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Monday, March 20, 2017

हिंदू वोटरों को रिटर्न गिफ्ट

प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के तमाम दिग्गजों की मौजूदगी में गोरक्षपीठ के महंत और पांच बार से लगातार गोरखपुर से सांसद चुने जा रहे योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली । चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जिस केसरिया होली की बात की थी वो उत्तर प्रदेश में योगी के शपथ ग्रहण के साथ संपन्न हो गई । योगी आदित्यनाथ के तौर पर बीजेपी ने एक ऐसे चेहरे पर दांव लगाया है जो अपनी वेशभूषा और बयानों से प्रखर हिंदूत्व की पैरोकारी करता रहा है । योगी आदित्यनाथ पूर्वी उत्तर प्रदेश से आते हैं जहां बीजेपी को लोकसभा और विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला था । इसके पहले शनिवार को जब भारत माता की जय के नारों के बीच लखनऊ के लोकभवन के सभागार में योगी आदित्यनाथ के नाम को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर जब विधायकों ने सर्वसम्मति से चुना तो वहां से एक साथ कई संदेश निकले । प्रखर और कट्टर हिंदूवादी छवि के नेता की पूर्वांचल में बेहद दबंग छवि है । कहा जाता है कि योगी अपनी दबंगई की वजह से प्रशासन को भी अपने इलाके में सही से काम करने के लिए मजबूर करते रहे हैं । जब गोरखपुर विकास प्राधिकरण ने इलाके के मुसलमानों की जमीन अधिग्रहित की थी तो योगी ने उनके अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी थी।  इसके अलावा योगी गोरखपुर से हिंदू वाहिनी नाम की एक संस्था भी चलाते हैं जिसके माध्यम से समाजसेवा का काम तो करते ही रहते हैं अपनी राजनीतिक जमीन भी मजबूत रखते हैं । दो हजार दो में जब वो अपनी पार्टी से खफा हो गए थे तो उसके बाद ही उन्होंने इस संगठन को बनाया था ।
योगी आदित्यनाथ को देश के सबसे बड़े सूबे की कमान सौंपकर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश के हिद्ओं को विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत का रिटर्न गिफ्ट दे दिया है । जिस तरह से जातियों के बंधन को तोड़कर उत्तर प्रदेश की हिंदू आबादी ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भरोसा जताया था उस भरोसे को योगी का राजतिलक और गाढ़ा करेगा । योगी ने चुनाव पूर्व अपने भाषणों में साफ साफ कहा था कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में सत्य का संतुलन कायम कर दिया गया है और यही संतुलन पूरे प्रदेश में लाना है । उनका इशारा बहुत साफ था । कैराना से पलायन और लव जेहाद जैसे मुद्दों को योगी प्रमुखता से उठाते रहे हैं ।  
दरअसल अगर योगी के राजतिलक पर विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि वहां अब भारतीय जनता पार्टी हिदुत्व और विकास की समन्यवादी राजीनीति के रास्ते पर चलेगी । हिदुत्व और विकास की इस समन्वयवादी राजनीति का मानचित्र दो हजार चौदह में लोकसभा चुनाव के वक्त तय किया गया था जब नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश को छोड़कर बनारस को अपना लोकसभा क्षेत्र चुना था । बनारस का सनातन परंपरा में अपना एक अलग स्थान है और उसी प्रतीकात्मकताकी वजह से बनारस का चयन हुआ था । नरेद्र मोदी की उम्मीदवारी मात्र ने उस वक्त पूर्वांचल औप बिहार के सटे इलाकों में बीजेपी के लिए कम से कम तीन दर्जन लोकसभा सीट पर जीत तय कर दी थी । उसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी मुसलमान को अपना प्रत्याशी नहीं बनाकर अपने कोर वोटरों को एक संदेश भी दिया । इस बात की लाख आलोचना हुई लेकिन उन आलोचनाओं पर ध्यान ही नहीं दिया गया, बल्कि उस पार्टी के नेताओं से जब इस बारे में सवाल पूछा जाता था तब वो कहते थे कि उनकी पार्टी सबका साथ सबका विकास में यकीन रखती है और तुष्टीकरण को किसी भी कीमत पर तरजीह नहीं देगी । विधायक दल के नेता के चुनाव में केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर मौजूद केंद्रीय मंत्री वैकेंया नायडू ने पत्रकारों से बात करते हुए साफ कहा कि विकास के अलावा जाति और मजहब की राजनीति के पैरोकारों को जनता ने जिस तरह से सबक सिखाया है उसका बीजेपी ध्यान रखेगी ।
अपने हिंदू वोट को मजबूत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी बहुत सधे हुए तरीके से उनको इस बात का संदेश दे रही थी और चुनावी नतीजों ने यह साबित किया कि बीजेपी के लक्षित वोटरों ने इन संदेशों को ग्रहण भी किया । अब योगी के हाथ में यूपी की कमान देकर बीजेपी नेतृत्व ने वोटों के इस समूह को और मजबूत करने का प्रयास किया है । इस प्रयास को दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव के पहले अन्य राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों की तैयारी से भी जोड़कर देखा जा सकता है। आनेवाले दिनों में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं ।

