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Saturday, October 17, 2020

अपनी जड़ों की ओर लौटता भारत


एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा कि ‘किसान क्षेत्र के हित के लिए करनेवाला हमारा संगठन सर्वमान्य संगठन बन गया है, और ऐसे हमारे संगठन को अनुकूलता भी प्राप्त हो गई है। क्योंकि जो हमारा विचार है, विज्ञान ने ही ऐसी करवट ले ली है कि हमने जिन तत्वों का उद्घोष अपनी स्थापना के समय से हम करते आए, विरोधों के बावजूद, उनको मान्यता देने के बजाए दूसरा कोई पर्याय रहा नहीं अब दुनिया के पास। कृषि के क्षेत्र में और जो कॉलेज में से पढ़ा है ऐसा कोई व्यक्ति आपकी सराहना करे ऐसे दिन नहीं थे। आज हमारे महापात्र साहब भी आपके कार्यक्रम में आकर जैविक खेती का गुणगान करते हैं। जैविक खाद के बारे में पचास साल पहले विदर्भ के नैड़प काका बड़ी अच्छी स्कीम लेकर केंद्र सरकार के पास गए थे। ये स्कीम अपने भारत की है, भारत के दिमाग से उपजी है, केवल मात्र इसके लिए उसको कचड़े में डाला गया। आज ऐसा नहीं है। पिछले छह महीने से जो मार पड़ रही है कोरोना की, उसके कारण भी सारी दुनिया विचार करने लगी है और पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधनेवाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है, आशा से देख रही है।‘ मोहन भागवत के भाषण के इस छोटे से अंश में कई महत्वपूर्ण बातें हैं जिनकी ओर उन्होंने संकेत  किया है। पहली बात तो ये कि आज भारत और भारतीयता को प्राथमिकता मिल रही है। भारतीय पद्धति से की गई खोज या नवोन्मेष को या भारतीय पद्धतियों को मान्यता मिलने लगी है। मोहन भागवत ने ठीक ही इस बात को रेखांकित किया कि पूरी दुनिया भारत की ओर आशा से देख रही है।

मोहन भागवत के इस वक्तव्य के उस अंश पर विचार करने की जरूरत है जिसमें वो कह रहे हैं कि पूरी दुनिया पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधने वाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है। दरअसल हमारे देश में हुआ ये कि मार्कसवाद के रोमांटिसिज्म में पर्यावरण की लंबे समय तक अनदेखी की गई। आजादी के बाद जब नेहरू से मोहभंग शुरू हुआ या यों भी कह सकते हैं कि नेहरू युग के दौरान ही मार्क्सवाद औद्योगीकरण की अंधी दौड़ में शामिल होने के लिए उकसाने वाला विचार लेकर आया। औद्योगिकीकरण में तो विकास पर ही जोर दिया जाता है और कहा भी जाता है कि किसी भी कीमत पर विकास चाहिए। अगर विकास नहीं होगा तो औद्योगिकीकण संभव नहीं हो पाएगा।लेकिन किसी भी कीमत पर विकास की चाहत ने प्रकृति को पूरी तरह से खतरे में डाल दिया। औद्योगिकीकरण का समर्थन करनेवाली विचारधारा में प्रकृति का आदर करने की जगह उसकी उपेक्षा का भाव है। ये उपेक्षा इस हद तक है कि मार्क्स ने ‘मास्टरी ओवर नेचर’ की बात की है यानि प्रकृत्ति पर प्रभुत्व। सृष्टि के इस महत्वपूर्ण अंग, प्रकृति पर प्रभुत्व की कल्पना मात्र से ही इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि मार्क्सवाद के सिद्धांत में बुनियादी दोष है। क्या ये मनुष्य के लिए संभव है कि वो प्रकृत्ति पर प्रभुत्व कायम कर सके। लेकिन मार्क्स ऐसा चाहते थे। उनके प्रकृत्ति को लेकर इस प्रभुत्ववादी नजरिए