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Saturday, April 4, 2026

फिल्मों के सामाजिक सरोकार


इस वर्ष जनवरी के आखिर में जब रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी तब दिल्ली से लापता हो रही बच्चियों का मुद्दा जोर-शोर से उठा था। एक रिपोर्ट के हवाले से ये समाचार चर्चा में आया था कि दिल्ली और आसपास के इलाकों से भारी संख्या में किशोरियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। उस समय आए आंकड़े बेहद डरानेवाले थे। तब भी ये भी कहा गया था कि जिस रिपोर्ट के हवाले से मुद्दा बनाया जा रहा था उसमें गायब हुई लड़कियों की बरामदगी के आंकड़े नहीं दिखाए गए थे। आंकड़ों को लेकर जब चर्चा बढ़ी को दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने एक्स पर एक पोस्ट किया। उसमें लिखा कि, चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया था कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। संयोग ऐसा था कि मर्दानी 3 में भी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों से बच्चियों के गायब होने की कहानी थी। दिल्ली पुलिस के पेड प्रमोशन वाले पोस्ट के बाद चर्चा कम जरूर हुईं लेकिन समाचारपत्रों में लड़कियों के गायब होने के बारे में कुछ न कुछ सामग्री प्रकाशित होती रही। गुमशुदा होनेवाली लड़कियों की संख्या के साथ साथ बरामदगी की संख्या भी प्रकाशित हुई। इससे इंटरनेट मीडिया से बना भ्रम कुछ कम हुआ और राजधानी और इसके आसपास के क्षेत्रों के निवासियों में भय भी कम हुआ। 

फिल्म मर्दानी-3 में बच्चियों का अपहरण कर उनको विदेश भेजने और उनपर दवाओं के ट्रायल की बहुत मार्मिक और भयावह कहानी है। फिल्मकार ने ये दिखाने का प्रयास किया है कि मानव तस्करी सिर्फ देह व्यापार के लिए नहीं होती बल्कि इसके अनेक रूप होते हैं। इस फिल्म में बच्चियों का अपरहण किया जाता था और जिनका ब्लड ग्रुप खास किस्म का होता था उसको विदेश ले जाकर उसपर कैंसर की दवाई का टेस्ट किया जाता था। अगवा की गई जिन लड़कियों का ब्लड ग्रुप उस समूह का नहीं होता है उनसे भीख मंगवाने से लेकर अन्य गैरकानूनी कार्य करवाए जाते थे। कैंसर की दवाई का जिन लड़कियों पर टेस्ट किया जाता था उनकी हालत बहुत खराब हो जाती थी और कुछ समय बाद तड़प तड़प कर उनकी मृत्यु होते दिखाया गया। इस सिंडिकेट में लड़कियों के लिए काम करने वाली एक संस्था और उसके प्रमुख की संलिप्तता भी दिखाई गई थी। कहानी थोड़ी फिल्मी भी होती है। जांच कर रही पुलिस आफिसर को सस्पेंड कर दिया जाता है लेकिन वो विभाग के अपने साथियों का साथ श्रीलंका जाकर इस गैंग का खात्मा करती है। फिल्म में कई टर्न और ट्विस्ट हैं, जो फिल्म को रोचक बनाने और दर्शकों को बांधने के लिए किए गए हैं, पर मूल कहानी तो लड़कियों का गिनी पिग की तरह इस्तेमाल करने की ही है। फिल्म की कहानी, संभव है काल्पनिक हो लेकिन मानव तस्करी का जो पहलू इसमें दिखाया गया है उसको देखकर गायब होने वाली लड़कियों को लेकर समाज को चिंतित होना चाहिए। ये अपराध बेहद संगठित और समाज के इज्जतदार लोगों की सरपरस्ती में चलता हुआ दिखाया गया है। वैसे लोग जो पैसे की खातिर किसी की जान को बेचने या जान लेने में नहीं हिचकते हैं। 