योगी को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपकर एक बार फिर से प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने राजनीतिक विश्लेषकों के आंकलन को गलत साबित कर दिया है । जो लोग पारंपरिक तरीके से राजनीति का विश्लेषण करते हैं उनको यह बात गले ही नहीं उतर रही थी कि उत्तराखंड में भी राजपूत जाति का मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश में भी राजपूत सीएम । जातियों से जकड़े विश्लेषकों को यह समझ ही नहीं आ रहा था । परंपरागत राजनीति विश्लेषक तो यहां तक कह रहे थे कि पूर्वी उत्तर प्रदेश से पीएम और सीएम दोनों नहीं हो सकते । पत्रकारों की टोली, जो खबरों के मामले में खुद को तीस मार खां समझती है, लगातार अलग अलग नामों पर कयास लगा रही थी । न्यूज चैनलों पर तो हर पांच मिनट में यूपी का नया सीएम घोषित हो रहा था । शनिवार सुबह तो मनोज सिन्हा का नाम तय माना जा रहा था । मनोज सिन्हा तो बनारस क मंदिर-मंदिक जाकर आशीर्वाद भी लेने लगे थे । योगी की ताजपोशी ने इन सब अटकलों को गलत साबित कर दिया । दरअसल अगर हम देखें तो नरेन्द्र मोदी ने बिल्कुल नई तरह की राजनीति शुरू की है जिसमें जातिगत समीकरणों का ध्यान तो रखा जाता है लेकिन उसको परोक्ष तरीके से अपनी राजनीति का हिस्सा बनाते हैं । जैसे योगी के साथ केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाकर सोशल इंजीनियरिंग को भी साधने की कोशिश की गई है । केशव प्रसाद मौर्य पिछड़ी जाति से आते हैं और दिनेश शर्मा ब्राह्मण हैं । अब इस समीकरण पर नजर डालें तो साफ है कि गैर यादव पिछड़ा, ब्राह्मणों को संदेश दे दिया गया । इसके बाद मंत्रियों के चयन में भी अन्य जातियों और क्षेत्रीय संतुलन का ख्याल रखा जाना तय है । योगी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने पर कुछ लोगों को लग रहा है कि विकास से ज्यादा विवाद होगा । कुछ उत्साही स्तंभकारों ने तो यूपी को हिंदू राज्य तक घोषित करते हुए योगी को मुसलमानों को साथ लेकर चलने की नसीहत तक दे डाली है । योगी के अबतक के बयानों और उनकी छवि के मद्देनजर यह आशंका व्यक्त की जा रही है लेकिन उत्तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जिसपर पीएमओ की सीधी नजर रहेगी । योगी के नाम के ऐलान के दो दिन पहले ही पीएमओ के आला अफसरों की टीम लखनऊ पहुंचकर सुशासन का खाका खींचने के काम में जुटी है । ऐसे में विवाद की आशंका से एकदम इंकार तो नहीं किया जा सकता है लेकिन मुख्यमंत्री बनने और उसके पहले के नेताओं के आचार व्यवहार में फर्क इस देश ने पहले भी देखा है । दूसरे योगी को साथ देने या साधने के लिए केशव मौर्या और दिनेश शर्मा को भी लगाया गया है, इस बात को नहीं भूलना चाहिए । 