को उनके अनुयायियों ने जमकर बढ़ाया। इस बात का उल्लेख यहां आवश्यक है कि स्टालिन ने सोवियत रूस की सत्ता संभालने के बाद संरक्षित वन क्षेत्र को नष्ट किया। औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरण पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की। नतीजा क्या हुआ ये सबके सामने है। बाद में इस गलती को सुधारने की कोशिश हुई लेकिन तबतक बहुत नुकसान हो चुका था। खैर ये अवांतर प्रसंग है इस पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी। अभी तो इसके उल्लेख सिर्फ ये बताने के लिए किया गया कि साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा की बुनियाद प्रकृति को लेकर बेहद उदासीन और प्रभुत्ववादी रही है। इसके विपरीत अगर हम विचार करें तो भारतीय विचार परंपरा में प्रकृत्ति को भगवान का दर्जा दिया गया है। हम तो ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ को मानने वाले लोग हैं। इस पंचतत्व का निषेध या उससे आगे जाकर कुछ और नया खोज वैज्ञानिक अभी तक कर नहीं पाए हैं सिवा इसके कि वो इन पंच तत्वों के अंदर के अवयवों को ढूंढ निकालने का दावा कर रहे हैं। हमारी परंपरा में तो नदी पर्वत और जल को पूजे जाने की परंपरा रही है। कभी भी आप देख लें किसी भी शुभ अवसर पर प्रकृत्ति को भी याद किया जाता है। 

मोहन भागवत ने इस ओर भी इशारा किया है कि कोरोना के बाद स्थितियां बहुत बदल गई हैं। सचमुच बहुत बदली हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा में जिन औषधियों की चर्चा मिलती हैं आज वो अचानक बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं। हमारे जो वामपंथी प्रगतिशील मित्र आयुर्वेद का मजाक उड़ाया करते थे उनको सुबह शाम काढ़ा पीते या फिर गिलोई चबाते देखा जा सकता है। आज पूरी दुनिया में भारतीय खान-पान की आदतों को लेकर विमर्श हो रहा है। हमारे यहां तो हर मौसम के हिसाब से भोजन तय है। मौसम तो छोड़िए सूर्यास्त और और सूर्योदय के बाद या पहले क्या खाना और क्या नहीं खाना ये भी बताया गया है। आज पश्चिमी जीवन शैली के भोजन या भोजन पद्धति से इम्यूनिटी बढ़ने की बात समझ में नहीं आ रही है। आज भारतीय पद्धति से भोजन यानि ताजा खाने की वकालत की जा रही है, फ्रिज में रखे तीन दिन पुराने खाने को हानिकारक बताया जा रहा है। कोरोना काल में पूरी दुनिया भारतीय योग विद्या को आशा भरी नजरों से देख रही है। आज जब कोरोना का कोई ज्ञात ट्रीटमेंट नहीं है तो ऐसे में श्वसन प्रणाली को ठीक रखने, जीवन शैली को संतुलित रखने की बात हो रही है। भारत में तो इन चीजों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। स परंपरा को अंग्रेजी के आभिजात्य मानसिकता और वामपंथ के विदेशी ज्ञान ने पिछले कई दशकों से नेपथ्य में धकेलने की कोशिश की। सफल भी हुए। मोहन भागवत जी ने विदर्भ के एक किसान का जो उदाहरण दिया वो बेहद सटीक है। किसी भी प्रस्ताव को इस वजह से रद्दी की टोकरी में फेंका जाता रहा कि वो भारतीय परंपरा और प्राचीन ग्रंथों पर आधारित होती थी। अब देश एक बार फिर से अपनी जड़ों और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरास की ओर लौटता नजर आ रहा है। 