फिल्म से वापस समाज में लौटते हैं। तीन चार दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चों की तस्करी को लेकर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान बेहद कठोर टिप्पणी की। अदालत ने कहा मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसिड्योर) और न्यायिक आदेशों के बावजूद दिल्ली बच्चों की तस्करी की मंडी बन चुकी है। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग से ये जानना चाहा कि बच्चों की तस्करी को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने एक बेहद ही डराने और चौंकानेवाली बात कही। याचिकाकर्ता ने एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन से एक बच्ची को बचाकर पुलिस को सौंपा गया था। आरोप लगाया गया कि पुलिस ने बचाई गई बच्ची को बाल कल्याण समिति के सामने पेश करने की बजाए उसको वापस तस्करों को सौंप दिया। बाद में वही बच्ची फिर से तस्करों के पास से मिली। अगर ये आरोप सही हैं तो ये हमारे सिस्टम पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है। कोर्ट ने इस आरोप का संज्ञान लिया है। हलांकि इस सुनवाई के दौरान ये बात भी सामने आई कि 2018 से लेकर 2024 के बीच रेलवे सुरक्षा बल ने रेलवे परिसर से 84000 बच्चों को बचाया भी। इस तरह से कई अन्य आंकड़े भी कोर्ट के समझ रखे गए थे। आज जब हमारी पुलिस व्यवस्था अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों और सुविधाओं से युक्त है तब कोर्ट की तस्करी की मंडी बनने जैसी टिप्पणी भयावह है। आज भी अगर बच्चों की तस्करी हो रही है तो उसका किन अपराध में उपयोग हो रहा होगा इस बारे में सोचकर सिहरन होती है। 

कई बार ये कहा जाता है कि फिल्में समाज के लिए संदेश देने का काम करती है। मर्दानी 3 में कम उम्र की लड़कियों का अपहरण करके विदेश भेजने की बात हो या वेबसीरीज डेल्ही क्राइम-3 में कम उम्र की लड़कियों को विदेश में बेचने की कहानी, एक संकेत तो समाज को दिया ही जा रहा है। इस तरह की कहानियां फिल्मों में आ रही हों और उसी समय इस तरह के केस कोर्ट में भी सुनवाई के लिए आ रहे हों तो ये प्रतीत होता है कि फिल्में कुछ तो कहने का प्रयास कर रही हैं। फिल्मों को बहुधा मनोरंजन कह कर खारिज कर दिया जाता है, लेकिन कई बार उनसे निकलनेवाले संदेश को पकड़ने की आवश्यकता भी है। 1950 में व्ही शांताराम की एक फिल्म आई थी दहेज। स्वाधीन भारत में दहेज की समस्या को लेकर ये फिल्म बनी थी। इस बात की कई बार चर्चा होती है कि बिहार विधानसभा में दहेज की कुरीति पर चर्चा के दौरान इस फिल्म का नाम कई बार आया था। कहा तो यहां तक जाता है कि बिहार में दहेज उन्मूलन कानून बनने के पीछे इस फिल्म की प्रेरणा थी। इस बात में सचाई हो या ना हो लेकिन इतना तो तय है कि व्ही शांताराम ने अपने फिल्म के माध्यम से इस कुरीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया था। फिल्मों से ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। आज अगर मर्दानी-3 में बालिकाओं की तस्करी का मुद्दा उठा है तो समाज को इस घृणित अपराध के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। सरकार और पुलिस तो अपने स्तर पर प्रयास करेंगी, अदालतों में सुनवाई होगीं, आदेश पारित होंगे लेकिन जबतक हमारा समाज इस अपराध के खिलाफ सजग होकर नहीं उठेगा तबतक बेटियों की तस्करी पर लगाम लगा पाना संभव नहीं है। आज जब हमारा देश विकसित बनने की राह पर अग्रसर है तब इस तरह के अपराध की समाज में कोई जगह होनी नहीं चाहिए।    


