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Saturday, January 15, 2022

साहित्य में दयनीय महानता का दौर


इन दिनों हिंदी साहित्य में एक अजीब किस्म का सन्नाटा दिखाई देता है। कुछ रचनाकार कई बार अपने लेखन से तो कई बार अपनी टिप्पणियों से इस सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश करते हैं। वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा नियमित तौर पर फेसबुक पर कोई टिप्पणी लिखकर साहित्य के ठहरे पानी में कंकड़ फेंकती रहती हैं। कई बार उस पर विवाद भी होता है। बीच-बीच में लेखक संगठनों के नाम पर कुछ नए पुराने लेखक अपील आदि जारी करते रहते हैं लेकिन उसका भी कहीं कोई असर दिखाई नहीं देता है। ऐसी अधिकतर अपील किसी न किसी चुनाव के पहले ही जारी की जाती हैं। अब तो इसका असर इंटरनेट मीडिया पर भी नहीं होता।  जमीनी स्तर पर तो शायद अपील पहुंचती भी नहीं है। कुछ ऐसे भी लेखक हैं जो साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में फासीवाद को लेकर चिंतित ही नहीं रहते हैं बल्कि उसके खतरों से लोगों को आगाह भी करते रहते हैं। उधर सरकार के विभिन्न मंत्रालय और विभाग साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में वैचारिक विरोधियों को लगातार स्थान देती रहती है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय की पत्रिका आजकल के आवरण पर धुर वामपंथी कवि की तस्वीर छपती है। इसके पहले भी वामपंथी विचारधारा के लेखकों के चित्र आजकल पत्रिका के आवरण पर नियमित तौर पर छपते रहे हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार मोदी सरकार के घोषित विरोधियों को दिया जाता है। फिल्म फेस्टिवल से लेकर युवा महोत्सव तक में सरकार विरोधियों की फिल्में और वक्ता के तौर पर उनको आमंत्रित करके सरकार लगातार अपने लोकतांत्रिक होने का प्रमाण देने में जुटी है। बावजूद इसके विचारधारा विशेष के लेखकों को 2014 के बाद से ही फासीवाद का डर सता रहा है। 

अब वामपंथियों में एक नई प्रवृत्ति स्पष्ट दिखने लगी है। पहले वो अपनी विचारधारा से संबद्ध राजनीतिक दलों के लिए काम करते थे । पिछले तीन चार साल से हो रहे चुनावों में वामपंथी दलों की हालत बहुत खराब हो गई है। अब अधिकतर वामपंथी लेखकों को कांग्रेस में संभावना नजर आने लगी। वामपंथी लेखक अब खुलकर कांग्रेस पार्टी के लिए काम करते हुए नजर आने लगे हैं। इंटरनेट मीडिया पर उनके लिखे को देखने से ये स्पष्ट हो जाता है। उनको अब इंदिरा गांधी के फासीवाद की बिल्कुल याद नहीं आती। उनको आपातकाल के दौर की ज्यादातियों की भी याद नहीं आती। निर्मल वर्मा ने तमिल लेखक पी कृष्णन से एक बातचीत में स्पष्ट रूप से इंदिरा गांधी की फासीवादी नीतियों और हिंदी के लेखकों पर अपनी राय रखी थी। निर्मल वर्मा ने कहा था, सबसे अधिक चौंकानेवाली बात थी इंदिरा गांधी की अलोकतांत्रिक तथा अत्याचारी नीतियों का बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा जरा भी विरोध न किया जाना। वैसे तो इंदिरा गांधी की तानाशाही हल्की थी लेकिन इस हल्के संस्करण ने भी  हमारे बुद्धिजीवी वर्ग को खासा भयभीत कर दिया था और उन्होंने घुटने टेक दिए थे। इस क्रम में निर्मल ने रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती तक का नाम लिया था। निर्मल ने बहुत कठोर शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा था कि उन्हें इस बात का अंदाज नहीं था कि हिंदी के बड़े साहित्यकार इतने भंगुर और सारहीन सिद्ध होंगे। अब जब वामपंथी लेखक भय से नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से इंदिरा गांधी की विरासत की प्रशंसा कर रहे हैं। संभव है इस वजह से प्रभाव नहीं पैदा कर पा रहे हैं। 