अगर इस बात पर गंभीरता से विचार किया जाए तो हम ह पाते हैं कि हमारे देश में कथित तौर पर प्रगतिशील विचारों के शक्तिशाली होने की वजह से आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी विचारों का अंधानुकरण शुरू हो गया। भारतीय विचारों को, भारतीय चिकिस्ता पद्धति को, भारतीय दर्शन को, भारतीय पौराणिक लेखन को सायास पीछे किया गया। उसको दकियानूसी, पुरानतनपंथी या परंपरावादी आदि कहकर उपहास किया गया। पश्चिमी आधुनिकता के आख्यान का गुणगान या उसके बढ़ते प्रभाव ने भारतीय जीवन शैली और भारतीय पद्धति को प्रभावित करना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि हमारे देश में एक ऐसा समाज बनने लगा था जो पूरी तरह से न तो भारतीयता में यकीन करता था और न ही पूरी तरह से पश्चिमी रीति-रिवाज को आत्मसात कर पा रहा था। पश्चिमी आधुनिकता और भारतीयता के इस द्वंद ने लंबे समय तक भारतीय ज्ञान पद्धति को प्रभावित किया। कोरोना की वजह से और देश में बदले राजनीति हालात ने एक अवसर प्रदान किया है जिसकी वजह से एक बार फिर से देश अपनी जड़ों की ओर लौटता दिख रहा है।   


Saturday, June 29, 2019

उदारवाद पर पुतीन का कठोर रुख


रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतीन ने उदारवाद को लेकर कई बेहद महत्वपूर्ण बातें की है। उन्होंने कहा है कि पूरी दुनिया से उदारवाद का दौर लगभग खत्म हो गया है। उनका मानना है कि उदारवादी विचार को जनता ने नकारना शुरू कर दिया है। उदारवाद की इस मजबूत पश्चिमी अवधारणा पर वामपंथी रूस की तरफ से ये अबतक का सबसे बड़ा हमला माना जा सकता है। पुतीन इतने पर ही नहीं रुके उन्होंने आगे कहा कि अब वो दौर आ गया है कि उदारवादी किसी को भी किसी भी समय इस अवधारणा की आड़ में कुछ भी करने को मजबूर नहीं कर सकते हैं। पुतीन का मानना है कि पिछले कई दशकों के दौरान उदारवाद के नाम पर लोगों को तरह तरह के आदेश देकर सत्ता से अपने हिसाब से काम करवाया। रूस के सर्वोच्च नेता का मानना है कि हर अपराध की सजा तो होनी ही चाहिए। शरणार्थियों के नाम पर किसी देश में घुस आने वालों को शरणार्थी के अधिकार के नाम पर अपराध करने की छूट नहीं दी जा सकती है। बेहद बेबाक अंदाज में पुतीन ने कहा है कि उदारवाद के नाम पर अराजकता की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती है। पुतीन का मानना है कि उदारवाद का सिद्धांत किसी भी देश के बहुमत के अधिकारों के खिलाफ जाता है, लिहाजा अब वो अर्थहीन हो चुका है। पुतीन ने अपने बयान के समर्थन में कई बातें भी कहीं उनमें से जो सबसे महत्वपूर्ण है वो ये कि उदारवाद के सिद्धांत को अपनाने वाली सरकारों ने अपनी जनता को भरोसा देने के बजाए सांस्कृतिक बहुलता और उदारता के नाम पर कई ऐसी बातों के मंजूरी दी जो बहुसंख्यक जनता के हितों के खिलाफ थीं। इस संबंध में उन्होंने लैंगिक स्वतंत्रता का उदाहरण दिया। उनका कहना था कि समलैंगिक लोगों को अपनी मर्जी से जीवन जीने का हक है, खुश रहने का अधिकार है लेकिन इसकी इजाजत देश के करोड़ों लोगों की पारंपरिक सांस्कृतिक और पारिवारिक संस्कारों को दांव पर लगाकर नहीं दी जा सकती है।
