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Saturday, January 18, 2020

साहित्यिक मेले से बनती संस्कृति


जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलए) एक ऐसा साहित्य महोत्सव है जो पूरी दुनिया के साहित्यप्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। हर वर्ष जनवरी के महीने में जयपुर के ऐतिहासिक डिग्गी पैलेस में आयोजित होनेवाले इस लिटरेचर फेस्टिवल में देश-विदेश के तमाम मशहूर लेखकों का जमावड़ा होता है जो साहित्य की विभिन्न विधाओं से लेकर राजनीति, खेल और सिनेमा लेखन की नई प्रवृत्तियों पर विमर्श करते हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखकों के अलावा दुनियाभर के प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित लेखकों के विचारों को सुनने का अवसर मिलता है। आज अगर पूरे देश के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे हैं या कह सकते हैं कि पूरे देश में जो एक साहित्य महोत्सवों की संस्कृति का विकास हुआ है तो उसके पीछे जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की सफलता ही है। लगभग सभी साहित्य उत्सव जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की तर्ज पर ही आयोजित होते हैं। इस लिहाज से अगर देखा जाए तो देशभर में साहित्यिक संस्कृति को मजबूत करने में जेएलए ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है प्रत्यक्ष रूप से भी और परोक्ष रूप से भी।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन 23 से 27 जनवरी तक हो रहा है। यह उनके आयोजन का तेरहवां साल है। तेरह सालों में जेएलए ने अपने आप को इतनी मजबूती से स्थापित कर लिया कि वो अब देश से निकलकर ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भी आयोजित होने लगा है। 2008 में पहली बार जब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन हुआ था तो इसकी संकल्पना जयपुर विरासत फाउंडेशन के कर्ताधर्ताओं ने की थी। जयपुर विरासत फाउंडेशन ने राजस्थान की लोक संस्कृति के लिए बहुत काम किया है। उस वक्त इससे जुड़ी मीता कपूर के मुताबिक 2008 के इंटरनेशनल हेरिटेज फेस्टिवल के तहत ही उसके खंड के रूप में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की शुरुआत हुई थी। 2008 में ये आयोजन तीन दिनों का था और दिग्गी पैलेस के एक ही हॉल में इसका आयोजन हुआ था। उस वर्ष भी नमिता गोखले जेएलएफ से एडवाइजर के तौर पर जुड़ी थीं। मीता कपूर बाद में इस आयोजन से अलग हो गईं लेकिन एक परंपरा जो उन्होंने पहले संस्करण में शुरू की थी उसका निर्वाह आज तक कर रही हैं। वो जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आने वाले सभी प्रतिभागियों और अन्य महत्वपूर्ण अतिथियों को अपने घर पर शाम को दावत देती हैं। इस रात्रिभोज में परोसे जानेवाला खाना वो खुद बनाती हैं या उनकी देखरेख में राजस्थानी खाना तैयार किया जाता है।
कहना ना होगा कि जेएलए के आयोजन की संरचना इस तरह से की गई ताकि साहित्यप्रेमियों के अलावा अन्य लोगों को भी अपनी ओर आकृष्ट कर सके। अलग अलग भाषा के लेखकों के साथ-साथ सिनेमा और खेल के सितारों को हर संस्करण में नियमत रूप से आमंत्रित करने से भी इसको मजबूती मिली। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में फिल्म से जुड़े लोगों और फिल्मी सितारों को बुलाने को लेकर कई बार सवाल भी खड़े होते रहे हैं। ऐसे सवाल सिर्फ जेएलएफ को लेकर ही नहीं उठे हैं बल्कि दुनिया में जहां भी साहित्य महोत्सवों में फिल्मी सितारों को बुलाया जाता है वहां वहां ऐसे सवाल खड़े होते रहे हैं। बेस्टसेलर उपन्यास चॉकलेट की ब्रिटिश लेखक जॉन हैरिस ने भी साहित्य महोत्सवों में फिल्मी सितारों को लेकर एक अलग ही तरह का प्रश्न उठाया था। उन्होंने कुछ सालों पहले कहा था कि ‘कई लिटरेचर फेस्टिवल इन सितारों के चक्कर में लेखकों पर होनेवाले खर्चे में भारी कटौती करते हैं। आयोजकों को लगता है कि सितारों के आने से ही उनको हेडलाइन मिलेगी। उनका मानना था कि इससे आयोजकों को फायदा होता है पर साहित्य नेपथ्य में चला जाता है । बाजार के विषेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के साहित्यिक आयोजन तभी सफल हो सकते हैं जब इसमें शिरकत करनेवालों में सितारे भी हों क्योंकि विज्ञापनदाता उनके ही नाम पर स्पांसरशिप देते हैं। विज्ञापनदाताओं की रणनीति होती है कि जितना बड़ा सितारा होगा उतनी बड़ी भीड़ जुटेगी और उनके उत्पाद का प्रचार बड़े उपभोक्ता वर्ग तक पहुंचेगा । परंतु सवाल यही है कि क्या इस तरह के आयोजनों में साहित्य या साहित्यकारों पर पैसे को तरजीह दी जानी चाहिए।अगर उद्देश्य साहित्य पर गंभीर विमर्श है, अगर उद्देश्य पाठकों को साहित्य के प्रति संस्कारित करने का है तो उसके साथ साथ इस सितारों को बुलाने में कोई हर्ज नहीं है। गुलजार, जावेद अख्तर, शाबाना आजमी, प्रसून जोशी तो लगभघ नियमित तौर पर ही इस आयोजन में आते रहे हैं। उनके अलावा काजोल, करन जौहर, सोमन कपूर, वहीदा रहमान जैसे कलाकार भी जेएलएफ की शान बढ़ा चुके हैं।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में विवादों की बड़ी भूमिका रही है हलांकि इसकी फेस्टिवल डायरेक्टर नमिता गोखले हमेशा से कहती हैं कि उनका उद्देश्य इस आयोजन में किसी तरह के विवाद पैदा करना कभी भी नहीं रहा। पर 2012 में विवादित लेखक सलमान रश्दी के जेएलएफ में आने को लेकर भारी विवाद हुआ था। सलमान पर अपनी किताब द सैटेनिक वर्सेस में ईशनिंदा का आरोप है और उनके खिलाफ ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्ला खोमैनी ने जान से मारने का फतवा भी जारी किया था। सलमान रश्दी के विवाद के केंद्र में रहने की वजह से अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी इस आयोजन की तरफ लोगों का ध्यान गया था। चार दिनों तक हुए विवाद के बाद आखिरकार सलमान को जयपुर आने की इजाजत नहीं मिली। मामला इतने पर ही नहीं रुका था उस वक्त की गहलोत सरकार ने वीडियो लिंक के जरिए सलमान को सत्र में भाग लेने की अनुमति नहीं दी थी। लेकिन इसके बाद भी विवाद रुका नहीं था। सलमान रश्दी के नहीं आने और वीडियो लिंक से सत्र में जुड़ने की अनुमति नहीं मिलने के बाद लेखक जीत थाईल, रुचिर शर्मा और हरि कुंजरू ने सलमान रश्दी की विवादित किताब के अंश पढ़ दिए थे। उसके बाद जीत थाईल पर जयपुर और अजमेर में आठ केस दर्ज किए गए थे। उसके बाद के वर्षों में आशीष नंदी के एक बयान को लेकर आशुतोष की आपत्ति पर भारी विवाद हुआ था। ये विवाद भी काफी दिनों तक चला और बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और वहां से निबटा। 2016 में फिल्मकार करण जौहर ने भी अपने बयान से छोटा ही सही पर विदा खड़ा किया था। जेएलएफ के आयोजन के पहले ही दिन करण जौहर ने लोकतंत्र को मजाक बता दिया था। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा था कि हमारे देश में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन सबसे बड़ा जोक है और लोकतंत्र तो उससे भी बड़ा मजाक है । करण के मुताबिक अगर आप अपने मन की बात कहना चाहते हैं तो ये देश सबसे मुश्किल है। इसके अलावा तस्लीमा नसरीन के वहां पहुंचने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मनमोहन वैद्य के एक बयान को लेकर भी भारी विवाद हुआ था। इ
इन विवादों ने जेएलएफ को चर्चित करने में अवश्य मदद की यहां गंभीर साहित्यिक विमर्श भी होते हैं जो पाठकों को संस्कारित करते हैं। राजनीति से लेकर अर्थशास्त्र और औपनिवेशिक संस्कृति के सवालों से भी विद्वान वक्ता मुठभेड़ करते हैं जो पाठकों को उन विषयों को सोचने समझने की एक नई दृष्टि देते हैं। देश दुनिया के पाठकों के लिए ये पांच दिन ऐसे होते हैं जिनमें हर तरह की रुचि के विषयों पर विमर्श होता है और पाठकों को भी उसमें हिस्सा लेने का अवसर प्राप्त होता है। पहले संस्करण में एक हॉल से शुरु हुए इस आयोजन में अब पांच स्थानों पर समांतर सत्र होते हैं और श्रोताओं के लिए विकल्प होता है कि वो किस विषय पर किस वक्ता को सुनना चाहते हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पिछले तेरह सत्रों में अपने आयोजन के स्वरूप में भी लगातार बदलाव करता रहता है। इसमें सांगीतिक आयोजन जुड़े, जयपुर बुक मार्क के रूप में प्रकाशन जगत की हस्तियों को आपस में विचार विनिमय का एक मंच मिला जहां पुस्तकों के प्रकाशन अधिकार से लेकर प्रकाशन जगत की समस्याओं पर विमर्श होते हैं। कुल मिलाकर अगर हम देखें तो जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल एक ऐसे आयोजन के तौर पर स्थापित हो चुका है जहां गंभीर साहित्यिक विमर्श के अलावा वहां जानेवालों के मनोरंजन से लेकर शॉपिंग तक के अवसर उपलब्ध होते हैं।
     