Thursday, April 2, 2020

डॉक्टरों का साहस और संघर्ष


इस वक्त कोरोना के खतरे से निबटने में डॉक्टरों की अहम भूमिका है। वो अपनी जान को खतरे में डालकर कोरोना संक्रमित लोगों का इलाज करने में और कोरोना से संक्रमित होने की आशंका वाले लोगों का टेस्ट करने में जुटे हैं। कई ऐसे डॉक्टर हैं जो कई कई दिनों तक अपने घर नहीं गए हैं। डॉक्टरों के साहस के कई किस्से दैनिक जागरण में लगातार छप भी रहे हैं। डॉक्टरों के इस साहस को हमारे देश ने हर दौर में देखा है, उनकी हिम्मत, उनके संघर्ष, उनकी मनोदशा से लेकर उनके मनोविज्ञान पर कई फिल्मों का निर्माण भी हुआ है। इस वक्त कोरोना वायरस और चीन की चर्चा हो रही है तो चीन और महामारी की पृष्ठभूमि पर बनी एक फिल्म डॉ कोटनीस की अमर कहानी की याद बरबस आ जाती है। ये फिल्म 6 मार्च 1946 को मुंबई में रिलीज हुई थी। इस फिल्म का मुख्य पात्र महाराष्ट्र के शोलापुर के डॉ द्वारकानाथ कोटनिस थे। इनको चीन जापान युद्ध के समय 1938 में भारत ने पांच डॉक्टरों के एक दल को चीन भेजा गया था। इसमें से चार डॉक्टर लौट आए लेकिन डॉ कोटनीस की वहां मरीजों की सेवा करते मौत हो गई। डॉ कोटनीस की असल जिंदगी में इतना बड़ा त्याग है कि उसको फिल्म के कैनवस पर समेटना बेहद मुश्किल था। जब चीन के सैनिक महामारी के शिकार हो जाते हैं और उसको बचाने के लिए कोई टीका नहीं था। डॉ कोटनीस टीका बनाना चाहते थे लेकिन उनके पास टीका को टेस्ट करने के लिए कोई जीव उपलब्ध नहीं था। वो इसको खुद पर टेस्ट करते थे। कई टेस्ट के बाद उनको सफलता मिली और उसके उपयोग से सैनिक ठीक होने लगे। खुद पर टीका को टेस्ट करने से उनकी हालत खराब हो गई और उनकी जान चली गई। इस पूरे सीन को फिल्म में निर्देशक ने बेहद संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ तब दिखाया है जब डॉ कोटनीस एक चाइनीज जनरल के शरीर से बुलेट निकाल रहे होते हैं। चार बुलेट निकालने के बाद जब वो पांचवां बुलेट निकालते हैं तो उनके हाथ कांपने लगते हैं और दौरा पड़ता है।   

मशहूर लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास ने डॉ कोटनीस के चीन में बिताए दिनों पर उनके साथी के हवाले से एक उपन्यास लिखा, ‘वन हू डिड नॉट कम बैक’. उन्होंने ही ये किताब व्ही शांताराम को दी थी. किताब पढ़ते ही शांताराम ने इसपर फिल्म बनाना तय कर लिया था। उन्होंने डॉ कोटनीस के मानवता के लिए किए गए अतुलनीय योगदान के लिए फिल्म बनाने का जब तय किया तो उन्होंने नेहरू, विजयलक्ष्मी पंडित और गांधी को इस बारे में पत्र लिखा और उनकी शुभकामनाओं की अपेक्षा की। विजयलक्ष्मी पंडित ने उनको पत्र लिखा, नेहरू ने उत्तर नहीं दिया और गांधी के सहायक ने उनको लिखा कि इस तरह के महत्वहीन विषयों को लेकर बापू को तंग न किया जाए। लेकिन शांताराम हतोत्साहित नहीं हुए। उन्होंने  डॉ कोटनीस की भूमिका खुद निभाने का फैसला लिया और ये भी तय किया कि डॉ कोटनीस की प्रेमिका जो बाद में पत्नी बनीं की भूमिका जयश्री निभाएंगीं। जयश्री, शांताराम की पत्नी थीं। इन फैसलों के बाद एक और मुश्किल सामने आई, जयश्री की आंखें बड़ी थी और चीनी लड़कियों की आंखें छोटी होती थीं। चीनी लड़की दिखने के लिए जयश्री का स्पेशल मेकअप करके आंखें छोटी की गई थीं।
डॉ कोटनीस की अमर कहानी के अलावा एक और फिल्म है जो डॉक्टरों के संत्रास को उनकी पीड़ा को, हाशिए पर धकेले जाने की पीड़ा को सामने लाती है। इस फिल्म का नाम है ‘एक डॉक्टर की मौत’। शबाना आजमी और पंकज कपूर अभिनीत इस फिल्म में भी एक डॉक्टर को उसके अविष्कार का श्रेय नहीं मिलता है बल्कि बुरी तरह अपमानित किया जाता है। ये भी एक बेहद खूबसूरत फिल्म है। इस तरह से हम देखते हैं कि डॉक्टरों के योगदान को हिंदी फिल्मों ने शिद्दत से रेखांकित किया है। कोरोना के इस भयावह समय में हमें डॉक्टरों को हौसला और हिम्मत देना चाहिए।        