अब हमें इस बात को समझना होगा कि पुतीन ऐसा क्यों कह रहे हैं। एक वामपंथी देश का सर्वोच्च नेता उदारवादी सिद्धांत के खिलाफ क्यों है। ये वो वामपंथी देश है रूस है जो 1917 के आसपास से ये घोषणा करता आया है कि वो पूरी दुनिया की जनता को पूंजीवाद के शिकंजे से मुक्त करेगा और धरती पर स्वर्ग उतार देगा। पश्चिम में अधिनायकवाद की अवधारणा जोर पकड़ रही थी, जब जर्मनी में नाजी हिटलर बड़े-बड़े दावे करते हुए खुद को श्रेष्ठ बता रहा था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उदारवाद की अवधारणा को आगे बढ़ाया गया, जिसको वामपंथियों ने भी अपनाया। भारत जब आजाद हुआ तो इस उदारवाद को यहां की बहुलतावादी संस्कृति से जोड़ दिया गया। ये तर्क दिए जाने लगे कि भारत की बहुलतावादी संस्कृति के लिए लिबरल यानि दूसरे के प्रति उदार होना चाहिए। जबतक हमारा देश मार्क्सवाद और समाजवाद के रोमांटिसिज्म में रहा देश में उदारवाद की आंधी चलती रही। लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है कि आंधी लंबे समय तक नहीं चल पाती और वो धीरे-धीरे स्थिर होने लगती है। उदारवाद की आंधी भी धीरे धीरे थमने लगी पर उदारवाद की बयार बहती रही। आजादी के बाद की ज्यादातर सरकारों ने उदारवाद की इस बयार को रोकने की कभी कोशिश नहीं की बल्कि जब भी ये हवा थोड़ी धीमी होती थी तो कृत्रिम तरीके से भी इसको ताकत देने कोशिश सरकारों द्वारा होती रही। कभी संस्थाओं के माध्यम से तो कभी व्यक्तियों के माध्यम से। लेकिन कृत्रिमता कभी भी प्राकृतिक स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकती है। हिंदी के मशहूर लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी जी ने लिखा है- चाहे कितने भी ट्यूबलाइट लगा दिए जाएं लेकिन वो सब मिलकर भी आकाशीय बिजली से निकलनेवाले प्रकाश की की बराबरी नहीं कर सकते हैं। उदारवाद के साथ भी यही हुआ।
भारत के परिप्रेक्ष्य में लिबरल या उदारवादियों के सिद्धांतों और तर्कों पर विचार करें तो पाते हैं कि वो बार-बार ये कहते हैं कि भारत विविध संस्कृतियों का देश है और हमें इस विविधता को संजो कर रखना चाहिए, इसका सम्मान करना चाहिए। भारत को विविध संस्कृतियों का देश कहते ही सबकुछ गड़बड़ाने लगता है क्योंकि भारत विविध संस्कृतियों का देश नहीं है उसकी संस्कृति एक है और विविधता उसका अनूठापन है। इसी अनूठेपन की वजह से भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया में अलग स्थान रखती है। लंबे समय तक भारत को विभिन्न संस्कृतियों का देश कहा जाता रहा, अब भी कहा जाता है और इसके आधार पर ही बहुलता और विविधता को बचाने के लिए अलग अलग धर्मों के हितों की रक्षा की बात की जाती रही और उनको भारतीय संस्कृति से अलग करके देखा जाता रहा । अज्ञानतावश लोग भारत के हिंदू और मुसलमानों की संस्कृति को अलग-अलग करके देखते हैं। इस वजह से ही दोनों समुदायों के बीच वैमनस्यता बढ़ती चली गई। दोनों की एक ही संस्कृति है, भारतीय संस्कृति। पुतीन जब कहते हैं कि पिछले कई दशकों के दौरान उदारवाद के नाम पर लोगों को तरह-तरह के आदेश देकर सत्ता से अपने हिसाब से काम करवाया, तो गलत नहीं कहते हैं। इसकी बानगी आप भारत में भी देख सकते हैं। आप पिछले पचास सालों में पेश हुए बजट का विश्लेषण कर लें आपको ये बातें साफ तौर पर दिखाई देंगी की उदारवाद के नाम पर किस तरह से सत्ता प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से आदेश देकर अपना काम करवाती रही है। उदारतावाद की मीठी गोली देकर जनता को लंबे समय तक बरगलाया जाता रहा।