Friday, January 27, 2017

वैचारिक समानता की ओर बढ़ते कदम

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है । इस वर्ष अभी हाल ही में समाप्त हुए साहित्यके इस सबसे बड़े उत्सव में भी एक अलग ही किस्म का विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई । इस विवाद की पृष्ठभूमि उस वक्त ही शुरू हो गई थी जब मेला के आयोजकों ने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले और संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य को मेले में वक्ता को तौर पर निमंत्रित किया था । संघ के बड़े अधिकारियों की जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में उपस्थिति और लगभग हर वर्ष इस आयोजन में दिखाई देनेवाले हिंदी के वरिष्ठ कवि और पुरस्कार वापसी के अगुवा अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश की अनुपस्थिति से जोड़कर देखा गया । दरअसल आयोजन के दसवें साल में अशोक वाजपेयी और असहिष्णुता के कथित झंडाबरदारों को जयपुर के इस साहित्यक महाकुंभ में निमंत्रित ही नहीं किया गया था । यह आश्चर्य की बात थी क्योंकि अशोक जी इस लिट फेस्ट में स्थायी अतिथि होते थे । अशोक वाजपेयी, उदय प्रकाश और हरि कुंजरू आदि को निमंत्रित नहीं करना और दत्तात्रेय होसबोले और मनमोहन वैद्य की उपस्थिति से कई लेखकों के चहरे पर बेचैनी के भाव दिखाई दे रहे थे । यह बात भी फैलाने की कोशिश की गई कि असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी समूह के लेखकों ने इस बार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का बहिष्कार किया जबकि सच्चाई इससे इतर थी । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की साख और वैश्विक ब्रांड के मद्देनजर यह बात किसी के भी गले नहीं उतर रही थी कि कोई लेखक इस उत्सव का बहिष्कार कर सकता है । कुळ लोगों ने सोशल साइट्स पर यह भ्रम फैलाने की कोशिश की । राजस्थान के कुछ लेखकों ने आयोजकों से दबी जुबान में फेस्टिवल के निदेशकों से अपनी आपत्ति दर्ज करवाई । बावजूद इसके संघ के पदाधाकरियों के सत्र में श्रोताओं की जबरदस्त भागीदारी रही । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मौजूद लेखकों में भी उनको सुनने का कौतूहल देखने को मिल रहा था । अमूमन सभी लेखकों का कहना था कि संघ के विचारों को सुने बिना खारिज किया जाना उचित नहीं है ।
दरअसल अगर हम देखें तो भारत में संवाद की परंपरा रही है, वाद विवाद की नहीं । आजादी के बाद से एक खास तरीके से ऑर्ग्यूमेंट यानि बहस की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाने लगा । किसी प्रकार की बहस या वाद विवाद से तबतक कुछ हासिल नहीं होता जबतक संवाद ना हो । वाद विवाद या बहस की इसी संस्कृति को सत्ता के साथ लंबे समय तक चिपकी एक विचारधारा ने अपनाया । सत्ता की परजीवी इस विचारधारा ने समान विचार वाले लोगों से ही बहस की, ऐसा माहौल बनाया गया कि समाज में बौद्धिक विमर्श अपने चरम पर है लेकिन उससे कहीं कुछ असाधारण हासिल हुआ हो, ऐसा ज्ञात नहीं है । बल्कि चिंतन की जो हमारी थाती थी उसपर भी आयातित बौद्धिकता लाद कर उसके विस्तार को अवरुद्ध किया गया । पाणिनी ने जो अष्टाध्ययी की रचना की और उसको एक वैज्ञानिक आधार दिया उसको भी धीरे-धीरे भुला दिया गया । संसार की सबसे वैज्ञानिक भाषाओं में से एक संस्कृत को पवित्रता के दायरे में बांधकर उसको पूजा पाठ की भाषा घोषित कर उसका गला घोंट दिया गया । मशहूर डच भाषाविज्ञानी और दार्शनिक फ्रिट्स स्टाल ने पाणिनी के मूल सिद्धांतों की तुलना यूक्लिड के ज्यामिती के सिद्धांतों से की है और कहा है कि जिस तरह से यूक्लिड ने ज्यामिती के सिद्धांतों को पूरे यूरोप में स्थापित किया उसी तरह से पाणिनी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया । पहले विदेशी आक्रमणकारियों की वजह से इस परंपरा को नुकसान पहुंचा और बाद में वैचारिक आक्रमण ने इसके विकास को बाधित किया ।
भारतीय ज्ञान परंपरा को रोकने के लिए आजादी के बाद ऑर्ग्यूमेंट की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाने लगा । होना यह चाहिए था कि ऑर्ग्यूमेंट की जगह कनवरसेशन यानि विचार विनियमय होता लेकिन अमर्त्य सेन जैसे महान विद्वान ने भी आरग्यूमेंटेटिव इंडियन की अवधारणा को ही आगे बढ़ाया । नतीजा यह हुआ कि विचार विनिमय का दौर रुक गया । बहस वाली विचारधारा के अलावा जो भी विचारधारा थी उसको अस्पृश्य माना जाने लगा । उनसे संवाद तक रोक दिया गया । नतीजा, दशकों तक एक विचारधारा का एकाधिकार और जहां एकाधिकार होता है वहां अधिनायकवाद का जन्म होता है । इसी वाद के चलते पिछले नौ साल तक जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में संघ से सीधे तौर पर जुड़े किसी विचारक या प्रचारक को वहां आमंत्रित नहीं किया गया । बगैर संघ के विचारों को सुने, बगैर उनसे संवाद किए उस विचारधारा को खारिज किया जाता रहा । जिस तरह से किसी प्रोडक्ट की एक लाइफ साइकिल होती है उसी तरह से विचारधारा भी उपर नीचे होती रहती है । वामपंथी विचारधारा के अंतर्विरोधों और मार्क्स के अनुयायियों के विचार और व्यवहार में अंतर ने उसको कमजोर किया तो लोग वैकल्पिक विचारधारा की ओर बढ़े । उसको जानने की कोशिश की जाने लगी और उसी कोशिश का नतीजा है मनमोहन वैद्य और दत्तात्रेय होसबोले का जयपुर लिटरेचपर फेस्टिवल में जाना । उनको विचारों को सुना गया अब उसके बाद अगर उसपर विचार विनिमय हो और विचारों की आवाजाही हो तो अस्पृश्यता की दीवार टूटेगी और यह स्थिति लोकतंत्र को मजबूत करने में सहायक होगी । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल साहित्यक और वैचारिक विमर्श का मंच है और जब उसमें सभी विचारधारा के लोगों को समान मौका मिलेगा तो उसकी साख भी बढ़ेगी ।

