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Friday, February 10, 2023

आक्रांताओं के कारण प्रवेश पर पाबंदी


पिछले दिनों दक्षिण भारत की यात्रा पर गया था। यात्रा के दौरान त्रिवेन्द्रम स्थित श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर में दर्शन करके परिसर के उत्तरी गेट से बाहर निकल रहा था। गेट पर पहुंचकर देखा कि एक विदेशी महिला और पुरुष गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मी से कुछ अनुरोध कर रहे थे। वो बार बार अंग्रेजी में कुछ कह रहे थे और सुरक्षाकर्मी सिर्फ नो नो (नहीं-नहीं) कह रहे थे। हम उनकी बात सुनने के लिए रुक गए। जिज्ञासा थी कि सुरक्षाकर्मी किस बात के लिए मना कर रहे हैं और विदेशी पर्यटक का आग्रह क्या है। जब हम रुके तो सुरक्षाकर्मी उनसे कह रहे थे ओनली हिंदू। ये सुनकर विदेशी पर्यटक ने कहा कि आई एम अ हिंदू, आई डू योगा। आई नो कृष्णा, आई नो रामा एंड आई विलीव इन गाड। (मैं हिंदू हूं, मैं योग करता हूं और राम और कृष्ण को जानता हूं। मैं भगवान में विश्वास करता हूं।) इतना सुनने के बाद भी सुरक्षाकर्मी सहमत नहीं हो रहे थे और बार बार उनसे कह रहे थे कि ओनली हिंदू कैन गो ( सिर्फ हिंदू ही मंदिर परिसर में जा सकते हैं)। विदेशी पर्यटक लगातार हिंदू धर्म के बारे में अपनी जानकारी सुरक्षाकर्मियों से साझा कर रहे थे। अब उसके साथ की महिला ने भी कहना आरंभ कर दिया था कि वो भी योग करती है इसलिए वो भी हिंदू है। हमने हस्तक्षेप करने का प्रयास किया लेकिन सुरक्षाकर्मी टस से मस नहीं हो रहे थे। थोड़ी देर तक दोनों की बातें सुनने के बाद सुरक्षाकर्मियों ने उनको अपने उच्चाधिकारियों के पास भेज दिया। पता नहीं उनको श्रीपद्मनाभस्वामी के दर्शन करने का सौभाग्य मिला या नहीं। जब हम कोच्चि के डच पैलेस के अंदर श्रीमहाविष्णु मंदिर पहुंचे तो मंदिर के बाहर बोर्ड लगा था, ओनली हिंदूज आर अलाउड इनसाइड द टैंपल (मंदिर में सिर्फ हिंदूओं के प्रवेश की अनुमति है)। वहां भी विदेशी पर्यटक मंदिर के गेट तक जा रहे थे और बोर्ड देखकर वापस हो रहे थे।

इन दो मंदिरों को देखने के बाद मन में ये प्रश्न उठा कि मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित क्यों है। जबकि कहा ये जाता रहा है कि हिंदू धर्म, उपासना की पद्धति भर नहीं है, वह एक समग्र जीवन दर्शन और व्यवहार प्रक्रिया है। उसमें सकारात्मक स्वीकृतियों के साथ निषेधात्मक पक्षों के उन्नयन की गंभीर दृष्टि होती है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद से लेकर छांदोग्योपनिषद तक में धर्म के अर्थ को स्पष्ट किया गया है। ऋगवेद में तो धर्म का अर्थ निश्चित नियम या आचरण के तौर पर उल्लिखित है। ऋगवेद और अथर्ववेद में धर्मन् शब्द का उपयोग कई बार मिलता है। जैमिनी की परिभाषा के अनुसार वेदों में प्रयुक्त अनुशासनों के अनुसार चलना ही धर्म है। धर्म का संबंध उन क्रिया-संस्कारों से है, जिनसे आनंद मिलता है और जो वेदों द्वारा प्रशंसित और प्रेरित हैं। मनुस्मृति में भी कहा गया है आचार: परमो धर्म:। धर्म की परिभाषा को लेकर, इसको उपादानों को लेकर, इसके सूत्रों को लेकर, इसके सूत्रग्रंथों को लेकर विपुल सामग्री उपलब्ध है। लेकिन कहीं भी धर्म का अर्थ उपासना पद्धति नहीं मिलता है। धर्म को जीवन जीने की पद्धति के तौर पर ही देखा गया है। अगर हिंदू धर्म को जीवन जीने की पद्धति माना गया है तो उन विदेशियों का क्या किया जाए जो ये कहते हैं कि उनका तो हिंदू धर्म में विश्वास है, वो राम और कृष्ण में भी विश्वास रखते हैं। क्या वो मंदिरों में प्रवेश कर सकते हैं। इस बारे में व्यापक हिंदू समाज को विमर्श करना चाहिए। 