साहित्य के राजनीतिक दांवपेंच से अलग हटकर अगर रचनात्मक स्तर पर भी देखें तो हिंदी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य बहुत आशाजनक नहीं लगता है। अब भी वरिष्ठ और बुजुर्ग साहित्यकार ही अपनी सक्रियता से रचनात्मक संसार को जीवंत बनाने के प्रयास में लगे हुए हैं, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं। हिंदी के अधिकतर युवा लेखक आत्ममुग्धता के शिकार हो गए हैं। छोटे-मोटे उपन्यास लिखनेवाले भी खुद को प्रेमचंद से बड़ा कथाकार मानने लगा है। उसकी अपेक्षा भी होती है कि साहित्य समाज उनको प्रेमचंद से अधिक सम्मान भी दे। इसी अहंकार में वो आलोचना से लेकर समीक्षा विधा को खारिज करने लगते हैं। इंटरनेट माध्यम पर होनेवाली फूहड़ या प्रशंसात्मक चर्चा को सत्य मानकर वो अपनी कृति को महान समझ लेते हैं। कवियों के तो कहने ही क्या, वो तो खुद की रचनाओं पर मुग्ध रहते ही हैं। साहित्य के इस दौर को देखकर एक मित्र की टिप्पणी सटीक लगती है। उसने एक दिन कहा था कि हिंदी साहित्य में ये दयनीय महानता का दौर है। ,

आज अगर हिंदी साहित्य में किसी प्रकार का कोई विमर्श नहीं हो रहा है तो उसके पीछे के कारणों की पहचान करनी होगी। राजेन्द्र यादव से हमारा वैचारिक स्तर पर काफी विरोध रहता था लेकिन उनकी इस बात के लिए उनके विरोधी भी प्रशंसा करते थे कि वो साहित्य में अछूते प्रश्न उठाते थे। नामवर सिंह धुर वामपंथी थे, कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके थे लेकिन जब वो लिखते थे तो उससे साहित्य जगत में हलचल होती थी, उनके लिखे के पक्ष विपक्ष में बातें होती थीं। अशोक वाजपेयी भी जबतक वामपंथ की राजनीति में नहीं उलझे थे तबतक उनके लेखन में एक वैचारिक उष्मा होती थी। इनके बाद की पीढ़ी में भी देखें तो ज्ञानरंजन से लेकर रवीन्द्र कालिया तक के लेखन में कुछ ऐसे तत्व अवश्य होते थे जो पाठकों के बीच चर्चा की वजह बनते थे। नरेन्द्र कोहली के लेखन में लगातार प्रयोग होते थे जो पाठकों को नई तरह से सोचने का आधार देते थे। कमलकिशोर गोयनका ने प्रेमचंद को समझने की नई दृष्टि हिंदी साहित्य जगत को दी। इन लोगों में अहंकार नहीं था और वो अपने पूर्वज लेखकों को कभी खारिज नहीं करते थे। उनको साहित्य की परंपरा का भी ज्ञान था और उसपर वो गुमान भी करते थे। कविता में भी देखें तो आधुनिक काल के कवियों ने काफी प्रयोग किए। स्वाधीनता के बाद भी कवियों ने अपनी लेखनी के माध्यम से भारतीय समाज की जड़ता पर प्रहार किया। आज ज्यादातर कविताएं गद्य में लिखी जा रही हैं। पहले कवियों पर संपादक नाम की संस्था का एक फिल्टर होता था लेकिन अब इंटरनेट मीडिया ने उस फिल्टर को समाप्त कर दिया। परिणाम यह हो रहा है कि कविता के नाम पर अंट शंट लिखा जा रहा है। लेकिन अहंकार इतना कि खुद को दिनकर और बच्चन से कम मानने को राजी नहीं। 