जिस तरह से आयोजकों ने पुरस्कार वापसी समूह को इस बार निमंत्रित नहीं करके उनको अपनी राजनीति चमकाने का मौका नहीं दिया उसी तरह से उनको तस्लीमा नसरीन के विरोध को भी दरकिनार करना होगा । तस्लीमा का विरोध कर रहे चंद मुस्लिम संगठनों के दबाव में आकर अगर उनको बोलेने ता मंच नीं देने का फैसला वापस नहीं होता है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा । तस्मीमा के विरोध और जयपुर लिट फेस्ट के आयोजकों की उनको भविष्य में नहीं बुलाने के आश्वासन पर भी हमारे बौद्धिक समाज में किसी तरह का कोई स्पंदन नहीं हुआ । यह भी एक किस्म की बौद्धिक बेइमानी है जब अभिव्यक्ति की आजादी पर चुनिंदा तरीके से अपनी प्रतिक्रिया देते हैं । जब बौद्धिक समाज या कोई विचारधारा अपने आंकलन में पक्षपात करने लगता है तब यह मान लेना चाहिए कि उसका संक्रमण काल है और वाम विचारधारा के अनुयायी करीब करीब हमेशा इस तरह का ही प्रतिक्रिया प्रदर्शन करते हैं ।  

Monday, March 28, 2016

साहित्य की गुगली

इस वक्त साहित्य में जमकर राजनीति का दौर जारी है । साहित्यकारों का एक खेमा अब फ्रंटफुट पर खेल रहा है । एक दौर में वामपंथी लेखक जिनको कलावादी कहकर खारिज करने में जुटे रहते थे उनको ही गले लगाकर सिरमौर करार दिया जा रहा है । प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन में जिन लेखकों को अपमानित किया गया था उनकी ही अहुवाई में अब सरकार के खिलाफ मुहिम शुरू हो रही है । अवसरवादिता और खेमों के रीअलायनमेंट का खेल जारी है । पहले अवॉर्ड वापसी की मुहिम चलाकर और मीडिया में उसको प्रमुखता मिलने के बाद अब अशोक वाजपेयी की अगुवाई में कुछ साहित्यकारों ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के बहाने से अपनी अपील की राजनीति शुरू की है । इनकी मांग है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल अपने टाइटल स्पांसर को बदल डाले । अब हमारे देश में लोकतंत्र है,अभिव्यक्ति की आजादी है तो यहां तो किसी को भी किसी तरह की मांग रखने और अपील जारी करने का संवैधानिक हक है । दरअसल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का टाइटल स्पांसर एरक निजी टेलिवीजन चैनल है । अपील करनेवालों का आरोप है कि कन्हैया एपिसोड के दौरान इस चैनल की भूमिका संदेह के घेरे में रही थी । लिहाजा जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को इसको छोड़ देना चाहिए । सवाल फिर से वही है कि जो लोग इस तरह की मांग कर रहे हैं उनके पीछे कितना नैतिक बल है । क्या उनकी मांग को लेकर समाज में किसी तरह का कोई उद्वेलन होगा । क्या साहित्य समाज में भी उनकी अपील पर कोई उत्साह या समर्थन हासिल होगा । क्या लेखक समुदाय भी एकजुट होकर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पर इस बावत दबाव डाल पाएंगे । मुझे तो इसमें संदेह है । क्योंकि किसी भी मुहिम के व्यापक होने के लिए यह आवश्यक है कि उसकी अगुवाई करनेवालों के पास नैतिक ताकत हो । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से अपने टाइटल स्पांसर को छोड़ने की अपील करने वालों का नैतिक खजाना खाली है । अशोक वाजपेयी पर भी उन लोगों से पुरस्कार लेने का आरोप है जो सफदर की हत्या में संदेह के घेरे में थे । अपनी उम्र के पचहत्तर पड़ाव पार करने के बाद अशोक वाजपेयी की सक्रियता सराहनीय है लेकिन बढ़ी उम्र के साथ वो अपने इर्द गिर्द घिरे लोगों से प्रभावित होते दिखाई देते हैं । साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी के दौर में उनकी अपील का असर हो रहा था । लोग काफी संख्या में उनसे जुड़ने लगे थे कि अचानक उन्होंने कालबुर्गी और दाभोलकर के साथ अखलाक का नाम जोड़कर उसको भटका दिया । अशोक वाजपेयी को करीब से जानने वाले कहते हैं कि उन्होंने अपने एक सलाहकार की राय के बाद ये किया और यहीं से पुरस्कार वापसी मुहिम कमजोर पड़ने लगी ।  क्योंकि साहित्य के सावलों से मुठभेड़ करने के लिए साहित्यक जमीन ही चाहिए । जैसे ही अशोक वाजपेयी ने अखलाक का नाम लिया तो विपक्षी खेमे को इसको पोलराइज करने का मौका मिल गया और जो एक बड़ी जमात अशोक जी के साथ खड़ी हो रही थी वो पीछे हट गई ।

इस वक्त साहित्य का जो माहौल है उसमें लेखक खुलकर सामने आने से कतरा रहे हैं । लेखक समुदाय भी दो तरफ बंटे हुए नजर आ रहे हैं जबकि कुछ लोग तटस्थ रहना चाहते हैं । ऐसे माहौल में अशोक वाजपेयी और के सच्चिदानंदन ने जयपुर लिट फेस्ट के सामने बड़ी चुनौती पेश की है । अशोक वाजपेयी लंबे समय से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से जुड़े रहे हैं । अशोक वाजपेयी की इस गुगली को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजक किस तरह के डक करते हैं ये देखना दिलचस्प होगा । 

Tuesday, January 26, 2016

साहित्य पर भारी सितारों की चमक

जयपुर में पांच दिनों तक चलनेवाला सालाना साहित्यक जलसा जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल खत्म हो गया । साल दर साल इस सालाना जलसे में लेखक और साहित्यक विमर्श नेपथ्य में जा रहे हैं और सेलिब्रिटी की चमक ज्यादा महसूस की जा रही है । जब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल शुरू हुआ था तब ये माना गया था कि इसका उद्देश्य साहित्य और समाज के सवालों से टकराने का है । वरिष्ठ लेखक आपस में साहित्य की समकालीन समस्याओं से लेकर नई लेखकीय प्रवृत्तियों पर चर्चा करेंगे जिससे उस भाषा के पाठक संस्कारित होंगे । परंतु हाल के दिनों में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सितारों और गंभीर लेखकों के बीच का फर्क मिट सा गया है । जिस तरह से प्रकाशक फिल्मी सितारों, राजनेताओं, सेलिब्रिटी पत्रकारों की किताबें छापने में लगे हैं उसी तरह अब लिटरेचर फेस्टिवल के कर्ताधर्ता भी फिल्मी सितारों से लेकर पूर्व और वर्तमान राजनेताओं की भागीदारी सुनिश्चित करते हैं । लिटरेचर फेस्टिवल में गुलजार साहब स्थायी भाव की तरह मौजूद रहते हैं भले ही उन साहित्यक मेलों में केदारनाथ सिंह, लीलाधर जगूड़ी या विनोद कुमार शुक्ल हों या ना हों । गुलजार को बुलाने के पीछे की मंशा उनकी बेहतरीन कविताएं सुनने की अवश्य रहती होंगी लेकिन भीड़ जुटाना और पाठकों को आकर्षित करना भी एक मकसद रहता है । ऐसा नहीं है कि सिर्फ जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में ही ऐसा होता है पूरी दुनिया में लिटरेचर फेस्टिवल में सितारों की चमक साहित्यक विमर्श पर भारी पड़ते हैं । बेस्टसेलर उपन्यास चॉकलेट की लेखक जॉन हैरिस ने भी एक बार कहा था कि कई लिटरेचर फेस्टिवल इन सितारों के चक्कर में लेखकों पर होनेवाले खर्चे में भारी कटौती करते हैं । आयोजकों को लगता है कि सितारों के आने से ही उनको हेडलाइन मिलेगी । उनका मानना था कि इससे आयोजकों को फायदा होता है पर साहित्य नेपथ्य में चला जाता है । बाजार के विषेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के साहित्यक आयोजनों तभी सफल हो सकते हैं जब इसमें शिरकत करनेवाले सितारे हों क्योंकि विज्ञापनदाता उनके ही नाम पर स्पांसरशिप देते हैं । विज्ञापनदाताओं की रणनीति होती है कि जितना बड़ा सितारा होगा उतनी बड़ी भीड़ जुटेगी और उनके उत्पाद का प्रचार बड़े उपभोक्ता वर्ग तक पहुंचेगा । परंतु सवाल यही है कि क्या इस तरह के आयोजनों में साहित्य या साहित्यकारों पर पैसे को तरजीह दी जानी चाहिए । अगर उद्देश्य साहित्य पर गंभीर विमर्श है, अगर उद्देश्य पाठकों को साहित्य के प्रति संस्कारित करने का है तब तो हरगिज नहीं । हां अगर उद्देश्य साहित्य के मार्फत कारोबार करना है तो फिर इस तरह से लटके झटके तो करने ही होंगे । अब तो जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मीना बाजार की तर्ज पर राजस्थानी पोशाक से लेकर हस्तशिल्प तक की बिक्री भी होती है । गहने जेवर की दुकान से लेकर चप्पल जूतों तक की दुकान देखी जा सकती है ।
इस बार भी दुनियाभर के तमाम बड़े लेखक और लेखिकाओं ने जयपुर के लिटरेचर फेस्टिवल में शिरकत की लेकिन इन सब पर करन जौहर, काजोल, गुलजार, जावेद अख्तर आदि की उपस्थिति भारी पड़ी । पहले ही दिन करन जौहर ने लोकतंत्र को मजाक बताकर विवाद खड़े करने की कोशिश की। करन ने व्यंग्यात्मक लहजे में ये कहकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की कि हमारे देश में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन सबसे बड़ा जोक है । करन जौहर इतने पर ही नहीं रुके और उन्होंने यहां तक कह दिया कि लोकतंत्र तो उससे भी बड़ा मजाक है । करन के मुताबिक अगर आप अपने मन की बात कहना चाहते हैं तो ये देश सबसे मुश्किल है । करन के बयान से हल्का फुल्का ही सही पर विवाद हुआ । कहने का मतलब ये कि जयपुर लिटरेटर फेस्टिवल में विमर्श और विवाद साथ-साथ चलते हैं । इस साहित्यक आयोजन की निदेशक नमिता गोखले बार-बार ये दोहराती हैं कि विवादों में उनकी रुचि नहीं है लेकिन जिस तरह से कुछ सत्र में विषयों और वक्ताओं का चुनाव होता है उससे लगता है कि अन्य आयोजकों की मंशा नमिता के मत से अलग है । पूर्व के वर्षों में विवादों ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को खासा चर्चित किया । चाहे वो सलमान रश्दी के कार्यक्रम में आने को लेकर उठा विवाद हो या फिर आशुतोष और आशीष नंदी के बीच का विवाद हो, सबने मिलकर इस फेस्टिवल को साहित्य की चौहद्दी से बाहर निकालकर आम जनता तक पहुंचा दिया ।



