढ़ता देखकर कांग्रेस ने उस बयान से पल्ला झाड़ लिया और बाद में अंतुले को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा । उस वक्त का अंतुले का बयान भी अल्पसंख्यकों को ध्यान में रखते हुए किया गया था । अभी हाल ही में विकिलीक्स ने इस बात का खुलासा भी किया था कैसे दो हजार चार के आमचुनाव में कांग्रेस ने मुंबई हमलों को भुनाने की कोशिश की थी । कुछ दिनों पहले देश के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी भगवा आतंक का जुमला फेंककर एक बहस को जन्म देने की कोशिश की थी । जब उनके बयान पर बवाल शुरु हुआ तो कांग्रेस ने उसको उनकी वयक्तिगत राय करार दे दिया ।
अब कुछ दिनों पहले पार्टी में खुद को अल्पसंख्यकों का पैरोकार मानने वाले कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी यह कहकर सनसनी फैला दी कि अपनी मौत के चंद घंटे पहले करकरे ने उन्हें फोन कर यह बताया था कि वो हिंदू संगठनों से मिल रही धमकियों से परेशान हैं । दिग्विजय सिंह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं सो उनकी बात को मीडिया में खासी तवज्जों मिली । लेकिन बाद में कुछ अखबारों ने करकरे की कॉल डिटेल छापकर दिग्विजय के बयान को संदेहास्पद बना दिया । बाद में महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल ने भी दिग्विजय के बयान की हवा निकाल दी । पाटिल ने कहा कि महकमे के पास कोई ऐसा रिकॉर्ड नहीं है जिससे दिग्विजय और करकरे के बीच की बातचीत की पुष्टि होती हो । यहां एक बार फिर सवाल खड़ा होता है कि अगर उस वक्त करकरे ने दिग्विजय सिंह से अपनी जान का खतरा बताया था तो दिग्गी राजा दो साल तक चुप्पी क्यों साधे रहे । देश यह जानना चाहता है करकरे की आशंका के मद्देनजर दिग्विजय खामोश क्यों रहे । दरअसल ये संदेहास्पद खामोशी कांग्रेस की सियासत का हिस्सा है । दिग्विजय सिंह पहले भी इस तरह की खामोशी साधते रहे हैं । दिल्ली कते बटला हाउस एनकाउंटर के डेढ साल बाद उनको अचानक से इलहाम होता है कि वो एनकाउंटर फर्जी था । दिग्विजय को इस ज्ञान की प्राप्ति आजमगढ़ के संजरपुर में होती है । जहां वो कहते हैं कि उन्होंने बटला हाउस एनकाउंटर के फोटोग्राफ्स देखे हैं जिनमें आतंकवादियों के सर में गोली लगी है । उनके मुताबिक दहशतगर्दों के खिलाफ एनकाउंटर में इस तरह से गोली लगना नामुमकिन है । जाहिर है इशारा और इरादा दोनों साफ था । अदालत और सरकारी जांच में ये सही साबित हुए मुठभेड़ पर सवाल खड़ा कर दिग्विजय क्या हासिल करना चाह रहे थे, यह आईने की तरह साफ था । उस वक्त भी कांग्रेस ने उनके इस बयान को उनकी वयक्तिगत राय बताकर पल्ला झाड लिया था ।
कुछ दिनों पहले राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की तुलना प्रतिबंधित संगठन सिमी से कर दी थी । सिमी और संघ की तुलना करने के अलावा राहुल कोई ठोस सबूत या तर्क अपने इस बयान के समर्थन में पेश नहीं कर पाए । राहुल गांधी अगर अपने इस बयान को लेकर गंभीर थे तो उन्हें अपनी सरकार पर दबाव डालना चाहिए था कि संघ के खिलाफ कार्रवाई करें । लेकिन उस बयान की मंशा किसी तरह की कार्रवाई या देश के प्रति चिंता नहीं बल्कि सिर्फ राजनीतिक फायदा था । अगर हम अंतुले, चिदंबरम और फिर दिग्विजय सिंह के बयानों से राहुल गांधी के बयान को जोड़कर देखें तो एक महीन सी रेखा नजर आती है जिससे एक ऐसी राजनीति की तस्वीर बनती है जहां एक खास समुदाय के वोटरों को लुभाने के लिए खाका तैयार किया जा रहा है । जाहिर सी बात है कि उसके केंद्र में उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव है । बिहार की जनता ने राहुल गांधी के करिश्मे पर पानी फेर दिया । राहुल के ताबड़तोड़ दौरे और यूथ ब्रिगेड को वहां उतारने का भी कोई नतीजा नहीं निकला और पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले वहां पार्टी को आधी सीटें मिली । अब चुनौती उत्तर प्रदेश में अपनी साख और सीट दोनों बचाने की है । लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिल गई थी । अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को ठीक-ठाक सीटें नहीं मिल पाती हैं तो राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल खडे़ होने शुरू हो जाएंगे क्योंकि राहुल गांधी और उनके रणनीतिकारों ने उत्तर प्रदेश को राहुल गांधी की प्रयोगशाला के तौर पर प्रचारित किया हुआ है ।