एक जमाना होता था जब साहित्यकारों की निजी गोष्ठियां हुआ करती थीं। जिसमें साहित्य की प्रवृत्तियों से लेकर नए लिखे जा रहे पर चर्चा होती थी। लोग खुलकर नई रचनाओं पर अपनी बातें रखते थे। आलोचना या प्रशंसा दोनों होती थी। इसमें बैठनेवाले वरिष्ठ साहित्यकार नए लेखकों की टिप्पणियों को ध्यान से सुनते थे और अगर आवश्यकता होती थी तो उसमें सुधार भी करते थे। इसका फायदा ये होता था कि नए लेखकों की समझने की दृष्टि का विस्तार होता था।  इंटरनेट मीडिया के विस्तार के बाद इस तरह की गोष्ठियां कम हो गईं। लोगों में पढ़ने की भी आदत कम होती जा रही हैं। रचनाओं पर टिप्पणी के स्थान पर लाइक के बटन अधिक दबने लगे हैं। दूसरी एक बात जो युवा लेखकों में देखने को मिल रही है कि वो अपनी लेखकीय परंपरा से अनजान हैं, उनको इस बात का भान ही नहीं है कि वो जिस भारतीय लेखन परंपरा में आना चाह रहे हैं वो कितना समृद्ध है। जब अपनी परंपरा के वैराट्य का अनुमान नहीं होता है तो व्यक्ति अहंकार का शिकार हो जाता है। उसको लगता है कि उसने जो लिख दिया है वही सबसे अच्छा है। युवा लेखकों को अपनी इस कमी को दूर करना होगा तभी जाकर हिंदी साहित्य जगत का वैचारिक सन्नाटा दूर होगा।  

Saturday, November 6, 2021

चयन की पारदर्शिता पर उठे सवाल


फिल्मकारों और फिल्मों से जुड़ी एक संस्था है जिसका नाम है फिल्म फेडरेशन आफ इंडिया (एफएफआई)। अन्य कामों के अलावा ये संस्था हमारे देश की उस फिल्म का चयन भी करती है जो आस्कर अवार्ड के लिए भेजी जाती है। आस्कर के लिए भेजी जानी वाली फिल्मों के चयन को लेकर बहुधा विवाद होते रहते हैं। इस वर्ष भी हुआ। इस वर्ष फिल्म फेडरेशन ने तमिल फिल्म ‘कुझंगल’ का चयन किया और हिंदी फिल्म ‘सरदार उधम’ को नहीं भेजा गया। तर्क ये दिया गया कि फिल्म सरदार उधम बहुत लंबी है और इसमें अंग्रेजों के प्रति घृणा का भाव दिखाया गया है। वैश्वीकरण के इस दौर में घृणा का ये भाव अपेक्षित नहीं है। किसी फिल्म को आस्कर में नहीं भेजने के ये कारण समझ से परे है। स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म शिंडलर्स लिस्ट जिसने आस्कर में कई पुरस्कार जीते थे वो तीन घंटे से अधिक अवधि की फिल्म है। इस फिल्म की लंबाई पर कभी आस्कर की जूरी ने सवाल नहीं उठाया। इस फिल्म को लेकर कभी प्रश्न नहीं उठा कि इसमें नाजियों का चित्रण आपत्तिजनक है। इसके अलावा फिल्म गान विद द विंड की लंबाई भी तीन घंटे अट्ठावन मिनट थी। फिल्म मेरा नाम जोकर की लंबाई के बारे में सबको ज्ञात ही  है। इस फिल्म की अवधि इतनी अधिक थी इसमें दो मध्यांतर थे। हमारे यहां से भी पूर्व में कई ऐसी फिल्में हैं जो आस्कर में भेजी जा चुकी है जो फिल्म सरदार उधम से लंबी है।  इसलिए एफएफआई की तरफ से जो तर्क दिए गए वो बचकाने तो हैं ही अपने देश के इतिहास को भी सही परिप्रेक्ष्य में नहीं देखने के दोष का शिकार हो गया। जलियांवाला बाग नरसंहार का जब चित्रण होगा तो उसको इसी तरह से देखा जाएगा। दरअसल इस तरह की बचकानी दलीलों की वजह से एफएफआई की साख लगातार छीजती चली गई है। आज भले ही ये संस्था दावा करे कि वो भारतीय फिल्मकारों की प्रतिनिधि संस्था है लेकिन वर्तमान दौर के बड़े फिल्मकार या तो इससे जुड़े नहीं हैं या यहां सक्रिय नहीं हैं। भारत सरकार को इस संस्था को मान्यता पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है।