Thursday, July 16, 2015

लिटरेचर फेस्टिवल का बढ़ता दायरा

जब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की शुरुआत हुई थी तब शायद ही किसी को अंदाजा रहा हो कि ये फेस्टिवल अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति पाने के बाद अंतराष्ट्रीय स्तर पर विश्व के अलग अलग देशों में आयोजित होगा । जयपुर में आयोजित ये लिटरेचर फेस्टिवल साल दर साल लोकप्रियता की नई ऊंचाइयां हासिल कर रहा है । इस फेस्टिवल के सफल होने में साल दर साल होनेवाले विवादों की भी महती भूमिका है । विवादों ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को खासा चर्चित किया । आयोजकों की मंशा विवाद में रही है या नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन इतना तय है कि विवाद ने इ, आयोजन को लोकप्रिय बनाया । चाहे वो सलमान रश्दी के कार्यक्रम में आने को लेकर उठा विवाद हो या फिर आशुतोष और आशीष नंदी के बीच का विवाद हो, सबने मिलकर इस फेस्टिवल को साहित्य की चौहद्दी से बाहर निकालकर आम जनता तक पहुंचा दिया । नतीजा यह हुआ कि साहित्य का ये फेस्टिवल धीरे धीरे मीना बाजार, यह शब्द इस स्तंभ में कई बार इस्तेमाल किया जा चुका है, बन गया । आयोजकों को स्पांसरशिफ से फायदा हुआ तो इस पेस्टिवल का दायरा और इसका प्रोडक्शन बेहतर होता चला गया । आठ नौ साल के अंदर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल विश्व में जाना पहचाना फेस्टिवल हो गया । इसको विश्व में लोकप्रिय बनाने में इसके आयोजकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी और वी एस नायपाल से लेकर जोनाथन फ्रेंजन तक की भागीदारी रही। भारत के दर्शकों की रुचि को ध्यान में रखकर कभी गुलजार तो कभी जावेद शबाना, तो कभी राहुल द्रविड़- राजदीप सरदेसाई तो कभी शर्मिला टैगोर की उपस्थिति सुनिश्चित की जाती रही । इसका फायदा भी मिला । अब जब यह लिटरेचर फेस्टिवल एक मुकाम हासिल कर लिया है तो इसको आयोजकों ने इसको विश्व के अन्य देशों में ले जाने का फैसला किया । इस क्रम में पहले लंदन में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित किया गया । इस साल मई में लंदन के साउथबैंक सेंटर में दो दिनों तक लेखकों ने साहित्य और राजनीति के सवालों से मुठभेड़ की । जयपुर लिटरेटर फेस्टिवल को आयोजित करनेवाले लेखक द्वय नमिता गोखले और विलियम डेलरिंपल ने लंदन में भी सफलतापूर्व इसका आयोजन किया जिसमें कई भारतीय लेखकों ने भी शिरकत की । जयपुर की तरह लंदन का दो दिनों का फेस्टिवल में मुफ्त प्रवेश नहीं था बल्कि एक निर्धारित शुल्क लेकर श्रोताओं को प्रवेश दिया गया । लंदन में सफलतापूर्वक आयोजन के बाद अब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल अमेरिका जा रहा है । आठारह लेकर बीस सितंबर तक तक अमेरिका में अब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन होगा । आयोजकों का दावा है कि अमेरिका में होने वाले इस लिटरेचर फेस्टिवल में करीब सौ से ज्यादा लेखक शामिल होंगे । कोलोराडो में आयोजित होनेवाले इस फेस्टिवल में लेखकों के साथ विमर्श के अलावा राजनीति और पर्यावरण की चिंताओं पर भी बात होगी । इसका मतलब यह है कि ये लिटरेचर फेस्टिवल लगातार अपना दायरा बढाता जा रहा है । विमर्श से लेकर आयोजन तक का । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों ने यह साबित कर दिया कि साहित्य का भी बहुत बड़ा बाजार है । उसने यह भी साबित कर दिया कि साहित्य और बाजार साथ साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकते हैं । साबित तो यह भी हुआ कि बाजार का विरोध करनेवाले नए वैश्विक परिवेश में कहीं ना कहीं पिछड़ते जा रहे हैं । पिछड़ते तो वो पाठकों तक पहुंचने में भी जा रहे हैं । इसके विरोध में तर्क देनेवाले यह कह सकते हैं कि यह अंग्रेजी का मेला है लिहाजा इसको प्रायोजक भी मिलते हैं और धन आने से आयोजन सफल होता जाता है । सवाल फिर वही कि हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में हमने कोई कोशिश क्या ? बगैर किसी कोशिश के अपने ठस सिद्धातों के यह मान लेना कि हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में इस तरह का आयोजन संभव नहीं है, गलत है । आसमान में सूराख हो सकता है जरूरत इस बात की है कि पत्थर जरा तबीयत से उछाली जाए । 

Monday, January 19, 2015

सजने लगा साहित्य का ‘मीनाबाजार’