Monday, January 30, 2017

अपाराधियों का हाथ, मायावती के साथ

किसी जमाने में यूपी में बहुजन समाज पार्टी का नारा गूंजता था- चढ़ गुडों की छाती पर बटन दबेगा हाथी पर । वही बीएसपी अब अपने इस नारे को भूल गई है । बीएसपी ने हाल ही में जेल में बंद माफिया डॉन मुख्तार अंसारी को अपनी पार्टी में परिवार समेत शामिल कर अपने इस नारे को ना केवल भुला दिया बल्कि मायावती ने अपने शासनकाल के दौरान बेहतर कानून व्यवस्था की अतीतजीविता को भी धूमिल कर दिया है । इस विधानसभा चुनाव के दौरान लोग यह कहते थे कि समाजवादियों के राज में अपराधी बेखौफ हो जाते हैं और बीएसपी के शासनकाल के दौरान वो दुबक जाते हैं । मायावती के राज में भ्रष्टाचार को लोग इसी बिनाह पर बर्दाश्त करते रहे हैं । मायावती ने ना केवल मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का विलय बीएसपी में किया बल्कि मुख्तार, उसके भाई और बेटे को भी पार्टी टिकट देकर इस बात को पुख्ता कर दिया कि अब अपराध और अपराधी से उनको परहेज नहीं है । उनके लिए सूबे की सत्ता महत्वपूर्ण है । गुंडा मुक्त प्रदेश का दावा करनेवाली मायावती ने जिस मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल करवाया है उसपर हत्या से लेकर कई संगीन जुर्म के मुकदमे दर्ज हैं । दो हजार पांच में बीजेपी के विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के आरोप में वो जेल में बंद हैं और इस हत्याकांड की सीबीआई जांच चल रही है ।
मायावती ने उसी मुख्तार को गले लगाया है जिसको उन्होंने दो बार पार्टी के बाहर का रास्ता दिखाया था । पहली बार 1997 में जब मुख्तार अंसारी पर विश्व हिंदू परिषद के कोषाध्यक्ष को अगवा करने का आरोप लगा था । इसके बाद फिर से उनको पार्टी में वापस लिया गया था और दो हजार दस में आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में पार्टी से निकाल बाहर किया गया था । अब एक बार फिर से उनको यह कहते हुए पार्टी में शामिल किया गया है कि वो भटक गए हैं और अब सुधरने की कोशिश कर रहे हैं । अपराधियों को सुधरने का मौका देने का ये तरीका लोगों को पच नहीं रहा है । दरअसल यह गुंडा से ज्यादा वोटबैंक की राजनीति है । माना जाता है कि मुख्तार अंसारी और उसके परिवार का बनारस, आजमगढ़ और मऊ इलाके के मुसलमान वोटरों पर प्रभाव है । उसके इस प्रभाव को भुनाने के चक्कर में ही मायावती ने मुख्तार अंसारी के दल का विलय बीएसपी में करवाया । यही सोच शिवपाल यादव की भी थी जब उन्होंने कौमी एकता दल का विलय चंद महीने पहले समाजवादी पार्टी में करवाया था । तब अखिलेश ने इसका तगड़ा विरोध किया था और माना जाता है कि चाचा-भतीजे के रिश्ते में दरार की बुनियाद वहीं से पड़ी थी । अखिलेश ने मुख्तार और उसके भाई को टिकट देने का भी विरोध किया था । अब मायावती को लगता है कि वो मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल कर पूर्वांचल के मुसलमानों के वोट हासिल कर लेगी । अगर चंद पलों के लिए यह मान भी लिया जाए कि मुख्तार का प्रभाव तीन जिलों के मुसलमान मतदाताओं पर है भी तो तीन जिलों के चंद वोटों की खातिर मायावती पूरे सूबे में अपनी अपराध और अपराधी विरोधी छवि को दांव पर लगाकर क्या हासिल कर लेगी ।
इस बार उत्तर प्रदेश में मायावती अपने सियासी जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही हैं । अब से कुछ महीने पहले तक माना जाता था कि मायावती को ही यूपी की जनता शासन की कमान सौंपेंगी लेकिन बीजेपी ने जिस तरह से धीरे-धीरे जमीनी राजनीति करते हुए खुद को मजबूत किया उससे फिजां बदलती नजर आ रही है । उधर अखिलेश ने भी खुद की अपराध विरोधी छवि पेशकर समाजववादी पार्टी के खिलाफ लोगों का गुस्सा कम करने में सफलता हासिल की । कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में गठबंधन होने के बाद अब मुसलमान मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति बन सकती है । दरअसल पिछले कई सालों में अगर मुस्लिम बहुल इलाकों के वोटिंग पैटर्न का विश्लेषण करें तो यह पता चलता है कि वो उस पार्टी या उस उम्मीदवार को वोट करते हैं जो बीजेपी को हराने की क्षमता रखता है । इस बार शुरुआत में मुस्लिम वोटरों का रुझान बीएसपी की ओर था लेकिन जैसे जैसे अखिलेश को मजबूती मिलती दिखने लगी और परिवार का झगड़ा शांत होने लगा वैसे वैसे ये रुझान कम होने लगा । समाजवादी पार्टी के प्रचारतंत्र ने मुस्लिम मतदाताओं के बीच इस बात पर जोर देना प्रारंभ किया कि बीएसपी तो बीजेपी के साथ जा सकती है क्योंकि पूर्व में दोनों दल साथ मिलकर सरकार चला चुके हैं । समाजवादी पार्टी के इस सियासी दांव के जवाब में बीएसपी ने थोक के भाव में मुसलमान उम्मीदवारों को पार्टी का टिकट दिया । बीएसपी लगभग हर चुनाव में अपना नारा बदलती रहती है । तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार का नारा देनेवाली पार्टी ने नारा बदला और कहा हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश हैं । दो हजार सात में जब ब्राह्मणों का वोट मिल गया तो फिर चुनाव में नारा बदला और सर्वसमाज के सम्मान में बहनजी मैदान में । वोटों की खातिर बदलते स्टैंड को यूपी की जनता को समझना होगा और उसी हिसाब से मतदान करना होगा ।