आस्कर में भारतीय फिल्म की प्रविष्टि को लेकर विवाद अभी ठंडा भी हुआ नहीं था कि एक और विवाद सामने आ गया है। इसमें भी फिल्म फेडरेशन का नाम आ रहा है। ये विवाद उठा है गोवा में आयोजित होनेवाले इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया (आईआईएफआई) के दौरान दिखाई जाने वाली एक फिल्म डिक्शनरी को लेकर। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया का आयोजन गोवा में 20 से 28 नवंबर तक है। इसका आयोजन सूचना और प्रसारण मंत्रालय की एक संस्था फिल्म समारोह निदेशालय करती है। इस अंतराष्ट्रीय फेस्टिवल के दौरान इंडियन पैनोरमा के अंतर्गत दिखाई जानेवाली फिल्मों की सूची जारी की गई। इस सूची में आमतौर पर चौबीस फिल्में होती हैं जो फेस्टिवल के दौरान दिखाई जाती हैं। इन फिल्मों का चयन एक जूरी करती है। जूरी सदस्यों और अध्यक्ष का चयन फिल्म समारोह निदेशालय करती है। इस बार भी बारह सदस्यों की एक जूरी ने इंडियन पैनोरमा के तहत दिखाई जानेवाली फिल्मों का चयन किया। इस जूरी के अध्यक्ष कन्नड फिल्मकार एस वी राजेन्द्र सिंह बाबू थे। राजेन्द्र सिंह बाबू के बारे में बताते चलें कि उन्होंने पिछले चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी के लिए चुनाव प्रचार किया था। उनकी अध्यक्षता वाली जूरी ने 24 फिल्मों का चयन किया और अपनी संस्तुति फिल्म समारोह निदेशालय को भेज दी। जब निदेशालय ने इंडियन पेनोरामा के फिल्मों की घोषणा की तो उसमें 24 की जगह 25 फिल्मों के नाम थे। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार में मंत्री ब्रत्य बसु की फिल्म डिक्शनरी को इसमें शामिल किया गया। जब इस बारे में जानकारी ली गई तो पता चला कि फिल्म फेडरेशन आफ इंडिया ने एकमात्र इसी फिल्म की संस्तुति की थी और इंडियन पैनोरमा के नियमों के अंतर्गत फिल्म समारोह निदेशालय की आतंरिक समिति ने इस फिल्म का चयन किया। 