जयपुर के दिग्गी पैसेल होटल परिसर में इक्कीस से पच्चीस जनवरी तक चलनेवाले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है । आठ सालों से आयोजित इस सालाना लिटरेचर फेस्टिवल में इस बार साहित्य के अलावा भी कई अन्य विषयों पर मंथन के लिए अपने अपने क्षेत्र के दिग्गज जुटेंगे । साहित्य के सवालों से टकराने के लिए बना विमर्श का यह मंच अब उससे बहुत आगे निकल चुका है । अब इस लिटरेटर फेस्टिवल के दैरान दिग्गी पैलेस परिसर में एक पूरा मीना बाजार सजता है । राजस्थानी कपड़ों से लेकर हस्तशिल्प तक और सोने के गहनों से लेकर जूतियों तक की दुकानें वहां लगाई जाती हैं । आयोजकों ने इस साहित्यक महफिल को पूरी तरह से मीना बाजार के माहौल के हिसाब से बना दिया है । इस बार तो यह मीना बाजार और भी ग्लैमरस होने जा रहा है । इस बार इस साहित्यक महोत्सव के केंद्र में फिल्म और फिल्म लेखन है । जावेद अख्तर और शाबाना आजमी के अलावा गीतकार प्रसून जोशी और फिल्म पर गंभीर लेखन करनेवाले यतीन्द्र मिश्र फिल्मों पर बात करेंगे । फिल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा की किताब- द फ्रंट रो, कनवरसेशंस ऑन सिनेमा को मशहूर फिल्म अभिनेत्री सोनम कपूर जारी करेंगी । इसके अलावा जावेद अख्तर के नए कविता संग्रह का भी विमोचन किया जाएगा ।   आयोजक इस बात के लिए खुश होते हैं और सही दावा भी करते हैं कि ये विश्व का सबसे बड़ा लिटरेचर फेस्टिवल है जहां लोगों का प्रवेश मुफ्त है ।  जयपुर के इस साहित्योत्सव में अब विमर्श कम भीड़ ज्यादा होती है । सात साल पहले जब उस महोत्सव की शुरुआत हुई थी तो दिग्गी पैलेस के फ्रंट लॉन में सिर्फ साहित्य के गंभीर श्रोता और साहित्यप्रेमी ही मौजूद होते थे । अब तो हालात यह है कि स्कूली बच्चों को बसों में भर भर कर मेला घुमाने के लिए लाया जाता है । आयोजकों ने भी इस साहित्यक मेले को लोकप्रिय बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ीहै । हर बार मशहूर लेखकों के अलावा तीन चार फिल्म कलाकार यहां आते ही हैं । इस बार सोनम कपूर, वहीदा रहमान, जावेद अख्तर , शबाना आजमी समेत कई सितारे यहां चमकने के लिए तैयार हैं । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को मशहूर करने में विवादों की भी बड़ी भूमिका है । चाहे वो समाजशास्त्री आशीष नंदी के पिछड़ों पर दिए गए बयान और आशुतोष के प्रतिवाद का विवाद हो  या फिर सलमान रश्दी के जयपुर आने को लेकर मचा घमासान हो । सलमान रश्दी के आने का वक्त उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के पहले का वक्त था लिहाजा सियासी दलों ने भी उसको भुनाने की कोशिश की थी । मामला इतना तूल पकड़ गया था कि सलमान रश्दी का भारत दौरा रद्द करना पड़ा था । उस विवाद की छाया लंबे समय तक जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को प्रसिद्धि दिलाती रही । पिछले साल अमेरिकी उपन्यासकार जोनाथन फ्रेंजन ने यह कहकर आयोजकों को झटका दिया था कि - जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल जैसी जगहें सच्चे लेखकों के लिए खतरनाक है, वे ऐसी जगहों से बीमार और लाचार होकर घर लौटते हैं । साहित्य  के साथ साथ वहां बहुधा राजनीतिक टिप्पणियां भी हो जाती हैं । पिछले साल नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन ने आम आदमी पार्टी के उभार को भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती के तौर पर पेश किया । वहीं अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के नेत्रहीन लेखक वेद मेहता ने मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि उनका पीएम बनना देश के लिए घातक हो सकता है । साहित्य से व्यावसायिकता की राह पर चल पड़े जयपुर साहित्य महोत्सव को तमाम लटके झटकों के बावजूद इस बात का श्रेय तो दिया ही जाना चाहिए कि इसने पूरे देश में साहित्यक उत्सवों की एक संस्कृति विकसित की है । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की देखादेखी आज देशभर में कई लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित होने लगे हैं । इससे देश में एक साहित्यक माहौल बनने में मदद तो मिल ही रही है 


Sunday, January 19, 2014

सर्द मौसम का विमर्श पर असर

जयपुर के दिग्गी पैसेल होटल परिसर में पांच दिनों तक चलनेवाले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की शुरुआत हो चुकी है । जनवरी की हा़ड़ कंपा देनेवाली सर्द सुबह में राज्यपाल मारग्रेट अल्वा और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन ने इसकी औपचारिक शुरुआत की । सात सालों से हर साल आयोजित होनेवाला ये लिटरेचर फेस्टिवल अब साहित्यक विमर्श के मंच से बहुत आगे जा चुका है । अब ये मेला पूरी तरह से कमर्शियल हो गया है । दिग्गी पैलेस के परिसर में अब एक पूरा मीना बाजार सजने लगा है । एक एख इंच खाली जमीन पर तरह तरह के समानों की दुकानें खड़ी हो गई हैं । राजस्थानी कपड़ों से लेकर हस्तशिल्प तक और सोने के गहनों से लेकर जूतियों और थैलों तक की दुकानें वहां लगने लगी हैं । किताबों की दुकानें कम अन्य चीजों की दुकानें ज्यादा हो गई हैं ।  मैं इस साहित्यक महफिल को इस वजह से मीना बाजार कहता हूं कि यहां वो पूरा माहौल है जो कि किसी भी मजमे को मीना बाजार बनाने के लिए काफी होता है । चाय और कॉफी के अलग अलग स्टॉल के अलावा बर्गर से लेकर लजीज व्यंजन तक अब वहां मौजूद हैं । इन सबसे आयोजकों को अच्छी खासी आय होती है । हस्तशिल्प और गहने तो विदेशी मेहमानों को ध्यान में रखकर लगाए गए हैं । कीमत भी उसी हिसाब से रखी गई हैं ।जयपुर के इस साहित्योत्सव में अब विमर्श कम भीड़ ज्यादा होती है । मुझे याद है कि छह साल पहले जब दिग्गी पैलेस के फ्रंट लॉन में साहित्यक विमर्श होता था तो साहित्य के गंभीर श्रोता और साहित्यप्रेमी ही वहां उपस्थित होते थे । ना कोई भीड़ भाड़ ना कोई तामझाम । अब तो कुल्हड़ की चाय का भी व्यावसायीकरण हो गया है । राजस्थानी साफा बांधे कुल्हड़ में चाय पीने के लिए कूपन लेनेवालों की लंबी कतार फ्रंट लॉन में लगती है ।