उससे भी महत्वपूर्ण ये जानना है कि हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश निषेध क्यों किया गया था। मंदिरों में केवल हिंदुओं को ही प्रवेश देने की व्यवस्था क्यों की गई थी। आज के संदर्भ में अगर इस प्रश्न को पूछा जाएगा तो जो खुद को कथित उदारवादी परंपरा के लेखक मानते हैं उनमें से अधिकतर इसका उत्तर जातिप्रथा और धर्मशास्त्रों में निर्दिष्ट जीवनपद्धतियों की एकांगी व्याख्या के आधार पर देंगे। कोई इसके लिए आर्य-अनार्य के सिद्धांत का सहारा लेगा तो कोई वर्ण या जाति व्यवस्था को इसका आधार बनाकर अपनी विद्वता का परिचय देने का प्रयास करेगा। क्या इस तरह के विचारों या तर्कों से सहमत हुआ जा सकता है। बिल्कुल नहीं। मंदिरों में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण रहा है विदेशी आक्रांताओं का मंदिरों पर हमला कर उसको तोड़ना, वहां संचित धन को लूटना और समाज के सांस्कृतिक केंद्र को तहस नहस करना। भारतीय संस्कृति में मंदिरों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। मंदिरों से नृत्य और कला का गहरा जुड़ाव रहा है। मुगल आक्रांताओं ने जब हमारे देश पर हमला किया और तो उनको मंदिरों की सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता का अनुमान हो गया था। ये अकारण नहीं है कि मुगलकाल में मंदिरों पर हमले हुए, मंदिरों को तोड़ा गया। मुगलों ने मंदिरों को तोड़कर सिर्फ हिंदुओं की आस्था को नहीं तोड़ा बल्कि उन्होंने भारतीय समाज के उस केंद्र को नष्ट करने का प्रयास किया जहां लोग संगठित होते थे। मुगलों ने मंदिरों के रूप में स्थापित सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्रों को तोड़कर भारतीय समाज को कमजोर करने का प्रयत्न किया था। समाज की ताकत पर प्रहार किया। भारतीय कला लोक के केंद्र मंदिर हुआ करते थे। जनता की आकांक्षाएं और उसके स्वप्न उन्हीं कलाओं में खुलते और खिलते थे। उत्तर भारत में मुगलों का प्रभाव रहा और वो सुदूर दक्षिण भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित नहीं कर पाए थे तो इस कारण दक्षिण भारत के मंदिर उनसे सुरक्षित रहे। जब उत्तर भारत के मंदिरों को तोड़े जाने और उसको नष्ट करने की खबरें दक्षिण भारत तक पहुंची होंगी तो मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई होगी। इन बातों का प्रमाण को ढूंढे जाने की आवश्यकता है। दक्षिण भारत के मंदिर के पुजारियों या वहां पीढ़ियों से रह रहे सेवादारों से बात करने पर इस तरह की बातें सामने आती हैं। उत्तर और पश्चिम भारत के मंदिरों में भी गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने का प्रयास हुआ। कई मंदिरों में इस तरह की पाबंदी लगाई भी गई। उसके पीछे के कारण भी यही रहे कि मुगलों की सेना ने कई बार छलपूर्वक मंदिरों में प्रवेश करके उसको तोड़ने का कार्य किया। 

मुगलों के पराभव के बाद और अंग्रेजी राज के उदय के समय और कालांतर में उनके शासनकाल में भी मंदिरों का पौराणिक स्वरूप स्थापित नहीं हो सका। इसका कारण ये रहा कि मंदिरों पर अंग्रेज शासकों की लगातार नजर रहा करती थी। वहां होने वाली गतिविधियों पर, वहां होनेवाले धन संचय पर भी अंग्रेज नजर रखते थे। उनको लगता था कि मंदिर ही स्वाधीनता की गतिविधियों के केंद्र हो सकते हैं। अंग्रेजों ने मंदिरों के सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप को बदलने का प्रयत्न किया और मंदिरों को सिर्फ धार्मिक केंद्र के रूप में प्रचारित करना आरंभ कर दिया। उनके सांस्कृतिक स्वरूप और सामाजिक भूमिका पर पाबंदियां लगाई गईं। अंग्रेजी शासन वाले कालखंड में धर्म से जुड़ी बातों को तोड़ा मरोड़ा गया। आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर धर्म की गलत व्याख्या करके उसको रिलीजन बनाकर आनेवाली पीढ़ियों के मानस में स्थापित कर दिया गया।

हिंदू समाज बहुत उदार रहा है और इसके अंदर से ही रूढ़ियों को खत्म करने को लेकर सुधारवादी पैदा होते रहे हैं। उन्होंने हिदू समाज में समय के साथ कई तरह के सुधार किए। इस तरह के कई मंदिर मिलेंगे जहां पहले गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित था लेकिन वहां अब इस नियम में ढील दे दी गई है और हर तरह के धर्मावलंबी उन मंदिरों में जा रहे हैं। ये उदारवादी दृष्टि समयानुसार व्यापक होती रहती है।