Saturday, March 3, 2018

मजबूत पहल से निखरेगी प्रतिभा ·


आज अगर हम भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य पर नजर डालते हैं, खासकर नाटक और फिल्म के क्षेत्र में तो हमें तमाम विदेशी नाटककारों और फिल्मकारों का उदाहरण ही देखने सुनने को मिलता है। फिल्म और नाटक पर होनेवाली चर्चा में  ब्रेख्त, चेखव, हेनरिक इब्सन, कुरुसोवा, गोदार आदि के नाम ही गूंजते हैं। रूस के लेखक एंतोन चेखव के नाटकों के बारे में कहा जाता है कि 1918 से 1956 तक चेखव की रचनाओं का इकहत्तर भाषाओं में अनुवाद हुआ। पूरी दुनिया की अलग अलग भाषा में करीब पचास लाख पुस्तकें छापकर सस्ते दाम पर उसका वितरण करवाने का व्यवस्था की गई। दुनियाभर में चेखव के नाटकों के मंचन के लिए सोवियत रूस ने एक अभियान चलाया। आर्थिक के अलावा हर तरह की मदद नाटककारों को दी गई। यही हाल ब्रेख्त के नाटकों के साथ भी हुआ। हेनरिक इब्सन के नाटक अब भी हिंदी में अनूदित होकर मंचित हो रहे हैं। नार्वे के इस नाटककार के लिए वहां की सरकार ने जो जतन किए वो सबके सामने है। शेक्सपियर के साथ भी इस तरह की सहूलियत रही। अपने देश की सांस्कृतिक प्रतिभा को विश्वभर में फैलाने के लिए रूस और जर्मनी के अलावा कई देशों ने योजनाबद्ध तरीके से प्रचार किया। इसी तरह से अगर हम देखें तो फिल्मकार गोदार को धीमे ट्रैकिंग शॉट का जनक मानकर स्थापित करने के लिए दुनियाभर में प्रचार किया गया। गोदार को महान बनाने के लिए भी योजनाबद्ध तरीके से कोशिशें की गईं। लेकिन व्ही शांताराम ने जिल तरह से कैमरे का उपयोग किया उसको वैश्विक फलक पर पहचान नहीं मिल पाई। ये शांताराम ही थे जिन्होंने जिब या ट्राली शॉट के आने के पहले ही इस तरह के प्रयोग अपनी फिल्मों में किए। उस दौर में व्ही शांताराम ने बैलगाड़ी में कैमरा बांधकर जिब की तरह से उसका इस्तेमाल किया और उसको नीचे उपर करते हुए शॉट्स लिए। गंधर्व नाटक मंडली में काम करते हुए शांताराम ने जो अनुभव हासिल किए थे उसके आधार पर उन्होंने अपनी फिल्मों में बेहद क्लोज शॉट और ट्रॉली शॉट्स का इस्तेमाल शुरु किया। इस बात की चर्चा बहुत कम होती है। इसकी वजह यही है कि अबतक सरकार के स्तर पर अपने कलाकारों की कला को वैश्विक मंच पर रखने की कोशिश संजीदगी से नहीं हुई।
दुनियाभर में इस तरह के कई उदाहरण हमे देखने को मिल जाते हैं जहां सरकारें अपनी कलात्मक प्रतिभाओं के प्रचार प्रसार के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाती रही है, उसपर बजट बनाकर धन खर्च करती रही है। लेकिन हमारे देश में अपनी कलात्मक प्रतिभाओं को पूरी दुनिया के सामने पेश करने की सांगठनिक पहल नहीं हुई। इसके नाम पर होता यह था कि या तो अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भागीदारी या फिर भारत में आयोजित अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में सिनेमा का प्रदर्शन आदि करवाकर सरकारी अमला अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेता था। कल्चरल एक्सचेंज के नाम पर भी छिटपुट गतिविधियां होती थीं। भारत में आयोजित अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी सिनेमा का प्रदर्शन होता था लेकिन उसको प्रचारित प्रसारित करने के लिए खास नहीं किया जाता था। अभी हाल ही में भारत सरकार ने इस दिशा में एक ठोस पहल की है। बर्लिन में आयोजित फिल्म महोत्सव, जिसको बर्लिनाले के नाम से जाना जाता है, में सीआईआई के साथ मिलकर एक प्रतिनिधिमंडल भेजा। इसकी अगुवाई मशहूर फिल्मकार करण जौहर ने किया और सदस्य के तौर पर वरिष्ठ फिल्मकार जानू बरुआ, शाजी करुण, सेंसर बोर्ड की सदस्य वाणी त्रिपाठी, अभिनेत्री भूमि पेडणेकर, सूचना और प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव अशोक परमार के अलावा सीआईआई के प्रतिनिधि भी शामिल थे। तीन दिनों तक चले इस बर्लिनाले में भारत की तरफ से इस प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने अपने देश के सिनेमा को तो शोकेस किया ही, इसके अलावा भारत में सिनेमा निर्माण की अनंत संभावनाओं के बारे में भी इस फेस्टिवल में शामिल होनेवाले दुनियाभर के फिल्मकारों को बताया। भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के उस पहल की मंशा बर्लिनाले में जाकर भारत की विविध और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के बारे में पूरी दुनिया के फिल्माकरों को बताना था। प्रतिनिधि मंडल की सदस्य वाणी त्रिपाठी के मुताबिक तीन दिनों तक चले इस फिल्म महोत्सव में अनेक देशों के फिल्मकारों से बातचीत हुई और उनको भारत में शूटिंग करने से लेकर फिल्मों के एडिटिंग की सहूलियतों के बारे में बताया गया। इस तरह की पहल पहले शायद ही हुई हो जिसमें अंतराष्ट्रीय स्तर के निर्देशकों और भारतीय फिल्मकारों को आमने सामने बैठकर फिल्म निर्माण से लेकर सांस्कृतिक साझेदारी की संभावनाओं पर विचार करने का अवसर मिला हो। उनको भारत में फिल्म बनाने के लिए तमाम सहूलियतों के बारे में भी बताया गया जिनमें फिल्म फेलिसिटेशन ऑफिस भी शामिल है जो कि फिल्मकारों को सिंगल विंडों क्लीयरेंस देता है।ऐसा पहली बार हुआ है कि बर्लिनाले में कोई सरकारी प्रतिनिधिमंडल इस तरह के एजेंडे के साथ शामिल हुआ हो। बर्लिनाले के दौरान भारतीय दूतावास में बर्लिनाले के अंतराष्ट्रीय दर्शकों, जिनमें कई मशहूर प्रोड्यूसर्स भी थे, के सामने फिल्म नीरजा का प्रदर्शन भी किया गया। फिल्म से जुड़े लोगों को अस्सी का दशक याद होगा जब फ्रांस ने पूरी दुनिया के फिल्मकारों को तमाम तरह की सहूलियतें दी थीं। जर्मन फिल्मकार श्लौंडार्फ की 1984 में बनी फिल्म ‘स्वान इन लव’ फ्रांस में बनी थी। इनके अलावा भी कई फिल्मकारों ने फ्रांस में जाकर फिल्म निर्माण किया था। अगर भारत में भी उसी तरह का माहौल बनाया जा सके तो दुनिया के मशहूर निर्देशक यहां आकर फिल्म निर्माण कर सकते हैं। 

एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त हमारे देश में सालभर में 1500 फीचर फिल्मों का निर्माण होता है, करीब 900 टीवी चैनलों के लिए कंटेंट तैयार किए जाते हैं, पैंतालीस करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं, जिनमें से करीब 35 करोड़ के पास स्मार्ट फोन है। यह परिदृश्य अंतराष्ट्रीय फिल्म निर्माताओं के लिए एक बेहतर बाजार है जिसके बारे में उनको विस्तार से बताए जाने की जरूरत है। अगर सरकार बर्लिनाले जैसे आयोजनों में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के लोगों की लगातार भागीदारी सुनिश्चित करवाती है तो इसके कई फायदे हो सकते हैं। अगर विदेशों के बड़े फिल्म निर्माता अपनी फिल्मों की शूटिंग और पोस्ट प्रोडक्शन का काम भारत में करती है तो स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। विदेश के फिल्मकारों को क्षेत्रीय स्तर के फिल्मकारों के साथ संवाद का मौका मिल सकता है जिससे की हमारे देश की स्थानीय प्रतिभा के बारे में पूरी दुनिया को पता चल सकता है और उनको बेहतर अवसर मिल सकते हैं। प्रत्यक्ष रूप से रोजगार और परोक्ष रूप से वैश्विक स्तर पर अवसर मिलने की संभावना बनती है। भारतीय फिल्म उद्योग को भी मजबूकी मिलेगी क्योंकि जब विदेशी फिल्में यहां बनने लगेंगी तो स्थानीय प्रतिभाओं को भी वैश्विक सोच और समझ का फायदा मिलेगा।  
पिछले दिनों कला विदुषी सोनल मान सिंह ने एक बातचीत में इस बात पर दुख जताया था कि हमारे देश में आजादी के सत्तर साल बाद भी कोई सांस्कृतिक नीति नहीं बन पाई है। उन्होंने एक दिलचस्प किस्सा भी सुनाया था कि जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो उनको चेतावनी दी थी कि अगर संस्कृति मंत्रालय को उचित महत्व नहीं दिया गया तो वो उनके आवास के बाहर धरने पर बैठ जाएंगी। सोनल जी इस बात से दुखी थीं कि संस्कृति मंत्रालय को किसी भी मंत्रालय के साथ पुछल्ले के तौर पर जोड़ दिया जाता है, कभी जहाजरानी मंत्रालय के साथ तो कभी महिला और बाल विकास मंत्रालय के साथ तो कभी विमानन मंत्रालय के साथ। दरअसल ये क्षोभ इस बात से उपजा था कि संस्कृति को महत्व नहीं मिलने की वजह से भारतीय कला को दुनिया में जितना महत्व मिलना चाहिए उतना मिल नहीं पाता है। अब अगर हम कालिदास का ही उदाहरण लें तो उनके नाटकों को वैश्विक स्तर पर प्रचारित करने के लिए कितने प्रयास किए गए ये शोध का विषय हो सकता है। संस्कृत में कई ऐसे नाटक और नाटककार हैं जिनके बारे में जब विदेशी विद्वानों ने लिखा तो वो अचानक से महत्वपूर्ण हो गए। कई ऐसी फिल्में बनीं, कई ऐसे निर्देशक हुए, कई ऐसी रचनाएं रची गईं जिनको वैश्विक मंच नहीं मिल पाया। वो अलक्षित रह गए। स्थानीय प्रतिभाओं को लक्षित और रेखांकित करने के लिए इस वक्त देश में एक ठोस सांस्कृतिक नीति की जरूरत महसूस की जा रही है। जबतक वो नहीं बन पाती है तबतक बर्लिनाले में जाकर भारतीय प्रतिभा और स्थितियों को मजबूती से रखने जैसी पहल लगातार होती रहे तो दुनिया के सामने भारतीय कला और कला संपदा को प्रमुखता से पेश करने में मदद मिल सकती है।