साहित्यप्रेमियों के अलावा बच्चे भी अच्छी खासी संख्या में इस मेले को देखने आते हैं । अब तो हालात यह है कि जिस तरह से किसी भी स्कूल से बच्चों को अप्पू घर ले जाया जाता है उसी तरह स्कूली बच्चे लाइन लगाकर स्कूल की यूनिफॉर्म में इस मीना बाजार में घूमने आते हैं । उनके साथ उनके शिक्षक भी होते हैं जो बच्चों को लाइनलगवाकर मेला दिखाते हैं और फिर बाहर ले जाते हैं । साहित्य प्रेमियों से ज्यादा भीड़ तमाशा और सेलिब्रिटीज को देखने और उनके साथ फोटो खिंचवानेवालों की होती है । आयोजकों ने भी इस आयोजन को लोकप्रिय बनाने और भीड़ के आकर्षण का केंद्र बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है । हर बार साहित्यक सुपरस्टार के साथ साथ लोकप्रिय फिल्मों के कलाकारों को भी यहां बुलाया जाता है ताकि आम जनता को आकर्षित किया जा सके । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को मशहूर करने में विवादों की भी बड़ी भूमिका है । जावेद शबाना से लेकर गुलजार और शर्मिला टैगोर तक यहां टहलते नजर आते रहे हैं । मुझे याद है कि पिछली बार जब राहुल द्रविड़ और राजदीप सरदेसाई का सेशन हुआ था तो फ्रंट लॉन को सेशन शुरू होने के पहले ही बंद कर देना पड़ा था । इतनी भीड़ थी कि सुरक्षाकर्मियों को उन्हें काबू में करने में दिक्कत हो रही थी । दिग्गी पैलेस के सामने सड़क तक लंबी कतार लगी हुई थी । ट्रैफिक पुलिस को गाड़ियों की भीड़ को काबू में करने के लिए खासी मशकक्त करनी पड़ी थी ।
पिछले दो सालों से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल विवादों की वजह से चर्चा में रहा है । पिछले साल समाजशास्त्री आशीष नंदी ने के पिछड़ों पर दिए गए बयान और आशुतोष के प्रतिवाद ने पूरे देश में एक विवाद खड़ा कर दिया था । आशीष नंदी ने कहा था कि – इट इज अ फैक्ट दैट मोस्ट ऑफ द करप्ट कमन फ्राम दे ओबीसी एंड शेड्यूल कास्ट एंड नाऊ इंक्रीजिंगली शेड्यूल ट्राइब्स । आशीष नंदी के उस बयान का उस वक्त पत्रकार रहे और अब आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष ने जमकर प्रतिवाद किया था । दोनों तरफ के बयानों पर जमकर तालियां भी बजी थी और बाद में राजनीतिक रोटियां भी सेंकी गई थी । उस विवाद पर हफ्तों तक न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया पर लंबी बहसें चली थी । कुछ नेता भी इस विवाद में कूद पड़े थे और आयोजकों और आशीष नंदी पर केस मुकदमे भी हुए थे, वारंट जारी हुआ था । बाद में जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और सुलझा तबतक लिटरेचर फेस्टिवल हर किसी की जुबां पर था । पूरे देश में लोग जान गए कि जयपुर में इस तरह का सालाना जलसा होता है । आशीष नंदी के बयान पर उठे विवाद के पहले पहले भारतीय मूल के लेखक सलमान रश्दी के जयपुर आने को लेकर अच्छा खासा विवाद हुआ था । कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने सलमान के जयपुर साहित्य महोत्सव में आने का विरोध किया था । उनकी दलील थी कि सलमान ने अपनी किताब- सैटेनिक वर्सेस में अपमानजन बातें लिखी हैं जिनसे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई थी । उस वक्त उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होनेवाले थे लिहाजा सियासी दलों ने भी इस विवाद को जमकर हवा दी और नतीजा यह हुआ कि सलमान रश्दी को आखिरकार भारत आने की मंजूरी नहीं मिली । तीन चार दिनों तक चले उस विवाद में जयपुर साहित्य सम्मेलन खासा चर्चित हो गया था । उस विवाद की छाया लंबे समय तक जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को प्रसिद्धि दिलाती रही थी। चूंकि सलमान रश्दी विवाद के केंद्र में थे इसलिए इंटरनेशनल मीडिया में उसको खासी तवज्जो मिली । अब तो हालत यह है कि जयपुर साहित्य महोत्सव इंटरनेशनल लिटरेरी कैलेंडर में अपना एक अहम स्थान बना चुका है । इस बार अब तक किसी विवाद के संकेत नहीं मिल रहे हैं । हलांकि इस बार फ्रीडम जैसा उपन्यास लिखकर दुनियाभर में शोहरत पा चुके अमेरिकी उपन्यासकार जोनाथन फ्रेंजन ने यह कहकर आयोजकों को सकते में डाल दिया कि- जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल जैसी जगहें सच्चे लेखकों के लिए खतरनाक है, वे ऐसी जगहों से बीमार और लाचार होकर घर लौटते हैं । अगर अपने इस वक्तव्य को थोड़ा विस्तार देते और बेहतर होता और उसपर विमर्श भी संभव था । जोनाथऩ का उपन्यास फ्रीडम खासा चर्चित रहा है और आलोचकों ने उसे वॉर एंड पीस के बाद का सबसे अहम उपन्यास माना है । इस वजह से उनकी बात को हल्के में भी नहीं लिया जा सकता है । इसके पहले नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन ने आम आदमी पार्टी के उभार को भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती के तौर पर पेश किया । उन्होंने आम आदमी पार्टी की तारीफ करते हुए कहा कि उन्हें अपेक्षा है कि भारत में एक ऐसी दक्षिणपंथी पार्टी की अपेक्षा है जो धर्मनिरपेक्ष हो । इसके पहले अमर्त्य सेन का नरेन्द्र मोदी विरोध काफी चर्चा में रह चुका है औपर अब वो आम आदमी पार्टी के बहाने से एक नया शिगूफा छोड़ गए हैं । वहीं अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के नेत्रहीन लेखक वेद मेहता ने मोदी पर निशाना साधा और कहा कि अगर वो देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो वो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए खतरनाक होगा । उनके मुताबिक मोदी के विचार हमेशा हिंदुओं और मुसलमानों को बांटनेवाले होते हैं । अस्सी वर्षीय मेहता ने अपने विचारों और वक्तव्य से स्पंदन पैदा करने की कोशिश की लेकिन उनके विचारों में मौजूद पूर्वग्रह साफ झलक रहा था लिहाजा लोगों ने उनको गंभीरता से नहीं लिया । साहित्योत्सव में हर बार इस तरह की कोशिशें होती रही हैं लेकिन मेरी समझ में नहीं आता है कि किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ पूर्वग्रह लेकर विमर्श में वस्तुनिष्ठता कैसे आ सकती है ।