Wednesday, January 4, 2017

दंगल का सुल्तान कौन ?

तमाम अटकलों को विराम लगाते हुए चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का ऐलान कर दिया है । जिन पांच राज्यों में चुनाव का एलान किया गया है उनमें सबसे अहम है उत्तर प्रदेश जहां चार सौ तीन विधानसभा सीटों के लिए चुनाव ले जाने हैं । इसके अलावा जो राज्य हैं वो हैं पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर । राजनीतिक तौर पर अगर हम देखें तो उत्तर प्रदेश और पंजाब बेहद अहम हैं । उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में मचे घमासान ने इस चुनाव को और रोचक बना दिया है । चंद दिनों पहले जिस तरह से अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव को अपदस्थ कर समाजवादी पार्टी पर अपना अधिकार जमा लिया उसके बाद चुनावी खेल और रोचक हो गया है । अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव दोनों ने चुनाव आयोग के दर पर दस्तक दी है और खुद को असली समाजवादी पार्टी बताते हुए साइकिल चुनाव चिन्ह देने की मांग की है । इस तरह के मसलों में चुनाव आयोग के पूर्व के फैसलों को देखते हुए यह तय माना जा रहा है कि अगर पिता-पुत्र के बीच सुलह नहीं हुई तो इस विधानसभा चुनाव में साइकिल चिन्ह किसी को नहीं मिलेगा । चुनाव आयोग समाजवादी पार्टी के दोनों खेमों को अलग अलग अस्थायी नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित कर सकता है । अखिलेश और मुलायम के झगड़े को लेकर दो तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, पहला तो ये कि इस झगड़े का असली फायदा भारतीय जनता पार्टी को होगा और वो लंबे वक्त बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो पाएगी । राजनीतिक विश्लेषकों का जो दूसरा आंकलन है वो ये कि अखिलेश ने अपने पिता से बगावत कर जनता को ये संदेश दिया है कि वो विकास के एजेंडे पर डटे रहेंगे । शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर ये संदेश भी दिया है कि बाहुबलियों के पैरोकारों को अखिलेश बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं । शिवपाल ने ही बाहुबलि मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के समाजवादी पार्टी में विलय को बड़ा मुद्दा बना दिया था । संभव है कि अखिलेश को अपनी विकासवादी छवि का फायदा हो । उधर बहुजन समाजवादी पार्टी भी सूबे में सत्ता वापसी के लिए तमाम सियासी दांव चल रही है । नोटबंदी के दौरान पार्टी के खाते में सौ करोड़ से ज्यादा की खबर की जांच को भी मायावती भुनाना चाहती हैं । इसी तरह से वो ये एलान भी कर रही हैं कि इस बार बसपा दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण गठजोड़ करके आगे बढ़ना चाहती है । मायावती ने डंके की चोट पर ये एलान किया कि इस बार बसपा ने सत्तानवे मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है । उनका ये एलान उस दिन सामने आया जिसके एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ये फैसला सुनाया था कि धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगना गलत है । वोट के मौसम में किसे सुप्रीम कोर्ट की फिक्र है । दरअसल मायावती को लग रहा है कि इस बार उत्तर प्रदेश के मुसलमान उनको वोट देंगे क्योंकि समाजवादी पार्टी के कमजोर होने से मुसलमान उनकी ओर आएंगें । उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटरों की संख्या करीब बीस फीसदी है और ये सौ से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक होते हैं । लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाने की कसक भी बसपा के नेत्व में है । इधर अगर देखें तो वहां करीब इक्कीस फीसदी दलित हैं जिनमें करीब बारह फीसदी जाटव और नौ फीसदी हैं । इसके अलावा दस फीसदी ब्राह्मण हैं । मायावती इसी गणित के आधार पर काम कर रही हैं कि अगर मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण उनके साथ आ गए तो उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता है । उधर बीजेपी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकासवादी चेहरे को लेकर चुनाव मैदान में हैं । बीजेपी एक साथ समाजवादी पार्टी और बसपा को रोकने में लगी है । वो विकास को मुद्दा बना रही है । लखनऊ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशाल रैली के बाद बीजेपी के हौसले बुलंद हैं । पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी लगातार उत्तर प्रदेश में दौरे कर रणनीति बना रहे हैं । ढाई साल पहले अमित शाह, जब यूपी के प्रभारी थे तो पार्टी को तिहत्तर सीटें मिली थीं ।
पंजाब में दस साल से शासन कर रही अकाली दल और बीजेपी गठबंधन को इस बार कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से जबरदस्त चुनौती मिल रही है । पंजाब की एक सौ सत्रह सीटों पर चुनाव होने हैं और कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में कांग्रेस तो उम्मीद है कि वो दस साल बाद सत्ता में वापसी करेगी लेकिन पार्टी के  सामने सबसे बड़ी चुनौती गुटबंदी है । प्रताप सिंह बाजवा और रजिंदर कौर भट्टल के अलावा मनीष तिवारी और अंबिका सोनी के गुटों में बंटी पार्टी अगर चुनाव के पहले एकजुट नहीं हो पाई तो उसके सत्ता में आने के सपनों पर ग्रहण लग सकता है । आम आदमी पार्टी के नेता अरविंदद केजरीवाल पंजाब में बेहद सक्रिय हैं और वहां उन्होंने ड्रग्स को बड़ा मुद्दा बना दिया है । उनका आरोप है कि ड्रग्स के मसले पर कांग्रेस और अकालियों में मिलीभगत है । ड्रग्स के मुद्दे पर उनको जनसमक्थन मिलता भी दिख रहा है लेकिन पार्टी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं कर पाई है । कयास इस बात के लगाए जा रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल खुद पंजाब के सीएम बनना चाहते हैं । पंजाब की सियासत में जट सिखों का दबदबा रहा है क्योंकि उंची जाति के इकतालीस फीसदी वोटरों में से करीब इक्कीस फीसदी वोटर सिख जट समुदाय से आते हैं । इसी के करीब यानि बाइस फीसदी वोट अन्य पिछड़ी जातियों का है । अनुसूचित जातियों के वोटरों पर भी सभी पार्टियों की नजर रहती है क्योंकि सब मिलाकर इनकी संख्या बत्तीस फीसदी पहुंचती है । पंजाब की राजनीति में डेरों का भी असर होता है, लिहाजा हर दल के लोग डेरों में मत्था टेकते रहे हैं ।

उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने अपने किले को बचाने की चुनौती है लेकिन हरीश रावत सरकार और संगठन क बीच जारी तनातनी के बीच उनकी राह मुश्किल लग रही है । उत्तराखंड में सत्तर सीटें हैं और कांग्रेस बहुत कम बहुमत से सरकार में है । माना जा रहा है कि यहां बीजेपी आगे चल रही है लेकिन इसके सामने भी कांग्रेस से पार्टी में शामिल हुए विजय बहुगुणा के लोगों को एडजस्ट करने की चुनौती है । गोवा की चालीस सीटों को लेकर होनेवाले चुनाव में मामला बेहद फंसा हुआ नजर आ रहा है । मनोहर पार्रिकर के गोवा से केंद्र की राजनीति में आने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लंबे समय तक जुडे सुभाष वेलिंगकर के अलग होने का असर चुनाव पर पड़ेगा । आम आदमी पार्टी ने वहां ताल ठोंक कर चुनाव तो त्रिकोणीय बना दिया है । आम आदमी पार्टी ने बेहद साफ छवि के ईपीएस अफसर एल्विस गोम्स को अपना उम्मीदवार बनाया है । यहां भी कांग्रेस आंतरिक कलह से जूझ रही है और ऐसा प्रतीत होता है कि वो तीसरे स्थान के लिए चुनाव मैदान में हैं । मणिपुर में नगा विद्रोहियों के उपद्रव के साठ विधानसभा सीटों पर चुनाव करवाना चुनौती भरा काम है । यहां मुख्यमंत्री ईबोबी सिंह के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है लेकिन पूर्वात्तर के ज्यादातर राज्य केंद्र में जिस दल की सरकार होती है उसके साथ ही जाती रही है । इस ट्रेंड के मद्देनजर बीजेपी उत्साहित है । पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे जब आंगे तो ये साफ हो जाएगा कि जनता का मूड क्या है । इससे इस बात के संकेत भी मिलेंगे कि नोटबंदी से लेकर सर्जिकल स्ट्राइक जैसी मोदी सरकार की नीतियों को जनता का कितना समर्थन है ।