यहां तक तो सबकुछ सामान्य लगता है कि एफएफआई ने एकमात्र फिल्म की संस्तुति की और निदेशालय की समिति ने उसका चयन कर लिया। लेकिन इसके तह में जाने पर एक असामान्य कहानी सामने आई। ममता बनर्जी सरकार में मंत्री और फिल्मकार ब्रत्य बसु की फिल्म डिक्शनरी की प्रविष्टि इंडियन पैनोरमा के लिए आई थी। इंडियन पैनोरमा की जूरी ने आरंभिक दौर में ही इस फिल्म को देखकर उसको फेस्टिवल के दौरान प्रदर्शित करने योग्य नहीं पाया। इस बीच फिल्म फेडरेशन ने डिक्शनरी को लेकर अपनी संस्तुति फिल्म समारोह निदेशालय को भेज दी। निदेशालय की आतंरिक कमेटी ने इसका चयन कर 25 फिल्मों की सूची जारी कर दी। ये ज्ञात नहीं हो सका कि निदेशालय ने फिल्म फेडरेशन से ये बात जाननी चाही कि नहीं उनकी तरफ से एकमात्र फिल्म की संस्तुति ही क्यों आई, जबकि आमतौर पर वो पांच फिल्मों की संस्तुति करते हैं।  नतीजा यह हुआ कि एक ऐसी फिल्म जिसको जूरी ने रिजेक्ट कर दी थी वो प्रदर्शित होनेवाली फिल्मों की सूची में आ गई। प्रश्न ये उठता है कि अगर इस तरह की कार्यप्रणाणी है तो फिर जूरी की राय का क्या अर्थ है? क्यों बीस पच्चीस दिन तक जूरी के सदस्य दो सौ बीस फिल्मों को देखकर उसमें से 24 फिल्मों का चयन करते हैं। हर फिल्म पर माथापच्ची होती है। फिल्म समारोह निदेशालय को इस पूरे प्रकरण पर स्थिति साफ करनी चाहिए। फिल्मों के चयन को लेकर पारदर्शिता होनी चाहिए अन्यथा चयन की प्रक्रिया से फिल्मकारों का विश्वास डिग जाएगा। 

इसके पहले भी फिल्म समारोह निदेशालय के फैसलों को लेकर विवाद होते रहे हैं। 2017 के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में फिल्म एस दुर्गा और फिल्म न्यूड के प्रदर्शन को लेकर अच्छा खासा विवाद उठा था। फिल्म एस दुर्गा और फिल्म न्यूड को इंडियन पैनोरमा से बाहर करने के फैसले के खिलाफ जूरी के अध्यक्ष सुजय घोष ने इस्तीफा दे दिया था। उनका कहना था कि बिना उनको बताए इन फिल्मों को प्रदर्शित होनेवाली फिल्मों की सूची से बाहर कर दिया गया । ऐसी अप्रिय स्थिति इस बार भी हो सकती है कि जूरी के अध्यक्ष या सदस्य इस बात को लेकर इस्तीफा दे दें कि उनकी राय के खिलाफ फिल्म का प्रदर्शन होने जा रहा है।  एस दुर्गा के प्रदर्शन को लेकर तो विवाद इतना बढ़ा था कि इस फिल्म के निर्माता सूचना और प्रसारण मंत्रालय के खिलाफ केरल हाईकोर्ट चले गए थे। उस वक्त भी फिल्म समारोह निदेशालय की कार्यपद्धति को लेकर सवाल उठे थे। अब एक बार फिर से नियमों की आड़ में एक ऐसी फिल्म को जोड़ा गया जिसको जूरी ने खारिज किया था। विवाद बढ़ने के बाद अगर निदेशालय इस फिल्म को सूची से हटाती भी है तो उससे एक राजनीतिक विवाद जन्म ले सकती है। ममता बनर्जी की पार्टी को भारतीय जनता पार्टी पर या मोदी सरकार पर निशाना साधने का एक मौका मिल जाएगा। वो ये आरोप लगा सकती हैं कि उनकी पार्टी के नेता की फिल्म को जानबूझकर हटा गया। एक ऐसा मुद्दा खड़ा हो सकता है जिसमें राजनीति नहीं है सिर्फ अफसरों की लापरवाही या कुछ और है। केंद्र सरकार ने कुछ दिनों पूर्व सूचना और प्रसारण मंत्रालय की फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं के पुनर्गठन की बात की थी, अब वक्त आ गया है कि उस घोषणा पर अमल किया जाए। फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं का पुनर्गठन हो और नियमों को पारदर्शी बनाकर जिम्मेदारियां भी तय की जाएं ताकि भविष्य में विवाद न हों और फेस्टिवल की लोकप्रियता भी बढ़े।