अगर याद करें तो 2015 के आसपास एक शब्द बहुत तेजी से राजनीतिक और साहित्यिक-सांस्कृतिक हलके में प्रचलित हुआ था। वो शब्द का असहिष्णुता। असहिष्णुता को इस तरह से प्रचारित किया जैसे वो हिंदुत्व का एक दुर्गुण हो। जबकि अगर सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथों को देखा जाए तो वहां सहिष्णुता और असहिष्णुता जैसी अवधारणा की उपस्थिति नगण्य है। लेकिन उदारवादियों ने इसको नगण्य उपस्थिति को भी केंद्र में ला दिया। नतीजा क्या हुआ पूरे देश में सहिष्णुता और असहिष्णुता को लेकर बहस छिड़ गई। एक ऐसी बहस जो ना केवल अर्थहीन थी बल्कि बाद में वो एक चुनावी दांव के तौर पर देखा गया। लिबरलिज्म या उदारवाद की अवधारणा को भारतीयों पर लादने की कोशिश की गई। भारत में इस तरह की अवधारणा के संकेत नहीं मिलते हैं। यहां तो समभाव की अवधारणा का उल्लेख मिलता है मतलब कि सबके साथ समान भाव से व्यवहार। उदारवादियों ने 2014 के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वो लिबरल सरकार नहीं है। ये भी कहा गया कि सरकार में अनुवादरवादी शक्तियां प्रबल हैं, सरकार पर तानाशाही से लेकर फासिज्म तक के आरोप जड़े गए। चुनाव के पहले ‘मैं हिंदू क्यों हूं’ से लेकर ‘व्हाई आई एम अ लिबरल’ जैसी पुस्तकें लिखी गईं।इस तरह की जितनी भी किताबें लिखी गईं वो उदारवादी अवधारणा को पुष्ट करने के उद्देश्य से लिखी गई थीं। जबकि जरूरत इस बात की है कि भारतीय अवधारणाओं के बारे में लगातार बात करके, लिखित में उसकी व्याख्या करके उसको पुष्ट किया जाए। भारतीय सभ्यता और संस्कृति का आधार इतना मजबूत है, इसकी अवधारणाएं इतनी स्पष्ट और व्यावहारिक हैं कि हमें किसी विदेशी अवधारणा को ना तो अपनाने की जरूरत है और ना ही उसको पोषित करने की। लेकिन दुर्भाग्य से मार्क्सवाद के रोमांटिसिज्म में हमारे देश ने वो दौर भी देखा जब ज्यादातर बुद्धिजीवी विदेशी अवधारणाओं के प्रभाव में चले गए। सिद्धांतों के प्रतिपादन के लिए भी विदेशी उद्धरणों का सहारा लिया जाने लगा। रूस और चीन का कम्युनिज्म हमारा आदर्श बन गया। लेकिन परिणाम क्या रहा। भारतीय संस्कृति पर आए विदेशी अवधारणाओं के बादल छंट गए दूसरी तरफ रूस और चीन में अधिनायकवादी ताकतें हावी हो गईं। दोनों जगह पर लोकतंत्र नहीं पनप सका। चीन में शी जिनफिंग आजीवन शासक बने रहेंगे और रूस में पुतीन भी कुछ उसी राह पर चलते नजर आते हैं। कभी प्रधानमंत्री बनकर शासन करते हैं तो कभी राष्ट्रपति बन जाते हैं लेकिन सत्ता की बागडोर अपने हाथ ही रखते हैं। तो कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो जो लोग पहले उदारवाद की वकालत कर रहे थे उनका उदारवाद से मोहभंग होने लगा है दूसरी तरफ भारत के साहचर्य और समभाव की अवधारणा एक बार फिर से पुष्ट होने लगी है। ये इस वजह से भी हो पा रहा है कि भारत में राजनीतिक परिवर्तन ने संस्कृति के क्षेत्र में भी बदलाव की शुरुआत कर दी है। मार्क्स और मार्क्सवाद की जगह पर अब भारत और भारतीयता की बात होने लगी है। भारतीय ज्ञान की समृद्धि के लिए यह शुभ संकेत है।