लेकिन जयपुर साहित्य महोत्सव इस मायने में अहम भी है कि इसने भारत में इस तरह के साहित्यक उत्सवों की एक संस्कृति विकसित की है । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की देखादेखी आज देशभर में कई लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित होने लगे हैं । हर संस्थान इस तरह के आयोजन को करने के लिए लालायित नजर आ रहा है । अखबारों ने भी लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित करने में खासी रुचि दिखाई है । नतीजा यह हुआ है कि इस तरह के आयोजन महानगरों के अलावा सुदूर छोटे शहरों में भी होने लगे हैं । यह एक अच्छी बात है और साहित्य के लिए शुभ संकेत भी । इस तरह से आयोजनों और विमर्श से हमारे समाज में एक सांस्कृतिक संस्कार विकसित हो सकता है । इसके लिए यह जरूरी है कि इस तरह के उपक्रमों का व्यावसायीकरण ना हो, पैसे कमाने का उद्यम ना बने । इस तरह के आयोजनों में मंशा ज्यादा अहम होती है क्योंकि अगर मंशा साफ है तो नतीजे बेहतरीन मिलते हैं । 

Sunday, March 3, 2013

साहित्य का मीना बाजार


पिछले कई सालों से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ने ना सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के साहित्यक मानचित्र पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है । बेहद छोटे स्तर से शुरु हुए इस लिटरेचर फेस्टिवल ने छह सालों में एक लंबा सफर तय किया है । इन छह सालों में इस फेस्टिवल में विश्व के अनेक भाषाओं के लेखकों ने शिरकत की और साहित्य से जुड़े गंभीर विषयों पर विमर्श किया । लेकिन समय बदला तो इस महोत्सव का स्वरूप भी बदला । पिछले साल सलमान रश्दी के जयपुर आने को लेकर मचे बवाल ने लिटरेचर फेस्टिवल को लोकप्रियता और चर्चा के शीर्ष पर पहुंचा दिया था । सलमान रश्दी के नहीं आने से भी कोई फर्क नहीं पड़ा था क्योंकि विवाद फिर भी हुआ था । जीत थाईल, रुचिर शर्मा और हरि कुंजरू ने सलमान रश्दी की विवादित किताब के अंश पढ़ दिए थे । उसके बाद जीत थाईल पर जयपुर और अजमेर में आठ केस दर्ज किए गए थे । यह अलग बात है कि साल भर बीत जाने के बाद भी इन केस की अबतक फाइल खुली ही नहीं है । जीत थाईल इस साल भी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पहुंचे और उन्हें उनके उपन्यास नारकोपोलिस पर प्रतिष्ठित डीएससी पुरस्कार भी मिला ।
अपने छठे एडिशन तक आते आते जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल साहित्यक उत्सव से अपना फलक बड़ा करते हुए साहित्य के मीना बाजार में तब्दील होता नजर आया । मैं पिछले कई सालों से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को देखता आ रहा हूं । इस बार इस साहित्य मेले में कई नई चीजें देखने को मिली । पहले जयपुर के दिग्गी पैलेस में आयोजित इस मेले में साहित्य पर गंभीर विमर्श हुआ करते था, इस बार भी हुआ लेकिन विमर्श के साथ साथ मेले में कारोबार का भी प्रवेश हो गया । शुरुआत में जब इस साहित्यक उत्सव की कल्पना की गई होगी तब भी उसके पीछे साहित्य पर गंभीर चिंतन के अलावा लाभ कमाने का भी उद्देश्य रहा होगा । लेकिन पिछले पांच मेलों तक यह थोड़ा ढंके छुपे तौर पर चल रहा था । इस बार मेले में खुलकर कारोबार हो रहा था । इस साल मेले में हर मंडप के पास तरह तरह के खाने पीने के स्टॉल लगे थे । कुल्हड़वाली चाय जो इस मेले की खासियत हुआ करती है उसके दाम में पिछले साल की तुलना में सौ फीसदी का इजाफा करते हुए उसे बीस रुपए प्रति कुल्हड़ कर दिया गया । खाने-पीने तक तक अगर यह मामला रुका रहता तब भी बात समझ में आती वेकिन इस बार तो विदेशी मेहमानों को ध्यान में रखते हुए हैंडीक्राफ्ट की भी कई दुकानें वहां लगाई गई थी जिसनें जयपुरी बलॉक प्रिंट के कपड़ों से लेकर थैले और टोपियां मिल रही थी । सबसे हैरानी की बात तो यह थी कि इस बार मेले में पहली बार गहनों की भी एक दुकान थी । साहित्यक मेले में गहनों की दुकान का मतलब समझ में नहीं आया । क्या आयोजकों को यह लगता है कि लिटरेचर फेस्टिवल में आनेवाले लोग वहां साहित्य सुनने और अलग अलग सत्रों में होनेवाले विमर्श में शामिल होने के अलावा पिकनिक और मौज मस्ती और शॉपिंग के लिए आते हैं । या फिर लिटरेचर फेस्टिवल की लोकप्रियता को भुनाते हुए आयोजक ज्यादा से ज्यादा लाभ कमा लेना चाहते हैं । इन सवालों के जबाव अबतक अनुत्तरित हैं । हलांकि इस बार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के प्रोड्यूसर संजॉय रॉय के हवाले से खबरें छपी कि मेले के आयोजन में तकरीबन डेढ़ करोड़ रुपए का नुकसान होगा । आयोजकों की दलील थी कि एकदम आखिरी वक्त में दो बड़े प्रायोजकों ने हाथ खींच लिया । साहित्यक मेले का इस साल का बजट तकरीबन साढ़े पांच करोड़ का था और प्रायोजकों से चार करोड़ रुपए मिले थे । इस लिहाज से मोटे तौर पर जो बैलेंस शीट बनती है उसमें डेढ करोड़ का नुकसान है ।
मैंने इस मेले को साहित्य का मीना बाजार इस वजह से कहा क्योंकि इस बार मेले में मीना बाजार में मौजूद तकरीबन हर चीज वहां मौजूद थी एक सिर्फ चरखी को छोड़कर । इस मेले के पहले इस साल रायल्स इलेवन और लेखकों की टीम के बीच एक क्रिकेट मै भी खेला गया । मेले को सफल बनाने के लिए कई फिल्मी सितारों को भी बुलाया गया । इस बार पहली बार शाम को होनेवाले म्यूजिकल कार्यक्रम को आयोजन स्थल, दिग्गी पैलेस से हटाकर एक अलग होटल के लॉल में आयोजित किया गया । जहां शामिल होने के लिए तीन सौ रुपए का टिकट भी था । लेकिन ऐसा नहीं है कि जयपुर साहित्य उत्सव सिर्फ कारोबार है, सिर्फ चकल्लस का अड्डा है । जैसा कि हमारे कई बुद्धिजीवी और बुद्दिजीवी होने का भ्रम पाले बैठे लोग सोचते हैं । जयपुर लिट फेस्ट में कई गंभीर मुद्दों पर भी चर्चा हुई । कई लोगों को इस बात पर आपत्ति है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में साहित्यक विमर्श के नाम पर हल्की चर्चा हुई । यह मानसिकता उन लोगों की है जो पूर्वग्रह से ग्रसित हैं और समाज में कुछ भी अच्छा और रचनात्मक घटित होना, उनके हिसाब से देश की अस्सी फीसदी गरीब जनता के साथ छल है ।
इस तरह के तर्क देनावाले लोग यह भूल जाते हैं कि इसी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के सत्र ऑफ वुमन आुटकास्ट्स प्रजेंट्स एंड रिबेल्स में में अपने जीवन काल में ही महान लेखिका का दर्जा हासिल कर चुकी महाश्वेता देवी ने कहा था कि सपने देखना इंसान का पहला और मूलभूत अधिकार है । नक्सलवादी भी सपने देखते हैं । उनका अपराध यही तो है कि उन्होंने सपने देखने का सहस किया, तो उनको फिर यह अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए । महाश्वेता देवी के इस बयान पर लंबा विमर्श चला । अखबारों में विशेष संपादकीय लिखे गए । एक ओर जहां महाश्वेता यह बात कह रही थी वहीं दूसरी ओर इसी मेले में किनशिप्स ऑफ फेश नाम के सत्र में तिब्बती धर्मगुरू और नोबेल पुरस्कार प्राप्त दलाई लामा ने शांति की जमर वकालत की । दलाई लामा ने कहा कि – जो लोग मैं –मैं के बारे में सोचते हैं उन्हें दिल का दौरा पड़ने की संभावना ज्यादा रहती है । दिल पर ऐसा दबाव ना बनाएं । दूसरों के बारे में भी सोचें । यही इस तरह के साहित्यक उत्सव की खूबसूरती है । उसी मेले में पाकिस्तान की उर्दू साहित्यकार और महिलावादी लेखिका फहमीदा रियाज का दर्द भी झलक आया, जब उन्होंने पूछा कि कहां जाऊं- उस पार जाऊं तो लोग मुझे भारत का एजेंट कहते हैं और यहां आती हूं तो विरोध की धमकी दी जाती है । धर्म में औरतों की हालात पर गीतकार जावेद अख्तर और फहमीदा के बीच जमकर तकरार हुई । जावेद का मानना था कि हर धर्म औरतों के खिलाफ है जिसका  फहमीदा ने जमकर विरोध किया और कहा कि इस तरह किसी भी मसले का सरलीकरण नहीं किया जा सकता है ।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जो और बात रेखांकित की जा सकती है वह यह है कि इसमें युवाओं की भागीदारी ने पिछले कई सालों के कीर्तिमान तोड़ दिए । इस बार के साहित्योत्सव में स्कूली छात्रों ने भी जमकर हिस्सा लिया । स्कूली छात्रों की भीड़ को देखकर ब्रिटिश लेखक एच जैक्ब्सन ने मजाक में कहा- हमारे मुल्क में मेरे श्रोताओं की औसत उम्र नब्बे साल से ज्यादा रहती है लेकिन यहां जयपुर में मुझे औसतन चौदह साल की बच्चियां प्रशंसक के रूप में मिली । मजाक में कही इस बात पर गंभीरता से चिंतन किया जा सकता है । हम इसको अपने देश के किशोर और नौजवानों के साहित्य में झुकाव के तौर पर देख सकते हैं । कई हिंदी लेखकों को यह अंग्रेजीवालों का जमावड़ा लगता है लेकिन इस बार एक और बात साफ हो गई कि हिंदी और उर्दू के सत्रों में अंग्रेजी साहित्य के सत्रों से ज्यादा श्रोता मौजूद थे । यह भी तो कुछ ना कुछ कहता ही है जिसको डिकोड किया जाना चाहिए । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल साहित्य का मीना बाजार तो बन गया है लेकिन अगर इस मीना बाजार से देऎश के किशोरों और युवाओं के बीच साहित्य के सवालों को सुनने और उससे टकराने की रुचि जागती है तो इस मीनाबाजर का स्वागत किया जाना चाहिए । इस मीना बाजार से अगर देश के किसी भी हिस्से में नई पीढ़ी में साहित्य का संस्कार विकसित होता है तो हमें तमाम विरोध के बावजूद इसका समर्थन करना चाहिए ।

 

Wednesday, January 23, 2013

लेखकों के मंथन का वक्त

भारत में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों की वजह से खुलेपन का फायदा हर क्षेत्र को हुआ । विदेशी कंपनियों को भारत में एक बड़ा बाजार दिखाई देने लगा था । आर्थिक उदारीकरण का फायदा यह हुआ कि देश के अन्य क्षेत्रों की तरह प्रकाशन जगत में भी विदेशी प्रकाशकों की आवाजाही बढ़ी । भारत के प्रकाशक भी विदेशी पुस्तक मेलों में जाने लगे । हिंदी के कई प्रकाशकों ने अंग्रेजी और अन्य भाषाओं की श्रेष्ठ कृतियों का अनुवाद करवाना शुरू किया । नतीजा यह हुआ कि भारत के पाठकों को विदेशी लेखकों की रचनाओं से परिचय होने लगा । उसके पहले तो सिर्फ रूस का प्रगति प्रकाशन ही विश्व साहित्य, या यों कहें कि एक खास विचारधारा की साहित्य, से हमारा परिचय करवाता था । इसके अलावा इस उदारीकरण का एक और फायदा यह हुआ कि हमारे देश में भी साहित्यक संस्कृतियों के नाम पर मेले शुरू होने लगे । पहले तो भारत में साहित्य संस्कृति के नाम पर चंद आयोजन होते थे । साहित्य के आयोजन या तो सृजनात्मकता की कब्रगाह (राजेन्द्र यादव के शब्द ) भारतीय विश्वविद्यालयों में होते थे या फिर कुछ लेखक संघों की पहल पर होते थे । उदारीकरण के बाद से देश में साहित्यिक आयोजन भी प्रगतिशीलों और विश्वविद्यालय शिक्षकों के हाथों से निकलकर सृजनात्मकता से लबरेज लेखकों के हाथों में भी पहुंचा । उन लेखकों के हाथों में जो साहित्यक आयोजनों के बहाने अपनी और साथी लेखकों की बात आम जनता या यों कह सकते हैं कि साहित्य में रुचि रखनेवाले लोगों तक पहुंचा सकें । पार्टी की विचारधारा को आगे बढ़ाने के काम से मुक्त होकर ये आयोजन साहित्यक विमर्श के मंच बनने लगे । इन आयोजनों की सफलता से एक बात तो साफ हो गई कि जन और लोक की बात करनेवाले साहित्यकारों और साहित्य के ठेकेदारों के आयोजनों से ज्यादा जन और लोक दोनों की भागीदारी इन मेलों में होने लगी ।
साहित्य के नाम पर होने वाले आयोजनों में पूंजी को लेकर भी प्रगतिशीलों ने पूर्व में खासा बखेड़ा किया था । ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब एक कोरियाई कंपनी ने साहित्य अकादमी के एक पुरस्कार की धनराशि को स्पांसर करने का फैसला लिया था । साहित्य अकादमी ने उसे मंजूरी भी दे दी थी लेकिन उस पुरस्कार को लेकर हिंदी जगत में वामपंथी लेखकों ने बड़ा वितंडा खड़ा कर दिया था । साहित्य अकादमी पर चंद लेखकों ने प्रदर्शन कर विरोध जताया था । उस पुरस्कार के खिलाफ हिंदी में कई लेख लिखे गए । बाद में जब दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में य़े कार्यक्रम आयोजित हुआ था तो मुट्ठीभर लोगों ने वहां भी विरोध जताने की कोशिश की थी । ये लोग साहित्य में पूंजीवाद का विरोध कर बड़ा सवाल खड़ा करने का दंभ भरनेवाले लोग थे । विरोध करनेवाले विचारधारा की बिनाह पर लंबे चौड़े वादे और दावे करनेवाले थे जिनको खुद की पत्रिका में देशी-विदेशी कंपनियों के विज्ञापन छापने से परहेज नहीं था । इस विरोध का नतीजा यह हुआ कि कंनी ने उस पुरस्कार से अपना हाथ खींच लिया । उस घटना के बाद से साहित्य में पूंजी लगाने में कारपोरेट कंपनियां हिचकने लगी हैं ।
इसके अलावा हिंदी के लोगों ने कई साहित्यक मेलों का विरोध भी किया था । उसमें से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल भी एक है । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल हर साल जयपुर के दिग्गी पैलेस में आयोजित होता है । चार पांच साल पहले तो हिंदी में जयपुर लिटरेचर फेस्टविल का हिंदी के साहित्यकारों ने जमकर विरोध किया था । उन्हें लगता था कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हिंदी के लोगों के साथ भेदभाव किया जाता है और उनको हाशिए पर रखा जाता है । लेकिन आनेवाले दिनों में हिंदी के लेखकों की ये शंका निर्मूल साबित हुई । जयपुर साहित्य सम्मेलन में हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ी और हिंदी के लेखकों की भागीदारी भी, जाहिर सी बात है कि प्रतिष्ठा में भी इजाफा हुआ । आज जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान हिंदी के दर्जनों सत्र होते हैं . हिंदी के कई लेखकों की उसमें शिरकत होती है । पिछले साल आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हिंदी के आलोचर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने शुरुआती सत्रों को ही संबोधित किया था । अंतराष्ट्रीय लेखकों से उनका मिलना जुलना होता है । अंतराष्ट्रीय पाठकों और विद्वानों के सामने हिंदी के लेखकों की रचनाओं पर विमर्श होता है । इन विमर्शों का फायदा अंतत: हिंदी और हिंदी के लेखकों को ही होता है । यह बात अब हिंदी के लेखकों की समझ में आने लगी है । इस साल जनवरी में होनवाले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में बड़ी संख्या में हिंदी के लेखकों की भागीदारी देखी जा सकती है । इस वजह से अक्तूबर नवंबर से ही हिंदी के लेखक जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करवाने में जुटे रहते हैं । दरअसल यह हम हिंदीवालों के स्वभाव में है । पहले विरोध करते हैं, फिर जब लगता है कि उससे हमारा लाभ होनेवाला है तो उसके साथ हो जाते हैं ।
अगर आप पिछले सालों में हिंदी में उठे विवादों पर नजर डालें तो यह बात पूरी तौर पर साफ हो जाती है । हिंदी की साहित्यक पत्रिका नया ज्ञानोदय में उपन्यासकार और महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय का एक साक्षात्कार छपा था जिसमें उन्होंने छिनाल शब्द का इस्तेमाल किया था । उस एक शब्द को लेकर हिंदी साहित्य में काफी बवाल मचा था जिसके बाद विभूति ने खेद प्रकट कर विवाद को खत्म करने की कोशिश की थी  । लेकिन हिंदी के कई लेखकों ने राय के खिलाफ एक मुहिम शुरू की थी और ज्ञानपीठ के सामने धरना प्रदर्शन किया था । हल्ला गुल्ला और धरना प्रदर्शन में जोर शोर से शिरकत करनेवाले कई लेखक अब उसी विश्विद्यालय में अपना बुढापा काट रहे हैं । दरअसल हिंदी के लेखकों के बीच एक अजूब किस्म की स्नाबरी देखने को मिलती है । उजाले में तो वो सिद्धांत, विचारधारा, जन, लोक, आदि की बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेकिन अंधेरा होते ही या सूना पाते ही उन सबको भुलाकर अपने लाभ लोभ के चक्कर में पड़ जाते हैं । जिससे उनकी विश्वसनीयता एकदम से दरक जाती है ।
हिंदी के प्रकाशकों को लेकर लेखकों को बहुत शिकायतें रहती हैं । यह बात बार बार सुनने में आती है कि हिंदी का लेखक गरीब होता जा रहा है और प्रकाशक अमीर होते जा रहे हैं । बहुत आसानी से प्रकाशकों पर लेखकों की रॉयल्टी हड़पने का आरोप भी लगता रहता है । हो सकता है कि उन आरोपों में आंशिक सचाई हो लेकिन सवाल यह उठता है कि वही लेखक जब प्रकाशकों के सामने होते हैं तो उनका रूप बदला सा नजर आता है । वहां वो याचक की भूमिका में होते हैं । उनकी पहली इच्छा यह होती है कि प्रकाशक उनकी किताब छाप दे । हिंदी के कई वरिष्ठ लेखकों ने तो प्रकाशकों से उपन्यास और किताबें लिखने के लिए अग्रिम पैसे लिए लेकिन आजतक ना तो किताब लिखी गई और ना ही प्रकाशकों को उनका चेक वापस मिला । कई लेखकों ने तो एक प्रकाशक से पैसे लिए और दूसरे से अपनी किताब छपवा ली । यहां सवाल यह उठता है कि लेखकों के इस गोरखधंधे पर कभी बात क्यों नहीं होती है । क्या हिंदी के लेखकों, साहित्यकारों में इस बात का साहस नहीं है कि वो अपने बीच के लोगों की गड़बड़ियों का पर्दाफाश कर सकें । विचारधारा और सिद्धांत की बड़ी बड़ी बातें करने और उसकी दिन रात दुहाई देने से कुछ नहीं होनेवाला है । वो सारी बातें खोखली लगती हैं जब सिद्धांत और विचारधारा को अपने स्वार्थ के लिए ताक पर रख दिया जाता है । इन हालात में लेखकों की साख खराब होती है । पाठकों का उनपर से भरोसा टूटता है । आज जरूरत इस बात की है कि लेखकों को एक ऐसी कमेटी को बनाने पर विचार करना चाहिए जिसमें लेखकों के साथ-साथ प्रकाशकों की भी भागीदारी हो । इस कमेटी का अध्यक्ष एक ऐसे व्यक्ति को बनाया जाना चाहिए जिसकी साख निर्दोष हो, जो विचारधारा की बेड़ियों में ना जकड़ा हो और जिसकी सोच वस्तुनिष्ठ हो । इस कमेटी को साहित्य अकादमी के अंदर स्वायत्ता दी जा सकती है । जिस तरह से न्यूज चैनलों ने स्वनियमन के लिए जस्टिस जे एस वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया है जो चैनलों में हो रही गड़बड़ियों पर नजर रखता है और उसका दोषी पाए जाने पर उनके खिलाफ कार्रवाई भी करता है । इस तरह की कमेटी का फायदा यह होगा कि ये लेखकों प्रकाशकों के बीच की शिकायतों का निबटारा करेगा । जो लेखक बेवजह प्रकाशकों को निशाने पर लेते हैं उनकी पहचान कर उनको दंडित करने का मैकेनिज्म बनाएगा । इसी तरह जो प्रकाशक लेखकों को ठगते हैं उनकी भी पहचान की जाएगी और उनपर भी जुर्माना लगाया जा सकेगा ।